नवजात शिशु परिवार के सभी सदस्यों के लिए खुशियां और आशा की नई किरण ले कर आता है. परिवार के सभी सदस्य उस के पालनपोषण का दायित्व खुशीखुशी लेते हैं और डाक्टर मां को सही राय देते हैं ताकि उस का शिशु स्वस्थ रहे.

गरमियों की तपिश के बाद जब सर्दी शुरू होती है तो लोग राहत महसूस करते हैं. पर सर्दी भी अपने साथ लाती है खुश्क हवाएं, खांसी और जुकाम जैसी कुछ तकलीफें, जिन से नवजात शिशु को खासतौर से बचाना चाहिए और उस की देखभाल में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए.

त्वचा की देखभाल

सर्दी के मौसम में हवा की नमी चली जाती है, जिस से शिशु की त्वचा शुष्क हो जाती है. ऐसे में बच्चे की मालिश जैतून के तेल से करने से बहुत लाभ होता है. उस से मालिश करने से खून का संचार सही रहता है और उस का इम्यूनिटी पावर यानी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. मालिश करते समय बच्चे को गरम और आरामदेह जगह पर लिटाना चाहिए. मालिश के कुछ देर बाद नहलाना चाहिए. बच्चे की त्वचा अत्यधिक नरम होती है, इसलिए साबुन ग्लिसरीन युक्त होना चाहिए और पानी कुनकुना होना चाहिए. जिस दिन ज्यादा सर्दी हो, उस दिन स्नान के बजाय साफ तौलिए को पानी में भिगो कर व निचोड़ कर उस से बच्चे का बदन पोंछ सकते हैं.

होंठों की देखभाल

सर्दी में शिशु के होंठ उस के थूक निकालने से गीले हो जाते हैं. उन की ऊपरी परत हट जाती है और उन पर सूखापन आ जाता है. उस के लिए पैट्रोलियम जैली या लिपबाम का उपयोग करना चािहए.

आंखों की देखभाल

सर्दी में कभीकभी शिशु की आंखों के कोने से सफेद या हलके पीले रंग का बहाव हो सकता है. इसे न तो हाथ से रगड़ें और न ही खींच कर निकालने की कोशिश करें. कुनकुने पानी में रुई डाल कर उसे हाथों से दबाएं फिर उस से आंखों को अंदर से बाहर की तरफ साफ करें. अगर शिशु की आंखें लाल हों या उन से पानी निकल रहा हो तो तुरंत आंखों के विशेषज्ञ को दिखलाना चाहिए.

शिशु के कपड़े

सर्दियों में शिशु के कपड़े गरम, नरम और आरामदेह होने चाहिए, जिन में कोई जिप या टैग न लगा हो.

बच्चे के हाथपैर गरम रखने के लिए उसे दस्ताने और मोजे पहनाने चाहिए और उस का सिर टोपी से ढकना चाहिए.

बच्चे के कपड़े धोने का डिटर्जैंट माइल्ड होना चाहिए.

बच्चे को कई बार ऊनी कपड़ों से ऐलर्जी हो जाती है जिस से उस के शरीर पर रैशेज हो जाते हैं. इसलिए कपड़े तापमान के हिसाब से ही पहनाने चाहिए. बच्चे को सीधा ऊनी कपड़ा पहनाने के बजाय पहले एक सूती कपड़े पहनानी चाहिए.

बच्चे को जूते पहनाने की आवश्यकता नहीं होती.

शिशु को सुलाते वक्त जब कंबल डालें तो ध्यान रखें कि कंबल से मुंह न ढक जाए, जिस से बच्चे को सांस लेने में दिक्कत हो.

शिशु के कपड़े अच्छी क्वालिटी के होने चाहिए और ज्यादा तंग नहीं होने चाहिए.

जरूरी कपड़े

6-8 मुलायम सूती की बनियान.

6-8 गरम इनर या गरम कपड़े.

6-8 पूरी बाजू के सूती या होजरी के टौप.

6-8 पाजामी.

7-8 बौडी सूट.

4 गरम पाजामा.

4-6 ऊनी जुराब.

2-4 ऊनी टोपी.

2 सूती टोपी.

4-6 स्वैटर, 4 जैकेट.

7-8 मोटी सूती जुराब.

4 दस्ताने.

6 तौलिए, 6 बिब.

3-4 नहाने के लिए इस्तेमाल होने वाले तौलिए.

डायपर रैशेज से बचाव

सर्दी में डायपर और सूती नैपीज की ज्यादा जरूरत होती है, क्योंकि शिशु सर्दी में जल्दी गीला करता है और सूखने में ज्यादा समय लगता है. कुछ खास बातें ऐसी हैं जिन का खयाल रखना आवश्यक है, जिस से डायपर रैशेज से बचाव हो पाए:

इस बात का खयाल रखना चाहिए कि डायपर समय पर बदला जाए.

डायपर ज्यादा टाइट नहीं होना चाहिए. उसे सही नाप का चुनना चाहिए.

डायपर बदलने से पहले और बाद में अपने हाथ अच्छी तरह धो लेना चाहिए.

डायपर बदलते वक्त ध्यान रखें कि शिशु की त्वचा सूखी और साफ हो.

गुप्तांगों को रगड़ें नहीं कोमलता से साफ करें.

नैपी रैश क्रीम का इस्तेमाल करें.

घर का वातावरण

आप को घर और बच्चे के कमरे को गरम रखना चाहिए, जिस के लिए कमरे की खिड़कीदरवाजे बंद रखने चाहिए. दीवारों पर गीलापन नहीं होना चाहिए. क्योंकि इस से फफूंदी लग सकती है, जिस से बच्चे को ऐलर्जी या सर्दी व खांसी हो सकती है.

यदि घर का कोई व्यक्ति धूम्रपान करता है तो उसे घर से बाहर जा कर करना चाहिए. कमरे और बाथरूम के फर्श को अच्छे डिटर्जैंट से धोना चािहए.

सर्दी में मच्छर वैसे कम होते हैं लेकिन अगर कीड़े या मच्छर हैं तो पेस्ट कंट्रोल करवाना चाहिए और बच्चे को उस दिन उस कमरे में नहीं ले जाना चाहिए. इस बात का खास खयाल रखना चाहिए कि घर के आसपास पानी इकट्ठा न हो और घर की नियमित रूप से सफाई हो. आजकल बाजार में स्टिकर के रूप में भी मौसक्यूटो उपलब्ध हैं, जो बच्चे की चारपाई या गाड़ी में भी लगाए जा सकते हैं.

मां के लिए कुछ निर्देश

अपने शिशु का टीकाकरण समयसमय पर नियमित रूप से करवाएं ताकि वह वायरस और बैक्टीरिया से दूर रहें.

बारबार अपने हाथ धोएं ताकि बच्चे को फ्लू और सर्दीखांसी के कीटाणुओं से दूर रख सकें.

अपने बच्चे के हाथ भी धोएं, क्योंकि बच्चा मुंह में हाथ डालता है.

शिशु के लिए मां का दूध सर्वोत्तम है, क्योंकि इस से उस का इम्यूनिटी पावर बढ़ता है और शरीर में पानी की कमी नहीं होती.

सर्दियों में बच्चे को ज्यादातर बीमारियां उस के करीब किसी बीमार व्यक्ति के खांसनेछींकने और उस के संपर्क में आने से होती हैं, इसलिए बच्चे को रोगी व्यक्ति से दूर रखें.

शिशु को डियोड्रैंट, परफ्यूम्स और धुएं से दूर रखें, क्योंकि इन से सांस की बीमारी हो सकती है.

सर्दियों में होने वाली बीमारियां

सर्दियों में शिशु को ये बीमारियां हो सकती हैं:

सामान्य जुकाम.

बुखार (वायरल फीवर).

फ्लू.

निमोनिया.

ब्रौंकाइटिस.

कान का संक्रमण.

मेनिनजाइटिस (मस्तिष्क ज्वर).

रोटावायरस.

कब ले जाएं डाक्टर के पास

बुखार आने पर.

खांसी आने पर.

अगर शिशु दूध कम पी रहा हो. दूध कम पीने से शिशु के शरीर में पानी की कमी हो जाती है.

अगर शिशु अत्यधिक सुस्त है तो.

प्राथमिक उपचार

आप के पास शिशु के लिए कुछ जरूरी दवाएं होनी चाहिए ताकि कभी भी रात में अगर जरूरत पड़े तो आप उन को उपयोग कर सकें. जैसे क्रोसिन सिरप, विक्स वेपोरब, सेवलौन, नोजीवियान ड्रौप्स और थर्मामीटर.

जब शिशु बीमार पड़े तो उस को कंफर्टेबल रखना और गोद में ले कर प्यार करना बहुत जरूरी है. नाक बंद होने पर नोजीवियान ड्रौप डालने से नाक खुल जाएगी. बच्चे को जितना आराम मिलेगा, वह बेहतर महसूस करेगा. उसे सर्दी के मौसम की ज्यादातर बीमारियां 1 हफ्ते में ठीक हो जाती हैं और उन से आप के शिशु की इम्यूनिटी बढ़ती है. इसलिए घबराएं नहीं.

-डा. शिवानी सचदेव गौड़

(निदेशक, एससीआई हैल्थकेयर, आईवीएफ व स्त्री रोग विशेषज्ञा)

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