औरतों के सदियों से शिक्षा दी जाती रही है कि उन्हें सहनशीलता अपनानी चाहिए और अगर कोई उन के विरुद्ध कुछ कहे तो वे उसे चुपचाप सुन लें. इस सहनशीलता की आड़ में औरतों पर अत्याचार किए जाते रहे हैं और सासससुर, पति ही नहीं, देवर, जेठजेठानी और दूर के रिश्तेदार हर औरत, खासतौर पर नई बहू के खिलाफ एक मोर्चा बना लेते और रातदिन न केवल औरत के कामकाज की आलोचना का अधिकार रहता है, उस के घरवालों, बहन, पिता, भाई के चरित्र व व्यवहार को बखिया उधडऩे का जन्मसिद्ध अधिकार रहता है.

आजकल वे कानूनों ने और नई बहूओं की कमाई ने इस पर थोड़ा अंकुश लगाया है पर यह बिमारी समाप्त नहीं हुई है. यह तब है जब सरकार और धर्म के मालिक अपने खिलाफ बोले 2 शब्दों पर भी बेचैन हो उठते हैं. देश में कानूनों की भरमार है जिसमें धर्म या सरकार को सही या गलत कुछ कहने पर पुलिस वाले रात 12 बजे भी किसी को घर में उठा सकते हैं. जब से टिवट्र और इंस्टाग्राम जैसे एप बने हैं और कोई भी कुछ भी बड़ी संख्या में लोगों तक अपने विचार पहुंचा सकता है, सरकार और धर्म सत्ता औरतों से भी ज्यादा तुनकमिजाज हो गई है.

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सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त जज रोहिंदन नरीमन ने कहा है कि इस देश में, युवाओं, छात्रों, स्टेंडअप कौमेडियनों, समाचारपत्रों, वेबसाइटों पर बोले शब्दों पर राष्ट्रद्रोह के मुकदमे चला दिए जाते हैं और बहुत बार उन्हें महिनों जेलों में सडऩे को मजबूर किया जाता है. अब तक शायद ही कोई मामला हुआ तो जिसमें इन छात्रों, युवाओं, कौमेडियनों को देश के कानूनों के अनुसार अंतिम न्यायालय से अपराधी माना गया हो पर ट्रायल के दौरान ही उन्हें यातनाएं जेलों में मिल जाती है और उनके परिवार अदालतों और वकीलों पर पैसा बरसाते थकते रहते हैं. जो सहनशीलता औरतों में होने का उदपदेश दिया जाता है वह असल में सरकार व धर्म के मालिकों को दिया जाना चाहिए.

औरतों को भी हेट स्पीच का मुकाबला करना पड़ता है. शादी के तुरंत बाद से लेकर 10-20 साल तक उस के पीहर को लेकर टीका टिप्पणी चलती रहती है. वे ही लोग जो अपने धर्म या अपनी प्रिय पार्टी की सरकार के खिलाफ 4 शब्द नहीं सुन सकते, घर की सदस्या बनी बहू को वर्षों तक नहीं छोड़ते. सहनशीलता को जो सलाह औरतों को दी जाती है असल में सरकार और धर्मों को चलाने वालों को दी जानी चाहिए.

जहां बात औरतों के बारे बोलने का हक है, यह स्पष्ट है कि यह हक किसी को नहीं है, पति को भी नहीं. हर औरत का अपना आत्मसम्मान है, अपना परिवार है, पैतृर्क संबंध हैं और किसी को कुछ कहने का हक है और न उस से कुछ मिलता है. औरतों को दासी समझ कर उन्हें ताउम्र का अधिकारी मानना धर्मग्रंथों में लिखा है तो उस धर्म को घर में नहीं घुसने देना चाहिए.

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