पटना रेलवे जंक्शन पर कुल 10 प्लेटफौर्म हैं. जंक्शन होने के कारण यहां यात्रियों की भागदौड़ और धक्कामुक्की आम बात है. पिछले कुछ महीनों से हर प्लेटफौर्म पर ऐसे युवकयुवतियों की भरमार नजर आती है, जिन्हें रेलगाड़ी से कहीं आनाजाना नहीं होता. वे प्लेटफौर्म पर बैठे घंटों स्मार्टफोन पर नजरें टिकाए घंटों साथ गुजार देते हैं.

10 रुपए का प्लेटफौर्म टिकट ले कर वे युवा निश्चिंत हो कर पीठ पर लैपटौप बैग लटकाए वहां समय गुजारते हैं. ये युवा वहां पोर्न साइट्स सर्च करते रहते हैं और पोर्न फिल्में देखते हैं.

आप सोच रहे होंगे आखिर इस के लिए रेलवे प्लेटफौर्म पर जाने की क्या जरूरत है? जरूरत है, क्योंकि रेलवे ने पटना जंक्शन पर मुफ्त वाईफाई सेवा शुरू की है. इस से युवाओं को वहां मुफ्त में पोर्न साइट्स का आनंद लेने का मौका मिलता है.

रेलवे ने देश के कई स्टेशनों को वाईफाई सेवा से लैस कर दिया है, पर रेलवे की मुफ्त वाईफाई सेवा का सब से ज्यादा इस्तेमाल पटना जंक्शन पर हो रहा है. स्टेशन पर मुसाफिरों की बढ़ती संख्या और वाईफाई के इस्तेमाल को देखते हुए इस की क्षमता 10 गुना अधिक बढ़ाने की तैयारी की जा रही है. वाईफाई इस्तेमाल करने के मामले में दूसरे नंबर पर जयपुर, तीसरे पर बेंगलुरु और चौथे पर दिल्ली रेलवे स्टेशन हैं. गौरतलब है कि पटना जंक्शन समेत देश 23 रेलवे स्टेशनों को रेलटैल और युगल की ओर से मुफ्त वाईफाई सेवा से लैस किया गया है.

सभी 23 रेलवे स्टेशनों में से पटना रेलवे स्टेशन पर सब से ज्यादा मुसाफिर वाईफाई का उपयोग कर रहे हैं. फिलहाल पटना जंक्शन पर एक गीगाबाइट क्षमता के वाईफाई की मशीन लगाई गई है. यात्रियों द्वारा इंटरनैट का अधिक इस्तेमाल किए जाने से उस की गति काफी धीमी हो गई है. इसे सुधारने के लिए रेलवे ने वाईफाई की क्षमता 10 गीगाबाइट करने का प्रस्ताव रेल मंत्रालय को भेजा है.

रेलवे सूत्रों के मुताबिक पटना जंक्शन पर सब से ज्यादा रेल यात्री यूट्यूब और पोर्न साइट्स सर्च कर रहे हैं. सब से ज्यादा डाटा इन्हीं साइट्स को देखने से खर्च हो रहा है. उस के बाद विकिपीडिया को सर्च किया जा रहा है.

ज्यादातर मुसाफिर इन्हीं साइट्स का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं. इस के अलावा रेल यात्री मुफ्त वाईफाई से अपने मोबाइल ऐप्स भी जम कर अपडेट करते हैं. फिल्म डाउनलोड करने में यात्री वाईफाई का जम कर इस्तेमाल करते हैं. पटना के बाद बिहार के गया और हाजीपुर जंक्शन को भी रेलवे ने फ्री वाईफाई से लैस कर दिया है.

एक ओर जहां रेलवे की फ्री वाईफाई सेवा का ज्यादातर इस्तेमाल पोर्न साइट्स देखने के लिए किया जा रहा है, वहीं नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल बीएसएनएल, एमटीएनएल और दूसरे इंटरनैट सर्विस प्रोवाइडर्स को 13 पोर्न साइट्स पर बैन लगाने का आदेश दिया था. भजभज मंडली सरकार का मानना है कि पोर्न साइट्स देखने से बच्चे और युवा बिगड़ सकते हैं. यह बच्चों के भविष्य और देश के लिए ठीक नहीं है.

समाजसेवी किरण राय कहती हैं कि पोर्न साइट्स को देखने से सभ्यता और संस्कृति के बिगड़ने की दलील देना रूढि़वादी मानसिकता को दर्शाता है. आज इंटरनैट के जमाने में सबकुछ खुला है और हर कोई अपनी मरजी और जरूरत के हिसाब से उस का उपयोग कर रहा है. इसलिए पोर्न साइट्स के नाम पर संस्कृति की दुहाई देना या होहल्ला मचाना ठीक नहीं है.

जानकारों का मानना है कि सैक्स सृष्टि को चलाने के लिए जरूरी चीज है, फिर यह गंदा और समाज को भटकाने वाला कैसे हो सकता है? हां, यह जरूर है कि हर समय सैक्स के बारे में सोचना और उस में लिप्त रहना ठीक नहीं है. वैसे यह तर्क हर चीज पर लागू होता है. पटना हाईकोर्ट के वकील अनिल कुमार सिंह कहते हैं कि अति हर चीज की खराब है. जैसे किसी बीमारी के इलाज के लिए दवा की मात्रा तय की जाती है, उस का अधिक डोज जानलेवा हो सकता है. ठीक उसी प्रकार सैक्स की अति भी ठीक नहीं है.

पोंगापंथी समाज और सरकार को यह समझना चाहिए कि पोर्न साइट्स युवाओं को भटकाने का काम नहीं कर रही हैं. ये समाज का अहम हिस्सा हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो सुप्रीम कोर्ट पोर्न साइट्स पर बैन लगाने वाली याचिका को खारिज नहीं करता.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी को उस के कमरे में पोर्न देखने से कैसे रोका जा सकता है? यह संविधान की धारा 21 के तहत मिला व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का खुला उल्लंघन है. कामसूत्र की रचना करने वाले देश में व्यक्तिगत आजादी को सब से ऊपर रखना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि कामुकता व्यक्तिगत इच्छा है. इस पर जबरन या कानूनन रोक लगाना वाजिब नहीं है.

गौरतलब है कि इंदौर के रहने वाले एडवोकेट कमलेश वासवानी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर पोर्न वैबसाइट्स पर रोक लगाने की मांग की थी. याचिकाकर्ता का तर्क था कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले ज्यादातर अपराध की वजह पोर्न साइट्स हैं. इन से सैक्स अपराधों को बढ़ावा मिलता है. कोर्ट ने इस दलील को मानने से इनकार कर दिया है.

गूगल के सर्वे के मुताबिक भारत में 5 में से 3 मोबाइल फोन उपयोग करने वाले पोर्न साइट्स देखते हैं. देश के कुल 50%  स्मार्टफोन पर पोर्न साइट्स देखी जाती हैं. देश में 4.31 मिनट, उत्तर प्रदेश में 7.11 मिनट और दिल्ली में 8.02 मिनट पर पोर्न साइट्स देखी जाती हैं. इतना ही नहीं महिलाएं भी पोर्न साइट्स देखने में पीछे नहीं हैं. 25% महिलाएं पोर्न साइट्स देखना पसंद करती हैं. यह दुनिया भर के 23% आंकड़े से 2 फीसदी ज्यादा है.

डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि सैक्स करने या सैक्स की किताब पढ़ने वालों को उस से दिमागी शांति और आनंद मिलता है. किसी को सैक्स करने से रोका नहीं जा सकता और न ही किसी तरह की सैक्सी फिल्म देखने पर सरकार द्वारा पाबंदी लगाई जा सकती है. अगर पोर्न साइट्स देखने से युवा और समाज में भटकाव आता तो अमेरिका आज सब से फिसड्डी देश होता. अमेरिका में रोजाना 14.2 अरब लोग पोर्न पेज पर विजिट करते हैं, यह आंकड़ा दुनियाभर का 40% है.

भारत में करीब 8.22 मिनट पोर्न सामग्री देखी जाती है, जबकि दुनिया भर में यह आंकड़ा 8.56 मिनट है. उतरी भारत में सब से ज्यादा पोर्न साइट्स देखी जाती हैं. पोर्न साइट्स देखने के मामले में मिजोरम सब से आगे है.

भारत में सब से ज्यादा सनी लियोनी की पोर्न फिल्मों को देखा जाता है. उस के बाद लीजा एन, भारतीय सैक्स, भारतीय बीवी और भारतीय भाभी को सब से ज्यादा सर्च किया जाता है.

भारतीय समाज और संस्कृति में पोर्न और सैक्स पर बात करने की सख्त मनाही है. इस मसले पर बात करने वाले को समाज से भटका हुआ व्यक्ति माना जाता है. यदि किसी घर में किसी बच्चे ने गलती से भी इस बारे में कुछ पूछ लिया तो डांट कर उसे चुप करा दिया जाता है या दूसरी बातों से उसे बहला दिया जाता है.

पुराने समय में तो व्यभिचार समाज और परिवार पर ज्यादा हावी था. जानकारों का मानना है कि पुराने जमाने में परिवार के ही कई मर्द और औरतों के बीच नाजायज रिश्ता कायम हुआ करता था. किसी का अपने जेठ से तो किसी का भाभी से, ससुर का बहू से, दामाद के सास के साथ सैक्स के रिश्ते बनते रहते थे. यह सब काफी चोरीछिपे, परदे के पीछे और घुप्प अंधेरे में हुआ करता था, इसलिए उस समाज को सुसंस्कृत माना जाता है. आज सैक्स को ले कर धीरेधीरे ही सही खुलापन आया है, जिस से पुराने जमाने के तथाकथित सुसंस्कृत लोग हायतोबा मचाए रहते हैं.

हाईस्कूल के मास्टर सुकांत सिंह कहते हैं कि भारतीय समाज सैक्स को छिपछिपा कर उपयोग में लाता है. दबी जबान में इस के बारे में बातें की जाती हैं. पुराने जमाने में सैक्स की कहानियों की किताबें बड़े पैमाने पर बिकती थीं. उस समय भी बच्चे और बड़े दोनों चोरीछिपे उन किताबों को पढ़ते थे. बाप की अलमारियों और बक्सों से सैक्स कहानियों की किताबें चुरा कर उन के बच्चे भी पढ़ा करते थे.

क्या इस से समाज और देश बरबाद हो गया? क्या बड़ेबड़े अफसर, वैज्ञानिक, डाक्टर, इंजीनियर, लेखक, कवि, साहित्यकारों ने कभी सैक्स की किताबें नहीं पढ़ीं? कभी पोर्न साइट्स नहीं देखीं? ऐसे में पोर्न साइट्स देखने वाले आज के युवाओं के भटकने या बरबाद होने की सोच बेकार है.

आज सैक्स की किताबों की जगह पोर्न साइट्स ने ले ली है और युवाओं के साथ बुजुर्ग भी उस का जम कर आनंद उठा रहे हैं. ये केवल मनोरंजन का जरिया भर हैं.

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