Alzheimer : 45 वर्षीय दीपक को पिछले कुछ सालों से भूलने की बीमारी है. उन्होंने इस का पहले तो जनरल फिजिशियन से इलाज करवाया, लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ. उन्हें किसी भी बात को याद रखना मुश्किल हो रहा था, ऐसे में उन के किसी दोस्त ने उन्हें न्यूरोलौजिकल सलाह लेने की सलाह दी. दीपक डाक्टर के पास गए, तो पता चला उन्हें अल्जाइमर की बीमारी है, जो सालों पहले उन के बाइक ऐक्सीडैंट के दौरान सिर पर चोट लगने की वजह से हुआ है.
पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ, लेकिन दवा के प्रयोग से उन की यह बीमारी काफी कम हुई है, जो समय के साथसाथ बढ़ रही थी. दीपक को अल्जाइमर सिर पर चोट लगने की वजह से सालों बाद हुई है, लेकिन एक उम्र के बाद वयस्कों में अल्जाइमर की बीमारी देखने को मिल रही है, जिस का आंकड़ा धीरेधीरे बढ़ता ही जा रहा है.
क्या कहती है रिसर्च
अल्जाइमर एसोसिएशन के अनुसार, वर्ष 2020 से दुनिया में 50 मिलियन से ज्यादा लोग डिमेंशिया से पीड़ित हैं. यह संख्या हर 20 साल में लगभग दोगुनी हो जा रही है. साल 2030 में यह 82 मिलियन और वर्ष 2050 में 152 मिलियन तक पहुंच जाएगी. ज्यादातर वृद्धि विकासशील देशों में होगी. डिमेंशिया से पीड़ित 60% लोग पहले से ही निम्न और मध्य आय वाले देशों में रहते हैं, लेकिन साल 2050 तक यह बढ़ कर 71% हो जाएगा. ये आंकड़े वर्तमान में उपलब्ध सर्वोत्तम साक्ष्यों पर आधारित और अनुमानित हैं.
इस बारे में मुंबई की कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हौस्पिटल की स्पैशलिस्ट कौग्निटिव और बिहेवियरल न्यूरोलौजिस्ट डा. अणु अग्रवाल कहती हैं कि अल्जाइमर की बीमारी धीरेधीरे बढ़ने वाला न्यूरोलौजिकल डिसऔर्डर है. दुनियाभर में यह डिमेंशिया का सब से आम कारण है.
लक्षण
डिमेंशिया के 60% से ज्यादा केसेज की वजह है :
यादाश्त खत्म हो जाना.
संज्ञानात्मक क्षमता कम होना.बरताव में बदलाव वगैरह.
इस के अलावा इस में व्यक्ति की काम करने की क्षमता धीरेधीरे नष्ट होती जाती है. इसका प्रभाव उन की जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ता है, जिस का भावनात्मक और लौजिस्टिकल बोझ परिवारों को भुगतना पड़ता है.
वजह जानें
असल में इस बीमारी में दिमाग (Brain) में असामान्य प्रोटीन पैदा होता है, जिस से धीरेधीरे दिमाग की कोशिकाओं की मृत्यु और सिकुड़न होने लगती है.
अल्जाइमर के पीछे के कारणों, जीवनशैली पर संभावित प्रभावों, उम्र बढ़ने के साथसाथ होने वाले प्रभाव आदि के बारे में सभी को जानना जरूरी होता है, क्योंकि न्यूक्लिअर परिवारों में अल्जाइमर का बढ़ना, बुजुर्गों को प्रभावित कर रहा है, क्योंकि आज के यूथ काम के साथ ऐसे रोगी को संभालने में असमर्थ हो रहे हैं. कई लोग तो ऐसे बीमार व्यक्ति को ओल्ड होम में रख देते हैं, जिस से अकेलापन अधिक होता है और शायद अल्जाइमर रोगी के अधिक होने का कारण भी यही बन रहा है.
एक अध्ययन में पाया गया कि 60 से 79 साल के लोगों में अकेलेपन की वजह से अल्जाइमर रोग का खतरा 3 गुना ज्यादा बढ़ा है.
अल्जाइमर और डिमेंशिया में अंतर
अल्जाइमर और डिमेंशिया में मुख्य अंतर यह है कि अल्जाइमर एक बीमारी है, जबकि डिमेंशिया लक्षणों का एक समूह है. अल्जाइमर मस्तिष्क में होने वाली एक बीमारी है. यह मस्तिष्क के उन हिस्सों को प्रभावित करती है, जो स्मृति, विचार और भाषा को नियंत्रित करते हैं, जबकि डिमेंशिया लक्षणों का एक समूह है, जिस में स्मरण करने की शक्ति का कम हो जाना, भाषा और समझदारी में कमी और किसी काम के बारे में सोचने में कमी होती है.
रिस्क फैक्टर
इस के आगे डाक्टर कहते हैं कि अल्जाइमर की मूल वजह अभी भी पूरी तरह से समझ पाना संभव नहीं हो पाया है. अध्ययनों से पता चला है कि आनुवंशिक, जीवनशैली और पर्यावरणीय कारण हैं, जो इस बीमारी के बढ़ने के जिम्मेदार हैं. रिस्क फैक्टर्स में उम्र बढ़ना, आनुवंशिकी और सिर में चोट लगना आदि शामिल हैं. साथ ही आहार, व्यायाम और सामाजिक जुड़ाव जैसे जीवनशैली से जुड़े विकल्प भी शामिल होते हैं.
लाइफस्टाइल है जिम्मेदार
वैज्ञानिक इस बीमारी की एक महत्त्वपूर्ण वजह के रूप में जीवनशैली पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और मानसिक खुशहाली के साथसाथ स्वस्थ जीवनशैली अल्जाइमर की जोखिम को कम करती है.
अध्ययनों से पता चलता है कि शारीरिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों में अल्जाइमर विकसित होने की संभावना काफी कम होती है. चलना, तैरना और यहां तक कि घर के कामों जैसी गतिविधियां दिमाग में रक्त के प्रवाह को उत्तेजित करती हैं, जिस से संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट में देरी हो सकती है.
इस के अलावा मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बनाए रखने में सही पोषण भी का होना महत्त्वपूर्ण है. फलों, सब्जियों, अनाज और अनसैच्युरेटेड फैट से भरपूर आहार अल्जाइमर के रिस्क को कम कर सकते हैं, जबकि लाल मांस, मिठाई और प्रोसेस्ड फूड से बचना चाहिए ताकि मोटापा और मधुमेह जैसे जोखिम कारकों से बचा जा सकें.
केवल अधिक उम्र का होना अल्जाइमर का कारण नहीं है. उम्र के साथसाथ होने वाले शारीरिक नुकसान, इस न्यूरोडीजैनेरेटिव विकार को बढ़ाता है. ऐसा देखा गया है कि विकसित देशों में आबादी औसतन लंबे समय तक जीवित रहती है, जबकि यहां डिमेंशिया सब से आम है.
भारत और चीन जैसे तेजी से शहरीकरण वाले देशों में भी इस बीमारी की दरें पहले से अधिक बढ़ रही हैं. इन देशों में भी लंबी जीवनअवधि और जीवनशैली में बदलाव अधिक लोगों को रिस्क में डालते हैं.
न्यूक्लियर परिवारों और सामाजिक अलगाव का प्रभाव
डा. अणु आगे कहती हैं कि जौइंट परिवारों से न्यूक्लियर परिवार यह बदलाव अल्जाइमर से पीड़ित बुजुर्गों को प्रभावित कर रहा है. पारंपरिक परिवारों में वयस्क लोग रोज की जिंदगी में सामाजिक ऐक्टिविटीज और समुदायों में अधिक शामिल होते रहे हैं, जिस से उन के दिमाग को सक्रिय रखने में मदद मिलती थी, लेकिन सिंगल परिवारों में वे खुद को अधिक अलगथलग महसूस करते हैं, जिस से उन की याददाश्त कम हो सकती है और संज्ञानात्मक में गिरावट हो सकती है.
यह बदलाव, खासकर शहरों में तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि यहां सामाजिक जुड़ाव के अवसरों की कमी है.
अकेले रह कर भी न हो अकेलापन
डाक्टर अनु कहती हैं कि वयस्कों में अकेलापन, चिंता और मानसिक गतिविधियों में कमी को बढ़ा सकता है, जिस से उन में अल्जाइमर की रिस्क बढ़ सकती है. आज वीडियो कौल जैसी तकनीकी सुविधा है, जो अकेलेपन को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन यह हमेशा पर्याप्त नहीं होती. सामुदायिक कार्यक्रम जैसे अपने हौबीज, स्थानीय क्लब, क्लासेज आदि हर जगह उपलब्ध होते हैं, जो शारीरिक और मानसिक रूप से सक्रिय रखने के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं.
रोकथाम और मैनेजमेंट
हालांकि वर्तमान में अल्जाइमर का कोई इलाज नहीं है, लेकिन जीवनशैली में कुछ बदलाव इस की शुरुआत को रोकने या देरी करने में मदद कर सकते हैं.
नियमित शारीरिक गतिविधियां, दिमाग को ऐक्टिव रखने वाले व्यायाम और पोषक तत्त्वों से भरपूर आहार फायदेमंद होते हैं. इस के अलावा नियमित स्वास्थ्य जांच और उच्च रक्तचाप, मधुमेह जैसी स्थितियों का जल्द से जल्द निदान भी जरूरी है. शारीरिक के साथसाथ सब से मानसिक जुड़ाव भी बहुत जरूरी है, मसलन किताबें या मैग्जीन पढ़ना, कोई वाद्य बजाना, पहेलियां सुलझाना और सामाजिक संपर्क बनाए रखना आदि जैसी गतिविधियां मानसिक लचीलापन बनाए रखने में मदद करती हैं.
रिसर्च मानती है कि सुनने और देखने की अक्षमता डिमेंशिया से जुड़ी हुई है. इस से बचने के लिए कान की मशीन और करैक्टिव लेंस जैसी आधुनिक उपकरणों की सहायता से इन समस्याओं को मैनेज करना असान हो जाता है. जिन लोगों का निदान किया गया है, उन के लिए जल्द से जल्द 24 घंटे विशेषज्ञों की सुविधा दी जाती हो. ऐसे अस्पताल मे इलाज और सहायक देखभाल, समझ और परिवार की भागीदारी के साथ मिल कर जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है. अल्जाइमर से निबटना एक बढ़ती हुई चुनौती है, लेकिन इसे ठोस प्रयासों और वयस्कों की देखभाल के तरीके में बदलाव के जरीए दूर किया जा सकता है. जैसेजैसे जागरूकता और शोध बढ़ते जा रहे हैं, वैसेवैसे इस बीमारी की बेहतर उपचार और रोकथाम या इलाज से हमारी उम्मीद भी बढ़ती जा रही है.
यही वजह है कि अमेरिका में रहने वाले वरिष्ठ नागरिक 60 की उम्र पार करने के बाद भी किसी न किसी काम में व्यस्त रहते हैं, वहां वरिष्ठ नागरिक की कोई समय सीमा नहीं होती. इस की वजह वहां की लाइफस्टाइल है, जहां हर व्यक्ति काम करना पसंद करता है, हर व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है जबकि
हमारे देश में लोग 60 की उम्र पार करने के बाद पूजापाठ, धर्मकर्म में लीन हो जाते हैं या परिवार वाले उन की इच्छा को जाने बिना ही ऐसे काम करने की सलाह देते रहते हैं, जिस से व्यक्ति का मानसिक और शारीरिक दोनों का स्तर धीरेधीरे कम होता जाता है.
अगर आप को अल्जाइमर से बचना है, तो अपने शारीरिक और मानसिक प्रोसेस को ऐक्टिव रखें और खुद भी नए जैनरेशन के साथ ताल से ताल मिला कर रहना सीखें.