सरकार शादी की आयु में लड़कों और लड़कियों का भेद खत्म करने वाली है और शादी की आयु दोनों के लिए न्यूनतम 21 वर्ष होगी. इस का अर्थ होगा कि यदि किसी ने अपनी मरजी से 21 साल से पहले साथ रहना शुरू भी कर दिया तो इसे लिवइन कहा जाएगा, विवाह नहीं चाहे पंडित, काजी या पादरी ने धार्मिक क्रियाकलापों से शादी करा दी हो.
यह कहना गलत नहीं है पर भारत जैसे देश में जहां लड़कियों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती है, बहुत से गरीब मांबापों के लिए अविवाहित बेटी आफत होती है. 21 साल तक घर पर रख कर उसे सुरक्षा देना देश के गरीब वर्ग के लिए संभव नहीं है.
एक तरफ लड़कियों को पीरियड्स 13-14 की जगह 10-11 में शुरू हो रहे हैं और दूसरी ओर शादी में देर हो रही है. अगर माहौल ऐसा हो जिस में घर का दरवाजा टाट का परदा हो, छत कच्ची हो, पानी लेने मीलों जाना हो, शौचालय न हो वहां 10-11 से ले कर 21 साल तक लड़की की सुरक्षा करना कितने गरीब मांबापों के बस की है?
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पुलिस वाले हैं पर वे तो खुद ही ऐसी लड़कियां की ताक में रहते हैं. अगर किसी के साथ सिर्फ छींटाकशी हो तो वह डर जाती है पर शिकायत तक नहीं कर सकती क्योंकि मांबाप के पास सिवा उसे घर में बंद कर के जाने के और कोई उपाय नहीं होता.
21 साल की आयु तक लड़कियों को समझ आ जाती है और वे घरगृहस्थी का बोझ संभालने में ज्यादा सक्षम हो जाती हैं, यह सोच ठीक है पर जब तक शारीरिक जरूरत जो प्रकृति ने दी है, का कोई जवाब न हो, कानून से कुछ भी करना लड़कियों के साथ खिलवाड़ हो सकता है.
शादी की आयु का कानून बनाना हो तो इस में सजा पंडित, काजी, मुल्ला और पादरी को देने का भी प्रावधान हो कि अगर वे इस आयु से कम की लड़की की शादी कराएंगे तो उन्हें जेल भेजा जाएगा. आजकल दोषी मातापिता ठहराए जाते हैं जो गलत है.
अगर 21 से ज्यादा का लड़का किसी 21 साल से कम उम्र की लड़की से सामाजिक, धार्मिक तरीके से शादी कर ले तो भी दोषी लड़कालड़की नहीं, उन के मातापिता नहीं, शादी कराने वाले होने चाहिए क्योंकि यदि वे शादी की रस्में नहीं कराएंगे तो कानून की नजरों में शादी होगी ही नहीं.
अफसोस यह है कि किसी सरकार, भाजपा सरकार में तो खासतौर पर पंडितों और दूसरे धर्म के दुकानदारों को सजा देने का कानून बनाने की हिम्मत नहीं है.