एक पुरानी लोकोवित है ‘जब गरीबी दरवाजे पर आती है तो प्यार खिड़की से कूद कर भाग जाता है.’ वाकई कहने वाले ने सच ही कहा है. रिश्ते में समर्पण, श्रद्धा, ईमानदारी प्यार की वजह से होती है. पर यह प्यार पैसों के अभाव में खत्म हो जाता है. एक समय ऐसा था जब संबंध और उस की संवेदनशीलता ही महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी.
रिश्ते बनते ही पैसों के तराजू में तोलने के बाद, संबंध बनाने की कोशिश शुरू करने से पहले उन में एकदूसरे के स्टेटस सिंबल को पहले आंका जाता है. यहां तक कि अपने रिश्तेदारों से भी भविष्य में संबंध बनाए रखने के लिए दोनों के आर्थिक स्तर को पहले तोला जाता है.
जिंदगी जीने के लिए जरूरत और सुविधा की चीजों को समेटने में पैसा ही काम आता है. सारी चीजों का मूल्य इसी पैसे के बदले तोला जाता है. वक्त के साथसाथ व्यक्ति के मूल्य को भी पैसे से ही आंका जाता है. जाहिर है संबंधों के फैले हुए तानेबाने भी इसी के इर्दगिर्द घूमने लगे.
यह जान कर भी कि जीवन जीने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा आसपास सुखद संबंध और उन का एहसास भी बहुत जरूरी होता है. अच्छे रिश्ते न केवल हमें हरदम भीतर से भरापूरा एहसास कराते हैं, साथ ही वक्तबेवक्त हमारी मदद भी करते हैं. यह अलग बात है कि रिश्तों में भी कैलकुलेशन होना नैचुरल है.
लोग पहले ही उन में एकदूसरे के लेनदेन का अनुमान लगा लेते हैं. तत्पश्चात यह निर्णय करते हैं कि किस रिश्ते को किस ढांचे में ढालना है. यह रिश्ता आसपास की कई सारी चीजों से प्रभावित होता है. इन में आर्थिक स्थिति प्राथमिक और अहम होती है.
डिपैैंडैंट रिलेशनशिप
इस बारे में चार्टड अकाउटैंट वर्षा कुमारी का मानना है कि हर रिश्ते को अच्छी तरह से बनाने के लिए पैसा अहम भूमिका निभाता है. माना कि रिश्तों के बनने और उन के स्वामित्व के लिए उन में प्यार, लगाव पर्सनैलिटी के तत्त्व समावेश होते हैं, लेकिन पैसे के बिना यह संबंध भी ज्यादा दिनों तक चलता.
प्यार को जाहिर करने, बनाए रखने के लिए पैसों की जरूरत तो पड़ती ही है.
फैशन डिजाइनर पूनम गुलाटी का कहना है कि हमारे जीवन में सब से करीबी रिश्ता पतिपत्नी का होता है. शादी के बाद कुछ समय तक मैं ने काम करना छोड़ दिया था. 3 साल बाद जब मैं ने बाहर काम करना शुरू किया तो अब मेरे व्यवहार को मेरे पति दूसरे ही तरीके से लेने लगे. मतलब मेरी हर बात पर वे यह कहने से नहीं चूकते कि अरे, अब तो तुम कमाने वाली हो गई हो, जबकि पहले मेरी उन बातों को मेरा भोलापन समझ जाता था.
बाकी रिश्तों से ऐसी प्रतिक्रिया तो मैं बरदाश्त कर लेती हूं पर अपने पति से ऐसा सुन कर मुझे वाकई दुख होता है. इस पैसे ने सारे संबंधों को ही बदल दिया है.
बाजारवाद का प्रभाव
समय के साथसाथ उपभोक्तावाद की वजह से भी पैसों का महत्त्व बढ़ता जा रहा है, साथ ही दूसरी चीजों का मूल्य घट गया है. आधुनिक समाज की सारी चकाचौंध पैसों पर ही टिक गई है. हमारे आसपास चलने वाले सारे मानसम्मान और संबंध पैसे के पैमाने से नापे जाने लगे. वहीं विज्ञापन भी लोगों की भावनाओं को भड़काता है. एक विज्ञापन कुछ साल पहले चला था टीवी में जिस में एक छोटा बच्चा घर से भाग कर रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाता है. वहां पर गरमगरम जलेबियों को देख कर उन के लालच में वापस घर लौट आता है.
यानी अभी से उस मासूम के दिलोदिमाग में यह बात बैठा दी गई है कि उस से जुड़े रिश्ते वापस घर नहीं बुलाते वरन वे जलेबियां ही उस के भीतर लालच पैदा करती हैं और वही रिश्तों को बनाए रखती हैं. अब जलेबियां नहीं पिज्जा, बर्गर और आईफोन का दौर है. फर्क इतना ही है.
अकसर देखने में आता है कि पत्नियां अपने पति से कहती हैं कि लगता है तुम मुझे प्यार नहीं करते. तभी काफी दिनों से मेरे लिए कोई गिफ्ट नहीं लाए अर्थात पतिपत्नी के प्रेम के बीच भौतिक चीजें जरूरी हैं.
मगर इन सारी स्थितियों से संबंधों में विसंगतियां आ गई हैं. पैसों की अधिकता या अभाव से संबंध कटने और बंटने लगे हैं. परिणामस्वरूप हमारे समाज में अकेलेपन से ग्रस्त एक बड़ा वर्ग विकसित हो रहा है.
भावनात्मक रुख
शिक्षिका रश्मि सहाय का इस बारे में विचार कुछ भिन्न है. वे कहती हैं कि माना कि आज रिश्तों के बीच पैसा बहुत बुरी तरह से आ गया है, पर व्यक्तिगत रूप से मैं अपने रिश्तों के बीच पैसा नहीं आने देती हूं. यह महज मेरी भावुकता भी कही जा सकती है. मगर मेरा मानना है कि जब रिश्तों में हिसाबकिताब आने लगता है तो वे बोझ बनने लगते हैं.
अत: मेरी कोशिश यही रहती है कि पैसा बीच में न आए और यदि आता भी है तो मैं उसे प्राथमिकता नहीं देती हूं. हां, कई बार मुझे इस की वजह से फाइनैंशियल लौस भी सहना पड़ा है, पर हमारी जिंदगी भूरीपूरी भी तो इन्हीं संबंधों की वजह से है. भले आप इसे मेरा ओवर इमोशनल कहें या आप मुझे प्रैक्टिकल न कहें.