Zoya Akhtar : जोया अख्तर जब बचपन के बारे में सोचती हैं तो उन्हें उस वक्त देखी गई फिल्मों का ही खयाल आता है. जिस घर में उन का बचपन बीता उसे अकसर एक अस्थाई थिएटर में बदल दिया जाता था. वहां एक बड़ा सा प्रोजैक्टर हुआ करता था. एक दीवार थी जो स्क्रीन का काम करती थी और हर 20 मिनट में होने वाला एक ब्रेक.
ब्रेक में प्रोजैक्टर पर चल रही फिल्म की रील बदली जाती थी. यहीं पर जोया ने पहली बार शम्मी कपूर द्वारा निर्देशित फैंटेसी कौमेडी फिल्म ‘बंडल बाज’ देखी थी. यह 1976 में उन के जन्म के कुछ साल बाद रिलीज हुई थी. इसी घर में एक नन्ही जोया ने झपकी लेते हुए अमेरिका की क्लासिक गैंगस्टर फिल्म ‘द गौडफादर’ देखी थी. यह फिल्म अमेरिका में रिलीज होने के आधे दशक बाद भारत में रिलीज की गई थी.
बचपन में जोया इस स्क्रीनिंग की अहमियत नहीं समझ पाई थीं. इस की अहमियत का पता उन्हें बहुत बाद में चला, जब उन के पिता ने उन्हें दोबारा रूबरू कराया. उन के पिता यानी गीतकार और फिल्मों में पटकथा लेखक जावेद अख्तर. जिस रात इस फिल्म की कौपी मुंबई पहुंची उस के अगले दिन फिल्म में कट लगाए जाने थे ताकि उसे थिएटर में रिलीज किया जा सके.
फिल्म के रिलीज के लिए जिस व्यक्ति को इस की कौपी मिली थी उस ने उसे सीधे जावेद अख्तर के घर भेज दिया. जावेद और हनी ने अपने दोस्तों को घर बुलाया. जगह कम न हो इस के लिए घर का फर्नीचर तक हटा दिया. उस रात यह फिल्म 2 बार देखी गई. इस की वजह यह थी कि अगले दिन फिल्म में कट लग जाने के बाद वह अपने मूल रूप में नहीं रहने वाली थी.
सिनेमा की दुनिया
एक बच्चे के लिए इस फिल्म को समझ पाना बहुत मुश्किल था. उसे देखते हुए जोया सो भी गई थीं. 5 दशक बाद मैं और जोया समुद्र की तरफ मुंह किए उसी बंगले में बैठे थे जिस में ‘द गौडफादर’ की पहली स्क्रीनिंग हुई थी. उस के बाद उन्होंने यह फिल्म लाखों बार देखी.
जोया के लिए सिनेमा की दुनिया बहुत अनजान नहीं थी. उन्होंने इसे केवल एक दर्शक के तौर पर ही नहीं देखा था बल्कि वे खुद इस का हिस्सा थीं. उन की मां अभिनेत्री और पटकथा लेखक हनी ईरानी और उन के पिता जावेद अख्तर खुद प्रसिद्ध कलाकार थे जो उस समय सिनेमा उद्योग में काफी मशहूर शख्सियतों में शामिल माने जाते थे.
जोया के मातापिता उन्हें अकसर फिल्मों की शूटिंग पर ले जाते थे. ‘दोस्ताना’ (1980) इन्हीं फिल्मों में से एक थी. इसे जावेद ने उस समय साथी रहे सलीम खान के साथ लिखा था. सलीमजावेद हिंदी फिल्म उद्योग की वह मशहूर जोड़ी है जिस ने भारतीय सिनेमा को कई बेहतरीन और हिट फिल्में दीं. ‘दोस्ताना’ में जीनत अमान, अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा ने अभिनय किया था. जोया ने बताया कि उन्हें इस के सैट पर ‘दिल्लगी ने दी हवा…’ गाने की शूटिंग अच्छी तरह से याद है. वे ‘बसेरा’ (1986) की शूटिंग पर भी गई थीं, जिस में हनी ईरानी ने सहायक निर्देशक के रूप में काम किया था.
जोया का जीवन फिल्मों के सैट पर ही बीता है. वे कहती हैं, ‘‘सैट मेरा घर है, यह मेरे खेल का मैदान है.’’
बदलती रहती है भूमिका
कुछ ही दशकों में जोया ने अपने दर्शकों को तरहतरह की फिल्में और वैब सीरीज दी हैं. इन के जरीए वे दर्शकों को स्पेन की सड़क यात्रा पर, भूमध्य सागर में एक क्रूज शिप पर, मुंबई की झुग्गी बस्ती धारावी में और दिल्ली की भव्य और खूबसूरत हवेली में ले कर गई हैं. वे अकसर बड़े कलाकारों के साथ काम करती हैं. उन की कहानियां अनगिनत चरित्रों के बीच की उलझनों से पैदा होती नजर आती हैं. उन के प्रशंसक जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ (2011), ‘दिल धड़कने दो’ (2015) और ‘गली बौय’
(2019) के उदाहरण दिया करते हैं. वहीं आलोचकों ने ‘द आर्चीज’ (2023) पर नाराजगी भी जताई.
जोया की खुद की प्रोडक्शन कंपनी ‘टाइगर बेबी फिल्म्स’ में उन की भूमिका बदलती रहती है. इस में वे लेखिका, निर्माता और निर्देशक के तौर पर अलगअलग काम करती हुई दिखती हैं. यह कंपनी उन्होंने लंबे समय से अपनी सहयोगी रहीं रीमा कागती के साथ मिल कर बनाई है. भले ही फिल्मों का सैट जोया का घर हो, लेकिन उन्होंने उसे अपना कार्यक्षेत्र भी बना लिया है.
कुछ अलग थी मेरी मां
अपनी मां हनी ईरानी पर बात करते हुए जोया बताती हैं, ‘‘1950 के दशक के आखिर में जब हनी ईरानी ढाई साल की थीं, तब उन्हें फिल्मों में कैरियर बनाने के लिए प्रेरित किया गया. उस के बाद उन्होंने 70 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया. 1972 में रिलीज हुई फिल्म ‘सीता और गीता’ के सैट पर उन की मुलाकात जावेद अख्तर से हुई. उन्होंने जल्द ही एकदूसरे से शादी कर ली. शादी के बाद हनी ने फिल्मों में अभिनय करना छोड़ दिया. 1985 में हनी और जावेद का तलाक हो गया.
जोया अपनी मां को ‘बेहद आजाद आत्मा’ के तौर पर परिभाषित करती हैं. वे कहती हैं, ‘‘मेरी मां की शादी बहुत जल्दी हो गई, बच्चे भी बहुत जल्दी हो गए और तलाक भी बहुत जल्दी हो गया. मैं और मेरे बड़े भाई फरहान अख्तर (फिल्म निर्माता और अभिनेता) मां के साथ ही रहते थे. जब मेरी उम्र 10 साल की थीं, मम्मी 28 साल की थीं. वे मु?ा से बहुत ज्यादा बड़ी नहीं थीं. वे एक युवा और मजेदार मां थीं.
जोया बताती हैं, ‘‘उन्होंने हम भाईबहन को आजादी और छूट तो दी लेकिन साथ ही उन्होंने इस पर भी जोर दिया कि हम दयालु बनें और काम को ले कर मजबूत सिद्धांतों का पालन करें. वे हमारे गलत व्यवहार को बरदाश्त नहीं करती थीं.’’
बाल कलाकार के तौर पर जल्दी काम शुरू करने और फिल्मों को ही कैरियर बनाने के फैसले की वजह से हनी ईरानी को औपचारिक शिक्षा के लिए बहुत कम समय मिला पाया. जब उन के बच्चे बड़े हो रहे थे, तब उन्होंने पुणे में सरकार द्वारा संचालित भारतीय फिल्म और टैलीविजन संस्थान के फिल्म प्रशंसा कोर्स में दाखिला लिया. जोया और फरहान भी उन के साथ जाते थे. वहीं पर उन दोनों ने सिनेमा के प्रति अपनी मां के प्रेम को आत्मसात किया.
जोया बताती हैं, ‘‘हम ने संस्थान में बहुत समय बिताया. वहां उन्होंने हमारे साथ विश्व सिनेमा की बहुत सारी फिल्में देखीं.’’
कोर्स पूरा करने के बाद ईरानी फिल्म इंडस्ट्री में वापस लौंटी लेकिन अभिनेत्री बन कर नहीं बल्कि एक पटकथा लेखक के तौर पर. बदले हुए रूप में जल्द ही उन्होंने खुद को स्थापित करना शुरू कर दिया. उन्होंने ‘लम्हे’ (1991), ‘डर’ (1993), ‘क्या कहना’ (2000), ‘कहो ना प्यार है’ (2000), ‘कोई मिल गया’ (2003) और ‘कृष’ (2006) जैसी प्रसिद्ध फिल्मों में पटकथा लेखक के तौर पर काम किया.
फिल्मी माहौल
जोया के घर का माहौल फिल्मी था. फिल्मों को ले कर उन के घर पर खूब बात होती थी. पूरा परिवार एकसाथ फिल्मों पर चर्चा करता था. किसी खास फिल्म में अभिनय की छोटीछोटी बारीकियों पर बहस होती थी. स्क्रिप्ट कैसे बेहतर हो सकती थी, इस के तमाम पहलुओं पर आलोचनात्मक चर्चा होती थी.
जोया ने बचपन से ही अपने मातापिता को लगातार लिखते हुए देखा है. इस तरह काम करने की ऊर्जा संक्रामक हुई है. वे बताती हैं, ‘‘हमारे घर में हम बस लिखना शुरू कर देते थे, चाहे वह कोई कविता हो, गाना हो या फिर कोई निबंध. इसे किसी खास काम की तरह नहीं सम?ा जाता था. घर का माहौल ही ऐसा था कि लिखना अपनेआप हमारा एक हिस्सा बन जाता था.’’
एक आखिरी बात जो जोया के दिमाग में थी, वह थी फिल्में बनाना और यह लंबे समय तक रही. जोया कहती हैं, ‘‘उस समय हिंदी फिल्म उद्योग उतना लोकप्रिय भी नहीं था. मु?ो याद है कि जब मैं स्कूल या कालेज जाती थी, उस समय लोग हिंदी फिल्मों में बहुत दिलचस्पी नहीं लेते थे. इस में काम करने वालों को सर्कस का हिस्सा माना जाता था, जबकि आज स्थिति बिलकुल अलग है.’’
आंखें खोलने वाला अनुभव
जोया ने स्नातक की पढ़ाई के बाद, फिल्मों में काम करने की जगह विज्ञापनों में काम करना चुना. इसी दौरान उन के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ आया, जब उन्होंने मीरा नायर की पहली फिल्म ‘सलाम बांबे’ (1988) देखी. उस में मुंबई की सड़कों पर रहने वाले एक युवा लड़के की कहानी दिखाई गई थी. हालांकि जोया इस से पहले मृणाल सेन, सत्यजीत रे और श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों की फिल्में देख चुकी थीं.
जोया कहती हैं, ‘‘उस तरह की फिल्में
बनाना भी मुश्किल माना जाता था. मेरे लिए ‘सलाम बांबे’ में वह सबकुछ था, जो मैं फिल्में बनाते हुए करने का सोचती थी. यह मेरी आंखें खोलने वाला अनुभव था. मुझे हकीकत समझ आई कि हम किसी भी तरह की कहानी दिखा सकते हैं.’’
‘सलाम बांबे’ के कुछ साल बाद जोया को अपने 20वें साल में मीरा नायर के साथ ‘कामसूत्र ए टेल औफ लव’ में सहायक निर्देशक के तौर पर काम करने का मौका मिला. यह उन के लिए किसी सपने के सच होने जैसा था.
कुछ लोगों की नाराजगी
इस से अलग फिल्म के सैट पर होना जोया के लिए नया अनुभव नहीं था लेकिन उस फिल्म पर काम करते हुए उन्हें लगा कि वे काम करने के एकदम नए तरीके में डाल दी गई.
‘कामसूत्र’ अमेरिकी फिल्म थी. फिल्म निर्माण से जुड़े इस के 70त्न प्रमुख लोग भी अमेरिकन ही थे. इस के अलावा, अमेरिकी और भारतीय फिल्म उद्योग में बहुत सारे तकनीकी पहलुओं का भी अंतर था. जैसेकि सिंक्रनाइज्ड साउंड का इस्तेमाल करना, जिस से औडियो को फिल्म की शूटिंग के समय ही रिकौर्ड किया जा सकता था. उस समय पूरे बौलीवुड में इस तरह की तकनीक ज्यादातर इस्तेमाल नहीं की जा रही थी. जोया बताती हैं कि इस फिल्म से उन्होंने बहुत कुछ सीखा और इस के जरीए उन के कुछ बहुत अच्छे दोस्त बने जो आज तक उन के संपर्क में हैं.
1997 में विदेशों में रिलीज हुई इस फिल्म में बचपन की सहेलियों, 2 युवा महिलाओं की सैक्स लाइफ को परदे पर दिखाया गया था. फिल्म के रिलीज होते ही विदेश में भी इस पर समाज के कुछ तबकों ने नाराजगी जताई. भारत में भी इसे रिलीज करने की अनुमति नहीं मिली. बाद में भारतीय सैंसर बोर्ड ने फिल्म के कुछ दृश्य हटा कर और ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ इसे रिलीज करने की अनुमति दी.
भारत में इस सर्टिफिकेट का मतलब है कि इसे सिनेमाघरों में केवल वयस्क ही देख सकते हैं. हालांकि जोया के लिए फिल्म में काम करने का फैसला बहुत सहज था. वे कहती हैं, ‘‘मैं ने अपने मातापिता से कहा कि मैं 6 महीनों के लिए खजुराहो और जयपुर जा रही हूं. वहीं इस फिल्म की शूटिंग हो रही थी. इस के बाद मैं ने अपना बैग उठाया और निकल गई.’’
जोया ऐसी अकेली फिल्म निर्माता नहीं थीं जिन के काम करने का पेशेवर तरीका ‘सलाम बांबे’ देखने के बाद बदल गया हो. ठीक उसी समय एक और महिला इसे देख कर प्रभावित हुई थीं और उसी तरह का काम करना चाहती थीं लेकिन अभी तक ये दोनों एकदूसरे से अनजान थीं. जोया की तरह उन्होंने भी ‘सलाम बांबे’ देखने के बाद फिल्म निर्देशक बनने का फैसला कर लिया था. उन का का नाम था, रीमा कागती.
पहली मुलाकात और दोस्ती
रीमा और जोया की पहली मुलाकात फिल्म निर्माता कैजाद गुस्ताद की ‘बांबे बौयज’ (1998) के सैट पर हुई. वे दोनों इस फिल्म में युवा सहायक निर्देशक के रूप में काम कर रही थीं. पहली मुलाकात के बाद दोनों अच्छी दोस्त बन गईं. अगले कई सालों तक दोनों ने स्वतंत्र रूप से सहायक निर्देशक के रूप में अलगअलग निर्देशकों के साथ काम किया. उन की इस सोच के पीछे तर्क था कि वे एक निर्देशक के अधीन रह कर प्रशिक्षु बनने के बजाय फिल्म निर्देशन की अलगअलग विधाओं को जानें. भारतीय सिनेमा उद्योग में उन दिनों यह असामान्य बात थी. इसी के साथ उन की लंबे समय तक चलने वाली सा?ोदारी की शुरुआत भी हुई थी.
रीमा कागती को अपनी पहली फिल्म बनाने के लिए 2007 तक का इंतजार करना पड़ा, जब उन्होंने फीचर फिल्म ‘हनीमून ट्रैवल्स लिमिटेड’ फिल्म लिखी और निर्देशित की. यह कौमेडी ड्रामा फिल्म 6 नए शादीशुदा जोड़ों की कहानी है जो शादी के बाद मुंबई से गोवा की यात्रा पर जाते हैं. जोया इस फिल्म में कार्यकारी निर्माता के तौर पर रीमा का साथ दे रही थीं. फरहान फिल्म के निर्माताओं में से एक थे. रीमा के निर्देशक बनने के 2 साल बाद, जोया ने ‘लक बाय चांस’ फिल्म के निर्देशन के साथ अपनी निर्देशक की भूमिका की औपचारिक शुरुआत की.
यह फिल्म शायद कभी बनती ही नहीं क्योंकि फिल्म के नायक ‘विक्रम’ की भूमिका निभाने के लिए उस समय 7 प्रमुख अभिनेताओं ने मना कर दिया था. आखिर में फरहान इस किरदार को निभाने के लिए तैयार हुए. तब जा कर यह फिल्म बननी शुरू हुई. फिल्म की कहानी यह थी कि एक महत्त्वाकांक्षी अभिनेता का, जो फिल्म उद्योग में बहुत सफल है, इस सफलता को पाने के लिए लगातार नैतिक पतन होता जा रहा है.
लिंगभेद और भाईभतीजावाद
जोया की पसंदीदा फिल्मों में से एक ‘दीवार’ (1975) है, जो 2 भाइयों की कहानी है. इन में से एक पुलिस वाला बनता है और दूसरा गैंगस्टर. इस फिल्म को ले कर जोया कहती हैं, ‘‘इस में जो पापी आत्मा (गैंगस्टर) है वह मुझे बहुत आकर्षित करता है.’’
वे कहती हैं कि वही पतित आत्मा मुझे अपनी फिल्म ‘लक बाय चांस’ में भी दिखाई देती है. बौलीवुड के बारे में एक बौलीवुड फिल्म ‘लक बाय चांस’ फिल्म उद्योग के अनियमित फिल्म निर्माण, लिंगभेद और भाईभतीजावाद पर चुटीले अंदाज में मजाकिया टिप्पणियां करती है. इस की कहानी जोया और संवाद जावेद अख्तर ने लिखी थी. यह फिल्म उद्योग की अनिश्चितताओं को अंदरूनी तौर पर दिखाती है.
जोया कहती हैं, ‘‘आज अगर मैं ‘लक बाय चांस’ बनाना चाहती तो यह आसानी से बन सकती थी. अब मानसिकता बदल गई है. फिल्मों को ले कर लोगों का स्वाद बदल गया है. उस समय यह बहुत क्लासिक थी. नायक और खलनायक के बारे में थी.’’
2012 में आई फिल्म ‘तलाश’ के तौर पर, जोया अख्तर और रीमा कागती ने सह लेखक के रूप में औपचारिक रूप से अपनी पहली सस्पैंस ड्रामा फिल्म बनाई. इस का निर्देशन रीमा कागती ने किया. इस की कहानी मुंबई शहर पर आधारित है, जहां व्यक्तिगत नुकसान से परेशान एक पुलिस अधिकारी एक बड़े कद के अभिनेता की मौत की जांच करता है.
इस जोड़ी की पहली बड़ी हिट फिल्म है ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा,’ जो 2011 में रिलीज हुई थी. इस का निर्देशन जोया ने किया और कहानी रीमा और जोया ने मिल कर लिखी. फिल्म 3 दोस्तों की कहानी है, जो कमजोर पड़ती पुरानी दोस्ती को दोबारा जिंदा करने के लिए स्पेन की यात्रा की योजना बनाते हैं. वहां पहुंचने के बाद वे स्पेन घूमने निकलते हैं.
उन में से एक को वहीं प्यार होता है और वहीं ब्रेकअप हो जाता है. दूसरा दोस्त पहले अपने मातापिता को पाता है, फिर खो देता है. तीसरे को बैलों से डर लगता है और उस का डर दूर करने के लिए वे सभी वहां ‘बुल रन’ में भाग लेते हैं. इस तरह हंसीमजाक करते हुए वे अपनी कमजोर होती दोस्ती को फिर से जिंदा करते हैं.
हिट रही फिल्म
फिल्म काफी सफल रही. दर्शकों को उम्मीद थी कि इस का अगला भाग भी आएगा, लेकिन डेढ़ दशक बाद भी जोया इस को ले कर बहुत उत्साहित नहीं हैं. इस मसले पर उन से पूछने पर वे कहती हैं, ‘‘मैं सिर्फ पैसा कमाने के लिए कुछ भी नहीं करना चाहती. अगर मुझे बनाने लायक कोई कहानी मिलती है तो मैं इसे जरूर बनाऊंगी, नहीं तो ऐसे ही ठीक है.’’
जोया द्वारा निर्देशित की गई अगली फिल्म थी ‘दिल धड़कने दो,’ जो 2015 में रिलीज हुई थी. इसे उन्होंने कागती और फरहान के साथ मिल कर लिखा था. फिल्म की कहानी एक धनी परिवार की कमियों पर है, जिसे व्यंग्य और हास्य के साथ जहाज पर हो रहे उत्सव के दौरान होने वाली घटनाओं के जरीए दिखाया जाता है. यह फिल्म भी बौक्स औफिस पर हिट रही.
यही वह समय था जब जोया अख्तर और रीमा कागती ने ‘टाइगर बेबी फिल्म्स’ नाम की प्रोडक्शन कंपनी बनाई. जोया कहती हैं, ‘‘हम ने पहले से इस की कोई योजना नहीं बनाई थी. यह सब स्वाभाविक रूप से होता गया. सब से पहले तो हम ने एकसाथ लिखना शुरू किया और यह हमारे लिए काम कर गया. बाद में भी हम दोनों साथ में लिखते रहे. कंपनी के बनने की कहानी के पीछे अपने काम का स्वामित्व लेना था.
बड़े पैमाने पर प्रशंसा
टाइगर बेबी फिल्म्स की पहली और आधिकारिक फिल्म जोया द्वारा निर्देशित ‘गली बौय’ थी जो 2019 में रिलीज हुई. इस में मुंबई के स्लम एरिया धारावी के एक युवा मुसलिम रैपर की विजयी यात्रा का वर्णन है. फिल्म का किरदार अपने पारिवारिक संघर्ष और आर्थिक बो?ा से जू?ाते हुए अपनी कलात्मक प्यास को पूरा करने में लगा हुआ है. फिल्म को उस की कहानी और उस के कहने के आकर्षक अंदाज के लिए बड़े पैमाने पर प्रशंसा मिली. लेकिन इस में दिखाई गई संगीत शैली में राजनीतिक तत्त्व को कम कर के दिखाए जाने को ले कर इस की खूब आलोचना भी हुई. 2020 के औस्कर पुरस्कारों के लिए भारत की तरफ से ‘गली बौय’ को आधिकारिक रूप से भेजा गया था.
इसे अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के तौर पर नामांकित कराया गया था. हालांकि यह अंतिम चयन में अपनी जगह नहीं बना पाई. यह 2019 की सब से ज्यादा कमाई करने वाली हिंदी फिल्मों में से एक थी. जोया कहती हैं, ‘‘अपने काम के लिए हर बार जब मैं ने किसी दूसरी शैली को आजमाना चाहा, वह सफल रही. भले ही स्क्रिप्ट देख कर लगा हो कि मेरी फिल्म को बेचना मुश्किल हो सकता है. इस मामले में मैं खुश हूं. एक वाकेया को याद करते हुए वे फिल्म निर्माता करण जौहर की बात बताती हैं कि करण ने ‘गली बौय’ को ले कर कहा था कि पता नहीं कि मैं इस फिल्म (गली बौय) को एक निर्माता के रूप में चुनना पसंद करूंगा या नहीं.’’
टाइगर बेबी की परियोजनाएं इमर्सिव लोकेशंस बनाने के लिए जानी जाती हैं. जैसाकि जोया इसे ‘वर्ल्ड बिल्डिंग’ कहती हैं. वे लगातार ‘विजुअल फील और फ्लेवर’ को फिर से खोजने के तरीकों के बारे में सोचती रहती हैं. विविधता की निरंतर खोज भी उन की अपनी खोज का हिस्सा है. साक्षात्कारों में वे अकसर इस बारे में बात करती हैं कि वे न तो आर्टहाउस हैं और न ही कमर्शियल बल्कि वे खुद को वैकल्पिक और मुख्यधारा के बीच कहीं रखती हैं.
बेहतरीन निर्देशन
जोया बताती हैं, ‘‘हम हमेशा फिल्म बनाने के अलगअलग तरीकों के साथ खेल रहे होते हैं. मैं ने और रीमा ने रोमांस के और पारिवारिक नाटक भी सफलता के साथ बनाए हैं. अमेजन प्राइम पर दिखाई जा रही ‘मेड इन हैवन’ ऐसी ही एक सीरीज है, जिस पर उन्होंने कई लेखकों और निर्देशकों के साथ काम किया है. यह सीरीज वैडिंग प्लानिंग का व्यापार कर रहे 2 दोस्तों पर आधारित है जो काम को ले कर बहुत सारे मुद्दों पर एकदूसरे से ?ागड़ा करते हैं.
जोया और कागती को अपराध वाला सिनेमा भी खूब पसंद है. इसी से प्रेरित हो कर उन्होंने 2023 में एक बैव सीरीज ‘दहाड़’ बनाई जो राजस्थान के एक गांव मंडावा की कहानी है. इसे उन्होंने रितेश शाह और जिथिन के साथ मिल कर लिखा था. यह बैव सीरीज एक सीरियल किलर के बड़े और गंभीर षड्यंत्र को उजागर करती है, जिस में वह कमजोर और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को शादी का वादा कर के अपने जाल में फंसाता है और फिर साइनाइड खिला कर उन की हत्या कर देता है.
‘दहाड़’ को शहरों पर केंद्रित कहानियों से एक प्रस्थान के रूप में देखा जा सकता है, जिन पर आमतौर पर टाइगर बेबी के ज्यादातर निर्माण आधारित होते हैं. जोया ‘दहाड़’ को ‘तलाश’ के विस्तार के तौर पर भी देखती हैं. वे कहती हैं, ‘‘दोनों के केंद्र में महिला के लापता होने की समस्या है. एक महिला गायब हो जाती है और इस से किसी को फर्क नहीं पड़ता.’’
जोया का मानना है कि ऐसा करना मिलीभगत वाले एक समाज द्वारा ही संभव हो सकता है जो महिलाओं पर तरहतरह के दबाव डाल कर उन्हें गंभीर खतरे में डालता है. यह मु?ो पागल कर देता है.
‘दहाड़’ में कहानी में किरदार को महिला प्रधान रचा गया है. इस में सोनाक्षी सिन्हा एक दलित पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाती हैं. लैंगिक और जातिगत भेदभाव से लड़ते हुए वे खुद को एक पुलिस अफसर के तौर पर स्थापित करती हैं. इस में सोनाक्षी के बौस बने गुलशन देवैया, एक समर्पित पिता और खड़ूस पति के तौर पर दिखाई देते हैं. फिल्म के एक दृश्य में वे अपनी बेटी को ‘झांसी की रानी’ कह कर बुलाते हैं. ऐसा करते हुए वे बताते हैं कि वे अपने भाई से किसी भी तरह से कम नहीं हैं.
जोया इस दृश्य के बारे में कहती हैं, ‘‘मैं और रीमा इसी तरह के माहौल में बड़े हुए हैं. हमारे घरों में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं था. हमारी मांएं मजबूत हैं, वहीं हमारे पास बेहद सुरक्षित पिता भी हैं. मु?ो लगता है कि इस से बहुत बड़ा फर्क पड़ता है.’’
दुनिया को अलग नजरिए से देखना
एक महिला फिल्मनिर्माता होने के नाते बौलीवुड में महिला दृष्टिकोण लाने को ले कर जोया का मानना है कि ये दोनों बातें आपस में जुड़ी हुई हैं. वे कहती हैं, ‘‘एक निर्धारित लिंग वाले व्यक्ति के रूप में मैं दुनिया को अलग तरह से देखती हूं. मुझे दुनिया भी उसी तरह से देखती है. आप के साथ होने वाला व्यवहार भी इस तरह ही तय होता है. जब मैं अपनी कहानी बताती हूं तो मेरा अनुभव उस कहानी में आएगा ही और यह इस पर निर्भर करता है कि दुनिया ने मेरे साथ कैसा व्यवहार किय या मेरा व्यवहार कैसा रहा.’’
इस का मतलब मजबूत, दृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला पात्रों को लिखना हो सकता है. इस का मतलब नर्म, कोमल हृदय वाले पुरुष पात्रों को लिखना भी हो सकता है. भले ही यह मात्र कोरी कल्पना हो.
जोया से अकसर सवाल पूछा जाता है कि वे और ज्यादा महिला केंद्रित फिल्में क्यों नहीं बनाती हैं? इस पर वे कहती हैं, ‘‘मुझे ऐसी ही फिल्में क्यों बनानी चाहिए? मुझे वह काम करना चाहिए जो मैं करना चाहती हूं. स्वतंत्र होने का यही तो मतलब है कि वह काम कर पाना जिस में आप सक्षम हों या फिर वह जो आप करना चाहते हैं. एक खांचे में बंध कर रहते हुए कभी दूसरे में जाने की कोशिश न करना, स्वतंत्र होना तो नहीं है.’’
बौलीवुड हमेशा से ऐसे पुरुषों का गढ़ रहा है जो फिल्म की स्क्रीन के साथ बाहर भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. जब से जोया ने अपने कैरियर की शुरुआत की है, तब से फिल्म जगत में काफी बदलाव आया है. पहले से ज्यादा महिलाएं फिल्में निर्देशित कर रही हैं, कहानियां लिख रही हैं और अपनी पहचान बना रही हैं. वे कहती हैं कि उन के समय में कुछ पुरुषों ने भी मजबूत महिला किरदारों को गढ़ा है.
जब जोया से पूछा कि उन्हें महिलाओं की मित्रता पर बनी कौन सी हिंदी फिल्में सब से ज्यादा पसंद हैं तो उन्होंने श्याम बेनेगल की ‘मंडी’ (1983) और शशांका घोष द्वारा निर्देशित ‘वीरे दी वैडिंग’ (2018) आदि नाम बताए.
मातापिता को मेरा काम पसंद है
जोया अपने काम में जावेद और फरहान को भी काफी शामिल कर के रखती हैं. जब भी वे कोई स्क्रिप्ट लिखती हैं तो सब से पहले उन का परिवार उसे पढ़ता है. उस पर पहली प्रतिक्रिया भी परिवार से ही आती है. फिल्म के रफ कट भी सब से पहले परिवार के लोग ही देखते हैं. वे कहती हैं, ‘‘मुझे लगता है कि प्रतिक्रिया देते समय मेरा भाई सब से ज्यादा दयालु होता है. मेरे मातापिता इस काम को इतनी बार कर चुके हैं कि उन की प्रतिक्रिया में उस तरह का दयाभाव नहीं होता. जैसेकि मेरे पिता जावेद का पंसदीदा तरीका यह कहना है- ठीक है, मैं अच्छी बातों के बारे में बात नहीं करूंगा क्योंकि वे तो वैसे भी अच्छी हैं. चलो, उन बातों के बारे में बात करते हैं, जिन्हें सुधारने की जरूरत है.’’
जोया से जब पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि उन के अनुभवी पटकथा लेखक मातापिता उन की बनाई हर फिल्म को पसंद करेंगे तो वे कहती हैं, ‘‘मेरे मातापिता तो दर्शकों का सिर्फ एक हिस्सा हैं. मु?ो पता है कि वे मेरे काम को पसंद करेंगे. एक फिल्म निर्माता के रूप में आप चाहते हैं कि हरकोई आप के काम को पसंद करे. जब आप एक फिल्म दिखा रहे होते हैं तो आप थोड़ी घबराहट तो महसूस करते ही हैं कि वह लोगों को पसंद आएगी या नहीं.’