डौ. पंकज गुप्ता

नारी सृष्टि की श्रेष्ठतम रचना है और मां इस सृष्टि का मधुरतम शब्द. नारी के समस्त रूपों में सर्वश्रेष्ठ स्थान मां का ही है. वाकई मां अनमोल है. मां ही बच्चों की पहली गुरु होती है, जिसके पास अपने बच्चों के लिए बिना किसी शर्त के ममत्व भरा प्यार होता है. सच में वे लोग बड़े ही भाग्यशाली होते हैं जिनके सिर पर मां के प्यार दुलार की छाया लहराती हैं.

वैसे तो अपनी मां से जुड़े बहुत सारे अविस्मरणीय क्षण ऐसे होते हैं जिनसे हमें हर पल कुछ सीख मिलती है. यहां मैं अपनी मां से जुड़ा एक यादगार पल जो लगभग 30-32 वर्ष पुराना है, साझा करना चाहूंगी जिसने मेरे जीवन को एक सकारात्मक दिशा प्रदान की.

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जब मैं बहुत छोटी थी तब एक बार मैं मां के साथ बाजार से घर आ रही थी. तभी देखा कि एक होटल के सामने एक बुजुर्ग व्यक्ति, जिसे देखकर ऐसा लग रहा था कि उसने काफी समय से खाना नहीं खाया, खाने के लिए गिड़गिड़ा रहा था और होटल वाला उसको दुत्कार कर दूर जाने को कह रहा था. तभी बिना एक पल गंवाये, उसकी सच्चाई को समझते हुए मां उसे अपने साथ घर तक ले आयीं और उसे भरपेट खाना खाने को दिया. तब उसकी आंखों में खुशी और संतुष्टि की जो चमक थी उसे मैं आश्चर्यचकित होकर देख रही थी और उस समय अपनी उम्र के हिसाब से थोड़ा बहुत कुछ समझ भी पा रही थी. मगर आज ये मेरे जीवन का सबसे अनमोल पाठ बन गया.

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एक बेटी अपनी सूझबूझ और होशियारी से दो घरों को संपन्न बनाती है, किसी के प्रति मन में दुर्भावना को न पनपने दो, कठिन समय में घबराओ मत, ईश्वर ने हमें हिम्मत, साहस और मस्तिष्क का जो शानदार संगम दिया है, उसका उचित समय पर उपयोग कर सफल जीवन जियो, इत्यादि ऐसी न जाने कितनी सलाहें मुझे हमेशा सकारात्मक सोच रखने की ताकत देता है.

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अब, जबकि आज मेरी मां हमारे बीच नहीं हैं तो बस एक यही एहसास कि मां कहीं दूर होकर भी हमारी खुशियों की कामना कर रही है, मुझे जीने का हौसला देता है.

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