Hindi Moral Tales : मेरा नाम है तियाना. वैसे मेरे बारे में आप जान ही जाएंगे, पहले मैं अभिलाष के बारे में बताऊं. मैं अभिलाष को तब से जानती हूं जब वह राजनीति में कदम जमाने की जी तोड़ कोशिश कर रहा था और लगातार सालदरसाल इसी में लगा पड़ा था. यहां तक कि कालोनी वाले भी उस के भविष्य को ले कर तरस खा कर कहते, ‘‘4 साल से ऊपर तो हो गए बेचारा और कब तक एडि़यां घिसेगा. इस हिस्से में नहीं लिखा राजनीति तो जाने दे न.’’
मगर सालों की जी तोड़ कोशिश के बाद 5वें साल उस ने आखिर जंग जीत ही ली. होगी तब उस की उम्र कोई 27 या 28 साल की. जब मैं थी कोई 36 साल से कुछ महीने ऊपर ही. हमारी कालोनी नूतन नगर एक बहुत ही सभ्य सुंदर कालोनी है, तब भी थी. बड़ेबड़े अमीर लोगों का वास था, पर हां यह कालोनी और भी सुविधासंपन्न और साफ होती अगर इसे कोई योग्य लीडर मिलता.
मैं अपनी स्कूटी से कालेज जाते हुए अकसर अभिलाष से रूबरू होती क्योंकि वह कालोनी के किसी न किसी कोने में कुछ न कुछ सफाई या व्यवस्था के काम में जुटा होता. जाने कितने सालों से वह पार्षद बनने की खाक छानता फिर रहा था और कालोनी का विकास बहुत हद तक इसी योजना का हिस्सा था.
खैर, अभिलाष के प्रयास से साल दर साल कालोनी की रंगत सुधरती रही, सुंदर बगीचे बने, रास्ते बने, गंदगी साफ होने की पुख्ता व्यवस्था हुई, पानी का इंतजाम इतना पुख्ता हुआ कि लोग लगभग भूल ही गए कि गरमी आने पर किस तरह कालोनी की पड़ोसिनें प्राइवेट पंप चला कर अपनेअपने घर में पानी खींच लेने को ले कर आपस में लड़ाइयां करती थीं.
लगभग 31 साल के होने तक उस के कामधाम और नाम की वजह से अभिलाष की फैन फौलोइंग काफी बढ़ गई थी और इन में मोटी, ताजी, लंबी, नाटी, गोरी, काली, गेहुआं, सुडौल, बेडौल, चपटी, पतली हर तरह की कालोनी वाली सार्वजनिक भाभियां मौजूद थीं, जिन की असली उम्र 40 के पार थी, लेकिन लगातार हर महीने वह घटघट कर अमावस्या के चांद की तरह पतली डोरनुमा बनी जाती थीं.
खैर, इन सब के बीच बात कुछ गंभीर भी थी. क्यों पता नहीं, (अब तो खैर पता है) अपनी उस 27 या 28 की उम्र से ही अभिलाष मु?ो कुछ अजीब सी नजरों से देखता. यों जैसेकि मैं कोई 21-22 की कमसिन लड़की हूं और जब देखो तब ऐसे देखते रहने से मु?ा में उस के प्रति शर्म की अनुभूति होने लगी थी. उस पर नजर पड़ते ही मैं सिर झुका कर आगे देखते हुए स्कूटी की स्पीड बढ़ा कर निकल जाया करती. बाद में मन में सोचती कि मुझ से इतना तो छोटा है, फिर उस के देखने भर से मुझे शर्म सी क्यों महसूस हो रही है? क्यों मैं खुद के व्यक्तित्व के प्रति सचेत सी हो जाती?
वैसे मुझे पता है, मैं खूबसूरत और स्मार्ट हूं, कालेज में लैक्चरर हूं और 36 की उम्र में मुश्किल से 30 की लगती. लेकिन उस से क्या होता है, मेरा एक दबंग पति है जिस की तब उम्र 42 साल, एक 13 साल की बेटी और एक 10 साल का बेटा. जबकि अभिलाष की तब तक शादी भी नहीं हुई थी. वह तो राजनीति में डुबकी लगालगा कर तैरने का ही अभ्यास कर रहा था. तैरना तो दूर की बात है.
मेरे दबंग पति जो वैसे तो वकील हैं लेकिन कालोनी भर में अपनी नेतागिरी के कारण अच्छी पैठ रखते हैं. कालोनी के हर आयोजन में, हरेक निर्णय में भागीदार रहते हैं और अभी तक पार्षद के चुनाव के लिए एडि़यां घिसता अभिलाष मेरे दबंग पति को दादा कह कर इज्जत देने को भी मजबूर था.
लिहाजा, अभी तक ऐसी कोई सूरत नहीं थी कि अभिलाष से मेरी कोई बात होती या
उस का फोन नंबर ही मेरे पास रहता और अब इन 5 सालों तक राजनीति में लाख आजमाइश के बाद अचानक एक दिन चुनाव से पहले बीसियों भाभियों की सजीधजी भीड़ ले कर अभिलाष मेरे दरवाजे पर पहुंचा और पहली बार मुझ से मुखातिब हुआ, ‘‘भाभी, मुझे जिता दीजिएगा, पार्षद बन गया तो…’’
इतने में ढेर सारी भाभियों के कलरव ने अभिलाष की बाकी बातें लगभग छीन सी
लीं, ‘‘अभिलाष को जिताना है, कालोनी को सजाना है.’’
होहल्ले के बीच मेरी नजर अभिलाष पर गई. उस की नजर मुझ पर एकटक टिकी थी. अभी वह अपनी उम्र के 31वें पड़ाव पर एक शादीशुदा परिपक्व राजनीतिज्ञ बन चुका था.
मैं ने आश्वासन दिया और सभी चले गए लेकिन एक कुछ रह गया, जो मुझे अच्छा तो नहीं लगा लेकिन पता नहीं कुछकुछ सा होता रहा.
नियत समय पर अभिलाष की मनोकामना पूर्ण हुई. इतने दिनों का संभावित फल उस की ?ाली में गिर चुका था. अभिलाष पार्षद बन चुका था.
अब तो उस के जलवे थे. विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री के साथ तक उस का उठनाबैठना शुरू हो गया था. साल बीत रहे थे, वह व्यस्त दर व्यस्त हो रहा था.
अब तो कालोनी की जान था वह. मुझे भी अब तरहतरह के सरकारी कागजातों के सुधार के लिए उस के पास जाना पड़ता और इसी दौरान उस ने मुझ से मेरा फोन नंबर ले लिया. न कहने की मेरी ओर से गुंजाइश नहीं थी क्योंकि आधार कार्ड हो या कोई सरकारी योजना मुझे पार्षद अभिलाष को साथ ले कर चलना था जैसे अन्य चलते हैं.
एक दिन अचानक उस ने अपना एक जबरदस्त फोटो मेरे व्हाट्सएप नंबर पर भेजा वह भी मुख्यमंत्री के साथ किसी राजनीतिक आयोजन में उस की उपस्थिति वाला. मु?ो यह कुछ ठीक नहीं लगा. उस की नजर याद आई, गोलमाल सी महसूस हुई.
यह और बात थी कि वह स्मार्ट था, हैंडसम था, यंग था और मैं उस की प्रशंसा भी खुले दिल से कर सकती हूं, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि मैं बचकाना हरकत करूं या अपनी जिंदगी के साथ खेल जाऊं. भाई कुछ नहीं तो मेरे दबंग पति के रहते मैं उन के पीठ पीछे किसी और को आंख उठा कर भी देख लूं. जहन्नुम इस से भली होगी मेरे लिए.
तुरंत एक हिमाकत भरा फौरवर्डेड जोक भी पहुंच गया उस तसवीर के पीछेपीछे. अब मैं निश्चिंत हो गई थी कि अभिलाष मुझे कुछ प्राइवेट संदेश दे रहा है, जिस का मुझे किसी तरकीब से विरोध करना पड़ेगा.
मैं दरअसल डर गई थी. यह नया क्या शुरू हो रहा था, वैसे अभिलाष मुझे बुरा नहीं लगता था लेकिन मैं झंझट में नहीं पड़ सकती थी.
दूसरी मुसीबत यह थी कि मेरे मातापिता इसी साल दूसरे राज्य से मेरे ही शहर में शिफ्ट हो कर आए थे वह भी हमारी ही कालोनी में एक नए किराए के मकान में. अब मेरे पापा की पैंशन और आधार कार्ड को ले कर मैं बुरी तरह फंसी हुई थी और यह काम पार्षद अभिलाष की मदद से ही होने को रुका था.
काम खत्म होने के बाद अगर यह सब आया होता, तो मैं ज्यादा सोचने को विवश नहीं होती, लेकिन अभी सीधे कोई खरी बात सुनाना जरा पेचीदा था. तिस पर करेले पर नीम चढ़ा यह कि मेरे वकील महोदय पति, पता नहीं पेशे की वजह से शक्की थे या शक्की होने की वजह से वकील थे हमेशा हर बात पर उन की शक की सूई घूम कर मुझ पर ही टिक जाती थी.
करूं तो क्या. सामने वाला औनलाइन मेरे जवाब के लिए रुका लग रहा था. मेरा दिमाग गड्डमड्ड हो रहा था. मैं उस के फोटो पर थम्सअप की इमोजी दे कर गायब हो गई.
डरते हुए आधे घंटे बाद फोन चैक किया कि उस ने मुझे बख्श दिया हो, अगला मैसेज आया था, ‘‘आप के घर के पास के गार्डन में आया हूं, आइए.’’
बड़ी कोफ्त हुई. भाई यह क्या है. गार्डन में मिलने की बात तो कुछ गलत हिसाब की ओर ही इशारा करती है. पर मना कैसे करूं. इस से काम भी बहुत कराना है, कहीं खफा न हो जाए और अगर इस की बातों में आती हूं तो भी खाई में गिरना ही लिखा है. इसे ?ांसे में रख कर काम करवाने तक लपेटे रखती हूं. मेरे मन में हिसाब का खाता खुला था. जब तक मांपापा का आधार कार्ड बन जाए. मेरा आधार कार्ड नया सुधरे और सरकारी मैडिकल कार्ड बने तब तक इसे अपनी तरफ से सीधा मना न ही करूं. मतलब हां, न के बीच लटका कर रखूं. मगर तब तक मेरे पति
कहीं यह खेल तो नहीं रहा मेरे साथ या कहीं पति ने ही मेरे चरित्र के प्रमाणपत्र के लिए इसे मेरे पीछे लगाया हो. दिमाग तो कम नहीं चलता मेरे पति का.
हाय. क्या करूं. किस मुसीबत में फंसी रे मैं.
उसी वक्त फिर उधर से संदेश आ गया, ‘‘दादा कहां हैं? क्या कर रहे हैं?’’
मैं ने लिखा, ‘‘घर पर हैं,’’ सोचा ऐसा बताने से वह शायद अब चुप हो जाए.
उस ने पलट कर लिखा, ‘‘दादा से डर लगता है, दादा आप का फोन तो नहीं देखते?’’
मैं ने सोचा. यह ठीक है. उसे लिखा, ‘‘देखते भी हैं कभीकभी,’’ अनजान बनने का नाटक करते पूछा, ‘‘क्यों?’’
उस ने बिना कुछ बताए झटपट सारा संदेश डिलीट कर दिया.
मैं ने फोन रख दिया. सोचा अब दौड़धूप कल से ही मांपापा के आधार कार्ड के लिए
लगती हूं, मुसीबत भी कम नहीं थी न. मेरे दबंग पति को बड़ी चिढ़ थी, मेरे मातापिता और मेरे विदेश में जा बसे मेरे छोटे भाई को ले कर.
भाई के रहते मेरे मातापिता अपनी बीमारी की वजह से मेरे सहारे मेरे पास रहने आ गए थे, यद्धपि मेरे पति को कभी मेरे मातापिता की सहायता नहीं करनी पड़ी, चाहे आर्थिक हो या अन्य कुछ. लेकिन मेरा उन के प्रति सहज सहृदय रहना मेरे पति को फूटी आंख नहीं सुहाता. इसलिए दिक्कत कुछ ज्यादा ही थी. मेरी नौकरी के कारण इन कामों में देरी होना स्वाभाविक था और तब जब सरकारी काम के नखरे भी हजार हों.
खैर, मैं अपने कालेज में कुछ एडजस्टमैंट बैठा कर पार्षद औफिस गई. अभिलाष नहीं था. मैं आज कालेज नहीं गई थी, पार्षद के साइन आज ही होने जरूरी थे, मैं ने उसे मजबूरन फोन किया. उस ने तुरंत फोन उठाया और 10 मिनट में औफिस आ गया. मैं ने गौर किया
उस ने सलीके से कुरतापाजामा
और जैकेट पहन रखी थी, वह फब रहा था.
इरादतन वह मेरे बिलकुल करीब आ गया और मु?ा से फार्म ले कर जो मेरे भरने का हिस्सा था, उस ने भर दिया. आराम से सभी जगह पर उस ने साइन किए और जो उस के भरने की जगह थी और जिसे उस के कर्मचारी भरा करते थे, वह भी उस ने भर दी. फिर मुहर लगा कर वह फार्म मेरी ओर बढ़ाया ताकि आगे की कार्यवाही के लिए मैं उसे ले जाऊं. मैं औफिस से निकल गई थी. वह मेरे पीछे आया. मैं अब बहुत हद तक आजाद थी, यद्धपि अपने बहुत से काम अभी भी उस से कराने थे लेकिन सोचा देखा जाएगा, इस के इरादों के आगे ?ाकूंगी नहीं.
उस ने पास आ कर कहा, ‘‘घर छोड़ दूं?’’
मैं ने कहा, ‘‘मेरी गाड़ी है न शुक्रिया,’’ मैं विनम्रता से उस की ओर देख मुसकराई और गाड़ी तक चली.
वह मेरे पीछे था, पीछे से ही कहा, ‘‘मैं आप के लिए ही औफिस आया था, आज मुझे नहीं आना था.’’
मैं पीछे मुड़ी, उसे एक बार और धन्यवाद कहा. स्कूटी में चाबी लगाई तो पाया स्कूटी की टायर पंक्चर है.
यह कैसे हुआ. मान नहीं सकती. अभी 2 दिन पहले ही हवा डलवाई थी मैं. वह मेरे पीछे खड़ा मुसकरा रहा था, बोला, ‘‘आप के लिए ही आया मैं. बोला न मैं ने आइए चलिए,’’ वह अपनी गाड़ी मेरे बिलकुल पास ले आया. फिर मेरी स्कूटी की चाबी मांगते हुए बोला, ‘‘यहां के कर्मचारी शेखर को मैं कह दूंगा वह आप की गाड़ी का पंक्चर ठीक करवा कर मेरे घर छोड़ देगा, आप शाम को ले जाना.’’
कुछ हक्कीबक्की सी हो मैं ने चाबी उस की ओर बढ़ा दी. यह हवाहवाई का चक्कर अभिलाष का किया धरा ही था, मैं समझ गई लेकिन इतनी दूर यहां से पैदल जाना नामुमकिन था और यह कालोनी के अंदर की सड़क थी, किराए के वाहन नहीं चलते थे.
‘‘अरे बैठिए न,’’ उस ने जोर दिया.
अब करती क्या, उस की गाड़ी में बैठना पड़ा. लगभग चिपक कर और वह गाड़ी भी कितनी धीरे चलाता रहा कि हर पल मझे यही लगता कि मेरे वकील पति मेरी पीठ पीछे बैठे मेरे संग चल रहे हैं.
मेरे घर से कुछ दूरी पर वह मुझे उतार कर बोला, ‘‘शाम को मैं आप की गाड़ी बनवा कर रखता हूं, मैं शाम को घर पर ही रहूंगा, गाड़ी आ कर ले लीजिएगा.’’
‘‘कल मुझेऔफिस जाना है, प्लीज
बन जाए.’’
मजबूरन एक और कृपा लेनी पड़ रही थी, जिस का उस ने खुले दिल से स्वागत किया.
सोचा था, शाम को उस की बीवी तो होगी ही, ज्यादा क्या होगा, चाबी लेनी है और गाड़ी स्टार्ट कर के सीधे घर.
घर पर किसी काम से व्हाट्सऐप चैक कर रही थी, देखा अभिलाष का संदेश.
‘‘आप की गाड़ी तैयार है, जाइए.’’
शाम के 5 बज रहे थे. मेरे पति लगभग रात के 8 बजे आते हैं, दोनों बच्चों को मैं नहीं पढ़ाती क्योंकि नौकरी और मातापिता के काम की भागादौड़ के बाद मेरी हिम्मत नहीं होती कि बच्चों के पीछे सिर पटकु. ऐसे भी बेटी 12वीं कक्षा में है तो उस की पढ़ाई कुछ अलग ही है. बच्चे अभी ट्यूशन में होते हैं, जिन्हें मेरे पति कोर्ट और उस के बाद अपने निजी औफिस से लौटते वक्त साथ ले आते.
मुझे अभिलाष से पीछा छुड़ाना था, मुझे अभिलाष के हिसाब से चलना नहीं था. मुझे उस से फोन पर भी संवाद बंद करना था, बावजूद इस के मैं उस के घर जाते वक्त खुद की ही नजर बचा कर खुद को थोड़ा ज्यादा सुंदर दिखाने का प्रयास करती रही.
वैसे मैं खुद को जानती हूं, यह उस से ज्यादा उस की बीवी के लिए था. स्त्री मनोविज्ञान. एक अपरिचित स्त्री जिस के पति की मैं परिचित हूं, कदाचित असुंदर दिख कर खुद को कुंठित नहीं करना चाहती थी.
मैं ने हलकी नीबू पीली जौर्जेट की लंबी कुरती के साथ सफेद स्ट्रैचेबल जींस पेयर की, ऊपर से सफेद डैनिम शौर्ट जैकेट.
मेरे घर से उस का घर पास ही था. दरवाजे पर पहुंचते ही बैल बजाने की जरूरत ही नहीं पड़ी. वह तुरंत दरवाजा खोल कर मुझे अंदर बैठक में ले गया. वह एक पीले कुरते और सफेद चूड़ीदार में अच्छा लग रहा था.
तभी उस ने कहा, ‘‘अरे आप भी पीला सा ही पहनी हैं,’’ फिर मेरी तरफ प्रशंसा से देख कहा, ‘‘बहुत अच्छी लग रही हैं.’’
मैं भी क्या कहती, ‘‘थैंक्स मेरी चाबी…’’
‘‘हां जरूर देते हैं. साथ 1 कप कौफी पी कर जाइए.’’
‘‘अपनी बीवी से मिलाइए,’’ मैं ने प्रश्नसूचक नजर उस की ओर रखी.
उस ने हलकी सी मुसकान के साथ कहा, ‘‘मेरी बीबी मायके गई है. तभी तो बुलाया है.
वह रहती तो संभव नहीं था. बिलकुल पसंद नहीं उसे, समझती ही नहीं. काम के सिलसिले… जरूरतें… कुछ नहीं सम?ाती. खैर, क्या करें. आया 1 मिनट.’’
1 मिनट की जगह 15 मिनट बाद आया 2 कौफी और कुछ बिसकुट के साथ. जितना डरी थी वैसा कुछ भी नहीं हुआ, इस की तसल्ली थी मुझे वापस आ कर.
जरा सी हंसी, थोड़ी मेरी कहानी, थोड़ी उस की बातें और एक सामान्य सी दोस्ती जैसा कुछ मैं ले कर वापस आई थी. अब नए सिरे से कुछ शुरू न हो, इस उम्मीद के साथ मैं अपने में व्यस्त हो गई.
याद तो ठीक से नहीं लेकिन फिर भी 4-5 महीने से मुझे अभिलाषा की ज्यादा खबर नहीं मिली क्योंकि उस के थोड़ेबहुत संदेश का मैं ने कोई जवाब नहीं दिया था और इसी वजह वह भी कटा सा ही रहा.
पार्षद वाली उस की गाड़ी बड़ी धूम से चल रही थी और मैं ने भी फालतू बातों से मन को दूर रखने की ठान ली थी. अचानक लगभग साल भर बाद पार्षद कार्यालय के क्लर्क शेखर
का एक व्हाट्सऐप संदेश मेरे फोन पर आया. मैं अचंभित.
मैं ने खोला संदेश. लिखा था, ‘‘नमस्ते भाभी. भैया ने मुझे आप को यह संदेश लिखने को कहा है, भैया की तबीयत बहुत खराब है, वे किसी से बता नहीं पा रहे हैं. दरअसल, उन्हें डिप्रैशन हो गया है, आप को अपने घर बुलाया है, कब आएंगी बताइएगा?’’
मैं तो खजूर के पेड़ पर जा अटकी.
शेखर को ही संदेश लिखा, ‘‘अभिलाषजी की बीवी कहां हैं?’’
‘‘भैया से अनबन कर के मायके में जा बैठी हैं, 2 महीने हो गए.’’
‘‘तो आप ने उन्हें क्यों नहीं लिखा संदेश?’’ मैं ने फिर सवाल किया.
‘‘भैया तो आप को बुला रहे हैं, किसी से बिना कुछ कहे एक बार आ कर मिल लीजिए भैया से, आप लैक्चरर हैं, समझदार हैं. भैया से बात करेंगी तो उन का मन थोड़ा हलका हो सकता है… पार्षद हैं, किसी को पता चला तो कैरियर खराब हो जाएगा, सब हंसेंगे और बात बनाएंगे.’’
‘‘देखती हूं,’’ मेरा जरा भी इस झमेले में पड़ने का मन नहीं था लेकिन मेरे स्त्री मन पर खुद के महत्त्वपूर्ण होने का भाव हावी हो गया और मैं चली गई अभिलाष के घर.
घर में उजाले और अंधेरे का कुछ अजीब सा मिश्रण था जो मुझे दुविधा में डाल रहा था.
आवाज लगाई धीरे से और अभिलाष बाहर निकला. मुझे तो ऐसा लगा नहीं कि वह बहुत दिनों से किसी मानसिक कष्ट में हो, लेकिन बुझ सा लगा, ‘‘आओ तिया अंदर आओ, आज तुम मेरे बुलाने पर आईं, तुम्हारे लिए बाहर का कमरा नहीं, तुम अंदर आओ.’’
शुरुआती तौर पर यह इज्जत अफजाई थी या करीबी होने की तस्दीक, मैं जांच नहीं पाई. नाम भी उस ने छोटा कर के लिया था, लेकिन स्त्री मन की अनुभूति ने जैसे मु?ो जकड़ लिया. मैं बात को अनसुना कर गई. भरोसा यह था कि अब तक उस ने मेरे साथ ऐसा कुछ भी किया नहीं था कि उस पर बिना बात शक करूं, सिवा इस वक्त उस के मेरे नाम को छोटा कर देने के. उस के साथ बैडरूम में आई, वह एक किनारे और मैं दूसरे किनारे बैठ गई.
मैं पूछती उस से पहले ही जरा मुंह लटका कर उस ने कहना शुरू किया, ‘‘बहुत दबाव में हूं तिया. इधर विधायकजी मुझे साइड करने के लिए मुझ पर 2 लाख के घपले का आरोप रहे हैं, दूसरी ओर मेरी बीवी देखो एन वक्त पर मुझ पर ही शक कर के मायके चली गई. किसी को कुछ भी कहा तो लोग मुझे ही बदनाम करेंगे और अगले चुनाव में मैं पिछड़ जाऊंगा.’’
‘‘आप अपनी बीवी का नंबर दो मैं समझाऊंगी उन्हें.’’
‘‘कुछ नहीं होगा. देखो एक चीज दिखाता
हूं तुम्हें फोन पर,’’ ऐसा कहते हुए वह मेरे बिलकुल पास आ कर बैठ गया और मेरे कंधे पर अपना सिर रख कर रोंआसा सा कहने लगा,’’ तिया मुझे तुम से बहुत उम्मीदें हैं, मुझे दुत्कारो मत, मैं पता नहीं कब से तुम्हें बहुत पसंद करता हूं, तुम्हें पाना, मतलब तुम्हे चाहता हूं,’’ उस ने मेरे हाथों को अपने हाथों में ले कर धीरेधीरे यों दबाते हुए मेरे होंठों को अपने होंठों के कब्जे में ऐसे ले लिया कि मैं उस के वश में आने लगी.
एक तरफ मन और दिमाग मुझे यहां से उठ कर भागने के लिए दुत्कारने लगा,
दूसरी ओर न जाने क्या इतना रूमानी सा मुझे मजबूर करने लगा कि मैं अभिलाष के अंधकार में खुद को ढीला छोड़ने पर विवश होने लगी. वह धीरे से मेरे पैरों को बिस्तर पर चढ़ा कर पूरी तरह मेरे ऊपर झुक गया. एक झटके में उस ने अपना कुरता निकाल फेंका और उस की सुगंधित देह मेरे ऊपर पसरने लगी.
मेरा शरीर अब उस के इतने काबू में था कि पल में सबकुछ बदलने वाला था. बेहोशी के आलम में न जाने क्या हो जाने वाला था. अचानक मैं झटके से उसे दूर ठेल सीधे जमीन पर खड़ी हो गई.
‘‘क्या था यह?’’ मैं एकदम अचंभित सी बोल पड़ी. फिर खुद को संभाला और दरवाजे की ओर भागी.
अभिलाष पीछे आया, ‘‘तिया, प्लीज यह मेरेतुम्हारे प्यार की बात है, किसी से कुछ नहीं कहना, मैं तुम्हारा फिर भी इंतजार करूंगा.’’
मैं कालोनी के अंदर थी. आसपास के पहचान वालों की नजर में न चढ़ूं, बहुत ही सामान्य कदमों से मन पर सौ मन का बो?ा उठाए घर पहुंची.
मन बहुत भारी हो उठा था और अब मुझे एहसास हो रहा था कि अभिलाष के प्रति मेरे मन में जो उठापटक थी, वह और कुछ नहीं, बस किसी का मुझे महत्त्व देना और चाहना मुझे भा रहा था क्योंकि जो भी हो, पति की बेखयाली ने मन को अभाव में डुबो तो रखा ही था. सच पूछा जाए तो यह अभिलाष के प्रति मेरी संवेदना या आकर्षण की बात ही नहीं थी वरना विवश होती कामना की नकेल पकड़ एक ?ाटके में उसे बिस्तर से जमीन पर सीधा खड़ा करना आसान नहीं होता. शायद सालों से स्त्री
मन में जमी चाहना ने अभाव बन कर मुझे डस लिया था.
शुक्र है शाम के 6 बज रहे थे और सब के घर आने में लगभग 2 घंटे बचे थे.
मैं अच्छी तरह नहा कर एक कप कौफी के साथ अपना फोन ले कर बिस्तर पर बैठी ही थी कि अभिलाष का संदेश, ‘‘क्यों चली गईं… मैं कितने सालों से तुम्हें पाना चाहता था.’’
मैं ने पूछा, ‘‘डिप्रैशन?’’
‘‘अभी तो कुछ नहीं लेकिन तुम्हें पा न सका.’’
‘‘पत्नी क्यों गई?’’
‘‘बेबी बर्थ के लिए.’’
‘‘अभिलाष, शेखर से तुम ने झूठ बुलवाया.’’
‘‘प्यार में सब जायज है,’’ अभिलाष की बेशर्मी अब मुझे बेहद बुरी लग रही थी.
‘‘अपनी जिंदगी और कैरियर से मत खेलो अभिलाष और अपनी बीवी की जिंदगी से भी. मेरे इस लास्ट मैसेज के बाद भी तुम ने मुझ से और कभी कोई संपर्क करने की कोशिश की तो हम दोनों की बातचीत के सारे स्क्रीन शौट मैं अपने पति को दिखा दूंगी.’’
अभिलाष इस मैसेज को देख कर ऐसे रफूचक्कर हुआ मेरी जिंदगी से जैसे गधे के सिर से सींग.
जान छूटे तो लाखों पाए. शोखियों की कारगुजारियों ने तो मेरी नींद ही खराब कर रखी थी. दिल पर से बोझ मैं ने उतार फेंका. अब से नींद वाकई सुहानी होगी.