हाल ही में ब्रिटेन में हुए एक सर्वे से पता चला है कि पुरुष घर के छोटेमोटे काम करने में भी आनाकानी करते हैं, इसलिए पत्नियां अपने पति से घर के काम कराने के लिए घूस का सहारा लेती हैं. यह घूस पति को स्पोर्ट्स चैनल देखने का मौका देने जैसी होती है. वे उन्हें तब अपनी पसंद का चैनल देखने देती हैं, जब वे दीवार पर तसवीर टांगने, घर के फर्नीचर को सही तरह से जमाने, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने का जिम्मा लेते हैं. इस के अलावा अपनी पसंद का महंगा गैजेट खरीदने की इजाजत, अपने दोस्तों के साथ बौयज नाइट आउट यानी रात में घूमने की आजादी, इन तरीकोें से पत्नियां पतियों को घरेलू काम में मददगार बनाती हैं.
सुपर बनने की डिमांड
भारतीय महिलाओं की स्थिति भी इस मामले में कुछ अलग नहीं है. उन के पास भी घरपरिवार, पति, बच्चे, औफिस, कैरियर, रिश्तेदारों के साथ निभाने आदि जिम्मेदारियों की लंबी लिस्ट होती है. उस से हर समय सुपर मां, सुपर पत्नी, सुपर कैरियर वूमन बनने की मांग की जाती है. ऐसे में औफिस और घर के बीच तालमेल बैठाती महिला अनेक अनचाहे पहलुओं से जूझती है. उस पर पति द्वारा, ‘साक्षी, मेरे जूते कहां हैं?’, ‘मेरा टिफिन पैक हुआ या नहीं?’, ‘मेरी फलां शर्ट प्रैस क्यों नहीं है?’, ‘शर्ट का बटन टूटा हुआ है’, ‘बाथरूम में तौलिया नहीं है’, ‘मेरी फाइल नहीं मिल रही’, ‘मेरी गाड़ी की चाबियां पकड़ाना जरा’, ‘तुम कोई भी काम ढंग से नहीं करती हो, तुम्हें पता है, मैं ये सब नहीं कर सकता’ जैसी शिकायतों का पुलिंदा किसी भी पत्नी को अंदर तक परेशान कर देता है कि जिन कामों के न होने की शिकायत पति कर रहा है, उन कामों को वह स्वयं भी कर सकता है. लेकिन वह इन कामों को पत्नी का काम समझता है.
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एकदूसरे के पूरक
हमारे समाज में लड़कियों में बचपन से ही जिम्मेदार, कार्यकुशल बनने और घरपरिवार के काम करने के संस्कार डाले जाते हैं. चाहे वह पत्नी हो, बच्चों की मां हो या बहू हो. भोजन, कपड़े धोना, बच्चों की देखभाल, फलसब्जी की खरीदारी, औफिस व घर के बीच तालमेल बैठाना सभी कामों की उम्मीद उसी से की जाती है. अगर पत्नी 2 दिन के लिए घर से बाहर चली जाए तो पति बीसियों बार कौन सी चीज कहां रखी है, जानने के लिए फोन करते हैं. घर लौटने पर घर में जगहजगह फैले अखबार, गंदे कपड़े, खाने की जूठी प्लेटें, डाइनिंग टेबल पर जमी धूल, सूखे गमले नजर आते हैं. जब स्त्रीपुरुष एकदूसरे के पूरक हैं, तो वे घरेलू कामों में एकदूसरे के मददगार क्यों नहीं हो सकते हैं?
जिम्मेदारी बराबर की
एक बौलीवुड अभिनेत्री से जब पूछा गया कि वे अपने होने वाले पति में क्या खूबी चाहती हैं, तो उन का जवाब था, ‘‘मैं चाहती हूं, मेरा होने वाला पति सही माने में मेरा सहयोगी, मेरा लाइफपार्टनर हो. वह हर पल हर सुखदुख में मेरा सहयोगी हो. उस में यह अहं न हो कि यह काम मेरा नहीं है, मैं इसे नहीं कर सकता.’’ दरअसल, आज की हर पढ़ीलिखी कैरियर माइंडेड युवती ऐसा जीवनसाथी चाहती है, जो जीवन के हर क्षेत्र में उसे पूरा सहयोग दे. उस की भावनाओं को पूरा महत्त्व दे, उसे बराबरी का अधिकार दे, उस के घरेलू कामों में उस की पूरी मदद करे. आज की जागरूक पत्नी का मानना है कि जब वह घर से बाहर जा कर पति को आर्थिक सहयोग दे रही है, तो पति से घरेलू कामों की उम्मीद करना कहीं से भी गलत नहीं है.
पति का सहयोग जरूरी
स्वतंत्र पत्रकार दीक्षा गोयल का कहना है कि पति का सहयोग कितना जरूरी और हिम्मत देने वाला होता है, यह मैं ने तब जाना जब मेरे बेटे अंश का जन्म हुआ. अंश के दूध की बौटल बनाने से ले कर उस के डायपर बदलने तक में मेहुल ने मुझे पूरा सहयोग दिया. आज अंश 5 साल का है, उसे बड़ा करने में मेहुल का बराबर का योगदान है. इस के विपरीत कई आलसी और अहंकारी पति इन कामों के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं समझते. औफिस से आते ही सब से पहले उन्हें चाय चाहिए. फिर वे पसर कर या तो टीवी के आगे बैठ जाते हैं या फिर नैट पर सर्फिंग कर के पत्नी को चिढ़ाते रहते हैं और खाना टेबल पर लगने का इंतजार करते रहते हैं. ऐसे पति आलसी और गैरजिम्मेदार पतियों की श्रेणी में आते हैं, जो बैठेबैठे और्डर करते रहते हैं. जब तक उन से कहा नहीं जाए, वे उठ कर पानी का गिलास भी नहीं लेते. ऐसे में पत्नी बेचारी झुंझला उठती है. अगर पति केवल पत्नी से ही घरेलू कामों की उम्मीद करे और पत्नी सहयोग के समय अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़े तो इस रिश्ते में कड़वाहट पैदा होती है और माहौल तनावपूर्ण हो जाता है.