धर्म के नाम पर ढोंग, पाखंड और आडंबर के खेल में 4 दशकों तक जनता को मूर्ख बनाता रहा आसुमल सिरूमलानी उर्फ आसाराम बापू आखिरकार आजीवन सीखचों के पीछे चला गया. अदालत में साढे़ 4 वर्षों तक चली कार्यवाही में आसाराम के झूठ, पाखंड से आवरण हटा कर उसे बलात्कारी सिद्ध कर बेनकाब कर दिया गया. यह फैसला उस समय आया है जब देश में चारों ओर धर्म, जातीय नफरत की फैली विषैली हवा का माहौल है और समूचा देश बच्चियों व महिलाओं के साथ हो रहे पाश्विक हमलों से आहत, उद्वेलित है. बच्चियों के यौनशोषण को ले कर धर्मों में तूतू मैंमैं हो रही है. असुरक्षा और अविश्वास के वातावरण के बीच जोधपुर की विशेष अनुसूचित जाति, जनजाति अदालत ने ढोंगी आसाराम को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने का फैसला सुना कर न्याय के प्रति एक नई आशा जगाई है.
15 अगस्त, 2013 की रात को आसाराम ने जोधपुर स्थित अपने आश्रम में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की लड़की के साथ यौन दुराचार किया. लड़की आसाराम के छिंदवाड़ा स्थित गुरुकुल में पढ़ती थी. उसे कुछ मानसिक परेशानी हुई तो स्कूल के निदेशक शरद चंद्र और वार्डन शिल्पी मिल कर उसे आसाराम के पास जोधपुर ले गए. उस के मातापिता को भी जोधपुर बुला लिया. कहा गया कि लड़की पर ‘बुरी आत्मा’ का फेर है, इस का इलाज किया जाएगा. जोधपुर आश्रम में आसाराम ने उसे कुटिया में बंद किया. डेढ़ घंटे तक बंधक बना कर रखा. लड़की के मांबाप को बाहर बैठा कर रखा गया. बलात्कार किए जाने के बाद लड़की अपने मांबाप और भाई के साथ रवाना हुई तो रास्ते में उस ने मांबाप के गुरु यानी आसाराम की काली करतूत का खुलासा किया.
घिनौनी करतूत पीडि़ता ने अपने बयानों में जो कुछ बताया, अदालत ने 25 अप्रैल, 2018 को दिए अपने फैसले में उसे शामिल किया, ‘‘मैं जोधपुर के मणाई आश्रम में सीढि़यों के पास बैठी हुई थी तो बापू ने पीछे वाले दरवाजे से इशारा कर के मुझे बुलाया. मैं आ गई तो बापू ने कहा कि जाओ, देख कर आओ कि तुम्हारे मम्मीपापा क्या कर रहे हैं. मैं ने जा कर देखा तो पापा चले गए थे, मम्मी गार्डन के गेट पर बैठी थीं. वापस आ कर मैं ने बापू को बताया कि मम्मी बैठी हैं और पापा चले गए हैं.
‘‘उस दौरान बापू ने पहले से ही रूम की लाइट बंद कर दी थी और वे बेड पर लेटे हुए थे. उन्होंने मुझे बेड पर अपनी साइड में बिठा लिया और फिर मेरा हाथ सहलाने लगे. उन्होंने मुझ से कहा कि पढ़लिख कर क्या करोगी. मैं तुम्हें वक्ता बना देता हूं. तुम समर्पित हो जाओ. हमारे साथ ही रहना. मैं तुम्हारी जिंदगी संवार दूंगा. फिर उठ कर उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और बदतमीजी करने लगे. ‘‘जब उन्होंने अपने कपड़े उतार लिए, तो मैं चिल्लाई कि आप यह क्या कर रहे हो, तो उन्होंने मेरा मुंह दबा दिया और धमकाया कि जरा सी भी आवाज निकाली तो देखना, मैं क्या करता हूं. तुम्हारे मांबाप को मरवा दूंगा. तुम्हारा खानदान खत्म हो जाएगा.
‘‘फिर वे बदतमीज करने पर उतारू हो गए, कहा कि मेरे प्राइवेट पार्ट को छुओ और…करो.’’ पीडि़ता ने इस आशय के बयान दिए हैं कि आसाराम ने उस के प्राइवेट पार्ट और मुंह पर और सभी जगह किस किया. वह रो रही थी कि उसे छोड़ दो.
पीडि़ता ने अपने बयान में आगे बताया कि उस ने आसाराम से कहा, ‘‘हम तो आप को भगवान मानते हैं. आप यह क्या कर रहे हो.’’ करीब सवा घंटे बाद आसाराम ने उसे छोड़ा और कहा कि अपने बाल व कपड़े ठीक कर लो, फिर जाना और किसी से कुछ मत बताना.
अदालत ने अपने फैसले में लिखा है कि पीडि़ता इस घटना से शौक्ड रह गई. जिस आदमी को वह भगवान समझती थी उस ने उस के साथ ऐसी घिनौनी हरकत की. उस के कपड़े खोल डाले. वह कुछ सोच नहीं पा रही थी. जब वह कमरे से बाहर आई तो उस की मां गार्डन के गेट पर बैठी हुई थी. वह अपनी माता के साथ रूम में आ गई. उस की माता ने पूछा भी था कि क्या हुआ तो उस ने कहा कि अभी यहां से चलो. बापू अच्छा इंसान नहीं है. जज ने फैसले में आगे लिखा है कि इस साक्ष्य से अभियोजन पक्ष आरोपित अपराध की आधारशिला साबित करने में सफल हुआ है. यह तय कानून है कि पीडि़ता का एकमात्र साक्ष्य ही अपराधी को दंडित करने के लिए पर्याप्त है, बस, सावधानी यह रखनी है कि बयान संदेह से परे और विसंगतियों से हीन हो. न्यायाधीश के अनुसार, उक्त साक्ष्य को किसी संपुष्टिकारक साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है. न्यायालय ने उपरोक्त साक्ष्य को देखते हुए यह तय किया कि अभियुक्त ने उस पर आरोपित अपराध किया ही होगा.
थाने पहुंचा मामला लड़की ने मांबाप को सारी बात बताई तो पिता ने कहा कि वह बापू से पूछेगा कि आखिर उस ने ऐसा क्यों किया. लड़की के पिता कर्मवीर सिंह ने आसाराम के सहायक से पूछा कि बापू कहां है. सहायक ने बताया कि उन का 19 अगस्त को दिल्ली में सत्संग है.
मांबाप लड़की को ले कर दिल्ली आए. वहां आसाराम का सत्संग का पंडाल तो लगा था पर वह नहीं आया. इस पर उन्होंने दिल्ली के कमला मार्केट थाने में एफआईआर दर्ज कराई. पुलिस ने जीरो एफआईआर लिखी. पीडि़ता के बयान लिए और मैडिकल जांच कराई. बाद में जीरो एफआईआर जोधपुर ट्रांसफर कर दी गई. 31 अगस्त को जोधपुर पुलिस ने आसाराम को बड़ी हीलहुज्जत के बाद इंदौर से गिरफ्तार कर लिया. लड़की के मातापिता आसाराम के अंधभक्त थे. ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय करने वाला लड़की का पिता आसाराम को खुलेहाथों दानदक्षिणा देता था. उस ने शाहजहांपुर में आसाराम के लिए एक आश्रम भी बनवा कर दिया था. आसाराम के प्रवचनों में यह परिवार नियमित जाता था. तरहतरह के हथकंडे आसाराम ने सजा से बचने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाए. शुरू में उस ने लड़की को झूठा बताया.
कहा गया कि 50 करोड़ रुपए झटकने के लिए साजिश की गई है. साथ ही, लड़की के घर वालों पर समझौते के लिए दबाव बनाया. खुद की बीमारी का बहाना बनाया और स्वास्थ्य के झूठे प्रमाणपत्र पेश किए. सरकार और अदालतों पर दबाव डालने के लिए प्रदर्शन करवाए. जमानत के लिए आसाराम व उस के अंधभक्तों द्वारा सुप्रीम कोर्ट तक को प्रभावित करने की कोशिशें की गईं. मामले को सांप्रदायिक रंग दिलाने के प्रयास किए गए. नेताओं से कहलवाया गया कि किसी हिंदू संत को ही क्यों फंसाया गया. सोनिया गांधी के इशारे पर फंसाने का आरोप लगाया गया. यहां तक कि आसाराम ने खुद को नपुंसक साबित करने की कोशिश भी की.
आसाराम पर जब बलात्कार का आरोप लगा तो भक्तों की फौज यह सच स्वीकार करने को तैयार नहीं थी. यह अराजकता का ऐसा नमूना है कि उस के जेल जाने और मुकदमा शुरू होते ही तमाम और मामले खुले, मामलों में गवाहों पर जानलेवा हमले भी शुरू हो गए. उन के एक निजी सहायक और आश्रम के एक विश्वासपात्र रसोइए समेत 3 गवाहों की हत्याएं भी कर दी गईं. कई और हत्याएं हुईं, कई गवाह लापता हुए. आसाराम को बचाने के लिए दिल्ली से राम जेठमलानी, सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे नामी वकीलों को जोधपुर बुलाया गया. फिर भी उसे छुड़ाया नहीं जा सका. उस की जमानत के लिए 12 बार अर्जी लगाई गईं पर हर बार वे निरस्त कर दी गईं.
संतों की छवि को नुकसान अपने फैसले में जज मधुसूदन शर्मा ने लिखा है, ‘‘अभियुक्त ने न केवल पीडि़ता का विश्वास तोड़ा, आम लोगों में संतों की छवि को नुकसान भी पहुंचाया. सजा देने का उद्देश्य समाज को सुरक्षित करना है और अभियुक्त को रोकना है. अपराध न केवल पीडि़त, बल्कि उस समाज के विरुद्ध भी है जिस से अपराधी और पीडि़त संबंध रखते हैं. उचित दंड नहीं दिया तो कोर्ट कर्तव्य से पथभ्रष्ट हो जाएगा.
फैसले में आगे लिखा है, ‘‘अभियुक्त के प्रति अवांछित सहानुभूति न्याय व्यवस्था को अधिक हानि पहुंचाएगी क्योंकि इस से जनता का विधि की व्यवस्था में विश्वास कम होगा. यदि न्यायालय क्षतिग्रस्त व्यक्ति को संरक्षित नहीं करेगा तो क्षतिग्रस्त व्यक्ति स्वयं बदला लेने के मार्ग पर चलेगा.’’
आश्रमों का साम्राज्य
देश में मौजूद आसाराम के 230 से ज्यादा आश्रमों में से कई विवादों में रहे हैं. खासतौर से सरकारी जमीन से ले कर आम लोगों की जमीन हथियाने के मामले सामने आए. गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में तो शासन ने आश्रम से जमीनें छीन ली हैं. गुजरात के मोटेरा आश्रम में 2008 में 2 मासूम चचेरे भाइयों दीपेश और अभिषेक वाघेला की लाशें नदी की तलहटी में मिली थीं. ये आसाराम के आश्रम में रहते थे. उन के मातापिता ने काला जादू के नाम पर हत्या की आशंका जताई थी. इस साल जनवरी में भी ओडिशा का एक साधक खून से लथपथ हालत में मृत मिला था.
2008 में ही छिंदवाड़ा के गुरुकुल में 2 छात्रों के शव बाथरूम में मिले थे. उस समय इस आश्रम को बंद करने की मांग उठी थी. जिस नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आसाराम को सजा हुईर् है वह भी इसी गुरुकुल में पढ़ती थी. 70 के दशक में साबरमती तट के छोटे से आश्रम से निकल कर 19 देशों में 400 से अधिक आश्रमों, 4 करोड़ से ज्यादा भक्तों और 10 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक की संपत्ति का स्वामी बना आसाराम ऐसा नाम है जो धर्म की डगर पर सरपट दौड़ता रहा. उस के आगे नतमस्तक बड़ेबड़े राजनेता, उद्योगपति और राजनीतिबाज उस की राह आसान बनाते रहे.
अहमदाबाद के मोटेरा में आसाराम ने एक कुटिया बनाईर् थी. कुछ समय बाद यहां आश्रम बन गया. इस के बाद राज्य सरकार उसे जमीन दान में देती रही. 80 से 90 के दशक के बीच कांग्रेस सरकार ने 14 हजार 500 वर्ग मीटर जमीन दान दी. 1997 से 1999 के बीच भाजपा सरकार उस पर मेहरबान हुई. उसे 23 हजार वर्ग मीटर जमीन और दे दी. इस के बाद 10 एकड़ जमीन दी गई.
इसी तरह मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड की सरकारों ने उसे जमीनें दीं. कई जगह तो जमीनें कब्जा ली गईं. छिंदवाड़ा में 10 एकड़ जमीन पर आश्रम है, यह जमीन किसी महिला की थी, जिस की हत्या के बाद इसे हड़प लिया गया. अहमदाबाद में एक किसान ने आसाराम पर 15 हजार गज जमीन कब्जाने का आरोप लगाया था. दिल्ली के रिज क्षेत्र में कई एकड़ में आश्रम बना कर सरकारी जमीन कब्जा ली गई, जिस का मामला अदालत में है. इस तरह जमीन के बिना ही आसाराम की कुल संपत्ति करीब 10 हजार करोड़ रुपए आंकी गई. यह बात 2014 में उस के विभिन्न आश्रमों में छापों के दौरान बरामद दस्तावेजों से साबित हुई.
और भी हैं चाणक्य ये ढोंगी लोगों को त्याग और आत्मसंयम की सीख देते हैं जबकि खुद महंगी गाडि़यों में घूमते हैं. आलीशान आश्रमों में रहने वाले इन ढोंगियों की फेहरिस्त लंबी है. इन में आसाराम, उस का बेटा नारायण साईं, निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह, राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर, इच्छाधारी बाबा भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी, स्वामी नित्यानंद, सच्चिदानंद उर्फ सचिन दत्ता शामिल हैं. ये बाबा स्वयं को भगवान बताने से परहेज नहीं करते.
पिछले कईर् सालों से हिंदुत्व को ले कर कारोबारी संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों व राजनीतिबाजों ने हिंदुओं को पूरी तरह से गर्त में धकेल दिया पर हाल के दिनों में अदालतों की सख्ती से इन में से कइयों के ढोंग की पोलें खुली हैं. कुछ दिनों पहले बाबा राम रहीम के आश्रम में चल रही काली करतूतों का काला चिट्ठा जगजाहिर हुआ था. हरियाणा की 2 लड़कियों ने राम रहीम पर बलात्कार का आरोप लगाया था. बाद में अदालत के आदेश पर उसे जेल भेज दिया गया. उस पर एक पत्रकार की हत्या का मामला भी दर्ज है. गुरमीत राम रहीम का साम्राज्य 700 एकड़ में फैला है.
दिल्ली के रोहिणी में आध्यात्मिक विश्वविद्यालय चलाने वाला कथित बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित शिष्या के साथ दुष्कर्म के आरोप के बाद से फरार है. कहा जाता है कि बाबा 16,800 लड़कियों के साथ यौनसुख पाना चाहता था ताकि ऐसा करने के बाद उसे सिद्धि मिल सके. आश्रम के अंदर सुरंग में बने कमरे में वह लड़कियों को गुप्त प्रसाद देने के बहाने दुष्कर्म व अश्लील हरकतें करता था.
इस से पहले हरियाणा में सतलोक आश्रम के बाबा रामपाल का साम्राज्य तहसनहस हुआ था. उस पर भी महिलाओं के साथ यौनशोषण, हत्या जैसे कई मामले हैं. ऐसी तमाम घटनाएं बताती हैं कि बाबागीरी इस देश में इतना बड़ा धंधा है जहां बिना किसी निवेश के भक्तों की फसल बोईर् जा सकती है और उसे बारबार काट कर मालामाल हुआ जा सकता है.
अंधभक्त दर अंधभक्त मजे की बात है कि आसाराम, रामपाल, राम रहीम जैसे बाबाओं की गिरफ्तारी के बाद भी इन के अंधभक्तों की जरा भी कमी नहीं हुई. इन्हीं अंधभक्तों की अंधश्रद्धा का फायदा उठा कर ये ढोंगी बाबा और स्वयंभू संत हर गलत काम को अंजाम देने से नहीं चूकते.
देशभर में कुकुरमुत्तों की तरह फैले बाबाओं ने सामाजिक विभाजन का पूरा फायदा उठाया. 4 वर्णों में बंटी मानसम्मान की मारी हजारों जातियां, उपजातियां ऐसे लोगों के चंगुल में फंसा दी गईं. दलितों, पिछड़ों को ईश्वर, पूजापाठ, मंदिरों से दूर रखा गया. इन बाबाओं ने इन वर्गों के लोगों को बरगलाया और अपने आश्रमों से जोड़ा. शिष्य मूंडे़ गए. उन्हें प्रवचनों में बुलाया गया. इन जातियों को जोड़ कर धूर्त और चालाक लोग गिरोह बना कर स्वयंभू संत, गुरु हो गए.
अपनी बातों में फंसा कर ये ढोंगी लोगों को बरगलाते हैं. आसाराम जैसे लोगों की वाकपटुता की वजह से भोलेभाले लोग आसानी से उन की बातों में आ जाते हैं. ये तरहतरह की मोहमाया त्याग, स्वर्गनरक, पापपुण्य, दानदक्षिणा के बहाने बना कर लोगों से पैसे ऐंठते रहते हैं. ये लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाने की कला बखूबी जानते हैं. आस्था के नाम पर भक्तों के साथ खिलवाड़ किया जाता है. ये पाखंडी धर्म की मार्केटिंग की बारीकियां जानते हैं. अखबार, टैलीविजन, इंटरनैट के माध्यम से लोगों के दुखों का उपाय करने के लिए स्वयं का प्रचार करते हैं. अपने दुखपरेशानियों में उलझी जनता इन के झांसे में आसानी से आ जाती है.
आसाराम विरोध करने वालों को चुप कराने की अकसर कोशिश कराता रहा. ‘सरिता’ ‘गृहशोभा’ पत्रिकाओं में आसाराम के पाखंडों के खिलाफ जब कुछ लिखा जाता था, तो वह अपने अनुयायियों, खासतौर से महिलाओं को भेज कर कार्यालय में हंगामा करवाता था. संपादक व लेखकों को धमकियां दी जाती थीं. फर्जी बाबाओं का साम्राज्य रातोंरात खड़ा नहीं होता. धीरेधीरे ये जनता के दुखदर्द की नस पकड़ते हैं. धर्र्म के नाम पर ऐश करने वाले ये बाबा जितने दोषी हैं उतने ही इन के भक्त हैं. राम रहीम की गिरफ्तारी के वक्त उस के अंधभक्तों ने पंचकूला में बवाल मचाया था, जिस से कई लोगों की जानें चली गईं. सरकारी कार्यवाही में बाधा डालने की कोशिशें की जाती रहीं. उसी तरह आसाराम की गिरफ्तारी से ले कर सजा सुनाए जाने तक उस के अधंभक्त धमकियां, हत्याएं, तोड़फोड़, धरनेप्रदर्शन करते रहे.
धर्म का धंधा ऐसा धंधा है, जहां बिना किसी प्रयास के बड़ेबड़े राजनीतिबाज और रईसों की फौज न सिर्फ अनुयायी बनी दिखती है बल्कि आसाराम सरीखे ऐसे फर्जी चरित्र वालों की ढाल बन कर खड़ी भी नजर आती है. नरेंद्र मोदी का आसाराम बापू के चरणों में सिर झुका कर प्रणाम करता हुआ वीडियो आजकल बहुत चर्चित है.
ये घटनाएं साबित करती हैं कि हमारा समाज किस तरह बाबाओं के सामने घुटने टेक कर बैठा हुआ है.
धर्मसंरक्षित यौनशोषण
दरअसल, यौनशोषण धर्र्म द्वारा संरक्षित है. धर्म की किताबों में देवताओं, अवतारों द्वारा स्त्रियों के साथ यौन संबंध बनाने, मौजमस्ती, ऐयाशी करने के किस्से भरे पड़े हैं. समाज की मानसिकता स्पष्ट है कि स्त्री दोयम दर्जे की है, पुरुष की अंकशायिनी बनना ही उस की नियति है. यही उस का धर्म है. ग्रंथों में बलात्कार की अनगिनत कथाएं हैं. ब्रह्मा द्वारा अपनी पुत्री के साथ सहवास करना, ऋष्यशृंग, ऋषि पराशर द्वारा मछुआरे की बेटी के साथ, वेदव्यास द्वारा अंबिका, अंबालिका और दासी, महात्मा दीर्घतमा द्वारा सुदेष्णा और उन की दासी व अन्य ऋषियोंमुनियों द्वारा दूसरों की स्त्रियों व कन्याओं के साथ यौन संबंध बनाने की कहानियां भरी पड़ी हैं. ऐसे किस्से ढोंगी बाबाओं को ललचाते रहे हैं.
देखिए कुछ उदाहरण- तत: कालेन महता मेनका परमाअप्सरा:,
पुण्करेषु नरश्रेष्ठ स्नातुं समुपचक्रमे. तां ददर्श महातेजा मेनका कुशिकात्मज:,
रूपेणाप्रतिभा तत्र विद्युत जलदे यथा. दृष्टवा कंदर्पवशमो मुनिस्तामिदमब्रवीत्,
अप्सरास्स्वागत तेअस्तु वस चेह ममाश्रमे. अनुगृहीष्व भद्रं ते मदनेन सुमोहितम्.
(वाल्मीकि रामायण 1/63/4,5,6) अर्थात बहुत समय बीत जाने पर मेनका नाम की परम सुंदरी अप्सरा पुष्कर में स्नान करने आई. महातेजस्वी विश्वामित्र ने कुशिक की पुत्री मेनका को देखा. अद्वितीय रूप वाली मेनका बादलों में बिजली के समान मालूम पड़ती थी. विश्वामित्र ने कामभावना के वशीभूत हो कर उस से कहा, ‘‘हे अप्सरा, तुम्हारा स्वागत है. तुम यहां आश्रम में रहो. मुझ काम मोहित पर तुम कृपा करो.’’
पराशर ऋषि ने सत्यवती से बलात्कार किया. पराशर सत्यवती के रूपसौंदर्र्य पर आसक्त हो गए और बोले, ‘‘देवी, मैं तुम्हारे साथ सहवास करना चाहता हूं.’’ सत्यवती ने कहा, ‘‘मुनिवर, आप ब्रह्मज्ञानी हैं और मैं निषाद कन्या. हमारा सहवास संभव नहीं है. मैं कुंआरी हूं, मेरे पिता क्या कहेंगे.’’ पराशर मुनि बोले, ‘‘बालिके, तुम चिंता मत करो. प्रसूति होने पर भी तुम कुंआरी ही रहोगी.’’ पराशर ने फिर मांग की तो सत्यवती बोली, ‘‘मेरे शरीर से मछली की दुर्गंध निकलती है.’’ तब उसे आशीर्र्वाद देते हुए पराशर ने कहा कि तुम्हारे शरीर से जो मछली की गंध निकलती है वह सुगंध में परिवर्तित हो जाएगी. इतना कह कर पराशर ने अपने योगबल से चारों ओर घने कोहरे का जाल रच दिया ताकि कोई उन्हें उस हाल में न देखे. इस प्रकार पराशर ने सत्यवती के साथ दैहिक संबंध कायम किया. इसी तरह वेदव्यास द्वारा अंबिका, अंबालिका और उन की दासी के साथ यौन रिश्ते बनाए गए. इस से धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर पैदा हुए.
लिखा है- किं तु मातु: स वैगुण्यात् अंध एवं भविष्यति,
तस्य तद् वचनं शृवा माता पुत्रमथाब्रवीत. 10 नांघ: कुरुणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन,
ज्ञाति वंशस्य गोप्तारे पितृणां वंशवर्द्धनम्. 11 द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि,
स तथेति प्रतिज्ञाय निश्चक्राम महायशा:. 12 (महा. आदि पर्व, अध्याय 105)
सत्यवती ने व्यास से पुत्र उत्पन्न करने का अनुरोध पांडुवंश की सुरक्षा के लिए किया था. पहला पुत्र अंधा होने की आशंका थी, तो सत्यवती ने कहा कि अंधा बालक कुरुवंश का राजा नहीं हो सकता. ऐसा दूसरा पुत्र दो जो जाति तथा वंश की रक्षा करे. व्यास ने माता की बात मान ली. ततोनिष्क्रांतमालोक्य सत्या पुत्रमथाब्रवीत,
शशंस स पुनर्मात्रे तस्य बालस्य पांडुताम्. 19 तं माता पुनरेवान्यमेकं पुत्रमयाचत्,
तथेति च महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत्. 20 (महा. आदि पर्व अध्याय 105)
दूसरी बार व्यास सहवास कर के निकले तो सत्यवती ने होने वाले बालक के विषय में पूछा. व्यास ने उसे पांडु रंग का बताया तो माता ने एक और बालक के लिए कहा और व्यास मान गए. तीसरी बार जब व्यास गए तो अंबालिका ने स्वयं न जा कर व्यास के पास अपनी दासी भेज दी. व्यास ने उसे दासी जान कर भी उस से सहवास किया और प्रसन्न हो कर उसे दासीपन से मुक्त कर दिया.
इसी तरह महाभारत में भीष्मसत्यवती संवाद में दीर्घतमा मुनि द्वारा सुदेष्णा और उस की शूद्र दासी के साथ सहवास करने की कथा भी है. कथा के अनुसार, सुदेष्णा दीर्घतमा धर्मात्मा को अंधा और बूढ़ा समझ कर उन से सहवास करना नहीं चाहती थी और उस ने अपनी शूद्र दासी को उस के पास भेज दिया. दीर्घतमा ने दासी को शूद्र समझते हुए भी कामुकता पूरी की और काक्षीवद् आदि 11 पुत्र उत्पन्न किए.
वाल्मीकि रामायण में कहा गया है- देवतानां प्रतिज्ञाय गंगामभ्येत्य पावक:,
गर्भ धारय वै दैवि देवतानामिदं प्रियम् समंततस्य देवीमभ्यषिंचत पावक:,
तमुवाच ततो गंगा सर्वदेवपुरोगमम्. शक्ता धारणे देव तेजस्तव समुद्धतम्,
गंगा तं गर्भमतिभास्वरम्. उत्ससर्ज महातेजा: स्रोतेभ्यो हि तदानद्य,
निक्षिप्त मात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरंजितम. तं कुमारं ततो जातम्.
अर्थात देवताओं के पास प्रतिज्ञा कर के अग्नि देवता गंगा के पास आया और बोला, ‘‘हे देवी, तुम मुझ से गर्भधारण करो. देवताओं की इच्छा है.’’ तब अग्नि ने उसे गर्भधारण कर दिया. वह उस के तेजोमय गर्भ को धारण करने में कठिनाई अनुभव करने लगी. गंगा ने उस गर्भ को फेंक दिया. उस के फेंकने पर एक तेजस्वी बालक पैदा हुआ. श्रीमद्भागवत पुराण की एक कथा में कहा गया है कि उतथ्य की गर्भवती पत्नी के साथ बृहस्पति ने बलात्कार किया और उस के वीर्य से भरद्वाज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ. बाद में यही भरद्वाज एक बार गंगा स्नान को गया तो वहां कपड़े बदल रही घृताचि नामक अप्सरा को देख कर स्खलित हो गया. शरद्वान ऋषि भी जानपदी नाम की अप्सरा को कम कपड़ों में देख कर वीर्यपात कर बैठे जिस से कृप नामक बालक पैदा हुआ.
पुराणों के अनुसार, बहलाफुसला कर या जबरन स्त्रियों के साथ ऋषियों, मुनियों द्वारा संबंध बनाना बलात्कार नहीं माना जाता था. आसाराम, राम रहीम, रामपाल, वीरेंद्र देव दीक्षित जैसे लोग तो इसी धर्म के प्रतीक हैं. यह वही प्रवृत्ति है जो स्त्रियों के प्रति सदियों से पुराणों में चरितार्थ होती आई है. ये लोग आधुनिक चरित्र हैं जिन्हें स्त्रियों के शोषण का धार्मिक हक प्रदान था. पौराणिक काल में राजा ऐसे ऋषियों को भूमि, धनसंपत्ति और कन्याएं दे कर कृतार्थ होते रहे.
आज के बाबा आधुनिक साधु और बाबा आज अगर बलात्कार के मामलों में लिप्त पाए जाते हैं तो आश्चर्य कैसा? ये लोग धार्मिक किताबों की कथाओं का फायदा उठाते आए हैं. अपने प्रवचनों में और स्त्रियों को बहलाफुसला कर बिस्तर पर लाने के लिए ऐसी कहानियों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं. ये खुद को ईश्वर का अवतार बता कर स्त्रियों को राजी करने में कामयाब हो जाते हैं. इसी वजह से कथित चमत्कारी बाबाओं और स्वयंभू भगवानों द्वारा स्त्रियों के शोषण के किस्से हमेशा से प्रकाश में आते रहे हैं.
सोचने की बात है कि हम किस तरह के समाज में रह रहे हैं. हमारे ज्ञान पर हमें शर्मसार होना चाहिए. हमारा ज्ञान लज्जित नहीं हो रहा? तमाम वैज्ञानिक तरक्की के बावजूद विज्ञान की धज्जियां उड़ रही हैं. अज्ञान का अंधकार चारों ओर दिख रहा है. सवाल है कि क्या आसाराम, राम रहीम, रामपाल के साथ धर्म का यह घिनौना ढोंग आजीवन कैद हो गया है? नहीं, जब तक इस देश में लोग धर्म, साधुसंत, गुरु, प्रवचकों में सुख, समृद्धि, शांति, ऐश्वर्य तलाशते रहेंगे, तब तक नए आसाराम, रामपाल, रामरहीम पैदा होते रहेंगे और लोगों को ठगते रहेंगे, स्त्रियों का यौनशोषण करते रहेंगे.
हाल के दशकों में कितने ऐसे साधु या बाबा हुए जिन्होंने कोई सुधार या जनजागृति का काम किया हो? कहां हैं धर्म की अच्छाइयों का बखान करने वाले नेता और हिंदू धर्र्म के संगठन? जो संगठन और उन के कार्यकर्ता हाथों में भगवा झंडा और सिर और कंधे पर भगवा दुपट्टा डाले धर्म की अलख जगाते सड़कों पर घूमते नजर आते हैं क्या वे पहले हिंदू धर्म की इस भीतरी गंदगी को साफ करने का बीड़ा उठाएंगे? क्या अब ऐसे तमाम बाबाओं, साधुसंतों, गुरुओं के खिलाफ समाज को उठ खड़े होने का वक्त नहीं आ गया? इन के विरुद्ध क्रांति की आवश्यकता नहीं है? क्या अभी भी समाज को और ठगे जाने की घटनाओं का इंतजार है?