Family Story In Hindi: स्वस्थ दृष्टिकोण- भाग 3- क्या हुआ था नंदा के साथ

सारी की सारी कहानी का अंत यह हुआ कि चंदन काफी समय जेल में रहा था, उस की नौकरी छूट गई थी सो अलग. वे लोग तलाक ही नहीं देते थे. न जीते थे न जीने ही देते थे.

‘‘आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं, मुझे तब भी दाल में कुछ काला लगता था जब मानसी वापस आ गई थी. इस चंदन को अगर मानसी की हत्या करनी होती तो वह उस की गरदन काटता न कि जरा सी नस काट कर छोड़ देता ताकि वह जिंदा रह कर सब को बताए कि सच क्या है. बेटी का मसला था न, मैं क्या कहती, मगर यह सत्य है कि लड़की वालों को सदा सहानुभूति मिलती है और लड़का इसी बात का अपराधी बन जाता है कि उस ने सात फेरे ले लिए थे, बस,’’ नंदा बोली तो बस, बोलती ही चली गई, ‘‘बड़ी वाली बेटी घंटाघंटा अपनी ससुराल से हर रोज फोन करती थी तो क्या जरूरी था कि मानसी भी हर रोेज घंटाघंटा मां से बातें करती? हमारी भी तो बेटियां हैं न, हम क्या रोज उन से बातें करते हैं?’’

‘‘फोन मात्र सुविधा के लिए होते हैं ताकि समय पर जरूरी बात की जाए, गपशप लगाएंगे तो क्या फोन का बिल नहीं आएगा? हमारी ही बहू अगर हर रोज अपनी मां से फोन पर गपशप करेगी तो क्या हजारों रुपए बिल देते हुए हम चीखेंगे नहीं? आखिर इतनी क्या बातें होती हैं जो मानसी मां से करना चाहती थी?’’

‘‘ससुराल भेज दिया है बेटी को तो उसे वहां बसने का मौका भी देना चाहिए. ससुराल में घटने वाली जराजरा सी बातें अगर मायके में बताई जाएं तो वे मिठास कम खटास ज्यादा पैदा करती हैं. मुझे तब भी लगता था कि कहीं कुछ गलत हुआ है. अब तो संयोगिता ने भी कुछ बताना चाहा है न, सच कुछ और होगा, आप देख लेना.’’

‘‘घर की बहू शादी के एक महीने बाद ही सहायता के लिए महिला संघ में पहुंच जाए तो क्या ससुराल वाले डर कर उसे अलग नहीं कर देंगे. बेटा क्या पत्नी को स्नेह दे पाएगा जब उस के सिर पर हर पल पुलिस और महिला संघ की तलवार लटकती रहेगी? कोई भी रिश्ता डर से नहीं प्यार से पनपता है. चंदन और मानसी में प्यार कब पनपा होगा जो उन की निभ पाती?’’

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मैं चुपचाप सुनता रहा. यह सच है कि हमारी बेटियां अपनेअपने घर में खुश हैं. 15-20 दिन बाद वह हमें फोन कर के हमारा हालचाल पूछ लेती हैं, जराजरा सी बात न वह हमें फोन पर बताती हैं और न ही हम. अनुशासन तो जीवन में हर कदम पर होना चाहिए न. सीमित आय वाला हजारों रुपए का बिल कैसे चुका पाएगा. व्यर्थ क्लेश तो होगा ही न.

जल्दी ही हम दोनों चंदन से मिलने जा पहुंचे. दूल्हा बने कभी मानसी की बगल में बैठे देखा था उसे और अब ऐसा लग रहा था जैसे पूरे जीवन का संत्रास एकसाथ ही सह कर थकाहारा एक इनसान हमारे सामने खड़ा है.

चंदन ने हमारे पैर छू कर प्रणाम किया. मैं सोचने लगा, क्या अब भी हमारा कोई ऐसा अधिकार बचा है?

‘‘जीते रहो,’’ स्वत: निकल गया मेरे होंठों से.

कुछ पल हम आमनेसामने बैठे रहे. बात कैसे शुरू की जाए. मैं ने ही चंदन को पास बुला लिया, ‘‘यहां आ कर मेरे पास बैठो, चंदन. आओ बेटा.’’

एक पुरुष बच्चों की तरह कैसे रो पड़ता है मैं ने पहली बार देखा था. मेरे घुटनों पर सिर रख कर वह ऐसी दर्द भरी चीखों से रोया कि नंदा भी घबरा उठी. संयोगिता ने ही लपक कर उसे संभाला, ‘‘आप चाचाजी से सब कह दीजिए, चंदन. रोइए मत, आप इसी तरह रोते रहेंगे तो बात कैसे कर पाएंगे? मैं चाची को ले कर दूसरे कमरे में चली जाती हूं. आप चाचाजी से बात कीजिए. रोइए मत, चंदन.’’

तब सहसा मैं ने ही चंदन को संभाला और इशारे से नंदा को संयोगिता के साथ जाने का इशारा किया. तब एक संतोष भाव उभर आया था संयोगिता के चेहरे पर मानो मेरे इशारे से एक डूबते को तिनके का सहारा मिला हो. संयोगिता भरी आंखों से मेरा आभार जताती हुई नंदा के साथ चली गई.

हम दोनों अकेले रह गए. कुछ समय लग गया चंदन को सामान्य होने में. फिर धीरे से चंदन ने ही कहा, ‘‘मेरा जीवन इस कदर बरबाद हो जाएगा मैं ने कभी सोचा भी न था.’’

‘‘यह सब क्यों और कैसे हो गया, मुझे सचसच बताओ, चंदन. किस का कितना दोष था, समझाओ मुझे. क्या मानसी निभा नहीं पाई या…?’’

‘‘सब से बड़ा दोष तो मेरा ही था, चाचाजी. मुझे तो पता नहीं था कि मेरे शरीर में कोई कमी है. मेरा शरीर मेरा साथ नहीं दे पाएगा मैं नहीं जानता था.’’

यह सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया. चंदन कुछ देर चुप रहा फिर बोला, ‘‘यह सचाई मुझे स्वीकार करनी चाहिए थी न. जो मेरे बस में नहीं था मुझे उसे अपनी कमी मान कर मानसी को आजाद कर देना चाहिए था. मैं अपनी कमजोरी स्वीकार ही नहीं कर पाया.

‘‘हर बीमारी का इलाज है. ठंडे दिमाग से हल निकालता तो हो सकता था सब ठीक हो जाता. मानसी को सचाई से अवगत कराता तो हो सकता था वह मेरा साथ देती, मेरा मानसम्मान संभाल कर रखती. मगर मैं तो अपनी कुंठा, अपनी हताशा मानसी पर उतारता रहा. उस ने निभाने की कोशिश की थी मगर मैं ने ही कोई रास्ता नहीं छोड़ा था.

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‘‘मानसी जराजरा सी बात अपने मायके में बताती. मैं चिढ़ कर फोन ही काट देता. मैं ने मानसी की हत्या करने की कोशिश नहीं की थी. मानसी ने खुद ही तंग आ कर अपनी नसें काट ली थीं.

‘‘यह भी सच है कि मानसी अपनी बड़ी बहन की अमीर ससुराल से हमारी तुलना करती थी कि दीदी दिन में 2-2 बार मम्मी को फोन करती हैं इसलिए वह भी करेगी. पहली बार में ही जब लंबाचौड़ा बिल आ गया तो पिताजी ने साफसाफ मना कर दिया, जिस पर मानसी ने काफी बावेला मचाया.

‘‘हमारे घर में अनुशासन था जिस में बंधना मानसी को गंवारा नहीं था. हमारी नपीतुली आमदनी पर जब मानसी ने ताना कसा तो मैं ने भी कह दिया था कि लोग तो दामाद को 10-10 लाख देते हैं, इतना ही खुला हाथ है तो अपनी मां से मांग लो.

‘‘बस, इसी बात को मुद्दा बना कर मानसी के परिवार ने महिला संघ में शिकायत कर दी कि मैं दहेज की मांग कर रहा हूं. मैं ने घबरा कर मानसी को उस के पूरे दानदहेज के साथ अलग कर दिया. मैं नहीं चाहता था कि मेरे मातापिता पर कोई आंच आए.

‘‘हालात बिगड़ते ही चले गए, चाचाजी. सब मेरे हाथ से निकलता चला गया. मेरा दोष था, मैं मानता हूं. मैं ने सब का हित सोचा, अपने मांबाप का हित सोचा, अपनी कमजोरी छिपा कर सोचा कि अपना हित कर रहा हूं लेकिन बेचारी मानसी का हित नहीं सोचा. उसे कुछ नहीं दिया. मेरे जीवन से वह रोतीबिलखती ही चली गई.

‘‘मैं अपनी भूल मानता हूं लेकिन यह सच नहीं है कि मैं ने मानसी की हत्या का प्रयास किया था. मैं ने दहेज की मांग कभी नहीं की थी, चाचाजी. मैं ने मानसी को अपनी समस्या नहीं बताई, यह सच है लेकिन यह सच नहीं है कि मैं मानसी को पागल प्रमाणित करना चाहता था.

‘‘अखबारों में मुझ पर जोजो आरोप छपे वे सच नहीं हैं. सच तो सामने आया ही नहीं. जो अन्याय मैं ने कभी किया ही नहीं उस की सजा मैं ने क्यों पाई? इतना अपमान और इतनी बदनामी होगी मैं ने नहीं सोचा था.

‘‘मानसी के साथ एक सुखी गृहस्थी का सपना था मेरा. नहीं सोचा था, 2 दिन बाद ही मेरा घर जंग का मैदान बन जाएगा. मानसी का सहज सामीप्य ही असहनीय हो जाएगा.

‘‘मैं मानसी से दूर रहने के बहाने ढूंढ़ने लगा था. अपनी नपुंसकता को मानसी से अवगत कराता तो शायद वह मुझे सहारा देती. अपने मांबाप को भी कुछ बता पाता तो हो सकता था वही मुझे कोई रास्ता दिखाते. अपने ही खोल में घुटघुट कर मैं ने अपने साथसाथ मानसी का भी जीना हराम कर दिया था. मेरी वजह

से मानसी का जीवन बरबाद हो गया. मुझे अपनी कमी का एहसास होता तो मैं कभी शादी नहीं करता. सच का सामना करता तो शायद कोई आसान रास्ता निकल आता.

‘‘मेरी हताशा हर रोज कोई नई समस्या खड़ी करती और मानसी का मुझ से झगड़ा हो जाता. असहाय मानसी करती भी तो क्या?

‘‘चाचाजी, 4 साल बीत गए उस घटना को, मेरी सांस घुटती  है वह सब याद कर के. हम ने मानसी का जीवन तबाह किया है.’’

मैं भारी मन से सबकुछ सुनता रहा. आखिर कहता भी क्या.

‘‘मैं आज भी मानसी को भुला नहीं पाया हूं, चाचाजी,’’ चंदन ने आगे कहना जारी रखा, ‘‘मैं मानसी के लिए परेशान हूं््. मैं उस से सिर्फ एक बार मिलना चाहता हूं.

‘‘आज इतना सब भोगने के बाद सच का सामना करने की हिम्मत है मुझ में. चाचाजी, आप मुझे सिर्फ एक बार मानसी से मिला दें.

‘‘संयोगिता से जब शादी की तब क्या उसे पूरी सचाई बताई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, संयोगिता मेरे एक दोस्त की बहन है. मेरी सचाई जान गई थी. दोस्त की पत्नी ने सब बताया था इसे. मेरा दोस्त ही मुझे डाक्टर के पास ले गया था. मैं मानता हूं, मुझ से ही गलती हुई थी. जो कदम मैं ने इतनी बड़ी सजा भोगने के बाद उठाया वह तभी उठा लेता तो इतनी बड़ी घटना न होती.’’

‘‘अब मानसी से मिल कर दबी राख क्यों कुरेदना चाहते हो? जो हो गया उसे सपना समझ कर भूलने का प्रयास करो. क्या संयोगिता का दिल भी दुखाना चाहते हो, जिस ने जीवन का सब से बड़ा जुआ खेला तुम्हारा हाथ पकड़ कर? तुम्हारा मन हलका हो जाए, मैं इसीलिए चला आया हूं, मगर अब अगर संयोगिता का मन दुखाओगे तो एक और भूल करोगे,’’ कहते हुए मेरी नजर बाहर की बंद खिड़कियों पर पड़ी. मैं ने उठ कर सारे पट खोल दिए. ताजा हवा अंदर चली आई. मैं फिर बोला, ‘‘घुटघुट कर मत जिओ, चंदन, खुल कर जिओ और अपना जीवन सरल बनाना सीखो. संयोगिता, जो तुम्हें संयोग ने दी है, अब उसी को सहेजो. जो नहीं रहा उस का दुख मत करो, समझेन.’’

शांत हो चुका था चंदन. उस का कंधा थपक कर मैं बाहर चला आया.

बाहर नंदा मेरा ही इंतजार कर रही थी.

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घर आ कर मैं देर तक सामान्य नहीं हो पाया. सोचने लगा, क्या दोष था चंदन का? अपनी सामयिक नपुंसकता को सहज स्वीकार नहीं कर पाया, क्या यही दोष था इस का? हम में से कितने ऐसे पुरुष हैं जो अपनी नपुंसकता को सहज स्वीकार कर कोई स्वस्थ दृष्टिकोण अपना पाते हैं? लड़की वाले अकसर अपनी हालत यह प्रमाणित कर के ज्यादा दयनीय बना लेते हैं कि उन्हीं के साथ ज्यादा अन्याय हुआ है. मानसी भी तो सचाई अपनी मां को बता सकती थी. वह चंदन पर हत्या करने का आरोप लगा कर इतना बड़ा बखेड़ा तो खड़ा न करती. यह सच है कि चंदन से प्यार मिलता तो मानसी सब सह जाती लेकिन चंदन से मिली थी मात्र हताशा, मानसिक यातना, जिस का प्रतिकार मानसी ने भी इस तरह किया. दोनों में से किसी का भी तो भला नहीं हुआ न.

‘‘क्या सोच रहे हैं आप?’’ नंदा ने पूछा.

‘‘बस, इतना ही कि हमारा भी कोई बेटा होता तो…’’

‘‘एकाएक बेटा क्यों सूझा आप को?’’

‘‘बेटा नहीं सूझा, एक जरूरत सूझी है. क्या बेटे की शादी से पहले उस का पूरा मेडिकल चेकअप जरूरी नहीं है? जन्मपत्री की जगह रक्त मिलाना चाहिए. तुम क्या सोचती हो. मेरा बेटा होता तो उस की पूरी जांच कराए बिना कभी शादी न कराता.

‘‘यह संकोच की बात नहीं एक जरूरत होनी चाहिए. मानसी का जीवन अधर में न लटकता अगर चंदन के मांबाप ने यह स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाया होता.’’

चुप थी नंदा. इस का मतलब वह मेरे शब्दों से सहमत थी. संयोगिता ने इसे शायद सारा सच बताया होगा न.

ठंडी सांस ली नंदा ने. मेरी तरफ देखा. उस की आंखों में भी पीड़ा थी. बस, यही सोच कर कि जो हो गया उसे समय पर संभाल लिया जाता तो जो सब हो गया वह कभी न होता.

Family Story In Hindi: स्वस्थ दृष्टिकोण- भाग 2- क्या हुआ था नंदा के साथ

ऐसे ही 2-3 दिन बीत गए. हम समझ नहीं पा रहे थे कि सचाई कैसे जानें.

दरवाजे की घंटी बजी और हम पतिपत्नी हक्के- बक्के रह गए. सामने वही लड़की खड़ी थी. हमारी नन्ही पड़ोसिन जो अब मानसी के तलाकशुदा पति की पत्नी है.

कुछ पल को तो हम समझ ही नहीं पाए कि हम क्या कहें और क्या नहीं. स्वर निकला ही नहीं. वह भी चुपचाप हमारे सामने इस तरह खड़ी थी जैसे कोई अपराध कर के आई हो और अब दया चाहती हो.

‘‘आओ…, आओ बेटी, आओ न…’’ मैं बोला.

पता नहीं क्यों स्नेह सा उमड़ आया उस के प्रति. कई बार होता है न, कोई इनसान बड़ा प्यारा लगता है, निर्दोष लगता है.

‘‘आओ बच्ची, आ जाओ न,’’ कहते हुए मैं ने पत्नी को इशारा किया कि वह उसे हाथ पकड़ कर अंदर बुला ले.

इस से पहले कि मेरी पत्नी उसे पुकारती, वह स्वयं ही अंदर चली आई.

‘‘आप…आप से मुझे कुछ बात करनी है,’’ वह डरीडरी सी बोली.

बहुत कुछ था उस के इतने से वाक्य में. बिना कहे ही वह बहुत कुछ कह गई थी. समझ गया था मैं कि वह अवश्य अपने पति के ही विषय में कुछ साफ करना चाहती होगी.

पत्नी चुपचाप उसे देखती रही. हमारे पास भला क्या शब्द होते बात शुरू करने के लिए.

‘‘आप लोग…आप लोगों की वजह से चंदन बहुत परेशान हैं. बहुत मेहनत से मैं ने उन्हें ठीक किया था. मगर जब से उन्होंने आप को देखा है वह फिर से वही हो गए हैं, पहले जैसे बीमार और परेशान.’’

‘‘लेकिन हम ने उस से क्या कहा है? बात भी नहीं हुई हमारी तो. वह मुझे पहचान गया होगा. बेटी, अब जब तुम ने बात शुरू कर ही दी है तो जाहिर है सब जानती होगी. हमारी बच्ची का क्या दोष था जरा समझाओ हमें? चंदन ने उसे दरबदर कर दिया, आखिर क्यों?’’

‘‘दरबदर सिर्फ मानसी ही तो नहीं हुई न, चंदन भी तो 4 साल से दरबदर हो रहे हैं. यह तो संयोग था न जिस ने मानसी और चंदन दोनों को दरबदर…’’

‘‘क्या कार का लालच संयोग ने किया था? हर रोज नई मांग क्या संयोग करता था?’’

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‘‘यह तो कहानी है जो मानसी के मातापिता ने सब को सुनाई थी. चंदन के घर पर तो सबकुछ था. उन्हें कार का क्या करना था? आज भी वह सब छोड़छाड़ कर अपने घर से इतनी दूर यहां राजस्थान में चले आए हैं सिर्फ इसलिए कि उन्हें मात्र चैन चाहिए. यहां भी आप मिल गए. आप मानसी के चाचा हैं न, जब से आप को देखा है उन का खानापीना छूट गया है. सब याद करकर के वह फिर से पहले जैसे हो गए हैं,’’ कहती हुई रोने लगी वह लड़की, ‘‘एक टूटे हुए इनसान पर मैं ने बहुत मेहनत की थी कि वह जीवन की ओर लौट आए. मेरा जीवन अब चंदन के साथ जुड़ा है. वह आप से मिल कर सारी सचाई बताना चाहते हैं. आखिर, कोई तो समझे उन्हें. कोई तो कहे कि वह निर्दोष हैं.

‘‘कार की मांग भला वह क्या करते जो अपने जीवन से ही निराश हो चुके थे. आजकल दहेज मांगने का आरोप लगा देना तो फैशन बन गया है. पतिपत्नी में जरा अलगाव हो जाए, समाज के रखवाले झट से दहेज विरोधी नारे लगाने लगते हैं. ऐसा कुछ नहीं था जिस का इतना प्रचार किया गया था.’’

‘‘तुम्हारा मतलब…मानसी झूठ बोलती है? उस ने चंदन के साथ जानबूझ कर निभाना नहीं चाहा? इतने महीने वह तो इसी आस पर साथ रही थी न कि शायद एक दिन चंदन सुधर जाएगा,’’ नंदा ने चीख कर कहा. तब उस बच्ची का रोना जरा सा थम गया.

‘‘वह बिगड़े ही कब थे जो सुधर जाते? मैं आप से कह रही हूं न, सचाई वह नहीं है जो आप समझते हैं. दहेज का लालच वहां था ही नहीं, वहां तो कुछ और ही समस्या थी.’’

‘‘क्या समस्या थी? तुम्हीं बताओ.’’

‘‘आप चंदन से मिल लीजिए, अपनी समस्या वह स्वयं ही समझाएंगे आप को.’’

‘‘मैं क्यों जाऊं उस के पास?’’

‘‘तो क्या मैं उन्हें भेज दूं आप के पास? देखिए, आज की तारीख में आप अगर उन की बात सुन लेंगे तो उस से मानसी का तो कुछ नहीं बदलेगा लेकिन मेरा जीवन अवश्य बच जाएगा. मैं आप की बेटी जैसी हूं. आप एक बार उन के मुंह से सच जान लें तो उन का भी मन हलका हो जाएगा.’’

‘‘वह सच तुम्हीं क्यों नहीं बता देतीं?’’

‘‘मैं…मैं आप से कैसे कह दूं वह सब. मेरी और आप की गरिमा ऐसी अनुमति नहीं देती,’’ धीरे से होंठ खोले उस ने. आंखें झुका ली थीं.

नंदा कभी मुझे देखती और कभी उसे. मेरे सोच का प्रवाह एकाएक रुक गया कि आखिर ऐसा क्या है जिस से गरिमा का हनन होने वाला है? मेरी बेटी की उम्र की बच्ची है यह, इस का चेहरा परेशानी से ओतप्रोत है. आज की तारीख में जब मानसी का तलाक हो चुका है, उस का कुछ भी बननेबिगड़ने वाला नहीं है, मैं क्यों किसी पचड़े में पड़ूं? क्यों राख टटोलूं जब जानता हूं कि सब स्वाहा हो चुका है.

अपने मन को मना नहीं पा रहा था मैं. इस चंदन की वजह से मेरे भाई

का बुढ़ापा दुखदायी हो गया, जवान बेटी न विधवा हुई न सधवा रही. वक्त की मार तो कोई भी रोतेहंसते सह ले लेकिन मानसी ने तो एक मनुष्य की मार

सही थी.

‘‘कृपया आप ही बताइए मैं क्या करूं? मैं सारे संसार के आगे गुहार नहीं लगा रही, सिर्फ आप के सामने विनती कर रही हूं क्योंकि मानसी आप की भतीजी है. इत्तिफाकन जो घट गया वह आप से भी जुड़ा है.’’

‘‘तुम जाओ, मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकता.’’

‘‘चंदन कुछ कर बैठे तो मेरा तो घर ही उजड़ जाएगा.’’

‘‘जब हमारी ही बच्ची का घर उजड़ गया तो चंदन के घर से मुझे क्या लेनादेना?’’

‘‘चंदन समाप्त हो जाएंगे तो उन का नहीं मेरा जीवन बरबाद…’’

‘‘तुम उस की इतनी वकालत कर रही हो, कहीं मानसी की बरबादी

का कारण तुम्हीं तो नहीं हो? इस जानवर का साथ देने का भला क्या

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मतलब है?’’

‘‘चंदन जानवर नहीं हैं, चाचाजी. आप सच नहीं जानते इसीलिए कुछ समझना नहीं चाहते.’’

‘‘अब सच जान कर हमारा कुछ भी बदलने वाला नहीं है.’’

‘‘वह तो मैं पहले ही विनती कर चुकी हूं न. जो बीत गया वह बदल नहीं सकता. लेकिन मेरा घर तो बच जाएगा न. बचाखुचा कुछ अगर मेरी झोली में प्रकृति ने डाल ही दिया है तो क्या इंसानियत के नाते…’’

‘‘हम आएंगे तुम्हारे घर पर,’’ नंदा बीच में ही बोल पड़ी.

मुझे ऐसी ही उम्मीद थी नंदा से. कहीं कुछ अनचाहा घट रहा हो और नंदा चुप रह जाए, भला कैसे मुमकिन था. जहां बस न चले वहां अपना दिल जलाती है और जहां पूरी तरह अपना वश हो वहां भला पीछे कैसे रह जाती.

‘‘तुम जाओ, नाम क्या है तुम्हारा?’’

‘‘संयोगिता,’’ नाम बताते हुए हर्षातिरेक में वह बच्ची पुन: रो पड़ी थी.

‘‘मैं तुम्हारे घर आऊंगी. तुम्हारे चाचा भी आएंगे. तुम जाओ, चंदन को संभालो,’’ पत्नी ने उसे यकीन दिलाया.

उसे भेज कर चुपचाप बैठ गई नंदा. मैं अनमना सा था. सच है, जब मानसी का रिश्ता हुआ भैया बहुत तारीफ करते थे. चंदन बहुत पसंद आया था उन्हें. सगाई होने के 4-5 महीने बाद ही शादी हुई थी. इस दौरान मानसी और चंदन मिलते भी थे. फोन भी करते थे. सब ठीक था, पर शादी के बाद ही ऐसा क्या हो गया? अच्छे इनसान 2-4 दिन में ही जानवर कैसे बन गए?

भाभी भी पहले तारीफ ही करती रही थीं फिर अचानक कहने लगीं कि चंदन तो शादी वाले दिन से ही उन्हें पसंद नहीं आया था. जो इतने दिन सही था वह अचानक गलत कैसे हो गया. हम भी हैरान थे.

तब मेरी दोनों बेटियां अविवाहित थीं. मानसी की दुखद अवस्था से हम पतिपत्नी परेशान हो गए थे कि कैसे हम अपनी बच्चियों की शादी करेंगे? इनसान की पहचान करना कितना मुश्किल है, कैसे अच्छा रिश्ता ढूंढ़ पाएंगे उन के लिए? ठीक चलतेचलते कब कोई क्यों गलत हो जाता है पता ही नहीं चलता.

‘मैं ने तो मानसी से शादी के हफ्ते बाद ही कह दिया था, वापस आ जा, लड़कों की कमी नहीं है. तेरी यहां नहीं निभने वाली…’ एक बार भाभी ने सारी बात सुनातेसुनाते कहा था, ‘फोन तक तो करने नहीं देते थे, ससुराल वाले. बड़ी वाली हमें घंटाघंटा फोन करती रहती है, यह तो बस 5 मिनट बाद ही कहने लगती थी, बस, मम्मी, अब रखती हूं. फोन पर ज्यादा बातें करना ससुरजी को पसंद नहीं है.’

मानसी शिला सी बैठी रहती थी. एक दिन मैं ने स्नेह से उस के सिर पर हाथ रखा तो मेरे गले से लिपट कर रो पड़ी थी, ‘पता नहीं क्यों सब बिखरता ही चला गया, चाचाजी. मैं ने निभाने की बहुत कोशिश की थी.’

‘तो फिर चूक कहां हो गई, मानसी?’

‘उन्हें मेरा कुछ भी पसंद नहीं आया. अनपढ़ गंवार बना दिया मुझे. सब से कहते थे. मैं पागल हूं. लड़की वाले तो दहेज में 10-10 लाख देते हैं, तुम्हारे घर वालों ने तो बस 2-4 लाख ही लगा कर तुम्हारा निबटारा कर दिया.’

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हैरानपरेशान था मैं तब. मैं भी तब अपनी बच्चियों के लिए रिश्तों की तलाश में था. सोचता था, मैं तो शायद इतना भी न लगा पाऊं. क्या मेरी बेटियां भी इसी तरह वापस लौट आएंगी? क्या होगा उन का?

‘देखो भैया, उन लोगों ने इस की नस काट कर इसे मार डालने की कोशिश की है. यह देखो भैया,’ भाभी ने मानसी की कलाई मेरे सामने फैला कर कहा था. यह देखसुन कर काटो तो खून नहीं रहा था मुझ में. जिस मानसी को भैयाभाभी ने इतने लाड़प्यार से पाला था उसी की हत्या का प्रयास किया गया था, और भाभी आगे बोलती गई थीं, ‘उन्होंने तो इसे शादी के महीने भर बाद ही अलग कर दिया था.

‘जब से हम ने महिला संघ में उन की शिकायत की थी तभी से वे लोग इसे अलग रखते थे. चंदन तो इस के पास भी नहीं आता था. वहीं अपनी मां के पास रहता था. राशनपानी, रुपयापैसा सब मैं ही पहुंचा कर आती थी. इस के बाद तो मुझे फोन करने के लिए पास में 10 रुपए भी नहीं होते थे.’

आगे पढ़ें- मैं चुपचाप सुनता रहा. यह सच है कि…

Family Story In Hindi: सितारों से आगे- भाग 4- कैसे विद्या की राहों में रोड़ा बना अमित

लेखिका- डा. सरस्वती अय्यर

 अवसर मिलते ही उन्होंने विजय से विद्या के साथ शादी की बात की. विजय ने धैर्यपूर्वक उन की बातें सुनीं, फिर एक गहरी सांस ले कर बड़ी ही शांति से जवाब दिया, ‘‘मां किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले अच्छी तरह से सोचविचार कर लो. मैं पहले ही गलत निर्णय ले कर पछता चुका हूं. अब तुम जैसा ठीक समझे. तुम्हारी हर बात मुझे स्वीकार है पर एक बार विद्या के मन की भी थाह ले लो. अगर उसे कोई विरोध नहीं है तो मेरी तरफ से भी समझे हां ही है.’’

बेटे की तरफ से हरी झंडी मिलते ही लक्ष्मी देवी विद्या के मातापिता से मिलीं. लक्ष्मी देवी का प्रस्ताव सुन कर उन की खुशी से आंखें भर आईं. उन की सहमति पा कर लक्ष्मी देवी का उत्साह दोगुना हो गया. अब वे देर नहीं करना चाहती थीं. शाम को विद्या के मातापिता को विद्या और वृंदा सहित घर आने का निमंत्रण दे कर वे बाजार की ओर निकल पड़ीं. टैलीफोन पर विजय को इस सहमति की सूचना देना वे न भूलीं.

मगर विजय एक बार जीवन में धोखा खा चुके थे. इस बार वे जल्दीबाजी नहीं करना चाहते थे. वे विद्या से मिल कर इस बारे में बात करना चाहते थे. कुछ भी निर्णय लेने से पहले विद्या से मिलना जरूरी था. कुछ सोच कर उन्होंने अपने सैक्रेटरी को बुलाया. उसे कुछ निर्देश दे कर वे बाहर निकले और विद्या को मोबाइल पर फोन किया, पर उस का फोन औफ था. उन्होंने विद्या के औफिस नंबर पर फोन किया तो पता चला कि आज विद्या का टूरनामैंट है. आज वे शिवाजी इंडोर स्टेडियम में हैं.

विजय कार ले कर स्टेडियम जा पहुंचे और दर्शकों की पंक्ति में बैठ गए. इंटरस्टेट बैडमिंटन का महिला फाइनल एकल मैच चल रहा था. विद्या की सर्विस चल रही थी. कोर्ट पर आत्मविश्वास से लबरेज विद्या की चुस्तीफुरती देखने लायक थी. उस के हर शौट पर तालियां बज रही थीं.

अपनी प्रतिद्वंद्वी को सीधे सैटों में पराजित कर के जब विजेता का कप ले कर वह स्टेज से उतरी तो विद्या के समर्थकों ने उसे कंधों पर उठा लिया. विजय के लिए विद्या का यह रूप नया था. प्रभावित तो वे उस से थे ही, अब उस के प्रशंसक भी बन चुके थे. जल्दी से स्टेडियम के बाहर जा कर फूलों की दुकान से उन्होंने एक बुके लिया और विद्या को देने वे जब मेन गेट पर पहुंचे तो देखा वहां भारी भीड़ खड़ी थी.

लोग अपने प्रिय खिलाडि़यों से मिलना चाहते थे. 1-1 कर के खिलाड़ी निकल रहे थे, मगर उन में विद्या कहीं नहीं दिख रही थी. परेशान हो कर विजय ने आसपास खोजा तो देखा, दूर अपना बैग ले कर थकीहारी विद्या स्टेडियम के छोटे वाले गेट से लगभग दौड़ती हुई सी निकल रही थी.

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विजय को याद आया कल ही शाम विद्या ने उसे बताया था कि बेटी के स्कूल में पेरैंट्सटीचर मीटिंग है और आज 2 बजे उसे स्कूल जाना है. विजय का मन विद्या के लिए करुणा से भर आया. सच औरत के कितने रूप होते हैं और इन अलगअलग रूपों को जीते हुए वह अपनेआप को इस कदर व्यस्त रखती है कि वह स्वयं अपनेआप को भुला देती है. क्या उस को उस के हिस्से की खुशियां पाने का हक नहीं है? जरूर है और यह हक उस को मैं दूंगा. अब विद्या और वृंदा को मैं सहारा दूंगा. सोचतेसोचते उन की कार कब विद्या के पास पहुंची वे समझ ही न सके.

कार का दरवाजा खोल कर हाथ में गुलदस्ता ले कर वे विद्या के सामने पहुंच गए, ‘‘क्या मैं स्टेट लैवल चैंपियन विद्याजी को अपनी छोटी सी कार में लिफ्ट दे सकता हूं?’’ विद्या के हाथों में बुके देते हुए विजय मुसकराते हुए बोले.

सामने विजय को देख कर विद्या पहले तो चौंक गई, फिर उस के चेहरे पर एक शर्मीली मुसकराहट आ गई. विजय से बुके ले कर विद्या कार में बैठ गई. अब उस की थकान काफूर हो चुकी थी. कार सीधे वृंदा के स्कूल के बाहर रुकी.

विद्या सुखद आश्चर्य से भर उठी, ‘‘आप को कैसे मालूम है कि मुझे यहां आना था?’’

मुसकराते हुए विजय बोले, ‘‘अरे हम अंतर्यामी जो ठहरे. अब जाइए जल्दी से वरना मीटिंग के लिए देर हो जाएगी. मैं यहीं आप का इंतजार करता हूं. पर जरा जल्दी कीजिएगा क्योंकि मैं ने तय किया है कि आज मैं बैडमिंटन चैंपियन विद्याजी के साथ ही लंच करूंगा वरना भूखा रहूंगा.’’

विद्या हंस पड़ी, ‘‘बस 10 मिनट में आई,’’ बोल कर वह स्कूल के अंदर चली गई.

मीटिंग में 10 के बजाय 20 मिनट लग गए. मीटिंग के बाद और 3 पीरियड थे, इसलिए वृंदा को छुट्टी नहीं मिली. उसे कक्षा में छोड़ कर विद्या स्कूल के बाहर आई. देखा, कार में एक बढि़या सा किशोर कुमार का गाना बज रहा था और विजय साहब आंखें बंद कर गुनगुनाते हुए गाने का मजा ले रहे थे. विद्या कार का दरवाजा खोल कर सीट पर बैठ गई और कार का हौर्न बताया.

विजय चौंक कर उठ बैठे और पास में मुसकराती विद्या को देख कर उस की शरारत समझ गए. मंदमंद मुसकरा कर गाड़ी स्टार्ट की और सीधे होटल पहुंच कर ही गाड़ी रुकी. इतने बड़े फाइवस्टार होटल में विद्या पहली बार आई थी. अपने सादे कपड़ों की ओर जब उस का ध्यान गया तो वह संकोच से भर उठी. होटल के दरवाजे पर विद्या को सकुचाते हुए देख उस की मनोदशा को विजय समझ गए. उन्होंने विद्या का हाथ मजबूती से थामा और रेस्तरां की तरफ बढ़ गए.

भूख दोनों को ही जोर से लगी थी. खाने का और्डर दे कर वेटर को जल्दी खाना  लाने को बोल कर विजय विद्या को देख कर मुसकरा उठे. बिना कुछ बोले उसे कुछ देर देखते रहे.

उन्हें इस प्रकार देखते पा कर विद्या और भी असहज हो गई. खैर, तब तक खाना आ गया. विद्या ने राहत की सांस ली. दोनों ने शांति से बिना कुछ बोले खाना खाया.

आइसक्रीम का और्डर दे कर विजय ने विद्या से पूछा, ‘‘जानती हो मैं तुम्हें आज यहां ले कर क्यों आया हूं?’’

विद्या ने इनकार में सिर हिलाया तो विजय बोले, ‘‘तो सुनिए मैडम, आज शाम को मेरी मां हमारी शादी की तारीख पक्की करने वाली है और उस के पहले मैं तुम्हारी हां सुनना चाहता हूं,’’ विजय ने बड़े ही सीधेसादे शब्दों में बिना किसी भूमिका के कहा.

‘‘क्या?’’ विद्या भौकचक्की रह गई. एक पल को तो विजय की बात सुन कर विद्या को विश्वास ही नहीं हुआ. फिर बोली, ‘‘पर विजयजी ऐसा कैसे हो सकता है? आप जानते हैं न कि मैं एक बच्ची की मां हूं?’’

‘‘हां मैं जानता हूं और उस प्यारी सी बच्ची को मैं अपनाना चाहता हूं. उसे अपना नाम देना चाहता हूं. इस केअलावा मुझे इनकार करने का और कोई कारण है आप के पास?’’

विजय के इस सवाल का विद्या के पास कोई जवाब नहीं था और उन के प्रस्ताव को मना करने के लिए उस के पास कोई ठोस कारण भी नहीं था. पर सबकुछ इतना अचानक हो रहा था कि वह कुछ कह भी नहीं पा रही थी.

तभी कुछ आगे झक कर मुसकराते हुए विजय धीरे से फुसफुसाए, ‘‘तो मैं यह रिश्ता पक्का समझं?’’

विद्या ने शरमाते हुए हां में सिर हिला दिया. विजय ने अपना हाथ उस के हाथ पर रख दिया.

इस के बाद तो जैसे चट मंगनी और पट ब्याह. बड़ी ही सादगी से दोनों के परिवारजनों के सामने विवाह समारोह संपन्न हो गया और विद्या विजय की पत्नी बन कर उन के घर आ गई. सब से ज्यादा आश्चर्य तो विद्या को वृंदा के व्यवहार से हुआ. वृंदा ने बड़ी ही समझदारी का परिचय देते हुए विजय को पिता के रूप में स्वीकार कर लिया और विजय तो उस की हर इच्छा पूरी करने के लिए जैसे हर पल तैयार रहते थे. दोनों को देख कर कोई कह नहीं सकता था कि इन का रिश्ता कुछ ही दिनों पहले का है. विद्या को तो जैसे भरोसा ही नहीं हो रहा था.

सच है सितारों से आगे जहां और भी है. विजय के कहने पर उस ने 6 माह की लंबी छुट्टी ली थी. अब वह इस सुनहरे समय को अपने हाथों से नहीं निकलने देना चाहती थी. इस के हर पल, हर घड़ी को वह यादगार बना देना चाहती थी. खैर, हंसतेखेलते 5 माह निकल गए. विजय औफिस जातेजाते वृंदा को स्कूल छोड़ कर चले गए थे. सुबह के कामों को निबटा कर बालकनी में बैठ कर दैनिक अखबार पढ़ते हुए विद्या कौफी की चुसकियां ले रही थी. यह उस की रोज की दिनचर्या थी.

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ट्रिंगट्रिंग फोन की आवाज सुन कर विद्या उठी. विजय फोन पर थे. बोले कि विद्या मैं अपनी एक जरूरी फाइल घर पर भूल गया हूं. देखो अलमारी के पास की टेबल की दराज में हरे रंग की जो फाइल है, उसे निकाल कर रखो. मैं अपने एक आदमी को भेज रहा हूं, उसे दे देना. 12 बजे एक मीटिंग है. शाम को मिलते हैं. बाद में फोन करता हूं और विजय ने फोन रख दिया. विद्या ने फाइल निकाल कर सामने टेबल रख दी और अखबार में डूब गई.

कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी बज उठी. विद्या ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने विजय के दफ्तर से आया आदमी खड़ा था. उस ने विद्या को नमस्कार किया. विद्या ने उस के अभिवादन का जवाब देते हुए फाइल दे दी.

फाइल ले कर जातेजाते वह आदमी रुका, ‘‘मैडम आप ने मुझे पहचाना नहीं क्या?’’

‘‘नहीं,’’ कहते हुए विद्या ने उस अधेड़ से आदमी को पहचानाने की कोशिश की. अचानक उसे झटका लगा. उफ, इस आदमी की शक्ल को वह कैसे भूल सकती है? सामने अमित खड़ा था. खिचड़ी बाल, सफेद दाढ़ी, मोटा चश्मा, साधारण सी शर्ट पहने हुए यह आदमी पहले के स्मार्ट, हैंडसम, आत्मविश्वासी अमित से कितना अलग है. विद्या जैसे कहीं खो सी गई.

अमित ने आगे कहा, ‘‘विद्या मैं तो तुम्हें विजय सर की शादी के रिसैप्शन में ही पहचान गया था. पर तुम से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. मैं ने तुम्हारे साथ अच्छा नहीं किया, शायद इसलिए कुदरत ने मुझे मेरे कर्मों की सजा दी. तुम्हारे जाने के बाद परिवार में और औफिस में मेरे और शबनम के रिश्ते के बारे में सभी लोग जान गए थे. मैं चाहता था जल्दी से तुम से तलाक ले कर अपने और शबनम के रिश्ते को नाम दे दूं, पर तब तक हमारी काफी बदनामी हो चुकी थी. शबनम भी मेरे मांपिता की उस के प्रति नफरत को समझ चुकी थी. वह जानती थी कि मेरी मां उसे कभी माफ नहीं करेंगी.

‘‘इन सब से बचना ही उस ने बेहतर समझ और एक दिन किसी को बताए बिना दिल्ली हैड औफिस अपना ट्रांसफर करवा लिया और अपने पिता के साथ दिल्ली चली गई. तुम्हें कंप्रोमाइज में पैसा देना था तो जमापूंजी भी खर्च हो गई थी. शबनम उस से भी नाराज थी. मांबाबूजी ने मुझ से बात तक करना बंद कर दिया और अपनी पोती से मिलने की आस लिए दोनों एक के बाद एक इस दुनिया से चले गए.

तब से मैं अकेला ही रहता हूं. दिमागी हालत खराब हो जाने के कारण कंपनी में इंजीनियरिंग का काम ठीक से नहीं कर पाया, इस कारण मुझे औफिस से निकाल दिया गया. अब मैं विजय सर की कंपनी में क्लर्क हूं. मुझे माफ कर दो विद्या, शायद यही मेरे किए की सजा है. मैं अपने ही कर्मों का फल भुगत रहा हूं,’’ अमित लगातार बोलते जा रहा था.

विद्या जैसे सपने से जागी, सामने सिर झकाए खड़े विजय को उपेक्षा से देखते हुए पूरे आत्मविश्वास से कहा, ‘‘आप गड़े मुरदे उखाड़ना बंद कीजिए. अब मैं पुरानी विद्या नहीं, आपकी कंपनी के मैनेजर विजय कुमार की पत्नी हूं और याद रखिए यह आप से मेरी आखिरी मुलाकात है. मैं नहीं चाहती भूल कर भी आप की जबां पर अब कभी भी मेरा नाम आए और उस के बाद आप मेरे घर आने की जुर्रत भी न करें. यही आप के लिए और आप की नौकरी के लिए अच्छा रहेगा,’’ और विद्या ने उस के सामने ही दरवाजा जोर से बंद कर दिया.

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नहीं, अब बहुत हो गया. अब वह कमजोर नहीं पड़ेगी. विजय की दी हुई इस दूसरी जिंदगी के बीच अपने अतीत की काली परछाईं को कभी नहीं आने देगी.

विद्या का चेहरा दृढ़ निश्चय से चमक रहा था और क्यों न हो ऐसा? अब उस के सारे दुख और तकलीफें छंट चुकी थीं और सुनहरी धूप उस के स्वागत में बांहें पसारे तैयार खड़ी थी.

Family Story In Hindi: सितारों से आगे- भाग 3- कैसे विद्या की राहों में रोड़ा बना अमित

लेखिका- डा. सरस्वती अय्यर

 मगर विद्या सोई नहीं थी. अमित के तिरस्कारपूर्ण व्यवहार और अपमान से उस का दिल रो रहा था. पर वह समझ चुकी थी कि अब कुछ नहीं होने वाला है, उसे जल्दी कोई निर्णय लेना ही होगा. जो आदमी अपनी पत्नी के प्यार और समर्पण को नहीं समझ पाया, उस के मन में अपने अनदेखेअनजन्मे बच्चे के लिए मोह कहां से जागेगा, ऐसे निर्मोही के साथ जीवन बिताने का क्या मतलब? विद्या ने एक पल की भी देर न की. उस ने अपने पिता को फोन किया. उन्हें सारी स्थिति समझई और तुरंत वहां आ कर उसे ले जाने को कहा. मां और पिताजी के आने तक वह अपना सामान पैक चुकी थी.

अचानक समधीसमधन को आया देख कर विद्या के सासससुर घबरा गए. तभी सामने से बड़े ही बेफिक्र अंदाज में अमित ने कमरे में प्रवेश किया. सब को देख कर वह सकपका कर वहीं खड़ा हो गया. विद्या खुद को काबू में न रख सकी. अमित के सामने जा कर उसे एक थप्पड़ जड़ दिया.

इस से पहले कि वह कुछ समझता विद्या के पिता ने कड़े शब्दों में अपने समधी से कहा, ‘‘गलती सिर्फ आप के बेटे की ही नहीं है, अपने बेटे की सारी करतूतें जानते हुए भी आप ने मेरी लड़की से उस की शादी करवाई. अब भी मैं आप को एक मौका देता हूं. अगर आप का बेटा अपनी भूल मान कर एक हफ्ते में मेरी बेटी को लेने आता है तो ठीक है वरना 10 दिनों में तलाक का नोटिस आप को मिल जाएंगा और मुआवजे की मांग की लिस्ट,’’ और वे विद्या का सूटकेस ले कर बाहर निकल गए.

विद्या ने मां का हाथ पकड़ कर घर से निकलते समय पलट कर देखा, सासससुर सिर झकाए खड़े थे. पर अमित के चेहरे पर पछतावे का कोई चिंह्न नहीं था, जबकि राहत के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे.

विद्या बुरी तरह टूट चुकी थी, पर मन में कहीं भीतर एक आशा छिपी हुईर् थी, शायद कभी अमित को अपनी गलती का एहसास हो और अपनी पत्नी के पास वह लौट आए. पर यह आस की डोर भी उस दिन टूट गई, जब अमित की और से ही तलाक के कागजात डाक से आए. विद्या की रहीसही आशा भी खत्म हो गई. उस के सारे सपने चूरचूर हो चुके थे.

विद्या रातदिन सोचती पर समझ नहीं पाती थी. ऐसा कैसे हो गया और इस सब में उस की क्या गलती थी? उस के पिता ने उस के औफिस में लंबी छुट्टी की अर्जी भेज दी थी. मांपिताजी और दोनों बहनें उस को बहलाने का हरसंभव प्रयास करतीं, पर विद्या एकदम गुमसुम सी हो चुकी थी. 9वें महीने एक सुंदर सी बिटिया के जन्म होने के बाद भी विद्या खुश न हो सकी. फिर उस के दिल में एक आस जागी. शायद अमित बच्ची को देखने आएं और उस का सलोना मुखड़ा देख कर उन का मन बदल जाए. मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

विद्या ने औफिस जौइन कर लिया. घर में उस की बहनें उस की बच्ची वृंदा का खयाल रखतीं और वह अपनेआप को औफिस के कामों में उलझए रखती. रात को वृंदा को हंसताखेलता देख कर अपने गम को भूलने का प्रयास करती, जो प्राय: निष्फल ही रहता था. तलाक के बाद कंप्रोमाइज में कुछ पैसा भी मिल गया. औफिस में सहकर्मियों के जोर देने पर एक बार फिर उस ने बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया. बस अब सुबह औफिस, दोपहर को टूरनामैंट और रात को वृंदा के साथ खेलना, उस का होमवर्क कराना आदि. वह अब पूरी तरह व्यस्त हो चली थी.

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मुंबईर् की तेज रफ्तार और भीड़भाड़ की जिंदगी में उसे पलभर का अवकाश नहीं मिलता था. वृंदा अब 12 साल की हो गई थी. विद्या की बहनें विवाह कर के ससुराल जा चुकी थीं. अब विद्या ही अपने वृद्ध मातापिता का सहारा थी और वे दोनों ही विद्या का. बहरहाल, वृंदा जरूर सब की लाड़ली थी और विद्या की तो जिंदगी ही जैसे वृंदा पर शुरू होती थी और उसी पर ही खत्म होती थी. ऐसे ही 3-4 साल गुजर गए.

उस दिन विद्या रोज की भांति शाम को 7 बजे दफ्तर से घर लौट रही थी. अगस्त का महीना था. मुंबई की बारिश अपने पूरे शबाब पर थी. ऐसे में तो स्टेशन से घर तक का सफर भी आसान नहीं था. दूरदूर तक कोई औटो नहीं दिख रहा था. बसें खचाखच भरी हुई थी. विद्या छाता खोल कर ठाणे स्टेशन से पैदल ही घर के लिए निकल पड़ी. अचानक बिजली कड़की और विद्या के मुंह से चीख सी निकल गई.

तभी उस के पास एक कार आ कर रुकी. कार के शीशे को नीचे कर के एक सभ्य से दिखने वाले व्यक्ति ने उसे पुकारा, ‘‘आइए मैं आप को आप के घर छोड़ देता हूं. घबराइए नहीं, मैं आप की बिल्डिंग में ही ग्राउंड फ्लोर पर रहता हूं और आप के पिताजी मुझे अच्छी तरह से पहचानते हैं.’’

विद्या ने गौर से उस अनजान युवक को देखा. हालांकि मन में ?िझक तो थी पर और कोईर् चारा भी नहीं था. मन मसोस कर अपना छाता बंद कर के विद्या कार के पिछले दरवाजे को खोल कर बैठ गई. रास्ते में दोनों की कोई बात नहीं हुई. बिल्डिंग आने पर युवक को धन्यवाद दे कर वृंदा कार से उतर गई. युवक ने मुसकरा करा कहा कि इस में धन्यवाद की कोई बात नहीं, आप का पड़ोसी होने के नाते यह तो मेरा फर्ज था. वैसे मेरा नाम विजय है, अच्छा नमस्ते.

घर पहुंच कर विद्या ने चैन की सांस ली. वृंदा अपने होमवर्क में और नानानानी अपना प्रिय सीरियल देखने में व्यस्त थे. चाय बना कर पिताजी को देते हुए विद्या ने उन्हें विजय के बारे में बताया.

पिताजी खुश हो गए, ‘‘अच्छा विजय. भई वह तो बहुत अच्छा लड़का है. अभी कल ही तो उस की मां गांव से आई हैं. मैं ने उसे इस रविवार को मां को खाने पर ले कर आने को कहा है.’’

विद्या कुछ कहती उस के पहले ही वृंदा की आवाज आई, ‘‘मां मेरी प्रोजैक्ट बनाने में मदद करो न,’’ और बात आईगई हो गई.

अगले दिन शनिवार की छुट्टी थी. विद्या पिताजी की दवाइयां लेने मैडिकल शौप गई. देखा वहां विजय अपनी माताजी के साथ दवाइयां ले रहे थे. विद्या ने उन्हें नमस्कार किया और दोनों में बातचीत शुरू हो गई. बातों ही बातों में विजय ने उस को बताया कि वे बहुत परेशान हैं क्योंकि माताजी को वायरल फीवर है और विजय को औफिस के जरूरी काम से दिल्ली जाना है.

विद्या ने विजय को दिलासा दिया कि आप चिंता मत करिए कल से मेरी 3 दिनों की छुट्टी है. मैं माताजी का खयाल रखूंगी. आप निश्चिंत हो कर जाइए. सुन कर विजय प्रसन्न हो गए. कहा कि थैंक्यू विद्याजी. मांजी के चेहरे पर भी राहत के भाव आ गए. विद्या उन्हें नमस्ते कर के घर आ गई.

विजय के दौरे पर जाने के बाद विद्या उन की माताजी को अपने घर ले आई. समय पर दवाइयां, भोजन और आराम पा कर उन का बुखार उतर गया. वे एक भद्र और मिलनसार महिला थीं. बहुत जल्दी वे घर के लोगों से हिलमिल गईं विशेषकर वृंदा तो अपनी चुलबुली बातों से उन की आंखों का तारा बन गई.

3 दिन बहुत जल्दी बीत गए और जब विजय दौरे से आए तो अपनी मां को स्वस्थ और हंसतेमुसकराते देख कर कृतज्ञता से उन्होंने हाथ जोड़ दिए और मांजी ने वृंदा को सीने से लगा कर उसे ढेरों आशीर्वाद दे कर विदा ली. इन तीन दिनों में विजय की मां लक्ष्मी देवी, विद्या की मां से उस की पूरी कहानी सुन चुकी थीं.

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इधर विजय की जिंदगी भी खुशियों से भरी नहीं थी. आईआईटी मुंबई से इंजीनियरिंग कर के उन्होंने लंदन की बड़ी फर्म जौइन की थी. कुछ दिनों तक वहां काम करते हुए औफिस की ही एक अंगरेज सहकर्मी जूलिया उन्हें बेहद भा गई और उन्होंने उस के समक्ष विवाह का प्रस्ताव भी रख दिया. जूलिया भी उन्हें पसंद करने लगी थी. उस ने तुरंत हां कह दी. मां ने बेमन से ही सही सहमति दे दी थी.

दोनों ने खुशीखुशी शादी की. थोड़े दिन तो सबकुछ ठीक रहा पर फिर दोनों के बीच के मतभेद उभर कर सामने आने लगे. जूलिया एक आजाद खयाल लड़की थी. परिवार, बच्चे जैसी बातों में उस की कोई रुचि नहीं थी. वह खाओपिओ और मौज करो सिद्धांत की हिमायती थी. विजय ने जूलिया को बहुत समझया पर जूलिया घर के बंधन में रहना स्वीकार नहीं कर पाई. अंत में विजय से तलाक  ले कर अपने ही देश के राबर्ट के साथ रहने चली गई.

विजय इस पूरे वाकेआ के दौरान बेहद टूट गए थे. इधर मुंबई में पिताजी के जाने के बाद मां भी अकेली हो गई थीं. आखिरकार मां के समझने पर लंदन छोड़ कर एक प्राइवेट फर्म में प्रोडक्शन मैनेजर बन कर विजय मुंबई आ गए. बीते दिनों की कड़वी यादों को भुलाने के लिए उन्होंने अपनेआप को काम में पूरी तरह डुबो दिया और इस कोशिश में कुछ हद तक वे संभल भी गए थे.

विद्या की जिंदगी और उस की हिम्मत व आत्मविश्वास को देख कर विजय की मां बेहद प्रभावित हुईं और फिर उस की सादगी और अपनत्व का परिचय तो उन्हें 3 दिनों में मिल ही चुका था. वृंदा से भी वे पूरी तरह से घुलमिल गई थीं. एक बार फिर उन की आंखों में अपने बेटे की शादी का सपना सजने लगा.

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Family Story In Hindi: सितारों से आगे- भाग 2- कैसे विद्या की राहों में रोड़ा बना अमित

लेखिका- डा. सरस्वती अय्यर

 अगला दिन रविवार था. सुबह विद्या की नींद देर से खुली, घड़ी की ओर देखा, तो बड़बडाई कि अरे 9 बज गए. किसी ने मुझे उठाया तक नहीं. लगभग दौड़ते हुए कमरे से बाहर आई तो देखा बाहर गार्डन में मां, पिताजी और अमित बैठ कर गंभीरतापूर्वक किसी विषय में बातचीत कर रहे थे. ड्राइंगरूम में फोन की घंटी बज रही थी. विद्या ने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘अमित हैं?’’

‘‘नहीं वे बाहर गार्डन में हैं. मैं विद्या बोल रही हूं, आप कौन?’’ विद्या ने पूछा.

सवाल के जवाब में फिर सवाल पूछा गया, ‘‘आप उस की कौन हैं?’’

‘‘मैं उन की पत्नी हूं,’’ विद्या ने जवाब दिया.

यह सुनते ही फोन कट गया.

‘कौन हो सकती है और उस ने फोन क्यों काटा?’ सोचते हुए विद्या बाथरूम में चली गई. जल्दी से फ्रैश हो कर किचन में जा कर 4 कप कौफी बना कर वह गार्डन में सब के लिए कौफी ले कर आई. उसे देखते ही तीनों शांत हो गए. गुडमौर्निंग कहते हुए विद्या ने मुसकराते हुए सब को कौफी दी और बैठते हुए अमित से पूछा, ‘‘आप का प्रोजैक्ट कैसा रहा? गए थे डेढ़ माह के लिए और लगा दिए 5 महीने,’’ कहते हुए उस ने अमित को शिकायतभरी नजरों से देखा.

मगर अमित ने कोई जवाब नहीं दिया. उड़तीउड़ती नजर उस पर डालते हुए चाय की चुसकियां लेता रहा.

विद्या को उस का यह व्यवहार कुछ चुभ गया पर वह स्वयं को संभालते हुए बोली, ‘‘अरे अमितजी आप का अभी एक फोन आया था, किसी महिला का था, पर जब मैं ने अपना नाम बताया तो पता नहीं क्यों उस ने जल्दी से फोन रख दिया.’’

‘‘अरे छोड़ो यार किसी बैंक वगैरह की क्रैडिट कार्ड बेचने वाली सेल्स गर्ल होगी,’’ कह कर अमित ने बात पलट दी.

विद्या कहना चाहती थी कि फोन करने वाली महिला का अनौपचारिक ढंग किसी क्रैडिट कार्ड वाली का नहीं हो सकता है, पर सब के सामने वह यह बात कह नहीं पाई. एक शक का कीड़ा कहीं अंदर कुलबुलाया जरूर था, पर उस समय बात आईगई हो गई.

अमित विदेश से सब के लिए ढेर सारे तोहफे लाया था. सब उसी में मगन थे, प्रिया भी आई थी, भाई से मिलने. पर इन सब के बीच विद्या को कहीं न कहीं लगता रहा कि अमित उस से अकेले में मिलने और बात करने में कतरा रहा है. खैर, दोपहर में खाना खा कर और भैया के लाए तोहफे ले कर प्रिया अपने घर चली गई. मां और पिताजी भी अपने कमरे में जा कर सो गए. रसोई वगैरह समेट कर विद्या जब अपने कमरे में पहुंची तो अमित गाड़ी की चाबी हाथ में ले कर कमरे से बाहर निकल रहा था.

‘‘अरे आप कहां जा रहे हैं?’’

विद्या के पूछने पर वह बोला कि थोड़ा दोस्तों से मिल कर आता हूं और वह बाहर निकल गया.

‘‘मुझ से मिलना नहीं आप को, मुझ से कुछ बातें नहीं करना आप को.’’

मगर विद्या की बातें सुनने के लिए अमित वहां कहां था. विद्या अपने आंसुओं पर काबू न पा सकी, जा कर कमरे में लेट गई.

लगातार बजती फोन की घंटी सुन कर विद्या उठी. एक बार फिर सुबह वाली आवाज थी, ‘‘अमित हैं क्या घर पर?’’

नहीं वे बाहर गए हैं. आप कौन?’’ विद्या ने पूछा.

मगर जवाब में, ‘‘अच्छा निकल गया क्या वह? चलो ठीक है ओके,’’ कह कर फोन रख दिया गया.

विद्या का संदेह और गहरा गया. शाम को इस बारे में अमित से बात करूंगी, उस ने तय कर लिया. पर ऐसा हो न सका. रात को 12 बजे अमित घर पहुंचा, तब तक विद्या सो चुकी थी. सुबह उस को भी औफिस जाना था. अगले दिन जल्दी उठ कर घर के काम आदि से फ्री हो कर वह औफिस के लिए निकल गई.

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आज अमित को 10 बजे किसी साइट इंस्पैक्शन के लिए जाना था. इसलिए वह आराम से सो रहा था. विद्या ने उसे जगाना उचित और सासूमां से कह कर वह औटो से चली गई.

विद्या औफिस पहुंच तो गई, पर उस का काम में मन नहीं लगा. एक तो घर पर काम की थकान, ऊपर से 2 दिनों से अमित की उपेक्षा से उस को बेतरह मानसिक कष्ट पहुंचा था. दोपहर होतेहोते उस को जबरदस्त सिर में दर्द होने लगा, बेचैनी होने लगी, चक्कर जैसे आने लगे. वह तुरंत छुट्टी ले कर घर आ गई.

काश, उस दिन घर न आई होती और उस ने वह सबकुछ आंखों से न देखा होता तथा कानों ने सुना न होता, तो क्या उस की जिंदगी आज कुछ और होती? नहीं, ऐसा कभी न कभी तो होना ही था. विद्या की आंखों से न चाहते हुए भी आंसू बह निकले. वृंदा को चादर ओढ़ा कर विद्या उठ खड़ी हुई. वृंदा ने उस के आंसू देख लिए तो हजार सवाल पूंछे और उन के जवाब देना उस के लिए बहुत मुश्किल होगा. अपने कमरे में आ कर विद्या लेट गई. एक बार फिर पुरानी यादें उसे घेरने लगीं और जैसे यादों की कडि़यां एक के बाद एक जुड़ती गईं…

उस दिन दोपहर के लगभग 2 बजे थे जब विद्या घर पहुंची. यह समय सासससुर के सोने का होता था, इसलिए उस ने डुप्लिकेट चाबी से घर का दरवाजा खोला और अपने कमरे की ओर जाने लगी कि अचानक सासूजी के कमरे से आती आवाजों ने उस का ध्यान खींचा. उन में से एक तेज आवाज अमित की थी. कमरे का दरवाला खुला था, पर परदे गिरे हुए थे.

भीतर से अमित की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी. गुस्से से भरे लगभग चिल्लाते हुए अमित कह रहा था, ‘‘मां अब तुम मुझ पर जबरदस्ती नहीं कर सकतीं. मैं ने तुम से पहले ही कहा था, मैं शबनम को नहीं छोड़ सकता पर तुम नहीं मानीं यह कह कर कि इस से प्रिया की शादी पर असर पड़ेगा. जोर डाल कर तुम ने उस विद्या को मेरे पल्ले बांध दिया.

‘‘यह तो अच्छा हुआ कि दुबई प्रोजैक्ट में शबनम मेरे साथ थी वरना मैं तो पागल हो जाता. मां प्लीज अब तो प्रिया भी सैटल हो चुकी है, अब विद्या से मेरा तलाक होना जरूरी है. शबनम मुझे शादी के लिए परेशान कर रही है. मैं अब और इंतजार नहीं कर सकता. तुम जल्दी से विद्या के मांबाप से बात करो और उन से कहो कि मुझे आजाद कर दें.’’

इस के पहले विद्या कुछ संभल पाती कि उसे ससुरजी की गरजती हुई आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘मैं ने सोचा था कि शादी के बाद तुम सुधर जाओगे, मगर नहीं. तुम्हारे इश्क का भूत अभी तक नहीं उतरा. अरे अब तो तुम बाप बनने जा रहे हो, भूल जाओ पुरानी बातें.’’

विद्या को माजरा कुछ समझे कि उसे सास की मनुहार भरी आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘अरे बेटा, इतनी सुंदर, सुघड़ बहू, साथ में सरकारी नौकरी और क्या चाहिए तुझे?’’

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‘‘अरे मां नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी सुंदर बहू और उस की नौकरी. मुझे इस प्रौब्लम से जल्दी छुट्टी दिलाओ वरना मैं ने कुवैत में जौब के लिए बात की हुई है. इस बार जाऊंगा तो 15-20 साल नहीं आऊंगा, फिर रहना आराम से अपनी बहू के साथ,’’ यह अमित की विफरती हुई आवाज थी.

विद्या सकते में थी. अब सबकुछ उस के सामने स्पष्ट हो चुका था. उस की आंखों के आगे जैसे अंधेरा सा छा रहा था. उस के पैर लड़खड़ा गए, जबान सूख गई. वह दरवाजे का सहारा लेते हुए वही जमीन पर बैठ गई.

आवाज सुन कर सासूमां लगभग दौड़ती हुई बाहर आईं. विद्या की स्थिति देख कर उन को समझते देर न लगी कि वह सबकुछ सुन चुकी है. उन्होंने तुरंत उसे उठाया, भीतर ले जा कर बिस्तर पर लिटाया. जल्दी से जा कर वे उस के लिए चाय बना कर लाईं. उन्होंने रोती हुई विद्या को बैठा कर प्यार से उस का सिर सहलाया और जबरदस्ती चाय पिलाई.

ससुरजी चिंता से कमरे से अंदरबाहर हो रहे थे. अमित मौका देख कर अपनी बाइक उठा कर जा चुका था. उसे विद्या की कोई परवाह नहीं थी. सास विद्या को समझ रही थी, ‘‘रोओ नहीं बेटे अपनी तबीयत संभालो सब ठीक हो जाएगा.’’

थोड़ी देर बाद जब उन्हें लगा कि रोतेरोते विद्या सो गई है तो वे अपने कमरे में चली गईं.

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आईना- भाग 1 : रिश्तों में संतुलन ना बनाना क्या शोभा की एक बढ़ी गलती थी

आंखें फाड़फाड़ कर मैं उस का चेहरा देखती रह गई. शोभा के मुंह से ऐसी बातें कितनी विचित्र और बेतुकी सी लग रही हैं, मैं सोचने लगी. जिस औरत ने पूरी उम्र दिखावा किया, अभिनय किया, किसी भी भाव में गहराई नहीं दर्शा पाई उसी को आज गहराई दरकार क्यों कर हुई? यह वही शोभा है जो बिना किसी स्वार्थ के किसी को नमस्कार तक नहीं करती थी.

‘‘देखो न, अभी उस दिन सोमेश मेरे लिए शाल लाए तो वह इतनी तारीफ करने लगी कि क्या बताऊं…पापा इतनी सुंदर शाल लाए, पापा की पसंद कितनी कमाल की है. पापा यह…पापा वह,’’ शोभा अपनी बहू चारू के बारे में कह रही थी, ‘‘सोमेश खुश हुए और कहने लगे कि शोभा, तुम यह शाल चारू को ही दे दो. मैं ने कहा कि इस में देनेलेने वाली भी क्या बात है. मिलबांट कर पहन लेगी. लेकिन सोमेश माने ही नहीं कहने लगे, दे दो.

‘‘मेरा मन देने को नहीं था. लेकिन सोमेश के बारबार कहने पर मैं उसे देने गई तो चारू कहने लगी, ‘मम्मी, मुझे नहीं चाहिए, यह शेड मुझ पर थोड़े न जंचेगा, आप पर ज्यादा जंचेगा.’

‘‘मैं उस की बातें सुन कर हैरान रह गई. सोमेश को खुश करने के लिए इतनी तारीफ कर दी कि वह भी इतराते फिरे.’’

भला तारीफ करने का अर्थ यह तो नहीं होता कि आप को वह चीज चाहिए ही. मुझे याद है, शोभा स्वयं जो चीज हासिल करना चाहती थी उस की दिल खोल कर तारीफ किया करती थी और फिर आशा किया करती थी कि हम अपनेआप ही वह चीज उसे दे दें.

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हम 3 भाई बहन हैं. सब से छोटा भाई, शोभा सब से बड़ी और बीच में मैं. मुझे सदा प्रिय वस्तु का त्याग करना पड़ता था. मैं छोटी बहन बन कर अपनी इच्छा मारती रही पर शोभा ने कभी बड़ी बहन बन कर त्याग करने का पाठ न पढ़ा.

अनजाने जराजरा मन मारती मैं इतनी परिपक्व होती गई कि मुझे उसी में सुख मिलने लगा. कुछ नया आता घर में तो मैं पुलकित न होती, पता होता था अगर अच्छी चीज हुई तो किसी भी दशा में नहीं मिलेगी.

‘‘एक ही बहू है मेरी,’’ शोभा कहती, ‘‘क्याक्या सोचती थी मैं. मगर इस के तो रंग ही न्यारे हैं. कोई भी चीज दो, इसे पसंद ही नहीं आती. एक तरफ सरका देगी और कहेगी नहीं चाहिए.’’

शोभा मेरी बड़ी बहन है. रक्त का रिश्ता है हम दोनों में मगर सत्य यह है कि जितना स्वार्थ और दोगलापन शोभा में है उस के रहते वह अपनी बहू से कितना अपनापन सहेज पाई होगी मैं सहज ही अंदाजा लगा सकती हूं.

चारू कैसी है और उसे कैसी चीजें पसंद आती हैं यह भी मैं जानती हूं. मैं जब पहली बार चारू से मिली थी तभी बड़ा सुखद सा लगा था उस का व्यवहार. बड़े अपनेपन से वह मुझ से बतियाती रही थी.

‘‘चारू, शादी में पहना हुआ तुम्हारा वह हार और बुंदे बहुत सुंदर थे. कौन से सुनार से लिए थे?’’

‘‘अरे नहीं, मौसीजी, वे तो नकली थे. चांदी पर सोने का पानी चढ़े. मेरे पापा बहुत डरते हैं न, कहते थे कि शादी में भीड़भाड़ में गहने खो जाने का डर होता है. आप को पसंद आया तो मैं ला दूंगी.’’

कहतीकहती सहसा चारू चुप हो गई थी. मेरे साथ बैठी शोभा की आंखों को पढ़तीपढ़ती सकपका सी गई थी चारू. बेचारी कुशल अभिनेत्री तो थी नहीं जो झट से चेहरे पर आए भाव बदल लेती. झुंझलाहट के भाव तैर आए थे चेहरे पर, उस से कहां भूल हुई है जो सास घूर रही है. मौसी अपनी ही तो हैं. उन से खुल कर बात करने में भला कैसा संकोच.

‘‘जाओ चारू, उधर तुम्हारे पापा बुला रहे हैं. जरा पूछना, उन्हें क्या चाहिए?’’ यह कहते हुए शोभा ने चारू को मेरे पास से उठा दिया था. बुरा लगा था चारू को.

चारू के उठ कर जाने के बाद शोभा बोली, ‘‘मेरी दी हुई सारी साडि़यां और सारे गहने चारू मेरे कमरे में रख गई है. कहती है कि बहुत महंगी हैं और इतनी महंगी साडि़यां वह नहीं पहनेगी. अपनी मां की ही सस्ती साडि़यां उसे पसंद हैं. सारे गहने उतार दिए हैं. कहती है, उसे गहनों से ही एलर्जी है.’’

शोभा सुनाती रही. मैं क्या कहती. एक पढ़ीलिखी और समझदार बहू को उस ने फूहड़ और नासमझ प्रमाणित कर दिया था. नाश्ता बनाने का प्रयास करती तो शोभा सब के सामने बड़े व्यंग्य से कहती, ‘‘नहीं, नहीं बेटा, तुम्हें हमारे ढंग का खाना बनाना नहीं आएगा.’’

‘‘हर घर का अपनाअपना ढंग होता है, मम्मी. आप अपना ढंग बताइए, मैं उसी ढंग से बनाती हूं,’’ चारू शालीनता से उत्तर देती.

‘‘नहीं बेटा, समझा करो. तुम्हारे पापा  और अनुराग मेरे ही हाथ का खाना पसंद करते हैं.’’

अपने चारों तरफ शोभा ने जाने कैसी दीवार खड़ी कर रखी थी जिसे चारू ने पहले तो भेदने का प्रयास किया और जब नहीं भेद पाई तो पूरी तरह उसे सिरे से ही नकार दिया.

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‘‘कोई भी काम नहीं करती. न खाना बनाती है न नाश्ता. यहां तक कि सजतीसंवरती भी नहीं है. अनुराग शाम को थकाहारा आता है, सुबह जैसी छोड़ कर जाता है वैसी ही शाम को पाता है. मेरे हिस्से में ऐसी ही बहू मिलने को थी,’’ शोभा कहती.

‘‘कल चारू को मेरे पास भेजना. मैं बात करूंगी.’’

‘‘तुम क्या बात करोगी, रहने दो.’’

‘‘किसी भी समस्या का हल बात किए बिना तो नहीं निकलेगा न.’’

शोभा ने साफ शब्दों में मना कर दिया. वह यह भी तो नहीं चाहती थी कि उस की बहू किसी से बात करे. मैं जानती हूं, चारू शोभा के व्यवहार की वजह से ही ऐसी हो गई है.

‘‘बस भी कीजिए, मम्मी. मुझे भी पता है कहां कैसी बात करनी चाहिए. आप के साथ दम घुटता है मेरा. क्या एक कप चाय बनाना भी मुझे आप से सीखना पड़ेगा. हद होती है हर चीज की.’’

चारू एक बार हमसब के सामने ही बौखला कर शोभा पर चीख उठी थी. उस के बाद घर में अच्छाखासा तांडव हुआ था. जीजाजी और शोभा ने जो रोनाधोना शुरू किया कि उसी रात चारू अवसाद में चली गई थी.

अनुराग भी हतप्रभ रह गया था कि उस की मां चारू को कितना प्यार करती हैं. यहां तक कि चाय भी उसे नहीं बनाने देतीं. नाश्ता तक मां ही बनाती हैं. बचपन से मां के रंग में रचाबसा अनुराग पत्नी की बात समझता भी तो कैसे.

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Family Story In Hindi: कच्ची गली- भाग 3- खुद को बदलने पर मजबूर हो गई दामिनी

फिर दामिनी को पानी की बोतल पकड़ाते हुए विपिन आगे कहने लगे, ‘‘मैं तुम्हारी तकलीफ समझता हूं. मैं तुम्हारे साथ हूं. इस घटना के कारण तुम्हारे प्रति मेरे प्यार में कोई कमी नहीं आएगी. तुम मेरी पत्नी हो और हमेशा रहोगी. अपने मन से आज की इस रात को हमेशा के लिए मिटा दो. आज के बाद हम इस का जिक्र कभी नहीं करेंगे.’’

तभी विपिन का फोन बजा. स्क्रीन पर सृष्टि का नाम देख उन्होंने लपक कर फोन उठाया.

‘‘सौरी पापा, मेरा फोन स्विचऔफ हो गया था, बैटरी डैड हो गई थी. मुझे आज घर लौटने में देर हो गई. वह असल में एक फ्रैंड का बर्थडे था और पार्टी में थोड़ी लेट हो गई. पर अब मैं घर आ चुकी हूं, लेकिन मम्मा घर पर नहीं हैं. आप दोनों कहां हैं?’’ सृष्टि ने पूछा.

सृष्टि घर आ चुकी है. लेकिन उस के कुछ समय देर से आने के कारण उस के अभिभावक इतना घबरा गए कि एक ऐसा कटु अनुभव अपने जीवन में जोड़ बैठे जिसे भूलना शायद संभव नहीं. दामिनी के मन में अब झंझावत चल रहा है. क्या करे वह? क्या उस के लिए इस दुर्घटना को भुलाना संभव होगा? क्या इतना आसान है यह? इन्हीं सब विचारों में उलझी दामिनी घर के सामने आ रुकी अपनी गाड़ी से उतरना नहीं चाह रही थी. काश, वह समय की सूई उलटी घुमा पाती और सबकुछ पहले की तरह खुशहाल हो जाता. उस की गृहस्थी, प्यारी सी बिटिया, स्नेह लुटाता पति अब तक सबकुछ कितना स्वप्निल रहा उस के जीवन में.

विपिन की आवाज पर दामिनी धीरे से उतर कर घर में प्रविष्ट हो गई.

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‘‘कहां गए थे आप दोनों?’’ सृष्टि के प्रश्न पर दामिनी से पहले विपिन बोल उठे, ‘‘तेरी मम्मा की तबीयत कुछ ठीक नहीं है. डाक्टर के पास गए थे.’’

अगले 2 दिनों तक दामिनी यों ही निढाल पड़ी रही. उस का मन किसी भी  काम, किसी भी बात में नहीं लग रहा था. रहरह कर जी चाहता कि पुलिस के पास चली जाए और उन दरिंदों को सजा दिलवाने के लिए संघर्ष करे. फिर विपिन द्वारा कही बातें दिमाग में घूमने लगतीं. बात तो उन की भी सही थी कि उस के पास पुलिस को बताने के लिए कोई ठोस बात नहीं, कोई पुख्ता सुबूत नहीं है.

इन दिनों विपिन ने घर संभाल लिया क्योंकि वे दामिनी को बिलकुल परेशान नहीं करना चाहते थे. वे उस के दिल और दिमाग की स्थिति से अनजान नहीं थे और इसीलिए उसे सामान्य होने के लिए पूरा समय देने को तैयार थे.

सृष्टि जरूर बर्थडे पार्टी की तैयारी में लगी हुई थी. अब पार्टी में केवल 3 दिन शेष थे. विपिन दामिनी की मानसिक हालत समझ रहे थे, इसलिए वे पार्टी को ले कर जरा भी उत्साहित न थे. लेकिन सृष्टि को क्या बताते भला, इसलिए उस के सामने वे चुप ही थे.

अगली सुबह विपिन के औफिस चले जाने  के बाद सृष्टि दामिनी से साथ मार्केट चलने का आग्रह करने लगी, ‘‘मम्मा, आप के लिए एक न्यू ड्रैस लेनी है. आखिर आप पार्टी की शान होने वाली हैं. सब से स्टाइलिश ड्रैस लेंगे.’’

सृष्टि चहक रही थी. लेकिन दामिनी का मन  उचट चुका था. वह अपने मन को शांत करने में स्वयं को असमर्थ पा रही थी. सृष्टि की बात से दामिनी के घाव फिर हरे होने लगे. ‘पार्टी’ शब्द सुन दामिनी को उस रात की बर्थडे पार्टी के कारण वह देर से घर लौटी थी. न सृष्टि पार्टी के चक्कर में पड़ती और न ही दामिनी के साथ यह हादसा होता.

अपने बिगड़ते मूड से दामिनी ने उस रात सृष्टि के देर से घर आने को ले कर कुछ उखड़े लहजे में कहा, ‘‘पार्टी, पार्टी, पार्टी… उस रात किस की बर्थडे पार्टी थी? क्या तुम एक फोन भी नहीं कर सकती थीं? इतनी लापरवाह कब से हो गईं तुम, सृष्टि?’’

अचानक नाराज दामिनी को देख सृष्टि चौंक गई, ‘‘वह… उस दिन… वह मम्मा… अब क्या बताऊं आप को. उस शाम मुझे कुछ ऐसी बात पता चली कि न तो मुझे समय का आभास रहा और न ही अपने डिस्चार्ज हुए फोन को चार्ज करने का होश रहा.’’

कुछ पल सोचने के पश्चात सृष्टि आगे कहने लगी, ‘‘पहले मैं ने सोचा था कि आप को यह बात बता कर चिंतित नहीं करूंगी पर अब सोचती हूं कि बता दूं.’’

सृष्टि और दामिनी का रिश्ता भले ही मांबेटी का था लेकिन उन का संबंध दोस्तों जैसा था. सृष्टि अपनी हर बात बेझिझक अपनी मां से बांटती आई थी. आज भी उस ने अपनी मां को उस शाम हुई देरी के पीछे का असली कारण बताने का निश्चय किया.

‘‘मां, मेरी सहेली है न निधि. उस का एक बौयफ्रैंड है. निधि अकसर उस से मिलने उस के पीजी रूम पर जाया करती थी. यह बात केवल उन दोनों को ही पता थी. मुझे भी नहीं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से निधि और उस लड़के में कुछ अनबन चल रही थी.

निधि ने ब्रेकअप करने का मन बना लिया. यह बात उस ने अपने बौयफ्रैंड से कह डाली. वह निधि से अपने निर्णय पर दोबारा विचार करने की जिद करने लगा. फिर उस ने निधि को एक लास्ट टाइम इस विषय पर बात करने के लिए अपने पीजी रूम में बुलाया. बस, निधि से गलती यह हुई कि वह उस लड़के की बात पर विश्वास कर आखिरी बार उस से मिलने को राजी हो गई.’’

दामिनी ध्यान से सृष्टि की बात सुन रही थी. साथ ही, उस का मन इस उलझन में गोते लगा रहा था कि क्या उसे भी सृष्टि को अपनी आपबीती सुना देनी चाहिए.

‘‘उस दिन रूम में निधि के बौयफ्रैंड के अलावा 3 लड़के और मौजूद थे, जिन्हें उस ने  अपने दोस्त बताया. जब निधि ब्रेकअप के अपने निर्णय पर अडिग रही तो उन चारों ने मिल कर उस का रेप कर डाला. उस के बौयफ्रैंड को उस से बदला लेना था. उफ, कितनी घिनौनी सोच है. या तो मेरी या किसी की भी नहीं. ऊंह,’’ कह कर सृष्टि के चेहरे पर पीड़ा, दर्द, क्रोध और घिन के मिलेजुले भाव उभर आए.

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वह आगे बोली, ‘‘आप ही बताओ मम्मा, जब निधि मुझ से ये सारी बातें शेयर कर रही थी तब ऐसे में समय का ध्यान कैसे रहता?’’

सृष्टि की बात सही थी. उस समय अपनी बात ढकने के लिए उस ने बर्थडे पार्टी का झूठा बहाना बना दिया था. मगर आज असलियत जानने के बाद दामिनी के पास भी कोई जवाब न था. वह चुपचाप सृष्टि का हाथ थामे बैठी रही, ‘‘निधि ने अब आगे क्या करने का सोचा है?’’ बस, इतना ही पूछ पाई वह.

‘‘इस में सोचना क्या है, मम्मा? जो हुआ उसे एक दुर्घटना समझ कर भुला देने में ही निधि को अपनी भलाई लग रही है. वह कहती है कि जिस नीयत से उस के बौयफ्रैंड ने उस का रेप किया, वह नहीं चाहती कि वह उस में कामयाब हो. वह इस घटना को अपने वजूद पर हावी नहीं होने देना चाहती. वैसे देखा जाए मम्मा, तो उस की बात में दम तो है. एक घटना हमारे पूरे व्यक्तित्व का आईना नहीं हो सकती.

‘‘आखिर रेप को इतनी वरीयता क्यों दी जाए कि उस से पहले और बाद के हमारे जीवन में इतना बड़ा फर्क पड़े. ठीक है, हो गई एक दुर्घटना, पर क्या अब जीना छोड़ दें या फिर बस मरमर कर, अफसोस करते हुए, रोते हुए जिंदगी गुजारें? इस बात को अपने मन में दफना कर आगे क्यों न बढ़ा जाए, वह भी पूरे आत्मविश्वास के साथ,’’ सृष्टि न जाने क्या कुछ कहे जा रही थी.

आज दामिनी के सामने आज की लड़कियों की केवल हिम्मत ही नहीं, उन के सुलगते विचार और क्रांतिशील व्यक्तित्व भी उजागर हो रहे थे. वे सिर्फ हिम्मत ही नहीं रखतीं, बल्कि समझदारी से भी काम लेती हैं. जिन बातों से अपना जीवन सुधरता हो, वे ऐसे निर्णय लेना चाहती हैं, न कि भावनाओं में बह कर खुद को परेशानी में डालने के कदम उठाती हैं. अपनी बेटी के मुंह से ऐसी बातें सुन कर दामिनी के अंदर भी कुछ बदल गया.

जब सृष्टि की बात पूरी हुई तब तक मांबेटी चाय के खाली कप मेज पर रख चुकी थीं.

‘‘तो चल, कौन सी मार्केट ले चलेगी एक शानदार सी ड्रैस खरीदने के लिए,’’ दामिनी ने कहा तो सृष्टि खुशी से उछल पड़ी, ‘‘मैं ने तो शौप भी तय कर रखी है. बस, आप की ड्रैस की फिटिंग चैक करनी है मेरी प्यारी मम्मा,’’ कह उस ने अपनी दोनों बांहें दामिनी के गले में डाल दीं. दामिनी भी सृष्टि को बांहों में ले हंसती हुई झूम उठी.

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बबूल का पौधा : अवंतिका ने कौनसा चुना था रास्ता

बबूल का पौधा- भाग 1 : अवंतिका ने कौनसा चुना था रास्ता

रात के लगभग 2 बजे अवंतिका पानी पीने के लिए रसोई में गई तो बेटे साहिल के कमरे की खिड़की पर हलकी रोशनी दिखाई दी. रोशनी का कभी कम तो कभी अधिक होना जाहिर कर रहा था कि साहिल अपने मोबाइल पर व्यस्त है. गुस्से में भुनभुनाती अवंतिका ने धड़ाक से कमरे का दरवाजा खोल दिया.

साहिल को मां के आने का पता तक नहीं चला क्योंकि उस ने कान में इयरफोन ठूंस रखे थे और आंखें स्क्रीन की रोशनी में उलझ हुई थीं.

‘‘क्या देख रहे हो इतनी रात गए? सुबह स्कूल नहीं जाना क्या?’’ अवंतिका ने साहिल को झकझरा.

मां को देखते ही वह हड़बड़ा गया, लेकिन उसे मां की यह हरकत जरा भी पसंद नहीं आई.

‘‘यह क्या बदतमीजी है? प्राइवेसी क्या सिर्फ आप लोगों की ही होती है, हमारी नहीं? मैं तो कभी इस तरह से आप के कमरे में नहीं घुसा,’’

साहिल जरा जोर से बोला. बेटे की तीखी प्रतिक्रिया से हालांकि अवंतिका सकते में थी, लेकिन उस ने किसी तरह खुद को संयत किया.

‘‘क्या देख रहे थे मोबाइल पर?’’ अवंतिका ने सख्ती से पूछा.

‘‘वैब सीरीज,’’ साहिल ने जवाब दिया.

अवंतिका ने मोबाइल छीन कर देखा. सीरीज सिक्सटीन प्लस थी.

‘‘बारह की उम्र और वैब सीरीज. अभी तो तुम टीन भी नहीं हुए और इस तरह की सीरीज देखते हो,’’ अवंतिका पर गुस्सा फिर हावी होने लगा.

साहिल ने कुछ नहीं कहा, लेकिन बिना कहे भी उस ने जाहिर कर दिया कि उसे मां की यह दखलंदाजी जरा भी नहीं सुहाई. अवंतिका उसे इसी हालत में छोड़ कर अपने कमरे में आ गई. पानी से भरी आंखें बारबार उसे रोने के लिए मजबूर कर रही थीं, मगर वह उन्हें रोके बैठी थी. रोए भी तो आखिर किस के कंधे पर सिर रख कर.

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कोई एक कंधा थोड़ी नियत किया था उस ने अपनी खातिर. सुकेश का कंधा जरूर कहने को अपना था, लेकिन उस के अरमान थे ही इतने ऊंचे कि उसे कंधा नहीं आसमान चाहिए था.

अवंतिका ने आंखों को तो बहने से रोक लिया, लेकिन मन को बहने से भला कौन रोक सका है. इस बेलगाम घोड़े पर लगाम कोई बिरला ही लगा सकता है. अवंतिका ने भी मन के घोड़े की लगाम खोल दी. घोड़ा सरपट दौड़ता हुआ 15 बरस पीछे जा कर ठहर गया. यहां से अवंतिका को सबकुछ साफसाफ नजर आ रहा था…

अवंतिका को वह सब चाहिए था जो उस की निगाहों में ठहर जाए, फिर कीमत चाहे जो हो. कीमत की परवाह वह भला करती भी क्यों, हर समय कोई न कोई एटीएम सा उस की बगल में खड़ा जो होता था और उस एटीएम की पिन होती थी उस की अदाएं, उस की शोखियां.

जब वह अदा से अपने बाल झटक कर अपनी मनपसंद चीज पर उंगली रखती, तो क्या मजाल कि एटीएम काम न करे.

अवंतिका 24 की उस उम्र में महानगर आई थी जिसे वहां लोग बाली उम्र कहते थे. शादी के बाद छोटे शहर से महानगर में आई इस हसीन लड़की को अपनी खूबसूरती का बखूबी अंदाजा था. इस तरह का अंदाजा अकसर खूबसूरत लड़कियों को स्कूल छोड़तेछोड़ते हो ही जाता है.  कालेज छोड़तेछोड़ते तो यह पूरी तरह से पुख्ता हो जाता है. भंवरे की तरह मंडराते लड़कों का एक मुख्य काम यह भी तो होता है.

अवंतिका ने कालेज करने के बाद डिस्टैंस लर्निंग से एमबीए किया था. एक तो महानगर की ललचाती जिंदगी और दूसरे पति सुकेश के औफिस जाने के बाद काटने को दौड़ता अकेलापन… अवंतिका ने भी नौकरी करने का मानस बनाया. सुकेश ने भी थोड़ी हिचक के बाद अपनी रजामंदी दे दी तो हवा पर सवार अवंतिका अपने लिए काम तलाश करने लगी.

2-4 जगह बायोडाटा भेजने का बाद एक जगह से इंटरव्यू के लिए बुलावा आया. सुकेश के जोर देने पर वह साड़ी पहन कर इंटरव्यू देने के लिए गई. अवंतिका ने महसूस किया कि इंटरव्यू पैनल की दिलचस्पी उस के डौक्यूमैंट्स से अधिक उस की आकर्षक देहयष्टि में थी.

‘साड़ी से कातिल कोई पोशाक नहीं. तरीके से पहनी जाए तो कमबख्त बहुत कमाल लगती है,’ यह खयाल आते ही डाइरैक्टर के साथसाथ अवंतिका की निगाह भी साड़ी से झंकते अपनी कमर के कटाव पर चली गई. वह मुसकरा दी.

न जाने क्यों अवंतिका अपने चयन को ले कर आश्वस्त थी. और हुआ भी वही. अवंतिका का चयन डाइरैक्टर रमन की पर्सनल सैक्रेटरी के रूप में हो गया.

औफिस जौइन करने के लगभग 3 महीने बाद कंपनी की तरफ से उसे रिफ्रैशर कोर्स करने के लिए दिल्ली हैड औफिस भेजा गया. पहली बार घर से बाहर अकेली निकलती अवंतिका घबराई तो जरूर थी, लेकिन अंतत: वह अपना आत्मविश्वास बनाए रखने में कामयाब हुई.

इस कोर्स में कंपनी की अलगअलग शाखाओं से करीब 10 कर्मचारी आए थे. रोज शाम को क्लास के बाद कोई अकेले तो कोई किसी के साथ इधरउधर घूमने निकल जाता.

यह एक सप्ताह का कोर्स था. 5 दिन की ट्रेनिंग के बाद आज छठे दिन परीक्षा थी. अवंतिका सुखद आश्चर्य से भर उठी जब उस ने परीक्षक के रूप में अपने बौस रमन को देखा. 2 घंटे की परीक्षा के बाद पूरा दिन खाली था. अवंतिका की फ्लाइट अगले दिन सुबह की थी. रमन ने उस के सामने आउटिंग का प्रस्ताव रखा जिसे अवंतिका ने एक अवसर की तरह स्वीकार कर लिया.

मौल में घूमतेघूमते अवंतिका ने महसूस किया कि रमन उस की हर इच्छा पूरी करने को तत्पर लग रहा है. पहले तो अवंतिका ने इसे महज एक संयोग समझ, लेकिन फिर मन ही मन अपना वहम दूर करने का निश्चय किया.

टहलतेटहलते दोनों एक साडि़यों के शोरूम के सामने से गुजरे तो अवंतिका जानबूझ कर वहां ठिठक कर खड़ी हो गई. उस ने शरारत से साड़ी लपेट कर खड़ी डमी के कंधे से पल्लू उतारा और अपने कंधे पर डाल लिया. अब इतरा कर रमन की तरफ देखा. रमन ने अपनी अनामिका और अंगूठे को आपस में मिला कर ‘लाजवाब’ का इशारा किया. अवंतिका शरमा गई.

इस के बाद उस ने प्राइज टैग देखा और आश्चर्य से अपनी आंखें चौड़ी कीं. अवंतिका ने साड़ी का पल्लू वापस डमी के कंधे पर डाला और निराश सी वहां से हट गई. इस के बाद वे एक कैफे में चले गए.

अवंतिका अनमनी सी मेन्यू कार्ड पर निगाहों को सैर करवा रही थी और रमन की आंखें उस के चेहरे पर चहलकदमी कर रही थीं.

‘‘तुम और्डर करो, मैं अभी आता हूं,’’ कह कर रमन कैफे से बाहर निकल गया.

15 मिनट बाद रमन वापस आया. अब तक अवंतिका कौफी और सैंडविच और्डर कर चुकी थी. खापी कर दोनों गैस्ट हाउस चले गए.

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रात लगभग 10 बजे रमन का कौल देख कर अवंतिका को जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ.  लेकिन जब उस ने उसे अपने कमरे में आने को कहा तब वह अवश्य चौंकी. ‘इतनी रात गए क्या कारण हो सकता है,’ सोच कर अवंतिका ने अपने टू पीस पर गाउन डाला और बैल्ट कसती हुई रमन के रूम की तरफ चल दी. रमन उसी का इंतजार कर रहा था.

‘‘हां, कहिए हुजूर, कैसे याद फरमाया?’’ अवंतिका ने आंखें नचाईं. एक शाम साथ बिताने के बाद अवंतिका उस से इतना तो खुल ही गई थी कि चुहल कर सके. अब उन के बीच औपचारिक रिश्ता जरा सा पर्सनल हो गया था.

‘‘बस, यों ही. मन किया तुम से बातें करने का,’’ रमन उस के जरा सा नजदीक आया.

‘‘वे तो फोन पर भी हो सकती थीं,’’ अवंतिका उस की सांसें अपनी पीठ पर महसूस कर रही थी. यह पहला अवसर था जब वह सुकेश के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष के इतना नजदीक खड़ी थी. वह सिहर कर सिमट गई.

‘‘फोन पर बातें तो हो सकती हैं लेकिन यह नहीं,’’ कहते हुए रमन ने अवंतिका को उस साड़ी में लपेटते हुए अपनी बांहों में कस लिया. साड़ी को देखते ही अवंतिका खुशी से उछलती हुई पलटी और रमन के गले में बांहें डाल दी.

‘‘वाऊ, थैंक्स सर,’’ अवंतिका ने कहा.

‘‘सरवर औफिस में, यहां सिर्फ रमन,’’ कह कर रमन ने दोनों के बीच से पहले साड़ी की और उस के बाद गाउन की दीवार भी हटा दी.

यही वह पल था जिस ने अवंतिका के इस विश्वास को और भी अधिक मजबूत कर दिया था कि हुस्न चाहे तो क्या कुछ हासिल नहीं हो सकता. संसार का कोई सुख नहीं जो उस के चाहने पर कदमों में झक नहीं सकता. दुनिया में ऐसा कोई पुरुष नहीं जो बहकाने पर बहक नहीं सकता.

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Family Story In Hindi: कच्ची गली- भाग 2- खुद को बदलने पर मजबूर हो गई दामिनी

सृष्टि ने उस के जन्मदिन की तैयारी शुरू कर दी. पार्टी पौपर्स, हैप्पी बर्थडे स्ट्रिंग, दिल की शेप के गुब्बारे और मेहमानों की एक लिस्ट. दामिनी के 50वें जन्मदिन को वाकई खास बनाना चाहती थी उस की बेटी. विपिन का भी पूरा सहयोग था. केवल धनदान से ही नहीं, बल्कि श्रमदान से भी विपिन साथ दे रहे थे.

अगली सुबह दामिनी थोड़ी देर से उठी. आज फिर उसे माइग्रेन अटैक आया था. सुबह उठने के साथ ही सिर में दर्द शुरू हो गया था. ऐसे में अकसर उस की इंद्रियां उस का पूरा साथ नहीं निभाती थीं, सो हर काम थोड़ा धीमी गति से होता था.

‘‘क्या हुआ मेरी प्यारी मम्मा को?’’ सृष्टि उस का उतरा चेहरा देख कर पूछने लगी.

‘‘बेटा, फिर वही सिरदर्द,’’ दामिनी अपना माथा सहलाती हुई बोली.

‘‘उफ, आप दवाई ले कर रैस्ट करो. हमारे जाने के बाद कोई काम मत करना.’’

सृष्टि की बात मान कर विपिन और उस के चले जाने के बाद दामिनी दवा खा कर कुछ देर सो गई.

फोन की घनघनाहट से दामिनी की आंख खुली, ‘‘हैलो,’’ टूटी हुई आवाज में वह बोली.

‘‘दामिनी, मैं रजत बोल रहा हूं. मेरे सहकर्मी को अपनी बेटी के दाखिले के सिलसिले में सृष्टि से कुछ पूछना है पर न जाने क्यों उस का सैलफोन स्विचऔफ आ रहा है. जरा उसे बुला कर अपने फोन से बात करवा दो.’’

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‘‘सृष्टि, सृष्टि कालेज से अभी लौटी कहां है. आज तबीयत थोड़ी ढीली लग रही थी, इसलिए आंख लग गई. क्या समय हुआ है?’’

‘‘रात के 8 बज रहे हैं. सृष्टि अभी तक नहीं लौटी,’’ विपिन के स्वर में चिंता के भाव घुलने लगे.

समय सुन कर दामिनी भी हड़बड़ा कर उठ बैठी, ‘‘इतनी देर सृष्टि को कभी नहीं होती. उस पर उस का फोन भी औफ आ रहा है. ऐसा क्या हो गया होगा,’’ कहती हुई दामिनी के पसीने छूट गए.

‘‘क्या तुम उस की सहेलियों के घर जानती हो?’’ विपिन ने पूछा.

‘‘हां, कुछ सहेलियां पास में ही रहती हैं. मैं फौरन जा कर पूछ आती हूं. तुम कहां हो?’’ दामिनी बोली.

‘‘मैं औफिस से घर के लिए चल दिया हूं. सृष्टि के कालेज के रास्ते में हूं. मैं पूरा रास्ता उसे देखता आऊंगा,’’ विपिन काफी घबरा कर बोल रहे थे.

‘‘मैं भी पासपड़ोस, अपने महल्ले व हाईवे तक सृष्टि को देख कर आती हूं,’’ दामिनी ने जल्दबाजी में अपनी चुन्नी उठाई और सड़क की ओर दौड़ पड़ी.

सब से पहले दामिनी ने सृष्टि की सब से पास रहने वाली  सहेली का दरवाजा खटखटाया, तो उस ने बताया, ‘‘आंटी, आज मैं कालेज गई ही नहीं. क्या हुआ, आप इतनी परेशान क्यों हैं?’’

मगर दामिनी के पास उत्तर देने का समय न था. वह भागती हुई दूसरी सहेली के घर पहुंची. फिर  तीसरी. पड़ोस में केवल इतनी ही लड़कियां सृष्टि के कालेज में पढ़ती थीं. कहीं भी सृष्टि की खबर न पा कर दामिनी की चिंता बढ़ती जा रही थी.

‘‘दामिनी अब हाईवे की ओर चलने लगी. तीव्र गति से कदम बढ़ाती दामिनी अब सुबकने लगी कि पता नहीं मेरी बच्ची कहां होगी. इतनी देर कभी नहीं हुई उसे. फोन क्यों स्विचऔफ है. कम से कम एक फोन कर देती. आएगी तो बहुत डांटूंगी. यह भी कोई तरीका हुआ. मन ही मन में बड़बड़ाती अपने आंसुओं को पोंछती हुई दामिनी हाईवे पर चली जा रही थी. कभी दुकान पर बैठे चाय पी रहे लोगों से पूछती तो कभी सड़क पर जा रहे लोगों को अपने फोन पर सृष्टि का फोटो दिखा कर उस के बारे में जानकारी हासिल करने का प्रयास करती.

उधर विपिन जगहजगह अपनी कार रोक कर सृष्टि को खोजने में प्रयत्नशील थे. घर निकट आता जा रहा था, किंतु सृष्टि का कुछ पता नहीं चल रहा था. विपिन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. कार चलाते हुए अब वे हाईवे पर पहुंच चुके थे. रात काफी हो चुकी थी. गाडि़यां तेज रफ्तार से अपने गंतव्य स्थान को दौड़ी जा रही थीं. कार चलाते हुए विपिन अब घर के निकट पहुंचने लगे लेकिन सृष्टि का कोई अतापता न चला था. विपिन किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा रहे थे.

तभी उन्होंने सड़क के किनारे किसी को औंधेमुंह गिरा देखा. तेजी से गाड़ी को साइड में लगाते हुए विपिन उतरे और उस ओर बढ़ चले. वह किसी स्त्री का शरीर था जिस के कपड़े बेतरतीब अवस्था में थे. करीब 10 फर्लांग दूर चुन्नी पड़ी हुई थी. विपिन बेहद घबरा गए कि कहीं यह सृष्टि तो नहीं… आज क्या पहना था सृष्टि ने, यह भी विपिन को नहीं पता क्योंकि सृष्टि उन के औफिस जाने के बाद ही अपने कालेज जाया करती है. लगभग भागते हुए विपिन उस की तरफ बढ़े और कंधे से पकड़ कर उस का चेहरा अपनी ओर मोड़ा.

उस के बाद जो उन्होंने देखा, उन के चेहरे पर विषादपूर्ण भाव उभर आए. पलभर को मानो उन्हें काठ मार गया.

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‘‘यह तो दामिनी है,’’ उन के मुंह से अस्फुट बोल निकले. दामिनी से दूर गिरी उस की चुन्नी, कंधे से सरका हुआ उस का कुरता, खुली हुई सलवार जो उस के घुटनों तक गिरी हुई थी और दुख व तकलीफ में लिपटा उस का चेहरा आदि सबकुछ साफसाफ दर्शा रहा था कि उस के साथ क्या बीत चुका है. जिस अनहोनी की आशंका दोनों मातापिता अपनी नवयौवना बेटी के लिए कर रहे थे, यथार्थ में वही दुर्घटना दामिनी के साथ घट चुकी थी.

‘‘यह क्या हुआ, तुम यहां कैसे, इस हालत में… उठो दामिनी,’’ कहते हुए विपिन सहारा दे कर दामिनी को उठाने लगे.

दामिनी मूर्च्छित सी अवस्था में उठने का प्रयास करने लगी. सृष्टि को ढूंढ़ते हुए वह यहां एक सुनसान कोने में पहुंच गई थी. सृष्टि का नाम पुकारती वह यहांवहां भटक रही थी कि सड़क से गुजरती एक गाड़ी में सवार कुछ लड़कों की गंदी नजर उस पर पड़ गई. अकेली औरत, चिंता में बेहाल, रुकी हुई गाड़ी की ओर बेध्यानी में बढ़ती चली गई और कुछ सशक्त हाथों ने उसे गाड़ी के भीतर घसीट लिया.

फिर इन्हीं सड़कों पर, चलती गाड़ी में उस के साथ वही अपमानजनक, अनहोनी दुर्घटना घट गई जैसी खबरें अखबार में पढ़ते हुए विपिन का मन परेशान हो जाया करता. कौन सोच सकता था कि जवान लड़की की मां को भी वही खतरा है जिस का डर अकसर मातापिता को अपनी युवा बेटियों के लिए लगता है. जमाना सेफ्टी पिन का हो या पैपरस्प्रे का औरतों के लिए सुनसान गलियां हमेशा से खतरा रहीं और आज भी हैं.

‘‘उठो दामिनी, हिम्मत करो. घर चलो,’’ विपिन दामिनी को दिलासा देने लगे.

क्या औरतों के लिए घर की देहरी लांघना सदा ही लक्ष्मणरेखा का प्रश्न रहेगा? किसी भी उम्र की औरत हो, कोई भी शहर हो, कोई भी जमाना हो कब तक औरत की इज्जत के लिए हर गली कच्ची रहेगी? कब तक हर औरत को रेप जैसे अपमानजनक अपराध के बाद ऐसे मुंह छिपाना पड़ेगा मानो वह इस की शिकार नहीं बल्कि असली गुनहगार है? केवल दामिनी नाम रख देने से औरत में शक्ति नहीं आती. वह फिर भी निर्बल, भेद्य, आलोचनीय, अशक्त रहती है. कब होगी वह सुबह जो सच्चा सवेरा लाएगी? कब बिखरेंगी वे किरणें जो सच्चा उजाला फैलाएंगी? दामिनी सुन्न दिलदिमाग लिए, लंगड़ाती हुई, विपिन के कंधे का सहारा लिए अपनी कार में बैठ गई.

‘‘विपिन…’’ कह दामिनी रोने लगी, ‘‘देखो न, यह क्या हो गया,’’ फिर स्वयं को समेटती हुई बोली, ‘‘पुलिस स्टेशन चलो, मुझे एफआईआर लिखवानी है.’’

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विपिन ने गाड़ी को सड़क के एक ओर लगाया और  दामिनी के सिर पर हाथ फेर कर उसे शांत करने लगे, ‘‘जो होना था सो हो गया. अब इन बातों से क्या होगा? इतनी रात को, यहां सुनसान कोने में कौन सी गाड़ी थी, कौन लोग थे, क्या तुम पहचान पाओगी? क्या तुम ने गाड़ी का नंबर देखा? पुलिस सब पूछेगी, तुम से सुबूत मांगेगी. उस पर जब यह खबर समाज में फैल जाएगी तो हमारे परिवार की इज्जत का क्या होगा? सब रिश्तेदार क्या कहेंगे? सृष्टि पर क्या बीतेगी… आगे चल कर उस की शादी के समय… कुछ सोचो दामिनी. भलाई इसी में है कि इस बात को यही खत्म कर दिया जाए. आने वाले कल के बारे में विचार करो.’’

आगे पढ़ें- सृष्टि घर आ चुकी है. लेकिन उस के…

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