1972 के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिका के कैनेथ एरो ने 1963 में ही चेतावनी दे दी थी कि स्वास्थ्य सेवा को बाजार के हवाले कर देना आम लोगों के लिए घातक साबित होगा.
इस चेतावनी का दुनियाभर में जो भी असर हुआ हो लेकिन हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं का स्वास्थ्य उद्योग में तबदील हो जाना क्या और कैसेकैसे गुल खिला रहा है, इस की ताजी बानगी बड़े वीभत्स, शर्मनाक और अमानवीय तरीके से बीती 1 दिसंबर को सामने आई.
दिल्ली के शालीमार बाग इलाके में स्थित मैक्स सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल के डाक्टरों ने एक दंपती को उन के जुड़वा बच्चों को पोलिथीन में पैक कर यह कहते थमा दी थी कि ले जाइए, ये दोनों मर चुके हैं.
जानना और समझना जरूरी है कि मैक्स सुपर स्पैशलिटी अस्पताल के डाक्टरों ने किस तरह की लापरवाही और अमानवीयता दिखाई थी जिस ने पूरे देश को झिंझोड़ कर रख दिया था. हालांकि महंगे पांचसितारा प्राइवेट अस्पतालों में होती आएदिन की लूटखसोट का यह पहला या आखिरी मामला नहीं था जिस ने सहज ही कैनेथ एरो की चेतावनी याद दिला दी, बल्कि ऐसा हर समय देश में कहीं न कहीं हो रहा होता है. और डाक्टरों को लुटेरा व हत्यारा तक कहने में लोगों को कोई संकोच या ग्लानि महसूस नहीं होती.
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जबकि जिंदा था बच्चा
शिकायतकर्ता पति या पिता आशीष की मानें तो उस ने 6 महीने की गर्भवती पत्नी वर्षा को उक्त अस्पताल में भरती किया था. भरती करने के बाद मैक्स के डाक्टरों ने गर्भस्थ जुड़वा शिशुओं के जिंदा रहने यानी बचने की संभावना महज 10-15 फीसदी ही बताई थी. निम्न मध्यवर्गीय आशीष यह सुन कर मायूस और परेशान हो उठा.
डरा कर पैसे ऐंठने के भी विशेषज्ञ हो चले डाक्टरों का यह दांव खाली नहीं गया. उन्होंने पुचकारते हुए आशीष से कहा कि खतरा टल सकता है यदि वर्षा को 35-35 हजार रुपए की कीमत वाले 3 इंजैक्शन लगाए जाएं. लगभग 1 लाख रुपए की रकम आशीष के लिए मामूली और गैरमामूली दोनों नहीं थी. पत्नी और बच्चों की सलामती के लिए वह इस बाबत तैयार हो गया तो उक्त 3 इंजैक्शन वर्षा को लगा दिए गए.
ये इंजैक्शन लगने के बाद ही चमत्कारिक ढंग से बच्चों के बचने की संभावना डाक्टरों ने बताई तो आशीष को 1 लाख रुपए खर्च करने का कोई मलाल नहीं हुआ. पैसा हाथ का मैल है, आताजाता रहता है, यह प्रचलित बात आशीष को भी मालूम थी कि जान अगर एक दफा चली जाए तो फिर कुछ नहीं हो सकता.
मैक्स अस्पताल में जाने से पहले वर्षा का नियमित चैकअप पश्चिम विहार इलाके के अट्टम नर्सिंग होम में होता था. जब भी वर्षा यहां आई तब डाक्टरों ने जांच के बाद यही कहा था कि सबकुछ नौर्मल और ठीकठाक है.
इस पर आशीष और वर्षा खुशी से फूले नहीं समाते थे. पहली दफा मांबाप बनने जा रहे नवदंपतियों की तरह उन्होंने होने वाले बच्चों के लिए खिलौने खरीदने भी शुरू कर दिए थे और बैडरूम में बच्चों के हंसते, खिलखिलाते पोस्टर भी लगा लिए थे. वर्षा के मायके वाले भी खुशखबरी सुनने का इंतजार करते अपने रस्मोरिवाज निभाने की तैयारियों में जुटे थे. आशीष और वर्षा की शादी को अभी 3 साल ही हुए थे.
नवंबर के तीसरे हफ्ते में वर्षा फिर से अट्टम नर्सिंग होम गई तो वहां की लेडी डाक्टर स्मृति ने परिवारजनों को मैक्स अस्पताल ले जाने की सलाह दी. उन के मुताबिक, वर्षा के वाटर बेग से लीकेज होने लगी थी.
आशीष या उस के पिता इस चिकित्सकीय भाषा को नहीं समझते थे. उन्हें तो बस वर्षा और होने वाले बच्चों की सलामती से सरोकार था. लिहाजा, वे भागेभागे मैक्स अस्पताल गए और
1 लाख रुपए के इंजैक्शन फिर लगवा लिए. अब खतरा टल गया है, यह बात ये लोग मैक्स जैसे नामी अस्पताल के डाक्टरों के मुंह से सुन कर ही वापस जाना चाहते थे.
खतरा कितना था और था भी या नहीं, यह इन्हें नहीं मालूम था. अस्पताल प्रबंधन के लालच का अंदाजा भी उन्हें कतई नहीं था. पहली दफा महंगे स्टार अस्पताल में इलाज के लिए जाने वाले कम पैसे वालों के साथ ऐसा न हो, तो जरूर बात हैरत की होती.
पहले तो उषारानी नाम की डाक्टर ने इन्हें यह कहते डराया कि बच्चों को जन्म के बाद 12 हफ्तों तक उन्हें नर्सरी में रखना पड़ेगा. हैरानपरेशान आशीष और उस के पिता कैलाश मैक्स अस्पताल के चाइल्ड स्पैशलिस्ट डाक्टर ए सी मेहता से मिले तो उन्होंने उषारानी की बात की पुष्टि करते सधे और कारोबारी ढंग से बताया कि शुरू के 4 दिन बच्चों को नर्सरी में रखने के 1 लाख रुपए प्रतिदिन और बाद में 50 हजार रुपए प्रतिदिन लगेंगे.
इतनी बड़ी रकम इन लोगों के पास नहीं थी. फिर भी, उन्होंने सोचा कि कहीं न कहीं से इंतजाम कर लेंगे. 29 नवंबर को वर्षा की मैक्स में ही अल्ट्रासाउंड जांच हुई थी जिस में बच्चों के पूरी तरह स्वस्थ होने की बात कही गई थी. इस से आशीष और उस के परिवारजनों ने राहत की सांस ली थी.
30 नवंबर को सुबह 7.30 बजे वर्षा ने पहले एक बेटे और फिर 12 मिनट बाद एक बेटी को जन्म दिया. सुबह 8 बजे परिवारजनों को बच्चे देखने की अनुमति मिली पर यह बता दिया गया था कि बेटी मृत पैदा हुई है और बेटा जिंदा है.
इन लोगों ने यह सोचते तसल्ली कर ली कि चलो, एक तो बचा. लेकिन फिर साढ़े 12 बजे के लगभग अस्पताल प्रबंधन की तरफ से बेटे के भी मर जाने की बात कही गई. जल्द ही आशीष के हाथ में 2 पैकेट यह कहते थमा दिए गए कि ये रहे आप के बच्चे.
कल तक जो आशीष अपनी फैमिली कंप्लीट हो जाने की आस लगाए बैठा था, उस का दिल पार्सल बना कर दी गई बच्चों की लाशें देख हाहाकार कर रहा था. उस का तो सबकुछ एक झटके में लुट गया था पर इस वक्त तक उसे यह नहीं मालूम था कि यह बेरहम लुटेरा कोई न दिखने वाला भगवान नहीं, बल्कि वे डाक्टर हैं जिन्हें भगवान के बाद दूसरा दरजा हर कोई देता है.
पैकेटों में पैक अपने नवजात बच्चों की लाशें ले कर आशीष अपने ससुर प्रवीण के साथ टैक्सी में बैठ कर चंदर विहार श्मशान की तरफ चल पड़ा.
कैसे अपने सपनों को दफन किया जाता है, यह उस से बेहतर कोई भी नहीं बता सकता. बीच में रास्ते में मधुबन चौक के पास लाश वाला पैकेट हिला, तो प्रवीण ने कहा, ‘लगता है बच्चा जिंदा है.’
यह हैरतअंगेज बात इस लिहाज से थी कि जिस बच्चे को मैक्स के डाक्टर मरा बता चुके हों वह जिंदा कैसे हो सकता है. आशीष ने इसे वहम समझा और उसे लगा कि गाड़ी हिलने की वजह से पैकेट हिला होगा, इसलिए प्रवीण को ऐसा लगा.
लेकिन बात सच थी. प्रवीण के हाथों में रखा पैकेट वाकई हिल रहा था, लग ऐसा रहा था, मानो बच्चा पांव झटक रहा हो. दोनों ने वक्त न गंवाते पैकेट खोलना शुरू किया जिसे बांधने में कोई लापरवाही नहीं की गई थी. पैकेट 5 परतों में बांधा गया था जिसे खोलने में लगभग 3 मिनट लग गए.
बच्चा वाकई जिंदा था, उसे ले कर वे तुरंत नजदीक के पीतमपुरा स्थित अग्रवाल अस्पताल ले गए. वहां तुरंत बच्चे को भरती किया गया और तुरंत ही उस का इलाज भी शुरू हो गया. अग्रवाल अस्पताल में मौजूद डाक्टर संदीप अग्रवाल ने बच्चे के जिंदा होने की पुष्टि की, साथ ही, यह भी बताया कि इंफैक्शन के चलते उस के बचने की उम्मीद कम है.
6 दिन इलाज हुआ पर बेटा बचा नहीं. इस के बाद सामने आई मैक्स की लारवाही या हैवानियत, कुछ भी कह लें, एक ही बात है. संदीप उस के घर वाले और नातेरिश्तेदार धरनाप्रदर्शन करने लगे तो दिल्ली हिलने लगी. ये लोग इंसाफ के साथसाथ उन 2 डाक्टरों को सजा दिए जाने की मांग कर रहे थे जिन्होंने बच्चे को मृत बता कर उन्हें दफनाने के लिए दे दिया था. इस बाबत आशीष ने शालीमार बाग थाने में एफआईआर दर्ज कराई. पुलिस ने आईपीसी की धारा 308 के तहत मामला दर्ज किया.
मामले ने तूल पकड़ा तो दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने पत्रकारवार्त्ता बुला कर बताया कि इस मामले की गंभीरता से जांच की जाएगी. इस बाबत जांच कमेटी गठित कर दी गई है. उस की रिपोर्ट आते ही कार्यवाही हुई. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मैक्स अस्पताल का लाइसैंस रद्द कर दिया. इस पर दिल्ली मैडिकल एसोसिएशन यानी डीएमए ने एतराज जताते, बल्कि सरकार को धमकी देते, कहा कि अगर मैक्स का लाइसैंस रद्द करने का फैसला वापस नहीं लिया गया तो डीएमए कामकाज ठप कर देगा और डाक्टर्स काम नहीं करेंगे.
मैक्स के हक में डीएमए ने तर्क दिए जिन के माने सिर्फ इतने भर थे कि हम चोरी भी करेंगे और फिर सीनाजोरी भी. बच्चा प्रीमैच्योर था और सरकार ने एक हजार परिवारों की रोजीरोटी पर संकट खड़ा कर दिया है, जैसी बातें आशीष के इस बयान के सामने कुछ भी नहीं थीं कि उस के बच्चे को 3 घंटे इलाज नहीं मिला, उसे किसी सामान की तरह पैक कर दिया गया था जबकि वह जिंदा था.
कानूनन डाक्टरों को काफी छूटें मिली हुई हैं, पर इस मामले में उन की करतूत छिपाए नहीं छिप रही है. न तो चिकित्सकीय दृष्टि से वे खुद को सच साबित कर पा रहे हैं और न ही कानूनी लिहाज से कोई राहत उन्हें मिलने की संभावना दिख रही.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मैडिकल माफिया से एक आम परिवार के हक में सीधे टकराने की हिम्मत दिखाई. यह वाकई तारीफ की बात है जिस से देशभर के लोगों को उम्मीद बंधी कि अगर सभी राज्य सरकारें सख्त हो जाएं तो ऐसी नौबत ही क्यों आए. हालांकि, कुछ ही दिनों बाद मैक्स अस्पताल का लाइसैंस बहाल कर दिया गया.
इसी तरह गुरुग्राम स्थित फोर्टिस अस्पताल में डेंगू से बच्ची की मौत और इलाज के लिए 16 लाख रुपए का बिल वसूलने के आरोप में वहां के एक डाक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई.
हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने कहा कि जांच पैनल की रिपोर्ट के आधार पर आपराधिक धाराएं जोड़ी जाएंगी.
उदाहरणों से भयावह आंकड़े
ऐसी नौबत जबतब आती रहती है जिस में प्राइवेट अस्पतालों पर लूटखसोट करने का आरोप सच साबित होता है. मृत व्यक्ति को 7 दिन वैंटीलेटर पर रखा, जीवित को मृत बता दिया, जब तक बिल अदा नहीं किया तो शव नहीं दिया गया या फिर दिल्ली के नजदीक ही गुरुग्राम में डेंगू पीडि़त एक बच्ची के इलाज का बिल 15 लाख रुपए आया जैसी खबरें अब चौंकाती नहीं हैं बल्कि बताती हैं कि लोकतांत्रिक सरकारें राजशाही से ज्यादा खोखली हैं.
हालांकि यह मसला भी सोचनीय है कि जब हमें चिकित्सा सुविधा पास के सामान्य या सरकारी अस्पतालों में मिल जाती है तो फिर लोग उन मल्टी स्पेशिऐलिटी वाले अस्पताल का रुख करते ही क्यों हैं जहां के खर्चे व मैंटिनैंस चार्जेज इतने भारी होते हैं.
मैक्स सरीखे लग्जरी अस्पतालों में हर तरह की सर्जरी के अलावा बड़ेबड़े मर्ज का इलाज करने के लिए बहुमंजिला होटल जैसी सुविधाएं दी जाती हैं. लोग मामूली बुखार से ले कर बड़े मर्ज के इलाज के लिए यहां आ कर भीड़ बढ़ाते हैं जबकि 60 प्रतिशत बीमारियां तो आप के नजदीकी अस्पताल में कर्म खर्चे पर ही ठीक हो सकती हैं. या फिर ऐसे अस्पताल का रुख करें जहां सिर्फ उसी विशेष बीमारी का इलाज होता हो. इस से अतिरिक्त टैस्ट करवाने या पैसे ऐंठने के विकल्प ही खत्म हो जाएंगे और फिर ये अस्पताल भी अपनी मनमानी के बिल नहीं जोड़ेंगे.
लोग महंगे अस्पतालों में जा कर लुट रहे हैं तो कोई भी यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि आखिरकार लोग वहां इलाज के लिए जाते ही क्यों हैं. यह एक संवेदनशील बात है जो सच के करीब लगती है, लेकिन इस का सीधा संबंध सरकार से भी है जो शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जवाबदेह होती है.
लोग महंगे अस्पतालों में जाते ही क्यों हैं, इस की जगह अगर यह सवाल पूछा जाए कि अस्पताल इतने महंगे क्यों हैं, तो जवाब की तरफ बढ़ने में सहूलियत रहेगी.
पेंच इतना भर नहीं है कि बड़े अस्पतालों की लागत और खर्च भी ज्यादा होते हैं और वे सरकार को टैक्स भी ज्यादा देते हैं और तमाम बड़े नेता व अफसरों का लगभग मुफ्त के भाव इन में इलाज होता है. सच यह है कि सरकार के निकम्मेपन के चलते पिछले 20 सालों से ब्रैंडेड अस्पतालों की शृंखला खूब फलफूल रही है जिन में निचुड़ता आखिरकार आम आदमी ही है.
साल 2017 की शुरुआत में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ब्रैंडेड अस्पताल संचालकों के कान उन के नाम के साथ करतूतें गिनाते खींचे थे. वह भी एक मीटिंग में, तो उन की घुड़की से अस्पताल संचालक सहमे थे.
पर हर जगह ऐसा नहीं होता. वजह, स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफाखोरों के हवाले करने की जिम्मेदार सरकार लूटखसोट पर अंकुश लगाने के लिए कोई पहल नहीं करती. अस्पतालों में दवाओं के दाम अलगअलग हैं, सेवाओं की फीस अलगअलग हैं, और इस के बाद भी कोई मरीज अगर लापरवाही के चलते मर जाए तो प्राइवेट अस्पतालों को आमतौर पर कोई सजा क्यों नहीं होती, इन सवालों के जवाब आंकड़ों से गिनाए जाएं तो समझ आता है कि सरकार की नीतियां भी कम दोषी या जिम्मेदार नहीं.
बात कम हैरत की नहीं कि देश में कुल 19,817 सरकारी अस्पताल हैं जबकि प्राइवेट अस्पतालों की तादाद 80,671 है. इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के मुताबिक, देशभर में रजिस्टर्ड एलोपैथिक डाक्टरों की संख्या 10,22,859 में से महज 1,13,328 डाक्टर ही सरकारी अस्पतालों में हैं यानी 90 फीसदी डाक्टर प्राइवेट सैक्टर में हैं.
देश की 75 फीसदी आबादी इस लिहाज से प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर कर दी गई है. यानी घोषित तौर पर स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हो चुका है जिस की चांदी कोई दर्जनभर ब्रैंडेड अस्पतालों की शृंखला, जिसे चेन कहा जाता है, काट रही है. सरकार स्वास्थ्य पर प्रतिव्यक्ति महीनेभर में 100 रुपए भी खर्च नहीं करती है.
जब बुनियादी सेवाएं बिकने लगती हैं तो वे पूरी तरह पूंजीपतियों की मुट्ठी में कैद हो कर रह जाती हैं. चूंकि कोई कुछ नहीं बोलता, उलटे, बतौर फैशन, यह कहा जाता है कि अगर जेब में पैसा है तो महंगे अस्पतालों में इलाज से हर्ज क्या.
हर्ज यह है कि फिर सरकार अपने बजट में कटौती करने लगती है. साल 2000 से ले कर 2017 तक स्वास्थ्य का सरकारी बजट 2,472 करोड़ से बढ़ कर 48,871 करोड़ रुपए हुआ लेकिन इन्हीं 17 सालों में प्राइवेट अस्पतालों का कारोबार साढ़े 6 लाख करोड़ का रिकौर्ड आंकड़ा छू रहा है जो साल 2000 में केवल 50 हजार करोड़ रुपए था.
यह पैसा कोई आसमान से नहीं बरस रहा, न ही प्राइवेट अस्पतालों के कारोबारी अपनी जेब से लगा रहे, बल्कि यह आशीष जैसे आम मेहनतकश लोगों की जेबकतरी का नतीजा है जिस पर कभीकभार कोई बड़ा हादसा होने पर ही हायहाय मचती है. मैक्स ग्रुप का सालाना टर्नओवर 17 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है, कैसे है, यह भी आशीष जैसे पीडि़त नहीं समझ पाते कि सरकारी अस्पतालों पर जानबूझ कर पसराई गई बदहाली इस की बड़ी जिम्मेदार होती है जो यह कहती है कि अगर अपने जिंदा बच्चे को जिंदा चाहिए तो 50 लाख रुपए जमा करो.
हर कोई जानता है कि सरकारी अस्पताल में जाने पर डाक्टर के मिलने की गारंटी नहीं, लेकिन प्राइवेट अस्पताल में है जहां हर विजिट के 500 रुपए से ले कर 1,500 रुपए डाक्टर को देने पड़ते हैं. यह डाक्टर सरकारी अस्पताल के ही सुविधाभोगी चैंबर में बैठा या तो टीवी देखता रहता है या फिर वीडियो गेम खेल रहा होता है पर इस सवाल का जवाब कोई नहीं देता कि चंद कदमों की दूरी नापने के 500 रुपए क्यों. इसी एक डाक्टर से अस्पताल उस की 20 विजिट पर 10 हजार रुपए रोज कमाता है. ऐसे 10 डाक्टर हों तो यह आंकड़ा एक लाख रुपए रोजाना का होता है.
लूटखसोट के इस कारोबार में हर कोई हाथ धो रहा है. हर छोटे शहर में कई नर्सिंगहोम होने लगे हैं जो कुछ दिन मरीज की जेब कुतरने के बाद इलाज पूरा न हो पाने पर उसे नजदीक के बड़े शहर में भेज देते हैं. बोलचाल की भाषा में इसे रैफर करना कहा जाता है. बडे़ जेबकतरे अपनी शानोशौकत, चमकदमक और हैसियत के मुताबिक जरूरतमंद मरीजों की बचीखुची रकम लूट लेते हैं. मरीज ठीक हो जाए तो ठीक, वरना कहने को परंपरागत भारतीय जुमला ‘हरि इच्छा’ तो है ही.
लैबों की लूट
पैथोलौजी की दरें बंधी हैं. मामूली बुखार में भी कई तरह की जांचें प्राइवेट अस्पताल में गंगाडुबकी की तरह अनिवार्य होती हैं. कमीशनखोरी पैथौलाजी में भी खूब चलती है. तरहतरह के माफिया देशभर में सक्रिय हैं-किडनी माफिया, हार्ट माफिया, कैंसर माफिया और अब तो पेंक्रियाज माफिया तक होने लगे हैं.
देशभर में सरकारी बसें अब गांवदेहातों की तरफ ही चलती दिखती हैं क्योंकि घाटे के चलते वहां कोई प्राइवेट ट्रांसपोर्टर जाने को तैयार नहीं होता. ठीक यही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का है. सरकार ने अस्पताल खोलना कम कर दिया है और अस्पतालों की बदहाली बढ़ा दी है ताकि मरीज घबरा कर प्राइवेट अस्पतालों की तरफ भागें.
कहने का मतलब यह नहीं कि प्राइवेट अस्पताल न हो, वे हों, पर लूटखसोट करने का हक उन से छीना जाना चाहिए.
अस्पतालों की लूटखसोट अब भी कम होगी, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. प्राइवेट स्कूलों की तरह उन्हें फीस कम करने के लिए सरकार मजबूर नहीं कर सकती और करेगी भी तो वे हजार नए रास्ते ढूंढ़ लेंगे. इन को ठिकाने लगाने का इकलौता रास्ता सरकार के पास यह है कि ये अस्पताल रोज का हिसाब सार्वजनिक करें जैसा कि जीएसटी लागू होने के बाद हर छोटेबड़े व्यापारी को करना पड़ रहा है, तभी इन की पूरी पोल खुलेगी.
मरीज भी अपने कानूनी अधिकारों को जानें
निजी अस्पतालों में जिस तरह से मरीजों को ठगा जाता है, उन से बचने के लिए हमारी न्यायिक प्रणाली में कुछ कानून भी हैं जिन का उपयोग कर के आप अपने मरीज के खर्चे और अस्पताल द्वारा उठाए जा रहे कदमों की जानकारी ले सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता ऋचा पांडे ने मरीज के हित में बनाए गए कानूनों की व्याख्या की.
एमआरटीपी एक्ट 1969 : इस के तहत कोई भी अस्पताल चाहे वह सरकारी हो या प्राइवेट, किसी भी खास जगह या दुकान से दवाइयां खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. इस कानून के तहत दवा विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए.
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 : हमारे देश में पेशेंट राइट नाम का कोई कानून नहीं है जबकि कई देशों में मरीजों के हित के लिए कानून बनाए गए हैं और सजा का भी प्रावधान है. लेकिन हम यहां स्वास्थ्य सेवा के उपभोक्ता होने के नाते देश के उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (1986) कानून के तहत अपने अधिकार की लड़ाई लड़ सकते हैं.
सूचना का अधिकार कानून 2005 : 2005 के बाद जो आम लोगों के हाथों में हथियार आया है वह है, सूचना का अधिकार. इस कानून के तहत सब से पहले हमें डाक्टर और अस्पताल से ये जानने का अधिकार है कि मरीज पर किस तरह का उपचार चल रहा है, जांच में क्या निकल कर आया और दवाइयों से कितना सुधार है. मरीज के परिजन और मरीज इस की जानकारी अस्पताल से मांग सकते हैं. सूचना के अधिकार का उपयोग कर के आप जो डाक्टर आप का इलाज कर रहा है उस की योग्यता, डिगरी की जानकारी की मांग भी कर सकते हैं.
क्लिनिकल इस्टैब्लिशमैंट एक्ट 2010 : इस कानून को देश के सभी राज्यों ने लागू नहीं किया है. इस अधिनियम के तहत हर अस्पताल, क्लिनिक या फिर नर्सिंग होम को रजिस्टर करना अनिवार्य होता है. साथ ही, एक गाइडलाइन के तहत हर बीमारी के इलाज और टैस्ट की प्रक्रिया निर्धारित है. और ऐसा न करने पर इस एक्ट में जुर्माने का प्रावधान भी है.
प्रोफैशनल कंडक्ट ऐंड ऐथिक्स एक्ट : आईएमए ने भी डाक्टरों के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं जिस में अगर आप को इमरजैंसी में इलाज की जरूरत है तो कोई डाक्टर इस के लिए आप को मना नहीं कर सकता जब तक फर्स्ट एड दे कर मरीज की स्थिति खतरे से बाहर न कर लें.
इंडियन जर्नल औफ मैडिकल ऐथिक्स : कोई मरीज नहीं चाहता कि उस की बीमारी का पता परिवार वालों को चले तो डाक्टर कभी भी उस बीमारी की परिवारवालों से चर्चा नहीं करेंगे. साथ ही, अस्पताल में ऐडमिट मरीज अपनी बीमारी के बारे में सैकंड ओपिनियन या दूसरे डाक्टर की सलाह ले सकता है. ऐसा करने से कोई भी अस्पताल या डाक्टर रोक नहीं सकता. लेकिन अगर दूसरे डाक्टर की ओपेनियन पहले से अलग है तो किसी भी डाक्टर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
किसी भी मरीज की सर्जरी के पहले यह डाक्टर की जिम्मेदारी है कि वह औपरेशन, सर्जरी के पहले मरीज के परिजन को संभावित खतरों की पूरी सही जानकारी दे और एग्रीमैंट लैटर पर उन के साइन ले. मरीज को दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने या डाक्टर बदलने के लिए अस्पताल को समय से रहते इस की सूचना मरीज के परिवारवालों को देनी चाहिए. मरीज के केस से जुड़ी पूरी प्रक्रिया सभी खर्चे के ब्योरे सहित अस्पताल से मरीज व उस के परिजन ले सकते हैं.
– साथ में दीपनारायण तिवारी