मां का दिल महान: क्या हुआ था कामिनी के साथ

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धर्मणा के स्वर्णिम रथ: क्या हुआ था ममता के साथ

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सास भी कभी बहू थी: सास बनकर भी क्या था सुमित्रा का दर्जा

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असुविधा के लिए खेद है: भाग 4- जीजाजी को किसके साथ देखा था ईशा ने

जाने जीजी के मन में क्या था. उस ने इन्हीं दिनों सेल्विना को अपना और तनय का वीडियो भेज कर अपने घर बुला लिया. वह भी उस वक्त जब तनय जीजी के साथ था.

सेल्विना का रोतेराते बुरा हाल था. वह लौट गई. सुबह तनय सेल्विना के पास वापस नहीं

लौट सका.

तनय समझ गया था कि वह सेल्विना को खो चुका है. जीजी ने उसे समझ लिया कि

जीजी तनय को हमेशा के लिए अपना बनाना चाहती है, इधर डेढ़ महीना होने को आया था- मम्मीपापा को बिहार के पास रखे हुए. अब जल्दी नतीजे पर पहुंचना जरूरी था. आखिर सेल्विना कौन थी? क्यों जीजी ने उस की जिंदगी उजाड़ी? तनय ही क्यों?

मैं ने अनादि को एक कौफी शौप में बुलाया. उस से कहा, ‘‘क्या तुम भी इस गेम में उतर रहे हो अनादि?’’

‘‘ऐसा क्यों लगा तुम्हें?’’

‘‘फिर ये सब क्या है? चाहने की बात क्यों करने लगे.’’

‘‘इस में बुराई तो कुछ नहीं न. हमउम्र हैं दोनों और दोनों की आय भी अच्छी है, दोस्त भी हैं. मैं तुम्हें पसंद भी करता हूं.’’

‘‘और मैं? पूछोगे नहीं या जरूरी नहीं है?’’

‘‘प्लीज बताओ.’’

‘‘बताऊंगी. पहले मेरे लिए हमारे इस काम को खत्म करो.’’

‘हांहां क्यों नहीं.’’

‘‘चलो फिर सेल्विना के स्कूल.’’

स्कूल पहुंच कर सेल्विना हमें नहीं मिली तो एक बच्चे की मदद से पास ही उस के फ्लैट में पहुंचे. शाम के 5 बज रहे थे. सेल्विना ने दरवाजा खोला तो पूरे घर में अंधेरा पसरा था. खिड़कीदरवाजे सब बंद. सेल्विना एक स्लीवलैस औफ व्हाइट बनियान फ्रौक में बड़ी मुरझई सी लग रही थी. ब्रेकअप का दर्द साफ था उस के चेहरे पर.

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सेल्विना हमें ड्राइंगरूम में ले गई. हम ने अपना परिचय देकर अपनी

मंशा जताई. उस ने पूरी जानकारी देने का वादा किया. मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हारे बौयफ्रैंड का नाम

तनय है?’’

‘‘हां.’’

‘‘कब मिली थी उस से?’’

‘‘लगभग 3 साल पहले. मैं रशिया के समारा शहर की लड़की हूं, सौतेले पिता के 2 बेटों की मुझ पर बुरी नजर थी, मैं वहां से अमेरिका चली गई पढ़ने. वहां तनय मिला मुझे.

‘‘उसे ग्राफिक्स कंपनी में जल्द नौकरी

मिल गई. हमारी आपस में बौंडिंग अच्छी हो गई थी. पेंटिंग्स का वह दीवाना था और अपनी ग्राफिक्स डिजाइनिंग में मुझ से आइडिया लेता रहता था.’’

‘‘तनय का बैकग्राउंट बताओ. कहां का है व कहां से पढ़ा है?’’

‘‘वे लोग कोलकाता से हैं… ये असल में राजस्थान के लाला हैं.’’

‘‘हमारे रिश्तेदार भी हैं कुछ जिन की लाला में शादी हुई थी. पढ़ा कहां से है?’’

‘‘मुंबई.’’

‘‘इस के पिता का नाम हरिनाथ और मां का नाम सुभागी है?’’

‘‘हां ऐसा ही कुछ है.’’

‘‘तनय तो तुम्हारे ही साथ रहता है, उस की मां कहां है?’’

‘‘यहां से पास ही है उन लोगों का घर. वह शाम को नौकरी के बाद वहां जाता था, कभीकभी मैं भी.’’

‘‘सेल्विना तनय का कोई पुराना सर्टिफिकेट है तुम्हारे पास जिस में उस के पिता का नाम

दर्ज हो?’’

सेल्विना ने अलमारी से एक फाइल निकाल कर दिखाई.

हां, यह तो वही शख्स है जिस पर जीजी ने बदले का प्रण किया था यानी हमारी नानी के चचिया सास की बेटी के बेटे यानी हमारी नानी की चचेरी ननद के बेटे यानी हमारे चचेरेफुफेरे मामा तनय लाला.

धन्य हो जीजी. तुम्हारे बदले की भावना हम सब को कहां ले कर गई. अब और तुम क्या करने वाली हो. तुम ने तो बदले की भावना से न सिर्फ सेल्विना और तनय को बरबाद किया, बल्कि और भी कई लोगों को उलझया. अब और क्या हासिल करना चाहती हो?’’

सेल्विना ने ही बताया कि जीजी तनय से पहले ही से जुड़ी थी, बाद में तनय ने सल्विना से जोड़ा जीजी को. मगर तनय धीरेधीरे जीजी के जाल में कब फंस गया, खुद ही नहीं समझ पाया.

हम सेल्विना को मदद का वादा कर बाहर आ गए. अनादि से मैं ने पूछा ‘‘क्या अब तुम्हें मेरी मदद करने के लिए किसी शर्त की जरूरत पड़ेगी?’’

‘‘नहींनहीं पड़ेगी, मेरी कोई शर्त भी नहीं है, यह तो तुम्हारी इच्छा पर है कि तुम मेरी बनना चाहोगी या नहीं.’’

‘‘तो पहले एक निर्दोष का दुख दूर करें, उस के बाद दूसरी बातें.’’

‘‘जी आज्ञा,’’ अनादि मुसकराया.

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मैं अनादि के फ्लैट में रहने चली गई. अनादि मुझ से चाबी ले कर मेरे घर पहुंच कर मेरे कमरे में जा कर सो गया. तनय सुबह वहीं से औफिस के लिए निकल गया. सभी यही समझते रहे कि बंद कमरे में मैं हूं.

जीजी अभी नहा कर निकली थी और वह टौवल लपेटे थी. अनादि कमरे से निकला. जीजी उसे सामने देख अचंभित हो गई.

अनादि उसे आगे कुछ समझने का मौका दिए बिना मेरे कमरे में खींच ले गया. अनादि अपने शिकार को काबू में करता हुआ धीरेधीरे उसे इस तरह तैयार कर चुका था कि वह  खुद शिकारी बन जाए.

गोरी रंगत का नया लड़का, जीजी खुद पर काबू नहीं रख पा रही थी जो उठ कर इस का विरोध करे.

आधे चंद्रमा के सामने जब आधी रात

जीजी तड़प उठी तो उस ने खुद ही यह बीड़ा उठा लिया.

अनादि इसी इंतजार में था. सतर्कता से रखे कैमरे को अनादि ने अब औन कर लिया था.

मैं ने अनादि से क्षमा मांगी और उस के पैन में लगे कैमरे में कैद दृश्यों को देखा और उन्हें अपने फोन में लिया. मेरा काम बन गया था.

सेल्विना और निहार को वे वीडियो भेजे और नोट लिखा, ‘‘बुराई को फांसा गया है, अब न्याय होगा.’’

मैं ने सेल्विना से संपर्क किया और कहा, ‘‘जल्द ही तुम्हें तुम्हारा प्यार वापस मिलेगा. तनय का फोन नंबर दो.’’

उस ने तुरंत दिया और मैं ने तनय से उस के औफिस में लंच के समय मिलने का तय किया.

मैं ने जीजी, उस के और हमारे बीच के परिचय सूत्र

और बदले के इतिहास का पूरा विवरण दे डाला. इस के साथ ही जीजी के साथ उस का वीडियो उसे यह कह कर दिखाया कि यह जीजी ने तुम्हारे विरुद्ध इस्तेमाल के लिए दिया था. किस तरह जीजी उस की मेहनत की कमाई लूट रही थी, याद दिलाया और अंतत: जीजी और अनादि का वीडियो यह कह कर दिखाया कि कैमरा मैं ने अपने कमरे में पहले से लगा रखा था. मुझे जीजी पर बिलकुल भी भरोसा नहीं था.

तनय खूबसूरत तो था, लेकिन वाकई कुछ नासमझ था.

वह डर गया, ‘‘यह औरत मेरे औफिस तक न आ जाए.’’

‘‘तुम अपने फोन की सिम बदल लो, साथ ही अपने बौस से मिला दो मुझे, तुम किस कदर मुश्किल में फंसे हो, वह भी पहले की किसी गलती के बिना, उन्हें समझ दूंगी. फिर तुम पर आंच नहीं आएगी.’’

तनय ने हमारे सामने सेल्विना से माफी

मांग ली. सेल्विना ने भी अपने प्यार को माफ  कर नया जीवन शुरू करने का ठान लिया. अब बारी थी निहार और अनादि की. अनादि के दिल में अब तूफान मचा था. चौंतीस साल के निहार

जिम और डायट कंट्रोल से छब्बीस के लग रहे थे. मैं ने मम्मीपापा और निहार को जीजी का

1-1 कारनामा बताया.

कहा मैं ने, ‘‘जीजी के अविकसित दिमाग में बदला, ईर्ष्या और वासना का अजब तालमेल है. इसलिए वह जिंदगी से तालमेल नहीं बैठा पाई. जो जैसा है उसे उस का प्रतिफल मिलता ही है. यही न्याय है. न्याय अपनापराया नहीं देखता और उसे देखना भी नहीं चाहिए.’’

अनादि अपनी बात के लिए चंचल हो

रहा था.

मैं ने अनादि से कहा, ‘‘अनादि तुम ने जो हमारे लिया किया, वह पूरी तरह निस्वार्थ था. किसी न किसी रूप में हम सब का स्वार्थ जुड़ा था. एक तुम ही ऐसे थे, जिन्हें इस केस से कुछ भी लेनादेना नहीं था. तुम्हारे लिए जो भी मेरे मन में है निहार से कहना जरूरी है.’’

मैं ने देखा उन दोनों की सांसें लगभग रुक चुकी थीं.

मैं ने निहार से कहा, ‘‘अनादि अब मेरा बहुत अच्छा दोस्त है और निहार, शादी के बाद…’’ मैं जानबूझ कर रुक गई थी.

निहार का चेहरा देखने लायक था, पर अनादि का सताना सही नहीं था. मैं बोल पड़ी, ‘‘शादी के बाद हम अनादि के लिए दुनिया की सब से अच्छी लड़की मिल कर

ढूंढ़ेंगी निहार. निहार की रुकी हुई सांसें जैसे चल पड़ी थीं.

‘‘ईशु,’’ निहार के मुंह से निकला.

अनादि उठ कर निहार से गले मिला. फिर मुझ से और निहार से संपर्क में रहने की बात कह वह चला गया. उधर तनय और सेल्विना की शादी में जीजी को छोड़ सभी उपस्थित थे.

जीजी को मम्मीपापा ने अपने गहनों और रुपयों से कुछ हिस्स देकर बाहर का

रास्ता दिखा दिया. जीजी के असामाजिक कृत्यों की वजह से जल्द ही निहार को जीजी से डिर्वोस मिल गया और मैं निहार की बन गई हमेशा के लिए. जीजी दिल्ली चली गई थी और वहीं एक स्कूल में नौकरी कर ली थी.

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दिल्ली से एक दिन जीजी का मुझे संदेश आया, ‘‘उम्मीद नहीं थी तू मुझे धोखा दे कर जड़ से काट फेंकेगी.’’

मैं ने उसे कोई जवाब नहीं दिया. मन ही मन मथ रही थी मैं कि बदले की आग में इंसान खुद तो जल मरता है, दूसरों को भी अकारण जला देता है. अब अगर बुराई को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए मैं ने धोखा दिया तो दिया… जीजी, इस असुविधा के लिए खेद है, पर अफसोस नहीं.

असुविधा के लिए खेद है: भाग 3- जीजाजी को किसके साथ देखा था ईशा ने

आखिर वह कौन था? सेल्विना का बौयफ्रैंड? मगर क्यों? कनैक्शन क्यों जमा आखिर? अचानक अंधेरे में रोशनी की तरह अपना नेपाली दोस्त अनादि याद आया, कालेज में 3 साल हम अच्छे ही दोस्त थे. अब वह कोलकाता में ही रहता है और सिक्यूरिटी गार्ड सप्लाई संस्थान चलाता है. बैचलर है, घरपरिवार का झंझट नहीं, मेरी मदद कर पाएगा.

हमारे कालेज के वाल्सअप गु्रप में हम सभी जुड़े हैं और इस लिहाज से उस के बारे में थोड़ीबहुत जानकारी मुझे थी. शाम के 6 बज रहे थे. मैं चल पड़ी उस के ठिकाने की ओर.

पहली मंजिल में उस का औफिस और दूसरी मंजिल में उस का घर था.

वह औफिस में ही मिल गया मुझे.

मुझे देख वह इतना खुश हुआ कि मुझे कुछ हद तक यह भी लगा कि मैं पहले ही इस से अपनी दोस्ती जारी रख सकती थी.

थोड़ी देर की बातचीत और कुछ स्नैक्सकौफी के बाद मैं मुद्दे पर आ गई. मैं ने उस से कहा, ‘‘अनादि, बात उतनी खतरनाक न सही, चिंता वाली तो है. मैं प्रोफैशनल तरीका अपना कर ज्यादा होहल्ला नहीं मचाना चाहती. बस जीजी की खुराफात बंद हो. मैं जानती हूं उस में बदले की भावना बचपन से ही कुछ ज्यादा है. अगर किसी पर उस ने टारगेट बना लिया तो उस की खैर नहीं.’’

मैं ने अपनी शादी और उस लड़के के इनकार की घटना बताई ताकि कुछ सूत्र मिल

सके अनादि को. सारी बातें सुन कर उस की दिलचस्पी जगी, कहा, ‘‘चलो कुछ तो खास

करने का मौका मिला वरना यह बिजनैस ऊबाने वाला है.’’

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‘‘देखो, हमारे पास 2 पौइंट हैं. एक बदला जीजी का, दूसरा जीजू से पीछा छुड़ा कर किसी सुंदर लड़के के प्रेम में पड़ कर अपनी जिंदगी को अपनी मरजी से जीना, तो इन 2 बातों में से कौन सी के लिए जीजी इतनी डैस्परेट है?’’

‘‘आज रात को वह सेल्विना के बौयफ्रैंड को बुला रही है. सेल्विना के स्कूल में जीजी पेंटिंग्स सिखाती है.’’

‘‘बाप रे काफी मसले हैं. हमें क्या

करना है?’’

‘‘समस्या यह है कि जीजी के पास उस वक्त कैसे पहुंचा जाए जब जीजी का बुलाया व्यक्ति वहां मौजूद हो क्योंकि मुझे घर में

देखते ही वह पैतरा बदल देगी और विश्वास में

न लूं तो गेम डबल कर के मुझे उलझएगी.

बेहतर यही होगा कि उसे विश्वास दिलाया जाए कि हम से उसे कोई खतरा नहीं. तो एक बात

हो सकती है तुम मेरे बौयफ्रैंड बन कर मेरे साथ घर चलो.

‘‘जीजू के घर मम्मीपापा को छोड़ जब आ रही थी तो  तुम से मुलाकात हुई और कालेज के दिनों से मुझ से प्रेम करने वाले तुम अब मुझे पा कर खोना नहीं चाहते, जीजी हमारी शादी में मदद करे, मम्मीपापा और रिश्तेदारों को समझने में मदद करे. तो हम भी उन की करतूतों पर आंख मूंदे ही साथ रहे हैं,’’ मैं ने प्लान बताया जो जीजी से कहना था.

‘‘ऐसा क्या?’’ नेपाली बाबू ने मेरी ओर बड़ी गहरी दृष्टि डाली.

मुझे कुछ अटपटा लगा. फिर भी मैं ने

सहज रह कर बाकी बातें पूरी की, ‘‘जब

जानेगी कि हमें उस की जरूरत है तो वह हमारा भी फायदा उठाना चाहेगी, और वक्तवक्त पर हमें भी अपनी कारगुजारियों से अनजाने ही अवगत करा देगी. इस के लिए वह कुछ हद तक हमारी ओर से निश्चिंत रहेगी. वह मेरे इस प्रेम वाले कमजोर पक्ष की वजह से मेरी ओर से लापरवाह हो जाएगी क्योंकि उसे लगेगा कि अब मैं ही

खुद अपनी जरूरत के लिए उस के सामन

झकी रहूंगी.’’

अनादि सामान्य दिख रहा था. बोला, ‘‘ग्रेट आइडिया, लैट्स प्रोसीड.’’

रात 9 बजे जब मैं और अनादि घर पहुंचे अपनी चाबी से दरवाजा खोल हम अंदर गए, जीजी के कमरे में लाइट जल रही थी. दोनों बिस्तर पर व्यस्त थे.

लड़का मेरी ही उम्र का लगभग 27 के आसपास, गोरा स्मार्ट और बहुत खूबसूरत था.

हम ने अपना वीडियो कैमरा औन कर लिया.

हमें प्रमाण चाहिए था और इस के लिए ग्रिल वाली खिड़की और परदे की आड़ हमारे लिए काफी थी. जीजी बीचबीच में लड़के से बातें भी करती जाती.

‘‘सेल्विना को वापस जाने को कब कहोगे?’’

‘‘रहने दो न उसे, बेचारी का बहुत पैसा लगा है स्कूल में.’’

‘‘तो मैं तुम्हें कैसे पा सकूंगी. शादी कैसे होगी हमारी?’’

‘‘तुम बड़ी हो उस से 4 साल, मां नहीं मानेगी.’’

‘‘अच्छा तो सिर्फ  मजे के लिए मैं?’’ जीजी होश खो रही थी.

जीजी ने आगे कहा, ‘‘और वह नैकलैस लाए?’’

‘‘हां.’’

‘‘हीरे की लौकेट वाला न?’’

‘‘हां बाबा.’’

‘‘कल, 20 हजार ट्रांसफर करने को बोला था बैंक में. किए?’’

‘‘करता हूं.’’

‘‘अभी करो.’’

‘‘इतनी जल्दी क्या है?’’

‘‘फिर इस वीडियो को देखो, सेल्विना तो क्या हर जगह पहुंच जाएगा. अच्छा लगेगा?

तुम्ही बताओ?’’

तनय वीडियो देख कर तनाव में आ कर उठ बैठा, ‘‘तुम मुझे ब्लैकमेल कर रही हो?’’

‘‘नहीं तनय. मैं तो बस सावधान कर रही हूं, सुख मुझे अकेले नहीं मिल रहा है, तुम्हें भी मिल रहा है, तो कुछ तो चुकाओगे न?’’

तनय ने मोबाइल से तुरंत रुपए ट्रांसफ र कर दिए. जीजी शातिर गेम खेल सकती है, मैं जानती नहीं थी. मैं उलझती ही जा रही थी.

हम ने कैमरा बंद कर दरवाजा खटखटाया. दोनों संभल गए. कुछ देर बाद जीजी ने कमरे का दरवाजा खोला.

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हम ने अपनी तय बातें उन के सामने रखीं. जैसाकि पहले से मालूम था वह भी इसी शर्त पर हमारी शादी में मदद को राजी हुई कि घर पर वे कुछ भी करें, हम उस के मामले में न दखल दें, न ही किसी से कुछ कहें.

हम ने उस का आभार माना और अपने कमरे में चले आए. 10 मिनट में अनादि चला गया. तनय भी थोड़ी देर बाद चला गया.

जीजू यानी निहार का संदेश मिला, ‘‘कब आओगी ईशा? साथ ही फोटो भी लाना. वाकई, जीजू ने कमाल किया. बेहद स्मार्ट और स्लिम हो गए. सच प्यार में बड़ी शक्ति है. उन की तसवीर देख चकित थी.’’

पता कर लिया था कि उन्होंने पार्कस्ट्रीट की एक कालोनी में सेल्विना के साथ मिल कर फ्लैट खरीदा था और सेल्विना के साथ तब तक लिवइन में था, जब तक न सेल्विना को भारतीय नागरिकता मिले और उस से कानूनी प्रक्रिया के तहत शादी हो जाए.

अनादि ने मुझे पता करने को कहा कि जीजी का इस तनय के साथ पहले से फेसबुक और चैटिंग का कोई रिश्ता है क्या?

जीजी से यह पूछने की फिराक में थी कि अनादि का संदेश आया, ‘‘ईशा क्या

मेरी बनोगी? बड़ा मिस करने लगा हूं यार तुम्हें.’’

‘‘यह क्या? जीजी के केस के बीच यह नया गेम क्या है?’’

5 फुट 7 ईंच का अनादि देखनेभालने में गोरा, सीधा, सरल नेपाली नहीं. कहती कि मुझे

5 फुट 7 ईंच की हाइट की लड़की के साथ बिलकुल नहीं जमेगा. लेकिन मैं तो…

मैं मन ही मन झल्ला गई. पर कोई जवाब नहीं दिया. क्या पता नहीं क्यों उसे दुखी कर

पाई. उस का हंसता सा चेहरा मेरी आंखों के आगे घूम गया.

आगे पढें- तनय समझ गया था कि वह ..

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असुविधा के लिए खेद है: भाग 1- जीजाजी को किसके साथ देखा था ईशा ने

‘‘मेरीनानी की चचिया सास की बेटी के बेटे ने मेरी बहन से शादी करने को इनकार किया? मेरी बहन से? क्या कमी है तुझ में? मैं उसे छोड़ूंगी नहीं. मैं ने कहा था इस रिश्ते के लिए. मुझे मना करेगा? 2-4 बार उस से इस बाबत पूछ क्या लिया, कहता है कि आप मेरे

पीछे क्यों पड़ी हैं? उस की इतनी हिम्मत?

मुंबई पढ़ने गया था तो प्राइवेट होस्टल में रहने के लिए कैसे मेरी जानपहचान का फायदा लिया.

अब विदेश में नौकरी हो गई, अच्छी सैलरी

मिल गई तो मेम भा रही है उसे. मुझे इनकार. बताऊंगी उसे.’’

‘‘अरे जीजी छोड़ न. मुझे ऐसे भी पसंद नहीं था वह. तुम भी तो हाथ धो कर उस के पीछे पड़ी थी, सभ्य तरीके से मना करने के बाद भी जब तुम साथ नहीं रही थी, तभी उस ने कहा ऐसा. बात समझेगी नहीं तो क्या करे वह और तब जब पहले से ही वह किसी के प्यार में है. अब तो मैं ने भी जौब जौइन की है, कहां उस के साथ विदेश जाऊंगी. फिर मांपिताजी की तबीयत भी ऐसी कि उन्हें अकेला छोड़ा न जाए.’’

‘‘तू चुप कर. रिश्ता सही था या नहीं यह अलग बात है, पर मेरी बात को वह टालने वाला होता कौन है? आज तक किसी ने बात नहीं

टाली मेरी.’’

‘‘अरे जीजी गुस्सा क्यों होती है जब मुझे करनी ही नहीं थी शादी?’’

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‘‘तु चुप करे. एक मेम के लिए मुझे ‘न’ कहा. मैं छोड़ूंगी नहीं उसे और तेरे लिए तो कभी लड़का न देखूं. कुंआरी ही रह.’’

‘‘दीदी क्यों खून जलाती है अपना? देखो 30 साल की उम्र में ही तुम कितनी चिड़चिड़ी

हो गई हो. वीपी हाई हो जाएगा. बीमार पड़ोगी

तो कंसीव नहीं कर पाओगी. जीजू कुछ कहते नहीं तुम्हें?’’

‘‘तु चुप कर. क्या कहेगा वह? उस की मम्मीपापा के भरोसे चलती थी उस की जिंदगी, अब दोनों गए ऊपर तो मेरा ही मुंह ताकता है. औफिस से घर और घर से औफिस, आता ही क्या है उसे? मुझे कहेगा?’’

जीजी को लगता कि दुनियाजहान का सारा भार जीजी के ही कंधों पर है. पहले हम दोनों

का साझ कमरा था. 3 साल हुए इधर जीजी की शादी हुई और दादादादी भी इहलोक सिधार गए. तब से उन लोगों का कमरा जीजी के नाम किया गया है.

ज्यादातर जीजी अपने भोलेभाले जरा गोलमटोल पति को रसोइए के जिम्मे छोड़ यहां आ जाती. यहां हम सब पर राज करने की पुरानी आदत उस की गई नहीं थी. जीजी के कमरे से फोन पर बात करने की आवाजें आ रही थीं.

‘‘क्यों, छोड़े क्यों? ऐसे ही छोड़ दें? निकालती हूं हवा उस की.’’

उधर शायद जीजी की वह सहेली थी जिन के पति वकील थे. बात नहीं बनी शायद. जीजी ने फोन रख दिया.

बड़ी उतावली हो वह ऐसे किसी सज्जन

को ढूंढ़ रही थी जो जीजी की बात न मान कर जीजी को अपमानित करने वाले दुर्जन की हवा निकाल सके. कौन मिलेगा ऐसा. जीजी सोच में पड़ी थी.

मैं जीजी के कमरे में गई. उसे शांत करने का प्रयास किया, ‘‘जीजी, यह कोई इशू नहीं

है, तुम ईगो पर क्यों लेती हो? तुम अब इस प्रकरण को बंद करो. मुझे नहीं करनी थी कोई शादी… अभी बहुत जल्दीबाजी होगी शादी की बात करना.’’

‘‘मत कर शादी. मैं तेरे लिए लड़ भी नहीं रही. मेरी बात टाल जाए, मुझ से ही काम निकाल कर वह भी विदेशी मेम के लिए? यह गलत है. मैं होने नहीं दूंगी.’’

‘‘बड़ी अडि़यल और बेतुकी है जीजी.’’

‘‘हूं. तुझे उस से क्या तू अपने काम से

काम रख.’’

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इस के 2 दिन बाद शाम को जीजी अपना फोन लाई. मुझ से कहा इन तसवीरों में सब से अच्छी वाली कौन सी है?

‘‘क्यों?’’

‘‘तु बता न.’’

‘‘यह वाली. मगर यह तो 4 साल पुरानी तसवीर है, करोगी क्या इस का?’’

‘‘एक दूसरी एफबी प्रोफाइल खोल कर उस में मेरी सारी पुरानी पेंटिंग्स डालूंगी.’’

‘‘अरे वाह. सच जीजी. यह हुई न बात. यह प्लान बढि़या है.’’

जीजी ने नया प्रोफाइल खोला और अपनी पुरानी पेंटिंग्स की तसवीरें खींच कर उस में डालती रही. वैसे समझ नहीं पाईर् कि पेंटिंग्स पुराने एफबी प्रोफाइल में क्यों नहीं डालीं? जीजी को यहां आए 20 दिन तो हो ही चुके थे. जीजू के लिए हम सब को चिंता होती. वहां अकेले उन्हें दिक्कत होती थी. लेकिन जीजी से इस बारे में कुछ कहो तो उस का उत्तर होता, ‘‘हांहां, मैं तो हूं ही पराई. अब तू ही यहां राज कर. यहां रहने के खर्च देने पड़ेगा क्या? यह मेरा भी घर है. मेरा इस पर हक है.’’

महीनाभर हो गया तो जीजू ही आ गए. मुहतरमा ने वापस जाने को ठेंगा दिखा दिया. जीजू वापस चले गए. जीजी को लगातार फोन पर व्यस्त देखती. कोलकाता के जिस मार्केटिंग एरिया में हम रहते हैं वहां शाम होते ही बाजार और दुकानों में गहमागहमी रहती है. पहले जीजी के  साथ अकसर मैं भी मार्केटिंग को निकला करती थी. लेकिन अब तो जीजी का फोन ही सबकुछ था. कुछ दिनों बाद जीजी ने निर्णय सुनाया कि वह एक जगह पेंटिंग्स सिखाने को जाना चाहती है. कह दिया और शुरू हो गई.

जीजू के लिए वाकई मैं चिंतित थी. एक सीधासरल इंसान इस तरह बेवजह रिश्ते की उलझन में फंस जाए. अफसोस की बात थी. जीजू को एक दिन मैं ने फोन किया और उन से जीजी के बारे में बातें कीं.

‘‘मैं क्या कह सकता हूं? मेरी बातों को वह मानती नहीं, न ही इन 3 सालों में उस का अपनों से कोई लगाव देखा.

‘‘दुनिया रुकती नहीं है ईशा, मेरी भी दुनिया चल रही है. उसे मेरी फिक्र नहीं है… कुछ बोलूं तो खाने को दोड़ती है…’’

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जीजी पार्क स्ट्रीट के ड्राइंग पेंटिग स्कूल में क्लास लेने जाने लगी थी. जीजी ने एक विदेशी बाला से मिलवाया. 26-27 की होगी. गोल्डन बालों में वह एशियन लड़की भारतीय सलवार सूट बड़े शौक से पहने थी.

जीजी ने इंग्लिश में परिचय कराया तो रशियन लड़की मुझ से गले मिली. फिर उस ने टूटीफूटी हिंदी में जो भी कहा उस का सार यही था कि वह अपने होने वाले पति के लिए सब छोड़ आईर् थी. लड़का अभी कोलकाता के किसी मल्टीनैशनल ग्राफिक्स डिजाइनिंग ऐंड कंपनी में काम करता है.

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यह क्या हो गया: नीता की जिद ने जब तोड़ दिया परिवार

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जिद: भाग 2- क्या परिवार से हटकर चंचल कुछ सोच पाई

लेखिकारिजवाना बानो ‘इकरा’

चंचल को अपनी इन खयालों की दुनिया से बाहर ले कर आई शिशिर की आवाज, “चंचल, मां बुला रही है, ड्राइंगरूम में, जल्दी आओ.“

यह सुन कर चंचल का दिल जोरों से धड़कने लगा कि अब खैर नहीं. डिनर का वक्त तो टल गया, लेकिन अब पक्की तरह से क्लास लगेगी.

ड्राइंगरूम में पहुंच कर देखा तो सब शांत था यानी कि कोई और बात है, चलो अच्छा हुआ.

मिसेज रस्तोगी ने बिठाया दोनों बहुओं को और अपने फौरेन टूर के बारे में बताने लगीं. इस बार रक्षाबंधन पर उन का यूरोप घूमने का प्लान है, अपनी दोनों बेटियों और दोनों बेटों के साथ. दोनों बहुओं को इस के एवज में छूट दी गई थी कि वो एक हफ्ता अपने पीहर रह कर आ सकती हैं, चाहें तो…

चंचल की आंखों में चमक आ गई, जैसे कि मांगी मुराद मिल गई हो, बल्कि उस से ज्यादा. अब वो आकांक्षा के साथ कितना सारा वक्त बिता पाएगी. बाकी घर वालों को उस की खुशी का राज समझ नहीं आ रहा था, लेकिन चंचल बहुत खुश थी.

आखिरकार रक्षाबंधन का समय भी आ गया. इधर, सुहाना और आशु खुश थे कि एक सप्ताह ननिहाल में धमाल मचाएंगे. तो उधर, चंचल के मन में भाई के साथसाथ आकांक्षा से मिलने की बेचैनी. चंचल के मातापिता तो तब से अपने नातीनातिन को खिलाने को बेताब थे. सालभर में, एक रक्षाबंधन पर ही चंचल घर आती थी और वो भी सिर्फ एक दिन के लिए, आज पूरे सप्ताह के लिए आ रही थी.

शनिवार का दिन त्योहार में गुजर गया, अगला दिन इतवार था, आकांक्षा को भी औफिस से फुरसत थी और चंचल को भी, अपने ससुराल की ड्यूटी से. आकांक्षा के घर मिलना तय हुआ. सुबहसुबह, 11 बजे ही चंचल को भाई आकांक्षा के यहां छोड़ आया.

घंटी बजाते ही उस की आवाज गूंज गई, चारों तरफ.

‘‘आ रही हूं…‘‘

दरवाजा खुलते ही चंचल का मानो सपना टूट गया, इतनी कमजोर सी, बीमार सी आकांक्षा. गले लगाते ही आंसू आ गए उस के, ‘‘क्या हाल बना लिया है अपना तू ने, ये हड्डियांहड्डियां क्यों निकाल रखी हैं? बीमार है क्या?‘‘

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आकांक्षा हंसते हुए बोली, ‘‘जैसे, तू खुद बड़ी मुटा गई हो. किधर से दो बच्चों की मां लग रही हो तुम? चल अब अंदर भी आ… सारी चिंता चैखट पर ही कर लोगी क्या?‘‘

घर छोटा सा था आकांक्षा का, लेकिन एकदम रौयल सजा हुआ था. ‘‘तो मैडम को अब महंगी चीजों का शौक भी हो चला है…हम्म…‘‘

‘‘ये सब तो पंकज की पसंद है, शादी के बाद कहां अपना कुछ बच ही जाता है. जो पतिदेव चाहें, बस वही सत्य है.‘‘

आकांक्षा की आंखों में उदासी देख, चंचल ने बात पलटी, ‘‘और बच्चे? बच्चे कहां हैं? वो तो पतिदेव को पसंद हैं या वो भी नहीं?‘‘

‘‘चल तू भी न, देख तेरे फेवरेट वाले दालपकौड़े बनाए हैं. चाय बस बन ही रही है.‘‘

‘‘बन क्या रही है चाय? 8 साल बाद मिलेंगे तो तू मेहमान की तरह चाय पिलाएगी मुझे? तू तो वैसे भी मेरे हाथ की चाय की दीवानी है.‘‘

अब दोनों सहेलियां किचन में हैं और चंचल चाय बना रही है.

‘‘चंचल, तुझे याद है वो मीनाक्षी…?‘‘

‘‘हां, वही मौडल मीनाक्षी न, जिस को सजनेसंवरने से फुरसत नहीं होती थी. हां याद है. हमारी तो कभी बनी ही नहीं थी उस से. वो कहां मिल गई तुझे?‘‘

‘‘मैड़म, सच में मौडलिंग कर रही है. पिछले महीने मैगजीन में उस का फोटो देखा तो आंखें खुली रह गईं. उस ने जो चाहा पा लिया. एक बड़ा नाम है मौडलिंग की दुनिया में वो आज.‘‘

‘‘वाअव… अच्छा है, किसी को तो कुछ मिला.‘‘

‘‘तुम्हें भी तो शिशिर मिल ही गया, क्यों? नहीं मिला क्या?‘‘ आकांक्षा की शरारत शुरू हो चुकी थी.

शिशिर के नाम पर चंचल आज भी झेंप सी गई. चायपकौड़े ले कर दोनों रौयल बैठक में आ कर बैठ गए. चाय पीते हुए चंचल ने फिर आकांक्षा से पूछा, ‘‘अब बता भी… बच्चे कहां हैं? दिख ही नहीं रहे. दादादादी के पास हैं? या सुबहसुबह खेलने निकल लिए.‘‘

इतनी देर से इधरउधर की बातें करते हुए आखिरकार आकांक्षा की आंख में आसूं आ गए.

‘‘आकांक्षा… अक्कू… क्या हुआ बच्चे? बता… सब ठीक है न? तेरी आंख में आंसू, मतलब बहुत बड़ी बात है.‘‘

गले लगा कर चंचल ने फिर से कहा, ‘‘अच्छा सब छोड़, पहले शांत हो जा तू. मेरी अक्कू रोते हुए बिलकुल अच्छी नहीं लगती.‘‘

चंचल ने नाक खींची, तो आकांक्षा के चेहरे पर भी मुसकान आ गई. अब दोनों सहेलियां बिना कुछ बोले, चाय पीने लगीं. चंचल ने अब कुछ नहीं पूछा. वो आकांक्षा को जानती है. कुछ समय ले कर वो खुद बता देगी कि क्या बात है.

‘‘बच्चे नहीं हैं चंचल, नहीं हैं बच्चे,‘‘ फिर से रो पड़ी आकांक्षा.

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‘‘ठीक है बाबा, नहीं हैं तो आ जाएंगे. वादा, अब दोबारा नहीं पूछूंगी. तू रो मत बस यार.‘‘

‘‘पंकज को अपना स्टेटस बनाना है. वो हमारी मिडिल क्लास वाली जिंदगी से बिलकुल खुश नहीं हैं. 8 साल हो गए शादी को, इन्हें लगता है, जिंदगी बस महंगी चीजों के पीछे भागने का नाम है.‘‘

एक गहरी सांस ले कर आकांक्षा ने कहा, ‘‘पता नहीं किस की बराबरी करना चाहते हैं. यह घर मुझे अपना घर लगता ही नहीं है. ब्रांडेड और महंगी चीजें बस, मेरी सादगी कहीं पीछे छूट गई है. पहननाओढ़ना, सब उन्हीं के हिसाब से होना चाहिए.‘‘

‘‘अब जब घर में लगभग हर सामान अपनी मरजी का खरीद चुके हैं तो अब इन्हें एक विला खरीदना है. जब तक इतना पैसा जमा नहीं कर लेंगे, विला खरीद नहीं लेंगे, तब तक कुछ और सुध नहीं लेनी.‘‘

‘‘आज संडे भी औफिस गए हैं. मेरी सरकारी नौकरी है. सो, मुझ पर बस नहीं चलता इन का, नहीं तो संडे भी औफिस भेज दें मुझे ये.‘‘

‘‘तुम्हारी बातों से ऐसा लग रहा है अक्कू, मानो मशीन हो तुम दोनों. और इसीलिए पंकजजी बच्चे नहीं चाहते हैं? एम आई राइट?‘‘

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जिद: भाग 1- क्या परिवार से हटकर चंचल कुछ सोच पाई

लेखिकारिजवाना बानो ‘इकरा’

‘‘हैलो चंचल, मैं… आकांक्षा बोल रही हूं.‘‘

‘‘आकांक्षा… व्हाट ए बिग सरप्राइज… कैसी है तू? तुझे मेरा नंबर कहां से मिला? और कहां है तू आजकल?‘‘

‘‘अरे बस… बस, एक ही सांस में सारे सवाल पूछ लेगी क्या? थमो थोड़ा, और यह बताओ कि रक्षाबंधन पर घर आ रही हो न इस बार? ससुराल से एक दिन की एक्स्ट्रा छुट्टी ले कर आइएगा मैडम… कितनी सारी बातें करनी हैं…‘‘

एक्स्ट्रा छुट्टी के नाम पर थोड़ा सकपकाते और तुरंत ही खुद को संभालते हुए चंचल बोली, ‘‘बड़ी आई छुट्टी वाली… मैडम, आप हैं नौकरी वालीं… हम तो खाली लोग हैं… ये बताइए, आप को कैसे इतनी फुरसत मिल जाएगी. आखिरी बार ज्वाइन करते समय काल की थी. तब से मैडम बस नौकरी की ही हो कर रह गई हैं.‘‘

‘‘चल झूठी, तेरे घर शादी का कार्ड भिजवाया था, तुझे ही फुरसत नहीं मिली.‘‘

‘‘हम्म… तब नहीं आ पाई थी मैं. ये बता कि अभी कहां है?‘‘

‘‘पिछले हफ्ते ही नासिक ज्वाइन किया है और फ्लैट भी तेरी कालोनी में ही मिल गया है. कल शाम को ही अंकलआंटी से मिल कर आई हूं और नंबर लिया तेरा. मुझ से नंबर मिस हो गया था तेरा और तुझ से तो उम्मीद रखना भी बेकार है.‘‘

कभी एकदूसरे की जान के नाम से फेमस लड़कियां 8 साल बाद एकदूसरे से बात कर रही हैं.

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चंचल की शादी के बाद आकांक्षा ने सरकारी नौकरी की तैयारी की. सालभर बाद ही नौकरी लग गई और उस के सालभर बाद शादी.

आकांक्षा की शादी का कार्ड तो मिला था चंचल को, लेकिन शादी में जाने की परमिशन नहीं मिल पाई थी, ससुराल से.

‘‘अच्छा अब सेंटी मत हो, औफिस वाले हंसेंगे मेरी बोल्ड आकांक्षा को ऐसे देखेंगे तो.‘‘

‘‘हां यार, चल रखती हूं फोन. मिलते हैं… हां… छुट्टी ले लियो ससुराल से देवी मां, नहीं तो पिटाई होगी तुम्हारी, बता दे रही हूं. चल बाय… आ गया खड़ूस बौस‘‘

‘‘बाय… बाय,‘‘ हंसते हुए फोन कटा, तो चंचल ने देखा कि सासू मां पीछे खड़ी हैं और उन के चेहरे पर सवालिया निशान हैं. कपूर की तरह जिस गति से हंसी चेहरे से गायब हुई, उस से अधिक गति से चंचल रसोई में चली गई. सासू मां की चाय का वक्त था ये और चाय में 5 मिनट की देरी हो चुकी थी.

‘मांजी को ये लापरवाही बिलकुल भी पसंद नहीं. पता नहीं, अब क्याक्या सुनना पड़ेगा? मुझे भी न, ध्यान रखना चाहिए था, ऐसा भी क्या बातों में खो जाना,‘ खुद को मन ही मन डांटते हुए चंचल फिर से आकांक्षा की बात याद करने लगी, ‘‘पिटाई होगी तुम्हारी… बता दे रही हूं.‘‘

‘‘बिलकुल नहीं बदली है ये लड़की,‘‘ आखिर मुसकराहट आ ही गई चंचल के चेहरे पर.

चंचल को पता है कि आकांक्षा न तो एक दिन की एक्स्ट्रा छुट्टी ले सकती है, न ही मिलनामिलाना होगा. लेकिन फिर भी वो बहुत खुश है, 10 साल साथ गुजारे हैं चंचल और आकांक्षा ने, स्कूलकालेज, होमवर्क, ट्यूशन, क्लास बंक, लड़कों से लड़नाझगड़ना, क्याक्या नहीं किया है दोनों ने साथ? सारी यादें एकदम ताजा हो गई हैं.

यही सब सोचतेसोचते चंचल सासू मां को चाय पकड़ा आई.

डिनर का समय आसानी से कट गया, बिना किसी शिकवाशिकायत के. चंचल को उम्मीद थी कि बहुत जबरदस्त डांट पड़ेगी और शिशिर भी गुस्सा करेगा. पिछली बार जब छोटे बेटे आशु ने सोफा गीला कर दिया था तो कितनी आफत आ गई थी, याद कर के ही रूह कांप गई चंचल की.

देखा जाए तो चंचल की शादी आकांक्षा के मुकाबले बड़े खानदान में हुई थी. साउथ दिल्ली की बड़ी सी कोठी, हीरों के व्यापारी रस्तोगीजी, सारे शहर में उन का बड़ा नाम, रस्तोगीजी के छोटे और स्मार्ट बेटे शिशिर ने जब चंचल को पसंद किया तो बधाइयों का तांता लग गया था चंचल के घर.

चंचल के भी अरमान पंख लगा कर उड़ने लगे थे. उम्र ही ऐसी थी वो और शिशिर चंचल को भी पहली ही नजर में पसंद आ गए थे. इधर शिशिर के घरपरिवार में भी चंचल की खूब चर्चा थी. चंचल की सुंदरता भी कालेज की सारी लड़कियों को मात देती थी. साथ ही साथ पढ़नेलिखने में इतनी तेज, फाइनेंस से एमबीए किया है. और क्या चाहिए था, रस्तोगियों को अपनी बहू में.

शादी की तैयारियां और इतना अच्छा रिश्ता मिलने की खुशी के बीच, चंचल को भी अपनी जौब का खयाल नहीं आया. उसे शिशिर से बात कर के लगा नहीं कि उन्हें कभी कोई इशू होगा इस से. आकांक्षा ने 1-2 बार कहा कि उसे बात करनी चाहिए शिशिर से, तो चंचल ने बात भी की.

शिशिर ने उसे पूरा विश्वास दिलाया कि किसी को कोई समस्या नहीं है, वो जो चाहे करे.

शादी के 3-4 महीने बाद वहीं दिल्ली में कर लेना जौब एप्लाई. और तुम हो भी इतनी क्वालीफाइड… तुम्हें कौन मना करने वाला है जौब के लिए? मेरी चंचल को तो यों ही मिल जाएगी जौब, चुटकी में,” सुन कर शर्म से चेहरा लाल हो गया था चंचल का इस तारीफ पर.

रस्मोरिवाज और घूमनेफिरने में दिन पंख लगा कर उड़ गए. शादी के 3 महीने बाद चंचल ने अपनी सासू मां से बहुत आराम से बात की, ‘‘मांजी, अब तो सारी रस्में, घूमनाफिरना, सब हो चुका आराम से. मैं जौब के लिए एप्लाई कर देती हूं.‘‘

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सासू मां ने बड़ी कुटिल मुसकान के साथ जवाब दिया, ‘‘आराम से तो होगा ही बहूरानी… शिशिर के पापा ने इतना बड़ा बिजनेस किस के लिए खड़ा किया है? अपने बच्चों की खुशियों के लिए ही न.”

जौब के लिए उत्तर न मिलता देख चंचल ने आगे कहा, ‘‘जी, मांजी, मैं जौब के लिए अब एप्लाई कर ही देती हूं. मन नहीं लगता मेरा भी सारा दिन घर में.‘‘

इस बार, सासू मां का पारा सातवें आसमान पर था, लगभग चिल्लाते हुए शिशिर को आवाज लगाई, ‘‘शिशिर… ओ शिशिर, मैं ने मना किया था न इतनी ज्यादा पढ़ीलिखी लड़की के लिए. तुझे ही पसंद थी न, ले अब, जौब करनी है इसे… संभाल ले इसे और न मन लगे इस का तो छोड़ आ उसी 2 बीएचके में. वहीं मन लगता है इस का.‘‘

शिशिर सिर झुकाए खड़ा रहा और चंचल को अंदर जाने का इशारा किया.

चंचल के जाने के बाद शिशिर बोला, ‘‘मां, समझा दूंगा मैं उसे, आप नाराज न होइए. दोबारा जबान नहीं खोलेगी वह आप के सामने.‘‘

अंदर जाते ही अब शिशिर को चंचल पर चिल्लाना था, ‘‘क्या जरूरत है तुम्हें जौब करने की? क्या कमी है इस घर में? इतनी बड़ी कोठी की रानी हो तुम, रानी बन कर रहो. क्या तकलीफ है तुम्हें?

‘‘और मां… उन के सामने किसे जबान खोलते हुए देखा तुम ने, जो इतना बोलती हो? मिडिल क्लास से हो कर भी संस्कार नाम की कोई चीज नहीं है तुम में.‘‘

शिशिर को इतना गुस्से में देख, अपनी पढ़ाई पर गर्व करने वाली, अपने चुनाव पर गर्व करने वाली चंचल सहम गई. उस दिन के बाद से उस ने जौब का दोबारा नाम नहीं लिया.

मां ने शिशिर को समझा दिया था, ‘‘जल्दी बच्चेवच्चे कर लो. ज्यादा फैमिली प्लानिंग के चक्कर में न पड़ना. बहू का मन घरगृहस्थी में उलझना भी जरूरी है.‘‘

देखते ही देखते चंचल एक प्यारी सी बेटी सुहाना और एक शैतान से बेटे आशु की जिम्मेदार मां बन गई.

अब चंचल के पास इतना भी समय नहीं होता कि वो खुद पर या खुद से जुड़ी किसी भी बात पर ध्यान दे सके. धीरेधीरे हालात ऐसे हो गए कि चंचल को अपने लिए चप्पल खरीदनी हो या बच्चों के लिए डाइपर, सासू मां से पूछे बिना नहीं ले सकती थी. घर में आने वाली सूई से ले कर सैनिटरी पैड्स तक पर उन की नजर रहती हमेशा. कुछ अपने मांबाप की इज्जत, कुछ अब बच्चों की चिंता, चंचल ने अपनी इस नियति को स्वीकार कर लिया है.

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असुविधा के लिए खेद है: भाग 2- जीजाजी को किसके साथ देखा था ईशा ने

पहले जब वह अमेरिका पढ़ने गई थी तो इस लड़के से प्रेम हुआ. लड़के के

पिता जब बाद में चल बसे और लड़के की मां ने उसे यहां बुलावा भेजा तो लड़की ने भी लड़के के साथ आने का मन बनाया.

इस रशियन लड़की सेल्विना दास्तावस्की की मां नहीं रही. सौतेले पिता हैं, अब उस का यह ब्रौयफ्रैंड ही सबकुछ है. सेल्विना की आंखों में एक मधुर संभाषण और बालसुलभ कुतूहल देखा मैं ने. वाकई वह बहुत प्यारी और निश्चल थी. मुझे भा गई थी.

रात को जीजी घर आई तो मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘अचानक कैसे वहां ड्राइंग सीखने जाने लगी? कैसे पहचान हुई सेल्विना से तुम्हारी?’’

‘‘फेसबुक के मेरे नए प्रोफाइल पर.’’

‘‘तुम ने भेजी थी रिकवैस्ट?’’

‘‘तुझे क्या करना किस ने भेजी?’’

‘‘जीजी तुम सारी चीजों में उलझ कर रह गई, लेकिन जीजू के बारे में बिलकुल नहीं सोच रही. आखिर चाहती क्या हो? जीजू अकेले

क्यों रहें?’’

‘‘मैं ने उन से कहा तो है कोलकाता ट्रांसफर करा लें. नहीं, अपनी पैत्रिक संपत्ति छोड़ कर किराए के मकान में आना नहीं चाहते. मैं क्यों नहीं बड़े शहर में रहूं. पर तू यह बता तुझे क्यों इतनी फिक्र हो रही जीजू की?

‘‘जीजी.’’

‘‘चुप कर. ढीलेढाले पाजामे को मेरे गले बांध दिया. सभी ने मिल कर.. बैंक की नौकरी है… वह कोई मर्द है?’’

जीजी की बातें बड़ी चकित करने वाली थीं. मैं रात तक बेचैन रही.

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वे मुझ से स्नेह रखते थे. जीजू की लाचारी मुझे खलने लगी. मैं ने उन्हें एक के बाद एक कई संदेश भेजे ताकि उन की खैरियत पता चल सके. कोई उत्तर न मिला मुझे तो मैं ने फोन मिला दिया. फोन उठाया गया, लेकिन कुछ पल कानाफूसी सी आवाजें आने के बाद फोन कट गया.

मुझे ऐसा क्यों लगा कि उस वक्त ऐसा कुछ था जो न  होता तो अच्छा था. कल की सुबह शनिवार की थी. जीजी अपना भलाबुरा समझ नहीं पा रही थी, मैं तो समझती थी. औफिस से

2 दिन की छुट्टी लेने की ठान मैं

सो गई.

कोलकाता से बस में 4-5 घंटे लगते थे जीजू के शहर पहुंचने में. रात को पहुंची तो मेन गेट खुला था.

बरामदे में पहुंच मैं ने दरवाजे पर हाथ रखा तो अंदर से बंद था. मुझे लग रहा था कोई दिक्कत जरूर है. मेरी छठी इंद्री ने काम शुरू किया और मैं ने बगीचे की तरफ खुल रही बैडरूम की खिड़की से हाथ अंदर कर धीरे से परदा हटा कर झंका.

दृश्य ने मुझे सदमे में डाल दिया. जीजू और उन की रसोई बनाने वाली रीना बिस्तर

पर साथ. यह क्या किया जीजू तुम ने. मुझे बहुत दुख हुआ. अभिमान और व्यथा से मैं तड़पने लगी. पर क्यों? क्या जीजी के लिए या और कुछ? मैं बरामदे में आ कर बैठ गई. क्या मैं माफ  कर दूं जीजू को? करना ही पड़ेगा. ठगा गया इंसान जीने की सूरत ढूंढ़ रहा है, थोड़ी देर में दरवाजा खोल रीना निकली. मुझे देख उस का चेहरा सफेद पड़ गया. किसी तरह नमस्ते किया और सरपट निकल गई.

मुझे देख जीजू सकपका गए. अपना सिर नीचे कर लिया. मैं अभी कुछ कहती कि वे

बोल पड़े, ‘‘ईशा, मैं तुम्हारे परिवार का गुनहगार हूं. प्रभा को कितने संदेश भेजे… न ही जवाब दिया, न ही आई. मुझ से अकेलापन बरदाश्त नहीं हो रहा था. रीना के पति का शराब पीपी कर लिवर खराब हो गया है, उसे पैसों की जरूरत

थी. सच तो यह है कि हम दोनों ही कंगाली में थे. वह गरीब है, दुखी है, मैं ने उसे संभाला, उस ने मुझे.’’

यथासंभव खुद के साथ लड़ते हुए मैं ने उन का हाथ अपने हाथों में लिया, ‘‘क्या फिर भी आप ने यह ठीक किया? जीजी को छोड़ो, कभी भी आप ने मुझे जानने की कोशिश नहीं की.’’

जीजू उम्मीद भरी आंखों से मुझे देखने लगे.

‘‘क्या कोई 10 बार यों ही किसी को संदेश भेजता है? आप के लिए शरीर ही सबकुछ है? मेरा संदेश आप की खैरियत के बारे में होता है, लेकिन इस के पीछे की कोई बात…’’

जीजू ने मेरे होंठ अपने होंठों से सिल दिए.

‘‘मैं कल्पना कैसे करूं कि आसमान का सूरज आ कर कहे कि मैं सिर्फ तुम्हारा हूं,’’

जीजू ने कहा मैं अपने आप को रोक नहीं पाई.

उन के गले लग पड़ी. और हम भावनाओं में, अनुभूतियों में, प्रेम के आकंठ अणृतवर्षा में डूब चुके थे.

‘‘ईशा. क्या सच ऐसा कभी हो सकेगा कि तुम हमेशा के लिए मेरी हो जाओ?’’

‘‘और रीना?’’ मैं ने छेड़ा.

‘‘कभी नहीं, विदा कर दूंगा उसे, माफ कर दो मुझे.’’

‘‘फिर तो यह आप पर है. लेकिन मैं मोटा जो हूं? तुम इतनी स्लिम और सुंदर?’’

‘‘उफ्फ. आप का यह भोलापन, सादगी, मेरी जान लेगा. कौन कहता है आप मोटे हो. बस इतने मोटे हो कि तीन महीने की जिम ट्रेनिंग और डायट सही कर आप बिलकुल फिट लगोगे. और वो सारा कुछ मैं इंतजाम करवा दूंगी.’’

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‘‘शुक्रिया मेरे तनमनधन से तुम्हारा शुक्रिया. मैं विश्वास नहीं कर पा रहा हूं कि कंगाल को राजपाट मिल गया है.’’

आज जीजू और मैं दोनों हवा से हल्के और समुद्र से भी गहरे हो गये थे.

जब लोटी तो देखा कि चार दिनों में ही जीजी में और भी बदलाव दिखे. अब वह बिलकुल मौर्डन स्टाइलिश लड़की थी, साड़ी से तो अब दूरदूर का नाता नहीं था. उस का घर आते ही अपने स्मार्टफोन में बिजी हो जाती. उस के बदलाव में कुछ और भी बात थी.

मैं ने जीजू यानी निहार से बात की और अपने मम्मीपापा को कुछ दिनों के लिए वहां छोड़ आई. तीनों को आपस में साथ रह कर एकदूसरे को समझने समझने का मौका मिले और इधर जीजी के दिमाग में शतरंज के प्यादे किसकरवट बैठ रहे हैं उस का भी मैं पता लगा पाऊं.

मम्मीपापा को निहार के पास छोड़ने जा रही थी तो जीजी से अपनी वापसी का जो दिन बताया था, उस के एक दिन पहले ही पहुंच गई मैं घर. घर की चाबी मेरे पास भी थी. मैं अंदर पहुंची तो आशा के मुताबिक जीजी फोन पर किसी से लगी पड़ी थी, ‘‘आज ही मिलो, तुम्हारी सेल्विना के साथ मैं लगभग गृहस्थी ही बसा चुकी. तुम जानते हो पेंटिंग्स की वजह से मैं तुम से जुड़ी, तुम पेंटिंग्स ग्राफिक्स का काम करते हो, और कहा भी था तुम ने कि तुम मेरे लिए वे सबकुछ करोगे जिस से मेरी पेंटिंग्स को पहचान मिले. लेकिन तुम ने तो मुझे गर्लफ्रैंड के हवाले कर दिया और भूल गये. क्या मैं तुम्हारी कुछ

भी नहीं.

‘‘कुछ भी नहीं सुनूंगी आज. मैं तुम्हें बुरी तरह मिस कर रही हूं, कल ईशा आ जाएगी वापस. आज रात सेल्विना को कोई बहाना बता कर मेरे पास आओ.’’

सारी बातें सुन कर फिर मेन दरवाजा बंद कर मैं बाहर आ गई.

आगे पढें- हमारे कालेज के वाल्सअप गु्रप में …

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