स्वाति अहलूवालिया, (लखनऊ)

एक मां ने पैदा किया, चलना सिखाया, जीवन के लक्ष्य को निर्धारित किया तो दूसरी ने दिखाया उन्हें प्राप्त करने का हौसला. ज़िंदगी की चुनौतियों पे खरे उतरना..मां के घर से आकर एक नए घर में प्रवेश किया तो स्नेह, प्यार और सामंजस्य से स्वागत किय. मां है तो घर है मां कि बिना सब अधूरा.

घर में घुसते ही मां को सामने ना देख कर जो पहला वाक्य मुंह से निकलता है मम्मी कहां है.  चोट मुझे लगती थी पर दर्द मम्मी को. सुबह की चाय से ले कर रात के खाने तक मम्मी सब तैयारी करती थी. काम पर भी जाना हो तो भी सारे इंतेज़ाम कर के जाती थीं. दूसरी तरफ मेरी सासू मां, जिन्हें मम्मा कह कर पुकारती हूं.. एक दम मेरी मम्मी की ज़ीरौक्स कौपी हैं. वहीं प्यार और स्नेह. आलम तो यह है की लोग मुझे उन्हीं की बेटी समझते हैं. धन्य है ईश्वर का जो उन्होंने मुझे एक नही 2-2 मां दी.

हर रिश्ते में मिलावट देखी कच्चे रंगों की सजावट देखी, लेकिन सालो साल देखा है मां को,  उसके चेहरे पर न थकावट देखी, ना ममता में मिलावट देखी…

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डौ. रंजना वर्मा  ‘रैन’, (गोरखपुर) 

मां, एक ऐसा शब्द जिसने हर सुख, हर दुख,  हर परेशानी को खुद में समेट रखा है. मां के साथ मेरा रिश्ता धूप में परछाईं के जैसा है. मेरे लिए मेरी मां खुशियों का खजाना है. उन्होंनें अशिक्षित होने के कारण शिक्षा के महत्त्व को समझा और एक शिक्षक बनकर देश समाज को शिक्षित करने की महत्वपूर्ण भूमिका को निभाने  के लिए मुझे प्रेरित किया.

मैं ये मानती हूं  कि एक कुशल व्यक्तित्व के निर्माण में मां की भूमिका सबसे  अहम है. मां अगर चाहे तो बच्चे  के व्यक्तित्व को सुन्दर गढ़ सकती है. जीवन जीने की प्रणाली हर मां अपने बच्चों को सिखाती है, बच्चे में संस्कार रोपती है. मेरी मां, मेरे लिए एक सम्बल है आज भी हर कठिन दौर से गुजरने का जज्बा मुझे मां की सीखों से ही मिलता है. मैंने स्वयं एक मां बनकर ही यह जाना है कि उन्होंने मेरे लिए क्या-क्या किया है.

मैं आज मां सच में मुझे दवाई सी लगती है वो कभी एलोपैथिक की कड़वी गोलियों सी पेश आती हैं और कभी होम्योपैथिक गोलियों सी मीठी बनकर हमारी हर बीमारी को जड़ से दूर करती है. मां तुझे सलाम, तुझे दिल की गहराइयों से प्यार.उनकी बदौलत एक बेहतरीन ज़िन्दगी जी रही हूं और अपने बच्चों  में उनके दिए संस्कारों को रोपित कर रही हूं.

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