सुचिता मिश्रा…
‘अभी ज़िंदा है मां मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा, मैं घर से जब निकलता हूं, दुआ भी साथ चलती है’ ये लाइन बेशक मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने लिखी है, लेकिन चरितार्थ हर एक बच्चे पर होती है. वाकई बच्चे के साथ एक मां का रिश्ता कुछ ऐसा ही होता है. दूर रहकर भी मां हमेशा बच्चे की तरक्की की दुआ करती है. अपने सपनों को वो अपने बच्चों में पूरा करती है. रहन-सहन, खाना-पीना, उठना-बैठना, तौर तरीके सिखाने वाली पहली टीचर मां ही तो होती है. मैं खुद भी जैसे जैसे बड़ी हुई, अपने जीवन को संभालना सीखा और मां से दूर होकर जब ससुराल आई तो हर कदम पर महसूस किया कि मेरे साथ न होने के बावजूद मेरी मां हमेशा मेरे साथ रही, क्योंकि वो मेरे अंदर बसती है.
पहली टीचर मां…
मुझे याद है स्कूल में दाखिला लेने से पहले हाथ में पेंसिल थमाने वाली मेरी मां ही थी और उन्होंने सबसे पहले मुझे जीरो बनाना सिखाया था. छोटा ‘अ’ बनाना जब सिखाती थी तो कहती थी कि पहले एक चूल्हा बनाओ, फिर मिलाकर दूसरा चूल्हा बनाओ, अब थोड़ी दूर एक लाइन खींचो. अब इस लाइन के बीच से एक और लाइन खींचकर दोनों चूल्हों के बीच में मिला दो. मां के निर्देशों के अनुसार जब मैं टेढ़ा मेढ़ा अक्षर बनाती थी, तो मां खुश होकर मेरी पीठ थपथपाती थी और जोर से बोलती थी “शाबाश” और मैं खुश हो जाती थी. आज जब किसी बच्चे को मैं इस तरह से पढ़ाती हूं तो मुझे मेरी मां याद आती है.
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जब उल्टे हाथ से खाना खाती थी, तो मां सीधे हाथ से खाकर बताती थी, जब बगैर चप्पल के दौड़ लगाती थी, तो मां चप्पल पहनने के लिए समझाती थी और जब तेज धूप में खेलने जाती थी तो मां की जोर से आवाज आती थी, चलो अंदर, शाम को खेलना. आज जब किसी बच्चे को ये सब सिखाती हूं तो मुझे मेरी मां याद आती है.
जब घंटों टीवी देखती थी तो मां होमवर्क के बारे में पूछती थी, खाना न खाउं तो मां दुलार करके खिलाती थी, जब दर्द हो मुझे तो मां रात भर नहीं सोया करती थी, जब मैं खिलखिलाउं तो मां खुद खिल जाया करती थी, जरा सा सुस्त नजर आउं तो मां बुरी नजर उतारा करती थी, जब बात न मानूं मां की, तो मां रूठ भी जाया करती थी. आज जब किसी मां को ऐसा करते देखती हूं तो मुझे मेरी मां याद आती है.
धीरे धीरे जब बड़ी हुई तो मां मेरी सहेली बन गई. अपनी तमाम बातों को मां मझसे बांटा करती थी. जो वो न कर पाई वो मुझे कराया करती थी, मैं जब भी किसी इम्तहान के लिए जाउं तो पास होने की दुआ करती थी, तकलीफों में डगमगाउं तो दिलासा देकर संभाला करती थी. आज जब मैं ये सब करती हूं तो मुझे मेरी मां याद आती है.
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किसी परेशान को देखकर मां दयावान हो जाती थी, जो भी पास में होता, सब समेट लाती थी. खुद भले न खाए लेकिन सबको प्यार से खिलाती थी. आज जब किसी के लिए वो दयाभाव मुझमें आता है तो मुझे मेरी मां याद आती है.
शादी करके जब ससुराल आई तो पहली बार खीर पकाई. सबको अच्छी लगी तो कहा मां ऐसे बनाती थी. जब सब्जी बनाती हूं तो हल्दी, नमक, मिर्च, मसाला सब उसी मां की तरह डालती हूं. जब कोई तारीफ करता है, तो मुंह से मां का नाम अपने आप निकल आता है.
ये तो चंद चीजें हैं जो आज मुझे याद आ गयीं और न जाने कितना कुछ है जो मुझमें मेरी मां का दिया हुआ है और जीवन भर मेरे साथ रहेगा. धीरे धीरे समय ने मुझे ये महसूस कराया कि आज मैं जो भी हूं, उसमें मेरी मां का बहुत बड़ा योगदान है. मां बेशक मेरे साथ रहे या न रहे, लेकिन वो मेरी आदतों में बसती है. मेरी मां हर पल मुझमें बसती है.
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