पेरिस की चकाचौंध देख कर आंखें चौंधिया गईं. पेरिस में न केवल एफिल टावर बल्कि कई दर्शनीय स्थल भी हैं. खूबसूरत बिल्डिंग्स और पेरिस की साफ सफाई देख कर हम खुश हो गए.
बचपन से ही दिल में पेरिस घूमने की ख्वाहिश थी, जो इस साल पूरी हुई. 2 फ्लाइट बदलने और 16 घंटे सफर करने के बाद जब हम पेरिस के चार्ल्स डि गौले एयरपोर्ट पहुंचे तो थकान के बावजूद सभी बहुत खुश और उत्साहित थे. हम एयरपोर्ट से सीधे होटल पहुंचे. हमारा घूमनेफिरने का प्रोग्राम अगले दिन से था, क्योंकि हम उस दिन शाम 8 बजे के करीब वहां पहुंचे थे. जब एयरपोर्ट से बाहर निकले तो अच्छीखासी धूप निकली हुई थी, क्योंकि वहां अंधेरा 10 बजे के आसपास होता है और सुबह 5 बजे तक दिन निकल आता है. हम सब उजाला देख कर बहुत खुश हुए.
होटल तक के कई किलोमीटर लंबे रास्ते में हम ने कई बातें नोट कीं जैसे वहां की बिल्डिंग्स बहुत खूबसूरत हैं, पूरे शहर में कहीं भी गंदगी का नामोनिशान नहीं है, यहां सभी गाडि़यां लैफ्ट हैंड ड्राइव हैं और यहां भी काफी देर तक ट्रैफिक जाम में फंसना पड़ता है.
अगले दिन हम लोग सब से पहले डिज्नीलैंड गए, जो शहर से थोड़ा दूर है. वाल्ट डिज्नी के पात्रों और फिल्मों की थीम पर बना यह पार्क इतना बड़ा है कि एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाने के लिए ट्रेन का सहारा लेना पड़ता है.
जैसेजैसे हम अंदर की ओर बढ़ते गए. ऐलिस इन वंडरलैंड, पीटर पैन, पाइरेट्स औफ द कैरेबियन स्नोव्हाइट आदि जितने भी डिज्नी के मशहूर पात्र हैं, सब हमारी आंखों के आगे जीवंत हो उठे. हर राइड मानो अपने पात्र की पूरी कहानी बयां कर रही थी. स्लीपिंग ब्यूटी का महल पार्क के बीचोंबीच बना हुआ है और यह पूरे डिज्नीलैंड की शान है. यह महल इतना सुंदर है कि एक बार को तो हमें ऐसा लगा मानो हम सचमुच परीलोक में ही आ गए हैं.
शाम के समय इस में लेजर शो होता है, जो दर्शकों को सम्मोहित करता है. बड़ेबड़े पेड़ों पर बने रोबिनसन के घर (ट्री हाउस) देखने के लिए संकरी सीढ़ियों से चढ़ कर जाना पड़ता है, जो बड़ा ही रोमांचक है. पाइरेट्स की राइड में जब घने अंधेरे और डाकुओं की तलवारों के शोरशराबे के बीच अचानक आप की गाड़ी कई फुट नीचे गिरती है तो रोमांच के साथसाथ थोड़ा डर भी लगता है. शाम के समय निकलने वाली परेड देख कर तो मजा आ गया. इस में डिज्नी के सारे पात्र नाचतेकूदते पूरे डिज्नीलैंड का चक्कर लगाते हैं. पूरा दिन यहां बिता कर शाम को हम ली इन्वैलिड्स गए.
यहां कुछ म्यूजियम और कुछ अन्य इमारतें बनी हुई थीं, जिन्हें लुइ 14वें ने युद्ध में घायल सैनिकों के इलाज के लिए बनवाया था. बूढ़े और अपाहिज सैनिकों व उन के परिवारों के लिए यहां मुफ्त में खानेपीने, इलाज और रहने का इंतजाम किया जाता था. नैपोलियन और उस के परिवार के कई सदस्यों तथा फौज के अनेक मार्शलों की कब्रें भी यहीं पर बनी हुई हैं.
यहां से हम आर्क औफ ट्राइंफ गए, जो इंडिया गेट की याद दिला रहा था. फ्रांस की क्रांति और अनेक युद्धों में मारे गए शहीदों की याद में यह गेट बनाया गया है और इंडिया गेट की ही तरह इस की दीवारों पर भी शहीदों के नाम खुदे हुए हैं.
अब रात के 9 बज चुके थे और हमें वापस होटल लौटना था. रास्ते में हमारे गाइड ने पेरिस के बनने की कहानी सुनाई, जो बड़ी रोचक थी. वर्ष 1852 तक पेरिस आम शहर जैसा ही था. 1852 में नैपोलियन बोनापार्ट का भतीजा लुई राजा बना. वह शहर को बिलकुल नए रूप में ढालना चाहता था और राजा बनते ही उस ने इस पर काम शुरू भी कर दिया.
बैरन हौसमैन नामक इंजीनियर को उस ने यह काम सौंपा. वह चाहता था कि उस का शहर न सिर्फ सुंदर बने बल्कि उस के हर हिस्से से अमीरी टपकती दिखाई दे. लुई ने शहर में जितनी भी गरीब बस्तियां थीं, उन्हें उजाड़ कर जनता को जबरदस्ती शहर के बाहरी हिस्सों में भेज दिया और फिर चौड़ी खूबसूरत सड़कों, बड़े-बड़े ब्लौक्स और महंगे बाजारों तथा बड़े सुंदर घरों का निर्माण शुरू किया. हरियाली की कमी न हो, इस बात का भी दोनों ने पूरा ध्यान रखा.
17 साल तक यह सारा काम चलता रहा और जनता हौसमैन को कोसती और गालियां देती रही. गरीब तो गरीब, अमीरों ने भी उस का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन 1870 तक जो पेरिस बन कर तैयार हुआ, उस ने हैरान कर दिया और कुछ ही समय में सारा विरोध खत्म हो कर यह शहर पूरे यूरोप के गर्व का कारण बन गया. अगले दिन सुबह सब से पहले हम एफिल टावर देखने गए. 2 घंटे लाइन में इंतजार करने के बाद जब हम ऊपर पहुंचे, तो वहां से पूरे पेरिस का सुंदर दृश्य देखने को मिला, उसे देख कर हम सब अभिभूत हो गए. वेसे तो इस की ऊंचाई लगभग 1 हजार फुट है, लेकिन मैटल से बना होने के कारण सूर्य की गरमी से प्रभावित हो कर यह मौसम के अनुसार 15 सेंटीमीटर तक घटताबढ़ता रहता है. इस के डिजाइनर अलैक्जेंडर गुस्ताव एफिल के नाम पर ही इस का नाम रखा गया है.
हमारे गाइड ने बताया कि वर्ष 1889 में फ्रांस की क्रांति के 100 साल पूरे होने पर फ्रांस में जश्न मनाया जा रहा था. इस के लिए वहां एक बड़ा वर्ल्ड फेयर आयोजित किया जा रहा था, जिस के मुख्य द्वार के रूप में एक बड़ा भव्य टावर बनाने का निश्चय किया गया, जिसे बाद में तोड़ा जाना था. लेकिन जब यह बन कर तैयार हुआ, तो इस की सुंदरता को देख कर इसे नष्ट करने का विचार त्याग दिया गया.
आजकल इसे एक बड़े रेडियो ऐंटीना की तरह प्रयोग किया जाता है. आज की तारीख में यह टावर पेरिस की पहचान और शान दोनों बन गया है. वहां के लोग अपनी इस धरोहर से कितना प्यार करते हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब हिटलर पेरिस में घुसा तो लोगों ने टावर की लिफ्ट के केबल काट दिए ताकि वह उन के शहर की इस शान पर चढ़ न सके. हिटलर कुछ सीढि़यां तो चढ़ा, पर फिर हार मान कर लौट गया.
इस के बाद हम सैंट चैपल चर्च और नोट्रे डैम कथीड्रल गए. दोनों ही चर्च दुनिया के मशहूर चर्चों में से हैं और अत्यंत खूबसूरत हैं. नोट्रे डैम कथीड्रल में जीजस क्राइस्ट के क्रौस का एक छोटा सा टुकड़ा क्राउन औफ थोर्न तथा कुछ अन्य रेलिक्स भी रखे गए हैं. नैपोलियन बोनापार्ट का राज्याभिषेक भी यहीं हुआ था. यहां बहुत बड़ेबड़े 10 घंटे हैं, जिन में से सब से बड़ा 13 टन से भी अधिक भारी है और इस का नाम इमान्युएल है. यहां से हम कौनकौर्ड स्क्वायर होते हुए लूव्र म्यूजियम पहुंचे. कौनकौर्ड स्कैवायर वह जगह है जहां लुई 16वें और उस की पत्नी मैरी एंटोनिएट के सिर काटे गए थे. लुई की तानाशाही से फ्रांस की जनता बहुत दुखी थी और मैरी से तो सब घृणा करते थे. एक तो वह आस्ट्रिया के राजपरिवार की बेटी थी और दूसरे बहुत ही फुजूलखर्च, घमंडी और बेवकूफ थी.
जब उसे यह बताया गया कि उस के राज्य में लोगों के पास खाने को रोटी नहीं है और वे भूखों मर रहे हैं, तो उस बेवकूफ औरत का जवाब था, ‘‘उन के पास रोटी नहीं है तो वे केक क्यों नहीं खा लेते?’’ इस से पहले से ही गुस्साई जनता और भड़क गई और उन दोनों को पकड़ कर उन्होंने मार दिया. इस प्रकार कौनकौर्ड स्क्वायर फ्रांस की क्रांति का प्रतीक बना. जब हम लूव्र म्यूजियम पहुंचे तो उस के सामने बना कांच का विशाल पिरामिड देखा.
यह म्यूजियम कई वजहों से खास है. पहला, यह पूरे संसार के कुछ सब से बड़े म्यूजियमों में से एक है. इस के बारे में कहा जाता है कि अगर आप यहां की हर कलाकृति को सिर्फ 4 सैकंड के लिए देख कर आगे बढ़ जाएं तो भी आप को पूरा म्यूजियम देखने के लिए 3 महीने का समय चाहिए. दूसरा, मोनालिसा, वर्जिन औफ द रौक्स और हम्मूराबी की आचा रसंहिता जैसी अनेक विश्व प्रसिद्ध कलाकृतियां यहीं पर हैं, जिन्हें देखने विश्व के कोनेकोने से लोग आते हैं. मोनालिसा की पेंटिंग के आगे जब हम खड़े हुए तो उस की भव्यता देख कर समझ आया कि सारी दुनिया उस की दीवानी क्यों है. लेखक डैन ब्राउन की बहुचर्चित पुस्तक ‘द डा विनची कोड’ में इस म्यूजियम का बहुत ही मनोरंजक चित्रण किया गया है. यह हमारी पेरिस यात्रा का अंतिम पड़ाव था और यहां से वापस होटल जाते समय पेरिस घूमने की खुशी थी तो जल्दी वापस जाने का गम भी. सपनों के शहर पेरिस का यह ट्रिप हमें हमेशा याद रहेगा.