फिल्म राइटर से निर्देशक बनेकमल पाण्डे उत्तरप्रदेश के चित्रकूट के एक छोटे से गांव से है, उन्हें बचपन से ही फिल्म इंडस्ट्री में कुछ करने की इच्छा थी. उन्होंने बहुत संघर्ष कर अपनी मुकाम हासिल की है. उनके इस संघर्ष में उनकी पत्नी रिया पांडे का हमेशा साथ रहा है. उनके दो बच्चे आरव पांडे और विहान पांडे है. पत्नी एक इंटीरियर डिज़ाइनर है. निर्देशक कमल को गृहशोभा की कहानियां, ब्यूटी, फैशन और सोच से जुड़े लेख बहुत पसंद है. इस ग्रुप की मनोहर कहानियां को भी खूब पढ़ते है.
कमल पांडे ने फिल्म साहेब बीबी और गैंग्स्टर रिटर्न्स, शादी में जरुर आना और हिट टीवी शो न आना इस देश लाडो आदि कई फिल्में और सीरियल को लिखा है. करीब 20 साल से उनकी डायरेक्टर बनने की इच्छा को अंत में एक कहानी फिल्म ‘जहाँ चार यार’ को डायरेक्ट करने का मौका मिला. एक निर्देशक के रूप में कमल की ये एक डेब्यू फिल्म है, जिसे उन्होंने बहुत मेहनत से लिखा और बनाया है. 60 प्रतिशत फिल्म लखनऊ में और बाकी गोवा में शूट किया गया हैं, क्योंकि टीम के कई लोगों को कोविड पोजीटीव हो गया था, जिससे बीच में शूट को रोकना पड़ा था.
गलत नहीं होती विचारधारा
कमल की इस फिल्म को पर्दे पर आने के लिए कुछ लोगों ने विरोध किया है, क्योंकि इसमें अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने काम किया है और स्वरा हमेशा सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने की वजह से कंट्रोवर्सी की शिकार हुई है. कमल कहते है कि अभिनेत्री स्वरा से काफी कंट्रोवर्सी जुडी हुई है, लेकिन उन्हें लेकर फिल्म फिल्म बनाने में कोई मुश्किल नहीं आई और जब मैं उन्हें कास्ट कर रहा था, तो कई लोगों ने उन्हें फिल्म में लेने से मना तक किया था, पर मेरे हिसाब से हर व्यक्ति की एक विचारधारा होती है. स्वरा की एक सोच समाज और राजनीति को लेकर है और वह अच्छा अभिनय भी करती है. मैने विचारधारा को साथ में लेकर चलने वाले को गलत नहीं समझता. फिल्म की कहानी को सभी दर्शक पसंद करेंगे और स्वरा की इमेज इसमें सामने नहीं आएगी.
नहीं मिलती तवज्जों घरेलू काम को
कमल कहते है कि बचपन से ही मैने अपने घरो या कहीं जाने पर महिलाओं की ऐसी दशा देखा है, महिलाएं पूरे घर को देखती है, लेकिन उन्हें देखने वाला कोई नहीं होता. सुबह 4 बजे उठकर घर के पूरे काम काज निपटाना और देर रात तक सब खत्म कर सोने जाना, ये सब देखते हुए मुझे लगता था कि महिलाओं का काम को थैंकलेस लाइफ कहा जा सकता है. इस विषय पर फिल्में नहीं बनी है, इसलिए मैंने इस विषय पर लिखना शुरू कर दिया. इसमें मैंने उन महिलाओं पर अधिक फोकस किया, जिनके बच्चे बड़े हो चुके है, पति अपनी कमाई में व्यस्त है और महिलाये घर पर अकेली लाइफ बिता रही है. ये कहानी बहुत पहले से मेरे दिमाग में थी, पर मैंने लॉकडाउन में इसे लिखकर पूरा किया और सौन्दर्य प्रोडक्शन हाउस में ले गया. उनको कहानी सुनाने के बाद उन्हें पसंद आई और उन्होंने मुझे इस फिल्म को बनाने की स्वीकृति दी, क्योंकि मैने उनके लिए फिल्म ‘शादी में जरुर आना’ लिख चुका था, उन्हें मेरी चॉइस पता था. इसलिए उन्हें आगे आकर इस फिल्म को बनाने में किसी प्रकार की झिझक नहीं थी.
निर्देशक बनने में लगा समय
कमल हंसते हुए कहते है कि शुरू से ही मैं राइटर और डायरेक्टर बनना चाहता था. मैं चित्रकूट के गांव मौऊ शिबो में जन्मा और बड़ा हुआ. इसके बाद इलाहाबाद और दिल्ली से पढाई की और मुंबई आ गया, मैं शुरू से ही लेखक और निर्देशक बनना था. निर्देशक की जर्नी तय करने में समय लगा पर मैंने लिखना पहले से ही शुरू कर दिया था.
मिला सहयोग
निर्देशक कमल का कहना है कि मुंबई में आने की वजह निर्माता नीरजा गुलेरी थी, जिन्होंने चन्द्रकान्ता बनाया था. उनके कई शोज चल रहे थे और उनके लेखक कमलेश्वर से मेरी बातचीत होती थी और मैं कमलेश्वर की वजह से ही नीरजा गुलेरी की शो के लिए कुछ लिखने के लिए मुंबई आया. पहला शो मेरा ‘युग’ था, जो डीडीमेट्रो पर आता था और बहुत सफल शो बनी थी. वहां से मेरा काम शुरू हुआ, जिसमे पहली फिल्म ‘शक्ति’ थी. उसके बाद रण, शो ‘ना आना इस देश लाडो’ आदि कई शोज भी लिखे है.
मिली प्रेरणा
निर्देशक आगे कहते है कि क्रिएटिव फील्ड में मेरे दादा अवधि में कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद कवितायें लिखते है. वह मेरे मन में आ गयी थी और मैंने करीब 12 साल से ही कवितायें और गीत लिखना शुरू कर दिया था. मेरे कई गीत छपे है. पहले मैं सीरियस गीत लिखता था. इसके बाद कहानियां लिखना शुरू किया. गीत मैं अभी भी लिखता हूं, लेकिन पढने का काम साइड में रह गया है. साहित्य का पाठक हूं.
मिला सहयोग
परिवार की प्रतिक्रिया कैसी रही पूछने पर वे बताते हैकि मेरे पिता देवनारायण पांडे मेरी बहुत कम उम्र में गुजर चुके थे, माँ कमला पांडे और बड़े भाई ने मेरी शिक्षा पूरी करवाई है. मैं दिल्ली आईएएस बनने आया था, लेकिन उसी बीच में मैंने लिखना भी जारी रखा, क्योंकि मुझे फिल्में लिखना और बनाना है. असल में मैंने बहुत पहले एक फिल्म ‘पथेर पांचाली’ दूरदर्शन पर देखा था. उसे देखने के बाद लगा कि मैं भी ऐसी कहानियां कह सकता हूं, जीवन से जुडी कहानी. मैं इसलिए मुंबई आया. दिल्ली से जब मैंने भाई को अपनी इच्छा को बताई, तो उन्होंने मुझे सोच-समझकर फैसला करने की सलाह दिया.
काम मिलना कठिन
मैं मुंबई साल1998 में आया और अपनी पढाई पूरी करने के लिए वापस दिल्ली गया, लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं कर पाया वापस आ गया. साल 2000 से मैं मुंबई में हूं. बड़ा ब्रेक मुझे ‘युग’ में मिला था. आउटसाइडर होने की वजह से बड़े प्रोडक्शन हाउस में एंट्री मिलना मुश्किल होता है, लेकिन मेरे मन में विश्वास था कि मैं अच्छा लिखता हूं और मेरी कहानी को लोग सुनना पसंद करते है. आउटसाइडर होने की वजह मुझे यहाँ तक पहुँचने में इतना समय लग गया. मैंने बिना किसी गॉडफादर, सोर्स या सपोर्ट के मैने अपनी जगह बनाई है. नए डायरेक्टर को मनपसंद कलाकारों को लेकर फिल्म बनाना बहुत कठिन होता है. मुझे शुरू में कठिनाइयाँ आई, लेकिन मेरी स्क्रिप्ट सुनने के बाद स्वरा ने तुरंत हाँ कह दी. इसके बाद सभी राजी हो गए. फिल्म ‘शादी में जरुर आना’ काफी पसंद की गयी थी, इससे कलाकार को निर्देशक पर विश्वासहो जाता है.
रिलीज का है डर
फिल्म रिलीज का डर बना हुआ है, क्योंकि कौन सी गैंग या लोग फिल्म की बहिष्कार के लिए पर्दे के पीछे से काम कर रही है, पता नहीं होता. उसी के बीच से अच्छी फिल्म अपनी जगह बनाएगी और लोगों तक पहुंचेगी. उम्मीद है फिल्म समय पर ही रिलीज होगी.
फिल्मो से गायब मनोरंजन
ओटीटी फिल्मों से मनोरंजन गायब है, हर फिल्म को रियल कहकर मारधाड़, हिंसा, सेक्स आदि जमकर डाल दिया जाता है, इस बारें में कमल कहते है कि मेरी राय में हिंदी सिनेमा बहुत अधिक हॉलीवुड से प्रेरित हो चुकी है. लोगों ने एक-एक पॉकेट्स में कहानियां बनानी शुरू कर दी है, जिसमे थ्रिलर, क्राइम थ्रिलर, साइकोलोजिकल थ्रिलर जैसी नाम दे दिया है. पहले जो हिंदी मनोरंजक फिल्मे बनती थी, उसका बीच में अभाव हो गया था. मैं मानता हूं कि रियलिटी कैसी भी हो,वह मैजिकल होनी चाहिए. जादुई यथार्थ को सिनेमा में क्रिएट करनी होगी, ताकि चीजे रियल होने के साथ-साथ ऑथेंटिक और आँखों को अच्छी भी लगे. मैं ऐसी फिल्मे बनाना चाहता हूं, जो मनोरंजन के साथ दिल को छुए भी. इसके अलावा मैं अभिनेता कार्तिक आर्यन और रणवीरसिंह के साथ काम करना चाहता हूं.
गुटबाजी का खतरा
फिल्म इंडस्ट्री में गुटबाजी का सिनेमा पर प्रभाव के बारें में पूछने पर कमल कहते है कि इसका प्रभाव फिल्म इंडस्ट्री पर बहुत पड़ा है. करन जौहर के ग्रुप में कोई घुस नहीं सकता. यशराज तक पहुंचना हर व्यक्ति के लिए बहुत मुश्किल है. बड़े हाउसेस आउटसाइडर की पहुँच से बाहर है. प्रतिभा की वजह से अगर मौका मिला भी है, तो उन्हें बाहर किसी के साथ काम करने नहीं देते. ये बहुत ही गलत नजरिया है, जिसे इंडस्ट्री भुगत रही है.