अभी एक वीडियो ट्विटर पर तैर रहा है. जिसमें कथित तौर पर तमिल सुपरस्टार अजीत के फैन्स रजनीकांत की फिल्म पेट्टा के पोस्टर्स जला रहे हैं. चूंकि रजनी और अजीत की फिल्म पेट्टा और विश्वासम एक ही दिन (पोंगल) रिलीज हुई हैं, इसलिये दोनों फिल्म स्टार्स के फैन्स आपस में भिड़े हुए हैं.

दक्षिण भारत में फिल्मी सितारों और नेताओं को लेकर फैन्स किस तक अंधभक्ति के शिकार हैं, इसके नमूने जबतब दिख जाते हैं. कोई कोई फैन क्लब वाला उनके मंदिर बनवा देता है तो कोई उन्हें शिवलिंग की तरह दूध से नहला देता है. रजनीकांत, कमल हसन से लेकर पवन कल्याण, चिरंजीवी तक ऐसे कई कलाकार हैं जिनके बाकायदा फैन्स क्लब कहते हैं और कई स्टार्स की तरफ से इन्हें फंडिंग भी मिलती हैं. लिहाजा ये क्लब वाले इस तरह के अंधभक्तों की फौज खड़ी कर देते हैं जो खुद को एक खास एक्टर या नेता का फैन्स बताकर लड़ने-मरने पर उतारू हो जाते हैं. कमल हसन ने रजनीकांत को कुछ कह दिया तो उनके फैन्स पहुंच जाते हैं कमल के घर तोड़फोड़ करने. कुछ साल पहले जब एक दक्षिण भारतीय एक्टर चंद्रशेखर ने राजनीति में उतरे अपने प्रतिद्वंद्वी एक्टर के खिलाफ कुछ बोल दिया तो उस एक्टर के फैन्स ने चंद्रशेखर पर भरी सभा में पत्थरों की बारिश कर दी. बेचारे चोटिल हो गए लेकिन फैन्स पर कौन सा केस दर्ज होता.

एक्टर नहीं मिला तो खुद को जला दिया

हालिया मामला तो और भी विचलित करने वाला है. कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार यश से मिलने की जिद में एक लड़के ने आत्मदाह कर लिया. हुआ यों कि यश को बर्थडे विश करने के लिए जब उनका एक फैन रवि शंकर अपने दोस्तों के साथ उनके घर पहुंचा. तब उसे वहां एंट्री करने से मना कर दिया गया. नाराजगी में रवि ने एक्टर के घर के सामने खुद को आग लगा ली. उसे यश के जन्मदिन पर उनसे मिलने की धुन थी. चूंकि कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री के इस एक्टर ने केजीएफ फिल्म के बाद से शाहरुख खान की फिल्म जीरो को बीट कर अपनी फैन फौलोइंग बढ़ा ली है, लिहाजा उनके घर के बाहर फैन्स की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. अब सबसे मिलना तो किसी भी एक्टर के लिए संभव नहीं है.

बहरहाल, किसी तरह उसे घायल अवस्था में अस्पताल ले गए लेकिन अगले दिन उसने दम तोड़ दिया. 26 साल के इस लड़के ने अपनी जान सिर्फ इस फिजूल से शौक के लिए दे दी. ताजुब इस बात का है कि इस बात से उसके मातापिता भी वाकिफ थे. उनके मुताबिक, रवि हर साल यश से मिलने जाता था. पिछले साल वह हमें भी उनके घर ले गया था. इस साल, हमने उसे जाने से मना किया था, लेकिन वह चला गया. पता नहीं रवि को पेट्रोल कहां से मिला.

हालांकि इस घटना के बाद यश, रवि से मिलने के लिए अस्पताल पहुंचे. लेकिन उन्होंने इस बात पर काफी गुस्सा भी जताया. उन्होंने कहा, मैं इस तरह के प्रशंसकों को नहीं चाहता हूं. यह फैंटेसी या प्यार नहीं है. इससे मुझे खुशी नहीं मिलती है. मैं इस तरह से किसी और को देखने नहीं आऊंगा. यह उन प्रशंसकों को गलत संदेश देगा जो सोचते हैं कि अगर वह ऐसा काम करेंगे तो मैं उनसे मिलने आउंगा.

दोषी कौन, भक्त या देवता ?

अब इसमें दोष भक्त का है देवता बन चुके एक्टर्स का, लेकिन फैन्स का इस तरह से फैनेटिक बनना चिंता का विषय है. पढ़ाई के प्रेशर से लेकर लड़की के दिल तोड़ने तक सुसाइड की कोशिशें वैसे ही युवाओं की जान ले रही हैं, उस पर फिल्मी सितारों की ये दीवानगी भी कम गंभीर मसला नहीं है.

कुछ कहेंगे कि इसमें एक्टर्स का क्या दोष. लेकिन कहीं न कहीं इस फैनबाजी को एक्टर ही बढ़ावा देते हैं. अपनी फिल्मों में मसीहा की इमेज बनाने से लेकर फैन्स क्लब को रजिस्टर्ड कराना हो या उनके उत्सवों में शिरकत करना, आदि बातें फैन्स को गुटों में बांध देती हैं. कुछ कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तरह. जो अपने नेता की तर्ज पर अभिनेताओं का झंडा (पोस्टर) लेकर चलते हैं. इनकी फिल्मों के रिलीज के समय पूरा का पूरा थियेटर इन फैन्स क्लब की मुठ्ठी में होता है. चलती फिल्म को बीच में ही रोककर ढोल-नगाड़ों का जश्न जैसा पागलपन भी यहीं दीखता है. टिकटों की कालाबाजारी भी होती है और असुरक्षा का माहौल अलग बनता है. अभी नार्थ इंडिया यानी हिन्दी बेल्ट में यह संक्रमण ज्यादा नहीं फैला है लेकिन कुछ कुछ लक्षण जरूर दिखने लगे हैं. मसलन सलमान खान और अक्षय कुमार के पोस्टर्स पर रिलीज एक समय मालाबाजी होने लगी हैं. जान देने या लेने जैसी बात सोशल मीडिया एकाउंट पर दिख जाती है. जहां फैन्स आपस में भिड़ जाते हैं और एक्टर्स को गरियाने लगते हैं.

लार्जर दैन लाइफ किरदार और सियासत

दरअसल रीजनल सिनेमा ने कभी भी देसी मुद्दों को नहीं छोड़ा. वहां के हीरो अभी भी लुंगी डांस करते हैं और रंगस्थलम, काला, पेट्टा, शिवाजी, नायकन, मारी, सरकार जैसी जैसी फिल्में वहीं के गाँव, किसान और क्षेत्रीय राजनीति की बात करती हैं. लिहाजा ऐसी फिल्मों के नायक जननायक- थलाइवा बन जाते हैं. एम जी रामाचंद्रन, जानकी रामाचंद्रन, सी एन अन्नादुराई, एनटी रामाराव, एम के करुणानिधि, जयललिता, चंद्रशेखर, चिरंजीवी, बालकृष्ण, हरिकृष्ण, पवन कल्याण, राम्या, जय प्रदा, विजय कांत आदि नाम फिल्मी पृष्ठभूमि से थे. एनटीआर ने बतौर अभिनेता अपनी नायक छवि का इस्तेमाल तेलुगू गर्व के मुद्दे पर आधारित अपनी तेलुगू देशम पार्टी को स्थापित करने में बखूबी किया. बाद में सीएम बने. आंध्रप्रदेश के सीएम रहे वाय एस राजशेखर रेड्‌डी की बायोपिक, बालकृष्ण की कथानायुडू, नेता-अभिनेता चिरंजीवी का सई रा नरसिम्हा रेड्डी से फ्रीडम फाइटर उय्यलावाडा नरसिम्हा रेड्‌डी की लाइफ को पर्दे पर उतारना, तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता की बायोपिक ‘आयरन लेडी’ का बनाना उसी फैनबाजी के कंधे पर सवार होकर यहां तक पहुंचे हैं.

फिल्में कोरी कल्पनाओं पर आधारित होती हैं. लेकिन इनमें काम करने वाले अभिनेता सामाजिक सरोकार की आड़ में रियलिस्टिक सिनेमा को दरकिनार कर लार्जर दैन लाइफ किरदार रचते हैं, जो राजा भी होता है और रंक भी. बिलकुल देवता सरीखा बनकर जनता की आवाज़ उठाता है और अवाम उस किरदार को असल का समझने लगते है. कई बार अभिनेता इस पागलपन का फायदा उठाकर सियासत में उतर जाते हैं और सिनेमाघर के टिकटों को बैलेट बौक्स तक खींच ले आते हैं. लेकिन इस सब फैन्बाजी में उनका क्या जो भावावेश में आकर खुद को जीतेजी मार रहे हैं.

दरअसल के डीएनए में ही व्यक्ति पूजा और गुलामी के बीज हैं. हम किसी को थोड़ा सा पसंद कर लें उसे अवतार मान बैठते हैं. जाहिर है इसका फायदा सदियों से भारत में सत्ता में बैठे लोग उठा रहे हैं और शायद आगे भी उठाते रहेंगे.

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