दूसरे बच्चे का आगमन जहां अपने साथ ढेरों खुशियां लाता है वहीं कुछ जिम्मेदारियां भी साथ लाता है. पहले बच्चे को इस बात के लिए तैयार करना पड़ता है कि घर में नन्हे मेहमान के आने से उस की जिंदगी में क्या बदलाव होगा. माना कि छोटे भाई या बहन के आने से पहला बच्चा खुद को अकेला नहीं महसूस करेगा, लेकिन उस के साथ ही उसे अपना प्यार भी बांटना पड़ेगा, अपना समय बांटना पड़ेगा, उसे ज्यादा अटैंशन मिलेगी. इन्हीं सब बातों के लिए पहले बच्चे को तैयार करना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम होता है.

पेश हैं, कुछ अहम सुझाव जो आप को यह जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभाने में मददगार होंगे.

तैयारी की शुरुआत

कई बार छोटे बच्चे मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार नहीं होते कि अब तक पेरैंट्स का जो जरूरी अटैंशन उन्हें मिलता था उसे कोई और बांट ले. ऐसे में उसे इमोशनली डील करना पड़ता है, क्योंकि अगर उसे मानसिक रूप से तैयार नहीं किया गया तो उस के कोमल मन पर इस का गलत असर हो सकता है. उस का आना उसे अच्छा न लगे या हो सकता है स्थाई रूप से उस के मन में अपने पेरैंट्स और छोटे भाई या बहन के प्रति नाराजगी पनपने लगे. इसलिए जैसे ही आप को दूसरे बच्चे की आने की खुशखबरी मिले वैसे ही पहले बच्चे का रिश्ता उस से बनाने की शुरुआत कर दें ताकि उस के साथ उस का जुड़ाव हो, वह उस के आने से पहले उस से इमोशनली अटैच हो जाए और उस का स्वागत करे.

पहले बच्चे को दें ज्यादा अटैंशन

माना कि दूसरा यानी आने वाला बच्चा छोटा होगा और उसे ज्यादा देखभाल की जरूरत होगी, लेकिन दूसरे बच्चे के साथ पहले बच्चे की बौडिंग बने, इस के लिए पहले बच्चे को ज्यादा अटैंशन देनी होगी. एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंसेज, फरीदाबाद की गाइनोकोलौजिस्ट डा. पूजा कुशल के अनुसार, ‘‘भले ही पहले व दूसरे बच्चे के बीच आयु का अंतर अधिक नहीं होता, फिर भी पहला बच्चा समझदार होता है. वह सभी बातों को इमोशनली फील करता है, इसलिए वह दूसरे बच्चे को अपना प्रतिद्वंद्वी न समझे और उस के साथ जुड़ सके, इस के लिए पहले बच्चे को ज्यादा अटैंशन दें. वैसे भी डिलिवरी के बाद व प्रैगनैंसी के दौरान पहला बच्चा हर बात को बहुत ध्यान से औब्जर्र्व करता है, इसलिए उसे हर समय अपने साथ रखें और दूसरे बच्चे की बात करते समय उसे पूरा अटैंशन दें.”

 ‘‘प्रैगनैंसी के दौरान जब दूसरे बच्चे के लिए शौपिंग करें तो पहले बच्चे से पूछें, उस की पसंद जानें और उस के अनुसार शौपिंग करें. इस से वह खुद को महत्त्वपूर्ण समझेगा ओर दूसरे बच्चे के प्रति उस के मन में ईर्ष्या का भाव नहीं पनपेगा, साथ ही आने वाले भाई या बहन के साथ जुड़ाव भी महसूस करेगा.’’

बच्चे के जन्म के बाद

छोटे बच्चे का डायपर बदलते समय, उसे नहलाते समय बड़े बच्चे की मदद लें. इस से वह हमेशा आप के व छोटे बच्चे के साथ रहेगा और अकेला महसूस नहीं करेगा, साथ ही उस में जिम्मेदार बड़ा भाई या बहन की भावना भी विकसित होगी.

आप चाहे कितनी ही व्यस्त क्यों न हों, बड़े बच्चे की ऐक्टिविटीज में पहले की तरह शामिल रहें.

अगर मां छोटे बच्चे की देखभाल में व्यस्त है तो पिता बड़े बच्चे की जिम्मेदारी ले. उसे पूरा अटैंशन दे. उस के साथ खेले, उसे बाहर घुमाने ले जाए.

छोटे बच्चे के आने के बाद बड़े बच्चे को उस से दूर न करें, बल्कि उसे अपने छोटे भाई या बहन को पास से देखने दें. अगर बड़ा बच्चा थोड़ा बड़ा है तो छोटे बच्चे को उस की गोद में दें. उस से कहें आप भी जब छोटे थे तो बिलकुल ऐसे ही थे. जब यह बड़ा हो जाएगा तो आप के साथ स्कूल जाएगा, आप के साथ खेलेगा. ऐसा करने से बड़े बच्चे के मन में अपने छोटे भाई या बहन के प्रति भावनात्मक रिश्ता पनपेगा.

कई बार जब घर के पहले बच्चे को दूसरे बच्चे के आने की खबर दी जाती है तो उसे समझ नहीं आता कि छोटे भाई या बहन की जरूरत क्या है और साथ ही उसे यह भी लगता है कि अब तक जो पूरे घर का अकेला लाडला या लाडली थी, सभी अपना पूरा ध्यान उसी पर देते थे, लेकिन दूसरे के आने से उस का प्यार बंट जाएगा. वह ऐसा न सोचे या उस के मन में ऐसे भाव न आएं, इस के लिए जरूरी है कि उसे समझाया जाए कि छोटा भाई या बहन होना जरूरी होता है, वह घर में आप का दोस्त, आप का साथी बनेगा.

आप के प्यार में कमी नहीं आएगी. आप उसे किताबों, वास्तविक उदाहरणों की सहायता से समझाएं कि देखो वे दोनों कैसे सभी काम एकसाथ करते हैं. आप का आने वाला छोटा भाई या बहन भी वैसा ही होगा और आप उस के साथ खूब मौजमस्ती करोगे. आप का अकेलापन दूर होगा.

इन तरीकों पर अमल करने से बड़े बच्चे के मन में आने वाले दूसरे बच्चे के प्रति प्रतिद्वंद्विता का भाव नहीं पनपेगा ओर वह उस का स्वागत तहेदिल से करेगा.

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