मां का दिल महान: भाग 3- क्या हुआ था कामिनी के साथ

अगले दिन नाश्ता करने के बाद शुचि रम्या के घर जा पहुंची. द्वार खोलते ही उसे देख कर चौंक गई थी रम्या.

‘‘मांजी की तो तबीयत ठीक नहीं है. मैं ने सोचा मैं ही तुम्हारी सहायता कर दूं,’’ शुचि सोफे पर पसरते हुए लापरवाही से बोली.

‘‘क्या कह रही हो, तुम? आज औफिस नहीं जाना क्या?’’ रम्या चौंक कर बोली.

‘‘आज छुट्टी ले ली है मैं ने. पड़ोसियों के लिए इतना त्याग तो करना ही पड़ता है. सोचा, पहले तुम्हारा हाथ बंटा दूं, उस के बाद हम सब का घूमने जाने का कार्यक्रम है. चलो बताओ, क्या करना है? मेरे पास अधिक समय नहीं है,’’ शुचि बोली.

‘‘काम तो बहुत सारा है. दहीबड़े बनाने हैं. खट्टीमीठी दोनों तरह की चटनी बनानी हैं. कचौड़ी बनाने की तैयारी भी करनी है. तुम्हें आता है ये सब?’’

‘‘पहले ही कहे देती हूं. मांजी की तरह कुशल नहीं हूं मैं. वैसे भी थोड़ा जल्दी थक जाती हूं.’’

‘‘तुम चिंता मत करो, मैं सब संभाल लूंगी.’’

‘‘कैसी बातें कर रही हो? पड़ोसी धर्म भी कोई चीज होती है. पर पहले थोड़ी चाय तो बनाओ. क्या है न, बिना पैट्रोल के गाड़ी चलती नहीं है,’’ शुचि बेबाकी से हंस दी.

‘‘अभी बना देती हूं. हम दोनों ने भी चाय कहां पी है. पलक को ट्यूशन के लिए भेज कर अभी जरा सा समय मिला है. अभी तक सुषमा भी नहीं आई है. हर रोज तो 7 बजे तक आ जाती थी,’’ रम्या चाय बनाने की तैयारी करते हुए बोली.

‘‘इन कामवालियों के संबंध में तो कुछ न कहना ही अच्छा है. इन्हें कुछ भी दो पर इन का मुंह तो कभी सीधा होता ही नहीं,’’ रम्या अब भी केवल अपनी कामवाली सुषमा को कोस रही थी.

‘‘तो काम शुरू करें,’’ चाय के कप उठाते हुए रम्या बोली.

‘‘अवश्य, पर यह तो बताओ कि तुम मुझे दोगी क्या?’’ शुचि पूछ बैठी.

कुछ देर के लिए तो मानो कक्ष की हवा थम सी गई और शुचि का प्रश्न दीवारों से टकरा कर लौट आया.

‘‘क्या कह रही हो तुम? ऐसी बात भला तुम सोच भी कैसे सकती हो?’’

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‘‘कमाल है, आज तुम्हें यह बात बड़ी विचित्र लग रही है. पर कल तो तुम ने यही बात मेरी मांजी से कही थी. तुम तो किसी से बिना पारिश्रमिक दिए काम करवाती ही नहीं हो. है न?’’ शुचि ने व्यंग्य किया.

‘‘वह तो मैं ने यों ही कह दिया था. म…म…मुझे लगा, मांजी खुश हो जाएंगी,’’ रम्या न चाहते हुए भी हकला गई.

‘‘मुझे भी खुश कर दो न. क्या है न, घर में खाने को नहीं है, तुम कुछ दे दोगी तो काम चल जाएगा,’’ शुचि अब भी क्रोध में थी.

‘‘तुम तो व्यर्थ ही बात का बतंगड़ बना रही हो. तुम इन वृद्धों की मानसिकता को समझती नहीं हो. यह कोई भी कार्य कुछ पाने की आशा से ही करते हैं,’’ रम्या अपनी ही बात पर अड़ी थी.

‘‘तुम्हारे विचार जान कर प्रसन्नता हुई. पर इन्हें अपने पास ही रखो. मांजी को बहुत बुरा लगा है, यह तो तुम समझ ही गई होंगी. मैं तो तुम्हें केवल यह बताने आई थी, भविष्य में तुम ने उन्हें अपमानित करने का प्रयत्न किया तो पता नहीं शायक क्या कर बैठें. अभी तो हम ने यह बात उन से छिपा कर रखी है,’’ तीखे स्वर में बोल कर शुचि बाहर निकल गई. रम्या सामने रखी ठंडी होती चाय को देखती रही.

‘‘स्वयं ही चाय बनवाई और छोड़ कर चली गईं. तुम तो अपनी चाय पी लो,’’ सुहास बोला.

‘‘वह मुझे इतना कुछ सुना कर चली गई और तुम चुप बैठे देखते रहे,’’ रम्या सुहास पर ही बरस पड़ी.

‘‘तुम क्या चाहती थीं मैं ढालतलवार ले कर मैदान में कूद पड़ता?’’

‘‘वह तो कोई विरला ही दिन होगा. पर मैं भी चुप नहीं बैठूंगी. ऐसा मजा चखाऊंगी कि शुचि याद रखेगी.’’

‘‘होश की बात करो, रम्या. स्वीकार कर लो कि भूल तुम्हारी थी. तुम ने कामिनी आंटी का अपमान किया है. जा कर क्षमा मांग लो और बात को यहीं समाप्त कर दो. तुम नहीं जाना चाहतीं तो मुझ से कहो, मैं क्षमा मांग लूंगा. वे बड़ी हैं, हमारी मां की आयु की हैं, क्षमा मांगने से हम छोटे नहीं हो जाएंगे. सोचता हूं तो मुझे भी आश्चर्य हो रहा है कि तुम ने उन से ऐसा व्यवहार किया. तुम्हें शायद पता नहीं है कि शायक के पिता रंगपुर के जानेमाने चिकित्सक थे.’’

कुछ देर के लिए रम्या चित्रलिखित सी बैठी रही. बात इतनी बढ़ जाएगी, यह तो उस ने सोचा ही नहीं था. पर अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा. अदिति और आर्यन पलक की जन्मदिन पार्टी में नहीं आए तो पलक को कितना बुरा लगेगा.

रम्या चुपचाप शुचि के घर की तरफ चल पड़ी. शुचि ने द्वार खोला तो सामने रम्या को खड़े देख कर हैरान रह गई.

‘‘मांजी, कहां हैं आप? शुचि बता रही थी कि आप नाराज हैं,’’ रम्या उन के पास बैठते हुए बोली, ‘‘मेरा इरादा आप का अपमान करने का नहीं था, न ही मैं आप को दुख पहुंचाना चाहती थी. पता नहीं कैसे वह सब मेरे मुंह से निकल गया. भूल हो गई, क्षमा कर दीजिए.’’

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‘‘अरे बैठो, मैं ने किसी बात का बुरा नहीं माना. समय बहुत बदल गया है. अब न किसी के पास दूसरों के लिए समय है और न ही प्रेम या आदर. ऐसे में क्या बुरा मानना,’’ कामिनी हर शब्द पर जोर दे कर बोलीं.

वे अपनी बात पूरी कर पातीं कि उस से पहले ही सुजाताजी के बेटे अनुराग ने प्रवेश किया. वह बदहवास हो रहा  था.

‘‘क्या हुआ, अनुराग?’’ शुचि उस की हड़बड़ाहट देख कर बोली.

‘‘मां स्नानघर में फिसल कर गिर गईं. शायद हड्डी टूट गई है. अस्पताल ले जाना पड़ेगा. मां ने कामिनी आंटी को फौरन आने को कहा है. कह रही थीं कि भूलचूक माफ कर के तुरंत आ जाएं,’’ वह बोला.

‘‘कैसी भूलचूक?’’ शुचि ने प्रश्न किया.

‘‘मुझे क्या पता. यह तो मां ही बता सकती हैं,’’ अनुराग ने कंधे उचका कर अपनी विवशता प्रकट की तो शुचि ने प्रश्नवाचक मुद्रा में कामिनी पर दृष्टि डाली.

‘‘वह सब बाद में, चल कर सुजाताजी को देखते हैं,’’ कामिनी अनुराग के साथ चल दीं.

सभी लपक कर सुजाताजी के फ्लैट में पहुंचे.

‘‘देखो न कामिनी, यह क्या हो गया,’’ सुजाता कामिनी को देखते ही बोलीं, ‘‘मुझ से तो चला भी नहीं जा रहा.’’ सुजाता ने कस कर कामिनी के हाथ पकड़ लिए. तब तक ऐंबुलैंस आ गई थी. सुजाता को ऐंबुलैंस से अस्पताल पहुंचाया.

सुजाता के पैर की हड्डी न केवल टूट गई थी बल्कि अपने स्थान से खिसक भी गई थी. तुरंत उन का औपरेशन किया गया. पूरे समय सगी बहन से भी बढ़ कर कामिनी ने सुजाता की सेवा की.

3 माह के बाद सुजाता ने बैसाखी के सहारे चलना प्रारंभ किया. सदाशय हाइट्स का तो अब कायाकल्प ही हो गया है. अब केवल कामिनी ही नहीं सब एकदूसरे के इस तरह काम आते हैं मानो एक ही परिवार के सदस्य हों. कामिनी का मन भी शायक और शुचि के पास रम सा गया है, अदिति और आर्यन छात्रावास से घर जो आ गए हैं.

सुजाताजी ने किस भूलचूक की माफी मांगी थी, शुचि ने यह कई बार पूछने का यत्न किया पर हर बार कामिनी ने मुसकरा कर टाल दिया.

‘‘जाने भी दे, शुचि. जब कोई माफी मांग ले तो माफ करने में ही समझदारी है. है कि नहीं?’’

‘‘ठीक है,’’ शुचि बोली पर उस के मन में मां की महानता के लिए सम्मान और बढ़ गया था.

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रंग जीवन में नया आयो रे: भाग 3- क्यों परिवार की जिम्मेदारियों में उलझी थी टुलकी

लेखिका- विमला भंडारी

निश्चय करते ही मुझे अस्पताल की थका देने वाली जिंदगी एकाएक उबाऊ व बोझिल लगने लगी. सोच रही थी कि दो दिन पहले ही छुट्टी ले कर चली जाऊं. अपने इस निर्णय पर मैं खुद हैरान थी.

विवाह के 2 दिन पूर्व मैं उदयपुर जा पहुंची. टुलकी ने मुझे दूर से ही देख लिया था. चंचल हिरनी सी कुलांचें मारने वाली वह लड़की हौलेहौले मेरी ओर बढ़ी. कुछ क्षण मैं उसे देख कर ठिठकी और एकटक उसे देखने लगी, ‘यह इतनी सुंदर दिखने लग गई है,’ मैं मन ही मन सोच रही थी कि वह बोली, ‘‘सिस्टर, मुझे पहचाना नहीं?’’ और झट से झुक कर मुझे प्रणाम किया.

मैं उसे बांहों में समेटते हुए बोली, ‘‘टुलकी, तुम तो बहुत बड़ी हो गई हो. बहुत सुंदर भी.’’

मेरे ऐसा कहने पर वह शरमा कर मुसकरा उठी, ‘‘तभी तो शादी हो रही है, सिस्टर.’’

उस से इस तरह के उत्तर की मुझे उम्मीद नहीं थी. सोचने लगी कि इतनी संकोची लड़की कितनी वाचाल हो गई. सचमुच टुलकी में बहुत अंतर आ गया था.

अचानक मेरा ध्यान उस के हाथों की ओर गया, ‘‘यह क्या, टुलकी, तुम ने तो अपने हाथ बहुत खराब कर रखे हैं, जरा भी ध्यान नहीं दिया. बड़ी लापरवाह हो. अरे दुलहन के हाथ तो एकदम मुलायम होने चाहिए. दूल्हे राजा तुम्हारा हाथ अपने हाथ में ले कर क्या सोचेंगे कि क्या किसी लड़की का हाथ है या…?’’ मैं कहे बिना न रह सकी.

मेरी बात बीच में ही काटती हुई टुलकी उदास स्वर में बोल उठी, ‘‘सिस्टर, किसे परवा है मेरे हाथों की, बरतन मांजमांज कर हाथों में ये रेखाएं तो अब पक्की हो गई हैं. आप तो बचपन से ही देख रही हैं. आप से क्या कुछ छिपा है.’’

‘‘अरे, फिर भी क्या हुआ. तुम्हारी मां को अब तुम से कुछ समय तक तो काम नहीं करवाना चाहिए था,’’ मैं ने उलाहना देते हुए कहा.

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‘‘मेरा जन्म इस घर में काम करने के लिए ही हुआ है,’’ रुलाई को रोकने का प्रयत्न करती टुलकी को देख मेरे अंदर फिर कुछ पिघलने लगा. मन कर रहा था कि खींच कर उस को अपने सीने में भींच लूं. उसे दुनिया की तमाम कठोरता से बचा लूं. मेरी नम आंखों को देख कर वह मुसकराने का प्रयत्न करते हुए आगे बोली, ‘‘मैं भी आप से कैसी बातें करने लग गई, वह भी यहीं सड़क पर. चलिए, अंदर चलिए, सिस्टर, आप थक गई होंगी,’’ मुझे अंदर की ओर ले जाती टुलकी कह उठी, ‘‘आप के लिए चाय बना लाती हूं.’’

बड़े आग्रह से उस ने मुझे नाश्ता करवाया. मैं देख रही थी कि यों तो टुलकी में बड़ा फर्क आ गया है पर काम तो वह अब भी पहले की तरह उन्हीं जिम्मेदारियों से कर रही है.

मेरे पूछने पर कहने लगी, ‘‘मां तो नौकरी पर रहती हैं, उन्हें थोड़े ही मालूम है कि घर में कहां, क्या पड़ा है. मैं न देखूंगी तो कौन देखेगा. और यह टिन्नू,’’ अपनी छोटी बहन की ओर इशारा करते हुए कहने लगी, ‘‘इसे तो अपने शृंगार से ही फुरसत नहीं है. अब देखो न सिस्टर, जैसे इस की शादी हो रही हो. रोज ब्यूटीपार्लर जाती है.’’

‘‘दीदी, आज आप की पटोला साड़ी मैं पहन लूं?’’ अंदर आती टिन्नू तुनक कर बोली.

‘‘पहन ले, मोपेड पर जरा संभलकर जाना.’’

‘‘पायलें भी दो न, दीदी.’’

‘‘देख, तू ने लगा ली न वही बिंदी. मैं ने तुझे मना किया था कि नहीं?’’

‘‘मैं ने मां से पूछ कर लगाई है,’’ इतराती हुई टिन्नू निडर हो बोली.

‘‘मां क्या जानें कि मैं क्यों लाई?’’

‘‘आप और ले आना, मुझे पसंद आई तो मैं ने लगा ली. इस पटोला पर मैच कर रही है न. अब मुझे जल्दी से पायलें निकाल कर दे दो. देर हो रही है. अभी बहुत से कार्ड बांटने हैं.’’

‘‘नहीं दूंगी.’’

‘‘तुम नहीं दोगी तो मैं मां से कह कर ले लूंगी,’’ ठुनकती हुई टिन्नू टुलकी को अंगूठा दिखा कर चली गई.

‘‘देखो सिस्टर, मेरा कुछ नहीं है. मैं कुछ नहीं, कोई अहमियत नहीं,’’ भरे गले से टुलकी कह रही थी.

‘‘टुलकी, ओ टुलकी,’’ तभी उस की मां की आवाज सुनाई दी, ‘‘हलवाई बेसन मांग रहा है.’’

‘‘टुलकी, जरा चाकू लेती आना?’’ किसी दूसरी महिला का स्वर सुनाई दिया.

‘‘दीदी, पाउडर का डब्बा कहां रखा है?’’ टुलकी की छोटी बहन ने पूछा.

‘‘क्या झंझट है, एक पल भी चैन नहीं,’’ झुंझलाती हुई वह उठ खड़ी हुई.

मैं बैठी महसूस कर रही थी कि विवाह के इन खुशी से भरपूर क्षणों में भी टुलकी को चैन नहीं.

दिनभर के काम से थकी टुलकी अपने दोनों हाथों से पैर दबाती, उनींदी आंखें लिए ‘गीतों भरी शाम’ में बैठी थी और ऊंघ रही थी. उल्लास से हुलसती उस की बहनें अपने हाथों में मेहंदी रचाए, बालों में वेणी सजाए, गोटा लगे चोलीघाघरे में ढोलक की थाप पर थिरक रही थीं.

सभी बेटियां एक ही घर में एक ही मातापिता की संतान, एक ही वातावरण में पलीबढ़ीं पर फिर भी कितना अंतर था. कुदरत ने टुलकी को ‘बड़ा’ बना कर एक ही सूत्र में मानो जीवन की सारी मधुरता छीन ली थी.

टुलकी के जीवन की वह सुखद घड़ी भी आई जब द्वार पर बरात आई, शहनाई बज उठी और बिजली के नन्हे बल्ब झिलमिला उठे.

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मैं ने मजाक करते हुए दुलहन बनी टुलकी को छेड़ दिया, ‘‘अब मंडप में बैठी हो. किसी काम के लिए दौड़ मत पड़ना.’’

धीमी सी हंसी हंसती वह मेरे कान में फुसफुसाई, ‘फिर कभी इधर लौट कर नहीं आऊंगी.’

बचपन से चुप रहने वाली टुलकी के कथन मुझे बारबार चौंका रहे थे. इतना परिवर्तन कैसे आ गया इस लड़की में?

मायके से विदा होते वक्त लड़कियां रोरो कर कैसा बुरा हाल कर लेती हैं पर टुलकी का तो अंगप्रत्यंग थिरक रहा था. मुझे लगा, सच, टुलकी के बोझिल जीवन में मधुमास तो अब आया है. उस के वीरान जीवन में खुशियों के इस झोंके ने उसे तरंगित कर दिया है.

विदा के झ्रसमय टुलकी के मातापिता, भाई और बहनों की आंखों में आंसुओं की झड़ी लगी हुई थी लेकिन टुलकी की आंखें खामोश थीं, उन में कहीं भी नमी दिखाई नहीं दे रही थी. इसलिए वह एकाएक आलोचना व चर्चा का विषय बन गई. महिलाओं में खुसरफुसर होने लगी.

लेकिन मैं खामोश खड़ी देख रही थी बंद पिंजरे को छोड़ती एक मैना की ऊंची उड़ान को. एक नए जीवन का स्वागत वह भला आंसुओं से कैसे कर सकती थी.

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मां का दिल महान: भाग 2- क्या हुआ था कामिनी के साथ

‘‘तुम चिंता मत करो, शायक. कोई न कोई राह निकल ही आएगी. पर इस के लिए हम मां को दुख तो नहीं पहुंचा सकते.’’

शायक कसमसा कर रह गया. उस का बस चलता तो वह कुछ अप्रत्याशित कर बैठता पर उस ने चुप रहना ही ठीक समझा.

इस बहस से कामिनी भी आहत हुई थीं पर रम्या से वादा कर दिया था इसलिए उस की सहायता को चली गई. आज उस की गतिविधियों पर उन की पैनी नजर थी. शीघ्र ही उन्हें आभास हो गया कि शायक उन से अधिक समझदार है. रम्या को केवल उन की सहायता नहीं चाहिए थी वह तो सारा काम उन्हीं से करवा रही थी. वह बड़ी होशियारी से उन की प्रशंसा के पुल बांधे जा रही थी. मानो इसी तरह उन्हें बरगला लेगी.

‘‘बालूशाही तो लाजवाब बनी हैं, दहीबड़े और बना दीजिए. आप के हाथों में तो जादू है,’’ बालूशाही बनते ही रम्या ने आगे का कार्यक्रम तैयार कर दिया.

‘‘रम्या बेटी, थक गई हूं. सुबह से काम कर रही हूं. एक कप चाय तो पिला,’’ कामिनी हंसीं.

‘‘पिलाऊंगी, चाय भी पिलाऊंगी. पहले काम तो समाप्त हो जाने दीजिए.’’

रम्या का उत्तर सुन कर दंग रह गईं कामिनी. वे उठ खड़ी हुईं.

‘‘अरे, जा कहां रही हैं आप? काम हो जाने के बाद चाय पी कर चली जाइएगा.’’

‘‘थोड़ी देर आराम कर के आऊंगी, बेटे. बैठेबैठे कमर में दर्द होने लगा है.’’

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‘‘इतने नखरे क्यों दिखा रही हैं आप? पैसे दूंगी. मैं किसी से मुफ्त में काम नहीं करवाती,’’ रम्या बदतमीजी से बोली.

कामिनी अविश्वास से घूरती रह गईं. न आंखों पर विश्वास हुआ न कानों पर. रम्या ने उस के बाद क्या कहा, वे सुन नहीं सकीं. चुपचाप उस के अपार्टमैंट से बाहर निकल आईं. पर वे अपने फ्लैट तक पहुंच पातीं, इस से पहले ही सुजाताजी मिल गईं.

‘‘मैं तो आप के यहां ही गई थी पर आप के यहां ताला पड़ा था,’’ वे उन्हें देखते ही बोलीं.

‘‘मेरे पास घर की एक चाभी हुआ करती है, इसलिए चिंता की बात नहीं है. चलिए न, मैं तो घर ही जा रही थी,’’ कामिनी बोलीं.

सुजाता कामिनी के साथ चली आईं.

‘‘आइए न, बैठिए. मैं अभी आई,’’ कामिनी ने सोफे की ओर इशारा किया.

‘‘मैं बैठने नहीं आई. आप का हिसाब करने आई हूं.’’

‘‘हिसाब? कैसा हिसाब?’’

‘‘आप ने 4-5 दिनों तक मेरी सेवा की, उसी का हिसाब,’’ उन्होंने 500 का नोट दिखाते हुए कहा.

‘‘क्या कह रही हैं आप? मैं ने पैसों के लिए आप की सेवा की थी क्या?’’

‘‘अरे तो इस में शरमाने की कौन सी बात है. आजकल के बच्चे ऐसे ही हैं. कितना भी कमाते हों पर मातापिता पर कुछ भी खर्च करने से कतराते हैं,’’ सुजाता नाटकीय स्वर में बोलीं, ‘‘मैं क्या समझती नहीं. कोई बिना मतलब किसी की सहायता क्यों करने लगा? अपने मुंह से कहना आवश्यक थोड़े ही है. 500 रुपए कम हैं क्या? 100 रुपए और ले लीजिए.’’

‘‘बस कीजिए, मैं कुछ कह नहीं रही तो आप जो मन में आए कहे जा रही हैं. आप बीमार थीं, कोई देखभाल करने वाला नहीं था. मानवता के कारण आप की देखभाल कर दी तो आप मुझे अपमानित करने चली आईं,’’ कामिनी क्रोधित हो उठीं.

‘‘लो, भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा. मैं तो आप की सहायता करना चाह रही थी. रम्या से आप की सिफारिश मैं ने ही की थी. कल आप वहां भी लड्डू बना कर आई थीं. अब भी तो वहीं से आ रही थीं आप?’’

‘‘मैं क्या आप को घरघर जा कर काम करने वाली लगती हूं? शरम नहीं आती आप को? आप जैसों को खरीदने की हैसियत है मेरी. निकल जाइए यहां से. मुझे नहीं पता था कि यहां के लोग मानवता की भाषा भी नहीं समझते,’’ वे अपने स्वभाव के विपरीत चीख उठीं.

‘‘लो, मैं ने ऐसा क्या कह दिया, इस तरह आपा क्यों खो रही हैं आप?’’ सुजाता ने कामिनी के घर से निकलते हुए कहा.

उन के जाते ही कामिनी कटे वृक्ष की भांति कुरसी पर गिर गईं. उठ कर चाय बनाने की भी हिम्मत नहीं हुई. वहीं बैठेबैठे सो गई थीं. जब द्वार की घंटी बजी, द्वार खोला तो सामने शुचि खड़ी थी. ‘‘अंदर आओ न,’’ उसे वहीं खड़े देख कर वे बोलीं. तभी समवेत खिलखिलाहट का स्वर गूंजा.

‘‘अरे कौन है? शुचि, आज क्या आर्यन और अदिति को घर ले आई है?’’

‘‘हां दादी. हम दोनों आ गए हैं ऊधम मचा कर आप को सताने. मां कह रही थीं आप का अकेले मन नहीं लग रहा है.’’

मां के पीछे खड़े दोनों बच्चे उन के सामने आ खड़े हुए.

‘‘हां रे, मैं तो वापस जाने की सोच रही थी.’’

‘‘दादी, आप यहां आ जाओ तो हम छात्रावास छोड़ कर घर में रहने लगें.’’

‘‘पहले क्यों नहीं कहा? अपने घर को किराए पर दे कर यहीं आ जाती.’’

‘‘तो अब आ जाओ न, दादीमां,’’ दोनों उन के गले लग कर झूल गए.

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उन की निश्छल हंसी के बीच उन का मन नहीं हुआ कि वे शुचि को अपने कड़वे अनुभवों के बारे में बताएं. पर बताना तो पड़ेगा ही. इतनी बड़ी बात को वे छिपा भी तो नहीं सकतीं, विशेष रूप से अपने बेटे शायक से.

शीघ्र ही शुचि चाय बना लाई और स्वयं वहीं बैठ कर चाय की चुस्कियां लेने लगी.

‘‘मां, हमें भी भूख लगी है,’’ आर्यन और अदिति ने दोनों को चाय पीते देख शोर मचाया.

‘‘धीरज रखो, थक गई हूं. मांजी भी सुबह से अकेले बैठी हैं. चाय तो पीने दो,’’ शुचि ने दोनों को डपटा.

‘‘तुम कह कर जातीं तो मैं दोनों के लिए गरम नाश्ता बना कर रखती. पर तुम ने बताया ही नहीं. तुम दोनों तो कुछ खाते ही नहीं, तलाभुना खाने से वजन जो बढ़ जाता है,’’ कामिनी ने शिकायत की.

‘‘मुझे भी कहां पता था मां? औफिस में अदिति का फोन आया कि स्कूल

3 दिनों के लिए बंद हो रहा है. एनसीसी का कैंप है. मैं जा कर ले आई. छात्रावास में रहने से तो अच्छा है 3 दिनों तक घर में रहेंगे हम सब के साथ. आज मैं बनाती हूं कुछ गरमागरम आप सब के लिए. आप तो दिनभर रम्या की सहायता कर के थक गई होंगी,’’ शुचि चाय समाप्त होते ही उठ खड़ी हुई.

‘‘रम्या आंटी की सहायता, पर क्यों? उन्हें दादी की सहायता की क्या आवश्यकता पड़ गई?’’ अदिति बोली.

‘‘पलक का जन्मदिन है. मांजी उसी के लिए रम्या की सहायता कर रही हैं,’’ शुचि ने समझाया.

‘‘अच्छा, रम्या के बेटे का नाम पलक है? लो भला मुझे तो यह भी पता नहीं. न मैं ने पूछा न रम्या ने बताया. मैं ने तो उसे देखा तक नहीं है. वह भी क्या तुम दोनों की तरह छात्रावास में ही रहता है?’’ कामिनी ने प्रश्न किया.

‘‘रहता तो घर में ही है पर सुबहशाम ट्यूशन में व्यस्त रहता है, इसीलिए आप से भेंट नहीं हुई होगी. सुबह 6 बजे घर से निकलता है तो शाम के 8 बजे घुसता है,’’ शुचि ने बताया.

‘‘यह लो, आजकल के मातापिता अपने ही बच्चों पर कितना अत्याचार करते हैं. हमारे बच्चे तो घंटों अपने मित्रों के साथ खेलते थे. पर आजकल तो पढ़ाई के बोझ तले पिसे जा रहे हैं.’’

‘‘पढ़ाईलिखाई से जो समय बचता है वह कंप्यूटर और टीवी की भेंट चढ़ जाता है. जीवन बहुत उलझ गया है, मां,’’ शुचि हंसी.

‘‘ठीक कहती हो तुम. जीवन केवल उलझा ही नहीं है, बहुत आगे निकल भी गया है. हम जैसे वृद्ध बहुत पीछे छूट गए हैं.’’

कामिनी का उदास स्वर सुन कर चौंक गई शुचि.

‘‘क्या हुआ, मां? तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ उस ने पूछा.

कामिनी सबकुछ कह कर मन हलका करना चाहती थीं पर चुप रह गईं. वे जानती थीं कि शायक को पता चला तो हंगामा हो जाएगा. अपने बेटे के स्वभाव से वे भलीभांति परिचित थीं. यह तो अच्छा हुआ कि शुचि उन के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना रसोई में व्यस्त हो गई थी और वे अदिति और आर्यन के साथ बातों में व्यस्त हो गईं.

कुछ ही देर में शुचि ने पुकारा तो सब खाने की मेज पर जा कर डट गए.

‘‘तुम्हारी मम्मी ने तो जरा सी देर में कितनाकुछ बना डाला,’’ कामिनी ने गरमागरम नाश्ते की प्रशंसा करते हुए कहा.

‘‘क्यों शर्मिंदा करती हैं, मांजी. अभी तो बस पकौड़े बनाए हैं, बाकी सब तो आते हुए खरीद लाई थी,’’ शुचि मुसकराई.

कामिनी भी मुसकरा दीं. अदिति और आर्यन के आने से बड़ी रौनक हो गई थी. वे रम्या और सुजाता प्रकरण को लगभग भूल ही चली थीं कि अचानक द्वार की घंटी बजी. शुचि ने द्वार खोला तो सामने रम्या और उस के पति सुहास खड़े थे.

‘‘आइए, आज तो सूरज अवश्य ही पश्चिम से निकला होगा,’’ शुचि ने उन का स्वागत करते हुए कहा.

‘‘मुझे पता था तुम यही कहोगी. तुम कामकाजी महिलाओं के पास तो सदा एक ही बहाना रहता है, समय की कमी का. पर हम गृहिणियां भी कम व्यस्त नहीं रहतीं.’’

‘‘मैं इस बहस में पड़ना ही नहीं चाहती. कौन अधिक व्यस्त रहता है, इस बात पर तो घंटों बहस हो सकती है. आओ, बैठो,’’ शुचि मुसकराई.

‘‘बैठने का समय भला किस के पास है? हम तो तुम सब को आमंत्रित करने आए हैं. कल पलक का जन्मदिन है न. तुम सब आना. मांजी को भी ले कर आना,’’ सुहास ने आग्रह किया.

‘‘मांजी तो यों भी आएंगी मेरा हाथ बंटाने, आएंगी न आंटी?’’ रम्या बड़ी अदा से बोली.

‘‘नहीं बेटी, मैं नहीं आ सकूंगी. आज तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है.’’

‘‘ओह, मैं तो आप के भरोसे बैठी थी. हो सके तो कल थोड़ी देर के लिए ही सही पर आ जाइएगा.’’

‘‘कैसी बातें कर रही हो, रम्या. मां ने कह दिया न उन की तबीयत ठीक नहीं है. फिर क्यों जोर डाल रही हो?’’ शुचि ने नाराजगी दिखाई.

‘‘चलो ठीक है, मैं किसी प्रकार काम चला लूंगी. अरे वाह, आज तो अदिति और आर्यन भी आए हुए हैं. तुम दोनों को देख कर पलक भी बहुत खुश होगा,’’ रम्या ने बात पलटते हुए कहा.

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‘‘क्या हुआ, मां? रम्या ने कुछ कहा था क्या?’’ शुचि ने थोड़ा सा एकांत पाते ही पूछ लिया.

‘‘बहुत बदतमीजी से पेश आई थी मुझ से. आज तक किसी ने इस तरह बात नहीं की,’’ कामिनी की आंखें भर आईं. उन्होंने शुचि को पूरा प्रकरण कह सुनाया.

‘‘मैं तो आज आप को देखते ही समझ गई थी कि कहीं कुछ गड़बड़ अवश्य है. पर आप चिंता मत करिए. मैं भी उसे ऐसा मजा चखाऊंगी कि वह याद रखेगी. आप शायक से कुछ मत कहिएगा वरना वे व्यर्थ ही भड़क उठेंगे.’’

आगे पढ़ें- कुछ देर के लिए रम्या चित्रलिखित सी बैठी रही…

घर का चिराग: भाग 3- क्या बेटे और बेटी का फर्क समझ पाई नीता

केशव बाबू गंभीर हो गए. पत्नी के प्रति घृणा करते हुए भी उन्होंने सहानुभूतिपूर्ण स्वयं में कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, लड़के के सिर पर अभी प्रेम का भूत सवार है. ऐसे प्रेम में गंभीरता और स्थायित्व नहीं होता. लिवइन रिलेशनशिप बंधनरहित होते हैं, इन में एक न एक दिन खटास अवश्य आती है, चाहे शादी को ले कर, चाहे बच्चों को ले कर या कमाई को ले कर या फिर उन के बीच में कोई तीसरा आ जाता है. जो रिश्ते शारीरिक आकर्षण पर आधारित होते हैं उन की नियति और परिणति यही होती है. जहां परिवार और समाज नहीं होता, वहां उच्छृंखलता और निरंकुशता होती है. देख लेना, एक दिन विप्लव और उस लड़की का रिश्ता टूट जाएगा.’’

‘‘परंतु वह कुछ करताधरता नहीं है. उस का भविष्य चौपट हो जाएगा.’’

‘‘वह तो होना ही है, जिस तरह की परवरिश और संस्कार तुम ने उस को दिए हैं, उस में उस का बिगड़ना आश्चर्यजनक नहीं है. न बिगड़ता तो आश्चर्य होता. अब हम कुछ नहीं कर सकते. ठोकर खा कर अगर वह सुधर गया, तो समझो सुबह का भूला शाम को घर वापस आ गया. वरना…’’

‘‘परंतु उस का खर्चा कहां से चलेगा?’’

‘‘मुझे लगता है, वह लड़की कहीं न कहीं नौकरी अवश्य करती होगी. जब तक उस के मन में विप्लव के लिए प्रेम रहेगा, वह उस का खर्चा उठाती रहेगी. जिस दिन उसे लगा कि विप्लव उस के लिए बोझ है या कोई अन्य लड़का उस के जीवन में आ गया, वह विप्लव को ठोकर मार देगी.’’ नीता रोने लगी. केशव बाबू ने उसे चुप नहीं कराया. कोई फायदा नहीं था. यह नीता की नासमझी का परिणाम था, परंतु विप्लव के पतन के लिए वह अकेली दोषी नहीं थी. इस में विप्लव का भी बहुत बड़ा हाथ था. कोई भी युवक नासमझ नहीं होता कि उसे अपने कर्मों के परिणामों का पता नहीं होता. प्यार उस ने अपनी बुद्धि और विवेक से किया था और उस ने कुछ सोचसमझ कर अपनी प्रेमिका के साथ रहना स्वीकार किया होगा. पढ़ने में वह कमजोर था, तो इस में उस की नालायकी और कामचोरी थी. हम जो कर्म करते हैं, उन के लिए स्वयं जिम्मेदार होते हैं. हम अपनी गलतियों के लिए किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते.

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केशव बाबू के लिए यह चिंता का विषय था कि बेटा बिगड़ गया था, परंतु वे बहुत अधिक परेशान नहीं थे. पत्नी की हठधर्मी और मनमानी में उन का कोई हाथ नहीं था. उन्होंने तो हर कदम पर उसे रोकने और समझाने की कोशिश की, परंतु वह उलटी खोपड़ी की औरत थी. हर सही बात उसे गलत लगती और हर गलत काम अच्छा. उस का दुष्परिणाम एक न एक दिन सब के सामने आना ही था. कहां तो नीता को चिंता थी कि ज्यादा पढ़ाने से बेटी बिगड़ जाएगी, कहां बेटा बिगड़ गया. जिसे वंश आगे बढ़ाना था, खानदान का नाम रोशन करना था, वही घर के सारे चिराग बुझा कर खुद अंधेरे में गुम हो गया था. अनिका के बीटैक का यह अंतिम वर्ष था. एक दिन उस ने पापा को फोन किया, ‘‘पापा, एक खुशखबरी है.’’

‘‘क्या बेटा, बोलो?’’ केशव बाबू ने उल्लास से पूछा.

‘‘पापा, मेरा सेलैक्शन हो गया है,’’ अनिका खुशी से चहक रही थी. केशव बाबू का हृदय खुशी से झूम उठा. शरीर में एक झुरझुरी सी उठी. उन्हें लगा, जैसे तपती दोपहरी में पसीने से तरबतर शरीर के ऊपर किसी ने वर्षा की ठंडी बूंदें टपका दी हों. वे हर्षित होते हुए बोले, ‘‘मुबारक हो बेटा, कहां हुआ है सेलैक्शन? ले किन अभी तो तुम्हारी फाइनल की परीक्षाएं बाकी हैं.’’

‘‘हां, वो तो है, परंतु ये कैंपस सेलैक्शन है. पिछले अंकों के आधार पर हुआ है. परीक्षा के बाद ही नियुक्तिपत्र मिलेगा. परंतु अभी एक शर्त है कि पहली पोस्ंिटग मुंबई में होगी.’’

‘‘तो इस में परेशानी क्या है? तुम होस्टल में रह चुकी हो. मुंबई में भी तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी.’’

‘‘हां, वह तो सही है. बस, मैं यह सोच रही थी कि आप अकेले हो जाएंगे.’’

‘‘नहीं, बेटा, पहले तुम अपने भविष्य की चिंता करो. वैसे भी शादी के बाद तुम हम सब को छोड़ कर चली जाओगी.’’

‘‘नहीं पापा, मैं आप को छोड़ कर कभी नहीं जाऊंगी.’’ केशव बाबू मन ही मन मुसकराए, परंतु आंतरिक खुशी के बावजूद उन की आंखों में आंसू छा गए. अपने को संभाल कर बोले, ‘‘अच्छा ठीक है. तुम अपना खयाल रखना.’’

‘‘ओके पापा.’’

‘‘मम्मी को बताया?’’

‘‘बता दूं, क्या?’’ अनिका ने पूछा.

‘‘बता दे तो अच्छा रहेगा, तुम्हारी मम्मी हैं, अच्छी हैं या बुरी, सदा तुम्हारी मां रहेंगी. वैसे भी आजकल उन के व्यवहार में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ है. मेरे साथ मीठा व्यवहार करती हैं. बेटे ने उन की आशाओं और अपेक्षाओं पर जो चोट की है, उस से उन का विश्वास डगमगा गया है. उन को अब कहीं कोई सहारा दिखाई नहीं देता.’’

‘‘ठीक है, मैं अभी फोन करती हूं.’’

शाम को जब केशव बाबू घर पहुंचे, तो नीता ने मुसकराते हुए उन का स्वागत किया. यह एक अच्छा संकेत था. केशव बाबू को अच्छा लगा. नीता ने कहा, ‘‘आप को मालूम है न?’’

‘‘क्या?’’ उन्होंने मन की खुशी को दबाते हुए पूछा.

‘‘अनिका की नौकरी लग गई है.’’

‘‘हैं,’’ वे आश्चर्य प्रकट करते हुए मुड़े, ‘‘मुझे तो नहीं मालूम. तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘अनिका ने स्वयं फोन कर के बताया है. आप को नहीं बताया?’’

‘‘नहीं, चलो, कोई बात नहीं. तुम को बता दिया तो मुझे बता दिया,’’ वे सामान्य दिखने की चेष्टा करते हुए बोले. बहुत दिनों बाद उन के घर में खुशियों ने अपने पंख फैलाए थे. अनिका की परीक्षाएं समाप्त हो गईं. उसे होस्टल खाली करना था. केशव बाबू उसे कार से स्वयं लेने गए थे. नीता भी जाना चाहती थी, परंतु उन्होंने मना कर दिया. लौटते समय रास्ते में केशव बाबू ने अनिका की पसंद की कुछ चीजें खरीदीं, उसे उपहार जो देना था. जानपहचान वालों के लिए मिठाई के डब्बे खरीदे और जब वे घर पहुंचे तो नीता उन्हें दरवाजे पर ही खड़ी मिली. कार के रुकते ही वह बाहर की तरफ लपकी और अनिका के कार से उतरते ही उसे अपने गले से लगा लिया. अनिका भी मां के गले से इस तरह लिपट गई जैसे सालों से उन के ममत्व, प्रेम और स्नेह को तरस रही थी. ‘‘मेरी बेटी, मेरी बेटी.’’ इस के बाद नीता का गला भर आया. उस की आंखों में आंसू उमड़ आए. उसे लग रहा था, जैसे अपनी खोई हुई बेटी को पा लिया हो.

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‘‘मम्मी,’’ अनिका के भर्राये हुए गले से निकला.

कई पलों तक मांबेटी एकदूसरे के गले लगी रहीं. केशव बाबू के टोकने पर वे दोनों अलग हुईं. ‘‘सारा प्यार बाहर ही उड़ेल दोगी, या घर के लिए भी बचा कर रखोगी तुम दोनों.’’ नीता ने खिसियानी हंसी के साथ कहा, ‘‘आप को क्या पता, बेटी को इतने दिनों बाद पा कर कैसा लगता है.’’

‘‘सच कह रही हो, मां के दिल को मैं कैसे समझ सकता हूं.’’ अनिका का हाथ पकड़ कर नीता अंदर ले आई, बोली, ‘‘बेटी, मैं ने सदा तेरे साथ बुरा बरताव किया. तुझे पराया समझती रही, आज मुझे अपनी गलती का एहसास हो रहा है. मेरी समझ में नहीं आता कि कैसे एक मां अपनी जायी बेटी के साथ दुर्व्यवहार कर सकती है, उसे एक बोझ समझ सकती है. लगता है, मेरे ही संस्कारों में कोई कमी रह गई थी.’’

‘‘मां, आप कैसी बातें कर रही हैं? मैं ने तो कभी ऐसा नहीं समझा. मां हमेशा अपने बच्चों का भला चाहती है.’’

भावातिरेक में नीता का गला भर आया. कुछ न कह कर उस ने अनिका को अपने अंक में समेट लिया. जिस दिन अनिका अपने प्रथम असाइनमैंट पर मुंबई जा रही थी, उस दिन फिर नीता की आंखों में आंसू भरे थे. उसे अपने अंक में समेटते हुए बोली, ‘‘बेटी, जातेजाते मैं एक बात स्वीकार करती हूं कि जिसे मैं घर का चिराग समझती थी वह जुगनू भी नहीं निकला और मैं जिसे कंकड़ समझ कर ठुकराती रही, वह हीरा निकला. बेटा, तुम्हीं मेरे घर का चिराग हो. आशा करती हूं कि अपने जीवन में कोई ऐसा कदम नहीं उठाओगी, जो हमें, बेटे की तरह दुख दे जाए.’’ अनिका मां का आशय समझ गई. दृढ़स्वर में बोली, ‘‘मम्मी, आप मेरी तरफ से निश्चिंत रहें. अव्वल तो ऐसा कुछ होगा नहीं, परंतु परिस्थितियों के अनुसार मनुष्य भी बदलता रहता है. अगर ऐसा कुछ हुआ तो आप की और पापा की सहमति व स्नेह से ही ऐसा होगा. मैं आप दोनों को कभी दुख नहीं दे सकती. आप पापा का खयाल रखना.’’ केशव बाबू स्वयं को बहुत दृढ़ समझते थे, परंतु बेटी से जुदा होते हुए उन की आंखों में आंसुओं का समंदर लहरा रहा था.

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घर का चिराग: भाग 2- क्या बेटे और बेटी का फर्क समझ पाई नीता

‘‘बस, रहने दो. 2-4 औरतों के नौकरी करने से देश का विकास नहीं होता, न समाज का भला होता. नौकरी करने वाली स्त्रियों के घर बिगड़ जाते हैं. वे अपनी संतानों की ठीक से देखभाल नहीं कर पातीं. परिवार, समाज और देश के विकास व उन्नति के लिए लड़कों का सक्षम होना परम आवश्यक है. हमें बेटे की शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए. वही हमारे बुढ़ापे का सहारा है.’’ केशव बाबू ने कटाक्ष किया, ‘‘तभी तो हमारे सुपुत्र पढ़ाई में कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रहे हैं. 3-3 डिगरियां लिए बैठे हैं और नौकरी हाथ नहीं आ रही है. डिगरी ले कर चाटेगा?’’

‘‘आप तो पता नहीं क्यों बेटे के खिलाफ रहते हैं. देख लेना, एक दिन वही हमारा नाम रोशन करेगा. मुझे तो डर है, बेटी बाहर जा कर हमारी नाक न कटवा दे?’’

‘‘वह तो पता नहीं कब हमारा नाम रोशन करेगा, परंतु तुम्हारी घटिया सोच के चलते मैं बेटी के जीवन को अंधकारमय नहीं बना सकता. बेटे के लिए तुम हमेशा अपनी मनमानी करती रही, परंतु बेटी के संबंध में तुम्हारी एक भी नहीं चलने दूंगा. वह जहां तक पढ़ना चाहेगी, मैं पढ़ाऊंगा,’’ केशव बाबू उत्तेजना में उठ कर खड़े हो गए.

‘‘बेटी के ऊपर पैसा बरबाद कर के एक दिन पछताओगे.’’

‘‘बेटे के ऊपर खर्चा कर के मैं कौन सा सुख भोग रहा हूं.’’ केशव बाबू की बात पर नीता इस तरह चीखनेचिल्लाने लगी, जैसे पति से नहीं, किसी और से कह रही हो, ‘‘अरे देखो तो इस भले आदमी को, कैसी अनहोनी की बातें कर रहा है, बेटे से ज्यादा इस को बेटी की पड़ी है. अपने घर में आग लगा कर कोई हाथ सेंकता है. मैं तो हार गई इस आदमी से. पता नहीं कैसे इतने दिनों तक झेलती रही. देख लेना, यह घर को बरबाद कर के रहेगा.’’ और वह झूठमूठ के आंसू बहाने लगी. ऊंची आवाज में चीखनाचिल्लाना और रोनाधोना, यही उस के सशक्त हथियार थे. ऊंची आवाज से वह अपने पति की आवाज को दबाती थी और आंसुओं से अपनी बात मनवाती थी. आज तक वह अपने इन्हीं 2 हथियारों का अनधिकृत प्रयोग करती आ रही थी. परंतु आज वे दोनों निरर्थक सिद्ध होने वाले थे.

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इस बार केशव बाबू नीता की आवाज से थोड़ा दबे, परंतु उस के आंसुओं से पराजित नहीं हुए. उन्होंने ठान लिया कि इस बार नीता की बात नहीं मानेंगे. वे बाहर जाने के लिए मुड़े, तभी उन को नीता के अलावा किसी और की सिसकियों की आवाज सुनाई पड़ी. उन्होंने ध्यान नहीं दिया था, उन की बेटी अनिका वहीं पर खड़ी थी.

वे बेटी के पास गए, ‘‘तुम क्यों रो रही हो, बेटी?’’ उन्होंने पूछा.

अनिका की रुलाई और तेजी से फूट पड़ी. केशव बाबू ने किसी तरह उसे चुप कराया और बाहर के कमरे में ला कर पूछा, ‘‘अब बताओ, तुम्हें क्या दुख है?’’ ‘‘पापा, मेरी वजह से आप के और मम्मी के बीच झगड़ा हुआ, मैं आगे पढ़ाई नहीं करूंगी,’’ उस ने हताश स्वर में कहा. केशव बाबू एक पल के लिए हतप्रभ से खड़े रहे. फिर बेटी के सिर पर हाथ रख कर बोले, ‘‘बेटा, तुम पढ़ाई करोगी. यह तुम्हारे भविष्य का ही सवाल नहीं है, मेरे आत्मसम्मान का भी सवाल है. तुम समझ रही हो न, तुम्हें कुछ बन कर दिखाना है. तुम्हें कुछ बना कर मैं दिखाना चाहता हूं कि बेटियां किसी से कम नहीं होतीं. बेटे ही नहीं, बेटियां भी मांबाप का नाम रोशन करती हैं.’’ अनिका समझ गई. बहुत पहले ही समझ गई थी. वह एक अच्छेभले, सुसंस्कृत और आर्थिक रूप से संपन्न परिवार में पैदा हुई थी, परंतु इस छोटे से घर में उस की सगी मां की सोच दकियानूसी और पुरातनपंथी थी. जब उस का बचपन जवान होने लगा था, तभी उस की समझ में आ गया था कि मां की नजरों में वह एक बोझ के समान है. उस का बड़ा भाई मां की आंखों का तारा है. हर पल वह पक्षपात का शिकार होती थी. गलती न होने पर भी उसे झिड़कियां, डांट और कभीकभी मार भी पड़ती थी, परंतु दूसरी तरफ भाई की बड़ी से बड़ी गलती पर भी उसे माफ कर दिया जाता था. खानपान, कपड़ेलत्ते में भी भाई को वरीयता दी जाती थी. मां की हठधर्मी से इस घर का माहौल हर पल विषाक्त बना रहता था.

मां के अनुचित व्यवहार से न केवल वह दुखी रहती थी, बल्कि केशव बाबू भी उदास और थकेथके से रहते थे. वह पापा का दर्द समझती थी, परंतु कुछ कर नहीं सकती थी. सभी दुखों और कष्टों से नजात पाने के लिए वह किताबों की दुनिया में खो गई. वह अपना ज्यादातर समय पढ़ने में बिताती, ताकि मां की खिटखिट से छुटकारा मिल जाए और पिता का उदास व थका चेहरा देख कर उस की उदासी और ज्यादा न बढ़े. पढ़ाई में उस की एकाग्रता के कारण ही वह अच्छे नंबरों से पास होती रही. केशव बाबू के लिए बेटी को उच्च शिक्षा दिलाना एक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था. उन के प्रोत्साहन से अनिका ने लगन से तैयारी की और उस का एक अच्छे कालेज में दाखिला हो गया. केशव बाबू ने उसे होस्टल में डाल दिया, ताकि घर के माहौल से वह दूर रह कर मन से पढ़ाई कर सके. रोजरोज की बकझक और लड़ाईझगड़े से वह पढ़ाई में मन कैसे लगाती? इस बीच, पतिपत्नी के बीच कितने विवाद हुए, वाकयुद्ध हुए, कितने लिटर आंसू बहे, कितनी धमकियां दी गईं, इन सब का बयान करना बेमानी है. बस, इतना कहना पर्याप्त है कि दोनों तरफ से तलवारें खिंची थीं, परंतु कत्ल नहीं हो रहे थे. यही गनीमत थी. यह तनाव घर में काफी दिनों तक बना रहा, परंतु धीरेधीरे खत्म हो गया.

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अनिका और उस के पापा के बीच रोज फोन पर बातें होती थीं. अनिका मां से भी बातें करती थी. पहले तो मां ऐंठी रहती थी, परंतु धीरेधीरे वह सामान्य हो गई. जिंदगी की ऊंचीनीची डगर पर सब लोग हिचकोले खाते हुए यों ही आगे बढ़ रहे थे. घर का माहौल कुछ दिनों से सहमासहमा और डरावना सा था. केशव बाबू ने इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया. वे अपनी नित्य क्रियाओं में व्यस्त रहते. औफिस जाते और घर पर आ कर पढ़ने में व्यस्त रहते. नीता वैसे भी उन से खिचींखिचीं रहती थी, इसलिए वे उस के किसी प्रसंग में दखल नहीं देते थे. दफ्तर से आ कर वे ड्राइंगरूम में बैठे ही थे कि नीता अपना तमतमाया हुआ चेहरा ले कर उन के सामने खड़ी हो गई. लगभग चीखते हुए बोली, ‘‘आप को पता है, इस घर में क्या हो रहा है?’’

केशव बाबू ने इस तरह सिर उठा कर नीता को देखा, जैसे कह रहे हों, ‘मुझे कैसे पता चलेगा. घर में तो तुम रहती हो,’ फिर उपेक्षित भाव से बोले, ‘‘बताओ?’’

‘‘विप्लव एक सप्ताह से घर नहीं आया है.’’

‘‘अच्छा, मुझे तो वह कभी घर में नहीं दिखता. तुम्हें पता होगा, वह कहां होगा? न पता हो, फोन कर के पूछ लो.’’

‘‘पूछा है, कहता है कि अपनी गर्लफ्रैंड के साथ रहने लगा है, लिवइन रिलेशनशिप में.’’ केशव बाबू एक पल के लिए हतप्रभ रह गए. फिर एक व्यंग्यात्मक मुसकान उन के चेहरे पर दौड़ गई, ‘‘खुशी की बात है, उस ने मांबाप को शादी के झंझट से बचा लिया. सोचो, लाखों रुपए की बचत हो गई. तुम बेटी की शादी का खर्च बचाना चाहती थी. तुम्हारे बेटे ने स्वयं की शादी का खर्च बचा दिया.’’ नीता धम्म से सोफे के दूसरे किनारे पर गिर सी पड़ी. वह केशव बाबू के पैरों की तरफ झुकती हुई बोली, ‘‘आप को मजाक सूझ रहा है और मेरी जान निकली जा रही है. वह न तो कोई नौकरी कर रहा है, न उस का एमबीए पूरा हुआ है. ऐसे में वह बरबाद हो जाएगा. वह लड़की उसे बरबाद कर देगी.’’

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आगे पढ़ें- केशव बाबू के लिए यह चिंता…

घर का चिराग: भाग 1- क्या बेटे और बेटी का फर्क समझ पाई नीता

केशव बाबू सठिया गए हैं. क्या सचमुच…वे तो अभी पचास के भी नहीं हुए, फिर भी उन की बीवी ऐसा क्यों कहती है कि वे सठिया गए हैं. उन्होंने तो ऐसा कोई कार्य नहीं किया. बस, बीवी की बात का हलका सा विरोध किया था. सच तो यह है कि वे जीवनभर अपनी पत्नी का विरोध नहीं कर पाए. उस के खिलाफ कभी कुछ कह नहीं पाए और बीवी अपनी मनमानी करती रही. दरअसल, उन की बीवी नीता उन पत्नियों में से थी जो धार्मिक होती हैं. रातदिन पूजापाठ में व्यस्त रहती हैं, पति को सबकुछ मानती हैं, परंतु पति का कहना कभी नहीं मानतीं. ऐसी पत्नियां मनमाने ढंग से अपने पतियों से हर काम करवा लेती हैं.

केशव बाबू उन व्यक्तियों में से थे जो हर बात को सरल और सहज तरीके से लेते हैं. किसी बात का पुरजोर तरीके से विरोध नहीं कर पाते. कई बार वे दूसरों के जोर देने पर गलत बात को भी सही मान लेते हैं. वे बावजह और बेवजह दोनों परिस्थितियों में झगड़ों से बचते रहते हैं. उन की इसी कमजोरी का फायदा उठा कर नीता हमेशा उन के ऊपर हावी रहती है. आज भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं हुई थी. बेटे विप्लव की पढ़ाई और भविष्य को ले कर पतिपत्नी के बीच चर्चा हो रही थी. उन का बेटा एमसीए कर के घर में बैठा हुआ था. 3 साल हो गए थे. अभी तक उस का कहीं प्लेसमैंट नहीं हुआ था. दरअसल, केशव बाबू उस के एमसीए करने के पक्ष में नहीं थे. वह पढ़ाई में बहुत साधारण था. बीसीए के लिए भी कई लाख रुपए दे कर मैनेजमैंट कोटे से उस का ऐडमिशन करवाया था. इस के पक्ष में भी वे नहीं थे क्योंकि वे जानते थे कि बीसीए करने के बाद भी वह अच्छी पोजीशन नहीं ला पाएगा. इस स्थिति में उस का कैंपस सेलैक्शन असंभव था और हुआ भी यही, बीसीए में उस के बहुत कम मार्क्स आए थे. फिर भी जिद कर के उस ने एमसीए में ऐडमिशन ले लिया था. इस पूरे मामले में मांबेटे एकसाथ थे और केशव बाबू अकेले.

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केशव बाबू ने केवल इतना कहा था, ‘‘इतनी कम मैरिट में किसी अच्छी कंपनी में तुम्हारे लिए नौकरी मिलना असंभव है. क्यों न तुम कंपीटिशन की तैयारी करो और छोटीमोटी नौकरी कर लो.’’इसी बात पर नीता भड़क गई थी. तीखे स्वर में बोली थी, ‘‘आप तो सठिया गए हैं. कैसी बेतुकी बात कर रहे हैं. एमसीए करने के बाद बेटा क्या छोटीमोटी सरकारी नौकरी करेगा? आप की अभी 10 साल की नौकरी बाकी है. बेटा कोई बूढ़ा नहीं हुआ जा रहा है और न हम भूखों मर रहे हैं. न हो तो बेटे को कोई और कोर्स करवा देते हैं. ज्यादा डिगरियां होंगी तो नौकरी मिलने में आसानी होगी.’’

केशव बाबू ने एक लाचार नजर नीता पर डाली और फिर बेटे की तरफ देखा. वह एक कोने में चुपचाप खड़ा इस तरह उन दोनों की बातें सुन रहा था, जैसे उस से संबंधित कोई बात नहीं हो रही थी. परंतु जब उन्होंने ध्यान से देखा तो बेटे के चेहरे पर एक कुटिल मुसकान विराजमान थी, जैसे कह रहा था, ‘आप लोग मेरे लिए लड़ते रहिए. पैसा बरबाद करते रहिए, परंतु करूंगा मैं वही जो मेरा मन करेगा.’ केशव बाबू को अपने बेटे की इस कुटिलता पर बड़ा गुस्सा आया. परंतु वे अच्छी तरह जानते थे कि उन के गुस्से की आग पर नीता के तर्कहीन पानी के छींटे पड़ते ही वे बर्फ की तरह ठंडे पड़ जाएंगे. तब उन्हें प्यार की गरमी देने वाला कोई नहीं होगा. वे रातभर इस तरह करवटें बदलते रहेंगे जैसे किसी ने उन के बिस्तर पर तपती रेत के साथसाथ कांटे भी बिछा दिए हों.हारे हुए जुआरी की तरह अंतिम चाल चलते हुए केशव बाबू ने कहा, ‘‘नौकरी बुद्धि से मिलती है, बहुत सी डिगरियों से नहीं और उस के लिए एक ही डिगरी काफी होती है. सोच लो, हमारी एक बेटी भी है. वह इस से ज्यादा बुद्धिमान और पढ़ने में तेज है. अपने जीवन की सारी कमाई बुढ़ापे तक इस की पढ़ाई पर खर्च करते रहेंगे, तो बेटी के लिए क्या बचेगा? उस की शादी के लिए भी बचत करनी है.’’

केशव बाबू की इतनी सरल और सत्य बात भी नीता को नागवार गुजरी और वह फिर से भड़क उठी, ‘‘आप को समझाने से कोई फायदा नहीं. आप सचमुच सठिया गए हैं. बेटी की शादी में बहुत सारा दहेज दे कर क्या करेंगे? सादी सी शादी कर देंगे.’’

‘‘परंतु क्या उस की पढ़ाई पर खर्चा नहीं होगा?’’

नीता की बुद्धि बहुत ओछी थी, ‘‘उस को बहुत ज्यादा पढ़ालिखा कर अपना पैसा क्यों बरबाद करें. वह कौन सा हमारे घर में बैठी रहेगी और हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेगी? लड़का हमारा वंश आगे बढ़ा कर हमारा नाम रोशन करेगा.’’ अपनी पत्नी की ओछी सोच पर केशव बाबू फिर तरस खा कर रह गए. इस के सिवा और कर भी क्या सकते थे. उन के सीधे स्वभाव का फायदा उठा कर नीता हमेशा उन पर हावी होती रही थी. अगर वे कभी अपनी आवाज ऊंची करते, तो उस की आवाज उन से भी ऊंची हो जाती. वह चीखनाचिल्लाना शुरू कर देती. इसी बात से वे डरते थे कि महल्ले वाले कहीं यह न समझ लें कि वे पत्नी के साथ मारपीट जैसा घटिया कृत्य करते हैं. सो, वे चुप हो जाते, फिर भी नीता का बड़बड़ाना जारी रहता. तब वे उठ कर बाहर चले जाते, सड़क पर टहलते या पार्क में जा कर बैठ जाते.केशव बाबू को बेटी की तरफ से कोई चिंता नहीं थी. वह पढ़ने में तेज थी. चिंता थी तो बस बेटे को ले कर, वह पढ़ने में न तो जहीन था, न बहुत ज्यादा अंक ही परीक्षा में ला पाता था. लेदे कर केवल डिगरी ही उस के हाथ में आती थी, परंतु केवल डिगरी से ही अच्छी नौकरी नहीं मिल सकती थी. पता नहीं, आगे चल कर क्या करेगा?

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इस बार भी नीता के आगे केशव बाबू की नहीं चली और बेटे ने एमबीए में ऐडमिशन ले लिया. इस के लिए भी उन्हें कई लाख रुपए खर्च करने पड़े. अब कई साल तक बेटा निश्ंिचत हो कर बाप के पैसे को लुटाता हुआ ऐश कर सकता था. न उसे पढ़ाई की चिंता करनी थी, न नौकरी की. बटी ने इंटर कर लिया तो एक बार फिर घर में हंगामा हुआ. वह 90 प्रतिशत अंक ले कर उत्तीर्ण हुई थी और बीटैक करना चाहती थी. केशव बाबू उस के पक्ष में थे, परंतु नीता नहीं चाहती थी. बोली, ‘‘जरा दिमाग से काम लो. एक साल बाद बेटी 18 की हो जाएगी. फिर उस की शादी कर देंगे. बीटैक कराने में हम पैसा क्यों बरबाद करें. ज्यादा पढ़ेगी तो विवाह भी ज्यादा पढ़ेलिखे लड़के के साथ करना पड़ेगा. उसी हिसाब से विवाह में भी पैसा ज्यादा खर्च होगा. हम क्यों अपना पैसा बरबाद करें. उस का पति चाहेगा तो उसे आगे पढ़ाएगा, वरना घर में बैठेगी.’’ केशव बाबू हैरत से नीता की ओर देखते हुए बोले, ‘‘तुम खुद पढ़ीलिखी हो और बेटी के बारे में इस तरह की बातें कर रही हो. आज नारी के लिए शिक्षा का महत्त्व कितना बढ़ चुका है, यह तुम नहीं जानती?’’

‘‘जानती हूं, बीए कर के मुझे क्या मिला? कौनसी नौकरी कर रही हूं. बीटैक कर के बेटी भी क्या कर लेगी. शादी कर के बच्चे पैदा करेगी, उन्हें पालपोस कर बड़ा करेगी, घर संभालेगी और बैठीबैठी मोटी होगी, बस. इस के अलावा लड़कियां क्या करती हैं, बताओ?’’ ‘‘जो लड़कियां नौकरी कर रही हैं और ऊंचेऊंचे पदों पर बैठी हैं, वे भी किसी की बेटियां, पत्नियां और मां होंगी. उन के घर वाले अगर इसी तरह सोचते, तो आज कोई भी नारी घर के बाहर जा कर नौकरी नहीं कर रही होती. वे नौकरियां कर रही हैं और देश, समाज व परिवार के विकास में योगदान दे रही हैं,’’ केशव बाबू जोर दे कर बोले.

आगे पढ़ें- इस बार केशव बाबू नीता की…

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मां का दिल महान: भाग 1- क्या हुआ था कामिनी के साथ

‘‘मां कहां हैं?’’ शायक ने अपनी पत्नी शुचि से प्रश्न किया.

‘‘क्या पता? मैं जब आई तब भी मां घर में नहीं थीं. एक घंटे से प्रतीक्षा कर रही हूं कि वे आ जाएं तो मैं भी चाय पी लूं,’’ शुचि ने उत्तर दिया.

‘‘तुम्हें अपनी चाय की चिंता है, मां की नहीं. वैसे भी तुम्हें चाय पीने से किस ने रोका है. चाय पी कर मां को बुला लातीं. इसी अपार्टमैंट के कौंप्लैक्स में होंगी. इस बिल्डिंग से बाहर तो वे जाती ही नहीं,’’ शायक क्रोधित हो उठा था.

‘‘तुम्हारी मां हैं, तुम्हीं बुला लाओ. मुझे तो तुम मांबेटे से बहुत डर लगता है. क्या पता किस बात पर भड़क जाओ. पहले हाथमुंह धो लो, मैं तुम्हारे लिए जूस ले आती हूं. अपने लिए चाय बना लूं क्या?’’ शुचि मुसकराई

‘‘तुम और तुम्हारी चाय. पिओ न, किस ने मना किया है? मैं पहले ही परेशान और थका हुआ हूं,’’ शायक अपना लैपटौप एक ओर पटकते हुए बोला.

‘‘क्यों गुस्सा हो रहे हो, संभाल कर रखो. लैपटौप टूट जाएगा. कंपनी का दिया हुआ है. इतनी लापरवाही ठीक नहीं है,’’ शुचि रसोई की ओर जाते हुए हंसी.

‘‘तुम्हें हर समय मजाक सूझता है,’’ शायक झुंझला गया.

‘‘तो मैं कहां मजाक कर रही हूं? वैसे मैं एक सुझाव दूं. तुम लंबी छुट्टी क्यों नहीं ले लेते? मां भी प्रसन्न हो जाएंगी कि उन का बेटा श्रवण कुमार उन के लिए कितना त्याग कर रहा है,’’ शुचि चाय की चुस्कियों का आनंद लेते हुए बोली.

‘‘मुझे व्यर्थ का क्रोध मत दिलाओ. तुम क्यों नहीं छोड़ देतीं अपनी नौकरी?’’

‘‘मैं तो तैयार हूं. तुम ने इधर आज्ञा दी और उधर मेरा त्यागपत्र मेरे बौस की मेज पर. तुम ही कहते हो, महंगाई बहुत बढ़ गई है. एक के वेतन से काम नहीं चलता. सच पूछो तो मैं अपने बच्चों को छात्रावास से घर लाना चाहती हूं. मन में बहुत अपराधबोध होता है. बच्चे पलक झपकते ही बड़े हो जाएंगे और हम तरसते रह जाएंगे,’’ शुचि एकाएक गंभीर हो उठी.

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‘‘अरे हां, यह बात तो मेरे दिमाग में आई ही नहीं. अब तो मां भी यहां हैं, उन्हें भी कंपनी मिल जाएगी. बच्चों को उन का मार्गदर्शन मिल जाएगा,’’ शायक ने कुछ सोच कर कहा.

‘‘मैं ने सोचा था, पर मुझे लगा कि कहीं मांजी को बुरा न लगे कि उन के आते ही बच्चों की जिम्मेदारी उन के कंधों पर डाल दी.’’

पतिपत्नी में अभी वार्त्तालाप चल ही रहा था कि कामिनी ने घर में प्रवेश किया.

‘‘मां, कहां चली गई थीं आप? मुझे कितनी चिंता हो जाती है,’’ उन्हें देखते ही शायक ने शिकायत की.

‘‘लो, इस में भला चिंता की क्या बात है. मैं क्या छोटी बच्ची हूं जो कहीं गुम हो जाऊंगी? घर से निकल कर जरा पासपड़ोस में घूम आती हूं तो मेरा भी मन बहल जाता है, उन की भी सहायता हो जाती है. सच कहूं, बड़ा संतोष होता है कि यह जीवन किसी के काम आ रहा है,’’ कामिनी बड़े संतोष से बोलीं.

‘‘पर मां, सुजाताजी तो अब ठीक हो गई हैं. और कितने दिनों तक उन की तीमारदारी में लगी रहोगी?’’

‘‘आज मैं उन के यहां थोड़े ही गई थी. आज तो मुझे तीसरे माले वाली रम्या बुला ले गई थी. परसों उस के बेटे का जन्मदिन है. मुझ से अनुनय करने लगी कि मैं उस की सहायता कर दूं.’’

‘‘और आप का कोमल दिल पिघल गया. आप तुरंत उन की सहायता करने को तैयार हो गईं,’’ शायक व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला.

‘‘हां, मेरा तो मन पसीज गया. आजकल की इन लड़कियों को घर का कामकाज तो कोई सिखाता नहीं है,’’ कामिनी शायक की बात पर ध्यान दिए बिना बोलीं.

‘‘तो आज से ही कल की तैयारी प्रारंभ हो गई? क्याक्या पकाया आज?’’ शायक ने प्रश्न किया.

‘‘बूंदी के लड्डू बनाए आज. वह तो बालूशाही भी बनाने के लिए कह रही थी पर मैं ने कह दिया कि बाकी काम कल करेंगे. अभी मेरा बेटा घर आ गया होगा और मेरे बारे में पूछ रहा होगा. बूंदी के लड्डू इतने अच्छे बने हैं जैसे हलवाई की दुकान से लाए गए हों,’’ कामिनी ने मानो राज की बात बताई.

‘‘आप ने बनाए हैं तो अच्छे ही बने होंगे. पाककला में तो आप की बराबरी बड़ेबड़े हलवाई भी नहीं कर सकते. थक गई होंगी आप. लीजिए, चाय पी लीजिए,’’ तभी शुचि चाय ले आई.

‘‘तेरी बात भी ठीक है, बेटी. चाय पीने का तो बहुत मन हो रहा था,’’ कामिनी ने चाय पीते हुए कहा.

‘‘लो, आप की रम्या बेटी ने चाय भी नहीं पिलाई क्या?’’ शायक ने फिर प्रश्न किया.

‘‘मां से उपहास करता है रे. उस बेचारी ने तो कई बार पूछा पर मैं ने ही मना कर दिया,’’ वे हंसीं.

‘‘अच्छा किया, मां. बहुत खराब चाय बनाती हैं वे. हम ने तो इसी डर से उन के यहां जाना ही छोड़ दिया,’’ शायक हंस दिया.

‘‘अच्छा, सच कह रहा है तू? कैसा जमाना आ गया है. 2 बच्चों की मां को चाय तक बनानी नहीं आती? घर में खाना कैसे बनाती होगी?’’

‘‘मैं आप से झूठ क्यों कहूंगा? खाना तो उन की नौकरानी बनाती है. जो कच्चापक्का बनाती है, खाना पड़ता है. पर वैसे वे बहुत होशियार हैं,’’ शायक नाटकीय स्वर में बोला.

‘‘अच्छा, मैं भी तो सुनूं उन की होशियारी के किस्से.’’

‘‘लो, अब भी आप को प्रमाण चाहिए. मेरी प्यारी मां. आजकल के स्वार्थी समाज में जहां कोई किसी को बेमतलब एक गिलास पानी को भी नहीं पूछता, वहां वे आप से जन्मदिन पार्टी के लिए सारे पकवान कितनी होशियारी से बनवा रही हैं, यह कम होशियारी है क्या?’’ न चाहते हुए भी शायक के स्वर में क्रोध झलक गया.

‘‘क्या कह रहा है, बेटे? ऐसी बात तेरे मन में आई भी कैसे. मैं क्या छोटी बच्ची हूं जो कोई बरगला ले? पड़ोसी एकदूसरे के काम आते ही हैं. तू तो मेरी आदत जानता है. महल्ले में किसी को भी कोई आवश्यकता पड़ती थी तो मैं अपना काम छोड़ कर उस की सहायता को दौड़ जाती थी. बदले में मुझे उन सब का जो सहयोग मिला उसे भी तुम भली प्रकार जानते हो,’’ कामिनी ने अपना पक्ष रखा.

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‘‘सौरी मां, मैं यह सब कह कर आप को दुखी नहीं करना चाहता था पर यहां के लोगों की मानसिकता अलग सी है. दूसरों को नीचा दिखाने में ही वे अपनी शान समझते हैं. हर चीज को लाभहानि के तराजू पर तौलते हैं ये लोग. सुजाताजी बीमार थीं, आप उन की मदद करना चाहती थीं, मैं ने कुछ नहीं कहा. पर रम्या का व्यवहार मुझे जंचा नहीं,’’ शायक बोलता रहा और कामिनी उसे अपलक निहारती रहीं.

‘‘क्या बात है, शायक? तुझे पासपड़ोस में मेरा मेलजोल बढ़ाना शायद अच्छा नहीं लगा?’’ वे पूछ बैठीं.

‘‘नहीं मां, बस डरता हूं कि कहीं कुछ अशोभनीय न घट जाए. शायद अकेलापन खल रहा है आप को. मैं आप का पक्ष भी समझता हूं. बस, आप को सावधान कर देना चाहता हूं.’’

‘‘ठीक है, तुझे बुरा लगता है तो आगे से खयाल रखूंगी. अब यह भी बता दे कि कल रम्या के यहां जाऊं या नहीं? क्या पता मेरे जाने से तुम लोगों की नाक नीची हो जाए,’’ कामिनी का गला भर्रा गया.

‘‘आप को बुरा लगा है तो माफ कर दो, मां. पर सच कहूं, जब कोई मेरी मां का अनुचित लाभ उठाता है तो मेरा खून खौल जाता है,’’ शायक स्वयं पर संयम नहीं रख सका.

‘‘क्यों, जरा सी बात पर घर सिर पर उठा रखा है. मां थक गई होंगी. उन्हें तरोताजा हो जाने दो,’’ शुचि ने बीचबचाव किया. फिर जरा सा एकांत पाते ही बोली, ‘‘क्यों व्यर्थ में बात का बतंगड़ बनाते हो. मां को अच्छा लगता है दूसरों की मदद करना तो हम कौन होते हैं उन्हें रोकने वाले.’’

‘‘मां नहीं जानतीं पर तुम तो रम्या को भली प्रकार जानती हो. लोगों को शीशे में उतार कर अपना काम निकलवाने में तो उन की बराबरी कोई कर ही नहीं सकता. पर वह मेरी मां को निशाना बनाए, यह मैं सहन नहीं करूंगा.’’

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अनकही इच्छाएं: क्यों पति औऱ बच्चों में वह भूल गई अपना अस्तित्व

लेखक- डा. हरिश्चंद्र पाठक

आज मेरे बेटे अरुण का अमेरिका से फोन आया. जब उस ने ‘ममा’ कहा तो मुझे ऐसा लगा मानो उस ने मुझे पहली बार पुकारा हो. मेरे रोमरोम में एक अजीब सा कंपन हुआ और आंखें नम हो गईं. लेकिन जब उस ने अपने डैडी के बारे में ज्यादा और मेरे बारे में कम बातें कीं तो मैं सारा दिन रोती रही. दिनभर यही सोचती रही कि उस ने मेरी तबीयत के बारे में क्यों नहीं पूछा. उस ने यह क्यों नहीं पूछा कि ममा, तुम्हारे जोड़ों का दर्द कैसा है. बस, पापा के ब्लडप्रैशर के बारे में, उन के काम के बारे में और फैक्टरी के बारे में ही पूछता रहा. उस ने अपनी छोटी बहन वत्सला के बारे में भी पूछा, लेकिन एक बार भी यह नहीं कहा कि ममा, तुम कैसी हो.

सारा दिन बीत गया, लेकिन मेरी रुलाई नहीं रुकी. यही सब सोचतेसोचते शाम हो गई. विजय फैक्टरी से आ गए थे. मैं ने मुंह धोया और किशन से चाय बनाने को कहा. उन के फ्रैश होने के बाद जब हम दोनों चाय पी रहे थे तो मैं चाह कर भी उन्हें अरुण के फोन के बारे में नहीं बता पाई. मुझे डर था कि बतातेबताते मेरा गला रुंध जाएगा और मैं शायद रो पड़ूंगी.

रात को खाने की मेज पर भी मैं कुछ न कह सकी और बात को सुबह की चाय के लिए छोड़ दिया.

मैं शुरू से ही काफी भावुक रही हूं. हालांकि, भावुक हर इंसान होता है, क्योंकि अगर भावनाएं नहीं होंगी तो वह इंसान नहीं होगा. कुछ लोग अपने भावों को छिपाने में माहिर होते हैं. मेरी तरह नहीं कि जरा सी बात पर रोने लगें. कभीकभी अपनी इस कमजोरी पर मुझे बड़ा गुस्सा आता है. मैं भी चाहती हूं कि दूसरे लोगों की तरह मैं भी बनावटी कवच ओढ़ कर अपने सारे दुखदर्द को उस के अंदर समेट लूं और बाहर से हंसती रहूं. लेकिन जिंदगी के लगभग 5 दशक पूरे करने के बाद भी मैं हर छोटीबड़ी बात पर बच्चों की तरह रो पड़ती हूं. कई बार तो मैं बहुत पुरानी बातें याद कर के भी अपनी आंखें नम कर लेती हूं.

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अब यह रोना मेरी जिंदगी का एक हिस्सा बन गया है. जिंदगी में मुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं रही. मायके में मांबाप की एकलौती बेटी थी तो ससुराल में सासससुर की एकलौती बहू बनी. फिर भी मेरा और मेरे आंसुओं का साथ ऐसे रहा, जैसे नदी और पानी का. मैं ने शायद ही आज तक ऐसा कोई दिन बिताया हो जिस दिन रोई न हूं.

रात को बिस्तर पर लेटी तो फिर अरुण के फोन का खयाल आ गया. बचपन में भी जब बाबूजी भैया के लिए पतंग या गेंद लाते थे तो मैं चुपचाप अपने कमरे में जा कर रोया करती थी. हालांकि मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं थी, मेरी गुडि़या थी, गुडि़या का बिस्तर था, रसोई का सामान था और ढेरों खिलौने थे, लेकिन फिर भी उस समय मैं खुद को उपेक्षित महसूस करती थी.

मेरी मां काफी कठोर स्वभाव की थीं. मुझे याद नहीं है कि कभी उन्होंने मुझे प्यार से गोद में बैठाया हो या कभी अपने साथ बाजार ले गईर् हों. मैं अपनी फरमाइश बाबूजी को ही बताती थी, उन्हीं के साथ बाजार जाती थी. वैसे मां के इस व्यवहार का कारण मुझे अब समझ में आता है.

दरअसल, हमारा ननिहाल ज्यादा पैसे वाला नहीं था. मां अभावों में पली थीं. हमारे बाबूजी सरकारी वकील थे, इसलिए घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. मां अपनी सारी इच्छाओं को पूरी करने में लगी रहतीं. वैसे तो वे काफी कंजूस थीं, लेकिन अपने गहनों और साडि़यों का उन्हें इतना शौक था कि महीने में 4 बार सर्राफा बाजार हो आती थीं.

मुझे तो तब आश्चर्य हुआ था जब मेरी शादी होने वाली थी. उन्हें इस बात की परवा नहीं थी कि कुछ ही दिनों में उन की बेटी उन्हें छोड़ कर चली जाएगी, बल्कि उन्हें यह चिंता थी कि वे लहंगा पहले दिन पहनेंगी या दूसरे दिन और लाल वाली साड़ी के साथ सोने का हार पहनेंगी या मोतियों का. मां घंटों तक अलगअलग गहने पहन कर कर खुद को आईने में निहारती रहतीं और मैं चुपचाप रोती रहती.

मां ने कभी मेरी किसी इच्छा का खयाल नहीं रखा. उन्होंने कभी किसी बात में मेरी तारीफ नहीं की. हां, मेरी गलतियां खूब निकालती थीं. मुझे याद है जब मैं ने शुरूशुरू में रोटियां बनाना सीखा था तो एक दिन बाबूजी बोले, ‘वाह, बेटा तू तो बहुत बढि़या फुलके बनाने लगी है.’

‘क्या खाक बढि़या बनाने लगी है. सारी रसोई में आटा फैला दिया,’ मां झट बोली थीं. मां ने यह बोल कर मुझे जो दुख दिया उसे मेरे अलावा कोई नहीं समझ सकता. कभीकभी मैं यह सोच कर पोंछा लगा देती कि शायद मां खुश हो जाएं, लेकिन मां देखते ही शाबाशी देने के बजाय चिल्ला उठतीं. ‘यह क्या किया बेवकूफ, पोंछे का पानी नाली में डाल दिया. अरे, इसे क्यारी में डालना था.’ मैं बाथरूम में जाती और नल खोल कर खूब रोती.

मां को न मेरी बनाई हुई चाय पसंद थी और न मेरी की हुई तुरपन. उन्हें मेरा गाना भी पसंद नहीं था जबकि इस के लिए मुझे स्कूल में कई इनाम मिल चुके थे.

जब मां घर से कुछ दिनों के लिए किसी शादी में या अपने मायके जातीं तो घर की सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर होती. मैं इस जिम्मेदारी को जहां तक होता, काफी अच्छी तरह निभाती और यह उम्मीद करती कि मां अगर शाबाशी नहीं भी देंगी तो कम से कम डांटेंगी तो नहीं. पर वे आते ही अपनी आदत के मुताबिक चिल्ला उठतीं, ‘तू ने तो 2 दिनों में ही सारा घी खत्म कर दिया. यह बाबूजी की पैंट क्यों नहीं धोई? भैया का कमरा इतना गंदा पड़ा है, ठीक नहीं कर सकती थी? क्या करती रही तू?’

मां के सामने मेरी कभी बोलने की हिम्मत न हुई. लेकिन मन ही मन खूब जवाब देती, ‘मां घी खाया ही तो है, फेंका तो नहीं? और इन दिनों पानी कुछ कम आया, इस वजह से पैंट रह गई. बाकी धुले हुए कपडे़ नहीं दिखे, इसी पैंट पर नजर पड़ी, मैं भैया का कमरा कब ठीक करती? सुबह खाना बनाने में रह जाती थी और शाम को स्कूल से लौट कर अपनी पढ़ाई करती थी.’ मैं यह सब खुद ही सोचती रहती और रोती रहती.

मैं हमेशा मां के मुंह से अपनी तारीफ सुनने को तरसती रही, लेकिन मेरी यह इच्छा कभी पूरी न हुई. वैसे मां मुझे ही नहीं डांटती थीं, वे बाबूजी को भी ऐसे ही फटकार लगतीं. एक बार बाबूजी अपना छाता कहीं भूल आए तो मां ने उन्हें ऐसे लताड़ा कि उन की बेचारगी देख कर उस दिन मैं रातभर तकिए में मुंह छिपा कर रोती रही.

मां की इस हिटलरशाही से तंग आ कर मैं यह भी सोचने लगती कि काश, मेरी शादी हो जाती तो रोजरोज की खिचपिच से और इस घुटन से तो छुट्टी मिलती.

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दरअसल, जब इंसान को बचपन में प्यार नहीं मिलता है तो वह इस प्यार को अपने जीवनसाथी और बच्चों में तलाशने की कोशिश करता है. मेरे अंदर भी एक आशा थी कि शादी के बाद मेरा पति मेरे सारे दर्द बांट लेगा. मैं उस के सारे दुख ले लूंगी और एकदूसरे की तकलीफें दूर करते हुए हम अपना जीवन आसान कर लेंगे.

लेकिन होनी में तो कुछ और लिखा था. मेरा सारा सोचना व्यर्थ गया. मेरी शादी एक संपन्न घराने में हुई. व्यापारिक घराना था. ससुरजी की 2 फैक्टरियां थीं. घर में सभी सुखसुविधाएं थीं, नौकरचाकर थे और मां जैसी सास थीं जिन्हें पा कर मैं निहाल हो गई थी. जब वे प्यार से मुझे अपने गले लगातीं या मेरे गालों पर हाथ फेरतीं तो मेरी आंखें अपनी आदत के अनुसार झरझर बहने लगतीं.

मेरे पति विजय ससुर के साथ बिजनैस में हाथ बंटाते थे. विजय सुदर्शन व्यक्तित्व के एक बहुत ही सीधेसादे इंसान हैं. वे मेरी हर इच्छा का खयाल रखते. वे खुद तो ज्यादा बोलते नहीं, लेकिन मेरी हर छोटीबड़ी बात को सिरआंखों पर रखते. उन की कम बोलने की आदत की वजह से धीरेधीरे मुझे तकलीफ होने लगी.

वे मेरा तो हर दर्द दूर करने की कोशिश करते, लेकिन अपनी कोई तकलीफ मुझे नहीं बताते. अपनी परेशानियां खुद ही झेल लेते. उन्हें बुखार है, इस का पता मुझे नौकरों से चलता था. उन की कार का पिछली शाम ऐक्सिडैंट हो गया, वह बात भी मुझे अपनी सास से मालूम होती थी. वे मुझे किसी बात की इत्तला देने की जरूरत नहीं समझते थे. जबकि, मैं उन के दुखों को बांटना चाहती थी, उन का सहारा बनना चाहती थी. जब ये बातें मुझे दूसरों से मालूम होती थीं तो मेरी आंखों से आंसुओं की बरसात शुरू हो जाती.

बचपन की आदत के मुताबिक मैं विजय को मन के कठघरे में खड़ा कर के खुद ही सवालजवाब करती रहती, ‘मैं उन की जीवनसंगिनी हूं. क्या मुझे उन की तकलीफों को जानने का अधिकार नहीं है? उन के मन में क्या चल रहा है, यह मुझे पता चलना जरूरी नहीं है?’ और इस की सजा थी, मेरा रातभर का रोना.

जब लेडी डाक्टर ने मेरा चैकअप कर के बताया कि मैं मां बनने वाली हूं तो फिर एक बार आशा बंधी कि कोई होगा मेरा अपना जो मुझे समझेगा, मेरी तकलीफ दूर करेगा. यह सोच कर मैं फिर रो पड़ी. डाक्टर ने सोचा, मैं घबरा गई हूं इसलिए वे मुझे समझाने लगीं, ‘डरने की बात नहीं है, मैं तुम्हारी सास को बहुत अच्छी तरह जानती हूं. मैं यहीं आ कर तुम्हें देखती रहूंगी.’ लेकिन इन्हें क्या पता कि मैं तो इस आशा पर खुश हो कर रो रही हूं जिस ने फिर से मुझे जीने की प्रेरणा दी है. आशाओं के अभाव में तो जीवन शून्य हो जाता है.

विजय इस खबर से काफी खुश थे. अब वे मेरा और ज्यादा खयाल रखने लगे. मैं ने एक प्यारी सी बेटी की तमन्ना की थी, लेकिन मुझे पहला बेटा हुआ. मुझे याद है, जब मैं ने पहली बार अरुण को गोद में ले कर उस का माथा चूमा था, तो उस के माथे पर मेरा एक आंसू टपक पड़ा था जिसे मैं ने सब की नजरें बचा कर जल्दी से पोंछ दिया था.

अब मैं काफी व्यस्त रहने लगी थी. विजय सुबह अरुण के उठने से पहले ही चले जाते और उन के लौटने तक अरुण सो जाता था. मैं वैसे भी अरुण को किसी से बांटना नहीं चाहती थी. उसे जमानेभर की खुशियां देना चाहती थी. उसे इतना प्यार देना चाहती थी कि जितना आज तक दुनिया में किसी मां ने अपने बेटे को न दिया होगा.

आज अरुण 25 साल का है और मुझे याद नहीं कि मैं ने उसे आज तक किसी बात पर जोर से डपटा हो, मारना तो दूर की बात है. लेकिन मेरे दिल को सब से बड़ा झटका उस समय लगा जब अरुण ने अपने मुंह से पहला शब्द मां के बजाय पा…पा निकाला था. अब वह अपने पापा को देख कर उछलने लगा था और मेरी गोद से उतर कर उन के पास जाने की जिद करता. मैं अपने कमरे में आ कर फूटफूट कर रोती रहती. विजय ने उस का दाखिला अपनी पसंद के स्कूल में करवाया. वे उसे अपनी पसंद का नाश्ता करवाते और अपनी पसंद के कपड़े भी पहनाते.

उन्हीं दिनों अचानक ससुरजी का देहांत हो गया. ज्यादा समय नहीं गुजरा कि सास भी हमें छोड़ कर चली गईं. अब तो मुझ से बोलने वाला भी घर में कोई नहीं रहा. कंपनी का सारा भार विजय के कंधों पर आ गया था. उन दिनों न उन्हें खाने की फुरसत थी और न सोने की. सुबह आननफानन नाश्ता कर के जाते, तो यह खबर न रहती कि शाम को डिनर पर कब आएंगे.

मिल में इन दिनों काफी दिक्कतें आ गई थीं. मजदूरों की हड़ताल चल रही थी. ये बातें भी मुझे बाहर से पता चलती थीं. वे तो इन बातों का जिक्र ही नहीं करते थे. शाम को डाइनिंग टेबल पर सिर झुका कर खाना खाते. कभीकभी तो मुझे इस अंगरेजी सभ्यता पर क्रोध भी आता. कुरसी पर बैठ कर खाइए, जो चाहिए खुद ले लीजिए और रोटी के लिए नौकर को आवाज लगा दीजिए.

कभी जी में आता कि मैं भी मां की तरह अपने हाथों से रसोई बनाऊं. सब को सामने बैठा कर अपने हाथों से खाना खिलाऊं. दाल में नमक पूछूं. यह भी पूछूं कि क्या चाहिए? पर यहां तो पतिपत्नी के बीच संवाद ही नहीं था. कोई विषय ही नहीं था, जिस पर हम चर्चा कर सकें. यह सब सोच कर मेरी आंखें भर आतीं.

खैर, धीरेधीरे फैक्टरी की समस्याएं कम हो गईं. विजय ने सबकुछ संभाल लिया था. इसी बीच एक दिन डा. दीपक कुमार की पत्नी से शौपिंग सैंटर पर मुलाकात हुई. उन्होंने विजय की तबीयत के बारे में पूछा तो मैं हैरान हुई. फिर जब उन्होंने कहा कि विजय का ब्लडप्रैशर पिछले दिनों बढ़ गया था तो मैं हक्कीबक्की रह गई. यह तो हद थी खामोशी की.

उस रात मैं ने खाना नहीं खाया. जब विजय ने मेरे बालों में हाथ फेरते हुए इस की वजह पूछी तो मैं उन के सीने से लग कर खूब रोई और फिर मैं ने अपने दिल की सारी भड़ास निकाल दी.

पूरी बात सुन कर विजय इत्मीनान से बोले, ‘दरअसल, मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था. तुम बहुत सीधी हो और बेकार में दुखी होगी, यही सब सोच कर मैं अपना दुख खुद सहता गया और वैसे भी, यह इतनी बड़ी बात थोड़े ही है.’

‘लेकिन विजय, तुम्हें क्या मालूम कि तुम जिस बात को मामूली समझते हो, वही बात मेरे लिए कितनी बड़ी है. अपने पति की बीमारी के बारे में मुझे बाहर वालों से पता चले, यह कितनी कष्टप्रद बात है मेरे लिए. इसे तुम क्या समझो.’ इस के बाद मेरा मन, मेरे मन का कठघरा, कठघरे में विजय और फिर रातभर की जिरह. मैं कभी किसी से कुछ कह नहीं पाती थी, लेकिन इतना सोचती थी कि रात भी छोटी पड़ जाती.

फिर वत्सला पैदा हुई. वत्सला को मैं ने सामान्य बच्चों की तरह पाला. हालांकि उस के हिस्से का संपूर्ण प्यार उसे दिया, लेकिन उस से कोई आशा नहीं बांधी. अब मैं ने अपनी इस नियति को स्वीकार कर लिया था. वैसे भी आशाएं जब टूटती हैं तो दिल जारजार रोता है और अब वह दुख मेरी बरदाश्त से बाहर था.

वत्सला ने मेरी काफी सेवा की. वह मुझे बहुत प्यार करती थी. प्यार तो मुझे अरुण भी करता था, लेकिन अपने डैडी के सामने वह मुझे भूल जाता. शायद वह जानता था कि मैं तो उसे प्यार करती ही हूं, इसलिए डैडी से जो थोड़ाबहुत समय मिलता है, उस में उन का प्यार भी वसूल कर लूं. वह हमेशा अपने डैडी की तरफदारी करता. पिकनिक कहां जाएंगे, घर में किस कलर का पेंट होगा, बर्थडे किस तरह मनाया जाएगा या दीवाली में कितनी आतिशबाजी छोड़ी जाएगी, यह सब निर्णय बापबेटा खुद मिल कर करते थे. लेकिन वत्सला मेरी वकालत करती रहती और उस के डैडी अकसर उस की बातें मान लिया करते. वत्सला को मेरी पसंद की चीजें ही अच्छी लगतीं. अपनी शादी के वक्त भी उस ने सारे कपड़े और गहने मेरी पसंद के ही लिए. उसे देख कर मुझे जब अपना बचपना याद आता, मां की फटकार याद आती तो मेरे आंसू छलक आते.

मां ने हमेशा मेरी बालसुलभ इच्छाओं को दबाया. उन्होंने मुझे उन तारीफों से वंचित रखा जो एक किशोरी के विकास के लिए जरूरी हैं. हालांकि विजय ने अपने सारे कर्तव्यों को पूरा किया, फिर भी मुझे एक पत्नी के अधिकारों से दूर रखा. अरुण ने मेरे ममत्व को ठेस पहुंचाई, जबकि मैं ने उसे पालने में

कोई कमी या कसर नहीं छोड़ी. दरअसल, हम स्वार्थी मांएं ऐसे ही दुखी होती हैं जब हमारे बच्चे हमारे प्यार के बदले की गई हमारी इच्छाओं को पूरा नहीं करते.

लेकिन वत्सला, जिस से मैं ने कभी कोई आशा ही नहीं की, मुझे जीवनभर का संपूर्ण प्यार दिया. जब वह मेरे सिर में अपने छोटेछोटे हाथों से बाम लगाती तो यही एहसास होता कि मैं अपनी मां की गोद में सोई हूं. जब वह अपने कालेज की या दोस्तों की बातें बता कर हंसाती तो उस में मुझे अपनी अंतरंग सहेली की झलक नजर आती. यद्यपि मैं ने उस से कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन वह मेरे दुख को महसूस करती थी. उस की शादी के दिन मैं उसे निहारनिहार कर खूब रोई. विदाई के समय तो मैं बेहोश हो गई थी.

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विजय ने अरुण को पढ़ने के लिए अमेरिका भेज दिया. उस दिन भी मेरी आंखों में आंसुओं की बाढ़ नहीं थम रही थी, जब उस ने मेरे कंधों पर हाथ रख कर कहा, ‘ममा, अपना खयाल रखना.’ मैं उस से लिपट कर ऐसे बिफर पड़ी कि फिर संभल न पाई. विजय ने मुझे अरुण से अलग किया और फिर मैं घर कैसे पहुंची, मुझे कुछ याद नहीं.

अब तक तो घर में चहलपहल थी. दोनों बच्चों के चले जाने के बाद घर काटने को दौड़ता. नौकरों की चहलपहल से अपने जीवित होने का एहसास होता. मन के भीतर तो पहले ही सूनापन था, अब बाहर भी वीराना हो गया.

यही सब सोचतेसोचते कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. सुबह घड़ी के अलार्म से नींद टूटी. सिर दर्द से भारी हो रहा था. आंखों की दोनों कोरें नम थीं. मैं उठ कर बाथरूम में चली गई. चाय के साथ विजय को अरुण के फोन के बारे में बताने के लिए खुद को तैयार जो करना था.

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सुजाता: भाग 3- क्यों अतुल ने पत्नी से मांगा तलाक?

देखतेदेखते 5 साल गुजर गए थे. उस ने अपनी थीसिस सबमिट कर दी थी जिस में सौरमंडल के ग्रहों के बारे में अतिरिक्त दुर्लभ जानकारियां थीं. उस की थीसिस को अमेरिका के अतिरिक्त अन्य कई देशों की साइंस मैगजींस में प्रकाशित किया गया था. सब ने इस थीसिस की सराहना की थी.

सुजाता एस्ट्रोफिजिक्स में पीएचडी डिग्री प्राप्त कर अब डा. सुजाता थी. स्टैनफोर्ड में भी उस ने अपना वर्चस्व कायम कर रखा था. पढ़ाई के अतिरिक्त वह सांस्कृतिक कार्यक्रमों और भारतीय व अमेरिकी उत्सवों में भाग लेती थी. दीक्षांत समारोह के अवसर पर सुजाता ने अपने पिता को भी अमेरिका बुलाया था. वे भी अपनी बिटिया की संघर्षमय सफलता पर प्रसन्न थे.

इस दौरान एक भारतीय विधुर ने सुजाता को प्रोपोज किया था. उस ने अपने पिता से पूछा भी था. रेणु से भी चर्चा की थी. दोनों को कोई आपत्ति न थी. पिता को तो खुशी होती अगर सुजाता का घर फिर बस जाता.

वह एक बार उस विधुर के साथ डेट्स पर भी गई थी, परंतु यह एक औपचारिकताभर थी उस व्यक्ति का स्वभाव और विचार परखने के लिए. सुजाता को यह प्रपोजल स्वीकार नहीं था. उस को लगा कि यह व्यक्ति रेणु का सौतेला पिता बनने के योग्य नहीं था. इस के बाद उस के पास फिर कभी शादी की बात सोचने की फुरसत भी नहीं थी.

पीएचडी करने के दौरान ही सुजाता को नासा से एस्ट्रोफिजिसिस्ट साइंटिस्ट का औफर मिल चुका था. उसे मोफेट कील्ड, कैलिफोर्निया में स्थित नासा के रिसर्च सैंटर में पोस्ट किया गया था. सुजाता को उस की विशिष्ट उपलब्धियों के आधार पर ग्रीन कार्ड आसानी से मिल गया था. अब वह अमेरिका की स्थाई निवासी थी.

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इस बीच, उस के पूर्व पति अतुल को भी अपनी पूर्र्व पत्नी की उपलब्धियों की जानकारी मिल चुकी थी. अमेरिकन लड़की से शादी के बाद उसे भी ग्रीन कार्ड मिल गया था. एक दिन उस ने सुजाता को फोन किया था. परंतु सुजाता ने उस को कोई तवज्जुह नहीं दी थी. उस ने मात्र इतना ही कहा, ‘‘हम मांबेटी दोनों बहुत खुश हैं, अब आगे हमारी जिंदगी में दखल न देना.’’ और फोन काट दिया था.

इधर अतुल की अपनी नई अमेरिकन बीवी के साथ निभ नहीं रही थी. उस की बीवी ने ही तलाक की अर्जी कोर्ट में दे रखी थी जो 6 मास होतेहोते मंजूर भी हो गई थी. अतुल को आधी संपत्ति उस अमेरिकन को देनी पड़ी थी.

सुजाता की बेटी रेणु करीब 15 साल की हो चली थी. वह भी कैलिफोर्निया की जूनियर चैस चैंपियन थी. एक बार फिर अतुल ने सुजाता से फोन कर मिलने की इच्छा व्यक्त की थी. पहले तो वह नहीं मान रही थी, पर उस के बारबार के आग्रह पर रविवार को सुबह मिलने को कहा. सुजाता ने रेणु को भी सारी सचाई बता दी थी, हालांकि, अतीत की कुछ बातें रेणु को अभी भी याद थीं.

डा. सुजाता ने सैन होजे में बड़ा घर खरीद लिया था. अतुल रविवार को सुजाता से मिलने पहुंचा था. रेणु ने स्नैक्स और जूस ला कर सामने टेबल पर रखा था.

रेणु को सामने देख कर अतुल बहुत खुश हुआ और बोला, ‘‘इधर आओ बेटी, मैं तुम्हारा पिता हूं.’’

सुजाता ने उस की बात काटते हुए कहा, ‘‘गलत. बिलकुल गलत. तुम उस के पिता थे. अब नहीं रहे.’’

अतुल बोला, ‘‘सौरी. पर क्या हम फिर से एक नहीं हो सकते? जब जागो तभी सवेरा.’’

सुजाता बोली, ‘‘याद करो, परदेश में तुम ने मुझे बेसहारा समझ सड़क पर ला कर खड़ा कर दिया था. मैं तो कभी सोई ही नहीं. हमेशा जगी और सचेत थी. हां, तुम जाग कर भी सोए हुए थे. जगे हुए को जगाया नहीं जाता है.’’

अतुल बोला, ‘‘मुझे तुम से तलाक लेने का अफसोस है. पर क्या फिर हम मिल नहीं सकते?’’

सुजाता ने कहा, ‘‘तुम अभी तक 2 बीवियों से तो निभा नहीं सके हो. तुम पर कोई मूर्ख लड़की भी भरोसा नहीं करेगी, मेरा तो सवाल ही नहीं उठता.’’

अतुल बोला, ‘‘एक बार फिर से सोच लो. आखिर, रेणु को भी पिता का संरक्षण मिल जाएगा.’’

सुजाता बोली, ‘‘अब तुम इतने दिनों

से अमेरिका में रह कर भी

बेवकूफी वाली बात कर रहे हो. यहां लड़कियां और औरतें बहुत सुरक्षित हैं. तुम तो कंप्यूटर इंजीनियर हो. तुम्हें पता होना चाहिए कि मैं जहां भी रहूं, सैलफोन में ऐप्स के द्वारा रेणु और घर पर बराबर नजर रख सकती हूं. वैसे, हम दोनों अपने बल पर अपनी रक्षा कर सकते हैं. तुम्हारे जैसे कमजोर मर्द क्या सुरक्षा देंगे? तुम अपनी फिक्र करो. हो सकता है, तुम्हें किसी औरत का संरक्षण चाहिए.’’

अतुल बोला, ‘‘एक बार रेणु से भी पूछ लो, उसे पिता नहीं चाहिए?’’

सुजाता ने रेणु से पूछा, ‘‘क्यों बेटे, मिस्टर अतुल को क्या जवाब दूं?’’

रेणु बोली, ‘‘मेरी मम्मीपापा दोनों आप हो मौम. हम दोनों में इतनी

शक्ति और क्षमता है कि किसी तीसरे की कोई गुंजाइश नहीं है हमारे बीच. मिस्टर अतुल से कह दो, कृपया चले जाएं.’’

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सुजाता अतुल की तरफ देख कर बोली, ‘‘तुम्हें जवाब चाहिए था, मिल गया न. नाऊ, यू कैन गो. और कभी नारी को अबला समझने की भूल भविष्य में न करना.’’

अतुल बिना कुछ बोले सुजाता के घर से निकल पड़ा था.  द्य

ऐसा भी

होता है

बात पुरानी है. हमें हिमाचल प्रदेश के किसी गांव में किसी शादी में जाना था और वह गांव मुख्य सड़क से काफी अंदर जा कर था.  बस से हम शाम ढले उस जगह पहुंचे जहां से हमें मुख्य सड़क से गांव की ओर पैदल जाना था लेकिन जब बस से उतरे तब बाहर बहुत तेज वर्षा हो रही थी.

अब गांव जाएं तो कैसे जाएं, यही सोचतेसोचते हम परिवार समेत सड़क किनारे स्थित एक छप्परनुमा दुकान की छत के नीचे खड़े हो गए.

दुकान में बैठे एक बुजुर्ग शायद हमारी समस्या को भांप गए थे. उन्होंने हमें बड़ी विनम्रता से छप्पर के अंदर आने को कहा सो हम अंदर चले गए और वहां पर बने एक चबूतरेनुमा बैंच पर बैठ गए.

उन दिनों मोबाइल भी नहीं होते थे इसलिए गांव में सूचना देना भी संभव नहीं था. उधर वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी.

बातों ही बातों में रात हो गई और सब भूख से बेहाल होने लगे. हमारी स्थिति भांप कर वही बुजुर्ग बोले, ‘‘मैं तुम्हारे सब के लिए खाना बना देता हूं, खाना खा कर तुम सब इसी छप्पर के नीचे सो जाना क्योंकि बारिश तो बहुत तेज हो रही है. थमने का नाम नहीं ले रही. लगता है  सुबह तक होती रहेगी. ऐसे में तुम्हारा निकलना संभव नहीं. उन्होंने शायद हमारे मन की बात कह दी थी सो सब ने यह सोच कर चुपचाप उन की बात मान ली कि सुबह चलते समय हम उन को खाने का और ठहरने का दाम दे देंगे. इतना कुछ हमारे लिए कर रहे हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि उन की पैसे से मदद करें.

हम ने भरपेट खाना खाया और थकावट के कारण हमें झट से नींद आ गई. सुबह सो कर उठे तो देखा बारिश भी रुक गई थी तो हम ने सामान उठाया और उन बुजुर्ग को पूरी व्यवस्था के दाम पूछे.

पलट कर बुजुर्ग बोले, ‘‘बेटा यह सब व्यवस्था मैं ने पैसे के लिए नहीं की थी बल्कि इंसानियत के नाते की थी. इस दाने पर तुम्हारा नाम था सो तुम ने खाया.’’

यह सुनते ही मैं ने बुजुर्ग के चरण पकड़ लिए. मैं ने उन्हें कुछ तो पैसे लेने को कहा लेकिन उन्होंने एक पैसा नहीं लिया और यह सोचता चला आया कि दुनिया में इंसानियत अभी जिंदा है,

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सुजाता: भाग 1- क्यों अतुल ने पत्नी से मांगा तलाक?

अतुल ने सुजाता से तलाक मांगा, उस ने दे दिया. सुजाता को पति के प्यार की भीख नहीं चाहिए थी. अतुल ने सुजाता को अबला समझा था, लेकिन वह कमजोर नहीं थी…

मुकेश कुमार बनारस के नामी  वकील थे. दयालबाग में उन का बड़ा सा बंगला था. आज उन के घर की रौनक देखने लायक थी. हजारों रंगीन बल्ब जगमगा रहे थे. दर्जनों हैलोजन बल्ब्स सामने की रोड पर भी लगे थे. पूरी रोड को कवर कर बड़ा सा पंडाल सजाया गया था. पंडाल के अंदर भी काफी सजावट थी. और बिस्मिल्लाह खान की शहनाई बज रही थी. बरात के शानदार स्वागत की पूरी तैयारी थी. क्यों न हो, उन की इकलौती बेटी सुजाता की शादी जो थी.

सुजाता ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से बीएससी करने के बाद कंप्यूटर के कुछ कोर्स किए थे. वह राज्य की चैस चैंपियन थी. इस के अतिरिक्त, उस ने संगीत में प्राथमिक शिक्षा भी ली थी. देखने में सुंदर भी थी. उस का भावी पति अतुल लखनऊ का रहने वाला था. उस ने

भी बीएचयू से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में बीटैक किया था. बेंगलुरु में एक अमेरिकन कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर था. मुकेश साहब बेटी की शादी अच्छे सजातीय लड़के से कर निश्ंिचत हो गए थे. अरेंज्ड मैरिज थी. बेटी को जरूरत की सब चीजें दिल खोल कर दी थीं. शादी के एक सप्ताह बाद ही सुजाता पति के साथ बेंगलुरु आ गई थी.

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अतुल और सुजाता दोनों बहुत खुश थे. सुजाता तो शाकाहारी थी पर अतुल मांसाहारी था. पर सुजाता को इस में कोई आपत्ति नहीं थी. दोनों ने प्लानिंग की थी कि 5 साल के बाद ही कोई बच्चा हो. इस बीच, दोनों ने खूब मौजमस्ती की. देशविदेश की सैर भी की. शादी के 6 साल बाद सुजाता मां बनने वाली थी. तभी अतुल को लंबे समय के लिए अमेरिका जाना पड़ा था. कंपनी ने उस के लिए एच 1 बी जौब वीजा लिया था. सुजाता को एच 4 वीसा, जो आश्रितों के लिए होता है, मिला था.

दोनों अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत में आ गए थे. कुछ महीने बाद उन को एक प्यारी सी बेटी हुई थी, रेणु. अमेरिका में जन्म होने के कारण उसे अमेरिकी नागरिकता मिल गई थी. साथ में अतुल ने उस के लिए भारतीय कौंसुलेट से ओवरसीज सिटीजन औफ इंडिया कार्ड भी बनवा लिया था.

सुजाता अपने वीजा पर अमेरिका में कोई काम नहीं कर सकती थी. और वैसे भी, उस की डिगरी पर कोई नौकरी नहीं मिल सकती थी. पर वह घर पर ही कुछ भारतीय बच्चों को चैस सिखलाया करती थी.

इस से उस का समय कट जाता था. अमेरिका में बच्चों में पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ न कुछ सीखने का शौक होता है. वह इस के बदले में कोई फीस तो नहीं लेती थी क्योंकि औपचारिक तौर पर वह यह काम नहीं कर सकती थी. पर जब कभी रेणु के जन्मदिन पर और अपनी एनिवर्सरी पर उन बच्चों व उन के मातापिता को बुलाती थी तो वे जानबूझ कर कैश ही गिफ्ट करते थे. सुजाता ने अमेरिका में पियानो बजाना भी सीख लिया था.

शुरू के 4-5 साल तो ठीक से बीत गए थे. दोनों पतिपत्नी बहुत खुश थे. रेणु अब अमेरिका में स्कूल जाने लगी थी. कुछ दिनों बाद पति व पत्नी में अकसर नोकझोंक होने लगी थी क्योंकि अतुल अकसर वीकैंड में देररात घर लौटता था. इस के चलते कभीकभी तो लड़ाईझगड़े भी होते थे. अतुल का उसी की कंपनी में कार्यरत एक अमेरिकन लड़की से अफेयर चल रहा था. यह बात अब सुजाता से छिपी नहीं थी. सुजाता इस का कड़े शब्दों में विरोध करती थी. आएदिन घर में तनाव रहता था.

एक दिन अचानक अतुल ने सुजाता से कहा, ‘‘बेहतर है, अब हम अलग हो जाएं.’’

सुजाता बोली, ‘‘तनाव तो तुम ने पैदा किया है हमारे बीच उस अमेरिकन लड़की को ला कर. उसे अपनी जिंदगी से निकाल फेंको, सबकुछ अपनेआप ठीक हो जाएगा.’’

अतुल बोला, ‘‘तुम जैसा सोच रही हो, वह नहीं होगा. हमारे बीच की खाई पाटना अब मुमकिन नहीं है. क्यों न हम तलाक ले लें?’’सुजाता को इस की उम्मीद नहीं थी. उस ने अपने को संभालते हुए

कहा, ‘‘बेहतर है, तलाक की बात तुम ने शुरू की. मैं भी बंटा हुआ पति नहीं चाहती हूं.’’थोड़ी देर रुक कर, फिर सुजाता ने आगे कहा, ‘‘क्यों न हम एक बार इंडिया में अपनेअपने घर बात कर उन्हें यह सब बता दें? इस के बाद जैसा तुम कहोगे, वैसा होगा.’’

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अतुल इस के लिए तैयार नहीं था. उस के मन में चालाकी सूझी थी. उसे अमेरिका आए 5 साल से ज्यादा हो गया था. उस का एच 1 बी वीजा 8 महीने बाद खत्म हो रहा था. यह वीजा 6 साल से ज्यादा नहीं मिलता है. उस का मन अमेरिका छोड़ने का नहीं था. वहां की लाइफस्टाइल उसे बेहद पसंद थी. उस ने मन में अमेरिकन लड़की से शादी करने की ठान ली थी. इस से उसे ग्रीन कार्ड आसानी से मिल जाता. फिर अमेरिका में जितने दिन चाहता, रह सकता था. उस को भय था कि यह बात सुजाता के पिता को अच्छी नहीं लगेगी और वे खुद एक वकील हैं, आसानी से तलाक नहीं होने देंगे और मामला लंबे समय तक लटका रहेगा.

सुजाता ने आगे कहा, ‘‘तब सीरियसली बताओ, मुझे क्या करना चाहिए?’’अतुल बोला, ‘‘मैं यहां डाइवोर्स सूट फाइल करूंगा. और तुम्हें बता दूं कि कैलिफोर्निया में ‘नो फाल्ट’ तलाक का नियम है. यदि पति या पत्नी में से कोई भी यहां की कोर्ट में तलाक की अर्जी देता है किसी वजह से भी तो उसे कोर्ट में वजह साबित करने की जरूरत नहीं होती है. हां, ज्यादा से ज्यादा प्रौपर्टी के बंटवारे और बच्चे की कस्टडी के लिए आपस में समझौता कर लेना होता है या फिर कोर्ट के फैसले का इंतजार करना पड़ता है.’’

सुजाता बोली, ‘‘जब तुम ने फैसला कर ही लिया है, तो मैं तुम से जबरदस्ती बंध कर नहीं रह सकती.

हूं. ठीक है, अब देररात

हो चुकी है, आगे कल

बात होगी.’’

रात में सुजाता ने अपने पापा को सारी बातें विस्तार से बताई थीं. उस के पिता ने कहा भी था कि वे अतुल के पूरे परिवार को इंडिया में कोर्ट केस में बुरी तरह ऐसा फंसा देंगे कि पूरी जिंदगी कोर्ट के चक्कर लगाते रहेंगे.

सुजाता ने कहा, ‘‘नहीं पापा, इस में अतुल के परिवार का कोई दोष नहीं है. उन को बेवजह क्यों तंग करना है, और जब अतुल को मुझ से प्यार ही नहीं रहा, तो मैं क्या उन से प्यार की भीख मांगूं?’’

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अगले दिन सुजाता ने अतुल से कहा, ‘‘तुम अपने पेपर्स तैयार करा लो, मैं साइन कर दूंगी.’’

अतुल बोला, ‘‘इस में एक बाधा है जो तुम्हारे हित में नहीं है.’’

वह बोली, ‘‘अब भी तुम मेरा हित सोच रहे हो?’’

अतुल बोला, ‘‘बात ठीक से समझो. जिस दिन कोर्ट से तलाक मिल जाता है, उसी दिन से तुम्हारा अमेरिका में रहना, गैरकानूनी हो जाएगा क्योंकि तब तुम मुझ पर आश्रित नहीं रहोगी और तुम्हारा वीजा  रद्द हो जाएगा. तुम भारी मुसीबत में फंस जाओगी.’’

आगे पढ़ें- दिनों बाद अतुल ने सुजाता को तलाक से …

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