न्याय प्रणाली में भ्रष्टाचार को दिखाने वाली फिल्म ‘‘वन डे जस्टिस डिलिवर’’में क्राइम ब्रांच की पुलिस अफसर लक्ष्मी राठी का किरदार निभाने के कारण शोहरत बटोर रही एक्ट्रेस ईशा गुप्ता अपनी बेबाकी के लिए जानी जाती हैं. पांच जुलाई को प्रदर्शित हो रही इस फिल्म में एक उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जिस दिन अवकाश ग्रहण करते हैं, उसी दिन उन्हें अहसास होता है कि वह कानून की किताबों में बंधे होते हुए वकीलों द्वारा दिए गए साक्ष्य के आधार पर कुछ गुनाहगारों को बरी कर दिया था और अब वह उन गुनाहगारों को सजा देने के लिए अपने तरीके से काम करेंगें. इस फिल्म में अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जो कदम उठाते हैं, उसके खिलाफ लक्ष्मी राठी जांच करती हैं. मजेदार बात यह है कि इस फिल्म में सख्त पुलिस अफसर का किरदार निभाने वाली ईशा गुप्ता अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने से पहले लंदन में वकालत कर चुकी हैं. प्रस्तुत है ईशा गुप्ता से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश..

सवाल- 2012 से अब तक के अपने करियर को आप किस रूप में देख रही हैं?

-सर, इसे मैं किस्मत कहूंगी. मेरा मानना है कि आपकी जिंदगी और करियर में जो कुछ हो रहा है,उसे स्वीकार करना चाहिए.एक कहावत है कि ,‘‘जब आप जिंदगी को लेकर योजना बना रहे होते हैं,तो भगवान आप पर हंस रहा होता है.’’मुझे लगता है कि मेरे साथ ऐसा ही हुआ है. मेरे पापा एअर फोर्स में थे,इसलिए मैं बचपन से एअर फोर्स में जाना चाहती थी.इसके पीछे एक मात्र चाहत प्लेन उड़ाने की थी.लेकिन जब मुझे पता चला कि एअर फोर्स से जुड़ने के बहुत पढ़ाई करनी पड़ेगी,तो मैंने इरादा बदल दिया.

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सवाल- आप पढ़ाई से इतना दूर क्यों भाग रही थीं?जबकि आपने पढ़ाई तो बहुत की है?

-आपने एकदम सही कहा.मैंने मास कम्युनीकेशन के अलावा वकालत की पढ़ाई की है.मैं वकील भी हूं.मैने कुछ समय तक वकालत की है. फिर भी एअरफोर्स में पढ़ाई के नाम पर मैं पीछे हटी,क्योंकि मैं प्लेन के बारे में नहीं पढ़ना चाहती थी,मैं सिर्फ प्लेन उड़ाना चाहती थी.उसके बारे में सीखना नहीं चाहती थी.मेरे तमाम दोस्त ऐसे हैं,जिन्होंने आॅटोमोबाइल इंजीनियर के रूप में पढ़ाई शुरू की थी,पर बाद में छोड़ कर कुछ और कर रहे हैं. जब मैंने एअर फोर्स का इरादा छोड़ दिया,तो मन में आया कि मुझे वकील बनना है.कानून की धाराओं और वकालत में मेरी हमेशा बहुत रूचि रही है.मैंने वकालत की पढ़ाई लंदन  जाकर की.उस वक्त मैं वहीं रहना भी चाहती थी.लेकिन अचानक भारत पे्रम मुझे वापस यहां खींच लाया. लंदन में वकालत की पढ़ाई करने से पहले मैंने मास कम्युनीकेशन भी किया था.मैं पूरे पांच साल की वकालत@लॉ की पढ़ाई नहीं करना चाहती थी.इसलिए पहले मैंने मास कम्युनीकेशन का कोर्स किया.उसके बाद दो साल की लॉ की पढ़ाई की.मैंने वहां पर वकील के तौर पर पै्रक्टिस शुरू कर दी थी.पर किस्मत में तो अभिनेत्री बनना लिखा था,तो अब यहां आपके सामने हूं.मेरा मानना है कि जब ईश्वर आपको कुछ देता है या आपके माध्यम से अच्छा@बुरा कुछ करवाना चाहता है,तो उस वक्त आपको सोचना चाहिए कि ईश्वर क्या निर्देश दे रहा है या उसका इशारा क्या है? मैंने ईश्वर के इशारे को समझा और उसके अनुसार अभी तक यहां पर काम कर रही हूं.

सवाल- आप एअरफोर्स में या वकालत के के पेशे के जरिए समाज या देश को कुछ देने की सोच रही थी? तो क्या अभिनेत्री बनकर आप समाज या देश को कुछ दे पा रही हैं?

-मैं इस तरह से नहीं सोचती. मैं एक सवाल करती हूं कि दूसरों ने समाज को क्या दे दिया?, जो मुझसे उम्मीद करते हैं. फिर भी मुझे लगता है कि मैं औरों से कहीं ज्यादा समाज को दे रही हूं.मैं अपनी आवाज को सही चीजों के लिए इस्तेमाल कर रही हूं. आज के समय में यह बात बहुत मायने रखती है कि आप आवाज उठाएं, अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाएं.  किसने कहा कि मैं वकालत के पेशे में रहते हुए समाज को कुछ दे रही थी? सच यही है कि वकालत के पेशे में रहते हुए मैं अपने लिए काम करती.सरकार नहीं,बल्कि प्रायवेट लॉयर के रूप में काम करती और ढेर सारा पैसा कमाती.सच कहूं तो अभिनेत्री के तौर पर मैं जितना पैसा कमा रही हूं,उससे कहीं ज्यादा पैसा मैं लौयर यानी वकील के रूप में कमा रही थी.

यूं भी चार दीवारी के अंदर एक इंसान सही है या गलत,इसे साबित करना बहुत आसान होता है. मगर पूरी आवाम के सामने,सोशल मीडिया पर किसी भी मुद्दे को उठाना बहुत कठिन होता है. और तब जब आप देश की एक पर्सनालिटी हो. इसलिए मैं कहती हूं कि बतौर अभिनेत्री मैं समाज व देश के लिए बहुत अधिक काम कर पा रही हूं. क्योंकि लोग मुझे सुनना चाहते हैं.यदि लोग यह जानना चाहते हैं कि अभिनेत्री के तौर पर मैं किस तरह के कपडे़ पहनती हूं,क्या खाती हूं,कहां जा रही हूं,कहां आ रही हूं, तो कलाकार के तौर पर यह भी बताना चाहिएं कि समाज या देश या किसी भी इंसान के हित में क्या है.अभिनेत्री के तौर पर मैं यह काम जरूर कर पा रही हूं.

सवाल- इस वक्त आप किस मुद्दे को तवज्जो दे रही हैं?

-यदि आप मुझे सोशल मीडिया पर फौलो कर रहे होंगे, तो आपने पाया होगा कि मैंने ‘क्लायमेट चेंज’को लेकर बहुत कुछ कहा है.मैं अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की बात कही है.आज आप व मैं,जिस वक्त बैठकर बातें कर रहे हैं, उसी वक्त ‘जी 20’ समिट में ‘क्लायमेट चेंज’ को अनदेखा कर दिया गया.अफसोस की बात यह है कि अमरीका ने ‘जी 20 समिट’में क्लायमेट चेंज को बड़ा मुद्दा मानने से इंकार कर दिया. मगर एक तरीके से उन्होंने सही किया.क्योंकि जिनकी वजह से पूरे विश्व में क्लायमेट पर्यावरण बिगड़ रहा है,यानी बड़ी बड़ी कंपनियों व तेल उत्पादक कंपनियों से ही हर राजनीतिज्ञ को पैसा मिल रहा है.पूरे विश्व में हर राजनीतिज्ञ की एकमात्र सोच यही रहती है कि कार्यकाल समाप्त होने से पहले पैसा जमा कर लें.इस चक्कर में देश के लोगों के भविष्य की उन्हें चिंता नही होती.आज कल लोग खासकर राजनीतिज्ञ बहुत स्वार्थी हो गए हैं. यह सभी सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं.यह राजनेता इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि पूरी दुनिया के लिए आतंकवाद से भी बड़ा मुद्दा ‘क्लायमेट चेंज’है.

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सर,पिछले हफ्ते रशिया का एक वीडियो सामने आया.एक पोलब गॉंव में आ गया है,जिसके पास खाने को कुछ नही है, उसकी बर्फ पिघल गयी है.जबकि ऐसा कभी होता नहीं.क्योंकि पोलब को लोग देख नही पाते हैं. वह हमेशा बर्फ में रहता है. पोलब बना ही बर्फ के लिए है.लेकिन हम लोगों की वजह से क्लायमेट चेंज हो रहा हैं और हालात ऐसे हो रहे हैं.

सोशल मीडिया में सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब आप कोई अच्छी बात कहेंगे,तो उसका विरोध करने के लिए ढेर सारे लोग सामने आ जाते हैं. लेकिन मैंने महसूस किया हर इंसान की जिंदगी में ऐसा होता है.घर के अंदर भी लोग आपका विरोध करते हैं. समाज में भी लोग विरोध करते हैं यानी कि जब भी आप कुछ अच्छा काम करेंगे, तो विरोध सहन करना पडे़गा.ऐसे में आपके सामने दो रास्ते होते हैं-पहला,आप उस विरोध की परवाह करें. दूसरा उस विरोध को अनदेखा कर दें.मैं सोशल मीडिया पर हर तरह के विरोध को अनदेखा कर देती हूं. विरोध करने वालों को महत्व नही देती.गीता कहती है-‘‘अपना कर्म करते रहो.’मैं ऐसा ही करती हूं. मेरे कहने का अर्थ यह है कि यदिआप किसी चीज में यकीन करते हैं, तो उसको निरंतर करते रहें. तकलीफें आएंगी, विरोध भी होंगे. अंततः जीत आपकी होगी.

सवाल- आप अपने अब तक के फिल्मी करियर को लेकर क्या कहना चाहेंगी?

-मेरी तकदीर मुझे फिल्मों में ले आयी.मैने 2012 में फिल्म‘‘जन्नत 2’’से बौलीवुड में कदम रखा था.दसके बाद मैने ‘राज 3’,‘गोरी तेरे प्यार में’जैसी फिल्में की. मगर फिल्म ‘हमशक्ल’की अफलता से मेरे करियर को काफी नुकसान हुआ. उसके बाद मैने कुछ म्यूजिक वीडियो के अलावा फिल्मों में आइटम नंबर किए.फिर मैने दक्षिण भारतीय भाषाओं की कुछ फिल्में की. मैंने परसियन भाषा की फिल्म‘‘द डेविल्स डौटर’’की. पर ‘टोटल धमाल’से मुझे फिर से नया जीवनदान मिला. इन दिनों मैं फिल्म ‘‘वन डे जस्टिस डिलिवर’’को लेकर उत्साहित हूं.

सवाल- फिल्म‘‘हमशक्ल’’की असफलता का क्या असर हुआा?

-‘हमशक्ल’की असफलता के बाद फिल्म इंडस्ट्री ने मुझे हाशिए पर ढकेल दिया. फिल्म इंडस्ट्री से मुझे सपोर्ट नही मिला. ‘हमशक्ल’ की असफलता के बाद मैं भी कुछ समय के लिए डिपे्रशन में चली गयी थी.पर मैं भी डिपे्रशन से उबरी.

सवाल- आपने डिप्रेरशन से उबरने के लिए क्या किया?

-लोग डिप्रेरशन से उबरने के लिए कई तरह की बातें कहते हैं. कुछ लोग मनोवैज्ञानिक डौक्टरों के पास पहुंच जाते हैं. पर मुझे लगता है कि यह सब जरूरी नही है. डिप्रेशन से उबरने के लिए अपने आत्मबल को मजबूत करने की जरूरत होती है.उसके बाद सिर्फ अपने काम को करते रहना चाहिए.जब मैं डिपे्रशन में पहुंची,तो मंैने बहुत कुछ सीखना शुरू किया. मैं अभिनेता नीरज कवि के ‘‘एक्टिंग वर्कशौप’’ से जुड़ी और एक्टिंग की टे्निंग ली. मैनें डांस के कुछ नए फार्म सीखे. आपको पता है कि बौलीवुड में सफलता को सलाम किया जाता है. इसीलिए मैंने दक्षिण भारत में जाकर कुछ फिल्में की. देखिए, काम करते रहने से आपकी सोच में बदलाव आना शुरू हो जाता है. घर पर खाली बैठे रहने से आप सिर्फ असफलता को लेकर सोचते रहते हैं और तब डिप्रेशन से उबरने के लिए सायकोलौजिकल ट्रीटमेंट की जरुरत पड़ती है.

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कम से कम एक कलाकार के तौर पर मेरा मानना है कि किसी भी फिल्म की सफलता या असफलता के कई कारण होते हैं. मैं मानती हूं कि डिप्रेशन के वक्त मुझे इंडस्ट्री के किसी भी इंसान का सपोर्ट नहीं मिला. मगर मुझे मेरे माता पिता का सपोर्ट मिला. मेरे माता पिता बहुत ही बेहतरीन इंसान हैं. मेरा पूरा परिवार हमेशा मेरे साथ खड़ा नजर आता है. आप यह मानकर चलें कि लोगों का नजरिया आपके प्रति अलग होता है. लोग जो देखना चाहते हैं, कोई जरूरी नहीं कि आप वही कर रहे हों. मेरी एक ही सोच होती है कि मुझे खुशी मिले या किसी वजह से मैं उदास हो जाउं, तो उस वक्त अपने माता पिता से सबसे पहले बात करूं. मुझे अपनी खुशी या उदासी पर लोगों की प्रतिक्रिया मायने नही रखती.

सवाल- फिल्म‘‘वन डे जस्टिस’’करने की वजह क्या रही?

-इस फिल्म की कहानी ने मुझे इस फिल्म से जुड़ने के लिए प्रेरित किया.दूसरी बात मुझे अपने अभिनय के गुरू अनुपम खेर जी के ेसाथ अभिनय करने का अवसर मिला.हम सुनते रहते हंै कि जीवन पूरा एक चक्र लेता है.तो अपने गुरू अनुपम खेर के साथ फिल्म‘‘वन डे जस्टिस डिलिवर’मेंं अभिनय करके मेरा जीवन चक्र पूरा हुआ.

सवाल- फिल्म‘‘वन डे जस्टिस डिलिवर’’क्या है?

-इस फिल्म में न्याय प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार को रेखांकित किया गया है. इसमें इस बात पर रोशनी डाली है कि एक न एक दिन हर इंसान को अहसास होता है कि उसने भी गलती की है. मैने इसमें एक कड़क अपराध जांच अधिकारी लक्ष्मी राठी का किरदार निभाया है.

इस फिल्म में भी हमने दिखाया है कि किस तरह से अच्छाई या बुराई है.पर मेरा और अनुपम खेर जी का जो कि जज बने हैं, दोनों के किरदार गे्र हैं.

सवाल- आप निजी जिंदगी में वकील रही हैं.इस फिल्म की कहानी में वकील जिस तरह से सबूतों को जज के सामने पेश करता है, उसके चलते जज गुनहगारों को छोड़ देता है. इस पर आप क्या कहना चाहेंगी?

-देखिए, मैं लौयर हूं. तो वकीलों की बुराई नहीं करूंगी. मैंने सबसे पहले आपको बताया कि वकालत के पेशे से जुड़कर मैं समाज सेवा नहीं, अपने लिए पैसे कमा रही थी. वकील का काम होता है-‘‘गंगा गए गंगादास, जमुना गए, जमुनादास.’’ वकिल के तौर पर उसका काम होता है कि जो उसे पैसा दे रहा है, उसके फायदे के लिए काम करें. जिस इंसान ने अपने आपको बचाने के लिए आपको पैसा दिया है, वकील के तौर पर आपका काम है कि आप उसे बचाए.

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सवाल- आप देश की न्याय प्रकिया के संदर्भ में किस तरह के विचार रखती है?

-सर, हमारे यहां तमाम कानून बदलने की सख्त जरूरत है.जब सेक्शन 377 को लेकर बदलाव किया गया, तो मुझे बड़ी खुशी मिली. मैने कहा- ‘‘देर आए दुरूस्त आए.’’क्योंकि प्यार युनिवर्सल हैं. प्यार को लेकर आप किसी पर अंकुश नहीं लगा सकते. यह बहुत ही सही जजमेंट रहा.अब नाबालिग रेप को लेकर मृत्युदंड को जो कानून बना रहे हैं,वह भी सही है.इसी तरह से अभी भी बहुत कुछ बदलने की जरूरत है.नारी सुरक्षा को लेकर भी कुछ कडे़ कानून बनने चाहिए. पर वर्तमान सरकार धीरे धीरे काफी कानून बदल रही है, जो कि अच्छा है.

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