रीमा और रमन के इकलौते बेटे 8 वर्षीय अक्षत के पास मंहगे से मंहगे खिलौनों का भंडार है पर कल से उसने अपने दोस्त बीनू के जैसी कार खरीदने की जिद लगा रखी है. उसे कुछ के समझाने के बजाए रमन ने उसे रोता देखकर अगले दिन वैसी ही कार लाकर दे दी जिससे वह उस समय तो खुश हो गया परन्तु क्या अभिभावकों द्वारा बच्चे क़ी जिद पूरी करने का ये तरीका सही है ? क्या इसके बाद उसकी इच्छाओं का अंत हो जाएगा. वास्तव में  बच्चे मिट्टी के समान होते हैं उन्हें जिस भी ढांचे में ढाल दिया जाए वे बड़ी आसानी से ढल जाते हैं. आजकल आमतौर पर परिवार में एक या दो बच्चे होते हैं और अपने इन नौनिहालों को हर अभिभावक जिंदगी की दौड़ में शिखर पर देखना चाहता है. इसके अतिरिक्त कई बार माता पिता अपने सपनों को पूरा करने के लिए भी बच्चों को मोहरा बना देते हैं. नौनिहालों को शिखर  पर पहुंचाने के लिए वे बाल्यावस्था से ही केरियर में श्रेष्ठतम करने के लिए विभिन्न विषयों की कोचिंग में भेजना प्रारम्भ कर देते हैं, स्कूल और कोचिंग के बीच में पिसते बच्चे जीवन के व्यवहारिक ज्ञान से अनभिज्ञ ही रह जाते हैं.

अक्सर वे कैरियर और एकेडेमिक्स में तो बेहतर प्रदर्शन करना सीख जाते हैं परन्तु दूसरों की भावनाओं या तकलीफों को समझना या उन पर काम करने से अछूते ही रह जाते हैं. जब कि जीवन को सफलता पूर्वक चलाने के लिए एकेडमिक्स के साथ साथ व्यवहारिक ज्ञान का होना भी अत्यंत आवश्यक है. यद्यपि 2020 में कोरोना के आगमन के बाद से कोचिंग व स्कूल के बंद होने से बच्चे घर में हैं, कोचिंग या क्लासेज भी ऑनलाइन ही हैं  भले ही बच्चे घर में हैं और उनका परिवार के साथ जुड़ाव भी बढ़ा है परन्तु उन्हें जीवन मूल्यों से परिचित कराना अत्यंत आवश्यक है. आवश्यक है कि किताबी शिक्षा के साथ साथ बच्चों को भावनाओं क़ी कोचिंग भी दी जाए. उन्हें खुश रहने और अपने व्यवहार से दूसरों को खुश करने की कला सिखाई जाए ताकि वे भविष्य में भी एक जिम्मेदार पिता, पति और नागरिक बनकर  सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें.

-रिश्तों की महत्ता बताएं

अक्सर माता पिता बच्चों से केरियर और सफलता के बारे में तो बात करते हैं परन्तु कभी भी रिश्तों और रिश्तेदारों के बारे में बात नहीं करते. काउंसलिंग एक्सपर्ट कैथलीन ओकानर कहती हैं, ” बच्चों से उन रिश्तों पर बात करें जिन्होंने आपको खुशी दी. उन्हें बताएं कि आपने उन रिश्तों के लिए क्या कुछ नहीं किया. उन्हें जिंदगी में रिश्तों का महत्त्व बताएं ताकि भविष्य में वे उनके साथ जीना सीख सकें. उन्हें परिवार की महत्ता और उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना सिखाएं. इसके लिए आवश्यक है कि आप उन्हें अपने बाल्यावस्था की छोटी छोटी शैतानियां और बातें कहानियों के रूप में सुनाएं इससे उन्हें सुनने में मजा भी आएगा और वे उन रिश्तों से परिचित भी हो सकेंगे. पहले जहां छुट्टियों में बच्चे दादी नानी के घर जाते थे वहीं आजकल छुट्टियों में घूमने जाने का ट्रेंड हो गया है जिससे बच्चे नाते रिश्तेदारों से अपरिचित ही रह जाते हैं. वर्ष में कम से कम एक बार उन्हें परिवार के सदस्यों से अवश्य मिलवाएं ताकि वे उनसे जुड़ाव भी महसूस कर सकें.

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-रोल मॉडल बनें

बच्चे सदैव अपने माता पिता का अनुकरण करते हैं. परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों पर  रश्मि हमेशा दीवाली मनाने अपने ससुराल ही जाती है इससे उसके बच्चे ग्रैंड पेरेंट्स और चाचा बुआ जैसे रिश्तों को तो समझ ही पाते हैं साथ साथ उनका सम्मान करना और परिवार के साथ रहना भी सीखते हैं. इस बाबत रश्मि कहती है,”आप इसे मेरा स्वार्थ भी कह सकते हैं क्योंकि आज जो बच्चे देखेंगे कल वही वे हमारे साथ करेंगे.”

इसलिए जो भी आप उनसे करवाना चाहते हैं उसे अपने जीवन में अवश्य उतारें ताकि वे आपको देखकर अपने व्यवहार में ला सकें.

-संतुष्ट रहना सिखाएं

यद्यपि कोरोना के आगमन के बाद से अभिभावकों ने बच्चों को संतुष्ट रहना सिखाया परन्तु उन्हें समझाना होगा कि जीवन में खुशी कभी पैसे से नहीं खरीदी जा सकती बल्कि खुश रहने के लिए संतुष्ट होना आवश्यक है और इच्छाओं का कभी अंत नहीं होता. इसके लिए उन्हें ऐसे लोंगों से परिचित कराएं जो उनसे कम भौतिक चीजों के साथ भी खुश रहते हैं. उन्हें छोटी छोटी बातों में खुश होना सिखायें. 90 के दशक से सकारत्मकता के मनोविज्ञान पर काम कर रहे मार्टिन सोलोमन जिंदगी के उद्देश्य पर काम कर रहे हैं वे कहते हैं बच्चों को बताएं कि सिर्फ पैसे कमाने से खुशी नहीं मिलती खुशी के लिए संतुष्ट होना जरूरी है वह भाव खुद में तलाशें जैसे किसी को पर्यावरण की रक्षा करना पसंद है तो किसी को गरीबो की मदद करना.

-धन का मूल्य समझाएं

आजकल परिवार का स्वरूप एक या दो बच्चों तक सीमित रह गया है. बच्चों की डिमांड उनके मुंह से निकलते ही पूरी हो जाती है इससे वे समझ ही नहीं पाते कि धन कमाने में कितना परिश्रम लगता है. उज्जैन में एक प्रतिष्ठित स्कूल के संचालक श्री वासवानी जी कहते हैं,”मेरा बेटा यदि 3 चीजों की डिमांड करता है तो उसमें से मैं एक बार में एक ही डिमांड पूरी करता हूं ऐसा नहीं है कि मैं उसकी डिमांड पूरी नहीं कर सकता परन्तु यदि इच्छा व्यक्त करते ही पूरी हो जाएगी तो उसे पैसे की वैल्यू ही समझ नहीं आएगी.” इसलिए बच्चों को बाल्यावस्था से ही पैसा बहुत मेहनत से कमाया जाता है यह समझाया जाना अत्यंत आवश्यक है.

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-कृतज्ञता सिखाएं

बच्चों को अपने आसपास के लोंगों, कामगारों के प्रति कृतज्ञ होना सिखाएं. घर के प्रेस वाले, मेड, ड्राइवर और अन्य कामगारों के उदाहरणों से ही उन्हें समझाएं कि उनका आपके जीवन में कितना महत्त्व है. कई घरों में बच्चे घर के कामगारों से बदतमीजी से बात करते हैं और अभिभावक उन्हें टोकने के बजाय हसना प्रारम्भ कर देते हैं जो सर्वथा अनुचित है क्योंकि यदि उन्हें प्रथम बार में ही टोक कर दण्डित किया जाए तो वे दोबारा गल्ती नहीं करेंगे.

-पर्यावरण के प्रति जगरूक बनाएं

अनीता अपने बच्चे के जन्मदिवस पर हर साल एक पौधा लगाती है और अपने बच्चे से ही उसकी देखभाल करने को कहती है इससे बच्चे में प्रकृति प्रेम बढ़ने के साथसाथ जिम्मेदारी का भाव भी आता है. आज समय की मांग है कि हम अपने बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाएं ताकि भविष्य में भी वे पर्यावरण को सहेजने में अपनी जिम्मेदारी निभा सकें. प्रकृति ने मानव जीवन को क्या क्या दिया है और उसे सहेजना कितना और क्यों जरूरी है यह उन्हें बचपन से ही सिखाया जाना अत्यंत आवश्यक है.

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