हाल के एक अध्ययन में पाया गया है कि जिन लोगों को अपने दफ्तर में काम करने के लिए अपना एक केबिन मिला होता है,वे लोग उन लोगों के मुकाबले अपनी जॉब से कहीं ज्यादा संतुष्ट होते हैं,जिन्हें सार्वजनिक रूपसे यानी खुले हाल में दूसरों के साथ वर्किंग टेबल साझी करनी पड़ती है.ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे परफोर्मेंस और सेटिस्फेक्शन पर हमारी निजता का भी बहुत असर होता है.किसी कामकाजी शख्स की पर्सनैलिटी को दफ्तर में उसके कामकाज की स्थितियां भी बहुत प्रभावित करती हैं.कामकाज की ये स्थितियां ही तय करती हैं दफ्तर में उसकी बेचैनी और नौकरी के संबंध में उसकी संतुष्टि.

यही वजह है कि आज की तारीख में तमाम कम्पनियां ऐसे कार्यस्थल निर्मित कर रही हैं, जहां न तो काइयां बॉस की हर समय चिक चिक सुनाई पड़ती है न ही सिरदर्द बना टारगेट का दबाव सर पर सवार रहता है. इन दफ्तरों में उस तथाकथित दफ्तरी राजनीति के भी दर्शन नहीं होते. ये बिल्कुल सकारात्मक किस्म के दफ्तर हैं. ये ऐसे कार्यस्थल हैं जहां रोज समय से पहले जाने का मन करता है और यहां से देर से निकलने का मन करता है. वर्क कल्चर बहुत तेजी से बदल रही है. इन दिनों तमाम बड़ी कंपनियों का जोर इस बात पर है कि उनके यहां काम करने वाले कर्मचारी कैसे ज्यादा से ज्यादा खुश और संतुष्ट रहें. हालांकि अभी ये ऐसी कम्पनियों से ज्यादा नहीं हैं जहां काम करना तनाव और दबाव का सबब होता है. ऐसे में ये भाग्यशाली कर्मचारी अपने दफ्तर को जन्नत कहते हैं तो क्या बुरा कहते हैं? बेशक ये कंपनियां भी अपने कर्मचारियों को तमाम वेतन और सुविधाएं उन्हीं से कमाकर मुहैय्या कराती हैं. इनके लिए भी इनका क्लाइंट बिना शक सबसे ऊपर है, लेकिन इनकी नजरों में इनका एम्प्लॉयी भी नीचे नहीं हैं. ये वे कंपनियां हैं जो क्लाइंट और एम्प्लॉयी के बीच एक खास तरह का संतुलन बनाती हैं.

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कुछ महीनों पहले एक कारोबारी अखबार ‘इकनॉमिक्स टाइम्स’ और ग्रेट प्लेसेज टु वर्क इंस्टिट्यूट ने मिलकर ‘बेस्ट कंपनीज टु वर्क फॉर 2015’ नाम की एक स्टडी की है. इस स्टडी से पता चलता है कि पिछले 5 साल से अपने कर्मचारियों की निगाह में काम करने के लिहाज से जन्नत नंबर -1 रही गूगल इंडिया अब इस पोजीशन में नहीं रही. इसे पछाड़कर अब काम के लिए जन्नत का पहला खिताब आईटी कंपनी आरएमएसआई ने हासिल कर लिया है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गूगल इंडिया की वर्क कल्चर बदल गयी है. यह कम्पनी अब भी मैरियट होटल्स, अमेरिकन एक्सप्रेस और सैप लैब्स इंडिया के साथ देश के कर्मचारियों के लिहाज से देश की सबसे अच्छी पांच कम्पनियों में शामिल है. यह सर्वे 20 अलग अलग क्षेत्रों की 700 कंपनियां के करीब 1.8 लाख एम्प्लौयी से राय पूछने के आधार पर हुआ है.

इस सर्वे में पहला स्थान हासिल करने वाली कम्पनी के चेयरमैन और एमडी राजीव कपूर के मुताबिक हमारे पास कोई सीक्रेट नहीं पहला नंबर हासिल करने के सिवाय इसके कि हमारे लिए अपने क्लाइंट के जितने ही हमारा एम्प्लौयी महत्वपूर्ण है उसके इथिकल वैल्यूज महत्वपूर्ण हैं. हमने काम के अपने अनुभव से सीखा कि हमें कौन-सी वैल्यूज को अपनाना चाहिए और उन्हें लागू कैसे किया जाए ? वास्तव में बहुत तेजी से जो कम्पनियां एम्प्लौयी फ्रेंडली हो रही हैं वो पुराने घिसे पिटे बोझिल नियमों को अलविदा कर रही हैं. घंटों-घंटों की कॉन्फ्रेंस कॉल, मीटिंग्स, लम्बे लम्बे ईमेल्स. ये सब उबाऊ और तनावदायक कॉरपोरेट कल्चर का अहम हिस्सा हैं. इन्हें ये कम्पनियां धीरे धीरे अलविदा कह रही हैं.

एम्प्लाॅयी फ्रेंडली कम्पनियां कम्युनिकेशन के नए और आसान तरीके ढूंढ़कर उन्हें अपनाने की हिम्मत दिखा रही हैं. जो एम्प्लॉयी के लिए एनर्जी बूस्टर भी साबित होते हैं. सैकंड रैंक गूगल इंडिया की हेड ऑफ पीपल ऑपरेशंस जयश्री राममूर्ति का कहना है, ‘दिखने में भले न लगे लेकिन बड़ी कम्पनियों में एक खास किस्म की आंतरिक नौकरशाही का जाल बिछ होता है हम तेजी से इस पर काम करके अपनी कंपनी को इससे मुक्त कर रहे हैं. जिससे कि अहम फैसले लेने में देरी न हो’.

गूगल ने अपने कर्मचारियों से भी कहा है कि जरूरत से ज्यादा नियम, गाइडलाइंस और पॉलिसी की वजह से होने वाली दिक्कतों को वो सामने लाएं और उन्हें दूर करने के लिए सुझाव भी दें. इसके साथ साथ यहां एक ऐसी मानव संसाधन व्यवस्था भी लागू की जा रही है जिसमें कोई कर्मचारी अपने सहकर्मी के परफॉर्मेंस का आकलन भी कर सकेगा. ये सब ऐसे कदम हैं जिससे कम्पनी के भीतर व्यवहारिक और वास्तविक तरीके से लोकतंत्र लागू किया जा सके.

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किसी कम्पनी में कितनी उदारता से कर्मचारियों के हितैषी नियम लागू किये जा सकते हैं, यह उस कम्पनी का अपनी महिला कर्मचारियों के प्रति नजरिए को देखकर पता चलता है. सैप इंडिया लैब्स के वीपी (एचआर) भुवनेश्वर नाइक कहते हैं, ‘हमारी प्लैनिंग है कि 2017 तक हमारे यहां मैनेजमेंट पोजिशंस पर 25 फीसदी महिलाएं हों. इसके लिए महिला कर्मचारियों को प्रोत्साहन देने के साथ ही साथ उन्हें सशक्त बनाकर किया जा रहा है. आमतौर पर महिलाओं को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव दी जाती हैं, लेकिन हमने अपने यहां उन्हें 20 हफ्ते की लीव किया है.’ अपने कर्मचारियों के साथ हर संकट में खड़ी रहने वाली कम्पनियों के भी बहुत सकारात्मक अनुभव हैं. आरएमआई की वीपी (एचआर) गगनज्योत के मुताबिक, ‘2011 के बाद हमारी कंपनी में काफी बदलाव हो रहे थे. मैनेजमेंट ट्रांसफर हो रहा था. कंपनी की हालत अच्छी नहीं थी. उन्हीं दिनों एक शाम कुछ कर्मचारी मेरे पास आए और बोले, हमें नहीं पता कि अगले महीने की सैलरी हमें कब मिलेगी या नहीं मिलेगी  लेकिन हमें यह पता है कि हम इस कंपनी को छोड़कर नहीं जा रहे हैं. कंपनी को इस संकट से निकालने में हम जी-जान लगा देंगे. हमारे लिए वह गर्व का पल था. हमारे 90 फीसदी कर्मचारी उस मुश्किल दौर में हमारे साथ थे और आज भी हैं. यह अपने कर्मचारियों के साथ कंपनी की बॉन्डिंग का ही प्रतिफल था.’

जो कार्यस्थल जन्नत होते हैं काम वहां भी होता है और उन कार्यस्थलों से ज्यादा होता है जो जहन्नुम होते हैं. फिर भी सबको जन्नत में काम करना नसीब नहीं होता.

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