हवाईयात्रा के दौरान कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन से सामान्यतया हम अनभिज्ञ रहते हैं. ये बातें पायलट या फ्लाइट अटेंडैंट हमें नहीं बताते हैं. उदाहरणस्वरूप, ऐसी कुछ बातें निम्न हैं :

– इमरजैंसी में पायलट अपनी खिड़की के रास्ते बाहर निकल सकता है.

– पायलट के लिए ऊपर के कंपार्टमैंट में रस्सी भी होती है. कमर्शियल वायुयान में पैराशूट या इजैक्शन सीट नहीं होती है. पायलट को जब पता चलता है कि अब जहाज का बचना असंभव है और यह क्रैश होने जा रहा है तो फिर भी वह जहाज को बचाने के लिए अंत समय तक पूरी कोशिश करता है.

– पायलट पर एक तरह से दबाव रहता है कि ईंधन जरूरत से ज्यादा न रखा जाए क्योंकि ऐक्स्ट्रा ईंधन के बोझ को ले कर उड़ने में ज्यादा ईंधन की खपत भी होती है. खराब मौसम या इमरजैंसी में अचानक नजदीकी हवाईअड्डे पर उतरने का विकल्प संभव होता है, इसलिए जरूरत से ज्यादा ईंधन न रख कर एक तरह से बचत करते हैं.

– ‘वाटर लैंडिंग’ ऐसी कोई चीज नहीं है, इसे ‘ओशन क्रैशिंग’ कहा जाता है. दरअसल, इसे डिचिंग कहते हैं जब इमरजैंसी में जहाज को पानी में उतारा जाता है.

– जहाज के उड़ते समय या जमीन पर उतरते समय लाइट को धीमी रखने का निर्देश दिया जाता है. ऐसा इसलिए कि फ्लाइट अटेंडैंट इमरजैंसी में ठीक से बाहर देख सके कि किस तरफ के आपातकालीन द्वार से विमान को खाली कराना सही होगा.

– विमान का एक इंजन फेल होने पर पायलट विमान को लैंड करा सकता है और अकसर इसे तकनीकी समस्या बताते हैं. यहां तक कि इस की भनक कभी फ्लाइट अटेंडैंट को भी नहीं लगती जब तक कि धुआं या आग की लपटें न दिखाई दें.

– पायलट ठीक से सो नहीं पाते या 2 उड़ानों के बीच सोने का समुचित अवसर नहीं मिलता, फिर भी वे चेहरे पर मुसकान बनाए रखते हैं ताकि यात्री और फ्लाइट अटेंडैंट सहज रहें.

– यदि पायलट फ्लाइट अटेंडैंट को बैठने के लिए कहते हैं तो अकसर इस का अर्थ है कि आगे वायुमंडल में तूफान या उथलपुथल है.

– चाय या कौफी के लिए भी पानी उसी टंकी से आता है जिस से शौचालय में सप्लाई होता है और इस पानी में बैक्टीरिया नौर्मल पानी की तुलना में कई गुणा ज्यादा होते हैं.

– पायलट्स कौकपिट में अपनी टोपी नहीं पहनते हैं.

– पायलट्स को अपनी पढ़ाई और ट्रेनिंग पर लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं.

– विमान सीधे रनवे पर लैंड नहीं करता बल्कि कुछ दूर हवा में रहने के बाद ही धरती को छूता है. लैंडिंग के समय पिछला चक्का ही पहले धरती को छूता है.

– कभीकभी कौकपिट में लैपटौप, सैलफोन या अन्य कारणों से पायलट का ध्यान हट जाता है और विमान अपने गंतव्य से आगे निकला जाता है.

– विमान अपने पीछे आकाश में लंबे बादल की पूंछ छोड़ता जाता है उसे कौंट्रेल कहते हैं.

– कभी वायुयान का वैस्ट वाटर वायुमंडल में लीक कर जाता है और यह बर्फ बन जाता है जिसे ब्लू आइस कहते हैं. यह जहाज के नीचे अकसर चिपका रह जाता है. इस का ब्लू रंग इस में मिले कीटनाशक के कारण होता है. कभीकभी लैंडिंग के समय जब यह बर्फ बाहर की गरम हवा के संपर्क में आती है तो पिघल कर धरती पर गिरती है. ऐसी कई घटनाएं रिहायशी इलाकों में हुई हैं जिन से घरों की छतों को काफी नुकसान हुआ है.

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