4साल की लंबी कोर्टशिप के बाद जब नेहा और शेखर ने अचानक अपनी दोस्ती खत्म कर ली तो सभी को बहुत आश्चर्य हुआ. ‘‘हम सब तो उन की शादी के निमंत्रण की प्रतीक्षा में थे. आखिर ऐसा क्या घटा उन दोनों में जो बात बनतेबनते बिगड़ गई?’’ जब नेहा से पूछा तो वह बिफर पड़ी, ‘‘सब लड़के एक जैसे ही होते हैं. पिछले 2 साल से वह मुझे शादी के लिए टाल रहा है. कहता है, इसी तरह दोस्ती बनाए रखने में क्या हरज है? असल में वह जिम्मेदारियों से दूर भागने वाला, बस, मौजमस्ती करने वाला एक प्लेबौय किस्म का इनसान है. आखिर मुझे भी तो कोई सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा चाहिए.’’

दूसरी ओर शेखर का कुछ और ही नजरिया था, ‘‘मैं ने शुरू से ही नेहा से कह दिया था कि हम दोनों बस, इसी तरह एकदूसरे को प्यार करते हुए दोस्ती बनाए रखेंगे. मुझे शादी और परिवार जैसी संस्थाओं में विश्वास नहीं है. उस वक्त तो नेहा ने खुशी से सहमति दे दी थी, लेकिन मन ही मन वह शादी और बच्चों की प्लानिंग करती रही और जबतब मुझ पर शादी के लिए दबाव डालना शुरू किया तो मैं ने उस से संबंध तोड़ लिया.’’

पुरुषों के बारे में धारणा

आमतौर पर पुरुषों के बारे में स्त्रियों का यही नजरिया रहा है कि वे किसी एक के प्रति निष्ठावान हो कर समर्पित नहीं होते हैं. वे एक गैरजिम्मेदार, मौजमस्ती में यकीन करने वाले मदमस्त भौंरे होते हैं, किंतु अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि इस आरोप की जड़ें बहुत गहरी हैं. इस की मुख्य वजह है पुरुष और स्त्री की बुनियादी कल्पनाओं का परस्पर भिन्न होना. पुरुष की प्रथम कल्पना होती है अधिक से अधिक सुंदर स्त्रियों के साथ दोस्ती करना. दूसरी ओर अधिकांश स्त्रियों की कल्पना होती है किसी एक ऐसे पुरुष के साथ निष्ठापूर्वक संबंध बनाना, जो उन्हें आर्थिक और सामाजिक संरक्षण दे सके. विवाह के बाद जहां एक स्त्री की प्रथम कल्पना को और पोषण मिलता है वहीं पुरुष को अपनी कल्पना को साकार करने का अवसर जाता दिखता है. अत: एक पुरुष के लिए जहां समर्पण का अर्थ अपनी प्यारी कल्पना का त्याग करना है वहीं स्त्री के लिए समर्पण का अर्थ है अपनी बुनियादी कल्पना को साकार करना. शायद इसीलिए समर्पित होना या किसी बंधन में बंधना पुरुषों के लिए उतना आसान नहीं होता जितना स्त्रियों के लिए.

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कुछ तो मजबूरियां

एक औरत, जो स्वावलंबी हो उसे हम कैरियर विमन कहते हैं, लेकिन यदि पुरुष स्वावलंबी हो तो उसे हम प्लेबौय, जिम्मेदारियों से कतराने वाला कहते हैं. यह जो धारणा बनी है, उस के पीछे पुरुषों के विकास और उन के मनोविज्ञान को समझना बहुत जरूरी है. हमारे यहां लाखों रुपए ऐसे विज्ञापनों पर खर्च किए जाते हैं, जो एक किशोर बालक के अर्धविकसित मस्तिष्क में एक जवान खूबसूरत और विकसित औरत की चाहत भर देते हैं. नतीजतन 14-15 साल की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते वह सुंदरियों की कल्पनाओं का आदी हो जाता है और फिर उसे एक नशीली लत लग जाती है. ऐसे में वह अपनी कल्पना की परी से अपनेआप को बहुत हीन महसूस करने लगता है. फिर जद्दोजहद शुरू होती है अपनेआप को बेहतर बनाने की. स्कूल में वह देखता है कि जो विजेता है, हीरो है, लड़कियां उसी के आसपास होती हैं. अत: उन का सामीप्य पाने के लिए वह हर क्षेत्र में हीरो बनने के लिए हाथपैर मारता है. इस कोशिश में वह बहुत मानसिक दबाव में रहता है. एक उम्र तक पहुंचतेपहुंचते वह समझने लगता है कि उसे लड़कियों का दिल जीतने के लिए या तो आर्थिक रूप से सबल बनना है या किसी और क्षेत्र में ‘हीरो’ बनना है. धीरेधीरे वह यह भी समझने लगता है कि ‘प्यार’ शब्द काफी महंगा है. प्यार जहां एक ओर अस्वीकार होने के भय को कम करता है वहीं दूसरी ओर यह पुरुष की जेबों पर आजीवन भार बनने वाला भी होता है. अत: समर्पित होने से पहले उसे बहुत कुछ सोचना पड़ता है.

अस्वीकृत होने का भय

सेक्स के मामले में यदि पुरुष पहल करते भी हैं तो स्त्री द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने का भय भी उन्हें लगातार बना रहता है, क्योंकि अमूमन जब कोई पुरुष किसी महिला के प्रति आकर्षित होता है तो उसे (स्त्री को) समझने में देर नहीं लगती कि यह लड़का उस में रुचि रखता है, किंतु पुरुष के लिए अकसर यह समझना कठिन होता है कि उसे स्वीकार किया जाएगा या नहीं. वह इसी दुविधा में रहता है कि हो सकता है उस की महिला मित्र ने उसे इसलिए इनकार न किया हो, क्योंकि वह ‘न’ नहीं कह पाई हो या उसे सिर्फ उस से सहानुभूति हो.

स्त्री चरित्र

हमारे यहां ज्यादातर स्त्रियां दोस्ती तो कर लेती हैं, लेकिन प्रेम के इजहार में वे बहुत कंजूसी बरतती हैं. अकसर पुरुष के प्रत्येक प्रस्ताव पर उन के मुंह से ‘न’ ही निकलता है, चाहे मन में जितनी ही ‘हां’ हो. और जब कोई स्त्री ‘न’ कहती है तो उस के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि उस की प्रेमिका की किस ‘न’ का मतलब ‘हां’ है और फिर उस की ‘न’ को ‘संभावनाओं’ में और ‘संभावनाओं’ को ‘संभवों’ में बदलने की नैतिक जिम्मेदारी बेचारे पुरुष की होती है. वैसे यदि महिलाओं की मूक भाषा का अनुवाद किया जा सके तो पुरुषों के लिए अस्वीकार किए जाने का खतरा शायद कम हो जाए. एक तरफ तो पुरुष लगातार अपनी महिला मित्र की ‘अस्वीकृतियों’ को ‘स्वीकृतियों’ में बदलने की उलझन में रहता है तो दूसरी तरफ उसे यह भी डर लगा रहता है कि यदि वह उस पर ज्यादा दबाव डालता है तो उसे ‘चरित्रहीन’, ‘सेक्सी’ और न जाने क्याक्या समझा जाएगा. साथ ही वह इस उलझन में भी रहता है कि यदि वह उस पर ज्यादा दबाव डालता है तो कहीं वह उस से विरक्त न हो जाए.

महिलाओं की गुप्त योजनाएं

अधिकांश महिलाएं सोचती हैं कि शादी के बाद पुरुष बदल जाएगा, जबकि वह कम ही बदलता है. इसलिए वे मन ही मन अपने हिसाब से भविष्य के कार्यक्रम बनाती रहती हैं. नेहा और शेखर के केस में यही बात थी. शेखर के शादी न करने के निर्णय के बावजूद नेहा ने मन ही मन शादी की सारी तैयारी यह सोच कर डाली कि वह बाद में मान जाएगा. जब नेहा ने उस पर दबाव डाला तो शेखर को लगा कि नेहा ने पूरी तरह से न सिर्फ उस की भावनाओं की अपेक्षा की है बल्कि अपने वादे को भी तोड़ा है. ऐसे में भविष्य के प्रति नेहा के व्यवहार को ले कर आशंकित होना शेखर के लिए स्वाभाविक ही था. आज यद्यपि स्त्रियों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं, अधिकांश महिलाएं आत्मनिर्भर होती जा रही हैं, फिर भी ज्यादातर मामलों में पुरुषों से उन की अपेक्षाएं नहीं बदली हैं. एक स्त्री जितनी अधिक आर्थिक परेशानियों में रहती है वह पुरुष से उतने ही अधिक आर्थिक संरक्षण की अपेक्षा रखती है. ऐसे में एक पुरुष जब अपनी प्रेमिका को यह हिसाब लगाते देखता है कि वह शादी के बाद काम करे या न करे, तब वह सोचता है कि यह लड़की शायद एक खास वजह से शादी करना चाहती है. शायद वह काम करतेकरते थक गई है और नौकरी से छुटकारा पाने के लिए विवाह के रूप में आर्थिक सुरक्षा की चादर ओढ़ना चाहती हो या उस की नौकरी छूटने वाली हो या वह अपने कैरियर से तंग आ कर मां बनना चाहती हो वगैरहवगैरह. ऐसी हालत में पुरुषों के जस्ट इन केस सिंड्रोम से पीडि़त हो कर अपनी महिला मित्र से संबंध खत्म कर लेना कोई अस्वाभाविक बात नहीं है.

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समर्पित पुरुषों की कमी

जहां स्त्रियां पुरुषों पर प्रेम में समर्पित न होने का आरोप लगाती हैं वहीं पुरुषों को भी महिलाओं से बहुत गंभीर शिकायतें होती हैं. उन का मानना है कि अधिकांश महिलाएं अपनी दूरबीन हमेशा कामयाब पुरुषों पर ही रखती हैं. स्कूलकालेज के समय से ही लड़के पाते हैं कि जो लड़के पढ़ाई में अच्छे होते हैं, खेल में भी आगे होते हैं, देखने में भी स्मार्ट होते हैं, साथ ही उन के पास अच्छी बाइक या कार होती है, लड़कियां उन्हीं के इर्दगिर्द चक्कर लगाती हैं. वे चाहती हैं कि पुरुष हर क्षेत्र में कामयाब भी हो और उन के प्रति पूरी तरह समर्पित भी हो. ऐसे में यकीन निष्ठावान पुरुषों की कमी तो होगी ही, क्योंकि अगर पुरुष भी इसी तरह की शर्त रख कर स्त्रियों का चयन करें तो उन्हें भी वफादार स्त्रियों की कमी खलेगी. मसलन, कोई पुरुष यदि ऐसी स्त्री की तलाश में हो जिस की कमाई वह खुद इस्तेमाल कर सके, वह खूबसूरत और आकर्षक भी हो, वह स्वयं प्रस्ताव भी ले कर आए और सेक्स में भी पहल करे तो क्या पुरुषों को ऐसी निष्ठावान स्त्रियों की समस्या नहीं रहेगी? चूंकि पुरुष के लिए समर्पण का अर्थ होता है अपनी बुनियादी कल्पनाओं का त्याग. अत: यदि वह अपनी प्रेमिका में ही अपने सारे सपने साकार कर सके तो वह काफी कुछ परेशानियों से बच सकता है.

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