पूंजी निवेश का जोखिम किसी भी बैंकिंग स्कीम या अन्य व्यवस्था में उम्र, बाजार के उतारचढ़ाव और निवेश के स्वरूप पर निर्भर करता है. ऐसे में किन स्कीमों में निवेश करें जिस से अधिकतम रिटर्न मिले, बता रही हैं ममता सिंह.

निवेश में आप का झुकाव इक्विटी की ओर है तो एक बात तय है कि शेयर बाजार में उतारचढ़ाव से आप की नींद उड़ रही होगी. हालांकि निवेश के पोर्टफोलियो में इक्विटी का शामिल होना अहम है लेकिन इक्विटी की हिस्सेदारी निवेशक के जोखिम लेने की क्षमता, उम्र और निवेश के लक्ष्य के आधार पर तय होनी चाहिए. इस के साथ ही, आप के पोर्टफोलियो में फिक्स्ड इन्कम वाले इंस्ट्रूमैंट का शामिल होना भी बहुत जरूरी है.

फिलहाल डैट इंस्ट्रूमैंट में निवेश करना आप के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है क्योंकि बाजार में इस के कई सारे प्रोडक्ट उपलब्ध हैं. इन में निवेश से आप अच्छा रिटर्न कमा सकते हैं.

फिक्स्ड इन्कम इंस्ट्रूमैंट

इक्विटी में निवेश करने से निश्चित तौर पर अच्छा रिटर्न मिलता है. वहीं, जब बाजार में अनिश्चितता बरकरार हो तो निवेशक अपनी पूंजी को सुरक्षित रखना चाहते हैं. अगर आप की उम्र ज्यादा है और आप रिटायरमैंट की ओर बढ़ रहे हैं तो ज्यादा जोखिम लेना आप के लिए उपयुक्त नहीं है. इस स्थिति में फिक्स्ड इन्कम वाले इंस्ट्रूमैंट का चुनाव करना ठीक रहता है.

सर्टिफाइड फाइनैंशियल प्लानर अजय बजाज के मुताबिक, बाजार में फिक्स्ड इन्कम वाले कई निवेश विकल्प मौजूद हैं जिन में निवेश कर के एक ओर निवेशक जहां अच्छा रिटर्न कमा पाएंगे वहीं दूसरी ओर वे टैक्स की बचत भी कर सकते हैं.

फिक्स्ड डिपौजिट बेहतर विकल्प

भारतीय निवेशकों के लिए फिक्स्ड डिपौजिट हमेशा से ही निवेश के लिए बेहतरीन विकल्प रहा है. इन में सब से खास बात है कि आप को निश्चित दर पर रिटर्न मिलेगा और जोखिम बिलकुल नहीं है. हालांकि इस निवेश से मिलने वाले ब्याज पर निवेशकों को टैक्स चुकाना पड़ता है. ऐसे में जो लोग निचले टैक्स स्लैब में आते हैं उन के लिए यह निवेश का बेहतरीन विकल्प है, खासतौर पर वे लोग भी, जो रिटायरमैंट के नजदीक हैं, इस में निवेश कर सकते हैं.

बैंक की जिन एफडी का लौकइन पीरियड 5 साल का होता है उन पर आयकर अधिनियम की धारा 80सी के तहत टैक्स छूट का फायदा भी मिलता है. इस के बावजूद बैंक के फिक्स्ड डिपौजिट में निवेशकों को उतना रिटर्न नहीं मिलता जितना कौर्पोरेट एफडी में मिलता है.

कौर्पौरेट एफडी की बात करें तो इस की ब्याज दरें बैंक एफडी से 1 से 2 फीसदी ज्यादा हैं. इस के बावजूद निवेशकों को उन कौर्पोरेट एफडी में निवेश से बचना चाहिए जिन की रेटिंग अच्छी न हो, फिर चाहे उस पर आप को 15 फीसदी तक रिटर्न ही क्यों न दिया जा रहा हो. जिस एफडी की रेटिंग अच्छी है पर रिटर्न थोड़ा कम हो, उस में निवेश करने में भी समझदारी है.

कौर्पोरेट बौंड डिबैंचर्स

बड़ी कंपनियां अपने फंड की जरूरत को पूरा करने के लिए बौंड जारी करती हैं. आमतौर पर इन बौंड के रिटर्न पर निवेशक को टैक्स चुकाना पड़ता है हालांकि कई बार सरकार कुछ कंपनियों को छोटे निवेशकों के लिए टैक्स फ्री बौंड जारी करने की अनुमति भी देती हैं. बौंड द्वारा कमाए गए मुनाफे पर निवेशक की आय के स्लैब के हिसाब से टैक्स चुकाना पड़ता है.

निवेशकों को इस तरह के इंस्ट्रूमैंट में निवेश करने से पहले यह जान लेना चाहिए कि मैच्योरिटी पर पैसा वापस मिलेगा या नहीं. कहने का मतलब है कि बौंड जारी करने वाली कंपनी की रीपेमैंट क्षमता के बारे में जानकारी होनी बहुत जरूरी है. वरिष्ठ नागरिकों को काफी उच्च रेटिंग वाले बौंड में निवेश करना चाहिए.

डाइवर्सिफाइड म्यूचुअल फंड

डेट इंस्ट्रूमैंट के बीच फिक्स्ड इन्कम म्यूचुअल फंड सब से ज्यादा डाइवर्सिफाइड फंड है. इस में मौजूदा ब्याज दरों और शेयर बाजार के उतारचढ़ाव को देखते हुए आमतौर पर निवेशकों को फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान, शौर्ट टर्म डेट फंड और गिल्ट फंड में निवेश करने की सलाह दी जाती है.

निवेशकों के लिए ये सह योजनाएं बेहतर मानी जाती हैं क्योंकि इन में एफडी से ज्यादा ब्याज मिलता है और मैच्योरिटी पीरियड के लिए भी 3 महीने से 3 साल का विकल्प मौजूद होता है. फंड हाउस ने कुछ ऐसी स्कीमें भी लौंच की हैं जिन का मैच्योरिटी पीरियड 370 से 390 दिन के बीच है. इन में निवेश करने से टैक्स के साथ महंगाई को भी समायोजित करने का मौका मिलता है.

हाइब्रिड या स्ट्रक्चर्ड प्रोडक्ट

कई फंड हाउस और प्राइवेट बैंक ऐसे हाइब्रिड प्रोडक्ट औफर कर रहे हैं जिन में डेट इंस्ट्रूमैंट की ज्यादा हिस्सेदारी होती है और इक्विटी का हिस्सा कम होता है. इन में कर्ज पर आधारित हाइब्रिड ऐंड स्कीम शामिल होती हैं. कैपिटल प्रोटैक्शन फंड और मंथली इन्कम प्लान इसी श्रेणी में आते हैं.

जानकार मानते हैं कि इस तरह का निवेश करने में एक ओर जहां आप का निवेश डेट इंस्ट्रूमैंट के जरिए सुरक्षित रहता है वहीं दूसरी ओर इक्विटी में निवेश से आप का रिटर्न भी बढ़ता है. इस पर भले ही ज्यादा रिटर्न न मिलता हो पर इस से होने वाले टैक्स फायदे और कम जोखिम के चलते यह छोटे निवेशकों के लिए पसंदीदा विकल्प है. विशेषज्ञों की मानें तो निवेशकों को अपने कुछ निवेश का कम से कम 20 से 40 फीसदी हिस्सा फिक्स्ड इंस्ट्रूमैंट पर लगाना चाहिए.

बरतें सावधानी

बाजार में उतारचढ़ाव हो रहा हो तो अपनी सारी निवेश राशि फिक्स्ड इन्कम इंस्ट्रूमैंट में निवेश नहीं करनी चाहिए. बाजार में जोखिम ज्यादा दिखाई दे तो फिक्स्ड इन्कम इंस्ट्रूमैंट का अनुपात बढ़ा दें. इस दौरान इक्विटी में निवेश जारी रखें. इस से लंबी अवधि में आप को लाभ होगा. इस तरह के इंस्ट्रूमैंट में निवेश करने से पहले मार्केट रिसर्च करना न भूलें क्योंकि किसी इंस्ट्रूमैंट में मिलने वाला 8 से 9 फीसदी रिटर्न भले ही आप को शुरुआत में लुभावना लगे लेकिन हो सकता है टैक्स के बाद यह रिटर्न कम हो जाए. आप को फिक्स्ड इन्कम इंस्ट्रूमैंट की जानकारी न हो तो किसी विशेषज्ञ की मदद लें. बाजार में सुधार दिखने लगे तो फिक्स्ड इन्कम इंस्ट्रूमैंट और इक्विटी में निवेश के अनुपात को बदल लें क्योंकि फिक्स्ड इन्कम इंस्ट्रूमैंट जहां आप को पूंजी की सुरक्षा देते हैं वहीं लंबे समय तक इन पर निर्भर होना आप के रिटर्न को घटा सकता है.

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