बच्चों की स्किन खासकर नवजातों की बहुत नाजुक होती है. कमजोर होने के कारण वे बहुत जल्दी एलर्जी व इन्फैक्शन के संपर्क में भी आ जाते हैं, इसलिए उन्हें खास केयर की जरूरत होती है. इस संबंध में एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस के डा. सुमित चक्रवर्ती शिशु को एलर्जी से बचाने के कुछ खास टिप्स बता रहे हैं:
क्या है स्किन एलर्जी
जब बेबी की स्किन ऐलर्जन यानी एलर्जी पैदा करने वाले तत्त्वों से प्रभावित होती है या फिर बौडी जब एक एलर्जी द्वारा ट्रिगर रासायनिक हिस्टामाइन का उत्पादन करता है तो स्किन ऐजर्ली होती है.
बच्चों में आमतौर पर यह एलर्जी डायपर से, खाने से, साबुन व क्रीम से, मौसम में आए बदलाव व कई बार कपड़ों के कारण भी हो जाती है. इस का प्रभाव खासकर सैंसिटिव स्किन पर सब से ज्यादा पड़ता है, जिसे स्पैशल केयर की जरूरत होती है.
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कैसी-कैसी स्किन एलर्जी
ऐक्जिमा: यह अक्सर 3-4 महीनों के बच्चों में देखने को मिलता है. इस में बौडी के किसी भी हिस्से पर लाल रंग के रैशेज दिखाई देने लगते हैं, जिन में इतनी खुजली होती है कि बच्चे के लिए उसे सहन करना मुश्किल हो जाता है.
कारण: यह बीमारी अकसर या तो जेनेटिक या फिर कपड़े, साबुन, गंदगी व बदलते मौसम के कारण होती है. ऐसे में आप को जब भी अपने बच्चे की स्किन पर लाल रंग के रैशेज दिखाई दें तो तुरंत डाक्टर से संपर्क करें.
क्या करें: अपने बच्चे की स्किन को रोजाना माइल्ड सोप से क्लीन करें. स्किन को ज्यादा देर तक गीला न रखें वरना उस पर एलर्जी के चांसेज बढ़ जाते हैं.
डायपर रैश से बचें ऐसे
बच्चा साउंड स्लीप ले, इस के लिए पेरैंट्स उसे हर समय डायपर पहनाए रखते हैं, लेकिन लंबे समय तक डायपर पहनाए रखना बच्चे की स्किन पर सूजन व रैशेज का कारण बनता है. इस के कारण बच्चे को इतनी ज्यादा खुजली होती है कि कई बार स्किन छिल तक जाती है.
कारण: लंबे समय तक डायपर चेंज न करना, अधिक गीला डायपर, जरूरत से ज्यादा टाइट डायपर रैशेज का कारण बनता है.
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क्या करें: हर 2-3 घंटों में डायपर को चेंज करें और चेंज करने से पहले स्किन को अच्छी तरह क्लीन करें, साथ ही डाक्टर की सलाह पर डायपर रैशेज क्रीम भी लगाएं. अगर बच्चे को डायपर पहनने में दिक्कत हो रही हो तो उस की स्किन को खुला छोड़ें. इस से धीरेधीरे रैशेज सूखने लगेंगे, जिस से खुजली व जलन में कमी आएगी.
बग बाइट रैशेज में करें ये
अकसर गरमियों में मच्छर या फिर बैड बग की वजह से बच्चों की स्किन पर रैशेज पड़ जाते हैं और उन में खुजली करने के कारण ये बाकी जगह को भी प्रभावित करने लगते हैं, जिस से बच्चे चैन की नींद नहीं सो पाते हैं.
कारण: अकसर गंदगी के कारण घर में कीड़ेमकोड़े होेते हैं, जिन से बचने के लिए घर की रोज अच्छी तरह सफाई करें.
क्या करें: तुरंत डाक्टर को दिखाएं ताकि ऐंटीबायोटिक क्रीम से रैशेज व जलन को कम करने में मदद मिले. बच्चे को ज्यादा टाइट कपड़े पहनाने से बचें.
हीट रैशेज से बचें ऐसे
गरमियों में बच्चों की स्किन खासकर उन के चेहरे, गरदन, अंडरआर्म व जांघों के पास हीट रैशेज हो जाते हैं, जिन में खुजली होने के कारण उन्हें काफी परेशानी होती है.
कारण: बौडी पर पसीने का जमा होना व तंग कपड़े पहनना हीट रैशेज का कारण बनता है.
क्या करें: बच्चे को ठंडी जगह रखें. उसे टाइट कपड़े पहनाने से बचें.
रिंग वार्म में करें ये
यह एक तरह का फंगल इन्फैक्शन होता है, जो आमतौर पर स्कैल्प, पैरों पर अपना प्रभाव डालता है और छूने पर एक से दूसरी जगह फैलता है.
कारण: यह गंदे टौवेल, कपड़ों, खिलौनों व पसीने के एक जगह इकट्ठा होने के कारण होता है.
क्या करें: जब भी बच्चे को प्रौब्लम हो तो उसे डाक्टर की सलाह पर ऐंटीफंगल क्रीम लगाएं और इस बात का खास ध्यान रखें कि जब भी क्रीम लगाएं तो प्रभावित जगह को पहले अच्छी तरह साफ कर लें.
सिर पर पपड़ी जमना
जन्म के समय शिशु के सिर पर पपड़ी जमा रहती है, जो आम बात है. लेकिन कई बार बाद में भी शिशुओं में इस तरह की समस्या देखने को मिलती है, जो काफी तकलीफदेह होती है. इसे क्रेड कैप स्किन रोग भी कहते हैं.
कारण: बौडी की तेल ग्रंथियों में ज्यादा तेल बनने की वजह से शिशु को यह समस्या
होती है.
क्या करें: साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें. स्थिति गंभीर होने पर तुरंत डाक्टर को दिखाएं.
इन स्किन केयर टिप्स का भी रखें ख्याल
इन बातों का ध्यान रखकर नवजातों को स्किन इन्फैक्शन से बचाया जा सकता है:
– शिशु को नहलाने के बाद बेबी क्रीम लगाना न भूलें, क्योंकि इस से स्किन ड्राई नहीं होती है.
– बेबी के कपड़े साफ जगह रखें और उन्हें रोज धोएं ताकि शिशु इन्फैक्शन से दूर रहे.
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– नवजात के लिए सोप व शैंपू डाक्टर की सलाह पर ही खरीदें.
– अगर परिवार के किसी सदस्य को स्किन एलर्जी है, तो उस से नवजात को दूर रखें.
– गंदे हाथों से बच्चों की स्किन को टच न करें.
– सौफ्ट फैब्रिक से बने कपड़े ही पहनाएं.
– खानेपीने में साफसफाई का खास ध्यान रखें.
– बेबी को कवर कर के रखें ताकि कीड़े-मकोड़ों के काटने का डर न रहे.