कभीकभी गपशप करने से बहुतकुछ सहज सा लगने लगता है. एक सुलझी हुई गपशप आपसी संबंधों को मजबूत करने में सहायक है. गपशप करना हमारे सामाजिक होने का सुबूत भी है. हलकीफुलकी गपशप हमें तरोताजा रखती है.
मनोवैज्ञानिक तो आजकल निराशा, अवसाद या उदासी के उपाय के रूप में गपशप की तकनीक आजमाने की सलाह देते हैं. कोई पराक्रम नहीं, बल्कि मीठी गपशप बहुत सारे गिलेशिकवे दूर कर देती है.
मगर एक कहावत है कि अति हर चीज की बुरी होती है. वीनू को यही लत लग गई थी. कालेज में हर समय हर किसी के साथ उस का बहुत सारा समय इसी तरह की गपशप में निकल रहा था. पहलेपहल तो सब को ही उस की गपशप अच्छी लगती थी, मगर बाकी कालेज मेट्स की पढ़ाई खराब हो रही थी. अब वे सब वीनू से कटेकटे से रहने लगे.
वीनू जब बहुत दिनों तक ऐसे ही अकेली रह गई, तो उस को अपना वही खराब बचपन याद आने लगा.
बड़ी बहन वीनू से 7 साल बड़ी थी और बहुत सुंदर थी. वह कभी भी वीनू को अपनी बात नहीं कहने देती थी.
“वीनू, तुम अभी बच्ची हो. खामोश रहो,” ऐसा कह कर उस का मुंह बंद कर देती थी.
जब वीनू कालेज में आई, तो अपनी बात दोस्तों के सामने खुल कर रखने लगी थी, पर… आज तो वीनू के साथी भी ऐसे हो गए.
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मगर वीनू ने एक दिन अपनी आदतों पर गौर किया. उसे तुरंत ही समस्या का हल मिल गया. अब उस ने यह आदत सुधार ली और परिणाम सकारात्मक रहे. उस के मित्रों का सर्कल फिर से बढ़ गया.
यहां वीनू तो समय पर सतर्क हो गई, मगर दिमाग चाट देने वाली गपशप करने की समस्या ज्यादातर लोगों को होने वाली आम समस्याओं में से एक है. ज्यादा अकेलापन, तनाव, चिंता, कोई घुटन, किसी से नाराजगी, अपने को बढ़ाचढ़ा कर बारबार पेश करना आदि यह सब गपशप की लत पड़ने की खास वजहों में शामिल हैं.
हर समय बोलने की आदत न केवल नैतिक तौर पर आप का पतन करती है, बल्कि मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए भी नुकसानदायक हो सकती है.
अगर मनोवैज्ञानिकों की मानें तो जो लोग बहुत अधिक बोलते हैं, उन्हें तनाव और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं के अलावा गला खराब होने या सिरदर्द जैसी शारीरिक समस्याएं भी हो सकती हैं. बहुत बोलने की प्रवृत्ति और इस से सेहत के संबंध के विषय पर सोचना जरूर चाहिए कि कहीं गपशप ऐसी न हो कि आप अपनी पसंद के विषय पर बिना रुके चपड़चपड़
बोलते ही चले जाएं और सामने वाला प्रताड़ित हो रहा हो. अगर गपशप हो तो ऐसी, जो सामने वाले को सुहाती हो. उस को अच्छा लग रहा हो, वो भी लगातार बोलने और सुनने में रुचि ले. हमें दोस्तों से बोलनाबतियाना जरूर चाहिए, मगर कब और किस तरह इस बात को भी गहराई से सोचनेसमझने की जरूरत है.
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि कई लोगों की आदत होती है कि वे मौका मिला और तपाक से बातों का सिलसिला शुरू कर देते हैं. कोई अगर एक छोटी सी जानकारी के लिए कुछ पूछ रहा है, तो इस पर ध्यान देना चाहिए कि संक्षिप्त बात की जरूरत है, मगर कुछ लोग यह गौर करने के बजाय उन के मन में जोजो किस्से तुरंत आते हैं, वो बस धारा प्रवाह बोल देते हैं. सब का साथ निभाना अच्छा है, मगर शिष्टता का प्रयोग भी जरूरी है. दोस्ताना या आत्मीय रिश्ते में किसी का प्यार से खूब सारा समय ले लेना अलग बात है, पर आप को अधिक कड़वा अनुभव हो सकता है. अगर लोग कन्नी काटने लगें.
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हम सब सामाजिक प्राणी हैं और बात करना यानी संवाद करना किसी से जुड़ने का प्रतीक है. इस में कोई दो राय नहीं.
कुछ लोग तो थोड़े समय बोल कर चुप हो जाते हैं, जबकि कुछ इतना बोलते और बतियाते हैं कि सुनने वाले को वहां से भागने पर मजबूर कर देते हैं.
हमें याद रखना चाहिए कि दूसरे का समय कितना उपयोगी है. समय का सम्मान करें, अपने शब्दों का भी.