आजकल सभी मातापिता यह शिकायत करते हैं कि बच्चे स्मार्टफोन, टैबलेट, टीवी या फिर मोबाइल पर गेम्स खेलने में लगे रहते हैं. मंजीत कहते हैं, ‘‘एक हमारा जमाना था जब हम पढ़ते हुए कभी नहीं थकते थे.’’ साथ में बैठी उन की पत्नी फौरन बोल उठीं, ‘‘मुझे तो मीकू, चीकू बहुत पसंद थे.’’ बालपुस्तकों की कमी आज भी नहीं, किंतु आज की पीढ़ी पढ़ने का खास शौक नहीं रखती है. कहीं इस के जिम्मेदार हम ही तो नहीं? पहले इतनी तकनीक हर हाथ में उपलब्ध नहीं होती थी कि बच्चे किताबों के अलावा मन लगा पाते. आजकल गैजेट्स हर छोटेबड़े हाथ को आसानी से प्राप्त हैं.
अपने नन्हे को पढ़ कर सुनाएं :
अपने नन्हेमुन्ने का अपने जीवन में स्वागत करने के कुछ वर्षों बाद ही आप उसे कहानी पढ़ कर सुनाने की प्रक्रिया आरंभ कर दें. इस से न केवल आप का अपने बच्चे से बंधन मजबूत होगा बल्कि स्वाभाविक तौर पर उसे पुस्तकों से प्यार होने लगेगा. उम्र के छोटे पड़ाव से ही किताबों के साथ से बच्चों में पढ़ने की अच्छी आदत विकसित होती है. प्रयास करें कि प्रतिदिन कम से कम 20 मिनट आप अपने बच्चों के साथ मिल कर बैठें और पढ़ें. पुस्तकों में कोई रोक न रखें, जो आप के बच्चे को पसंद आए, उसे वह पढ़ने दें.
पढ़ने के साथ समझना भी जरूरी :
बच्चा तेजी के साथ किताब पढ़ पाए, यह हमारा लक्ष्य नहीं है, बल्कि जो कुछ वह पढ़ रहा है, उसे समझ भी सके. इस के लिए आप को बीचबीच में कहानी से संबंधित प्रश्न करना चाहिए. इस से बच्चा न केवल पढ़ता जाएगा, बल्कि उसे समझने की कोशिश भी करेगा. आप ऐसे प्रश्न पूछें, जैसे अब आगे क्या होना चाहिए, क्या फलां चरित्र ठीक कर रहा है, यदि तुम इस की जगह होते तो क्या करते. ऐसे प्रश्नों से आप का बच्चा कहानी में पूरी तरह भागीदार बन सकेगा तथा उस की अपनी कल्पनाशक्ति भी विकसित होगी.
बच्चे के रोलमौडल बनें :
यदि आप का बच्चा बचपन से पढ़ने का शौकीन है तब भी घर में किसी रोलमौडल की अनुपस्थिति उसे इधरउधर भटकने पर मजबूर कर सकती है. आप स्वयं अपने बच्चे के रोलमौडल बनें और उस की उपस्थिति में अवश्य पढ़े. चाहे आप को स्वयं पढ़ना बहुत अधिक पसंद न भी हो तब भी आप को प्रयास करना होगा कि बच्चे के सामने आप पढ़ते नजर आएं. क्या पढ़ते हैं, यह आप की इच्छा है, लेकिन आप के पढ़ने से आप का बच्चा यह सीखेगा कि पढ़ना उम्र का मुहताज नहीं होता और हर उम्र में इंसान सीखता रह सकता है.
आसपास देख कर सिखाइए :
छोटे बच्चे बिना पढ़े ही क्रीम की बोतल के नाम, शैंपू के नाम, उन के पसंदीदा रैस्तरां, जैसे डोमिनोज का नाम आदि जान जाते हैं. कैसे? चिह्नों द्वारा. मीनल बताती हैं कि उन की डेढ़ वर्र्र्षीया बिटिया ढेर सारे चिह्न (कंपनियों के लोगो) पहचानती है और उन की कंपनियों के नाम बता देती है तो जब उन के दूसरा बच्चा होने का समय निकट आया, उन्होंने नवजात शिशु की कौट के ऊपर उस के नाम के अक्षर टांग दिए. इस का असर यह हुआ कि न केवल उन की बड़ी बिटिया नाम की स्पैलिंग सीख गई, बल्कि छोटी भी बहुत जल्दी वर्णमाला सीख गई. तकनीकी भाषा में इसे ‘एनवायरनमैंटल पिं्रट’ कहते हैं अर्थात चिह्नों की सहायता से बच्चे, बिना पढ़े ही, भिन्न रैस्तरां, सौंदर्य प्रसाधन, ट्रैफिक सिग्नल, कपड़े, पुस्तकें आदि पहचानने लगते हैं और उन में भेद कर सकते हैं. नन्हे बच्चों की उत्सुक प्रवृत्ति का लाभ उठाते हुए आप उन्हें न केवल किसी चीज का शाब्दिक अर्थ बल्कि सामाजिक महत्त्व तथा उपयोग भी बता सकते हैं. अपने आसपास की चीजें देख वे प्रश्न करेंगे और आप उत्तर के द्वारा उन्हें कईर् चीजें सिखा सकते हैं.
भिन्न प्रकार की पुस्तकों को बनाएं मित्र :
जब आप का बच्चा पढ़ने लगे, तब आप उसे भिन्न प्रकार की पुस्तकें पढ़ने को दें, जैसे अक्षर ज्ञान वाली पुस्तकें, बाल कहानियां, कविताओं की पुस्तकें आदि. साथ ही, वह एक प्रकार की कहानियों को दूसरी से अलग करने में अपने दिमाग में विचारों को बनाना व संभालना सीखेगा.
खेलखेल में :
कई खेलों द्वारा आप अपने छोटे बच्चे को पढ़ने की ओर आकर्षित कर सकती हैं. दिल्ली की प्रेरणा सिंह कहती हैं, ‘‘हर शुक्रवार वे अपनी सोसाइटी में 5 से 7 साल के बच्चों के लिए ‘फन फ्राइडे’ मनाती हैं. यहां वे बच्चों की टोली को अलगअलग टीम में विभाजित कर खेलों द्वारा पढ़ने की ओर उन का रुझान पैदा करती हैं. इस के लिए वे कई खेलों का सहारा लेती हैं.
वे कहती हैं, ‘‘केवल स्कूली पढ़ाई ही जीवन में काम नहीं आती. जो कुछ हम अपने वातावरण से सीखते हैं, वही हमारा व्यक्तित्व बनता है और जिंदगी में हमारे काम आता है.’’
डिजिटल बनाम प्रिंट
वर्ष 2013 से 2015 तक नाओमि बैरोन द्वारा किए गए शोध में 5 देशों-भारत, जापान, अमेरिका, जरमनी व स्लोवेनिया के 429 विश्ववि-ालयों के छात्रों से जब डिजिटल बनाम कागज की किताबों की तुलना करने को कहा गया तो छात्रों की प्रतिक्रिया थी कि उन्हें कागज की खुशबू भाती है. उन्हें कागज को छूने, देखने, पकड़ने से आभास होता है कि वे पढ़ रहे हैं. पिं्रट उन्हें बेहतर समझ में आता है और अधिक याद रहता है.
सोशल मीडिया का असर
सोशल मीडिया पर ज्ञान तो बहुत है पर सही या गलत, इस का कोई प्रमाण नहीं है. जिस के जो दिल में आता है, वह उस का औडियो या वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर देता है. बच्चे व किशोर ज्ञान की कमी के कारण इस अधकचरी जानकारी को प्राप्त कर समझते हैं कि उन्हें किताबें पढ़ने की आवश्यकता नहीं है.
बच्चे को सिर्फ अक्षरज्ञान देना नहीं है, बल्कि पुस्तकों जैसे सच्चे मित्र द्वारा सामाजिक ज्ञान के साथ भावनात्मक संबलता भी प्रदान करना है. बच्चा जो पढ़े, जो सीखे, उसे गुने भी. इस के बिना पढ़ना व्यर्थ है. केवल पढ़ना ही ध्येय नहीं, लिखना भी लक्ष्य होना चाहिए. और अच्छा लिखने के लिए ज्यादा पढ़ना आवश्यक है. अच्छी किताबें बच्चों को ज्ञान के साथ एक नई दुनिया दिखाती हैं, उन्हें सही राह पर चलने की प्रेरणा देती हैं.
खेल ऐसा जो पढ़ने में रुचि जगाए
कुछ आकर्षक खेल जिन के द्वारा आप अपने बच्चों में पढ़ने की अभिरुचि विकसित कर सकती हैं-
– हर अक्षर की कठपुतलियां बनाइए. कोई एक शब्द कहिए, जिस की स्पैलिंग बच्चों को कठपुतलियों को उठा कर बनानी है. जो टोली पहले बना देगी, वह जीत जाएगी.
– हर टोली में से एक बच्चा आएगा और एक बड़े बोर्ड पर किसी वस्तु की कलाकारी करेगा. दूसरी टीम को उस की स्पैलिंग बतानी होगी.
– जिस बच्चे ने जो भी नई कहानी पढ़ी है, वह उसे पूरे समूह को सुनाएगा. कहानी समाप्त होने पर सब तालियां बजाएंगे.
– सब बच्चों को एक विषय दिया जाएगा और उस पर उन्हें एक छोटी कहानी बनानी होगी.
– बारीबारी से सब बच्चे दी हुई पुस्तक में से कहानीपाठ या कवितापाठ करेंगे.
शोध जो कहता है
– करीब 1,500 अभिभावकों, जिन के 8 वर्ष तक की आयु के बच्चे हैं, से लंदन के बुकट्रस्ट द्वारा बातचीत करने पर परिणाम आया कि अभिभावक मानते हैं कि डिजिटल के मुकाबले कागज से बच्चों की दृष्टि को कम खतरा रहता है, उन को कम सिरदर्द होता है और बेहतर नींद आती है.
– 92 फीसदी लोगों का कागज की किताब में अधिक ध्यान लगता है.
– 86 फीसदी डिजिटल के मुकाबले प्रिंट को पसंद करते हैं.
– 45 फीसदी लोगों ने इस बात का भय जताया कि गैजेट के हाथ में आने से बच्चों का स्क्रीनटाइम बढ़ जाएगा.
– 31 फीसदी को डर था कि गैजेट से बच्चे गलत साइट पर जा कर कुछ अनर्गल भी देख सकते हैं.