उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के खेमादेई गांव की तेजिस्वनी सिंह का परिवार मध्यवर्गीय परिवार है. पिता श्रीराम सिंह चकबंदी विभाग में थे. तेजस्विनी की एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई है. पढ़ाई के लिए पिता ने लखनऊ में रहना शुरू किया. तेजस्विनी की मां निर्मला सिंह ने अपनी बेटियों का पालनपोषण बहुत अच्छी तरह से किया. तेजस्विनी के पिता को जब कैंसर हुआ तो डाक्टरों ने कहा कि ये 6 माह से अधिक जीवित नहीं रह पाएंगे.
लखनऊ के संजय गांधी अस्पताल में उन का इलाज शुरू हुआ. तेजिस्वनी को स्कूल टाइम से ही हर्बल दवाएं बनाने का शौक था. वह स्किन केयर के लिए दवा खुद तैयार करती थीं और उस का प्रयोग अपने दोस्तों और खुद पर करती रहती थीं. पिता को कैंसर हुआ तो उस ने पढ़ना शुरू किया कि किन चीजों को प्रयोग कर के उन के खानपान को बेहतर किया जा सकता है.
पत्रकारिता में कैरियर बनाने के चलते उस की मुलाकात कैंसर विशेषज्ञ डाक्टरों से आसानी से हो जाती थी. ऐसे में उस ने कुछ दर्दनिवारक और डाइट सूप बनाने शुरू किए. इस में उस की डाइटिशियन बहन ने भी बहुत साथ दिया. हर्बल डाइट और इलाज से तेजस्विनी के पिता 4 साल तक जीवित रहे. उन का इलाज करने वाले डाक्टरों ने भी माना कि हर्बल दवाओं का असर है.
शादी के बाद पत्रकारिता छोड़ कर तेजस्विनी ने सौंदर्य प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया और ‘मिसेज इंडिया इंटरनैशनल सिंगापुर 2018’ का खिताब जीता. आज वह अपने हर्बल प्रोडक्ट्स को ले कर बनाई कंपनी ‘और्गैनिक ग्रीन्स’ को ले कर काम कर रही हैं. पेश हैं, तेजस्विनी के साथ हुई बातचीत के कुछ खास अंश:
शादी के बाद सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की वजह क्या थी?
मैं अपनी बहन से छोटी थी. मेरे मातापिता तो 2 बेटियों के होने से किसी दबाव में नहीं थे पर बाकी रिश्तेदारों की बातें सुन कर मुझे लगता था कि जैसे मेरी परवाह नहीं है किसी को. ऐसे में मैं हमेशा कुछ न कुछ अलग करती रहती थी. मैं तांबे और पीतल के तार से बहुत सुंदर ज्वैलरी बनाती थी. सुंदरता को ले कर मेरी सोच साफ थी. मैं हमेशा बहुत सुंदर और फिट दिखना चाहती थी.
स्कूल के समय में साथी कहते थे कि मौडल लगती हो. शादी के बाद जब सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का अवसर आया तो सोचा एक बार ग्लैमर की फील्ड को भी आजमा लिया जाए. खुद को प्रूव करने के लिए इस में हिस्सा लिया.
‘मिसेज इंडिया इंटरनैशनल सिंगापुर-2018’ खिताब जीतने के बाद क्या बदलाव महसूस किया?
जीवन में सैलिब्रिटी सी फीलिंग महसूस होने लगी. मुझे ‘ब्यूटीफुल बौडी’ का खिताब भी मिला था. पहले मैं दूसरों के लिए लिखती थी अब लोग मुझ पर लिखने लगे. मौडलिंग और विज्ञापनों के कई अच्छे अवसर मिले. मेरा मन फैशन और मौडलिंग की दुनिया में जाने का नहीं था. ऐसे में मैं ने मौडलिंग के कई औफर छोड़े.
मुझे अभी भी कैंसर, हार्ट और डायबिटीज जैसे रोगों पर काम करना है. यह खिताब जीतने के बाद मेरी बातों को लोगों ने थोड़ा गंभीरता से सुनना शुरू किया है. मेरी बातों पर लोग भरोसा कर रहे हैं.
और्गैनिक ग्रीन्स की शुरुआत कैसे हुई?
जब मैं स्कूल में पढ़ती थी उस समय हम ने घर पर कई तरह के प्रोडक्ट्स को मिला कर एक क्रीम तैयार की थी. अपने घर में काम करने वाली नौकरानी को लगाने के लिए दी तो उस ने बताया कि बहुत अच्छी लग रही.
जब मैं पत्रकारिता के जौब में थी तो मैडिकल मेरी फील्ड थी. धूप में आनेजाने पर मुझे स्किन इन्फैक्शन हो गया. डाक्टरों को दिखाया तो बोले यह हाइपर पिगमैंटेशन है. मैं ने अपनी पहले वाली बनाई क्रीम का प्रयोग शुरू किया. धीरेधीरे मेरे दाग गायब हो गए. जब पिता को कैंसर हुआ तो वह बहुत खराब दौर था. हम ने कुछ हर्बल प्रोडक्ट्स और सूप तैयार कर उन को देना शुरू किया. इस से उन का जीवन थोड़ा लंबा हो सका.
उन का इलाज करने वाले डाक्टर आज भी यह सोच कर हैरान हैं कि लाइफ कैसे बढ़ गई थी?
आप ब्यूटी के क्षेत्र में काम कर रही हैं या हैल्थ के?
अभी ब्यूटी के क्षेत्र में काम कर रही हूं. हमारे 100 के करीब प्रोडक्ट्स हैं. अब हम हैल्थ के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं.
क्या सरल होता है ये सब करना?
सरल कुछ नहीं होता. हर्बल ब्यूटी प्रोडक्ट्स जब बनाने शुरू किए तो क्व20 हजार की मशीन लगाना मुश्किल काम था. कुछ पैसे जोड़ कर क्रीम बनाई. उसे बेचने के लिए खुद दुकानदारों के पास गए. कई दुकानदारों ने क्रीम को रिजैक्ट कर दिया. मगर हिम्मत नहीं हारी. खुद पैदल दुकानदुकान जाती थी. अब वही दुकानदार हमारी खूब क्रीम बेच रहे हैं.
लड़कियों की समाज में क्या हालत है?
समाज के एक बड़े वर्ग की सोच लड़कियों को ले कर अभी भी पुरानी ही है. शादी लड़कियों के लिए एक बड़ा जुआ होता है. इस की सफलता और असफलता दोनों की जिम्मेदारी लड़की की मानी जाती है. उस का सब से अधिक प्रभाव लड़की पर पड़ता है.
लड़की की सफलता को उस की मेहनत से कम ही लोग जोड़ कर देखते हैं. यह सोच निचले स्तर से ले कर ऊपर के स्तर तक कायम है. बहुत सारे उदाहरणों के बाद भी यह सोच जल्दी बदलने वाली नहीं लग रही. आज भी बलात्कार, छेड़छाड़, शोषण और लड़कियों को दबाने, उन्हें मनचाहा न करने देने की घटनाएं कम नहीं घट रहीं.