लड़की- भाग 2 : क्या परिवार की मर्जी ने बर्बाद कर दी बेटी वीणा की जिंदगी

लेखक- रमणी मोटाना

सुधाकर पहले ही ज्योतिषी से मिल चुके थे और उस की मुट्ठी गरम कर दी थी. ‘महाराज, कन्या एक गलत सोहबत में पड़ गई है और उस से शादी करने का हठ कर रही है. कुछ ऐसा कीजिए कि उस का मन उस लड़के की ओर से फिर जाए.

‘आप चिंता न करें यजमान,’ ज्योतिषाचार्य ने कहा.

ज्योतिषी ने वीणा की जन्मपत्री देख कर बताया कि उस का विदेश जाना अवश्यंभावी है. ‘तुम्हारी कुंडली अति उत्तम है. तुम पढ़लिख कर अच्छा नाम कमाओगी. रही तुम्हारी शादी की बात, सो, कुंडली के अनुसार तुम मांगलिक हो और यह तुम्हारे भावी पति के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. तुम्हारी शादी एक मांगलिक लड़के से ही होनी चाहिए वरना जोड़ी फलेगीफूलेगी नहीं. एक  बात और, तुम्हारे ग्रह बताते हैं कि तुम्हारी एक शादी ऐनवक्त पर टूट गई थी?’

‘जी, हां.’

‘भविष्य में इस तरह की बाधा को टालने के लिए एक अनुष्ठान कराना होगा, ग्रहशांति करानी होगी, तभी कुछ बात बनेगी.’ ज्योतिषी ने अपनी गोलमोल बातों से वीणा के मन में ऐसी दुविधा पैदा कर दी कि वह भारी असमंजस में पड़ गई. वह अपनी शादी के बारे में कोई निर्णय न ले सकी.

शीघ्र ही उसे अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी से वजीफे के साथ वहां दाखिला मिल गया. उसे अमेरिका के लिए रवाना कर के उस के मातापिता ने सुकून की सांस ली.

‘अब सब ठीक हो जाएगा,’ सुधाकर ने कहा, ‘लड़की का पढ़ाई में मन लगेगा और उस की प्रवीण से भी दूरी बन जाएगी. बाद की बाद में देखी जाएगी.’

इत्तफाक से वीणा के दोनों भाई भी अपनेअपने परिवार समेत अमेरिका जा बसे थे और वहीं के हो कर रह गए थे. उन का अपने मातापिता के साथ नाममात्र का संपर्क रह गया था. शुरूशुरू में वे हर हफ्ते फोन कर के मांबाप की खोजखबर लेते रहते थे, लेकिन धीरेधीरे उन का फोन आना कम होता गया. वे दोनों अपने कामकाज और घरसंसार में इतने व्यस्त हो गए कि महीनों बीत जाते, उन का फोन न आता. मांबाप ने उन से जो आस लगाई थी वह धूलधूसरित होती जा रही थी.

समय बीतता रहा. वीणा ने पढ़ाई पूरी कर अमेरिका में ही नौकरी कर ली थी. पूरे 8 वर्षों बाद वह भारत लौट कर आई. उस में भारी परिवर्तन हो गया था. उस का बदन भर गया था. आंखों पर चश्मा लग गया था. बालों में दोचार रुपहले तार झांकने लगे थे. उसे देख कर सुधाकर व अहल्या धक से रह गए. पर कुछ बोल न सके.

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‘अब तुम्हारा क्या करने का इरादा है, बेटी?’ उन्होंने पूछा.

‘मेरा नौकरी कर के जी भर गया है. मैं अब शादी करना चाहती हूं. यदि मेरे लायक कोई लड़का है तो आप लोग बात चलाइए,’ उस ने कहा.

अहल्या और सुधाकर फिर से वर खोजने के काम में लग गए. पर अब स्थिति बदल चुकी थी. वीणा अब उतनी आकर्षक नहीं थी. समय ने उस पर अपनी अमिट छाप छोड़ दी थी. उस ने समय से पहले ही प्रौढ़ता का जामा ओढ़ लिया था. वह अब नटखट, चुलबुली नहीं, धीरगंभीर हो गई थी.

उस के मातापिता जहां भी बात चलाते, उन्हें मायूसी ही हासिल होती थी. तभी एक दिन एक मित्र ने उन्हें भास्कर के बारे में बताया, ‘है तो वह विधुर. उस की पहली पत्नी की अचानक असमय मृत्यु हो गई. भास्कर नाम है उस का. वह इंजीनियर है. अच्छा कमाता है. खातेपीते घर का है.’

मांबाप ने वीणा पर दबाव डाल कर उसे शादी के लिए मना लिया. नवविवाहिता वीणा की सुप्त भावनाएं जाग उठीं. उस के दिल में हिलोरें उठने लगीं. वह दिवास्वप्नों में खो गई. वह अपने हिस्से की खुशियां बटोरने के लिए लालायित हो गई.

लेकिन भास्कर से उस का जरा भी तालमेल नहीं बैठा. उन में शुरू से ही पटती नहीं थी. दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर था. भास्कर बहुत ही मितभाषी लेकिन हमेशा गुमसुम रहता. अपने में सीमित रहता.

वीणा ने बहुत कोशिश की कि उन में नजदीकियां बढ़ें पर यह इकतरफा प्रयास था. भास्कर का हृदय मानो एक दुर्भेध्य किला था. वह उस के मन की थाह न पा सकी थी. उसे समझ पाना मुश्किल था. पति और पत्नी में जो अंतरंगता व आत्मीयता होनी चाहिए, वह उन दोनों में नहीं थी. दोनों में दैहिक संबंध भी नाममात्र का था. दोनों एक ही घर में रहते पर अजनबियों की तरह. दोनों अपनीअपनी दुनिया में मस्त रहते, अपनीअपनी राह चलते.

दिनोंदिन वीणा और उस के बीच खाई बढ़ती गई. कभीकभी वीणा भविष्य के बारे में सोच कर चिंतित हो उठती. इस शुष्क स्वभाव वाले मनुष्य के साथ सारी जिंदगी कैसे कटेगी. इस ऊबभरे जीवन से वह कैसे नजात पाएगी, यह सोच निरंतर उस के मन को मथते रहती.

एक दिन वह अपने मातापिता के पास जा पहुंची. ‘मांपिताजी, मुझे इस आदमी से छुटकारा चाहिए,’ उस ने दोटूक कहा. अहल्या और सुधाकर स्तंभित रह गए, ‘यह क्या कह रही है तू? अचानक यह कैसा फैसला ले लिया तू ने? आखिर भास्कर में क्या बुराई है. अच्छे चालचलन का है. अच्छा कमाताधमाता है. तुझ से अच्छी तरह पेश आता है. कोई दहेजवहेज का लफड़ा तो नहीं है न?’

‘नहीं. सौ बात की एक बात है, मेरी उन से नहीं पटती. हमारे विचार नहीं मिलते. मैं अब एक दिन भी उन के साथ नहीं बिताना चाहती. हमारा अलग हो जाना ही बेहतर है.’

‘पागल न बन, बेटी. जराजरा सी बातों के लिए क्या शादी के बंधन को तोड़ना उचित है? बेटी शादी में समझौता करना पड़ता है. तालमेल बिठाना पड़ता है. अपने अहं को त्यागना पड़ता है.’

‘वह सब मैं जानती हूं. मैं ने अपनी तरफ से पूरा प्रयत्न कर के देख लिया पर हमेशा नाकाम रही. बस, मैं ने फैसला कर लिया है. आप लोगों को बताना जरूरी समझा, सो बता दिया.’

‘जल्दबाजी में कोई निर्णय न ले, वीणा. मैं तो सोचती हूं कि एक बच्चा हो जाएगा तो तेरी मुश्किलें दूर हो जाएंगी,’ मां अहल्या ने कहा.

वीणा विद्रूपता से हंसी. ‘जहां परस्पर चाहत और आकर्षण न हो, जहां मन न मिले वहां एक बच्चा कैसे पतिपत्नी के बीच की कड़ी बन सकता है? वह कैसे उन दोनों को एकदूसरे के करीब ला सकता है?’

अहल्या और सुधाकर गहरी सोच में पड़ गए. ‘इस लड़की ने तो एक भारी समस्या खड़ी कर दी,’ अहल्या बोली, ‘जरा सोचो, इतनी कोशिश से तो लड़की को पार लगाया. अब यह पति को छोड़छाड़ कर वापस घर आ बैठी, तो हम इसे सारा जीवन कैसे संभाल पाएंगे? हमारी भी तो उम्र हो रही है. इस लड़की ने तो बैठेबिठाए एक मुसीबत खड़ी कर दी.’

‘उसे किसी तरह समझाबुझा कर ऐसा पागलपन करने से रोको. हमारे परिवार में कभी किसी का तलाक नहीं हुआ. यह हमारे लिए डूब मरने की बात होगी. शादीब्याह कोई हंसीखेल है क्या. और फिर इसे यह भी तो सोचना चाहिए कि इस उम्र में एक तलाकशुदा लड़की की दोबारा शादी कैसे हो पाएगी. लड़के क्या सड़कों पर पड़े मिलते हैं? और इस में कौन से सुरखाब के पर लगे हैं जो इसे कोई मांग कर ले जाएगा,’ सुधाकर बोले.

‘देखो, मैं कोशिश कर के देखती हूं. पर मुझे नहीं लगता कि वीणा मानेगी. वह बड़ी जिद्दी होती जा रही है,’ अहल्या ने कहा.

‘‘तभी तो भुगत रही है. हमारा बस चलता तो इस की शादी कभी की हो गई होती. हमारे बेटों ने हमारी पसंद की लड़कियों से शादी की और अपनेअपने घर में खुश हैं, पर इस लड़की के ढंग ही निराले हैं. पहले प्रेमविवाह का खुमार सिर पर सवार हुआ, फिर विदेश जा कर पढ़ने का शौक चर्राया. खैर छोड़ो, जो होना है सो हो कर रहेगा.’’ बूढ़े दंपती ने बेटी को समझाबुझा कर वापस उस के घर भेज दिया.

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एक दिन अचानक हृदयगति रुक जाने से सुधाकर की मौत हो गई. दोनों बेटे विदेश से आए और औपचारिक दुख प्रकट कर वापस चले गए. वे मां को साथ ले जाना चाहते थे पर अहल्या इस के लिए तैयार नहीं हुई.

अहल्या किसी तरह अकेली अपने दिन काट रही थी कि सहसा बेटी के हादसे के बारे में सुन कर उस के हाथों के तोते उड़ गए. वह अपना सिर धुनने लगी. इस लड़की को यह क्या सूझी? अरे, शादी से खुश नहीं थी तो पति को तलाक दे देती और अकेले चैन से रहती. भला अपनी जान देने की क्या जरूरत थी? अब देखो, जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है. अपनी मां को इस बुढ़ापे में ऐसा गम दे दिया.

बंदिनी- भाग 2 : रेखा ने कौनसी चुकाई थी कीमत

लाखों में एक न होने पर भी रेखा के चेहरे का अपना आकर्षण था. लंबी, छरहरी देह, गेहुआं रंग, सुतवां नाक, और ऊंचे उठे कपोल. बड़ी आंखें जिन में चौबीसों घंटे एक उज्ज्वल हंसी चमकती रहती, काले रेशम जैसे बाल और दोनों गालों पर पड़ने वाले गड्ढे जिस में पलभर का पाहुना भी सदा के लिए गिरने स्वयं ही चला आए. अशोक तो पहली नजर में ही दिल हार बैठा था.

अशोक एक व्यापारी मोहनलाल के घर में काम करता था. मोहनलाल ग्वालियर का एक बहुत बड़ा व्यापारी था. गांव में उस की बहुत जमीनें थीं जिन की देखभाल के लिए उस ने अशोक और उस के बड़े भाई को लगा रखा था. वह साल में कई बार गांव आता था. मंडी में आई अकसर हर कुंआरी लड़की का खरीदार वही होता था. शादीशुदा, अधेड़ उम्र का आदमी और 4 बच्चों का पिता, परंतु पुरुष की उम्र और वैवाहिक स्थिति उस की इच्छाओं के आड़े नहीं आती.

समाज के नियम बनाने वालों के ऊपर कोई नियम लागू नहीं होता. जाति से ब्राह्मण और व्यवसाय से बनिया मोहनलाल बहुत ही कामी और धूर्त पुरुष था. वह अपना व्यवसाय तो बदल चुका था परंतु जातीय वर्चस्व का झूठा अहंकार आज भी कायम था. बहुत जल्द ही वह राजनीतिक मंच पर पदार्पण करने वाला था. इसी व्यस्तता के कारण पिछले कुछ वर्षों में उस का गांव आना थोड़ा कम हो गया था.

अशोक इसी बात से निश्ंिचत था. उस ने रेखा को खरीद कर कहीं दूर भाग जाने की साहसी योजना भी बना रखी थी. शुरू में रेखा केवल अशोक के प्रेम से अवगत थी, वह न तो उस के अस्तित्व के बारे में जानती थी और न ही उस की योजना के बारे में. परंतु कल्पना की  विदाई ने उसे वास्तविकता से अवगत करा दिया था. रेखा को यह भी मालूम हो गया था कि उस के धनलोलुप परिवार के मुंह में खून लग चुका है.

शीघ्र ही रेखा को अपने परिवार की नई योजना की भनक भी लग गई थी. अशोक सदा रेखा से किसी बड़े काम के लिए पैसे बचाने की बात करता था. उस समय रेखा को लगा करता था, वह शायद किसी व्यवसाय हेतु बचत कर रहा है. परंतु अब वह इस बचत के पीछे का मतलब समझ गई थी. किंतु अब रेखा के परिवार वालों के पास एक नया और प्रभावशाली ग्राहक आ गया था. इस में कोई शक नहीं था कि वे रेखा का सौदा उस के साथ तय करने वाले थे.

इस प्रथा की बात छिपाने की वजह से रेखा अशोक से नाराज थी, परंतु अशोक ने उसे समझाबुझा कर शांत कर दिया था. रेखा इस गांव से पहले ही भाग जाना चाहती थी, अशोक के तर्कों से हार गई थी. बदली हुई परिस्थितियों ने उसे भयभीत कर दिया था और उस ने अपना गुस्सा अशोक पर जाहिर किया था कि, ‘‘जिस बहुमूल्य को खरीदने के लिए तू इतने महीनों से धन जोड़ रहा था, उस के कई और खरीदार आ गए हैं.’’

एकाएक हुए इस आघात के लिए अशोक तैयार नहीं था, वह लड़खड़ा गया. न जाने कितने महीनों से पाईपाई जोड़ कर उस ने 2 लाख रुपए जमा किए थे. रेखा की यही बोली उस के भाई ने लगाई थी. अशोक जानता था कि रेखा को अपना बनाने के लिए उस का प्रेम थोड़ा कम पड़ेगा, इसलिए वह धन जोड़ रहा था. परंतु आज रेखा के इस खुलासे ने जाहिर कर दिया था कि विक्रेता अपनी वस्तु के दाम में परिस्थिति के अनुसार बदलाव कर सकता है.

थोड़ी देर पहले रेखा को उस पर गुस्सा आ रहा था, परंतु अब अशोक की दशा देख कर उसे दुख हो रहा था. उस ने करीब जा कर अशोक को अपनी बांहों में भर लिया, ‘‘तूने कैसे भरोसा कर लिया उस भेडि़ए पर. अरे पगले, जो अपनी बहन का व्यापार कर सकता है, वह क्या कभी सौदे में लाभ से परे कुछ सोच सकता है?’’

‘‘जान से मार दूंगा मैं, उन सब को भी और तेरे भाई को भी,’’ रेखा के बाजुओं को जोर से पकड़ कर उसे अपनी ओर खींचते हुए चिल्ला पड़ा था अशोक.

‘‘अच्छा, मोहनलाल को भी?’’ रेखा ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा था.

वह एक ही पल में छिटक कर दूर हो गया,

‘‘क्य्याआआ?’’

एक दर्दभरी मुसकान खिल गई थी रेखा के चेहरे पर, ‘‘बस, प्यार का ज्वार उतर गया लगता है.’’

काफी समय तक दोनों निशब्द बैठे रहे थे. फिर अशोक ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘रेखा, तू अपने भाई की बात मान ले. हां, परंतु मोहनलाल से पहले तू मेरी बन जा.’’

‘‘पागल हो गया है क्या? मैं…’’ रेखा को अपनी बात पूरी भी नहीं करने दी उस ने और दोबारा बोल पड़ा था, ‘‘रेखा, सारा चक्कर तेरे कौमार्य का है. एक बार तेरा कौमार्य भंग हो गया तो तेरा दाम भी कम हो जाएगा. मोहनलाल ज्यादा से ज्यादा तुझे एक साल रखेगा. चल, हो सकता है तेरी सुंदरता के कारण अवधि को एकदो साल के लिए बढ़ा दे परंतु उस के बाद तो तुझे छोड़ ही देगा. फिर तुझे मैं खरीद लूंगा. लेकिन…’’

‘‘लेकिन?’’

‘‘मैं मोहनलाल को जीतने नहीं दूंगा. कुंआरी लड़कियों का कौमार्य उसे आकर्षित करता है न, तू उसे मिलेगी तो जरूर, पर मैली…’’

रेखा अशोक के ऐसे आचरण के लिए तैयार नहीं थी. पुरुष चाहे कितनी ही लड़कियों के साथ संबंध रखे, वह हमेशा पाक, परंतु स्त्री मैली. वह यह भूल जाता है मैला करने वाला स्वयं पाक कैसे हो सकता है. परंतु कोई भी निर्णय लेने से पहले वह कुछ और प्रश्नों का उत्तर चाहती थी, ‘‘यदि मेरा कोई बच्चा हो गया तो?’’

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‘‘न, न. तुझे गर्भवती नहीं होना है. किसी और का पाप मैं नहीं पालूंगा.’’

एक आह निकल गई थी रेखा के मुख से. इस पुरुष की कायरता से ज्यादा उसे स्वयं की मूर्खता पर क्रोध आ रहा था. उस की वासना को प्रेम समझने की भूल उस ने स्वयं की थी. रेखा ने एक थप्पड़ के साथ अशोक के साथ अपने संबंधों पर विराम लगा दिया था. परंतु अब अपने परिवार द्वारा रचित व्यूह में वह अकेली रह गई थी.

चक्रव्यूह की रचना तो हो गई थी, उसे भेदने के लिए महाभारत काल में अभिमन्यु भी अकेला था और आज रेखा भी अकेली ही थी. तब भी केशव नहीं आए थे और आज भी कोई दैवी चमत्कार नहीं हुआ था. पराजित दोनों ही हुए थे.

पराजित रेखा मोहनलाल की रक्षिता बन ग्वालियर चली गई थी. दूर से ही जिस के जिस्म की सुगंध राह चलते को भी मोह कर पलभर को ठिठका देती थी, वही रेखा अब सूखी झाडि़यों के झंकार के समान मोहनलाल के घर में धूल खा रही थी.

केवल शरीर ही नहीं, वजूद भी छलनी हो गया था उस का. मोहनलाल के घर में बीते वो 10 साल अमानुषिक यातनाओं से भरे हुए थे. उस का शरीर जैसे एक लीज पर ली हुई जमीन थी, जिसे लौटाने से पहले मालिक उस का पूरी तरह से दोहन कर लेना चाहता था. कभी मालिक खुद रौंदता था, कभी उस के रिश्तेदार, तो कभी उस के मेहमान. घर की स्त्रियों से भी सहानुभूति की उम्मीद बेकार थी.

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जीवनज्योति

लड़की- भाग 3 : क्या परिवार की मर्जी ने बर्बाद कर दी बेटी वीणा की जिंदगी

लेखक- रमणी मोटाना

आज उसे लग रहा था कि उस ने व उस के पति ने बेटी के प्रति न्याय नहीं किया. क्या हमारी सोच गलत थी? उस ने अपनेआप से सवाल किया. शायद हां, उस के मन ने कहा. हम जमाने के साथ नहीं चले. हम अपनी परिपाटी से चिपके रहे.

पहली गलती हम से यह हुई कि बेटी के परिपक्व होने के पहले ही उस की शादी कर देनी चाही. अल्हड़ अवस्था में उस के कंधों पर गृहस्थी का बोझ डालना चाहा. हम जल्द से जल्द अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे. और दूसरी भूल हम से तब हुई जब वीणा ने अपनी पसंद का लड़का चुना और हम ने उस की मरजी को नकार कर उस की शादी में हजार रोडे़ अटकाए. अब जब वह अपनी शादी से खुश नहीं थी और पति से तलाक लेना चाह रही थी तो हम दोनों पतिपत्नी ने इस बात का जम कर विरोध किया.

बेटी की खुशी से ज्यादा उन्हें समाज की चिंता थी. लोग क्या कहेंगे, यही बात उन्हें दिनरात खाए जाती थी. उन्हें अपनी मानमर्यादा का खयाल ज्यादा था. वे समाज में अपनी साख बनाए रखना चाहते थे, पर बेटी पर क्या बीत रही है, इस बात की उन्हें फिक्र नहीं थी. बेटी के प्रति वे तनिक भी संवेदनशील न थे. उस के दर्द का उन्हें जरा भी एहसास न था. उन्होंने कभी अपनी बेटी के मन में पैठने की कोशिश नहीं की. कभी उस की अंतरंग भावनाओें को नहीं जानना चाहा. उस के जन्मदाता हो कर भी वे उस के प्रति निष्ठुर रहे, उदासीन रहे.

अहल्या को पिछली बीसियों घटनाएं याद आ गईं जब उस ने वीणा को परे कर बेटों को कलेजे से लगाया था. उस ने हमेशा बेटों को अहमियत दी जबकि बेटी की अवहेलना की. बेटों को परवान चढ़ाया पर बेटी जैसेतैसे पल गई. बेटों को अपनी मनमानी करने की छूट दी पर बेटी पर हजार अंकुश लगाए. बेटों की उपलब्धियों पर हर्षित हुई पर बेटी की खूबियों को नजरअंदाज किया. बेटों की हर इच्छा पूरी की पर बेटी की हर अभिलाषा पर तुषारापात किया. बेटे उस की गोद में चढ़े रहते या उस की बांहों में झूलते पर वीणा के लिए न उस की गोद में जगह थी न उस के हृदय में. बेटे और बेटी में उस ने पक्षपात क्यों किया था? एक औरत हो कर उस ने औरत का मर्म क्यों नहीं जाना? वह क्यों इतनी हृदयहीन हो गई थी?

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बेटी के विवर्ण मुख को याद कर उस के आंसू बह चले. वह मन ही मन रो कर बोली, ‘बेटी, तू जल्दी होश में आ जा. मुझे तुझ से बहुतकुछ कहनासुनना है. तुझ से क्षमा मांगनी है. मैं ने तेरे साथ घोर अन्याय किया. तेरी सारी खुशियां तुझ से छीन लीं. मुझे अपनी गलतियों का पश्चात्ताप करने दे.’

आज उसे इस बात का शिद्दत से एहसास हो रहा था कि जानेअनजाने उस ने और उस के पति ने बेटी के प्रति पक्षपात किया. उस के हिस्से के प्यार में कटौती की. उस की खुशियों के आड़े आए. उस से जरूरत से ज्यादा सख्ती की. उस पर बचपन से बंदिशें लगाईं. उस पर अपनी मरजी लादी.

वीणा ने भी कठपुतली के समान अपने पिता के सामंती फरमानों का पालन किया. अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं का दमन कर उन के इशारों पर चली. ढकोसलों, कुरीतियों और कुसंस्कारों से जकड़े समाज के नियमों के प्रति सिर झुकाया. फिर एक पुरुष के अधीन हो कर उस के आगे घुटने टेक दिए. अपने अस्तित्व को मिटा कर अपना तनमन उसे सौंप दिया. फिर भी उस की पूछ नहीं थी. उस की कद्र नहीं थी. उस की कोई मान्यता न थी.

प्रतीक्षाकक्ष में बैठेबैठे अहल्या की आंख लग गई थी. तभी भास्कर आया. वह उस के लिए घर से चायनाश्ता ले कर आया था. ‘‘मांजी, आप जरा रैस्टरूम में जा कर फ्रैश हो लो, तब तक मैं यहां बैठता हूं.’’

अहल्या नीचे की मंजिल पर गई. वह बाथरूम से हाथमुंह धो कर निकली थी कि एक अनजान औरत उस के पास आई और बोली, ‘‘बहनजी, अंदर जो आईसीयू में मरीज भरती है, क्या वह आप की बेटी है और क्या वह भास्करजी की पत्नी है?’’

‘‘हां, लेकिन आप यह बात क्यों पूछ रही हैं?’’

‘‘एक जमाना था जब मेरी बेटी शोभा भी इसी भास्कर से ब्याही थी.’’

‘‘अरे?’’ अहल्या मुंहबाए उसे एकटक ताकने लगी.

‘‘हां, बहनजी, मेरी बेटी इसी शख्स की पत्नी थी. वह इस के साथ कालेज में पढ़ती थी. दोनों ने भाग कर प्रेमविवाह किया, पर शादी के 2 वर्षों बाद ही उस की मौत हो गई.’’

‘‘ओह, यह सुन कर बहुत अफसोस हुआ.’’

‘‘हां, अगर उस की मौत किसी बीमारी की वजह से होती तो हम अपने कलेजे पर पत्थर रख कर उस का वियोग सह लेते. उस की मौत किसी हादसे में भी नहीं हुई कि हम इसे आकस्मिक दुर्घटना समझ कर मन को समझा लेते. उस ने आत्महत्या की थी.

‘अब आप से क्या बताऊं. यह एक अबूझ पहेली है. मेरी हंसतीखेलती बेटी जो जिजीविषा से भरी थी, जो अपनी जिंदगी भरपूर जीना चाहती थी, जिस के जीवन में कोई गम नहीं था उस ने अचानक अपनी जान क्यों देनी चाही, यह हम मांबाप कभी जान नहीं पाएंगे. मरने के पहले दिन वह हम से फोन पर बातें कर रही थी, खूब हंसबोल रही थी और दूसरे दिन हमें खबर मिली कि वह इस दुनिया से जा चुकी है. उस के बिस्तर पर नींद की गोलियों की खाली शीशी मिली. न कोई चिट्ठी न पत्री, न सुसाइड नोट.’’

‘‘और भास्कर का इस बारे में क्या कहना था?’’

‘‘यही तो रोना है कि भास्कर इस बारे में कुछ भी बता न सका. ‘हम में कोई झगड़ा नहीं हुआ,’ उस ने कहा, ‘छोटीमोटी खिटपिट तो मियांबीवी में होती रहती है पर हमारे बीच ऐसी कोई भीषण समस्या नहीं थी कि जिस की वजह से शोभा को जान देने की नौबत आ पड़े.’ लेकिन हमारे मन में हमेशा यह शक बना रहा कि शोभा को आत्महत्या करने को उकसाया गया.

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‘‘बहनजी, हम ने तो पुलिस में भी शिकायत की कि हमें भास्कर पर या उस के घर वालों पर शक है पर कोई नतीजा नहीं निकला. हम ने बहुत भागदौड़ की कि मामले की तह तक पहुंचें पर फिर हार कर, रोधो कर चुप बैठ गए. पतिपत्नी के बीच क्या गुजरती थी, यह कौन जाने. उन के बीच क्या घटा, यह किसी को नहीं पता.

‘‘हमारी बेटी को कौन सा गम खाए जा रहा था, यह भी हम जान न पाए. हम जवान बेटी की असमय मौत के दुख को सहते हुए जीने को बाध्य हैं. पता नहीं वह कौन सी कुघड़ी थी जब भास्कर से मेरी बेटी की मित्रता हुई.’’

अहल्या के मन में खलबली मच गई. कितना अजीब संयोग था कि भास्कर की पहली पत्नी ने आत्महत्या की. और अब उस की दूसरी पत्नी ने भी अपने प्राण देने चाहे. क्या यह महज इत्तफाक था या भास्कर वास्तव में एक खलनायक था? अहल्या ने मन ही मन तय किया कि अगर वीणा की जान बच गई तो पहला काम वह यह करेगी कि अपनी बेटी को फौरन तलाक दिला कर उसे इस दरिंदे के चंगुल से छुड़ाएगी.

वह अपनी साख बचाने के लिए अपनी बेटी की आहुति नहीं देगी. वीणा अपनी शादी को ले कर जो भी कदम उठाए, उसे मान्य होगा. इस कठिन घड़ी में उस की बेटी को उस का साथ चाहिए. उस का संबल चाहिए. देरसवेर ही सही, वह अपनी बेटी का सहारा बनेगी. उस की ढाल बनेगी. हर तरह की आपदा से उस की रक्षा करेगी.

एक मां होने के नाते वह अपना फर्ज निभाएगी. और वह इस अनजान महिला के साथ मिल कर उस की बेटी की मौत की गुत्थी भी सुलझाने का प्रयास करेगी.

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भास्कर जैसे कई भेडि़ये सज्जनता का मुखौटा ओढ़े अपनी पत्नी को प्रताडि़त करते रहते हैं, उसे तिलतिल कर जलाते हैं और उसे अपने प्राण त्यागने को मजबूर करते हैं. लेकिन वे खुद बेदाग बच जाते हैं क्योंकि बाहर से वे भले बने रहते हैं. घर की चारदीवारी के भीतर उन की करतूतें छिपीढकी रहती हैं.

सपनों की उड़ान: भाग 3- क्या हुआ था शांभवी के साथ

शादी होते ही 15 दिन तो शांभवी ने संयुक्त परिवार में घूंघट के भीतर यह सोच कर बिता दिए कि दिल्ली जाते ही वे इन सब बंधनों से आजाद हो जाएगी. मगर दिल्ली पहुंच कर उस के सारे सपने भरभरा टूट गए.

विजय बेहद लापरवाह और आलसी इंसान निकला. पूरे घर में सामान फैला कर रखता. घरेलू कार्य में मदद करने को अपनी तोहीन समझता. उस की वैस्टर्न ड्रैस को ले कर भी टीकाटिप्पणी करता.

हनीमून के लिए हिल स्टेशन का प्रताव रखने पर बोला, ‘‘हनीमून तो वे जाते हैं जो

अपने परिवार की बंदिशों में रहते हैं. हम तो यहां आजाद पंछी हैं. हमें कहीं जाने की क्या जरूरत? तुम ने तो कभी दिल्ली भी नहीं देखी है. वीकैंड में तुम्हें अलगअलग जगह जैसे इंडिया गेट, कुतुबमीनार, कनाट प्लेस, अक्षरधाम सब आराम से घुमा दूंगा.’’

शांभवी मन मसोस कर रह जाती. इशिता अभी भी उत्सुकता से उस के फोन का इंतजार करती. मगर शांभवी हां हूं, ठीक हैं कह कर बात टाल जाती.

शांभवी की शादी अच्छे से संपन्न होते ही भानुप्रताप ने इशिता की कुंडली रिस्तेदारों के माध्यम से अनेक जगह भिजवा दी. 2-4 जगह से अच्छे प्रस्ताव भी मिल गए. फिर क्या था भानुप्रताप अपनी पत्नी रितिका के पीछे पड़ गए, ‘‘सुनो, तुम इशिता को एक दिन बैठा कर अच्छे से समझओ. इतने अच्छे रिश्ते आसानी से नहीं मिलते. अभी उस की उम्र कम है जैसेजैसे उम्र बढ़ेगी रिश्ते मिलने भी कम हो जाएंगे.’’

‘‘जब इशिता पहले जौब करना चाहती हैं तो उसे कर लेने दो, फिर रिश्ते भी देख लेंगे,’’ रितिका ने समझया.

‘‘तुम ने भी तो शादी के 4 महीने बाद जौइन की थी वैसे ही वह भी कर लेगी,’’ भानुप्रताप लापरवाही से बोले.

‘‘आप ने कभी ध्यान भी दिया कि ससुराल और नौकरी के बीच तालमेल बैठाने में मुझे कितनी मुश्किल होती थी? आप तो हाथ झड़ कर निकल जाते थे सारी बातें मुझे ही सुननी पड़ती थीं,’’ रितिका का मन कड़वाहट से भर गया.

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‘‘एक लड़का रेलवे में इंजीनियर है दूसरा एमबीए है, सालाना 24 लाख का पैकेज है. कुंडली और फोटो देख कर दोनों परिवार सहमत हैं. तुम बस इसे राजी कर लो तो मैं उन लोगों को अपने घर आमंत्रित करूं,’’ भानुप्रताप ने रितिका को समझया.

‘‘मैं उसे कुछ नहीं कहूंगी जब आप को पता है वह अभी शादी करने को राजी नहीं है तो आप ने बिना बताए उस के फोटो और कुंडली क्यों भेजी?’’

‘‘बेकार बहस न करो. इतना अच्छा रिश्ता घर बैठे नहीं मिलता,’’ भानुप्रताप ऊंची आवाज

में बोले.

रितिका बहस में न पड़ कर वहां से उठ कर रसोई में चली गई. थोड़ी देर

में इशिता भी रसोईघर में आ गई.

‘‘मम्मी मैं क्या सुन रही हूं पापा ने मेरे लिए रिश्ता ढूंढ़ा है? आप ने मुझ से पूछे बिना इतना बड़ा फैसला कैसे ले लिया?’’

‘‘मुझे भी नहीं पता… तुम्हारे पापा हमेशा अपनी मरजी ही तो चलाते आए हैं इस घर में.

‘‘सब आप की वजह से हुआ है आप कभी दमदार आवाज में विरोध नहीं करती हैं न, इसी बात का फायदा पापा को मिल जाता है.’’

इशिता की बात सुन कर रितिका को एक झटका लगा. इशिता सही कह रही है वो कभी भी किसी बात का विरोध ही नहीं करती बस समझता ही करती आई है.

1 हफ्ता तो यही तमाशा चलता रहा. भानुप्रताप और इशिता दोनों ही रितिका से एकदूसरे की शिकायत करते रहते. एक दिन परेशान हो रितिका ने दोनों को आमनेसामने बैठा दिया और बोलीं, ‘‘जो तुम दोनों मुझ से कहते रहते हो कि इसे यह बता दो, उसे यह बता दो. आज फुरसत में हो आमनेसामने बैठ कर बात कर लो कि लड़के वालों को क्या जवाब भिजवाना है.’’

भानुप्रताप ने इशिता से कहा, ‘‘पहले मेरी बात ध्यान से सुनना बीच में बिलकुल नहीं बोलना, फिर मैं तुम्हारी बात सुनूंगा.’’

इशिता सहमत हो गई. भानुप्रताप ने उसे दोनों रिश्तों के विषय में समझया. उन दोनों युवकों का बायोडेटा, फोटोग्राफ, पारिवारिक रहनसहन के विषय में बताया.

इशिता अनमनी सी सुनती रही. पापा की बात समाप्त होते ही बोली, ‘‘आप भाई को अभी कितने साल और तैयारी के लिए देने जा रहे हैं?’’

‘‘कम से कम 3 साल तो देने ही पड़ेंगे. इतना आसान नहीं है आईएएस बनना.’’

‘‘तो ठीक है मुझे बस सालभर का समय दे दीजिए, फिर मैं आप की बात मान जाऊंगी.’’

‘‘सालभर कोई रिश्ता इंतजार नहीं करेगा. नौकरी के लिए आवेदन करती रहना शादी के बाद.’’

‘‘कहा न कि पहले नौकरी करूंगी फिर शादी की सोचूंगी. मन करेगा तो करूंगी नहीं तो खुद कमाऊंगी, खुद पर उड़ाऊंगी,’’ इशिता ने लापरवाही से कहा.

‘‘यह क्या बकवास है… रितिका तुम इसे कुछ समझती क्यों नहीं?’’

पितापुत्री जब भी आमनेसामने आते बहस शुरू हो जाती. रितिका ने भी उन की बहस के बीच बोलना बंद कर दिया.

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इशिता ने अपना लक्ष्य केद्रिंत कर लिया. वह हर दिन कम से कम 5-6 कंपनियों में आवेदन करती. उस दिन वह सुबह से साक्षात्कार में व्यस्त थी. शाम को चाय का कप पकड़ कर वह सोच में बैठी थी कि पिछले 15 दिनों में दिए साक्षात्कार के परिणाम भी अब जल्द ही आने शुरू हो जाएंगे. उसे पूरी उम्मीद है कि इस बार उसे नौकरी मिल ही जाएगी.

तभी सामने से पापा को बिस्कुट का डब्बा लाते देख वह समझ गई कि फिर से उसे शादी के लिए फुसलाने को पापा बिस्कुट का सहारा ले कर आ रहे हैं और उसी विषय पर चर्चा करेंगे. उस का सिर अब भारी हो चला था सुबह से लैपटौप पर आंखें गड़ाए वह थक चुकी थी. पापा से बहस कर अपना मूड खराब नहीं करना चाहती थी. अत: वहां से उठ कर बरामदे में रखी कुरसी पर बैठ गई.

भानुप्रताप भी सब समझ गए. अपनी बेटी की जिद देख कर उन्हें बहुत क्रोध आया तो वहीं से जोरजोर से बोलने लगे, ‘‘एक शांभवी है अपनी ससुराल वालों का दिल उस ने जाते ही जीत लिया. अपनी गृहस्थी में रचबस गई है. किसी से उसे कोई शिकायत नहीं. उस के मांपापा भी निश्चिंत हो गए हैं. एक हम हैं इतने अच्छे रिश्ते पकड़ कर बैठे हैं. रोज लड़के वालों से संपर्क कर उन्हें रोके हुए हैं. मगर हमारी बेटी सब से ज्यादा जिद्दी हैं. शांभवी को देखो उसे तो बीएड कर कैरियर बनाने की नहीं पड़ी है. एमबीए कर दिमाग खराब हो गया है इस का…’’

बरामदे तक आ रही बड़बड़ की आवाज से ध्यान हटाने के लिए वह फोन पर मेल चैक करने लगी. एक मेल को पढ़ कर वह उछल पड़ी. उसे एमएलसी में जौब मिल गई थी. उस ने मम्मीपापा को यह खुशखबरी देने के लिए बरामदे से अंदर झंका तो उसे मम्मी सिर पकड़ कर बैठी दिखीं और पापा फोन पर अच्छा, हां, फिर लगातार बोलते हुए दिखे.

‘‘क्या हुआ?’’ उस ने रोआंसा मुंह ले कर बैठी रितिका से पूछा.

‘‘शशश…’’ भानुप्रताप ने उसे चुप रहने को कहा.

वह सोफे पर बैठ गई.

फोन के बंद होते ही भानुप्रताप चुपचाप दूसरे सोफे पर बैठ गए.

‘‘कोई कुछ बोलेगा?’’ उस ने अपने मम्मीपापा से पूछा.

‘‘शांभवी के घर पुलिस आई थी उस के पति की पिटाई कर के गई,’’ मम्मी ने कहा.

‘‘क्या? मगर क्यों? पड़ोसियों से झगड़ा हुआ क्या?’’ इशिता ने पूछा.

‘‘ विजय और शांभवी की बहस हो गई थी तो विजय ने हाथ उठा दिया. शांभवी सामने दीवार से टकरा गई. उस के माथे से खून निकलने लगा. उसी समय दोनों भाई शांभवी से मिलने उस के घर पहुंच गए. शांभवी की यह हालत देख कर दोनों ने पुलिस बुला ली. पुलिस ने आ कर विजय की ठुकाई की. फिर शांभवी के कहने से छोड़ दिया वरना वे विजय को घरेलू हिंसा एक्ट में थाने ले जाने को तैयार थे,’’ भानुप्रताप एक सांस में बोल गए.

‘‘अब शांभवी बता रही है कि वह तो पहले भी 1-2 बार हाथ उठा चुका है मगर इस ने किसी को कानोंकान खबर न होने दी. कह रही थी कि वह ये सब बता कर आप लोगों को परेशान नहीं करना चाह रही थी,’’ रितिका ने कहा.

‘‘बेवकूफ है. वह कहती थी कि शादी के बाद घूमनेफिरने और मनमरजी करने की आजादी मिल जाएगी. मिल गई उसे आजादी? पिता के पहरे से निकली तो पति की बंदिशों में कैद हो गई. मैं ने कहा था बीएड कर लो, जौब पकड़ लो, आर्थिक आजादी तभी मिलेगी. मगर मैडम को तो शादी करनी थी,’’ इशिता ने बौखला कर कहा.

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रितिका ने उसे चुप रहने का इशारा किया.

‘‘मुझे ग्रेटर नोएडा में जौब मिल गई है. सालाना 7 लाख का पैकेज है. अब आप को मेरी बात सुननी पड़ेगी पापा. जब मेरा मन होगा मैं तभी शादी करूंगी. चाहे 1 साल बाद हो या फिर 4 साल बाद,’’ यह कह कर उस ने पापा की प्रतिक्रिया जाननी चाही.

भानुप्रताप ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘तुम ठीक कहती हो बेटा, खूब तरक्की करो, सदा सुखी रहो.’’

सपनों की उड़ान: भाग 2- क्या हुआ था शांभवी के साथ

सुबह से ही पूरे घर में जैसे भूचाल सा आ गया था. लड़के वाले फर्रुखाबाद से

हरदोई लंच टाइम तक आने वाले थे. दोनों गृहिणीयां भोजन के इंतजाम में व्यस्त हो गईं. शांभवी और इशिता कमरे में कपड़ों के ढेर के सामने खड़े हो एकदूसरे के ऊपर टीकाटिप्पणी में व्यस्त हो गईं.

‘‘यह ड्रैस कैसी है दी?’’ इशिता ने लौंग स्कर्ट और सफेद टौप पहन इठलाते हुए पूछा.

‘‘कुछ भी पहन ले… वैसे भी तुझे सब के सामने आने की मनाही है,’’ शांभवी ने मुंह बिचका कर चिढ़ाया.

‘‘अरे, तुम्हारे विजय के लिए तैयार नहीं हो रही हूं. अपने लिए तैयार हो रही हूं,’’ कह कर उस ने कपड़ों के ढेर से कपड़े निकाल कर सहेजने शुरू कर दिए.

‘‘ मेरा विजय… अभी हमारा रिश्ता तय नहीं हुआ है,’’ शांभवी ने कहा.

‘‘तेरे बौयफ्रैंड को पता है यह?’’ रिश्ता इशिता ने पूछा.

‘‘कालेज फ्रैंड हैं बौयफ्रैंड नहीं… वह जौब करने चंडीगढ़ चला गया है अब ज्यादा बात नहीं होती,’’ शांभवी ने लापरवाही से कहा.

‘‘तब ठीक है मुझे लगा कि तू उसे धोखा दे रही है,’’ इशिता ठंडी सांस भर कर बोली.

‘‘तू सुना, अभी तक कोई बौयफ्रैंड नहीं बना?’’

‘‘नहीं, मुझे बौयफ्रैंड, शादी इन सब में फिलहाल कोई इंटरैस्ट नहीं है. मेरा सारा ध्यान अच्छी नौकरी ढूंढ़ने में लगा है. सच कहूं तो पापा का तानाशाही रवैया देख मेरा तो शादी करने का मन ही नहीं करता है. मम्मी इतनी मेहनत कर कमाती हैं पर पापा 1-1 रुपए का हिसाब रखते हैं. सारी शौपिंग, इनवैस्टमैंट सबकुछ पापा की मरजी से ही होता है.’’

तभी उन के कमरे का दरवाजा खटखटा कर रितिका ने कहा, ‘‘यह साड़ी शांभवी को पहना दो… विजय की दादी भी साथ आ रही हैं.’’

इशिता ने दरवाजा खोल कर पूछा, ‘‘साड़ी?’’

‘‘हां. बिचौलिए से पता चला है कि उस की दादी भी गाड़ी में सवार हो गई हैं… लगता है रिश्ता पक्का करने ही आ रहे हैं.’’

शांभवी सिर पकड़ कर बैठ गई.

‘‘क्या हुआ दी?’’

‘‘मैं ने सोचा था दिखनेदिखाने और रिश्ता पक्का होने के बीच कुछ समय मिल जाएगा, जिस से विजय से खुल कर बातचीत भी हो जाएगी, मगर सब इतनी जल्दी हो रहा है कि मुझे तो कुछ सम?ा में ही नहीं आ रहा?’’

‘‘शादी तो करना चाहती हो न?’’

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‘‘हां, विजय दिल्ली में जौब करता है. अच्छा कमाता है. अब पहली बार इस शहर से बाहर निकलने को मिलेगा. बेटों को तो बाहर पढ़ने भेज दिया, मगर हमें जाने को नहीं मिला. सोचती हूं शादी के बाद इस रोकटोक से आजाद हो जाऊंगी. अपनी मरजी का पहनंगी और घूमूंगी.’’

‘‘तो फटाफट तैयार हो जा. साड़ी का पल्लू सिर पर रख ले और सब पर इंप्रैशन जमा देना. मुझे तो सामने आने को मना किया है, शायद रिश्ता पक्का हो जाने के बाद मिलवा दें,’’ इशिता अपनी आंखें मटका कर बोली.

विजय के मम्मीपापा, चाचाचाची, दादी

और बिचौलिए समेत 7 लोग बैठक में मौजूद थे. चायपानी के बाद शांभवी को उस की मम्मी ले कर चली गईं.

इशिता बेचैनी से कमरे के चक्कर काटने लगी. जब न रहा गया तो धीरे से बैठक की ओर बढ़ चली. परदे की ओट से सोफे में बैठे विजय और शांभवी दिखाई दे रहे थे. शांभवी की नजर परदे की ओट से झांकती इशिता के ऊपर पड़ गई. उस ने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोकी और उसे आंखों से वहां से जाने का इशारा किया, जिसे रितिका ने भी देख लिया. वे तुरंत उठ कर खड़ी हो गईं और परदे के पीछे आ कर इशिता का हाथ थाम कर उसे कमरे की ओर खींच ले गईं और बोलीं, ‘‘क्या कर रही हो? उस का रिश्ता पक्का हो जाने दो, फिर मिलना सब से… इतनी बड़ी हो गई हो, मगर बचपना नहीं गया तुम्हारा.’’

उस के पापा भी पूरा माजरा सम?ा कर कमरे में आ गए.

‘‘जब मुझे एमबीए के लिए पूना में एडमिशन मिला तो आप ने नहीं भेजा तब मैं छोटी थी और आज कह रहे हैं कि बड़ी हो गई हो.’’

‘‘देखो यहां मुझे कोई तमाशा नहीं चाहिए. अब तो रिश्ता तय हो जाने के बाद भी तुम्हें बाहर आने की जरूरत नहीं, यहीं बैठी रहना,’’ पापा गुस्से से बोले.

‘‘मैं आऊंगी भी नहीं… मुझे अब बुलाना भी नहीं,’’ कह कर वह अपमानित हो तकिए में सिर रख कर सिसकने लगी. उस के मम्मीपापा उसे वैसे ही छोड़ कर कमरे से बाहर चले गए. कुछ ही देर में वह नींद के आगोश में समा गई.

सारे मेहमानों को विदा कर पूरा परिवार तनावमुक्त हो बैठक में हासपरिहास में व्यस्त हो गया. शांभवी जब कमरे में आई तो इशिता बेसुध सोई हुई थी.

‘‘ कितना सोएगी इशिता, यह मेरे ब्लाउज में फंसी पिन निकाल दे, मेरा हाथ पीठ नहीं पहुंच रहा है… यह पिन कहां लगा दी तूने?’’ उस ने अपनी साड़ी को निकालते हुए कहा.

इशिता आंख मलते हुए उठी सामने शांभवी को साड़ी से उल?ा हुआ देख हंस पड़ी और बोली, ‘‘फाइनल हो गया?’’

‘‘हां, 2 महीने बाद सगाई और शादी साथ ही हैं,’’ कह कर अपने गले में पड़ी सोने की चेन दिखाते हुए कहा, ‘‘यह विजय की दादी ने पहनाई है.’’

‘‘तुझे भी विजय पसंद आया?’’

‘‘पता नहीं… कुछ सम?ा नहीं आ रहा है. घर वालों को तो बहुत पसंद आया. मुझे विजय नहीं अपनी आजादी चाहिए. शादी के बाद घर में मेरी मरजी चलेगी. अपने मन का खाना, पहनना बस इस से ज्यादा मुझे जिंदगी से कुछ नहीं चाहिए.’’

‘‘पता नहीं आप क्या सोचती हैं दी, मगर मेरी नजर में आर्थिक आजादी ज्यादा महत्त्व रखती है. मुझे तो बस एक अच्छी सी नौकरी मिल जाए. फिर मैं आत्मनिर्भर बन जाऊंगी. ध्यान रहे यह सोने की चेन कही खूंटे से बांधने वाली रस्सी में न बदल जाए.’’

‘‘चल हट, पूरा समय बकवास… देखना विजय को मैं कैसे अपने आगेपीछे नचाती हूं,’’ शांभवी ने अपनी ऊंगली में चेन को लपेटते हुए कहा.

शादी की खरीदारी व अन्य तैयारी के लिए शांभवी का परिवार लखनऊ आ गया. उन 15 दिनों में इशिता को शांभवी और विजय की रसभरी बातें, व्हाट्सऐप्प पर पढ़नेसुनने को मिलीं.

‘‘सोच रहा हूं जब तुम मेरे साथ दिल्ली में रहोगी तो मैं रोज तुम्हारे लिए अलगअलग रंग के बुके लाऊंगा.’’

‘‘और मैं हर शाम अलग अंदाज में सज कर तुम्हें चौंका दूंगी कभी मराठी, कभी पंजाबी और कभी…’’

‘‘तुम्हें पता है तुम्हारी आंखें कितनी नशीली हैं… तुम्हें देखते ही मुझे पहली नजर का प्यार हो गया है.’’

‘‘मैं तो बस यही कहूंगी, ‘आए हो मेरी जिंदगी में तुम बहार बन के, मेरे संग यों ही रहना तुम प्यारप्यार बन के.’’’

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‘‘गलत बात इशिता तुझे मैं ने अपना फोन लहंगे की डिजाइन पसंद करने के लिए दिया था न कि मेरी और विजय की चैट पढ़ने के लिए,’’ कह शांभवी ने फोन छीन लिया.

‘‘सौरी दी, पर चैट पढ़ कर बड़ा मजा आ रहा है. क्या आप को वाकई प्यार हो गया है?’’ इशिता ने पूछा.

‘‘अरे वह तो यों ही लिख दिया, अब उस ने इतना कुछ लिखा तो…’’

‘‘यह क्या बात हुई? मैं इसीलिए शादी नहीं करना चाहती. इतना ?ाठ मु?ा से न बोला जाएगा.’’

‘‘मुझे भी बस शादी कर अपने मायके की कैद से बाहर निकलना हैं. विजय कहता है कि उसे नईनई जगह घूमना बहुत पसंद हैं हम हर साल एक नई लोकेशन में फोटोशूट करते मिलेंगे.’’

‘‘और बीएड का क्या?’’

‘‘देखा जाएगा, मन करेगा तो पूरा कर लूंगी.’’

‘‘देखती हूं, अगर आप को अपनी शादी में इतना रोमांस, सैरसपाटा और उन्मुक्तता मिल गई तो शायद शादी के प्रति मेरी धारणा भी बदल जाए.’’

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Serial Story: भाभी- क्या अपना फर्ज निभा पाया गौरव?

जिम्मेदारियों के बीच न भूलें जीवनसाथी को वरना हो सकता है ये अफसोस

घर से ऑफिस ,ऑफिस से घर ये रूटीन बन गया .2 से 3 साल और निकल गए. मेरी उम्र 25 की हो गयी और फिर शादी हो गयी. मेरे जीवन की कहानी शुरू हो गयी. अपने जीवनसाथी के हाथों में हाथ डालकर घूमना -फिरना ,रंग बिरंगे सपने  देखना ,जीवन से एक अलग सा ही लगाव महसूस होने लगा.पर ये दिन जल्दी ही उड़ गए .फिर बच्चे के आने की आहट  हुई.अब हमारा सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया. उठाना-बैठाना ,खिलाना-पिलाना ,लाड-दुलार ,समय कैसे फटाफट निकल गया मुझे पता ही नहीं चला.

इस बीच कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया ,बातें करना ,घूमना -फिरना कब बन्द हो गया दोनों को पता ही नहीं चला. वो बच्चे में व्यस्त हो गयी और मैं अपने काम में.

घर और गाडी की क़िस्त ,बच्चे की पढाई लिखी और भविष्य की जिम्मेदारी और साथ ही साथ बैंक में शून्य बढ़ाने  की चिंता ने मुझे घेर लिया .उसने भी अपने आपको काम में पूरी तरह झोंक दिया और मैंने भी.

इतने में मै  35 साल का हो गया .इसी बीच दिन बीतते गए,समय गुजरता गया ,बच्चा बड़ा होता गया .एक नितांत, एकांत पल में मुझे वो गुज़रे दिन याद आये और मौका देखकर मैंने अपने जीवन साथी से कहा “अरे यहाँ आकर मेरे पास बैठो ,चलो हाथ में हाथ डालकर कहीं घूम कर आते है .” उसने अजीब नज़रों से मुझे देखा और कहा ‘आपको  घूमने की पड़ी है और यहाँ इतना सारा काम पड़ा है आप  भी हद करते हो ‘.मैं शांत हो गया .

बेटा उधर कॉलेज में था इधर बैंक में शून्य बढ़ रहे थे .देखते ही देखते उसका कॉलेज ख़त्म हो गया और वो परदेश चला गया.

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मैं भी बूढा हो गया वो  भी उम्रदराज़ लगने लगी .दोनों 55 से 60 की ओर बढ़ने लगे .बैंक में शून्य बढ़ रहे थे और हमारे जीवन के भी.

बाहर आने जाने के कार्यक्रम बन्द होने लगे.अब तो गोली ,दवाइयों के दिन और समय निश्चित होने लगे.जब बच्चे बड़े होंगे तब हम सब साथ रहेंगे ये सोचकर बनाया गया घर बोझ लगने लगा.बच्चे कब वापस आयेंगे यही सोचते-सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे.

एक शाम ठंडी हवा का झोका चल रहा था .वो भी दिया- बाती कर रही थी और मैं अपनी  कुर्सी पर बैठा अपने अतीत के कुछ खुशनुमा पल याद कर रहा था . आज भी उस पल  को याद करके मेरे चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है जब हमारी शादी की बारहवी  सालगिरह पर उसने मुझसे सालगिरह का तोहफा माँगा. उसने मुझसे कहा की मैं  जो भी मांगूंगी आप मुझे दोगे . मैंने हाँ में सिर हिला दिया .वो अन्दर कमरे से जाकर 2 डायरी ले आई और मुझसे बोली कि मुझे आपसे बहुत कुछ कहना रहता है लेकिन हमारे पास एक दूसरे के लिए समय ही नहीं होता.इसलिए हमारी जो भी शिकायतें होंगी हम पूरा साल अपनी -अपनी डायरी में लिखेंगे और अगली सालगिरह पर हम एक दूसरे की डायरी पढेंगे .मैं भी सहमत हो गया की विचार तो अच्छा है.

देखते ही देखते साल बीत गए. शादी की अगली सालगिरह आई .हम दोनों ने एक दूसरे की डायरी ली.उसने कहा की पहले आप पढ़िए.मैंने पढना शुरू किया.पहला पन्ना,दूसरा पन्ना, तीसरा पन्ना शिकायते ही शिकायते “आज शादी की वर्षगांठ पर मुझे ढंग का तोहफा नहीं दिया ”.

“आज होटल में खाना खिलाने का वादा करके भी नहीं ले गए “.

“आज जब शौपिंग के लिए कहा तो जवाब मिला की मैं बहुत थक गया हूँ “ ऐसी अनेक रोज़ की छोटी छोटी फरियादें लिखी हुई थी.ये सब पढ़कर मेरी आँखों में आंसू आ गए. मुझे एहसास हुआ की वाकई में इन औरतों की ज़िन्दगी हमारे इर्द-गिर्द ही घूमती है.मैंने कहा की मुझे पता ही नहीं था मेरी गलतियों का .मै ध्यान रखूंगा की आगे से  ऐसा न हो.

अब बारी उसकी थी .उसने मेरी डायरी खोली .

पहला पन्ना कोरा? दूसरा पन्ना कोरा? अब उसने दो,चार पन्ने साथ में पलटे  वो भी कोरे? फिर पचास –सौ पन्ने साथ में पलटे  वो भी कोरे?

उसने कहा कि मुझे पता था की आप  मेरी इतनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकेंगे .मैंने पूरा साल इतनी मेहनत से आपकी सारी  कमियां लिखी ताकि आप  उन्हें सुधार सको.

मै मुस्कुराया और मैंने कहा की मैंने सबकुछ अंतिम पन्ने पर लिख दिया है.उसने उत्सुकता से अंतिम पन्ना खोला उसमे मैंने लिखा था;- “मैं तुम्हारे मुंह पर तुम्हारी जितनी भी शिकायत कर लूं लेकिन तुमने मेरे और मेरे परिवार के लिये जो  त्याग किये है मैं उनकी भरपाई कभी नहीं कर सकता.

मैं इस डायरी में लिख सकूं ऐसी कोई कमी मुझे तुममे दिखाई नहीं दी.ऐसा नहीं है की तुममे कोई कमी नहीं है, लेकिन तुम्हारा प्रेम,तुम्हारा समर्पण,तुम्हारा त्याग उन सब कमियों से ऊपर है.मेरी अनगिनत भूलों के बाद भी तुमने जीवन के हर समय में मेरी छाया  बनकर मेरा साथ निभाया है.अब अपनी ही छाया में कोई दोष कैसे निकाल सकता है.” अब रोने की बारी उसकी थी .वो मेरे गले लगकर  बहुत रोई .शायद अब उसके सारे गिले शिकवे दूर हो चुके थे.

तभी अचानक phone की घंटी बजी . मैं अपने अतीत के उस खुशनुमा पल से बाहर आ चुका था .मैंने लपक कर phone उठाया .बेटे का phone था जिसने कहा की उसने शादी कर ली है अब वो परदेश में ही रहेगा.उसने कहा’पिताजी आपके बैंक के शून्य आप दोनों के लिए पर्याप्त होंगे ,आप आराम से अपना जीवन बिता लीजियेगा और अगर जरूरत पड़े तो वृदाश्रम चले जाइएगा  वहां आप लोगों की देखभाल हो जाएगी.’ और भी कुछ ओपचारिक बातें करके उसने phone रख दिया.

मैं वापस आकर कुर्सी पर बैठ गया उसकी भी दिया- बाती ख़त्म होने को आई थी .मैंने उसे आवाज़ दी “चलो आज फिर हाथों में हाथ लेकर बातें करते है.” वो तुरंत बोली “अभी आई “.उसने शेष पूजा की और मेरे पास आकर बैठ गयी.”बोलो क्या कह रहे थे “लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा.उसने मेरे शरीर को छूकर देखा शरीर बिलकुल ठंडा पड़  गया था. “मैं उसकी ओर एक टक  देख रहा था “.

उसने मेरा ठंडा हाथ अपने हाथों में  लिया और बोली “चलो कहाँ घूमने चलना है तुम्हे?क्या बातें करनी है तुम्हे? “

बोलो !! ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई !! वो एकटक मुझे देखती रही.उसकी आँखों से आंसू बह निकले .मेरा सर उसके कंधे पर गिर गया . ठंडी हवा का झोका अब भी चल रहा था.

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जी हाँ दोस्तों ये तो सिर्फ एक कहानी है पर शायद ये बहुत से लोगों के जीवन ही हकीकत भी है . हम अपनी जिम्मेदारियों को निभाते -निभाते अपने जीवन साथी के लिए समय निकालना ही भूल जाते है .

पति पत्नी का रिश्ता बहुत ही प्यार भरा रिश्ता होता है. इसमें कई तरह की भावनाएँ होती हैं जैसे की प्यार, देखभाल, परवाह, लड़ना-मनाना व छोटी मोटी नोंक-झोंक. यह नोंक झोंक भी वहां होती हैं जहाँ प्यार होता है.

जीवनसाथी, जीवन की ऐसी आवश्यकता है, जिसे किसी भी कीमत पर नकारा नहीं जा सकता . वह आपको सहज महसूस कराने के लिए सब कुछ करेगा. आपका साथी हमेशा आपके मुश्किल समय में आपके साथ रहेगा . वो  हर कठिन परिस्थिति में आपके ठीक पीछे खड़ा होगा . आपका जीवनसाथी मृत्यु तक आपकी हर चीज का ख्याल रखेगा. सच्चाई ये है की जीवनसाथी के बिना जीवन बिलकुल अधूरा है

सब अपना अपना नसीब साथ लेकर आते हैं .इसलिए कुछ समय अपने लिए भी निकालो . जीवन अपना है ,जीने के तरीके भी अपने रखो .शुरुआत आज से करो क्यूंकि कल कभी नहीं आएगा.

“कभी कभी किसी से ऐसा रिश्ता बन जाता है कि हर चीज़ से पहले उसी का ख्याल आता  है”

बहार: भाग 3- क्या पति की शराब की लत छुड़ाने में कामयाब हो पाई संगीता

लेखिका- रिचा बर्नवाल

पार्क में आरती ने संगीता को कुछ ऐक्सरसाइजें सिखाईं. लौटने के समय संगीता बहुत खुश थी.

‘‘मम्मी, शादी के बाद से मेरा वजन लगातार बढ़ता जा रहा है. क्या व्यायाम से मैं पतली हो जाऊंगी,’’ आंखों में आशा की चमक ला कर संगीता ने अपनी सास से पूछा.

‘‘इन के अलावा वजन कम करने का और क्या तरीका होगा? पर एक समस्या है,’’ आरती की आंखों में उलझन  के भाव पैदा हुए.

‘‘कैसी समस्या?’’

‘‘सुबह पार्क में आने की.’’

‘‘मैं जल्दी उठ जाया करूंगी.’’

अचानक आरती ताली बजाती हुई बोलीं, ‘‘मैं तुम्हारे ससुर को जोश दिलाती हूं कि वे

रवि को नाश्ते की चीजें बनाना सिखाएं. उन दोनों को रसोई में उलझ कर हम पार्क चली आया करेंगी.’’

‘‘बिलकुल ऐसा ही करेंगे, मम्मी. आम के आम और गुठलियों के दाम. मेरा वजन भी कम होने लगेगा और नाश्ता भी बनाबनाया मिल जाएगा,’’ संगीता प्रसन्न नजर आने लगी.

उधर रसोई में रमाकांत अपने बेटे को समझ रहे थे, ‘‘रवि, मैं ने कुछ चीजें तेरी मां

से बनानी सीखीं क्योंकि अब उस की तबीयत ज्यादा ठीक नहीं रहती. मैं ने देखा है कि तू भी अधिकतर डबलरोटी मक्खन खा कर औफिस जाता है. मैं तुझे ये 5-7 चीजें बनानी सिखा देता हूं. ढंग का नाश्ता घर में बनने लगेगा, तो तेरा और बहू दोनों का फायदा होगा.’’

‘‘पोहा बनाने में आप की सहायता करना मुझे अच्छा लगा, पापा. आप मुझे बाकी की चीजें भी जरूर सिखाना,’’ रवि खुश नजर आ रहा था.

‘‘अब ब्रश कर के आ. फिर हम दोनों साथ बैठ कर नाश्ता करेंगे.’’

‘‘मम्मी और संगीता के आने का इंतजार नहीं करेंगे क्या?’’

‘‘अरे, तेरी बहू जितनी ज्यादा देर घूमे अच्छा है. अपनी मां के साथ उसे रोज पार्क भेज दिया कर. उस का बढ़ता मोटापा उस की सेहत के लिए ठीक नहीं है.’’

रमाकांत की यह सलाह रवि के मन में बैठ गई. उस दिन ही नहीं बल्कि रोज उस ने सुबह उठ कर अपने पिता के मार्गदर्शन में कई नईर् चीजें नाश्ते में बनानी सीखीं.

आरती और संगीता रसोई में आतीं, तो बापबेटा उन्हें फौरन बाहर कर देते. तब आरती अपनी बहू को पार्क में ले जाती.

वहां से सैर और व्यायाम कर के दोनों लौटतीं, तो उन्हें नाश्ता तैयार मिलता. सब बैठ कर नाश्ते की खूबियों व कमियों पर बड़े उत्साह से चर्चा करते. सुबह की शुरुआत अच्छी होने से बाकी का दिन अच्छा गुजरने की संभावना बढ़ जाती.

संगीता अपने सासससुर के आने से अब सचमुच बड़ी प्रसन्न थी. सास के द्वारा काम में मदद करने से उसे बड़ी राहत मिलती. बहुत कुछ नया सीखने को मिला उसे आरती से.

रवि का मन बहुत होता अपने दोस्तों के साथ शराब पीने का, पर हिम्मत नहीं पड़ती. अपनी खराब लत के कारण वह अपने मातापिता को लड़तेझगड़ते नहीं देखना चाहता था.

धीरेधीरे शराब पीने की तलब उठनी बंद हो

गई उस के मन में. उस में आए इस बदलाव के कारण संगीता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

सप्ताहभर तक नियमित रूप से पार्क जाने का परिणाम यह निकला कि संगीता के पेट का माप पूरा 1 इंच कम हो गया. उस ने यह खबर बड़े खुश अंदाज में सब को सुनाई.

‘‘आज पार्टी होगी मेरी बहू की इस सफलता की खुशी में और सारी चीजें संगीता और मैं घर में बनाएंगे,’’ आरती की इस घोषणा का बाकी तीनों ने तालियां बजा कर स्वागत किया.

उस रविवार के दिन के भोजन में मटरपनीर, दहीभल्ले, बैगन का भरता, सलाद, परांठे और मेवों से भरी खीर सबकुछ संगीता और आरती ने मिल कर तैयार किया.

खाना इतना स्वादिष्ठ बना था कि सभी उंगलियां चाटते रह गए. आरती ने इस का बड़ा श्रेय संगीता को दिया, तो वह फूली न समाई.

‘‘मैं कहता हूं कि किसी होटल में क्व2 हजार रुपए खर्च कर के भी ऐसा शानदार खाना नसीब नहीं हो सकता,’’ रवि ने संतुष्टि भरी डकार लेने के बाद घोषणा करी.

‘‘चाहे वह स्वादिष्ठ खाना हो या दिल को गुदगुदाने वाली खुशियां, इन्हें घर से बाहर ढूंढ़ना मूर्खता है,’’ बोलते

हुए आरती की आंखों में अचानक आंसू छलक आए.

‘‘मम्मी, आप की आंखों में आंसू क्यों आए हैं?’’ रवि

ने अपनी मां का कंधा छू कर भावुक लहजे में पूछा.

‘‘हम से कोई गलती हो गई क्या?’’ संगीता एकदम घबरा उठी.

‘‘नहीं, बहू,’’ आरती ने उस का गाल प्यार से थपथपाया, ‘‘सब को एकसाथ इतना खुश देख कर आंखें भर आईं.’’

‘‘यह तो आप दोनों के आने का आशीर्वाद है मम्मी,’’ संगीता ने उन का हाथ पकड़ कर प्यार से अपने गाल पर रख लिया.

रमाकांत ने गहरी सांस छोड़ कर कहा, ‘‘आज शाम को हम वापस जा रहे हैं. शायद इसीलिए पलकें नम हो उठीं.’’

‘‘यों अचानक जाने का फैसला क्यों कर लिया आप ने?’’ रवि ने उलझन भरे स्वर में पूछा.

‘‘नहीं, आप दोनों को मैं बिलकुल नहीं जाने दूंगी,’’ संगीता ने भरे गले से अपने दिल की इच्छा जाहिर करी.

‘‘हम दोनों तो आज के दिन ही लौटने का कार्यक्रम बना कर आए थे, बहू. तेरे जेठजेठानी व दोनों भतीजे बड़ी बेसब्री से हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं,’’ आरती ने मुसकराने की कोशिश करी, पर जब सफल नहीं हुईं तो उन्होंने संगीता को गले लगा लिया.

संगीता एकाएक सुबकने लगी. रवि की आंखों में भी आंसू ?िलमिलाने लगे.

‘‘मम्मीपापा, आप दोनों अभी मत जाइए. मेरे घर में आई खुशियों की बहार कहीं आप

दोनों के जाने से खो न जाए,’’ रवि उदास नजर आने लगा.

रमाकांत ने उस का माथा चूम कर समझया, ‘‘बेटा, अपने घर की

खुशियों, सुखशांति और मन के संतोष के लिए किसी पर भी निर्भर मत रहना. तुम दोनों समझदारी से काम लोगे, तो यह घर हमारे जाने के बाद भी खुशियों से महकता रहेगा.’’

‘‘बस, सदा हमारी एक ही बात याद रखो तुम दोनों,’’ आरती उन दोनों से प्यारभरे स्वर में बोलीं.

‘‘आपसी मनमुटाव से दिलोदिमाग पर बहुत सा कूड़ाकचड़ा जमा हो जाता है. इंसान को प्यार करने व लड़नेझगड़ने दोनों के लिए ऊर्जा खर्चनी पड़ती है. तुम दोनों चाहे लड़ो चाहे प्यार करो, पर सदा ध्यान रखना कि ऊर्जा के बहाव में दिलोदिमाग पर जमा वह कूड़ाकचरा जरूर बह जाए. बीते पलों की यादों को फालतू ढोने से इंसान कभी भी नए और ताजे जीवन का आनंद नहीं ले पाता.’’

रवि और संगीता ने उन की बात बड़े ध्यान से सुनी. जब उन दोनों की नजरें आपस में मिलीं, तो दोनों के दिलों में एकदूसरे के लिए प्र्रेम की ऊंची लहर उठी.

‘‘आप अगली बार आएंगे, तो मुझे पूरी तरह बदला हुआ पाएंगे,’’ संगीता ने फौरन अपने सासससुर से मजबूत स्वर में वादा किया

‘‘हमारी आंखें खोलने के लिए आप दोनों को धन्यवाद,’’ कह रवि ने अपने मातापिता के हाथों को चूमा.

‘‘मिल कर अपने बच्चों का शुभ सोचना हमारी एकमात्र इच्छा है. हमारे लड़नेझगड़ने को तो तुम दोनों नाटक समझना,’’ आरती बोलीं.

आरती के इस बचन को सुना कर रमाकांत रहस्यमयी अंदाज में मुसकराने लगे.

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