मूलतः भारतीय मगर अमरीका में जन्में व पले बढ़े अक्षय ओबेराय को 12 वर्ष की उम्र में ही अभिनय का शौक हो गया था. उन्होने अमरीका में रहते हुए एक फिल्म ‘‘अमरीकन चाय’’ में बाल कलाकार के रूप में अभिनय भी किया था. उन्होने अमरीका में रहते हुए अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण भी लिया. मगर अभिनय के क्षेत्र मे कैरियर बनाने के लिए वह अमरीका से मुंबई आ गए. उन्हे सबसे पहले सूरज बड़जात्या ने ‘राजश्री प्रोडक्शन’ की फिल्म ‘‘इसी लाइफ में’’ में लीड किरदार निभाने का अवसर दिया. अफसोस इस फिल्म ेने बाक्स आफिस पर पानी तक नही मांगा,जिसके चलते उनका संघर्ष लंबा ख्ंिाच गया. इसके बाद फिल्म ‘पिज्जा’ ने थोड़ी सी पहचान दिलायी. लेकिन शंकर रमण निर्देशित फिल्म ‘‘गुड़गांव’’ में नगेटिब किरदार निभाकर उन्होंने कलाकार के तौर पर बौलीवुड मेंं अपनी पहचान बनायी. उसके बाद उनका कैरियर हिचकोले लेते हुए लगातार आगे बढ़ता रहा. मगर ओटीटी प्लेटफार्म तो उनके लिए जीवन दायी साबित हुए. अब वह काफी व्यस्त हो गए हैं. इन दिनों भारत की पहली वच्र्युअल फिल्म ‘‘जुदा हो के भी ’’ को लेकर चर्चा में हैं. विक्रम भट्ट निर्देशित यह फिल्म 15 जुलाई को सिनेमाघरों में पहुॅची है.
प्रस्तुत है अक्षय ओबेराय से हुई बातचीत के अंश. . .
आपकी परवरिश अमरीका में हुई. आपने अभिनय का प्रशिक्षण भी अमरीका में ही लिया. फिर वहां पर फिल्मों में अभिनय करने की बनिस्बत आपने अभिनय को कैरियर बनाने के लिए बौलीवुड को क्यों चुना?
-देखिए,आप अच्छी तरह से जानते है कि मेरी जड़ें भारत में ही हैं. मेरे माता पिता काफी पहले अमरीका में सेटल होे गए थे और मेरा जन्म वहीं पर हुआ. मगर जब मैं बारह वर्ष का था,तभी से घर पर व स्कूल में अभिनय किया करता था. बॉलीवुड फिल्में बहुत देखता था. लेकिन मैं यह देख रहा था कि वहां की फिल्मों में स्क्रीन पर जो कलाकार नजर आ रहे थे,वह सभी गोरे लोग थे. मैं तो उनकी तरह दिखता नहीं था. मेरे घर का रहन सहन व भाषा सब कुछ पूरी तरह से भारतीय ही रहा. मेेरे माता पिता अस्सी के दशक में भारत से अमरीका गए थे,मगर वह भारतीय कल्चर को भी अपने साथ ले गए. अमरीका में भी हमारे घर पर पूरी तरह से हिंदी भाषा और भारतीय कल्चर ही रहा. और हिंदी फिल्में ही देखते थे. इसलिए अमरीकन की तरह सोच मेरे दिमाग में कभी आयी ही नहीं. मुझे लगा कि मेरे लिए हिंदी सिनेमा ही बेहतर रहेगा. इसलिए मैं मुंबई चला आया. बॉलीवुड में काम करते हुए मुझे दस वर्ष हो गए. मुझे लगता है कि यह मेरा सही निर्णय रहा. वहां रहकर शायद मैं उतना तो काम न कर पाता, जितना यहां कर पाया. यहां जितने विविधतापूर्ण किरदार निभाए,वह भी शायद वहां पर निभाने को न मिलते. मैने यहां पर फिल्म के अलावा ओटीटी प्लेटफार्म पर भी काफी अच्छा काम करने का अवसर पाया. शायद इस तरह का विविधतापूर्ण काम करने अवसर मुझे हालीवुड में न मिलता.
आपने 2010 में ‘राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म ‘‘इसी लाइफ में’’ से अपने अभिनय कैरियर की शुरूआत की थी. तब से अब तक के कैरियर को आप किस तरह से देखते हैं?
-मैं हमेशा अपने आपको ‘अभिनेता’ मानता था और मानता हूं. ‘ ‘स्टार ’ शब्द से मैं कभी इत्तफाक नहीं रखता. मैने ‘स्टार’ शब्द के पीछे कभी नहीं भागा. जैसा कि आपने भी कहा मैंने अमरीका में अभिनय की विधिवत शिक्षा ली. भारत आने के बाद मैने मकरंद देशपंाडे के साथ थिएटर किया. मेरी रूचि हमेशा अभिनय में रही. मेरी अब तक की अभिनय यात्रा में काफीउतार चढ़ाव रहे. मैेने असफलताएं भी काफी देखीं. इन सारी चीजों ने मुझे एक ‘अभिनेता’ बनाया है. कोई अभिनेता के तौर पर पैदा नही होता. अभिनेता को तराशा जाता है. हमें लगातार किरदारांे ंपर काम करना पड़ता है. अपनी संवाद अदायगी पर काम करना होता है. मसलन- एक डाक्टर अपने पहले आपरेशन में कुछ कमाल नही कर पाया होगा,पर बाद में वह दिग्गज सर्जन बनता है. यही बात अभिनय के क्षेत्र में भी लागू होती है. आप जितनी मेहनत करोगे, भाषा,संवाद अदायगी, चरित्र चित्रण, इमोशंस पर जितना काम करोगे,उतना ही बेहतरीन कलाकार बनते जाओगे. तो मुझे भी काम बहुत मिला. कुछ ऐसा बॉक्स आफिस पर उम्दा धमाल नही हुआ है. लेकिन उम्मीद है कि बहुत जल्द बाक्स आफिस पर धमाल भी होगा. मगर अब तक इन सारी चीजों ने मुझे मैच खेलने के लिए तैयार किया. इतने विविधातपूर्ण किरदार निभाने और इतना काम करने के बाद मैं महसूस करता हूं कि अब मैं अगले स्तर के लिए तैयार हूं.
आप अब तक के कैरियर में टर्निंग प्वाइंट्स क्या मानते हैं?
-शुरूआती तौर पर सूरज बड़जात्या जी ने मुझे फिल्म ‘इसी लाइफ में ’ लांच किया था,मगर फिल्म सफल नही हुई थी. सही मायनों में मेरा पहला टर्निंग प्वाइंट फिल्म ‘गुड़गांव’ रही. दूसरा टर्निंग प्वाइंट ‘पिज्जा’ रहा. ‘गुड़गांव’ को लोग कल्ट फिल्म मानते हैं. इस फिल्म को पत्रकारिता के स्कूल में पढ़ाया जा रहा है. मेरी परवरिश अलग माहौल में हुई. मेरे चेहरे के नयन नक्श भी कुछ अलग प्रकार के हैं. फिर भी फिल्म ‘गुड़गांव’ के शंकर रमण ने मुझे क विलेन के तौर पर देखा. इसके लिए मुझे हरियाणवी भाषा के लहजे को सीखना व पकड़ना पड़ा था. फिल्म ‘गुड़गांव’ के प्रदर्शन के बाद अचानक लोगों को मुझसे आपेक्षाएं होने लगी. लोगांे को अहसास हुआ कि इस बंदे में दम है. क्योकि इस फिल्म में मैंने जिस तरह का किरदार निभाया है,उसके ठीक विपरीत मैं निजी जीवन में नजर आता हूं और अलग तरह से ही बात करता हूं. इस फिल्म को कई फिल्मकारों ने देखा और मेरे अभिनय की तारीफ भी की. खैर,अब तो यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर मौजूद है और अब तो इसे काफी दर्शक मिल चुके हैं. फिर सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट ओटीटी प्लेटफार्म रहा. मैने ओटीटी पर ‘ईलीगल’, ‘इनसाइड एज’ और ‘हाई ’ तक हर वेब सीरीज के लिए प्रशंसा ही पायी. ओटीटी प्लेटफार्म से ही मुझे दर्शक मिले. पहले फिल्म इंडस्ट्ी के अंदर के लोग मुझे अच्छा कलाकार बताया करते थे. मगर ओटीटी के चलते अब आम दर्शक भी मुझे अच्छा एक्टर मानने लगा हैं. तो मैं अपने कैरियर में ‘गुड़गांव’ और ओटीटी इन दो को महत्वपूर्ण टर्निंग प्वाइंट मानता हूं.
आपकी कुछ फिल्मों की असफलता की वजह भी रही कि उन्हें ठीक से प्रमोट नहीं किया गया और उन्हे ठीक से रिलीज भी नहीं किया गया?
-आपने एकदम सही कहा. आप काफी लंबे समय से फिल्म पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं. आपको काफी अनुभव है. इसनिए आपका आकलन गलत तो नहीं हो सकता. सच तो यही है कि मुझे नही याद कि मेरी एक भी फिल्म ढंग से रिलीज हुई है. हर शुक्रवार को जब मेरी फिल्म रिलीज होती थी,तो पता ही नही चलता था कि मेरी फिल्म भी रिलीज हो रही है. पर जब फिल्म को अच्छे रिव्यू मिलते थे,तब कुछ चर्चा होती थी. अब तो खैर काफी प्लेटफार्म आ गए हैं. ‘गुड़गांव’,‘लाल रंग’, ‘कालाकांडी’ सहित मेरी कई अच्छी फिल्में रही हैं,जिनका न ठीक से प्रमोशन हुआ और न ही इन्हें ठीक से रिलीज किया गया. मेरी फिल्म की मार्केटिग का कभी भी बडा बजट नहीं रहा. इसे आप तकदीर भी कह सकते हो कि फिल्में ठीक ठाक रहीं.
माना कि ओटीटी पर आपको कलाकार के तौर पर अच्छी पहचान मिली,मगर वहां भी आप ठीक से प्रमोट नहीं हो पा रहे हैं?
-शायद यह मेरी भी कमजोरी है. मैं हमेशा काम,किरदार,कहानी,फिल्म पर फोकश करता हूं. रचनात्मक रूप से बहुत ज्यादा सचेत रहता हूं. काफी मेहनत करता हूं. पर अपने आपको बेचने में उतनी मेहनत नहीं करता. मैं सोशल मीडिया का भी शेर नही हूं. सोशल मीडिया का किंग नहीं हूं. मुझे सोशल मीडिया पर खुद को बनाए रखना भी नहीं आता. मैं फिल्मी पार्टियों में भी नही जाता. कुछ लोग ऐसे हैं जो कि मंदिर जाते हैं,तो वहां की सेल्फी लेकर पत्रकार को फोन करते हैं कि भाई इसे छपवा दे. मेरा दिमाग इस दिशा में जाता ही नहीं है. तो यह मेरी अपनी कमजोरी है. जबकि हर कलाकार को खुद को बेचना आना चाहिए. हम जानते हंै कि जो दिखता है,वही बिकता है. मुझे हमेशा लगता है कि मेरा काम बात करेगा और ऐसा होता है. लेकिन इसमें वक्त लगता है. मैने इस बात को अब अहसास किया कि दस वर्षों से अध्कि समय तक काम करने के बाद ओटीटी के चलते मुझे पहचान मिली. अब मैं जब सड़कों पर जाता हूं,तो लोग मुझे पहचानते हैं. अब लोग मुझसे एअरपोर्ट पर सेल्फी मांगने लगे हैं. मैने यह सब खुद को बेचकर नही खरीदा है. बल्कि मेरा काम बोल रहा है. यह मेरी अपनी मेहनत का परिणाम है. लेकिन यह समझ में आया कि मेहनत के बल पर इतना ही मिलेगा. स्टारडम के स्तर पर जाने के लिए आपको अपनी मार्केटिंग भी करनी पड़ेगी. यह मेरी कमजोरी है कि मैं सही ढंग से प्रमोट नही हो पाया,पर अब मैं इस पर भी ध्यान दॅंूगा.
वच्र्युअल फार्मेट पर पहली बार विक्रम भट्ट ने फिल्म ‘‘जुदा होके भी ’’बनायी है, जिसमें आप लीड किरदार में हैं. आपने इस फिल्म का हिस्सा बनना क्या सोचकर स्वीकार किया?
-मैने इस फिल्म से जुड़ना वच्र्युअल तकनीक के कारण स्वीकार नहीं किया. वच्र्युअल बहुत अलग तकनीक है. इससे सिनेमा में इजाफा ही होगा. मैने ‘जुदा होके भी’ को करने के लिए हामी भरी उसकी अलग वजह रही है. मैने अब तक जितनी भी फिल्में की या वेब सीरीज की,उन्हे अधिकांशतः शहरी दर्शकों ने ही देखा है. अति बुद्धिमान समझे जाने वाले दर्शको ने देखा है. ‘लाल रंग’ या ‘गुड़गांव’ जैसी फिल्में देश के कुछ हिस्से में ही चली. मसलन हरियाणा में चली. मैने अब तक हार्ट लाइन की एक भी फिल्म नही की. जब तक आप हार्टलाइन यानी कि देश के दिल की फिल्में नहीं करेंगे,तब तक लोगों के दिलों तक नहीं पहुंच सकते. और हार्ट लाइन की फिल्में बनाना भट्ट कैंप से बेहतर कोई नही जानता. भट्ट कैंप बहुत अच्छी तरह से समझते हैं कि हार्ट लाइन में किस तरह की फिल्में देखी जाती हैं. जब महेश भट्ट साहब और विक्रम भट्ट जी मेरे पास इस फिल्म का आफर लेकर आए थे,तो मैने उनसे साफ साफ कहा था कि आपको मेरे साथ जिस तरह की भी फिल्म बनानी है,बनाएं,क्योंकि मुझे उन दर्शकांे की तरफ फोकश करना है,जो वफादार है. या सिंगल थिएटर के जो दर्शक हैं या जिन्हे आप हार्ट लाइन दर्शक कह लें.
आपके अनुसार फिल्म ‘‘जुदा हो के भी ’’ क्या है?
-यह वूंडेड यानी कि घायल लोगांे की कहानी है. उसने बहुत दर्द झेला है. इसमें मेरे किरदार अमन की कहानी है. जो बहुत बड़ा फिल्म स्टार रह चुका है. अब वह स्टार नही है. अब दिन भर दारू पीता है. उसने अपना बच्चा खोया हुआ है यानी कि जब उसका बेटा चार पांच वर्ष का था,तब उसकी मौत हो गयी थी. वह उसका दुःख लेकर जी रहा है. फिर कोई युवक उसकी बीबी को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है और अमन अपनी बीबी की खोज में जाता है. फिल्म की शुरूआत में अमन सब कुछ खो चुका है. फिर धीरे धीरे उसे जो कुछ पाना है,उसकी चुनौती को स्वीकार कर अंततः पा लेता है. तो इस फिल्म में अमन की कए लड़ाई है. अमन की एक यात्रा है.
आपने अमन के किरदार के साथ न्याय करने के लिए कोई होमवर्क किया?
-मैं अपनी हर फिल्म के लिए अलग अलग तरह से काफी होमवर्क करता हूं. जब हर इंसान अलग है. तो फिर हर फिल्म का किरदार भी अलग ही होता है. हर किरदार का लुक,उसके अहसास सब कुछ अलग होता है. इस फिल्म में मैने उसके भाषा के लहजे पर काम किया. वह कलाकार है,तो मैंंने पियानो बजाना सीखा. भट्ट साहब की जो डायलाग बाजी होती है,उस पर काम किया कि मैं किस तरह भारी भरकम संवादों को बड़ी सहजता से पेश कर सकूंू.
एक कलाकार के लिए वच्र्युअल फार्मेट में शूटिंग करना कितना फायदेमंद है?
-मेरे लिए तो फायदेमंद है. देखिए,पांच करोड़ की लागत में बनी फिल्म हो या सौ करोड़ की लागत में बनी फिल्म हो,दर्शक को फिल्म देखने के लिए एक समान ही टिकट के दाम चुकाने होते हैं. ऐसे में दर्शक चाहता है कि वह बड़े बजट की फिल्में देखे. तेा वच्र्युअल फार्मेट में शूटिंग करने से कम खर्च में महंगी फिल्म बन जाती है. ऐसे में मेरे जैसे कलाकार के लिए,जिसकी बाक्स आफिस पर बड़ी पहुंच नही है,जो सौ करोड़ के बजट वाली फिल्म में लीड किरदार नही निभा सकता,उसके लिए वच्र्युअल फार्मेट वरदान ही है. वच्र्युअल फार्मेट में शूट करके मैं दर्शकों को वही सब दे सकता हूं,जो दर्शक को सौ करोड़ की फिल्म में मिल रहा है.
किसी भी फिल्म को अनुबंधित करने के बाद अपनी तरफ से किस तरह की तैयारियां करना पसंद करते हैं?
-मुझे लगता है कि हर किसी को कलाकार बनना है. मगर वास्तव में बहुत कम लोगांे को अच्छा अभिनेता बनने का अवसर मिलता है. मैं हर दृश्य में ,चाहे वह फिल्म हो या ओटीटी हो या कोई तीस सेकंड की विज्ञापन फिल्म ही क्यांे न हो,मैं अपनी तरफ से उसमें पूरी जान डालता हूं. भट्ट साहब कहते है कि कलाकार को अपनी आत्मा सेट पर छोड़कर जाना चाहिए. वह सही कहते हैं. यदि आप किरदार में आत्मा नही छोडेंगे,तो परदे पर दर्शक को उसमें जान जीवंतता नजर ही नही आएगी. तो मेरी तरफ से यह कोशिश रहती है कि मेरे अंदर जितना भी हूनर है,वह सब उस किरदार में पिरो दूं. और मुझे अंदर से अहसास भी हो कि मैने अपनी तरफ से पूरा कामइमानदारी से किया है.
आपकी आने वाली दूसरी फिल्में कौन सी हैं?
-काफी हैं. इस वर्ष मैं बहुत काम कर रहा हूंू. एक फिल्म है ‘वर्चस्व’. जिसमें मेेरे साथ त्रिधा चैधरी व रवि किशन भी हैं. यह कोयले के खदान की नगरी की कहानी है. यह छोटे गांव के लड़के की कहानी है,जो कोयले की खदान में काम करता है,फिर वहां का स्थानीय डॉन बन जाता है. इसके अलावा एक फिल्म ‘‘गैस लाइट ’’ है. पवन कृपलानी निर्देशित इस फिल्म में सारा अली खान,चित्रांगदा सिंह व विक्रांत मैसे भी हैं. फिल्म ‘एक कोरी प्रेम कथा’ में सोशल सटायर है. कुछ फिल्मों का ख्ुालासा अभी नही कर पा रहा हूं.
आपके शौक क्या हैं?
-बास्केट बाल देखता हूं. पढ़ता हूं. अपने बेटे के साथ वक्त बिताता हूं. मैं ऑटो बायोग्राफी व नॉन फिक्शन सहित सब कुछ पढ़ना पसंद करता हूं. मुझे लगता है कि हम जो कुछ पढ़ते हैं या देखते हैं,वह सब हमारे सब कॉशियस माइंड में अंकित रहता है और वह अनजाने ही किसी किरदार को निभाते समय मदद कर जाता है. किताबें पढ़ने से इंसान के तौर पर ग्रोथ होती है.
कोई ऐसी किताब पढ़ी हो,जिसे पढ़ते समय आपके मन में आया हो कि इस पर काम हो तो उससे आप जुड़ना चाहेंगें?
-अम्ब्रे ऐसी की एक किताब है . उनकी ऑटाबायोग्राफी है,जिसे मैने पढ़ा है और उनसे मैं बहुत प्रभावित हुआ हूं. मैं उनकी तरह सुंदर तो नहीं हूं. पर उस तरह का किरदार करने का अवसर मुझे मिल जाए,तो मजा आ जाएगा.