इनसान की जिंदगी में खानेपीने की चीजों की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता. हमारी स्वस्थ जिंदगी का आधार ही खानापीना है. लेकिन पिछले कुछ अरसे से खानेपीने की चीजों में मिलावट के मामले बहुत तेजी से सामने आ रहे हैं. नामीगिरामी कंपनियों की चीजों में भी मिलावट का जहर तेजी से घुलता जा रहा है. नैस्ले, मैकडोनाल्ड्स, डौमिनोज, मदर डेरी व अमूल डेरी जैसी तमाम कंपनियां मिलावट के मोरचे पर पकड़ी जा चुकी हैं. ऐसे में बेचारा आम आदमी तो घबरा ही जाएगा.

हमेशा नसीहत दी जाती है कि छोटीमोटी कंपनियों की चीजें इस्तेमाल न की जाएं. बस मशहूर ब्रैंडेड कंपनियों की चीजें ही खाई जाएं. मगर जब वे भी खराब साबित हों तो क्या किया जाए? वैसे भी आम लोगों के लिए ब्रैंडेड कंपनियों की महंगी चीजें खाना मुमकिन नहीं होता और फिर जब वे भी कसौटी पर फेल साबित हों, तब तो मामला ही गड़बड़ा जाता है. रईस भी हैरान रह जाते हैं कि आखिर किया क्या जाए?

बहरहाल, मिलावट वाली खतरनाक खानेपीने की चीजों के बीच इनसान सिर्फ चौकन्ना रह कर ही महफूज रह सकता है. यहां कुछ ऐसी ही जानकारी दी जा रही है, जिस पर ध्यान दे कर महफूज रहा जा सकता है:

बात दूध की

दूध को बहुत ही अच्छा व सेहत बनाने वाला माना जाता है. इसे पीने से शरीर को कैल्सियम व फैट सहित तमाम उम्दा तत्त्व हासिल होते हैं. लिहाजा हर कोई अपनी हैसियत के मुताबिक दूध का सेवन करना चाहता है. बच्चों के लिए तो दूध ही पूरा आहार होता है. मगर जब से मदर डेरी व अमूल जैसी नामी कंपनियों के दूध में मिलावट की बात उजागर हुई है तब से लोग दूध के नाम से घबराने लगे हैं. मामूली दूधियों के दूध में तो केवल गंदा पानी मिला होता है, मगर नामी कंपनियों के दूध में डिटर्जैंट व खतरनाक रसायन तक मिले पाए गए हैं.

मिलाई जाने वाली चीजें

दूध में पानी मिलाने का सिलसिला तो मुद्दत से चला आ रहा है. इस से दूध बस पतला और बेस्वाद हो जाता है. अलबत्ता गंदा पानी मिलाने से पीने वाले को बुरा तो लगता है, पर इस से ज्यादा नुकसान नहीं होता है. पानी के अलावा दूध में रंग, यूरिया, वाशिंग पाउडर व डिटर्जैंट वगैरह की मिलावट की जाती है. इन चीजों की मिलावट से इनसान की किडनियों व लिवर को नुकसान पहुंचाता है. मानव के इन अंगों का स्वस्थ रहना जीवन के लिए बेहद जरूरी है. रंग, यूरिया व डिटर्जैंट वाले दूध से ब्लडप्रैशर सहित और कई दिक्कतें हो सकती हैं, लिहाजा ऐसे दूध के सेवन से बचना जरूरी है. मिलावटी दूध की पहचान लैक्टोमीटर नामक यंत्र से की जा सकती है.

सही दूध का सापेक्षिक घनत्व 1.030 से 1.034 तक होता है. परखने के लिए दूध की कुछ मात्रा ले कर लैक्टोमीटर से उस का सापेक्षिक घनत्व परखा जा सकता है. उपकरणों की दुकान से लैक्टोमीटर खरीदते वक्त उस के इस्तेमाल का तरीका जरूर पूछें. कृषि विज्ञान केंद्र के पशु वैज्ञानिक से भी इस की जानकारी ली जा सकती है. दूध में मिलावट मिलने पर एक जागरूक नागरिक की तरह उस की शिकायत दर्ज कराने से नहीं चूकना चाहिए. किसी भी तरह की मिलावट अच्छाखासा गुनाह है.

खुशबूदार मिलावटी चावल

रोटी खाने वालों के साथसाथ चावल खाने के शौकीन भी बड़ी तादाद में पाए जाते हैं. बहुत से लोगों का तो मुख्य खाना ही चावल होता है. बिहार, बंगाल व दक्षिण भारत के ज्यादातर लोग रोटी के बजाय चावल खाना पसंद करते हैं. ऐसे में मिलावटखोर व बेईमान लोग चावलों में भी मिलावट कर के उन्हें महंगा बनाने की कोशिश से बाज नहीं आते. मैटानिल रंग व ऐसेंस की मिलावट के बल पर तमाम मिलों में उम्दा किस्म के खुशबूदार चावल तैयार किए जाते हैं, जो हकीकत की कसौटी पर उम्दा नहीं होते. लोग उन्हें बढि़या मान कर महंगे दाम पर खरीद लेते हैं और उन के खतरे से अनजान रहते हैं. ऐसे चावल खाने से खाना पचाने के सिस्टम पर तो खराब असर पड़ता ही है, इस के अलावा लिवर को भी नुकसान पहुंचता है.

हींग में भी मिलावट

रसोई में रोजाना इस्तेमाल की जाने वाली तीखी महक वाली हींग में भी आजकल खूब मिलावट की जा रही है. हींग चाहे किसी भी कंपनी की हो, मगर उस का शुद्ध होना मुश्किल होता है. आमतौर पर बेईमान किस्म के लोग हींग की मात्रा बढ़ाने के लिए उस में अरारोट मिला देते हैं. अरारोट में तो महक होती नहीं, लिहाजा उस में हींग की खुशबू (ऐसेंस) वाला कैमिकल मिला दिया जाता है. इस मिलावट से एकबारगी हींग बहुत उम्दा किस्म की मालूम पड़ती है. अलबत्ता बाद में रसायन की महक उड़ कर खत्म सी हो जाती है, पर उस का नुकसान बरकरार रहता है. मिलावटी हींग की पहचान सरल है.

माचिस की जलती तीली हींग के करीब ले जाने पर उस की लौ चमकदार हो जाती है. अगर हींग नकली होगी तो ऐसा नहीं होगा. इसी तरह शुद्ध हींग पर पानी डाल कर रगड़ने से पानी का रंग दूधिया हो जाता है, जबकि नकली हींग से पानी का रंग दूधिया यानी सफेद नहीं होता. खाद्य सुरक्षा विभाग के माहिरों के मुताबिक नकली हींग भी सेहत के लिए घातक होती है. इस से पाचनतंत्र को नुकसान पहुंचता है. लिहाजा, यह सभी का कर्तव्य है कि नकली हींग या किसी भी खराब चीज की शिकायत खाद्य सुरक्षा विभाग से जरूर करें.

बेसन का नकली पीलापन

पकौड़े, कढ़ी, हलवा वगैरह बनाने के लिए बेसन का घरघर में इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है. एक नामी कंपनी के बेसन में खेसारी दाल की मिलावट का मामला कुछ अरसा पहले सामने आया था. चूंकि चना काफी महंगा है, लिहाजा साधारण आटे और सफेद पाउडर में मैटानिल पीला रंग मिला कर धड़ल्ले से नकली बेसन तैयार किया जा रहा है. यह नकली बेसन असली चने के बेसन के मुकाबले ज्यादा पीला और खूबसूरत नजर आता है.

मैटानिल रंग वाला बेसन इनसान की किडनियों, लिवर और प्रजननतंत्र को खासा नुकसान पहुंचाता है. इस से लोगों का हाजमा भी बिगड़ जाता है. नकली बेसन की पहचान भी आसान है. इस के लिए कांच के गिलास में जरा सा बेसन लें और उस में थोड़ा सा पानी डालें. फिर उस में सांद्र हाइड्रोक्लोरिक ऐसिड (एचसीएल) की 4-5 बूंदें डालें. ऐसिड डालते ही जामुनी रंग नजर आएगा, जो इस बात का गवाह होगा कि बेसन नकली है.

आटे की नकली सफेदी

गेहूं का आटा रोजाना खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. सस्ते गेहूं की कत्थईपन लिए हुए बनने वाली रोटियां हमेशा से मामूली मानी जाती हैं, जबकि धवल सफेद रोटियां शान का प्रतीक समझी जाती हैं. मगर हकीकत यह है कि आटे में मिलावट कर के उसे फालतू सफेदी दी जाती है, जो नुकसानदेह होती है. बेईमान लोग आटे में भूसी का पाउडर मिला कर उसे फालतू सफेदी देते हैं.

खाद्य सुरक्षा विभाग ने इस पाउडर को ‘फीका स्वाद’ नाम दिया है. मिलावटी आटे को गूंधने में असली आटे के मुकाबले कम पानी की जरूरत होती है. मिलावटी आटे की रोटियां बेशक ज्यादा सफेद होती हैं, मगर उन में कुदरती मिठास नहीं होती है. इस मिलावटी आटे के इस्तेमाल से भी खाने वाले का हाजमा खराब होने का खतरा रहता है.

चटपटा अचार कितना बेकार

दादीनानी के तजरबे से बनने वाला स्वादिष्ठ अचार सदियों से प्रचलन में रहा है, मगर अब तैयार यानी रैडीमेड अचार ज्यादा बिकने लगा है. मसरूफ या निकम्मी औरतें अचार बनाने जैसे काम को फुजूल मानती हैं और बनाबनाया खरीदना ही बेहतर समझती हैं. आजकल बिकने वाले अचार में आर्जीमोन की मिलावट की जाती है, जो किडनियों व पाचनतंत्र के लिए घातक होती है. अचार में कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले तमाम मसाले भी मिलावटी होते हैं, नतीजतन बाजारू यानी रैडीमेड अचार ज्यादा ही खतरनाक हो जाता है. ज्यादा खट्टा व चटपटा अचार खाने में मजेदार जरूर लगता है, पर बाद में रुला देता है.

घटिया बिस्कुटों की भरमार

पिछले कुछ अरसे से तमाम नामी कंपनियों के बिस्कुटों में भी मिलावट के मामले लगातार उजागर हो रहे हैं यानी अब बिस्कुट भी इतने सुरक्षित नहीं रहे कि अच्छी कंपनी के बिस्कुट आंख मूद कर खा लिए जाएं. हाल ही में नामी कंपनी प्रिया गोल्ड के बिस्कुट में कमी पाई गई थी. इसी तरह मोनैको जैसे जानेमाने बिस्कुट भी कसौटी पर फेल हो गए थे.

2014 में उत्तराखंड की एक बिस्कुट कंपनी के 10 में से 5 नमूने फेल साबित हुए थे. इसी तरह मुरादाबाद की एक कंपनी के बिस्कुट भी जांच में फेल पाए गए थे. आमतौर पर बिस्कुट बनाने में इस्तेमाल किया जाने वाला मैदा घटिया व मिलावटी होता है. उस में दूसरे अनाज के साथसाथ सफेद पाउडर की भी मिलावट की जाती है. सफेद पाउडर वाले घटिया मैदे से हाजमा खराब होने का खतरा रहता है. दूसरे अनाज की मिलावट से भी नुकसान होने का डर रहता है.

नमक भी नकली

खानेपीने की चीजों में चीनी से ज्यादा नमक की अहमियत होती है. पुराने जमाने में नमक को लगभग मुफ्त का माना जाता था. तब नमक डली की शक्ल में बेहद सस्ता मिलता था. अब आयोडीन वाला नमक शानदार पैकिंग में चीनी की लगभग आधी कीमत में मिलता है. यह बात अलग है कि 1 किलोग्राम नमक का असर 1 किलोग्राम चीनी के मुकाबले कहीं ज्यादा होता है. अब यही असरदार और जरूरी नमक भी नकली मिलने लगा है. पिछले दिनों ‘खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन’ ने वाराणसी के 3 ब्रैंडों के नमक के नमूने लिए थे.

जांच की रिपोर्ट में इन नमूनों में मिट्टी के भूरेकाले कण पाए गए. शुद्ध नमक की परख के लिए उसे कांच के गिलास में पानी में घोलना चाहिए. पानी में घुलनशील होने की वजह से नमक पूरी तरह से घुल जाना चाहिए, लेकिन उस में मौजूद रेत या मिट्टी के कण वगैरह गिलास की तली में बैठ जाएंगे. इस प्रकार मिलावटी नमक की पहचान आसानी से हो जाएगी. दूसरी मिलावटी चीजों की तरह ही मिलावटी नमक भी सेहत के लिए घातक होता है. इस के इस्तेमाल से मूत्राशय में पथरी हो सकती है, जो बाद में मुसीबत साबित हो सकती है.

कुल मिला कर गेहूं, चावल से ले कर नमक तक हर मिलावटी खाने की चीज सेहत के लिए नुकसानदायक होती है. लिहाजा, इस मामले में सतर्क रहने में ही भलाई व समझदारी है. मिलावट से बचने के लिए हर मुमकिन कोशिश तो खुद ही करनी चाहिए. दूध के लिए अगर मुमकिन हो व जगह हो तो खुद ही गाय पाल लेनी चाहिए, क्योंकि गाय मिलावटी दूध नहीं देगी. इसी तरह तमाम मसाले साबुत ला कर घर में ही पीस लेने चाहिए. छोटी घरेलू चक्की लगा कर घर में ही आटा, बेसन व अन्य चीजें पीसने का इंतजाम करना अक्लमंदी होगी. इसी तरह चावलदाल वगैरह भी परिचित लोगों से खरीद कर इत्मीनान की सांस ली जा सकती है. इस के बावजूद किसी भी चीज में मिलावट का अंदेशा हो तो फौरन खाद्य सुरक्षा विभाग, निकटतम थाने या इलाके के फूड इंस्पैक्टर से शिकायत करना न भूलें.

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