पति-पत्नी के रिश्ते में नयापन बनाए रखें ऐसे

शादी के बाद पतिपत्नी प्यार से अपने जीवन का घोंसला तैयार करते हैं. कैरियर बनाने के लिए बच्चे जब घर छोड़ कर बाहर जाते हैं तो यह घोंसला खाली हो जाता है. खाली घोंसले में अकेले रह गए पतिपत्नी जीवन के कठिन दौर में पहुंच जाते हैं. तनाव, चिंता और तमाम तरह की बीमारियां अकेलेपन को और भी कठिन बना देती हैं. ऐसे में वह एंप्टी नैस्ट सिंड्रोम का शिकार हो जाते हैं.  आज के दौर में ऐसे उदाहरण बढ़ते जा रहे हैं. अगर पतिपत्नी खुद का खयाल रखें तो यह समय भी खुशहाल हो सकता है, जीवन बोझ सा महसूस नहीं होगा. जिंदगी के हर पड़ाव को यह सोच कर जिएं कि यह दोबारा मिलने वाला नहीं.

राखी और राजेश ने जीवनभर अपने परिवार को खुशहाल रखने के लिए सारे इंतजाम किए. परिवार का बोझ कम हो, बच्चे की सही देखभाल हो सके, इस के लिए एक बेटा होने के बाद उन्होंने फैमिली प्लानिंग का रास्ता अपना लिया. बच्चे नितिन को अच्छे स्कूल में पढ़ाया. बच्चा पढ़ाई में होनहार था. मैडिकल की पढ़ाई करने के लिए वह विदेश गया. वहां उस की जौब भी लग गई. राखी और राजेश ने नितिन की शादी नेहा के साथ करा दी. नेहा खुद भी विदेश में डाक्टर थी. बेटाबहू विदेश में ही रहने लगे. राखी और राजेश का अपना समय अकेले कटने लगा. घर का सूनापन अब उन को परेशान करने लगा था.

राखी ने एक दिन कहा, ‘‘अगर  बेटाबहू साथ होते तो कितना अच्छा होता. हम भी बुढ़ापे में आराम से रह रहे होते.’’

‘‘राखी जब नितिन छोटा था तो हम दोनों यही सोचते थे कि कब यह पढ़ेलिखे और अच्छी सी नौकरी करे. समाज कह सके कि देखो, हमारा बेटा कितना होनहार है,’’ राजेश ने पत्नी को समझाते हुए कहा.

‘‘तब हमें यह नहीं मालूम था कि हम इस तरह से अकेलेपन का शिकार हो जाएंगे,’’ राखी ने कहा.

राजेश ने समझाते हुए कहा, ‘‘हम ने कितनी मेहतन से उसे पढ़ाया. अपने शौक नहीं देखे. हम खुद पंखे की हवा खाते रहे पर बेटे को हर सुखसुविधा दी. अब जब वह सफल हो गया तो अपने अकेलेपन से घबरा कर उस को वापस तो नहीं बुला सकते. उस के सपनों का क्या होगा.’’

‘‘बात तो आप की भी सही है. हमें खुद ही अपने अकेलेपन से बाहर निकलना होगा. हम अकेले तो ऐसे नहीं हैं. बहुत सारे लोग ऐसे ही जी रहे हैं,’’ राखी ने कहा.

राखी और राजेश ने इस के बाद फिर कभी इस मुद्दे पर बात नहीं की. उन्होंने अपने को बदलना शुरू किया. सोशल ऐक्टिविटीज में हिस्सा लेना शुरू किया. खुद क ो अच्छी डाइट और ऐक्सरसाइज से फिट किया. साल में 2 बार वे अपने बहूबेटे के पास विदेश जाने लगे. वहां वे 20-25 दिनों तक रहते थे.  साल में 1-2 बार बेटाबहू भी उन के पास छुट्टियों में आने लगे. कभी महसूस ही नहीं हुआ कि वे अकेले हैं. सोशल मीडिया के जरिए वे आपस में जुडे़ रहते थे. अपने बारे में राजेश और राखी बहूबेटे को बताते तो कभी बहूबेटा उन को बताते रहते. फैस्टिवल पर कभीकभी एकसाथ मिल लेते थे.

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राखी ने डांस सीखना शुरू किया. लोग शुरूशुरू में हंसने लगे कि यह कैसा शौक है. राखी ने कभी इस बात का बुरा नहीं माना. डांस सीखने के बाद राखी ने अपने को व्यस्त रखने के लिए शहर में आयोजित होने वाले डांस कंपीटिशन में हिस्सा लेना शुरू किया. राखी की डांस में एनर्जीदेख कर सभी उस की प्रशंसा करने लगे. पत्नी को खुश देख कर राजेश भी बहुत खुश था. मातापिता को खुश देख कर बेटाबहू भी खुश थे. जीवन का जो घोंसला सूनेपन से भर गया था, वापस खुशहाल हो रहा था.

राखी और राजेश एंप्टी नैस्ट सिंड्रोम के शिकार अकेले कपल नहीं हैं. समाज में ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. आज के समय में हर परिवार में 1 या 2 ही बच्चे हैं. ऐसे हालात हर जगह बन रहे हैं. अब पतिपत्नी खुद को बदल कर आपस में नयापन बनाए रख कर हालात से बाहर निकल रहे हैं.

बनाएं नई पहचान

संतोष और सुमन की एक बेटी थी. वे दोनों सोचते थे कि ऐसे लड़के से शादी करेंगे जो उन के साथ रह सके. बेटी ने विदेश में जौब कर ली. उस की शादी वहीं रहने वाले एक बिजनैसमैन से हो गई. संतोष ने अपनी पत्नी सुमन को खुद को सजनेसंवरने के लिए  कहा. सुमन को यह पहले भी पसंद  था. ऐसे में उस का शौक अब और निखरने लगा.  कुछ ही तैयारी के बाद एक समय ऐसा आया कि सुमन शहर की हर पार्टी में शामिल होने लगी. वह पहले से अधिक निखर चुकी थी. संतोष खुद बिजनैसमैन था इसलिए पत्नी को कम समय दे पाता था पर जहां तक हो सकता था पत्नी का पूरा साथ देता था.

एक दिन सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन हुआ. सुमन ने उस में हिस्सा लिया और विवाहित महिलाओं की यह सौंदर्य प्रतियोगिता जीत ली. वह अब खुद  ही ऐसे आयोजनों के साथ जुड़ कर  नए सिरे से अपने को स्थापित कर  चुकी है.

अब केवल पति को ही नहीं, उस के बच्चों को भी मां के टैलेंट पर गर्व होता है. सुमन ने मौडलिंग भी शुरू कर दी. वह कहती है हम ने शादी के बाद जिन शौकों को पूरा करने का सपना देखा था, वे अब पूरे हो रहे हैं. ऐसे में मेरा मानना है कि शादी के बाद देखे गए सपने अगर पूरे नहीं हो रहे हैं तो उन को पूरा करने का समय यही है. सपने भी पूरे होंगे और अकेलापन भी दूर होगा.

अपने शौक को पूरा करे

अर्चना को स्कूल के दिनों से ही पेंटिंग बनाने का शौक था. जल्दी शादी, फिर बच्चे होने के बाद यह शौक दरकिनार हो गया था. अर्चना की परेशानी थोड़ी अलग थी. वह सिंगल मदर थी. उस ने खुद ही बेटे आलोक को अपने दम पर पढ़ालिखा कर विदेश भेजा. अब खुद अकेली रह गई. कई बार आलोक अपनी मां को भी अपने साथ ले जाता था. पर अर्चना वहां रहने के लिए तैयार नहीं थी. कुछ दिन बेटे के पास विदेश रह कर वापस चली आती थी. वापस आ कर उसे अकेलापन परेशान करता था.  अकेलेपन से बचने के लिए अर्चना ने अपने पेंटिंग के शौक को पूरा करना शुरू किया. खुद सीख कर अब वह बच्चों को भी पेंटिंग सिखाने लगी. इस से उसे कुछ पैसे भी मिलते थे. इन पैसों से अर्चना ने पेंटिंग कंपीटिशन का आयोजन कराया. अब अर्चना को कहीं भी अकेलापन नहीं लग रहा था. अर्चना ने अपने को फिट रखा. आज वह खुश है और अब वह पहले से अधिक सुंदर लगती है. मां को खुश देख कर बेटा भी पूरी मेहनत से अपना काम कर रहा है.

कई बार पेरैंट्स बच्चों के कैरियर को बनाने के लिए अपने शौक को पूरा नहीं करते. उन को दरकिनार कर देते हैं. जब बच्चे बाहर सैटल हो जाएं तो पेरैंट्स अपने शौक को पूरा कर सकते हैं. इस से 2 तरह के लाभ होते हैं. एक तो पुराने शौक पूरे हो जाते हैं. दूसरे, खुद इतना व्यस्त हो जाते हैं कि खालीपन का एहसास नहीं होता.

अपने शौक के पूरा होने का एहसास दिल को खुशी देता है. कई लोग हैं जो खाली समय में बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं. कुछ लोग पर्यावरण के लिए जागरूकता अभियान चलाते हैं. इस से समाज के लोग उन के साथ खडे़ होते हैं और समाज में उन को नया मुकाम भी हासिल होता है.

पत्नी को प्रोत्सहित करें. उस के लिए पैसे और समय दोनों उपलब्ध कराएं. साथ में, उस के आत्मविश्वास को जगाएं कि वह अभी भी अपने हुनर का कमाल दिखा सकती है.

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नयापन बनाए रखने के टिप्स

एनर्जी से भरपूर दवाएं खाना भी जरूरी होता है. आमतौर पर ऐसे समय में सैक्स के महत्त्व को दरकिनार किया जाता है. हालांकि सैक्स भी इस उम्र में जरूरी होता है. यह केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक हैल्थ के लिए जरूरी होता है. इस से खुद में एक बदलाव का अनुभव होता है.

शुरूआत में पति खुद ही पत्नी का हौसला बढ़ाएं. फैशन, फिटनैस और ब्यूटीफुल ड्रैस आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं.

खालीपन को दूर करने के लिए क्याक्या किया जा सकता है जिस से पहचान भी बने, यह पत्नी की योग्यता को देख कर फैसला करें.

सोशल सर्किल बनाते समय यह ध्यान रखें कि एकजैसी सोच के लोग हों. कई बार नैगेटिव सोच के लोग आगे बढ़ने के बजायपीछे ढकेल देते हैं.

घरेलू जिम्मेदारियां : पुरुष कितने सजग

वसुधा ने औफिस से आते ही पति रमेश से पूछा कि अतुल अब कैसा है? फिर वह अतुल के कमरे में चली गई. सिर पर हाथ रखा तो महसूस हुआ कि वह बुखार से तप रहा है.

वह घबरा कर चिल्लाई, ‘‘रमेश, इसे तो बहुत तेज बुखार है. डाक्टर के पास ले जाना पड़ेगा.’’

जब तक रमेश कमरे में आते तब तक वसुधा की निगाह अतुल के बिस्तर की बगल में रखी उस दवा पर पड़ गई जो दोपहर में उसे खानी थी.

बुखार तेज होने का कारण वसुधा की समझ में आ गया था. उस ने रमेश से पूछा, ‘‘तुम ने अतुल को समय पर दवा तो खिला दी थी न?’’

‘‘मैं समय पर दवा ले कर तो आया था पर यह सो रहा था. मैं ने 1-2 आवाजें लगाईं. जब नहीं सुना तो दवा रख कर चला गया कि जब उठेगा खुद खा लेगा. मुझे क्या पता कि उस ने दवा नहीं खाई होगी.’’

परेशान वसुधा ने गुस्से से कहा, ‘‘रमेश, दवा लेने और दवा खिलाने में फर्क होता है. तुम क्या समझोगे इस बात को. कभी बच्चे की देखभाल की हो तब न,’’ और फिर उस ने अतुल को जल्दी से 2-3 बिस्कुट खिला कर दवा दी और सिर पर ठंडी पट्टी रखने लगी. आधे घंटे बाद बुखार थोड़ा कम हो गया, जिस से डाक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ी.

असल में वसुधा के 10 साल के बेटे अतुल को बुखार था. उस की छुट्टियां समाप्त हो गई थीं, इसलिए रमेश को बेटे की देखभाल के लिए छुट्टी लेनी पड़ी. औफिस निकलने से पहले वसुधा ने रमेश को कई बार समझाया था कि अतुल को समय से दवा खिला देना, पर जिस बात का डर था, वही हो गया.

75 वर्षीय विमला गुप्ता हंसते हुए कहती हैं, ‘‘यह कहानी तो घरघर की है. पिछले सप्ताह मैं अपनी बहू के साथ शौपिंग करने गई थी. 2 साल की पोती को संभालने की जिम्मेदारी उस के दादाजी की थी. पोती को संभालने के चक्कर में दादाजी ने न तो समय देखा न जरूरी बात याद रखी, घर में ताला लगा पोती को साथ ले कर निकल पड़े पार्क की तरफ. इसी बीच नौकरानी आ कर लौट गई. घर आते ही देखा, ढेर सारे बरतनों के साथ किचन हमारा इंतजार कर रही है. एक काम किया पर दूसरा बिगाड़ कर रख दिया.’’

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इन बातों को पढ़ते हुए कहीं आप यह तो नहीं सोच रहीं कि अरे यहां तो अपना ही दर्द बयां किया जा रहा है. जी हां, अधिकांश महिलाओं को यह शिकायत रहती है कि पति या घर के किसी पुरुष सदस्य को कोई काम कहो तो तो वह करता तो है पर या तो अनमने ढंग से या ऐसे कि कहने वाले की परेशानी बढ़ जाती है. आखिर ऐसा क्यों होता है कि पुरुषों द्वारा किए जाने वाले घरेलू कार्य ज्यादातर स्त्रियों को पसंद नहीं आते? उन के काम में सुघड़ता की कमी रहती है अथवा वे जानबूझ कर तो आधेअधूरे काम तो नहीं करते हैं?

पुरुषों की प्रकृति एवं प्रवृत्ति में भिन्नता

इस संबंध में अनुभवी विमला गुप्ता का कहना है कि असल में स्त्रीपुरुषों के काम करने की प्रवृत्ति और प्रकृति में फर्क होता है. ज्यादातर पुरुषों को बचपन से ही घर के कामों से अलग रखा जाता है, जबकि लड़कियों को घर के कार्य सिखाने पर जोर दिया जाता है. ऐसे में पुरुषों के पास इन कार्यों के लिए धैर्य की कमी होती है और वे औफिस की तरह ही हर जगह अपना काम निबटाना चाहते हैं. खासकर घरगृहस्थी के कामों में, जो कहा जाता है उसे वे ड्यूटी समझ कर पूरा करने की कोशिश करते हैं, उन्हें उन कामों से कोई विशेष लगाव या जुड़ाव महसूस नहीं होता.

इस के विपरीत स्त्रियां स्वभाव से ही काम करने के मामले में अपेक्षाकृत ज्यादा ईमानदार होती हैं. वे सिर्फ काम ही नहीं करतीं, बल्कि उस काम विशेष के अलावा उस से संबंधित अन्य कई बातों को ले कर भी ज्यादा संजीदा रहती हैं.

बेफिक्र एवं आलसी

दूध चूल्हे पर चढ़ा कर भूल जाना, दरवाजा खुला छोड़ देना, टीवी देखतेदखते सो जाना, पानी पी कर फ्रिज में खाली बोतल रख देना, सामान इधरउधर फैला कर रखना और भी न जाने कितनी ऐसी छोटीबड़ी बातें हैं, जिन्हें देख कर यह माना जाता है कि पुरुष स्वभाव से ही बेफिक्र, स्वतंत्र और लापरवाह होते हैं पर वास्तव में ऐसा नहीं है कि वे घरेलू काम सही ढंग से नहीं कर सकते हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविकता यह है कि ज्यादातर उन के किए बिना ही सब कुछ मैनेज हो जाता है तो वे आलसी बन जाते हैं और घरेलू काम करने से कतराने लगते हैं. एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि कुछ पुरुष घरेलू कामों को करना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे घंटों बैठ कर टीवी के बेमतलब कार्यक्रम देख सकते हैं पर घरेलू काम नहीं कर सकते.

दोहरी जिम्मेदारी निभाना टेढ़ी खीर

इस बात को कई पुरुष भी स्वीकार कर चुके हैं कि घर और औफिस दोनों मैनेज करना अपने वश की बात नहीं है. पर महिला चाहे कामकाजी हो या हाउसवाइफ, आज के जमाने में उस का एक पैर रसोई में तो दूसरा घर के बाहर रहता है. घरेलू महिला को भी घर के कामों के अलावा बैंक, स्कूल, बिजलीपानी के बिल जमा करना, शौपिंग जैसे बाहरी काम खुद करने पड़ते हैं जबकि इस की तुलना में पति शायद ही घर के कामों में उतनी मदद करता हो. अगर महिला कामकाजी हो तो कार्य का भार कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है. उसे अपने औफिस के काम के साथसाथ पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाना पड़ता है. महिलाएं अपनी घरेलू जिम्मेदारियों से कभी मुक्त नहीं हो पातीं. दोहरी जिम्मेदारी को निभाते रहने के कारण कामकाजी होते हुए भी वे सदा घरगृहस्थी के कामों से भी जुड़ी होती हैं. अत. उन में काम निबटाने की सजगता और निपुणता स्वत: ही आ जाती है.

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अनुभव एवं परिपक्वता

मीनल एक उच्च अधिकारी हैं, जिन का खुद का रूटीन बहुत व्यस्त रहता है, फिर भी वे कहती हैं, ‘‘सुबह का समय तो पूछो मत कैसे भागता है. आप कितने भी ऊंचे ओहदे पर हों, घर के सदस्य आप से बेटी, पत्नी, बहू, मां के रूप में अपेक्षाएं तो रखते ही हैं, जबकि पुरुषों से ऐसी अपेक्षाएं कम ही रखी जाती हैं. ऐसे में चाहे मजबूरी हो या जरूरत, महिलाओं को मल्टीटास्कर बनना ही पड़ता है अर्थात एकसाथ कई काम करना जैसे एक तरफ दूध उबला जा रहा है, तो दूसरी तरफ वाशिंग मशीन में कपड़े धोए जा रहे हैं, बच्चे का होमवर्क कराया जा रहा है तो उसी समय पति की चाय की फरमाइश पूरी की जा रही है. इन कामों को करतेकरते स्त्रियां पुरुष की अपेक्षा घरेलू कामों में अधिक कार्यकुशल, अनुभवी और परिपक्व हो जाती हैं.’’

एक शोध के मुताबिक स्त्रियों का मस्तिष्क पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा सक्रिय रहता है जिस के कारण वे एकसाथ कई कामों को अंजाम दे पाती हैं.

जार्जिया और कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी रिपोर्ट के अनुसार महिलाएं ज्यादा अलर्ट, फ्लैक्सिबल और और्गेनाइज्ड होती हैं. वे अच्छी लर्नर होती हैं, इस तरह की कई दलीलें दे कर इस बात को साबित किया जा सकता है कि पुरुषों में घरेलू जिम्मेदारियां निभाने की क्षमता स्त्रियों की अपेक्षा कम होती है.

अब सोचने वाली बात यह है कि आधुनिक जमाने में जब पत्नी कामकाजी हो कर पति के बराबर आर्थिक सहयोग कर रही है तो पुरुष का भी दायित्व बनता है कि वह भी घरेलू जिम्मेदारियों को निभाने में खुद को स्त्री के बराबर ही सजग और निपुण साबित करे.

मेरी पत्नी ने झूठे दहेज के इल्जाम में फंसा दिया, मैं क्या करुं?

सवाल

मैं विवाहित पुरुष हूं. मेरा विवाह हुए 4 वर्ष हो गए हैं. शादी के बाद से ही पत्नी का मेरे प्रति व्यवहार क्रूरतापूर्ण था. वह बात बात पर मुझे परेशान करती थी. हर समय कोई न कोई डिमांड करती और कहती, मांग पूरी करो वरना तुम्हें व तुम्हारे परिवार को दहेज विरोधी कानून में फंसवा दूंगी. बातबात पर पुलिस स्टेशन में झूठी शिकायत कर के परेशान करना उस की दिनचर्या बनने लगी. परेशान हो कर मैं ने तलाक का केस फाइल कर दिया तो उस ने सचमुच में हमें झूठे दहेज कानून में फंसा दिया. मुझे समझ नहीं आ रहा, क्या करें, इस मुसीबत से कैसे निकलूं? सलाह दें.

जवाब

दरअसल, 498ए दहेज प्रताड़ना कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया था लेकिन आज यह कानून, कवच बनने के बजाय हथियार बन गया है जो कानूनी आातंक का रूप ले रहा है. आप की पत्नी की तरह अनेक पत्नियां इस कानून का दुरुपयोग पतिपत्नी के बीच के अहं, पारिवारिक विवाद, अलग रहने की इच्छा, संपत्ति में हक की चाहत आदि के लिए करती हैं. झूठे मुकदमे दर्ज करवाने के मामले अब बहुत सुनने में आ रहे हैं जो न केवल निराधार होते हैं बल्कि उन के पीछे गलत इरादे होते हैं. ऐसे मुकदमे दर्ज कराने का मकसद पैसा कमाना भी होता है. लेकिन अगर आप सही हैं तो डरे नहीं और पत्नी के खिलाफ सुबूत इकट्ठा करें. वैसे भी,

2 जुलाई, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने दहेज से जुड़े श्वेता किरन के मामले में निर्णय सुनाते हुए कहा है कि 498ए कानून के अंतर्गत की गई शिकायत में कोई भी गिरफ्तारी तब तक नहीं हो सकती जब तक कोई 2 सुबूत या गवाह उपलब्ध न हों. ऐसा निर्णय इसलिए दिया गया ताकि असंतुष्ट व लालची पत्नियां इस कानून का दुरुपयोग न कर सकें और न ही पति को ब्लैकमेल कर सकें.

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मेड से निभाना है रिश्ता तो जरुर जानें ये बातें

आज के इस महंगाई युग में अधिकतर महिलाएं काम पर जाती है. इस कारण घर के कामकाज को करने के लिये घर में कामवाली बाई रखना जरूरी सा लगता है. इससे उनका काम कम हो जाए और इस कारण वह समय पर अपने औफिस या काम जा सके. लेकिन सवाल यह उठता है कि कामवाली बाई का समय पर आना और उससे काम लेना कितना मुश्किल है, ये तो आप जानते है. आज के जमाने में काम वाली बाई से काम लेना आसान काम नहीं है, इसलिये आपको काम वाली से भी काम करवाने के लिये कुछ बातों का जरूर ध्यान रखना चाहिए जिससे आपका भी काम हो जाए और उनको भी काम करने में परेशानी महसूस न हो. इसलिए अगर आप ये जरूरी टिप्स अपनाएंगे तो आप भी सुखी और काम वाली बाई भी सुखी.

1. सबसे पहले काम वाली बाई रखते समय और अपने व्यवहार में थोडा इंसानियत का फर्ज निभाना सीखे और थोड़ा दिल और दिमाग से सोचकर ही बात करें. कामवाली के साथ अपनापन रखें वरना वह तो एक दिन में छोड़कर चली जायेगी और इस खास बात का बखूबी ध्यान रखें की जरूरत उसको भी है पैसे की और आपको काम की तो केवल आप ही उस पर हावी न हो.

2. कामवाली बाई रखते समय सभी बातें स्पष्ट कर लें जैसे कि महीने में कितनी छुट्टी लेगी और अगर ज्यादा ली तो क्या करें. इमरजैंसी छुट्टी कैसी लेनी है उसके साथ पहले की छुट्टी मिलानी है या नही सब बातें पुरी तरह से स्पष्ट करें और ज्यादा की तो क्या पैसे काटना है या अलग से एक्स्ट्रा काम करवाना है इत्यादि इससे आप को भी टेंशन नही रहेगा.

3. अब अगर मेहमान वगैरह आने पर क्या एक्स्ट्रा पैसे देना है या नहीं सभी स्पष्ट कर लें.

4. कामवाली बाई का समय निर्धारण कर लें लेकिन एक दिन कभी देर हो जाए तो थोड़ा सा इंसानियन का फर्ज निभाए और उसकी भी बात सुने जिससे आपको पता चले कि वह सच बोल रही है या नहीं.

5. काम वाली को कभी कभी इंसानियन के नाते खाना कपड़े इत्यादि देते रहे जिससे उसे भी काम करने में अच्छा महसूस होगा. साथ में उसके बच्चों की साम्थर्य अनुसार मदद करते रहे कभी तबियत खराब होने पर उसको अपने आप ही छुट्टी का बोल दे. जिससे आपकी अच्छाई पता चलेगी. हो सकता है कभी आपकी तबियत खराब होने पर आपके व्यवहार को ध्यान मे रखकर वह भी आपके घर का एक्स्ट्रा काम अपने आप ही कर दें और छुट्टी न लें. इसलिये उसे बनाकर रखें आप भी उसकी जरूरत का ध्यान रखे और समय आने पर वह भी सोचेगी की मैडमजी ने भी मेरी सहायता की थी. तो चलों मै भी ज्यादा काम कर दू, इससे आपको भी अच्छा लगेगा .

6. कामवाली बाई से बात करते समय संयम रखे. अनापशनाप न बोले सोच-समझकर बोले. फालतू की बातें न बताये उससे उतना ही बोले जितना जरूरी हो वरना बाद में पछताना न पड़े.

7. आड़े वक्त अगर पैसे मांगती है तो ये देख लें कि कोई बहाना तो नहीं बना रही है. काफी सोचसमझकर उसकी मदद कर दें. इससे भी कामवाली से आपका अच्छा रिश्ता बनेगा.

8. अगर आपके यहां सब्जी भाजी ज्यादा है या अन्य वस्तु जो उसको ले जाने में एतराज न हो तो उसको दे दें फेंकने से तो अच्छा है किसी के पेट में चला जायेगा. परन्तु खाना अच्छा ही दे पुराना खराब हुआ न दें नहीं तो आप परेशानी में पड़ सकती हैं इसलिये अच्छा खाना ही दें

9. सबसे बड़ी बात उसके दुख में सहानुभूति के साथ खड़े रहे तो हो सकता है उसको भी लगे की आपको बिना कारण परेशान नही करना चाहिए इसलिये कहते हैं कि कर भला तो हो भला.

10. आप कभी भी अपने घर की पूरी जानकारी कामवाली बाई को न दें और उसके सामने फोन पर शिकायतों की लिस्ट न बताएं या बात करते समय ध्यान रखें की आपकी बात कोई सुन रहा है. इसलिये बात करते समय संयम से ध्यान देकर करें.

11. कामवाली बाई को चोरी का आरोप बिना सोचे समझे न लगाये. पहले घर में वह चीज अच्छी तरह देख लें या पूरे घर के सदस्यों से पूछ लें अच्छी तरह जांच-पड़ताल कर लें और फिर भी आपको लगता है कि बाई पर आरोप लगाया जाए तो सहजता से विनम्रता से पूछकर जबाव से सतुंष्ट होने पर या न होने पर आप होशियारी के साथ उसको हटा दें. नहीं तो वह आपके घर में दूसरी बाई को लगने नही देगी और चारों तरफ आपकी बुराई करते फिरेगी सो अलग. इसलिये ये काम करते समय बड़ी सर्तकता बरतें.

12. कामवाली बाई आपको कोई इधर उधर की बातें चुगली करें तो आप पूरी तरह से विश्वास कर उस व्यक्ति के बारे में आप उसके कहने पर व्यवहार को ने बिगाड़े. वरना हो सकता है आपको पछताना पड़े. इसलिये सबसे बड़ी बात अगर वह इधर उधर की बात बताये तो उसे डांट दें कि मुझे चुगली मत बताये. कभी कभी कामवाली बाई की बातों में आकर लोग सम्बन्ध बिगाड़ बैठते हैं जो गलत है इसलिये दूसरा पक्ष सुनने के बाद ही कोई फैसला लें.

मेरी बेटी को स्किजोप्रेनिआ की बीमारी है, क्या इससे जौब या शादी में दिक्कत आ सकती है?

सवाल-

मेरी बेटी की उम्र 17 वर्ष है. पिछले 2 साल से वह स्किजोप्रेनिआ से पीडि़त है. वह बहुत ही असहज ढंग से बरताव करती है और रात में डर कर उठ जाती है. वह खुद इस समस्या से बाहर निकलना चाहती है. मुझे भी बहुत चिंता सताती है क्योंकि इस की वजह से बच्ची की पढ़ाई का भी नुकसान हो रहा है. आगे चल कर इस की जौब या शादी में दिक्कत आ सकती है. कृपया कर के बताएं क्या इस का कोई इलाज संभव है?

जवाब-

स्किजोप्रेनिआ एक गंभीर मानसिक रोग है. इस बीमारी से पीडि़त के निजी और सार्वजनिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. आप की बच्ची के मामले में बिना जांच के कुछ भी कह पाना मुश्किल होगा क्योंकि बच्ची की स्थिति का पूरी तरह आंकलन किया जाएगा. मानसिक रोग में कुछ भी जनरल नहीं होता हर मरीज की परिस्थितियों और मानसिक स्थिति के मुताबिक जांच और उपचार किया जाता है.

अगर इनिशियल स्टेज है तो बीमारी का इलाज संभव है, लेकिन एडवांस स्टेज में इस बीमारी को पूर्ण  रूप से स्थाई इलाज थोड़ा कौंप्लैक्स होता है. लेकिन दवाओं और सही उपचार की मदद से इस के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है. इसलिए आप को निराश होने की आवश्यकता

नहीं है. बच्ची की उम्र कम है ऐसे में उस का अभी मैडिकल इलाज शुरू करवाएं तो आप स्थिति को नियंत्रित कर सकती हैं. परिवार के सदस्यों को भी समझाएं और तुरंत डाक्टर से सलाह लें.

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डा. अनुरंजन बिस्ट

सीनियर साइकेट्रिक्ट, फाउंडर, माइंड ब्रेन टीएमएस इंस्टिट्यूट

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दुनियाभर में कोरोनावायरस महामारी के समय में सोशल डिस्टेंसिंग, क्वारंटाइन और देश भर में स्कूलों के बंद रहने से बच्चे प्रभावित हुए हैं. कुछ बच्चे और युवा बेहद अलग-थलग महसूस कर रहे हैं और उन्हें चिंता, उदासी और अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है. वे अपने परिवारों पर इस वायरस के प्रभाव को लेकर भय और दुख महसूस कर सकते हैं. ऐसे भय, अनिश्चितत, और कोविड-19 के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए घर पर ही रहने जैसी स्थिति उन्हें शांत बैठे रहना मुश्किल बना सकती है. लेकिन बच्चों को सुरक्षित महसूस कराना, उनके हेल्दी रुटीन को बरकरार रखना, उनकी भावनाओं को समझना बेहद महत्वपूर्ण है. इस बारे में बता रहे हैं Kunwar’s Educational Foundation के educationist(शिक्षाविद्) राजेश कुमार सिंह.

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न बनाएं छोटी सी बात का बतंगड़

लेखक-वीरेंद्र बहादुर सिंह 

‘‘नेहा मेरी आरती को तुम ने गुस्से में कुछ कहा क्यों?’’ गुस्से में लालपीली होते हुए मालती जोरजोर से कह रही थी.

‘‘अरे मालती मैं तो आरती और विश्वा, दोनों पर गुस्सा कर रही थी. वह भी इसलिए कि दोनों बहुत शोर कर रहे थे,’’ नेहा ने शांति से कहा.

‘‘बच्चे शोर नहीं करेंगे तो कौन करेगा?’’ मालती कटाक्ष करते हुए बोली.

‘‘बच्चे इतने ही प्यारे हैं तो अपने घर बुला कर शोर कराओ न. मुझे नहीं अच्छा लगता. एक तो सभी को संभालो, ऊपर से ताने भी सुनो,’’ मालती की बातों से तंग आ कर नेहा गुस्से में बोली.

‘‘मुझे सब पता है. आरती ने मुझे सब बताया है, जो तुम ने उसे कहा है. तुम ने उसे घर जाने के लिए भी कहा है. यह लड़की समझती ही नहीं वरना किसी के घर जाने की क्या जरूरत है?’’

‘‘किसी के घर नहीं मालती, जिस तरह मैं अपनी विश्वा को रखती हूं, उसी तरह आरती को भी रखती हूं. अगर कभी गुस्सा आ गया तो इस में क्या हो गया? अगर विश्वा कभी कोई गलती करती है तो मैं उस पर भी गुस्सा करती हूं.’’

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दोनों पड़ोसिन सहेलियों ने छोटी सी बात पर पूरी कालोनी सिर पर उठा ली थी. एक छोटी सी बात ने बहुत बड़ा रूप ले लिया था. दोनों के गुस्से का पारा लिमिट के ऊपर जा रहा था. अगलबगल वाले अपना काम छोड़ कर जुगल जोड़ी कही जाने वाली सहेलियों का झगड़ा देखने लगे थे. वैसे भी जिन के पास कामधाम नहीं होता, इस तरह के लोग किसी के घर आग लगने पर उसे बुझने के बजाय उस में तेल डाल कर रोटी सेंकने में माहिर होते हैं. यहां भी लोगों के लिए रंगमंच पर नाटक जमा हुआ था और कोई भी यह मजा छोड़ना नहीं चाहता था.

देखतेदेखते दोनों पक्षों से उन के पति भी उन्हें शांत कराने के लिए सामने आ गए. अब सभी को और मजा आने लगा था. छोटी सी बात का बतंगड़ बन गया था और छोटे बच्चों को ले कर बड़े झगड़ने लगे थे.

कोई ऐसा नहीं था, जो इन लोगों को शांत कराता. हरकोई दोनों ओर से अच्छा बन कर होम में घी डाल कर हाथ सेंकना चाहता था. इस बात को नेहा और मालती समझे बगैर लोगों का मनोरंजन करते हुए मूर्ख बन रही थीं. दोनों के बीच हमेशा छोटी से छोटी चीज को ले कर मित्रभाव से लेनदेन का व्यवहार चलता रहता था.

उस दिन भी जब एक शब्द पर 2 कटाक्ष भरे शब्दों के बाणों द्वारा लेनदेन का व्यवहार चल रहा था. दोनों में से कोई भी समझने को तैयार नहीं थी.

गलती का एहसास

उन दोनों का झगड़ा कम होने का नाम नहीं ले रहा था. उसी बीच आरती के जोरजोर से रोने की आवाज आई तो सभी का ध्यान उस की तरफ चला गया. आरती और विश्वा आपस में झगड़ रही थीं. उसी की वजह से आरती रोने लगी थी.

बिटिया को रोते देख मालती का गुस्सा और बढ़ गया. गुस्से में पैर पटकते हुए बेटी के पास जा कर लगभग चीखते हुए बोली, ‘‘तुम से कितनी बार कहा कि इस के साथ मत खेला करो, क्या किया विश्वा तुम ने?’’

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‘‘मम्मी, आप ने ही तो कहा था कि जिस का लेना चाहिए, उसे वापस भी करना चाहिए. आप नेहा आंटी से कुछ लेती हैं तो ज्यादा ही वापस करती हैं. आप कहती हैं कि इसे लेनदेन का व्यवहार कहा जाता है. मैं भी वही कर रही थी. विश्वा ने कल मुझे अपनी चौकलेट दी थी. अब मैं अपनी चौकलेट दे रही हूं तो यह मना कर रही है. यह कह रही है कि इस की मम्मी ने कहा है कि अगर दोस्तों को कुछ देते हैं तो उन से वापस नहीं लेते. इस में व्यवहार नहीं होता,’’ रोते हुए आरती ने मालती की ओर देखते हुए कहा.

जिन के लिए अब तक झगड़ा हो रहा था, वे एकदूसरे को खुश करने के लिए परेशान थीं. इन छोटे बच्चों की समझदारी देख कर मालती और नेहा को अपनी गलती का एहसास हो गया. दोनों ही एकदूसरे से माफी मांगते हुए अपनीअपनी बेटी पर गर्व महसूस करते हुए खुश हो रही थीं.

घड़ीभर पहले जो गुस्से की आग बरस रही थी, अब उस पर होने वाली इस प्रेम की बरसात ने वातावरण को एकदम शीतल बना दिया था, जिस से सभी के चेहरे चमक रहे थे.

मेरा बेटे को शराब और सिगरेट की लत लग गई है, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरे बेटे की उम्र 21 वर्ष है. वह गलत दोस्तों की संगति में आने की वजह से शराब और सिगरेट की लत का शिकार हो गया है. अब तो स्थिति यह हो गई है कि वह अपनी एडिक्शन की तलब पूरा करने के लिए चोरी भी करने लगा है. घर में किसी के भी पैसे बिना बताए उठा लेता है. मैं उस की इस स्थिति को देखते हुए खुद तनाव में आ गई हूं. कुछ समझ नहीं आता कि क्या करूं. कैसे उस को एडिक्शन से मुक्ति दिलाई जाए?

जवाब

जब हम एडिक्शन यानी लत की बात करते हैं तो इस का सीधा संबंध दिमाग से होता है. लत किसी भी चीज की हो सकती है. आप को यह समझना होगा कि एडिक्शन एक लत या आदत नहीं बल्कि बीमारी होती है. रही बात आप के बेटे की तो पूरी केस हिस्ट्री देखने के बाद उस की शारीरिक और मानसिक स्थिति का आकलन किया जा सकता है. उस से पता चलेगा कि शराब के कारण उस के शरीर पर कितना बुरा असर हुआ है. दूसरा यह पता लगाना भी जरूरी है कि शराब की वजह से डिप्रैशन या अन्य तरह की समस्या तो नहीं है. पहले उस की काउंसलिंग होगी फिर इलाज शुरू किया जाएगा.

आप घबराएं नहीं. एडिक्शन से आजाद होना मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं. अगर सही उपचार द्वारा कोशिश की जाए तो नशे की लत को छुड़ाया जा सकता है. टीएमएस थेरैपी के द्वारा नशे की लत को छुड़ाने में 100% रिजल्ट मिले हैं.

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पीयूष ने दोनों बैग्स प्लेन में चैकइन कर स्वयं अपनी नवविवाहित पत्नी कोकिला का हाथ थामे उसे सीट पर बैठाया. हनीमून पर सब कुछ कितना प्रेम से सराबोर होता है. कहो तो पति हाथ में पत्नी का पर्स भी उठा कर चल पड़े, पत्नी थक जाए तो गोदी में उठा ले और कुछ उदास दिखे तो उसे खुश करने हेतु चुटकुलों का पिटारा खोल दे.

भले अरेंज्ड मैरिज थी, किंतु थी तो नईनई शादी. सो दोनों मंदमंद मुसकराहट भरे अधर लिए, शरारत और झिझक भरे नयन लिए, एकदूसरे के गलबहियां डाले चल दिए थे अपनी शादीशुदा जिंदगी की शुरुआत करने. हनीमून को भरपूर जिया दोनों ने. न केवल एकदूसरे से प्यार निभाया, अपितु एकदूसरे की आदतों, इच्छाओं, अभिलाषाओं को भी पहचाना, एकदूसरे के परिवारजनों के बारे में भी जाना और एक सुदृढ़ पारिवारिक जीवन जीने के वादे भी किए.

हनीमून को इस समझदारी से निभाने का श्रेय पीयूष को जाता है कि किस तरह उस ने कोकिला को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया. एक सुखीसशक्त परिवार बनाने हेतु और क्या चाहिए भला? पीयूष अपने काम पर पूरा ध्यान देने लगा. रातदिन एक कर के उस ने अपना कारोबार जमाया था. अपने आरंभ किए स्टार्टअप के लिए वैंचर कैपिटलिस्ट्स खोजे थे.  न समयबंधन देखा न थकावट. सिर्फ मेहनत करता गया.

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उधर कोकिला भी घरगृहस्थी को सही पथ पर ले चली.

‘‘आज फिर देर से आई लीला. क्या हो गया आज?’’ कामवाली के देर से आने पर कोकिला ने उसे टोका.

इस पर कामवाली ने अपना मुंह दिखाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं भाभीजी, कल रात मेरे मर्द ने फिर से पी कर दंगा किया मेरे साथ. कलमुंहा न खुद कमाता है और न मेरा पैसा जुड़ने देता है. रोजरोज मेरा पैसा छीन कर दारू पी आता है और फिर मुझे ही पीटता है.’’

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अहंकार से टूटते परिवार

पुरानी मान्यताओं के हिसाब से बेटी की शादी करने के बाद मातापिता उस की जिम्मेदारियों से पल्ला झड़ लेते थे. लड़की की मां चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती थी. लड़के की मां को ही पतिपत्नी के बीच तनाव का कारण माना जाता था. मगर आधुनिक युग में बेटी के प्रति मातापिता की सोच बहुत बदली है. ज्यादातर घरों में पति से ज्यादा पत्नी का वर्चस्व नजर आने लगा है. इसलिए बेटी की ससुराल में होने वाली हर छोटीबड़ी बात में उस की मां का हस्तक्षेप बढ़ने लगा है.

आजकल की बेटियों का तो कुछ पूछो ही नहीं. अपने घर की हर बात अपनी मां को फोन से बताती रहती हैं. छोटेछोटे झगड़े या मनमुटाव जो कुछ देर बाद अपनेआप ही सुलझ जाता है उसे भी वे मां को बताती हैं. मांपिता को पता लग जाने मात्र से बखेड़ा शुरू हो जाता है.

बहू के घर वाले खासकर उस की मां उसे समझने के बदले उस की ससुरालवालों से जवाब तलब करने लगती है, जिसे लड़के के घर वाले अपने सम्मान का प्रश्न बना लेते हैं और अपने लड़के को सारी बातें बता कर उसे बीच में बोलने के लिए दबाव बढ़ाने लगते हैं.

पति को अपने मातापिता से जब अपनी ससुराल वालों के दखलंदाजी की बातें मालूम होती हैं, तो वह इसे अपने मातापिता का अपमान समझ कर गुस्से में आ कर पत्नी से झगड़ पड़ता है. उधर पत्नी भी अपने मातापिता के कहने पर उन के सम्मान के लिए भिड़ जाती है. मातापिता के विवादों की राजनीति में पतिपत्नी के बीच बिना बात झगड़ा और तनाव बढ़ता है.

छोटीछोटी बातों का बतंगड़

हर मातापिता जब अपने बच्चों की शादी करते हैं तो उन की खुशहाली ही चाहते हैं. फिर भी अपनी अदूरदर्शिता के कारण अपने ही बच्चों की जिंदगी बरबाद कर देते हैं. आजकल बेटी की मां को लगता है कि वह बराबर कमा रही है तो किसी की कोई बात क्यों सुने? यह बात भी सही है, गलत बात का विरोध करना चाहिए, अत्याचार नहीं सहना चाहिए, पर अत्याचार या कोई गलत व्यवहार हो तब न.

अकसर छोटीछोटी बातों का ही बतंगड़ खड़ा होता है. जरूरी नहीं है कि हर बात के लिए उद्दंडता से ही बात की जाए. अगर कोई बात पसंद नहीं आती हो तो बड़ों का अपमान करने के बदले शांति से समझ कर भी बातें की जा सकती हैं. बातबात पर उलझ कर यह बताना कि हम बराबर कमाते हैं, इसलिए हम किसी से कम नहीं, मेरी ही सारी बातें सही हैं जैसी बातें करना गलत है.

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लड़कियों में इस तरह की बढ़ती स्वेच्छाचारिता उन की स्वत्रतंता को नहीं दर्शाती है, बल्कि उन की उद्दंडता को ही दर्शाती है. किसी भी चीज का विरोध शांतिपूर्ण ढंग से भी समझ कर किया जा सकता है. लड़की को भी समझना चाहिए कि यह उस का घर है और घर की भी अपनी एक मर्यादा होती है.

बेवजह की बातें

मेरे पड़ोस में रिटायर बैंक कर्मचारी रहते हैं. उन का बेटा एक सरकारी औफिस में ऊंचे पद पर कार्यरत है. उन की बहू भी बेटे के औफिस में नौकरी करती है. हाल ही में उन्हें पोता हुआ, तो उन्होंने कोरोना को देखते हुए कुछ अती करीबी लोगों को ही बुलाया.

लड़के की बूआ बहू को बच्चे की बधाइयां देते हुए बोली, ‘‘समय से पहले ही बच्चे का बर्थ हो जाने से बच्चा बहुत कमजोर है. लगता है बहू कोल्डड्रिंक और फास्टफूड ज्यादा खाती थी तभी बच्चे का जन्म समय से पहले हो गया.’’

तुरंत लड़के की मां ने विरोध किया, ‘‘नहीं… ऐसी कोई बात नहीं है दीदी… बस हो जाता है कभीकभी.’’

पास में बैठी बहू की बहन ने सुन लिया. तुरंत रिएक्ट करते हुए बोली, ‘‘अच्छी बात है जिस के मन में जो आता है वही बोल जाता है. दीदी तुम ने विरोध क्यों नहीं किया, यों ही कब तक घुटघुट कर जीती रहोगी.’’

संयोग से तब तक बूआजी बगल वाले कमरे में चली गई थीं.

तुरंत बहू की मां ने रिएक्ट किया, ‘‘जिसे पूछना है मुझ से पूछे, दामादजी से पूछे, यों मेरी बेटी को जलील करने का उन्हें कोई हक नहीं है. वह कोई गंवार लड़की नहीं है, दामादजी के बराबर कमाती है.’’

लड़के की मां दौड़ी आईं, ‘‘कुछ मत बोलिए, वह घर की सब से बड़ी है. जो भी कहना हो बाद में मुझ से कह लीजिएगा.’’

तुरंत बहू बोली, ‘‘मेरी मां ने ऐसा क्या गलत कह दिया जो आप लोग उसे चुप कराने लगे?’’

फिर से बहन बीच में पड़ी, ‘‘इस सब में सब से ज्यादा गलती तो जीजाजी की है. वे अपनी बूआ से क्यों नहीं पूछते हैं कि वह इस तरह का ऊटपटांग बातें क्यों करती है.’’

तुरंत लड़़के की मां बोली, ‘‘मेरे बेटे के बाप की तो हिम्मत ही नहीं है कि अपनी बहन से सवाल पूछे. फिर मेरा बेटा क्या पूछेगा? अपने घर में हम अपने से बड़ों से उद्दंडता से बातें नहीं करते.’’

छोटी सी बात थी मगर

एक 80 साल के बुजुर्ग की बातों को ले कर दोनों परिवारों में कितने दिनों तक ठनी रही. लड़की के मातापिता अपनी बेटी को कहते कि उस की ससुराल में उन का अपमान हुआ है. वे लड़के वाले हैं तो क्या हुआ, मेरी बेटी उन के घर में इस तरह की उलटासीधी बात क्यों सुनेगी. लड़के की बूआ माफी मांगे वरना हम लोग लीगल ऐक्शन भी ले सकते हैं.’’

जब बहू ने ये सब बातें अपनी ससुराल में बोलीं तो लड़के के मातापिता बिगड़ गए, लड़के की मां बोली, ‘‘अच्छी जबरदस्ती है. मेरे घर की हर बात में टांग अड़ाते हैं, उलटे हमें धमकियां भी देते हैं. जो करना है करें, इतनी सी बात के लिए कोई माफी नहीं मांगेगा. इतना गुमान है तो रखें अपनी बेटी को अपने घर.’’

यह छोटी सी बात इतनी बढ़ी कि लड़की की मां अपनी बेटी को अपने घर ले गईं. न चाहते हुए भी पतिपत्नी, एकदूसरे से अलग हो गए. अपनेअपने मातापिता की प्रतिष्ठा बचातेबचाते बात तलाक तक पहुंच गई. बड़ी मुश्किल से लड़के के दोस्तों ने बीच में पड़ कर बात को संभाला.

गलत सलाह कभी नहीं

वंदना श्रीवास्तव एक काउंसलर है के अनुसार मातापिता के बेटी की ससुराल में छोटीछोटी बातों में दखल देने और लड़के के मातापिता के अविवेकी गुस्से और नासमझ भरी जिद्द से आज परिवार तेजी से टूट रहे हैं. वंदनाजी के अनुसार, उन के पास ज्यादातर ऐसे ही मामले आते हैं, जिन में मां की गलत सलाह के कारण बेटियों के घर टूटने के कगार पर होते हैं.

मेरे पड़ोस में एक सिन्हा साहब रहते हैं. उन्होंने अपनी इकलौती संतान अपने बेटे की शादी बड़ी धूमधाम से की. बहू को बेटी का मान देते थे. बहू भी बहुत खुश रहती थी और आशाअनुरूप सब से काफी अच्छा व्यवहार करती थी.

1 महीने बाद बेटा बहू के साथ दिल्ली लौट गया. वह वहीं जौब करता था. बहू भी वहीं जौब करती थी. जब बहू गर्भवती हुई बेटा मां को अपने पास बुला लाया, पर यह बात बहू की मां को पसंद नहीं आई. पहले वह समधन को यह कर घर लौटने की सलाह देती रही कि अभी से रह कर क्या कीजिएगा, समय आने पर देखा जाएगा. जब वह नहीं लौटी तो वह बेटी को समझने लगी कि जरूर तुम्हारी सास के मन में कुछ है, उन के हाथों का कुछ भी मत खानापीना.

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जैसे ही लड़के की मां की समझ में यह बात आई, वह वहां से जाने को तैयार हो गई, लेकिन बेटे के काफी अनुरोध करने पर उस की मां को वहां रुकना ही पड़ा. जब बच्चे का जन्म हुआ बहू की मां भी आ गई. फिर तो वह बच्चे को दादीदादा को छूने ही नहीं देती थी. बहू का व्यवहार अपनी मां को देख बदलने लगा. सीधीसादी सास उसे कमअक्ल नजर आने लगी. अपनी मां का साथ देते हुए सास से बुरा व्यवहार करने लगी. फिर अपनी मां के साथ अचानक मायके चली गई.

सासूमां और ससुरजी पटना लौट आए. तब से वे लोग बेटे के घर नहीं जाते हैं. बेटा खुद अपने मातापिता से मिलने आता है. रोज फोन भी करता है. बहू को ये सब पसंद नहीं है इसलिए घर में हमेशा तनाव बना रहता है. बहू के मां के कारण एक खुशहाल परिवार तनाव में जीता है.

अगर अपनी बेटी को सुखी रखना है तो खासकर लड़की की मां को बेटी का रिश्ता ससुराल में मजबूत बनाने में मदद करने के लिए उसे अच्छी सलाह देनी चहिए ताकि अपने अच्छे आचारविचार से वह सब का दिल जीत कर सब का प्यार और सम्मान पा सके. मां की जीत तभी है जब बेटी की ससुराल वाले उस पर नाज करें. तभी उस की बेटी खुद भी शांति से रहेगी और दूसरे को भी शांति से रहने देगी.

वहीं लड़के के मातापिता को बहू के मायके वालों की बातों को अपने सम्मान का विषय न बना कर इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों का घर छोटीछोटी बातों से न टूटे वरना मातापिता के अहं की लड़ाई में बिना कारण बच्चों के घर टूटते रहेंगे.

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औरत नहीं है बच्चा पैदा करने की मशीन

हाल ही में मुंबई के पौश इलाके दादर की एक 40 वर्षीय महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि उस के पति ने उसे बेटा पैदा करने के दबाव में 8 बार गर्भपात कराने को मजबूर किया. इस के साथ ही उस को 1,500 से अधिक हारमोनल और स्टेराइड इंजैक्शन दिए गए.

भारत में गर्भपात गैरकानूनी है, इसलिए उस का गर्भपात और उपचार बिना उस की सहमति के विदेश में करवाया. बेटे की ख्वाहिश में की जा रही इस मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने पर उस के साथ मारपीट की.

पीडि़ता ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि शादी के कुछ समय बाद ही पति ने वारिस के रूप में एक बेटे की जरूरत पर जोर दिया और जब ऐसा नहीं हो सका तो उस के साथ मारपीट करनी शुरू कर दी. इसी वजह से विदेश में उस का 8 बार गर्भपात कराया. महिला के पिता सेवानिवृत्त जज हैं और उन्होंने अपनी बेटी का विवाह एक उच्च शिक्षित और प्रतिष्ठित परिवार में किया था. पीडि़ता के पति और सास दोनों ही पेशे से वकील हैं और ननद डाक्टर है.

2009 में पीडि़ता ने एक बच्ची को जन्म दिया. 2 साल के बाद 2011 में जब वह दोबारा गर्भवती हुई तो उस का पति उसे डाक्टर के पास ले गया और गर्भ में फिर से बेटी होने की खबर पा कर उसे गर्भपात के लिए मजबूर किया.

आरोपी पति अपनी पत्नी को भ्रूण प्रत्यारोपित कराने ले गया और इस से पहले आनुवंशिक रोग के निदान के लिए बैंकौक भी ले कर गया. गर्भाधान से पहले भ्रूण के लिंग की जांच कर के उस का इलाज और सर्जरी की जा रही थी. इस के लिए पीडि़ता को 1,500 से अधिक हारमोनल और स्टेराइड के इंजैक्शन दिए गए. महिला की शिकायत के आधार पर पति के खिलाफ उत्पीड़न, मारपीट, धमकी और जैंडर सलैक्शन का केस दर्ज कर लिया गया.

सोचने वाली बात है कि जब रईस और पढ़ेलिखे लोग ऐसा करेंगे तो दहेज देने में लाचार या अनपढ़ लोगों के बारे में कुछ कहना ही बेकार है. आज के समय में जबकि लड़कियां बड़े से बड़े ओहदे पर पहुंच कर बखूबी अपनी भूमिकाएं निभा रही हैं तब इस तरह की सोच रखने वाले रईस परिवारों की इस मानसिक संकीर्णता पर अफसोस जाहिर करने के सिवा क्या कहा जा सकता है?

औरतों के साथ हैवानियत

मगर बात यहां केवल संकीर्ण सोच या बेटे के लिए पागलपन की नहीं है. इस तरह के मामले दरअसल हैवानियत की सीमा पार कर जाते हैं. एक औरत के लिए मां बनने का सफर आसान नहीं होता. गर्भधारण के बाद के पूरे 9 महीने उसे कितनी शारीरिक तकलीफों से गुजरना पड़ता है यह केवल एक औरत ही समझ सकती है. मगर अकसर पुरुष औरत को इंसान नहीं बल्कि बच्चे पैदा करने वाली मशीन समझते हैं.

उन्हें यह भी समझ नहीं आता कि एक मां का अपने बच्चे से जुड़ाव उसी समय हो जाता है जब वह उस के पेट में आता है. बच्चा उस के शरीर का ही हिस्सा होता है. ऐसे में महज बेटी होने की वजह से उस का गर्भपात करा देना उस अजन्मी बच्ची के साथसाथ मां की ममता का भी खून करना होता है. असुरक्षित गर्भपात गर्भवती औरतों की मृत्यु का तीसरा सब से बड़ा कारण है.

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यही नहीं गर्भपात और इलाज के नाम पर उस के शरीर में हारमोनल और स्टेराइड इंजैक्शन घुसाना या सर्जरी करना किसी भी तरह मान्य नहीं है. पति होने का मतलब यह नहीं कि पुरुष महिला के शरीर का मालिक हो गया और उस के साथ कुछ भी करने का हक हासिल कर लिया. इस तरह के लोग तो रैपिस्ट से भी ज्यादा हैवान होते हैं. रेपिस्ट किसी अनजान महिला के साथ जबरदस्ती करते हैं, मगर पति 7 वचन निभाने का वादा कर के भी महिला को मर्मांतक पीड़ा पहुंचाते हैं.

औरत केवल बच्चे पैदा करने के लिए नहीं है

हाल ही में अफगानिस्तान में तालिबान की नई सरकार में महिलाओं को शामिल किए जाने की सभी संभावनाओं को खारिज करते हुए समूह के एक प्रवक्ता ने कहा कि महिलाओं को सिर्फ बच्चे पैदा करने चाहिए. एक महिला के लिए कैबिनेट में होना जरूरी नहीं है. इस के बाद अफगानिस्तान की सैकड़ों महिलाएं अपनी जान जोखिम में डाल कर इस के विरोध में सड़कों पर उतर आईं.

तालिबान द्वारा विरोध पर काररवाई में महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोड़े और लाठियों का इस्तेमाल किया. यही नहीं तालिबान ने अफगानिस्तान में महिलाओं के खेलों पर भी प्रतिबंध लगा दिया है.

इस तरह की सोच पुरुषों की छोटी सोच का नतीजा होती है. आज महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिला कर अपनी काबिलीयत साबित कर रही हैं. फिर भी औरतों को दोयम दर्जा ही दिया जाता है. बात तालिबान की हो या भारत की, औरतों के साथ हैवानियत कहीं भी हो सकती है और इस की वजह महिलाओं के प्रति समाज का संकीर्ण रवैया है. समाज का यह रवैया कहीं न कहीं धार्मिक अंधविश्वासों और धर्मगुरुओं की देन है.

मैं बच्चा पैदा करने की मशीन नहीं हूं

महिला हीरोइन हो या साधारण घर की लड़की अकसर भारतीय समाज में शादी के बाद ज्यादातर लड़कियों से यह सवाल जरूर पूछा

जाता है कि वह खुशखबरी कब सुनाएगी यानी मां कब बन रही है. ऐसा लगता है जैसे औरत का सब से पहला और जरूरी काम बच्चे पैदा करना ही है.

दरअसल, ससुराल में ऐंट्री होने के बाद से ही लड़कियों पर एक अच्छी पत्नी और बहू के साथसाथ घर को वारिस देने की जिम्मेदारी भी डाल दी जाती है. उसे बेटे की मां बनने का आशीर्वाद दिया जाता है. मां बनने में देर हुई तो ताने दिए जाने लगते हैं. सिर्फ परिवार वाले ही नहीं बल्कि रिश्तेदार और पासपड़ोस वालों का नजरिया भी यही होता है.

अकसर घर के बड़े बेटियों को समझते हैं कि शादी के बाद कैरियर को भूल कर पहले घर देखना और घर की जिम्मेदारी संभालनी चाहिए. लड़की को कभी अपनी जिंदगी से जुड़े अहम फैसले लेने का हक भी नहीं मिलता. कई बार सासससुर द्वारा बहू से डिमांड की जाती है कि वह उन्हें पोता ही दे.

इस तरह कभी पोते की चाह को ले कर सासससुर बहू पर हावी होते हैं तो कभी शादी के तुरंत बाद बच्चे की पैदाइश को ले कर उतावले रहते हैं. ऐसा लगता है जैसे बहू बच्चा पैदा करने की मशीन है. जब चाहे पोता पैदा करवा लो और यदि गर्भ में बच्ची है तो उस की हत्या कर दो. लगता है जैसेकि लड़की की अपनी कोई संवेदना ही नहीं. उस का कोई वजूद ही नहीं, रूढ़ीवादी सोच के चलते लड़की के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है.

बदल जाती है लड़की की जिंदगी

शादी वैसे तो 2 लोगों के बीच होती है, लेकिन अपेक्षाएं केवल बहू से ही की जाती हैं. वैसे ही नए माहौल में एडजस्ट होना और घर को संभालना उस के जीवन की चुनौती होती है. उस की जिंदगी में ऐसे कई बदलाव आते हैं जिन का सामना सिर्फ और सिर्फ लड़की को ही करना पड़ता है. यही नहीं नए रीतिरिवाजों से ले कर सब के मन की करने का बोझ भी घर की नई बहू पर डाल दिया जाता है.

जिन लड़कियों के लिए जिंदगी में कैरियर बहुत महत्त्वपूर्ण होता है उन्हें भी शादी के बाद अपनी प्राथमिकताएं बदलनी पड़ती हैं. एक अच्छी बहू, पत्नी बनने के चक्कर में कैरियर बहुत पीछे छूट जाता है. बची हुई कसर उन के मां बनने के बाद घर पर रह कर बच्चा संभालने की जिम्मेदारी पूरी कर देती है.

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सोसाइटी में दिखावा

समाज में दिखावा करने का रिवाज बहुत पुराना है. बहू के आने के बाद शादी में मिले सामान से ले कर उस की खूबसूरती और कुकिंग स्किल्स को ले कर ससुराल वाले रिश्तेदारों के सामने तारीफ करते नहीं थकते. ऐसा कर के वे समाज में अपनी हैसियत बढ़ा रहे होते हैं. सोसाइटी में अच्छी और बुरी बहू के कुछ पैमाने बने हुए हैं जिन के आधार पर एक बहू को जज किया जाता है. बहू घर का कितना काम करती है, कितनी जल्दी पोते का मुंह दिखा रही है या कितने बड़े घर से आई है जैसी बातें ही उस के अच्छा और बुरा बनने का फैसला करती हैं.

समाज को नहीं भाती आत्मनिर्भर लड़की

समाज में एक आत्मनिर्भर बहू को पचा पाना आज भी मुश्किल है. अगर बहू अपने पहनावे, कैरियर और दोस्तों से मिलनेजुलने जैसी बातें खुद डिसाइड करती है तो ससुराल में उस का टिकना मुश्किल हो जाता है. उस के पति और सासससुर को यह बात बिलकुल रास नहीं आती है. अगर एक बहू काम से घर पर देर से लौटती है तो उसे जज किया जाता है. लड़के दोस्त होने पर उस के चरित्र तक पर सवाल उठाए जाते हैं और शादी के तुरंत बाद मां न बनने का फैसला उस में कई तरह की कमियां ढूंढ़ निकालता है.

जरूरी है कि महिलाएं खुद अपनी अहमियत को समझेंं और किसी भी तरह के दबाव को अपनी लाइफ पर हावी न होने दें. पुरुषों को भी जरूरत है इस सोच से ऊपर उठने की, बेटा हो या बेटी बिना किसी पक्षपात के बच्चे को अपना पूरा प्यार देने की.

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जब कहना हो न

20 सितंबर, 2021 की सुबह. करीब 9 बजे का समय. सड़क पर लोगों की आवाजाही आम दिनों की तरह थी. दिल्ली के लेबर चौक के पास से 2 युवतियां गुजर रही थीं. सहसा वहां एक बाइक आ कर रुकती है. बाइक सवार बाइक को ठोकर मार कर एक युवती की तरफ लपक कर उस पर एक के बाद एक कैंची से वार करने लगता है. खून से लथपथ लड़की जमीन पर गिर जाती है. मगर युवक  रुकता नहीं. लड़की पर करीब 25-26 दफा वार कर डालता है.

युवक युवती की गरदन को बुरी तरह गोद देता है. पीठ पर भी वार करता है. लात भी जमाता है. यहां तक कि कई नसें भी काट देता है. हैवानियत का यह घिनौना खेल करीब 10 मिनट तक चलता है. इस बीच लोग मूकदर्शक बने खड़े रहते हैं. कोई बचाव के लिए आगे नहीं आता है.

दिलोदिमाग को झकझोर देने वाली इस घटना को देख कर कोई भी समझ सकता है कि वह शख्स उस लड़की से बेतहाशा नफरत करता होगा.

सुरेंद्र नाम का यह शख्स 3 वर्षों से करुणा नाम की उस युवती से प्यार करने का दंभ भरता था. एकतरफा प्यार में पागल यह युवक एक कंप्यूटर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट चलाता था और शादीशुदा था. उस के 2 बच्चे भी हैं. पत्नी के साथ तलाक का केस चल रहा था. करीब 3 साल पहले करुणा ने उस के सैंटर में दाखिला लिया था. तभी से सुरेंद्र उस का पीछा करने लगा था और प्यार करने का दावा करता था. करुणा ने उस का प्रेमप्रस्ताव ठुकरा दिया था. पुलिस में भी शिकायत की थी. पर सुरेंद्र के प्यार का भूत नहीं उतरा. उसे शक था कि करुणा किसी और से जुड़ी हुई है. करुणा के रिजैक्शन ने सुरेंद्र के अहं पर ऐसी चोट की कि उस ने अपने तथाकथित प्यार के जनून में करुणा का कत्ल ही कर डाला.

ऐसी ही एक घटना 19 सितंबर, 2016 को दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में घटी. जब एक दिलजले आशिक ने अपनी प्रेमिका को तीसरी मंजिल की बालकनी से फेंक दिया. वजह वही थी, एकतरफा प्यार में रिजैक्शन का दर्द.

करीब डेढ़ साल पहले आरोपी अमित ने ब्यूटीपार्लर में काम करने वाली उस युवती से फेसबुक पर दोस्ती की थी. दोनों के बीच जानपहचान बढ़ती गई. व्हाट्सऐप पर खूब चैटिंग भी होने लगी पर अमित द्वारा विवाह का प्रस्ताव रखने पर लड़की ने इनकार कर दिया और इस इनकार की कीमत उसे अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी.

दरअसल, 19 सितंबर की रात अमित अपनी बहन के साथ लड़की के घर पहुंचा और बातचीत के दौरान फिर से विवाह का प्रस्ताव रखा पर युवती द्वारा फिर इनकार किए जाने पर वह आगबबूला हो गया और युवती को बालकनी से नीचे फेंक दिया.

इसी तरह गत 23 सितंबर को ईस्ट दिल्ली क्रौस रिवर मौल की तीसरी मंजिल से एक 17 वर्षीय लड़की ने छलांग लगा कर खुदकुशी कर ली. इस घटना की तह में भी एक असफल हिंसक प्रेमी का बदला ही था. दरअसल, यह युवक 1 माह से लड़की को परेशान कर रहा था. लड़की के परिवार वालों ने इंदिरापुरम थाने में आरोपी के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई थी. मगर वह लड़की का पीछा नहीं छोड़ रहा था.

उस ने लड़की का अपने साथ लिया गया फोटो व्हाट्सऐप पर डाल दिया. इस घटना से लड़की को इतनी शर्मिंदगी उठानी पड़ी कि उस ने आहत हो कर अपनी जान दे दी.

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ऐसी घटनाएं समाचारों की सुर्खियां बनती रहती हैं. हाई प्रोफाइल केसेज (1996 का प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड/नैना साहनी तंदूर कांड) हों या मध्य अथवा निम्नवर्गीय केसेज जनून और अहं के आवेश में पागल पुरुष (भले ही वह पति हो या प्रेमी) स्त्री के प्रति हिंसक हो उठता है. तब उसे अपने ही प्रेम को बेदर्दी से मौत के घाट उतारते जरा भी संकोच नहीं होता है.

अब सवाल उठता है कि प्रेम जैसे खूबसूरत और दिल के रिश्ते में बदला और नफरत जैसे नकारात्मक भावों की जगह कहां है? प्रेम तो ऐसा एहसास है. जो दिल की गहराइयों को छूता है. सच्चा प्यार करने वाला इनसान कभी अपने प्रेमी को दुखतकलीफ में नहीं देख सकता. वह तो प्रेमी के चेहरे पर मुसकान सजाने के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगा सकता है. फिर जान लेना तो कल्पनातीत बात है. दरअसल, इन घटनाओं के मूल में है रिजैक्शन.

प्यार में रिजैक्शन

जिंदगी में अकसर हम चीजें रिजैक्ट करते हैं. कभी कोई चीज, जो हमें पसंद न हो उसे, तो कभी नौकरी, जो रास न आ रही हो या फिर कभी कोई आइडिया जो हमारी अपेक्षाओं के अनुकूल न हो. जैसे अप्रूवल, वैसे ही रिजैक्शन. दोनों ही हमारी जिंदगी के हिस्से हैं. इस से हैल्दी कंपीटिशन और बेहतर क्वालिटी निश्चित होती है. मगर मुश्किल तब पैदा होती है जब मनुष्य एकदूसरे को रिजैक्ट करते हैं खासकर जब लड़की/ स्त्री किसी लड़के/पुरुष को रिजैक्ट करती है.

मर्दवादी मानसिकता पर चोट

ऐसा होने पर उन के अहं पर चोट लगती है. लड़के कभी यह सहने को तैयार नहीं होते कि कोई लड़की उन के प्रेम को अस्वीकार कर किसी और को गले लगा ले. वे प्रेम पर एकाधिकार चाहते हैं. दरअसल, बचपन से ही हमारे यहां घरों में लड़कों की हर इच्छा पूरी की जाती है. मनपसंद चीज न मिलने पर यदि वे तोड़फोड़ भी करते हैं, तो भी घर वाले कुछ नहीं कहते.

घर के पुरुष महिलाओं पर रोब झाड़ते हैं. भाइयों के आगे बहनों में चुप रह कर सब सह जाने की आदत डाली जाती है. नतीजतन बड़े हो कर भी बहुत से लड़के स्वयं को इस मर्दवादी मानसिकता से मुक्त नहीं कर पाते.

नफरत में बदलती चाहत

इस तरह की मर्दवादी मानसिकता वाले शख्स जब एकतरफा प्यार में किसी को जनून की हद तक चाहने लगते हैं और लड़की यदि उन की इस चाहत को गंभीरता से नहीं लेती या अस्वीकार कर देती है, तो उन के प्यार को नफरत में बदलते देर नहीं लगती.

इस संदर्भ में क्रिमिनल साइकोलौजिस्ट अनुजा कपूर कहती हैं, ‘‘एक अध्ययन में पाया गया है कि किसी के प्रति एकतरफा चाहत जब जनून का रूप ले लेती है, तो वह इनसान को बड़े से बड़ा अपराध तक करने को मजबूर कर देती है. नाकाम चाहत में कुछ व्यक्ति डिप्रैशन में आ जाते हैं, तो कुछ घटिया करतूतों पर उतर आते हैं जैसे धमकी भरे मैसेज भेजना, पीछा करना, परेशान करना आदि. नफरत के ज्वार में बह कर कुछ लड़के कई दफा लड़की के साथसाथ अपनी जिंदगी भी बरबाद कर लेते हैं.’’

स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब प्रेमी/पति साइकोपैथ हो. इन का कोई भरोसा नहीं होता. अपने जनून में ये बर्बरता की हद तक जा सकते हैं.

साइकोपैथ प्रेमियों के लक्षण

साइकोलौजिस्ट डा. गौरव गुप्ता का कहना है, ‘‘साइकोपैथ जोड़तोड़ या झांसा देने में माहिर होते हैं. किसी लड़की/लड़के की शुरुआती मुलाकातों में इस बात का पता नहीं चल पाता कि  वह साइकोपैथ के साथ है. इस तरह के व्यक्ति के किसी के साथ जुड़ने पर उस के जीवन में काफी बदलाव नजर आने लगते हैं. वह अपने पहनावे को ले कर सतर्क होने लगता है. ऐसा व्यक्ति अपने पार्टनर को बोलने नहीं देता. सामने वाले की बातों को नजरअंदाज करता है. दूसरे की योजनाओं को चुटकियों में पलट कर अपनी योजना थोप देता है. अगर आप ब्रेकअप करने का प्रयास करेंगे तो वह परेशान हो उठेगा, माफी मांगेगा, लेकिन यह सब प्लानिंग के तहत होता है. उसे कभी अपने किए का पछतावा नहीं होता. वह आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोलने में माहिर होता है. वह धीरेधीरे आप को दोस्तों से अलग करता जाएगा और केवल वही आप की जिंदगी में रहेगा ताकि वह आप पर और अधिकार जमा सके. उस का व्यवहार पलपल बदलता है. हर बार वह अपने बुरे बरताव के लिए माफी मांगेगा, लेकिन उस में सुधार नहीं होता.’’

कानून की ढीली पकड़

इस तरह की घटनाओं की एक और मुख्य वजह कानून की ढीली पकड़ भी है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में महिलाओं के हित में अनेक कानून बने हैं. फिर भी उन के खिलाफ अपराधों में कमी नहीं आ रही. वजह है कानून की ढीली पकड़ और अपराधी को सजा मिलने में होने वाला विलंब.

बड़े से बड़ा अपराध कर के भी अपराधी बच निकलता है. सजा मिलती भी है तो वर्षों बाद. ऐसे में लोगों के बीच कानून का खौफ घटा है. लड़कियों के साथ खुलेआम छेड़छाड़, कहीं भी शराबसिगरेट पीना, बीच सड़क पर थूकना, गंदगी फैलाना, गालियां देना, ट्रैफिक नियमों की अवहेलना जैसे काम करने के बावजूद व्यक्ति को सजा मिलनी तो दूर उसे टोकने वाला भी कोई नहीं होता है. वह स्वयं को सिस्टम के ऊपर समझने लगता है और फिर जो मन करता है वही करने लगता है.

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न कहें मगर संभल कर

लाइफ कोच, अनामिका यदुवंशी कहती हैं, ‘‘जिस शख्स के लिए आप का दिल गवाही न दे रहा हो उसे अपने साथी के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता. अत: न कहते समय कुछ बातों का खयाल रखें ताकि सामने वाला आप से बदला लेने को उतारू न हो.’’

न कहना हो तो न करें इंतजार: किसी को भी ज्यादा समय तक मौका दे कर आप उस के मन में यह संशय पनपने का समय दे रही हैं कि कहीं न कहीं उस के पास अब भी मौका है. जितनी देर आप लटकी रहेंगी, उतनी ही उस की उम्मीदें बढ़ती रहेंगी. ऐसे में किसी को ज्यादा दिनों तक लटका कर न कहने से आप उसे न केवल ज्यादा दुख देंगी, बल्कि इस से उस का ईगो भी ज्यादा हर्ट होगा और वह अपना गुस्सा संभालने की स्थिति में नहीं रहेगा.

अत: आप की किसी लड़के में रुचि नहीं है तो शुरूआत से ही सारी चीजें साफ रखनी चाहिए.

सब से बेहतरीन तरीका है ईमानदारी से सीधे तौर पर न कहना: मैसेज से कहें न. सामने न कहने से किसी के भी अहं को चोट लग सकती है, क्योंकि हो सकता है वह उस समय भावनाओं से अभिभूत हो या फिर जब आप न कहें वह उस समय नशे में हो और आप पर गुस्सा करे, चिल्लाए. अत: इन स्थितियों से बचने के लिए अपनी अस्वीकृति मैसेज द्वारा भेज सकती हैं.

अनदेखा करें: कोई आप की प्रतिक्रिया पाने के लिए लगातार आप को मैसेज करेगा. आप के सामने गिड़गिड़ाएगा कि आप उसे क्यों छोड़ रही हैं. हो सकता है, आप को सब के सामने बेइज्जत भी करे या आप का मजाक उड़ाए. ऐसे में आप को खुद को सही ठहराने के लिए कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है. बस हर स्थिति को अनदेखा करें और धैर्य रखें.

न कह कर मत करें हां: भले ही कोई आप को कितने भी मैसेज करे या दबाव बनाए, लेकिन अपना मन या निर्णय न बदलें. उसे यह मौका कतई न दें कि वह आप की नजरों में आप को ही दोषी बना दे और इस कारण आप उस से बातचीत जारी रखें. यदि आप नहीं चाहती हैं तो दोस्ती रखने की भी जरूरत नहीं है. उसे दुख न हो, इस के लिए दूसरी कहानी बनाने की जरूरत नहीं है और न ही भविष्य के लिए उसे फिर से उम्मीद बंधाने की जरूरत है.

यदि उसे अनदेखा करना मुश्किल है, तो ब्लौक कर दें. एक बार जब कोई न कर देता है और किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं रखता तो अधिकांश लोग आगे बढ़ जाते हैं.

आप को न कहने का हक है. बस इस के बारे में खुद को स्पष्टवादी रखे, लेकिन स्थिति साफ रखें. अस्पष्टता लिए कोई गुंजाइश न छोड़ें बिना दुख पहुंचाए न कहने का सब से बेहतर तरीका यही है.

अनामिका यदुवंशी कहती हैं कि पुरुषों को नफरत से नहीं, सकारात्मक सोच से डील करना चाहिए. यदि न आप का साथी कह रहा है या दुनिया में आप को सब से ज्यादा समझने वाला अथवा वह जो आप को खुद भी बहुत प्यार करता है, पर उस की कोई मजबूरी है तब उस की न को दिल पर न ले कर उस की भावनाओं को समझें वरना उस की न को अहं पर ले कर आप खुद को नुकसान पहुंचाएंगे और भविष्य के लिए बड़ी समस्याएं खड़ी करेंगे.

न का सीधा असर दिमाग पर: दरअसल, जब हम न सुनते हैं तो हमारे दिमाग का कुछ हिस्सा तेजी से कार्य करता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब आप शारीरिक रूप से दर्द या दुख महसूस करते हैं तो उस का सीधा असर दिमाग पर होता है. इसी कारण न सुनना ज्यादा दुख पहुंचाता है.

मनोवैज्ञानिक घावों को भी भरा जा सकता है: भावनात्मक दर्द, किसी की अस्वीकृति और मानसिक पीड़ा से उत्पन्न घावों को भरा जा सकता है. इस के लिए हमें सकारात्मक सोच रखनी होगी. सकारात्मक सोच के साथ जीवन के दोनों पहलुओं हां और न को साथ ले कर चलें. निश्चय ही किसी की न आप को कभी परेशान नहीं करेगी.

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