3 साल पहले जब 30 वर्षीय शुभि गोयल ने अपने 40 दिन के बेटे को खो दिया, तो जैसे उस की दुनिया ही उजड़ गई. सांस की तकलीफ से बेटा इस दुनिया में आते ही चला गया. यह एक अपूर्णीय क्षति थी और उसे अब इस दुख के साथ जीना था. 1 हफ्ते बाद ही अपने बेटे के लिए खरीदे गए कपड़े और खिलौने ले कर वह एक बालाश्रम चली गई. वह पहली बार किसी अनाथालय गई और इस अनुभव ने उस का जीवन ही बदल दिया.  वहां शुभि ने बहुत कुछ देखा. 1-1 दिन के बच्चे की बात सुनी, जिन्हें कूड़े के ढेर से लाया गया था. क्रूरता के शिकार अनाथ बच्चे उस की तरफ देख कर मुसकरा रहे थे. वे बच्चे शुभि का दुख नहीं जानते थे पर कोई उन से मिलने आया है, यह देख कर ही वे खुश थे. उसी समय उस ने उन बच्चों के साथ और ज्यादा समय बिताने का फैसला कर लिया.

शुभि बताती हैं, ‘‘ये वे दिन थे जब मैं सोचा करती थी कि मेरे साथ ही यह क्यों हुआ. जब भी किसी मां को अपने छोटे बच्चे के साथ देखती थी, मुझे अधूरापन लगता था. मैं ने अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, जिन के बच्चे होते थे, उन से मिलना बंद कर दिया था. मुझे अपना बेटा याद आने लगता था. मैं कल्पना करती थी कि मेरा बेटा अब इतना बड़ा हो गया होता. मैं अपनेआप को बहुत असहाय महसूस करने लगी थी.’’  शुभि को यह भी पता चला कि जिन के बच्चे हो गए हैं, उन दोस्तों ने यह खबर शुभि से छिपाई है, तो उसे बहुत दुख हुआ.

शुभि आगे कहती हैं, ‘‘जब आप स्वयं  को ठगा सा समझते हैं, तो सहानुभूति भी चाकू की तरह लगती है पर अब मैं समझी हूं कि मेरी दोस्त मुझे तकलीफ से बचाने की कोशिश कर रही थीं.’’

साइकोथेरैपिस्ट और काउंसलर डाक्टर सोनल सेठ साफ करती हैं, ‘‘वे लोग जिन्होंने हाल ही में कोई दुख या नुकसान सहा है, वे दूसरों को अच्छा समय बिताते देख कर डिप्रैशन में आ सकते हैं. ऐसा उन के जीवन में आया खालीपन और दूसरों के जीवन की पूर्णता महसूस कर विरोधाभास के कारण होता है.’’

दुख से उबरने की सीमा

हर व्यक्ति के किसी दुख से उबरने की सीमा अलगअलग होती है, जैसे कि 40 वर्षीय तनु शर्मा, जो एक प्रतिष्ठित कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर हैं, आजकल मैटरनिटी ब्रेक पर हैं. जब तनु ने प्रेमविवाह किया तो उन्हें लगा, यह उन की परफैक्ट लवस्टोरी है.  बहुत लंबे समय तक झेली गई मानसिक यंत्रणा याद करते हुए तनु कहती हैं, ‘‘विवाह के थोड़े दिनों बाद ही मैं ने महसूस कर लिया कि  मेरे पति में बहुत गुस्सा है और उन का अपने गुस्से पर जरा भी कंट्रोल नहीं है. मैं बारबार  झूठे वादों पर यकीन करती रही. कई सैकंड  चांस देने के बाद भी उन के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया.  घरेलू हिंसा की कई घटनाओं के बाद  अंत में मैं वहां से भाग आई. मैं कुछ न कर  पाने की स्थिति में खुद पर ही नाराज थी, मैं  सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए मुसकराती  रहती थी. अपनी परेशानी किसी से कह भी  नहीं पा रही थी. मुझे सामान्य होने में बहुत  समय लगा.’’

डाक्टर सेठ कहती हैं, ‘‘एक दुखी  व्यक्ति दुख और हानि की 5 अवस्थाओं से गुजरता है, डिनायल, गुस्सा, बारगनिंग,  डिप्रैशन और स्वीकृति. मिलीजुली भावनाएं  रहना सामान्य है.’’

फौरगैट ऐंड स्माइल

चाहे किसी रिश्ते का अंत हो या किसी करीबी की मृत्यु, आगे बढ़ना आसान नहीं है.  तनु बताती हैं, ‘‘मैं जीवन में अपने मातापिता  की पौलिसी फौलो करती हूं, फौरगिव, फौरगैट और स्माइल. इस से आप को दर्द सहने में  और आगे बढ़ने में मदद मिलती है. अपने  दोस्तों से रोज बात करना बहुत महत्त्वपूर्ण है.  चाहे कुछ भी हो, अपने करीबी लोगों से जरूर बात करें.’’  तनु शर्मा की उन के दोस्तों ने बहुत मदद की. वे कहती हैं, ‘‘दोस्तों ने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा. अब उन्हें मेरी बेबीसिटिंग नहीं  करनी पड़ती, अब धीरेधीरे मैं ने खुश रहना  सीख लिया है.’’

डाक्टर सेठ सलाह देती हैं, ‘‘हर व्यक्ति  की जरूरतें अलगअलग होती हैं. यदि आप सोशल गैदरिंग में अनकंफर्टेबल हैं, तो यह  कहना उचित रहता है कि मुझे अभी अकेले  रहने की जरूरत है, सो प्लीज, ऐक्सक्यूज मी. फिर भी ध्यान रखें, अकेलेपन में आप  नकारात्मक विचारों से घिर सकते हैं. ऐसी  स्थिति में अपने दोस्त या किसी फैमिली मैंबर  के साथ या किसी काम में खुद को व्यस्त रखना सब से अच्छा रहता है.’’

अपराधबोध न पालें

डाक्टर सेठ बताती हैं कि उन की एक  30 वर्षीय क्लाइंट इस अपराधबोध में घिर गई  थी कि वह अपने पति की मृत्यु के बाद  पहला नया साल अपने दोस्तों के साथ बिता  कर मना रही थी. मैं ने उसे समझाया कि  फोकस इस दुख पर नहीं, बल्कि अपने पति  की यादों पर रखो. वे भी तुम्हें खुश ही  देखना चाहेंगे.  35 वर्षीय वैडिंग फोटोग्राफर कविता अग्रवाल को 2 दुखों का सामना करना पड़ रहा था. उस के छोटे भाई की ऐक्सीडैंट में डैथ हो  गई थी और उस का तलाक का केस भी चल रहा था. वे कहती हैं, ‘‘मेरे भाई के जाने के बाद मुझे लगा जैसे मैं ने अपने बच्चे को खो दिया है. जब मैं विवाह या किसी और खुशी के अवसर पर शूटिंग करती थी, भाईबहनों का प्यार देख कर मुझे हमेशा अपने भाई की याद आती थी. उस मुश्किल समय में मेरे परिवार ने हमेशा एकदूसरे को सहारा दिया.’’

शुभि गोयल अब सांताक्रूज में स्पैशल  बच्चों के लिए बने आश्रम में जाती हैं. वे कहती हैं, ‘‘जब भी मैं अपने बेटे को याद करती हूं या अधूरापन महसूस करती हूं, फौरन अपने सोचने की दिशा बदलने की कोशिश करती हूं. मेरे बच्चे के दुख ने मुझे उदार बना दिया है. अब मैं इन स्पैशल बच्चों पर अपना प्यार बांटती हूं और खुशी महसूस करती हूं.’’  जब परिवार या दोस्त किसी शोकाकुल व्यक्ति को किसी प्रोग्राम में आमंत्रित करना चाहें तो उन्हें अच्छी तरह सोच लेना चाहिए कि कैसे क्या करना है. डाक्टर सेठ सलाह देते हुए कहती हैं, ‘‘यदि किसी का दुख बिलकुल ताजा है और वह शोकसंतप्त है तो उसे किसी पार्टी में बुलाना बिलकुल उचित नहीं है.  यदि 2 या 3 महीने बीत गए हैं और  आप उस व्यक्ति की स्थिति का अंदाजा नहीं  लगा पा रहे हैं तो पहले उस से मिलें, सामान्य बातचीत करें. अंदाजा लगाएं कि वह अब  कैसा महसूस कर रहा है. फिर अगर आप  ठीक समझें, कोमलता से, स्नेह से स्पष्ट करें  कि आप जानते हैं कि यह उस के लिए मुश्किल समय है पर यदि वह ठीक महसूस करे तो आप उसे अपने प्रोग्राम में बुलाना चाहते हैं. जबरदस्ती न करें, दबाव न डालें. यदि वे तैयार नहीं हैं, तो उन की भावनाओं का सम्मान करें ओर अपना सहयोग दें.’’

समय अपनी गति से चलता रहता है. किसी प्रिय की मृत्यु या आर्थिक अथवा पारिवारिक कष्ट आते रहते हैं. आसान नहीं है पर आगे बढ़ना भी जरूरी होता है. याद रखें, काली से काली रात का भी सवेरा होता है. दूसरों के दुखों में अपना सहयोग दें, स्नेहपूर्वक उन का हौसला बढ़ाते रहें. ऐसे समय में परिवार और दोस्तों का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान होता है. कभी किसी के दुख में शामिल होने से पीछे न हटें.

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