लव मैरिज टूटने के ये हैं 10 कारण

विवाह से पहले एकदूसरे को पाने की चाह में जो युगल समाज तथा परिवार के विरुद्ध जाने से भी संकोच नहीं करते, अचानक विवाह होते ही या उम्र के किसी भी पड़ाव में एकदूसरे से आखिर अलग होने का निश्चय क्यों कर लेते हैं. यह बहुत चिंतनीय विषय है, क्योंकि पहले के जमाने के विपरीत आधुनिक समय में अधिकतर विवाह युवाओं द्वारा स्वेच्छा से किए जा रहे हैं. मातापिता द्वारा पारंपरिक सुनियोजित विवाह को उन के द्वारा नकारा जा रहा है. इन के असफल होने के कई ठोस कारण हैं:

– प्रेम विवाह बौलीवुड की ही देन है, जहां जीवनसाथी ढूंढ़ते समय न उम्र की परवाह होती है न जाति के बंधन की. जिस रफ्तार से प्रेम विवाह का फैसला यहां लिया जाता है उसी रफ्तार से तलाक भी हो जाता है. ‘तू नहीं और सही’ यह सोच पूरे बौलीवुड को अपनी गिरफ्त में लिए हुए है, जिस के प्रभाव से साधारण जनता भी अछूती नहीं है. यह तो सर्वविदित है ही कि फिल्मों के नायकनायिका की जीवनशैली आम जनता को बहुत जल्दी प्रभावित करती है, क्योंकि वे उन के आदर्श होते हैं.

– बौंबे हाई कोर्ट ने एक केस के संदर्भ में 2012 में बताया था कि अरेंज्ड मैरिज के बजाय प्रेम विवाहों में तलाकों की संख्या कहीं ज्यादा है. 1980 से प्रेम विवाह के चलन ने जोर पकड़ा. उस से पहले प्रेम की अभिव्यक्ति ही इतनी कठिन थी कि परिवार वालों के सामने जाहिर होने से पहले ही वह कहीं और रिश्ता जुड़ने के कारण दम तोड़ देती थी. यह चलन अभी महानगरों तक ही सीमित है. अभी छोटे शहरों और गांवों में इसे समाज द्वारा मान्यता नहीं मिली है. यह स्थिति भी देखने को मिल सकती है कि यदि परिवार वालों को पता लग जाता है, तो समाज में अपने मानसम्मान को ठेस न पहुंचे, इस से बचने के लिए वे अपने बच्चों की हत्या तक करने से भी गुरेज नहीं करते.

– प्रेम जिस की परिणति विवाह में होती है वह वास्तव में प्रेम नहीं होता, महज शारीरिक आकर्षण होता है. प्रेम और विवाह सिक्के के दो पहलू होते हैं. कोई जरूरी नहीं कि एक प्रेमी अच्छा पति भी साबित हो या एक प्रेमिका अच्छी पत्नी साबित हो. विवाह के पहले एक ही व्यक्ति के गुणों पर रीझ कर उस के साथ जीवनयापन का निर्णय करते हैं, लेकिन भारत में विवाह के बाद पत्नी को पति के सारे परिवार से तालमेल बना कर चलना पड़ता है, पति को भी पत्नी के साथ अपने परिवार की जिम्मेदारी निभानी होती है.

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प्रेम विवाह तभी सफल होता है जब इस का आधार त्याग, प्रतिबद्धता, समर्पण, समझौता हो जोकि प्राय: आधुनिक युवावर्ग में देखने को नहीं मिलता है, इसलिए विवाह के पहले देखे गए दिवास्वप्न विवाह के बाद धराशायी होते देख कर पत्नी विद्रोह करने लगती है, जिस का परिणाम तलाक होता है.

– आधुनिक लड़कियां पढ़लिख कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गई हैं. इस का सकारात्मक प्रभाव के साथ नकारात्मक प्रभाव यह पड़ रहा है कि वे असहनशील होने के साथसाथ अभिमानी भी हो रही हैं, जोकि सफल वैवाहिक जीवन के लिए घातक है.

– आधुनिक युवावर्ग अपनी वैयक्तिकता को प्राथमिकता देता है और किसी भी प्रकार का समझौता करने से कतराता है, जोकि वैवाहिक जीवन का आधार है. इसी कारण केरल राज्य में तलाकों की संख्या सब से अधिक है. वहां के लोगों की सोच है कि हर व्यक्ति को विवाह करना ही क्यों चाहिए?

– अमेरिका और कनाडा के साथसाथ कई पश्चिमी देशों के लोग भी अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते हैं. आजकल हमारे युवा भी या तो उन देशों में नौकरी के कारण वहां जा कर बस गए हैं या फिर भारत में रह कर विदेशी कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं, इसलिए वहां के लोगों के वैवाहिक जीवन का हमारी युवा पीढ़ी पर भी बहुत प्रभाव पड़ रहा है. मगर वे भूल जाते हैं

कि भारत के विपरीत वहां के युवा न तो परिवार और न ही समाज के प्रति उत्तरदायी होते हैं.

15-16 साल की उम्र के बाद ही न वे मातापिता के प्रति कर्तव्यों के लिए बाध्य होते हैं और न ही मातापिता का उन के प्रति कोई कर्तव्य शेष रह जाता है. उन्हें समाज क्या कहेगा, इस का उन्हें कतई भय नहीं होता है.

– फिर अब तलाक लेना भी बहुत आसान हो गया है खासकर महिलाओं के लिए संविधान की धारा 498 के अंतर्गत वे ससुराल पक्ष पर शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगा कर बहुत आसानी से उन से छुटकारा पा सकती हैं. इस के लिए उन्हें कोई प्रमाण दिखाने की भी आवश्यकता नहीं होती है. हां, इस का महिलाओं द्वारा दुरुपयोग करने के कारण लोगों के दबाव डालने पर संविधान के इस कानून में अब संशोधन किया गया है.

– समाज में दिनप्रतिदिन तलाकों की संख्या में बढ़ोतरी भी युवावर्ग को तलाक लेने के लिए प्रेरित कर रही है. ‘दोस्त तलाक ले सकता है तो मैं क्यों नहीं? शायद दूसरा पार्टनर इस से बेहतर मिल जाए’, यह सोच युवावर्ग पर हावी है.

– प्रेम विवाह अधिकतर बिना सोचेसमझे, अपनी मरजी से होता है, इसलिए उसे अपनी मरजी से तोड़ना भी बहुत आसान लगता है, क्योंकि समाज या परिवार का उन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं होता.

– लिव इन रिलेशनशिप भी प्रेम विवाह का ही एक रूप है. महानगरों में इस का चलन खूब जोर पकड़ रहा है. इस में लड़केलड़कियां अपने परिवार को सूचित किए बिना ही स्वेच्छा से एकदूसरे के साथ रहते हैं और आवश्यक नहीं कि साथ रहते हुए वे विवाह के बंधन में बंध ही जाएं. उन्हें रिश्ता टूटने पर तलाक लेने के लिए किसी कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की आवश्यकता नहीं होती है यानी बंधनरहित विवाह में यह बहुत सुखदायी रिश्ता लगता है. लेकिन यह तभी तक ठीक है, जब तक दोनों में तालमेल है, क्योंकि समाज और परिवार की मानसिकता इस रिश्ते की स्वीकृति नहीं देती और उन का सहयोग न मिलने के कारण एक के भी द्वारा रिश्ता तोड़ने पर दूसरा भावनात्मक रूप से आहत हो कर अवसाद में चला जाता है. आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाता है. अभिनेत्री प्रत्यूषा इस का ताजा उदाहरण हैं. उन से पहले जिया खान ने भी यह कदम उठाया था.

2005 में साउथ की प्रसिद्ध अभिनेत्री खुशबू के लिव इन रिलेशनशिप और विवाह से पहले शारीरिक रिश्ता रखने के समर्थन में साक्षात्कार में खुलेआम बोलने पर विरोधियों का कहना था कि इस से हमारे समाज की लड़कियों पर बुरा असर पड़ेगा. अत: उन के विरोध में 22 एफआईआर दर्ज होने के बाद खुशबू द्वारा केस दर्ज करने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई स्त्री और पुरुष साथ रहना चाहते हैं तो उस का विरोध क्यों हो? ऐसा कर के वे क्या अपराध कर रहे हैं? यह लोगों की मानसिकता के अनुसार गलत हो सकता है, लेकिन गैरकानूनी नहीं. संविधान के आर्टिकल 21 में दिए गए मौलिक अधिकार ‘स्वतंत्रता से जीने का अधिकार’ के अंतर्गत यह आता है. यह उन का व्यक्तिगत मामला है.

प्रेम विवाह की तरह 22 मई, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को भी विवाहित रिश्ते के समान वैधानिक घोषित कर दिया था.

तलाक लेने के लिए कानून हमारे हित को ध्यान में रख कर ही बनाया गया है, लेकिन उपयोग के स्थान पर उस का दुरुपयोग भी धड़ल्ले से हो रहा है. मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताडि़त होने पर ही तलाक लेना उचित है. छोटीछोटी बातों को तूल दे कर या कोई दूसरा पसंद आ जाए तो तलाक लेने का परिणाम कभी सुखद नहीं हो सकता. विवाह चाहे किसी भी प्रकार का हो उस की नींव आपसी समझदारी और समझौते पर ही टिकी होती है.

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पश्चिमी देशों के विपरीत हमारे देश में वैवाहिक जीवन में परिवार का जो सहयोग मिलता है वह उसे सफल बनाने के लिए बहुत आवश्यक है.

विवाह सामाजिक बंधन के रूप में ही ठीक है, बिना बंधन के वह बिना पतवार की नौका के समान है, जिस की कोई मंजिल नहीं होती. यहां प्रेम विवाह का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए सुधारात्मक कदम उठाने अति आवश्यक हैं.

मातापिता को अपने बच्चों की भावनाओं को समझ कर उन की पसंद को स्वीकार करते हुए सहयोगात्मक प्रतिक्रिया देनी चाहिए. उन के मार्गदर्शन से ही बच्चों के वैवाहिक जीवन में ठहराव और अनुशासन की कल्पना की जा सकती है.

वर्जिनिटी : भ्रम न पालें

किसी भी युवती के लिए पहले सैक्स के दौरान उस की वर्जिनिटी सब से ज्यादा माने रखती है. युवती की योनि के ऊपरी हिस्से में पतली झिल्ली होती है जो उस के वर्जिन होने का प्रमाण देती है, लेकिन किसी भी युवती की योनि और उस के ऊपरी सिरे में स्थित हाइमन झिल्ली को देख कर यह पता लगाना कि वह वर्जिन है कि नहीं न तो संभव है न ही ठीक. सैक्स के दौरान अकसर पार्टनर द्वारा युवती की योनि से रक्तस्राव की उम्मीद की जाती है लेकिन ज्यादातर मामलों में पाया गया है कि पहली बार सैक्स के दौरान युवती के वर्जिन होने के बावजूद उस की योनि से रक्तस्राव नहीं होता, फिर भी साथी  द्वारा यह मान लिया जाता है कि युवती पहले भी सैक्स कर चुकी है, जबकि पहली बार सैक्स के दौरान युवती की योनि से स्राव होने या न होने को उस के वर्जिन होने का सुबूत नहीं माना जा सकता, क्योंकि पहली बार में बहुत सी युवतियों को इसलिए रक्तस्राव नहीं होता, क्योंकि खेलकूद, साइकिल चलाना आदि की वजह से उन की योनि में स्थित झिल्ली कब फट जाती है उन्हें स्वयं नहीं पता चलता. इस का कारण हाइमन झिल्ली का बहुत पतला व लचीला होना है. कभीकभी युवती में जन्म के समय से ही यह झिल्ली मौजूद नहीं होती. ऐसे में पहले सैक्स के दौरान योनि से रक्तस्राव न होने के आधार पर युवती के चरित्र पर संदेह करना गलत होता है.

पहली बार सैक्स के दौरान युवक अपने साथी से उस के कुंआरी होने का सुबूत भी मांगते हैं, जबकि वह खुद के कुंआरे होने का सुबूत देना उचित नहीं समझते. इस वजह से पहला सैक्स जिसे हम वर्जिनिटी का नाम देते हैं, आगे चल कर सैक्स संबंधों में बाधा बन जाता है. युवती की वर्जिनिटी पर शक की वजह से कई तरह की गलतफहमियां जन्म लेती हैं. इस का प्रमुख कारण कुंआरेपन को ले कर लोगों से सुनीसुनाई बातें हैं.

किसी भी युवक या युवती के लिए पहली बार किए जाने वाले सैक्स का जो रोमांच होता है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह एक ऐसी स्टेज है जहां युवकयुवती एकदूसरे के सामने अपने सारे कपड़े उतारने और सैक्स को ले कर होने वाली झिझक को दूर करने की शुरुआत करते हैं. यहीं से युवकयुवती के कुंआरेपन की समाप्ति होती है और यही वह स्टेज है जहां दोनों अपनी वर्जिनिटी खोते हैं.

युवती को अपने कुंआरेपन का सुबूत देने के लिए कई तरह की परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है जोकि सरासर गलत है. अगर युवती पुरुष से कुंआरे होने का सुबूत नहीं मांगती तो उसे भी चाहिए कि अपने साथी पर विश्वास करते हुए उस के कुंआरेपन पर सवाल खड़ा न करे. अकसर युवती के कुंआरेपन को ले कर घरेलू ंिहंसा व तलाक जैसी नौबत भी आ जाती है. अपने चरित्र का प्रमाण देने के लिए युवती को तमाम तरह के सुबूत पेश करने के लिए कहा जाता है.

सैक्स के दौरान वर्जिनिटी को ले कर आने वाले खून की कुछ बूंदों के प्रति पुरुषवर्ग इतना गंभीर होता है कि वह वर्षों से चले आ रहे इस दकियानूसी खयाल से बाहर आने की सोच भी नहीं सकता, जबकि अपने कुंआरेपन को गृहस्थी के बीच का मुद्दा बनाना गलत है. इसलिए युवकयुवतियों को चाहिए कि वे पहले सैक्स को यादगार बनाएं न कि वर्जिनिटी के चक्कर में पड़ कर संबंधों में दरार पैदा करें.

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प्यार और भरोसे से करें शुरुआत

नीरज की अरेंज्ड मैरिज थी, अत: वह अपनी होने वाली पत्नी से कभी मिला नहीं था. ऐसे में नीरज के दोस्त शादी की पहली रात को ले कर नीरज को तमाम तरह की सलाह देने में लगे हुए थे. उस के एक दोस्त ने कहा कि वह अपनी पत्नी के साथ पहली रात के सैक्स यानी सुहागरात में पत्नी के वर्जिन होने का पता लगाने के लिए योनि से रक्तस्राव होने पर जरूर ध्यान दे. अगर रक्तस्राव हुआ तो समझ ले कि पत्नी ने किसी के साथ सैक्स नहीं किया है, अगर नहीं हुआ तो वह पहले सैक्स कर चुकी है.

लेकिन नीरज ने दोस्त की इस बात पर ध्यान न दिया, क्योंकि वह जानता था कि पहले सैक्स में रक्तस्राव होना जरूरी नहीं. इस से यह पता चलता है कि वर्जिन होने के लिए सुबूत देने की जरूरत नहीं होती बल्कि पहली बार किए जाने वाले सैक्स की शुरुआत प्यार और भरोसे के साथ की जाए तो यह न केवल ज्यादा मजा देने वाला होता है, बल्कि इस से रिश्ता और भी गहरा व विश्वसनीय बन जाता है.

बातचीत है जरूरी

सैक्स व मनोरोग विशेषज्ञ डा. मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि कौमार्य खोने के पहले एकदूसरे के बारे में अच्छी तरह से जान लें, क्योंकि सैक्स आनंद के लिए किया जाता है न कि भूख मिटाने के लिए. इसलिए सैक्स को मजेदार बनाने की कोशिश करें, आपस में कामुक बातचीत की शुरुआत हो और धीरेधीरे यह बातचीत शर्म से ऊपर उठ कर सैक्स संबंध के रूप में आगे बढे़. इस तरह सैक्स का मजा दोगुना हो जाता है और पतिपत्नी के बीच शर्म का परदा भी उठ जाता है.

पहले सैक्स को ज्यादा मजेदार व यादगार बनाने के लिए वर्जिनिटी जैसे दकियानूसी खयाल से ऊपर उठ कर शारीरिक व मानसिक संतुष्टि को ज्यादा महत्त्व देना चाहिए. इस के अलावा किसी तरह की अजीबोगरीब उम्मीदें नहीं पालनी चाहिए जिन से जीवन साथी को किसी तरह की ठेस पहुंचे.

कैसी प्रेमिका की चाहत

एक सर्वे के अनुसार 51% युवा प्रेमियों को प्रेमिका की ब्यूटी, 36% को ब्रेन और 15% को प्रेमिका की ब्यूटी विद ब्रेन दोनों का कौंबिनेशन प्रभावित करता है.

प्रेमी प्रेमिका की तरह अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर प्रेमिका को चुनते हैं.

आइए जानें वे क्या पसंद करते हैं अपनी प्रेमिका में :

–       युवा प्रेमी को साफसफाई का खयाल रखने वाली प्रेमिका अधिक पसंद आती है.

–       युवा प्रेमी को प्रेमिका की बौडी लैंग्वेज, बाल, आंखें, मुसकराहट भी अपनी ओर आकर्षित करती है.

–       युवा प्रेमी बहुत होनहार प्रेमिका की चाहत नहीं रखते बल्कि उन्हें हर सामान्य कार्य में रुचि रखने वाली प्रेमिका ज्यादा पसंद आती है.

–       51% युवाओं का मानना है कि उन्हें प्रेमिका की खूबसूरती के अलावा उस का केयरिंग नेचर बहुत प्रभावित करता है.

–       आत्मविश्वासी प्रेमिका युवा प्रेमी को ज्यादा पसंद आती है.

–       अकसर युवक ऐसी प्रेमिका को पसंद करते हैं जो अपना अधिकांश समय उन्हें ही दे.

–       बातबात पर इमोशनल होने वाली पे्रमिका से वे दूरी बनाने में ही भलाई समझते हैं.

–       युवा प्रेमी अकसर ऐसी प्रेमिका चाहते हैं, जो सैक्सी और कौपरेट करती हो.

– रुचि सिंह

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सामान दें सम्मान के साथ

दीवाली पर घर की साफ सफाई के दौरान रागिनी ने अपनी कामवाली को एक पुराना सूटकेस यह कहते हुए दिया कि “ले जा तेरे काम आएगा.” एक सप्ताह बाद वही सूटकेस सोसाइटी के कचरे के अटाले के ढेर में पड़ा देखकर रागिनी का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस दिन से उसने आगे से अपनी मेड को कुछ भी न देने का निश्चय कर लिया.

एक सप्ताह तक फ्रिज में रखी रहने के बाद भी जब घर के किसी सदस्य ने मिठाई नहीं खायी तो गीता ने वह मिठाई अपनी काम वाली को दे दी, कामवाली ने अपनी मालकिन से तो कुछ नहीं कहा परन्तु गेट के बाहर जाकर कुत्तों को खिला दी.

इसी प्रकार रजनी ने घर के कुछ पुराने कपड़े अपने ही घर के सर्वेन्ट क्वार्टर में रहने वाले नौकर को दिए. कुछ दिनों बाद उसी नौकर की पत्नी को उन्हीं पुराने कपड़ों के बदले स्टील के बर्तन खरीदते देखकर उसे बहुत क्रोध आया और उसने अपने नौकर को खूब खरी खोटी सुनायीं.

कामगारों और मालिकों के बीच इस प्रकार की घटनाएं होना बहुत आम बात है जब मालिक का मन रखने के लिए कामवाले उनके द्वारा दिया गया सामान ले तो लेते हैं परन्तु प्रयोग करने के स्थान पर उसे फेंक देते हैं. क्योंकि उन्हें अक्सर वह सामान दिया जाता है जो प्रयोग करने के लायक ही नहीं होता.

क्या कहते हैं कामगार

एक सोसाइटी के कई घरों में काम करने वाली सीमा कहती है, “मेहनत हम चार पैसे कमाने के लिए करते हैं परन्तु घर का कबाड़ देकर मालिक हमें नौकर होने का अहसास कराते हैं आखिर हम भी तो उन्हीं की तरह एक इंसान हैं.”

अनेक घरों में खाना बनाने का काम करने वाली रजनी कहती है,”10 दिन से मैं खुद उस मिठाई को फ्रिज में रखा देख रही थी और 11 वें दिन मालकिन ने वह मिठाई उठाकर मुझे दे दी,”तेरे बच्चे खा लेंगे”.मानो मेरे बच्चे इंसान नहीं जानवर हों.

आमतौर पर कामगारों को दिये जाने वाले सामान में खाद्य पदार्थ, पहनने के कपड़े और घरेलू सामान होता है. अक्सर उन्हें वह सामान दिया जाता है जो हमारे लिए अनुपयोगी होता है परन्तु कोई भी सामान देने से पूर्व यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि वह सामान एकदम बेकार और कचरे में फेंकने योग्य तो नहीं है.

ध्यान रखने योग्य बातें

-पुराने कपड़े देते समय यह सुनिश्चित करें कि वह मैला, कुचला, फटा न हो. यदि कहीं से सिलाई खुली है तो उसे सिलकर, धो और प्रेस करा कर ही दें.

-कई दिनों तक फ्रिज में रखने के बाद कोई भी खाद्य पदार्थ देने के स्थान पर उपयोग करने के बाद अगले दिन ही उन्हें दे दें ताकि समय रहते वे उसे प्रयोग कर सकें.

-सदैव ध्यान रखें जिस खाद्य पदार्थ को आप स्वयम नहीं खा सकते उसे उन्हें भी क्यों देना क्योंकि वे भी आपकी तरह ही एक इंसान ही हैं.

-कोई भी घरेलू सामान यदि एकदम टूटी फूटी हालत में है तो उसे कामगारों को देने के स्थान पर कचरे में फेंक दें.

-अरे ये तो सब खा लेते हैं या सब पहन ओढ़ लेते हैं जैसी ओछी बातें सोचकर उनके आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचाएं.

-किसी भी सामान को उन्हें देने से पूर्व उनसे पूछें कि वह उनके काम का है भी या नहीं.

-सबसे जरूरी बात कि आप उन्हें भी अपने जैसा ही एक इंसान समझें और उसी अनुरूप उनसे व्यवहार भी करें.

सदियों के बाद हमारे समाज के कामगार वर्ग को आज थोड़ा ही सही पर वो सम्मान प्राप्त होने लगा है जिसके वे वास्तव में हकदार हैं..इसे वे स्वयम तो आसानी से नहीं जाने देंगे परन्तु हम मालिकों कभी दायित्व है कि उनके इस सम्मान को बरकरार रखें.

मार से नहीं सुधरते बच्चे

कभी खिलौने तोड़ने, कभी होमवर्क न करने, कभी टीवी ज्यादा देर तक देखने, कभी सुबह जल्दी न उठने को ले कर हर बच्चे को कभी न कभी बचपन में अभिभावकों से अवश्य मार पड़ी होगी. जब बच्चे पेरैंट्स के अनुसार काम नहीं करते तो पेरैंट्स को गुस्सा आता है और गुस्से में वे पहले बच्चों को डरातेधमकाते हैं और जब ऐसा करने से बात बनती नहीं दिखती, तो वे बच्चों पर हाथ उठा देते हैं. पेरैंट्स ऐसा करते समय सोचते हैं कि वे ऐसा बच्चों की भलाई के लिए कर रहे हैं, उन्हें सुधारने के लिए कर रहे हैं. पर क्या बच्चों पर हाथ उठाना सच में बच्चों की भलाई के लिए होता, आइए जानते हैं :

हाथ उठाने के पीछे कारण :

साइकोलौजिस्ट प्रांजलि मल्होत्रा के अनुसार, ‘‘पेरैंट्स को लगता है कि बच्चों को मारना उन को सिखानेसमझाने का तरीका है, मारने से वे समझ जाएंगे और दोबारा वही गलती नहीं करेंगे. लेकिन, ऐसा नहीं है.

‘‘कई बार तो बच्चे यह भी नहीं समझ पाते कि उन्हें मार किस बात पर पड़ी है. कई बार बच्चे अकारण भी मार खा जाते हैं. बच्चों पर हाथ उठाने से न सिर्फ उन्हें शारीरिक रूप से चोट पहुंचती है बल्कि वे मानसिक रूप से भी कमजोर पड़ जाते हैं.

‘‘कई मामलों में बच्चों पर हाथ न उठा कर यदि प्यार से समझाया जाए तो उन पर सकारात्मक प्रभाव होता है. शारीरिक हिंसा बच्चों को गलत रास्ता दिखाती है. साथ ही, बच्चे यह समझ बैठते हैं कि सभी समस्याओं का हल केवल एक हाथ उठाने से हो सकता है. ऐसे में वे अपने आसपास दोस्तों के साथ भी मारपीट का रवैया अपनाने लगते हैं.’’

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हाउसवाइफ ज्यादा उठाती हैं हाथ :

मुंबई के एक एजुकेशनल गु्रप पोद्दार इंस्टिट्यूट औफ एजुकेशन द्वारा देश के 10 शहरों में किए गए सर्वे के अनुसार, घर में रहने वाली मांएं बच्चों पर पुरुषों की तुलना में अधिक हाथ उठाती

हैं. हैरानी की बात यह है कि 77 प्रतिशत मामलों में मां ही बच्चों को पीटती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि कामकाजी महिलाओं के पास बच्चों के लिए बहुत कम समय होता है, इसलिए वे कम हाथ उठाती हैं जबकि हाउसवाइफ बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताती हैं, इसलिए उन की गलतियों को ले कर वे ज्यादा सख्त होती हैं.

रिश्ते में आ सकती हैं दूरियां :

बच्चों को मार खाना न केवल अपमानित लगता है बल्कि मार उन्हें अशांत या डरपोक बना सकती है. बातबात पर हाथ उठाने से जहां कुछ बच्चे उग्र हो जाते हैं वहीं कुछ बच्चे हर समय डरेसहमे रहने लगते हैं, वे किसी से बात करने से भी कतराने लगते हैं. बड़े होने पर ये सारी समस्याएं उन के विकास में बाधक बन सकती हैं. बारबार मारने से बच्चों में पेरैंट्स का डर खत्म हो जाता है और हो सकता है आप का यह व्यवहार आप के और बच्चों के रिश्ते में दूरियां भी ला दे.

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बेटी नहीं बेटे की परवरिश पर भी दें ध्यान

“मां, मुझे अपनी सहेली निशा के घर जाना है आज. उस ने क्लास में बहुत अच्छा नोट बनाया है. कल टैस्ट है. एक बार उस के घर जा कर पढ़ आती हूं. पास ही तो रहती है. स्कूटी से तुरंत जा कर आ जाऊंगी,’’ राशि ने अपनी मां सुधा से कहा.

‘‘यह कोई वक्त है लड़कियों का घर से बाहर निकलने का? देख रही हूं सुधा तूने इसे कुछ ज्यादा ही छूट दे रखी है. कुछ ऊंच-नीच हो जाएगी, तो सिर धुनती रहना जीवन भर,’’ मां के कोई जवाब देने से पहले ही राशि की दादी बोल उठीं.

‘‘तुम्हें क्लास में ही उस से नोट ले लेना चाहिए था. आखिर रात होने का तुम ने इंतजार ही क्यों किया?’’ पापा ने घर में घुसते ही कहा.

‘‘बेटा, उस नोट को छोड़, खुद नोट बना ले. अब रात के 9 बजे तुम्हारा बाहर जाना उचित नहीं,’’ मां ने भी समझाया.

मन मसोस कर राशि अपने कमरे में जा कर पढ़ने बैठ गई.

करीब 1 घंटे के बाद राशि का भाई अपने कमरे से निकला और मां से बोला, ‘‘मां, शाम से बाहर नहीं निकला हूं, एक चक्कर लगा कर आता हूं,’’ और फिर बाइक ले बाहर चला गया. कहीं से कोई आवाज नहीं आई. किसी ने उस से कुछ नहीं पूछा या कहा.

दोहरी सोच

आम भारतीय घरों में कमोबेश यही स्थिति होती है. बेटी को तो हर समय आचारव्यवहार सिखाते रहेंगे. कभी दूसरे के घर जाने के नाम पर तो कभी जमाना बहुत खराब है के नाम पर. ऐसे न बोलो, ऐसे न चलो, ऐसे न करो आदि की लंबी सूची होती है बेटियों को सिखाने के लिए. कभी सीधेसीधे तो कभी घुमाफिरा कर बेटियों को बताया जाता है कि रास्ते में शोहदों को कैसे नजरअंदाज करना है. कोई फबती कसे तो कैसे चुपचाप कोई बखेड़ा खड़ा किए निकल लेना चाहिए. अगर कोई ऊंचनीच हो भी जाए तो गलतियां खोज कर लड़की को ही कुसूरवार ठहराया जाता है कि उस ने कपड़े ही ऐसे पहन रखे थे या रात के वक्त भला कहीं अच्छे घर की लड़कियां बाहर घूमती हैं? अखबार में छपी बलात्कार क ी खबरों को सुना कर उन्हें और भीरु बनाया जाता है. मगर बेटों के लिए यही सोच है कि अरे लड़का है इस के लिए क्या सोचना. कोई लड़की है क्या जो फिक्र की जाए कि कहां जा रही है? क्या कर रही है? दरअसल, परेशानी इसी सोच से है.

क्या ऐसा नहीं लगता कि परेशानी दरअसल लड़कों से ही है? क्या आप ने कभी सुना है कि कुछ लड़कियों ने मिल कर एक लड़के के साथ छेड़खानी की, बलात्कार किया या कुछ ऐसा ही और? नहीं न? सड़कों पर तेजी से दोपहिया वाहन चलाते हुए कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो दुर्घटनाग्रस्त या मरने वाले भी ज्यादातर लड़के ही होते हैं जबकि दोपहिया अब तो लड़कियां भी चलाती हैं.

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बचपन से ही सिखाएं

लड़कियां शुरू से ही बहुत समझदार और संवेदनशील होती हैं. अब कुछ ज्ञान लड़कों को भी दिया जाना चाहिए. बेटों से बचपन से ही कहा जाता है, ‘अरे लड़की हो क्या जो रो रहे हो?’ ‘डरपोक, तुम लड़की हो क्या?’ ‘चूडि़यां पहन रखी हैं क्या?’ ‘अरे, तुम किचन में क्या कर रहे हो?’ वगैरहवगैरह. ऐसा बोल कर उन्हें शुरू से ही संवेदनहीन बना दिया जाता है.

बेटों को भी बचपन से ही सिखाना चाहिए कि लड़कियों की इज्जत करें. मां का यह कर्तव्य है कि अपने जिगर के टुकड़े को सिखाए कि राह चलती लड़कियों को घूरा न जाए. उन्हें कैसे इज्जत दी जाए.

दोष किस का

घर में बेटियों को नालायक लड़कों से बचने के गुण सिखाने के साथसाथ बेटों को लायक बनने के गुण भी बताए जाएं. बच्चे तो बच्चे होते हैं, कच्ची मिट्टी की तरह. जैसा चाहें हम उन्हें गढ़ सकते हैं, जैसा चाहें हम उन में सोच रोपित कर दें. फिर क्या लड़का और क्या लड़की.

आज जब हम किसी सड़क छाप मजनू या किसी बलात्कारी अथवा हिटलरशाही पति को देखते हैं, जो मनमानी करने को अपना हक समझता है, तो यह समझ लेना चाहिए कि दोष उस की परवरिश का भी है. सुधा ने तो बेटी को बाहर नहीं जाने दिया कि कुछ अनर्थ न हो जाए पर हो सकता है उस का भोला सा दिखने वाला लाल ही बाहर कोई अनर्थ कर आया हो.

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पिता के अमीर दोस्त, मां के गरीब रिश्तेदार

रिश्तों की अपनी अहमियत होती है. बिना रिश्तेदारों के जिंदगी नीरस हो जाती है व अकेलापन कचोटने लगता है. जिंदगी में अनेक अवसर ऐसे आते हैं जब रिश्तों के महत्त्व का एहसास होता है.

अकसर देखने में आता है कि किशोरकिशोरियां उन रिश्तेदारों को ज्यादा अहमियत देते हैं जो आर्थिक रूप से ज्यादा संपन्न होते हैं और गरीब रिश्तेदारों की उपेक्षा करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते, गरीब रिश्तेदारों को अपने घर बुलाना उन्हें अच्छा नहीं लगता. वे खुद भी उन के घर जाने से कतराते हैं. भले ही बर्थडे पार्टी या शादी हो, अगर जाते भी हैं तो बेमन से.

आज के किशोरकिशोरियों में एक बात और देखने को मिलती है. वे अपने पिता के अमीर दोस्तों का दिल से स्वागत करते हैं. अपने मातापिता की बर्थडे पार्टी या मैरिज ऐनिवर्सरी में वे उन्हें खासतौर से इन्वाइट करते हैं. उन की पसंद की चीजें बनवाते हैं, लेकिन मां के गरीब रिश्तेदारों को बुलाना जरूरी नहीं समझते. यदि मां के कहने पर उन्हें बुला भी लिया, तो उन के साथ उन का बिहेवियर गैरों जैसा रहता है.

सुरेश के मम्मीपापा की मैरिज ऐनिवर्सरी थी. सुरेश और उस की बहन सुषमा एक महीना पहले ही तैयारियों में जुट गए थे. दोनों ने मिल कर मेहमानों की लिस्ट तैयार की और अपनी मम्मी को दिखाई.

लिस्ट में पिता के सभी अमीर दोस्तों का नाम शामिल था. मां को लिस्ट देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ. वे बोलीं, ‘‘अरे, तुम दोनों ने अपने मामामामी, मौसामौसियों के नाम तो लिखे ही नहीं. केवल मुंबई वाले मौसामौसी का ही नाम तुम्हारी लिस्ट में है.’’

यह सुनते ही सुरेश का चेहरा तमतमा उठा. वह बोला, ‘‘मैं आप के गरीब रिश्तेदारों को बुला कर अपनी व पापा की नाक नहीं कटवाना चाहता. न उन के पास ढंग के कपड़े हैं न ही उन्हें पार्टी में मूव करना आता है. क्या सोचेंगे पापा के दोस्त?’’

यह सुन कर मम्मी का चेहरा उतर गया. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि उन का बेटा ऐसा सोचता होगा. उन की मैरिज ऐनिवर्सरी मनाने की सारी खुशी काफूर हो चुकी थी.

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सुरेश के पिता ने भी सुरेश और सुषमा को बहुत समझाया कि बेटे रिश्तेदार अमीर हों या गरीब, अपने होते हैं. हमें अपने हर रिश्तेदार का सम्मान करना चाहिए.

सुरेश ने मातापिता के कहने पर मम्मी के रिश्तेदारों को इन्वाइट तो कर लिया पर मैरिज ऐनिवर्सरी वाले दिन जब वे आए तो उन से सीधे मुंह बात तक नहीं की. वह पापा के अमीर दोस्तों की आवभगत में ही लगा रहा.

सुरेश की मम्मी को उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर रंग में भंग न पड़ जाए, इसलिए वे शांत रहीं और स्वयं अपने भाई, भाभी और अन्य रिश्तेदारों की खातिरदारी करने लगीं.

मेहमानों के जाने के बाद सुरेश और सुषमा मम्मीपापा को मिले गिफ्ट के पैकेट खोलने लगे. उन्होंने मामामामी के गिफ्ट पैकेट खोले तो उन्हें यह देख कर बड़ा ताज्जुब हुआ. उन के दिए गिफ्ट सब से अच्छे व महंगे थे. रोहिणी वाले मामामामी ने तो महंगी घड़ी का एक सैट उपहार में दिया था और पंजाबी बाग वाली मौसीमौसा ने मम्मीपापा दोनों को एकएक सोने की अंगूठी गिफ्ट की थी, जबकि पापा के ज्यादातर अमीर दोस्तों ने सिर्फ बुके भेंट कर खानापूर्ति कर दी थी.

सुरेश व सुषमा ने अपने मम्मीपापा से माफी मांगते हुए कहा, ‘‘हमें माफ कर दीजिए. हम गलत थे. जिन्हें हम गरीब समझ कर उन का अपमान करते थे, उन का दिल कितना बड़ा है, यह आज हमें पता चला. आज हमें रिश्तों का महत्त्व समझ आ गया है.’’

ऐसी ही एक घटना मोहित के साथ घटी जब उसे गरीब रिश्तेदारों का महत्त्व समझ में आया. मोहित के पापा बिजनैस के सिलसिले में मुंबई गए हुए थे. एक दिन अचानक उस की मम्मी को सीने में दर्द उठा. मम्मी को दर्द से तड़पता देख मोहित ने पापा के दोस्त हरीश अंकल को फोन मिलाया और अस्पताल चलने को कहा तो उन्होंने साफ कह दिया, ‘‘बेटा, रात को मैं कार ड्राइव नहीं कर सकता, तुम किसी और को बुला लो.’’

मोहित ने पापा के कई दोस्तों को फोन किया, पर सभी ने कोई न कोई बहाना बना दिया. मोहित की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करे. अचानक उसे मम्मी के चचेरे भाई का खयाल आया जो पास में ही रहते थे. उस ने उन्हें फोन पर मम्मी का हाल बताया तो वे बोले, ‘‘बेटा, तुम परेशान मत हो, मैं तुरंत आ रहा हूं.’’

चाचाजी तुरंत मोहित के घर पहुंच गए. वे अपने पड़ोसी की कार से आए थे. वे मोहित की मम्मी को फौरन अस्पताल ले गए. डाक्टर ने कहा कि उन्हें हार्टअटैक पड़ा है. अगर अस्पताल लाने में थोड़ी और देर हो जाती तो उन्हें बचाना मुश्किल था.

यह सुनते ही मोहित की आंखों में आंसू आ गए. उसे आज रिश्तों का महत्त्व समझ में आ गया था. पिछले दिनों इन्हीं चाचाजी की बेइज्जती करने से वह नहीं चूका था.

किशोरकिशोरियों को रिश्तों के महत्त्व को समझना चाहिए. अमीरगरीब का भेदभाव भूल कर सभी रिश्तेदारों से अच्छी तरह मिलना चाहिए. उन्हें पूरा सम्मान देना चाहिए.

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रिश्तों में मिठास घोलें

रिश्ते अनमोल होते हैं. किशोरकिशोरियों को मां के गरीब रिश्तेदारों को भी इज्जत देनी चाहिए. उन के यहां अगर कोई शादी या अन्य कोई फंक्शन हो तो जरूर जाना चाहिए. ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहिए कि उन्हें अपनी बेइज्जती महसूस हो. चाचाचाची, मामामामी, मौसामौसी से समयसमय पर फोन पर या उन के घर जा कर हालचाल लेते रहना चाहिए, इस से रिश्तों में मिठास घुलती है और रिश्तेदार हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं.

रिश्तेदारों के बच्चों से भी बनाएं संपर्क

किशोरकिशोरियों को चाहिए कि वे अपने गरीब रिश्तेदारों से न केवल संपर्क बनाए रखें बल्कि उन के बच्चों से भी दोस्त जैसा व्यवहार रखें. उन से फेसबुक, व्हाट्सऐप द्वारा जुड़े रहें. परिवार के फोटो आदि शेयर करते रहें. उन्हें कभी इस बात का एहसास न कराएं कि वे गरीब हैं. चचेरे व ममेरे भाईबहनों से भी अपने सगे भाईबहन जैसा ही व्यवहार करें. इस से उन्हें भी अच्छा लगेगा. आजकल वैसे भी एकदो भाईबहन ही होते हैं. कहींकहीं तो एक भी भाई या बहन नहीं होता. ऐसे में कजिंस को अपना सगा समझें और उन के साथ लगातार संपर्क में रहें.

छुट्टियों में रिश्तेदारों के घर जाएं

स्कूल की छुट्टियों में अपने मम्मीपापा के साथ रिश्तेदारों के घर जरूर जाएं. खासतौर से मम्मी के गरीब रिश्तेदारों के घर. जब आप उन के घर जाएंगे तो उन्हें अच्छा लगेगा. उन के बच्चों यानी अपने कजिंस के लिए कोई न कोई गिफ्ट जरूर ले जाएं. इस से आपस में प्यार बढ़ता है.

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‘मैं’ फ्रैंड से कैसे निबटें

हम सब के फ्रैंडसर्कल में ऐसे फ्रैंड्स जरूर होते हैं जो हमेशा अपनी तारीफ करते रहते हैं जैसे ‘मेरा फोन सब से अच्छा है, इस में सैल्फी बहुत अच्छी आती है. मेरे पास भी एकदम ऐसी ही ड्रैस है, तुम्हारी थोड़ी सस्ती क्वालिटी की है, लेकिन मैं ने तो काफी महंगी खरीदी थी.

कोई उन की बात सुने चाहे न सुने, लेकिन वे अपनी बात जरूर कहते हैं. कई बार तो ऐसा भी होता है कि उन्हें आते देख सब इधरउधर हो जाते हैं कि कौन इस की बात सुन कर बोर हो?

क्या करते हैं ऐसे फ्रैंड्स

दरअसल, हम ऐसे फ्रैंड्स को ‘मैं’ फ्रैंड कह सकते हैं. सामने वाले की चीज कितनी भी अच्छी क्यों न हो ये उस की तारीफ करने के बजाय अपनी ही तारीफ करते हैं. इन्हें लगता है कि इन के पास जो है वही अच्छा है.

‘मैं’ फ्रैंड बनना नुकसानदायक

भले ही आप अपने फ्रैंडसर्कल में अपनी बात मनवा कर खुद को श्रेष्ठ साबित करते होंगे, लेकिन ‘मैं’ फ्रैंड बनने के नुकसान भी हैं. आप के फ्रैंड्स आप से बातें शेयर नहीं करते. उन्हें लगता है कि आप से शेयर कर के क्या फायदा. अगर इस से कुछ कहेंगे तो भी यह सौल्यूशन देने के बजाय अपनी ही तारीफ करेगा.

अगर आप के सर्कल में भी कोई ‘मैं’ फ्रैंड है तो क्या करें

कटें नहीं फेस करें : अकसर ‘मैं’ फ्रैंड को जानने के बाद हम उस से कटने लगते हैं, उस से अलग रहने की कोशिश करने लगते हैं, सोचते हैं क्यों अपना मूड खराब करें. ऐसा करना गलत है. ऐसा कर के आप अपने लिए एक सुरक्षित दायरा बनाने लगते हैं और आप को इस तरह की पर्सनैलिटी के साथ ऐडजस्ट करने में प्रौब्लम होने लगती है इसलिए कटने के बजाय सामना करना सीखें. अपने ‘मैं’ फ्रैंड के सामने अपनी बात रखिए. भले ही वे आप की बात को बारबार काट, लेकिन अपनी बात पूरी करें.

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पहली ‘मैं’ में सहमति जताएं लेकिन दूसरी में नहीं : अगर आप कहीं बाहर घूमने गए हैं और आप के साथ ‘मैं’ फ्रैंड भी है तो मुंह न बनाते रहें कि इसे क्यों साथ ले कर आए हो बल्कि धैर्य से काम लें. किसी बात पर रिऐक्ट न करें. अगर वह कहे कि मुझे यह नहीं खाना, मैं यह नहीं खाता तो उस से कहें कि पिछली बार हम ने तुम्हारी पसंद की डिश खाई थी, इस बार तुम हमारी पसंद की डिश खाओ.

कभी-कभी नजरअंदाज करना भी सही है : कभी-कभी आप अपने ‘मैं’ फ्रैंड की बातों को अनसुना भी करें. वह कुछ कहे तो ऐसे बिहेव करें जैसे कि आप ने कुछ सुना ही नहीं ताकि धीरेधीरे उसे समझ आए कि आप उस की बातों में रुचि नहीं दिखा रहे और वह खुद को बदलने का प्रयास करे.

ग्रुप में न समझाएं : आप अपने ‘मैं’ फ्रैंड से परेशान हैं इस का मतलब यह नहीं है कि आप ग्रुप बना कर समझाएं या ग्रुप में सब के सामने कहें, बल्कि अकेले में मौका देख कर कहें क्योंकि किसी को भी यह अच्छा नहीं लगेगा कि सब के सामने आप उस की कमियां गिनवाएं.

खुद से पहल कर के बताएं : हम अपने फ्रैंड को उस की कमियों व खराब आदतों के बारे में नहीं बताते, क्योंकि हमें लगता है कि अगर हम बताएंगे तो उसे बुरा लगेगा और हमारी दोस्ती में दरार आ जाएगी. लेकिन इन बातों को सोचने के बजाय पहल कर के अपने फ्रैंड की कमियों को बताएं ताकि वह इन आदतों को सुधार सके.

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चाइल्ड फ्री ट्रिप

मुंबई निवासी सुनीता के बच्चे 9वीं क्लास में थे, तो वे और उस के पति निलिन पुणे एक शादी में गए थे. शादी में जाना जरूरी था और बच्चों की परीक्षाएं थीं. बहुत सोचविचार के बाद पतिपत्नी बच्चों को खूब सम झाबु झा कर मेड को निर्देश दे कर 2 रातों के लिए पुणे चले गए थे.

वे बताती हैं, ‘‘पहले तो मेरा मन ही उदास रहा कि बच्चों को कोई परेशानी न हो जाए, हम सोसाइटी में भी नएनए थे. मैं भी कई दिन से घर में बोर हो रही थी. इस से पहले बच्चों को कभी अकेला नहीं छोड़ा था. पर जब चले गए तो हैरान रह गई. बेकार की जिस चिंता में मैं डरतेडरते गई थी, पहली रात में ही बच्चों से बात कर के इतनी खुशी हुई जब देखा दोनों मस्त हैं, अपनाअपना काम कर रहे हैं, हमारे बिना सब मैनेज कर लिया है, उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई है. तब जा कर मैं ने अपनी पहली चाइल्ड फ्री ट्रिप जी भर कर ऐंजौय किया. उस के बाद तो हम अकसर 1-2 रात के लिए दोनों घूम

आते, बच्चों ने भी यही कहा कि हम तो स्कूलकालेज में उल झे रहते हैं, आप लोग आराम से जाया करें.

‘‘बच्चे जब फ्री हुए तो उन के साथ कभी चले गए वरना फिर तो हम 2-3 रातों से 1 हफ्ते के ट्रिप पर भी आ गए और अब अकसर जाते रहते हैं. कुछ दिन वी टाइम बिता कर फ्रैश हो कर वापस लौटते हैं. मन खुश रहता है.’’

अब तो कोरोनाकाल के चलते लौकडाउन में फैमिली टाइम कुछ ज्यादा ही हो गया. बहुत से लोगों पर वर्क फ्रौम होम का काफी प्रैशर रहा, घर के अन्य सदस्यों की जरूरतें और बच्चों की औनलाइन क्लासेज के चलते पतिपत्नी को एकदूसरे के साथ बिताने के लिए फुरसत के पल बहुत ही मुश्किल से मिल रहे थे. दोनों पर काम का काफी प्रैशर रहा. शायद यही कारण है कि कुछ नौर्मल होने पर पतिपत्नी एकदूसरे के साथ कुछ क्वालिटी टाइम बिताने के लिए बच्चों के बिना ट्रिप प्लान करते दिखाई दिए जो शायद जरूरी भी हो गया था.

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एक मजेदार किस्सा

नीता तो अपना एक मजेदार किस्सा बताते हुए कहती हैं, ‘‘एक बार पति अपने औफिस की किसी मीटिंग में दूसरे शहर जा रहे थे. वहां मेरी एक अच्छी फ्रैंड रहती थी, मेरा मन हुआ कि मैं भी चली जाऊं और उस से मिल आऊं. एक ही बेटा है जो उस टाइम 8वीं क्लास में था. उस के दोस्त की मम्मी ने कहा कि बेटे को उन के पास छोड़ कर जा सकती हूं.

‘‘मैं एक रात के लिए चली गई. बेटे ने टाइम अपने फ्रैंड के घर इतना ऐंजौय किया कि उस के बाद कई दिन तक कहता रहा कि मम्मी, वापस किसी फ्रैंड के यहां मिलने जाओगी तो मैं रह लूंगा. उस के बाद हम पतिपत्नी जब भी बाहर गए, वह अकेला होने पर कभी अपने दोस्तों को बुला लेता, कभी उन के घर चला जाता. हम भी एक छोटा हनीमून टाइप चीज मना आते और बेटा भी अपना टाइम बढि़या ऐंजौय करता.’’

बहुत सारी हौस्पिटैलिटी इंडस्ट्री एडल्ट्स को इस तरह का टाइम बिताने के लिए कई तरह के औप्शंस और औफर देती रहती हैं. लग्जरी रिजौर्ट्स बढ़ते जा रहे हैं. कुछ एअरलाइंस तो छोटे बच्चों से दूर बैठने के लिए सीट्स चुनने का भी औप्शंस देती हैं. आइए अब इसी ट्रैंड पर बात करते हैं:

प्राइवेसी भी मस्ती भी

बच्चों के बिना पतिपत्नी का अकेले ट्रिप पर जाना नई बात नहीं है. 90 के दशक में कैरेबियन सिंगल्स रिजोर्ट ने इस आइडिया को सामने रखा था. यह ट्रैंड किसी को भी एक रूटीन से हट कर अपनी पर्सनल स्पेस देने की बात करता है. चाहे सनसैट क्रूसेस पर जाना हो, शानदार स्पा ट्रीटमैंट हो, किसी भी तरह की रोचक ऐक्टिविटी प्लान की जा सकती है.

आजकल इंडिया में यह ट्रैंड काफी कारणों से चलन में है. व्यस्त रूटीन, बच्चों की देखभाल और उन के कभी न खत्म होने वाले काम और अन्य जिम्मेदारियां निभातेनिभाते आजकल एडल्ट्स एकदूसरे के साथ टाइम बिताना भूल ही जाते हैं या चाह कर भी बिता नहीं पाते हैं. आजकल दोनों जब इस तरह का प्लान बनाते हैं, अच्छी जगह पर प्राइवेसी की आशा रखते हैं.

वी टाइम ऐंजौय

इंडिया में अकसर पार्टनर्स गोवा, जयपुर, कूर्ग और नौर्थ के हिल स्टेशंस पर जाना पसंद करते हैं. आजकल कई लोग थाईलैंड, मैक्सिको और सैशल्स जाना पसंद कर रहे हैं. एडल्ट्स औनली हौलिडेज में कैंडल लाइट डिनर्स,

स्कूबा डाइविंग, जंगल सफारीज और रेन फौरेस्ट का मजा लिया जा सकता है. पार्टनर्स अब वी टाइम को ऐंजौय करना चाहते हैं और कर भी रहे हैं.

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एडल्ट औनली हौलिडेज प्लान

– जहां भी जाना हो, ऐंडवांस में प्लान कर लें. ऐन मौके पर बुकिंग की परेशानी हो सकती है.

– दोनों मिल कर ऐसी चीजों को ऐक्स्प्लोर करें जिन में दोनों की ही सामान रुचि हो.

– यदि पहली बार बच्चों के बिना जा रहे हैं तो शुरू में 2 या 3 दिनों के लिए ही जाएं.

– अगर आप बच्चों को अकेले छोड़ कर जा रहे हैं तो धीरेधीरे इस आइडिया पर उन से बाते करते हुए कई बातों का ध्यान रखने के लिए सम झाते रहें जिस से वे मैंटली तैयार हो जाएं.

– हर तरह की इमरजैंसी में आप बच्चों से बात करने की पहुंच में हों, इस बात का ध्यान रखें.

– जब बच्चे साथ नहीं हैं, तो कुछ रोमांटिक नए अनुभव ले कर रोमांस रिचार्ज करें.

– कपल स्पा थेरैपी से अपनी इस छुट्टी को यादगार बना सकते हैं.

– अपनी अनुपस्थिति में किसी भरोसे के व्यक्ति को उन्हें बीचबीच में देखने के लिए कह कर जाएं.

– बच्चों को वीडियोकौल कर के उन्हें जुड़े रहने का एहसास दिलाते रहें.

– जिसे बच्चों की केयर करने के लिए कह कर जा रहे हैं, उन्हें बच्चों की मैडिकल केयर के बारे में भी जरूर बता दें.

जादुई झप्पी के 11 फायदे

जादू की मीठी झप्पी सचमुच कितनी जादुई है, इस को वही महसूस कर सकता है, जो अपने प्यार को एक नर्म, सुंदर स्पर्श से अभिव्यक्त करना जानता है. चिकित्सक भी मानते हैं कि कुछ सैकंड के झप्पी या आलिंगन दवा सा प्रभाव दिखाता है.

यों पूरी दुनिया में गले लगा कर झप्पी देनेलेने के तरीके सिखाने वाले क्लब तक बने हुए हैं और आलिंगन से जुड़े अनेक उत्सव पूरी दुनिया में मनाए जा रहे हैं, फिर भी अचानक या किसी बधाई के रूप में एकदूजे को दिया जाने वाला आलिंगन तो अपनेआप में अनूठा है ही.

सार्वजनिक रूप से शुरुआत

सब से पहले सार्वजनिक रूप से आलिंगन को अमेरिका में विधिवत रूप से किया जाना शुरू किया गया था. हालांकि कुछ स्रोतों का कहना है कि जब से दुनिया शुरू हुई प्रेमीप्रेमिका या मित्र आलिंगन करते हैं.

हां, यह बात जरूर है कि सीने से लगाने की यह भावना चोरीछिपे पूरी की जाती होगी और मारे शर्म से कोई इस का लाभ ही नहीं ले पाता होगा, तब किसी जागरूक व्यक्ति ने इस को खूब फैलाया होगा.

फिर भी यह माना जाता है कि लगभग 50 साल पहले यह प्रथा कुछ यूरोपीय छात्रों द्वारा आविष्कृत की गई थी. उस समय बोझिल लैक्चरों से उकता कर कुछ छात्रों द्वारा यह तरीका खोजा गया था.

यूरोप के छात्रों को तकनीकी विषयों ने लगातार सुस्त और निराश कर दिया तो यह उपाय खोजा गया. उन्होंने पठनपाठन के दौरान उदास करने वाले और ऊब पैदा करने वाले सत्र के अवसाद के बाद जम्हाई लेते सहपाठियों को प्यार से हग कर के सत्र खत्म होने का जश्न मनाने का फैसला किया. इस के परिणाम बेहद शानदार रहे थे. हौलेहौले ही सही, यह हग किसी स्वार्थ और विशेष कारण के बिना भी गले लगाने का एक बहाना बनता चला गया.

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पूरे संसार का समर्थन

अब आलिंगन की संस्कृति को पूरे संसार में समर्थन मिल गया है और आज अगर कोई अपने विपरीतलिंगी को भी सब के सामने गले लगा ले तो यह गलत या अनैतिक नहीं माना जाता.

हग करना स्नेह की गरमाहट और प्रेम का आदानप्रदान है. चिकित्सकों और वैज्ञानिकों ने प्रेमी के लिए न केवल गले लगाने के रोमांच, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी पर्याप्त शोध किया है. तो फिर आइए, जानते हैं आलिंगन के लाभ :

मजबूत होता है आत्मविश्वास :

जादू की यह झप्पी सच्चे साथी के रूप में पूर्ण सुरक्षा की भावना अंकुरित करती है. युगल साफ कहते हैं कि जब प्रेमी ने स्नेह से गले लगाया, तो कोई और डर या परेशानी नहीं थी. आलिंगन से आत्मविश्वास मजबूत होता है और आपसी जुड़ाव में भी तीव्र बढ़ोत्तरी होती है.

गले लगाते हुए प्रेमी सुकून और आराम महसूस करते हैं. कई अध्ययनों से पता चला है कि अकसर गले लगाना मानसिक और रचनात्मक विकास को आगे ले जाता है.

थकावट को दूर भगाता है :

अगर आप बहुत ज्यादा थके हुए हैं, तो आप के लिए भी आलिंगन बहुत जरूरी है. आलिंगन में यह माद्दा है कि यह चुटकी में थकान को दूर भगाता है. आलिंगन से दिमाग शांत होता है. आप का ध्यान उस चीज से हटता है जिसे ले कर आप परेशान हैं.

ऐनर्जी बूस्ट करता है :

अगर आप अकेलेपन और आलस्य के शिकार हैं, तो आलिंगन आप के लिए फायदेमंद हो सकता है. खून में बढ़ी औक्सीटोसिन की मात्रा मोरल बूस्टअप करती है. इसलिए आलिंगन के बाद लोग तरोताजा महसूस करने लगते हैं और अकेलेपन का एहसास भी दूर हो जाता है.

स्ट्रेस बूस्टर भी है :

जब कोई अपने बहुत करीबी साथी को गले लगाता है, तो उस के अंदर का सारा तनाव पलक झपकते दूर हो जाता है. यह खून में बढ़ते औक्सीटोसिन का कमाल है. इसलिए कई विशेषज्ञ तनावग्रस्त लोगों को अपने प्रियतम से आलिंगन की सलाह देते हैं.

दिल के लिए लाभप्रद :

अपने किसी खास का नियमित रूप से आलिंगन से दिल की धड़कन नियंत्रित रहती है, जो औक्सीटोसिन और मेटाबौलिज्म का निर्माण करता है. दिल के मरीजों को अपने जीवनसाथी या प्रेमीप्रेमिका को नियमित रूप से हग करना चाहिए.

अनिद्रा का दुश्मन :

आलिंगन को अनिद्रा का दुश्मन माना जाता है. जिन्हें रात में नींद न आती हो या कम नींद आती हो उन्हें अपने प्रिय से प्यार की झप्पी लेनी चाहिए. इस से उन्हें खूब नींद आएगी. विशेषज्ञ कहते हैं कि आलिंगन के बाद बहुत अच्छी नींद आती है और जो लोग खूब हग करते हैं, वे जम कर सोते हैं.

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बढ़ती है मैमोरी पावर :

रिसर्च में यह भी पता चला है कि नियमित रूप से आलिंगन सुख लेने वाले स्त्रीपुरुष की स्मरणशक्ति बहुत लंबे समय तक दुरुस्त रहती है. विशेषज्ञ कहते हैं कि आलिंगन न करने वालों की तुमना में नियमित आलिंगन करने वाले स्त्रीपुरुष की स्मरण शक्ति भी बेहतर होती है.

लंबी उम्र में फायदेमंद :

औक्सीटोसिन के रिसाव से शारीरिक दमखम बढ़ता है. इसलिए नियमित रूप से आलिंगन करना एक औषधि साबित होता है. इस से दिल की धड़कनें नियंत्रित रहती हैं, जिस से औक्सीटोसिन के साथसाथ मेटाबौलिज्म भी बेहतर होता है.

आलिंगन के बाद बहुत अच्छी नींद आती है. वैज्ञानिक दावा करते हैं कि नियमित आलिंगन से उम्र बढ़ती है. इतना ही नहीं, आलिंगन मानसिक स्वास्थ्य भी सही रखता है. अगर कोई उदास है और उस का कोई साथी आ कर उसे हग कर ले तो अच्छा लगता है और उदासी दूर हो जाती है.

सकारात्मक सोच :

आलिंगन से हर किसी की सोच सकारात्मक हो जाती है, क्योंकि इस से दिमाग में सकारात्मक प्रतिक्रिया होती है. इस आधार पर कह सकते हैं कि आलिंगन इंसान की जिंदगी को सकारात्मकता से भर देती है और नियमित आलिंगन करने वाले के स्वभाव से नकारात्मकता दूर हो जाती है.

बेचैनी होती है दूर :

खून में औक्सीटोसिन नाम के हारमोन का जितना ज्यादा रिसाव होगा, कोई भी व्यक्ति उतना ही ज्यादा हैल्दी होगा. यह हारमोन इंसान की बेचैनी को भी खत्म करता है यानी आप अगर बेचैनी महसूस कर रहे हैं तो अपने प्रिय को गले लगा लीजिए, आप की बेचैनी खत्म हो जाएगी.

मेहनती बनाता है :

इटली की एक लोककथा में बताया गया है कि एक कमजोर शरीर वाले युवक को उस की प्रेमिका सीने से लगा कर ऊर्जा देती थी और वह मजदूरी करता था. हौलेहौले उस युवक का शरीर मजबूत हो गया और वह खूब मन लगा कर मेहनत करने लगा. उस के बाद उस युवक ने यह रहस्य अपने दोस्तों से साझा किया और उन्होंने भी अपनी प्रेमिका को हर रोज सीने से लगाने का संकल्प लिया.

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DIWALI 2021: शादी के बाद पहली दीवाली ऐसे बनाएं यादगार

शादी के बाद सृष्टि की पहली दीवाली थी. उस के सासससुर और जेठजेठानी पास ही दूसरे फ्लैट में रहते थे. सृष्टि के पति मनीष को कंपनी की तरफ से अलग मकान दिया गया था जिस में दोनों पतिपत्नी अकेले रहते थे. सृष्टि भी जौब करती थी इसलिए घर में दिन भर ताला लगा रहता था.

औफिस में दीवाली की छुट्टी एक दिन की ही थी पर सृष्टि ने 2 दिनों की छुट्टी ले ली. वह अपनी पहली दीवाली यादगार बनाना चाहती थी. दीवाली वाले दिन मनीष को जरूरी मीटिंग के लिए बाहर जाना पड़ा. मीटिंग लंबी खिंच गई. लौटतेलौटते शाम हो गई. मनीष ने सृष्टि को फोन किया तो उस ने उठाया नहीं. घर लौटते वक्त मनीष यह सोचसोच कर परेशान था कि जरूर आज सृष्टि उस की खिंचाई करेगी या नाराज बैठी होगी.

असमंजस के साथ उस ने घंटी बजाई. दरवाजा खुला पर अंदर अंधेरा था. वह पल भर में ही तनाव में आ गया और जोर से चिल्लाया, ‘‘सृष्टि कहां होयार, आई एम सौरी.’’  तभी अचानक सृष्टि आ कर उस से लिपट गई और धीमे से बोली, ‘‘आई लव यू डियर हब्बी, हैप्पी दीवाली.’’

तभी दोनों के ऊपर फूलों की बारिश होने लगी. पूरे कमरे में रंगबिरंगी कैंडल्स जल उठीं और मनमोहक खुशबू से सारा वातावरण महक उठा. सामने बेहद आकर्षक कपड़ों और पूरे श्रृंगार के साथ सृष्टि खड़ी मुसकरा रही थी. मनीष ने लपक कर उसे बाहों में उठा लिया. सारा घर खूबसूरती से सजा हुआ था. टेबल पर ढेर सारी मिठाइयां और फायरक्रैकर्स रखे थे. सृष्टि मंदमंद मुसकरा रही थी. दोनों ने 1-2 घंटे आतिशबाजी का मजा लिया. तब तक मनीष के मातापिता, भाईभाभी और उन के बच्चे भी आ गए, सृष्टि ने सभी को पहले ही आमंत्रित कर रखा था. पूरे परिवार ने मिल कर दीवाली मनाई. यह दीवाली मनीष और सृष्टि के जीवन की यादगार दीवाली बन गई.

दिलों को भी रोशन करें

इसे कहते हैं पहली दीवाली की रौनक जो घरआंगन के साथसाथ दिलों को भी रोशन कर जाए. शादी के बाद की पहली दीवाली का खास महत्त्व होता है. यदि इस दिन को लड़ाईझगड़ों या तनातनी में गंवा दिया तो समझिए आप ने बेशकीमती लमहे यों ही लुटा दिए. जिंदगी खुशियों को सैलिब्रेट करने का नाम है तो फिर दीवाली जैसे रंग और रोशनी के त्योहार के दिन अपना मनआंगन क्यों न जगमगाएं?

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अक्सर शादी के बाद जब लड़की ससुराल में पहली दीवाली मनाती है तो उसे होम सिकनैस और घरवालों की कमी महसूस होती है. ऐसा होना स्वाभाविक है पर इस का मतलब यह नहीं कि दीवाली जैसे मौके का मजा किरकिरा कर  दें. बेहतर होगा कि नए माहौल और नए लोगों के साथ दीवाली इतने प्यार से मनाएं कि आप का आने वाला समय भी नई खुशियों से रोशन  हो जाए.

इनलौज के साथ करें शौपिंग

मौके को यादगार बनाना है तो अपनी सास या ननद के साथ जी भर कर शौपिंग करें. पूरे परिवार के लिए तोहफे खरीदें. किस के लिए क्या खरीदना है, इस की एक लिस्ट पहले ही बना कर रख लें. इस काम में अपनी सास की सहायता ले सकती हैं. वह आप को पूरे परिवार की पसंदनापसंद बता सकेंगी. सारे गिफ्ट्स खूबसूरती से रैप कर के सरप्राइज के लिए सुरक्षित जगह  पर रख दें. गिफ्ट्स के अलावा मिठाइयां, चौकलेट्स, फायरक्रैकर्स और सजावटी सामानों की शौपिंग भी कर लें.

रोशन करें घर का कोनाकोना

दीवाली रोशनी का त्योहार है इसलिए पूरे घर को दीपों मोमबत्तियों और दूसरे डिजाइनर बल्बस से सजा दें. लाइटिंग अरैंजमैंट ऐसी करें कि आप का घर अलग ही जगमगाता नजर आए.

घर में बनाएं मिठाइयां

यह एक पुरानी मगर सटीक कहावत है कि किसी के दिल तक पहुंचने का रास्ता उस के पेट से हो कर जाता है. शादी के बाद अपने इनलौज व हसबैंड के दिल तक इसी रास्ते पहुंचा जा सकता है. आप को अपनी पाक कला में निखार लाना होगा. स्वादिष्ठ फैस्टिव मील्स और स्वीट्स तैयार करने होंगे. ज्यादा नहीं जानतीं तो अपनी मां या सास की सहायता लेने से हिचकें नहीं. पत्रिकाओं में भी हर तरह की रैसिपीज छपी होती हैं. उन की सहायता लें और सब को खुश कर दें.

दीवाली पार्टी

अपनी पहली दीवाली यादगार बनाने आसपड़ोस के लोगों व रिश्तेदारों को जाननेसमझने व रिश्तों को प्रगाढ़ करने का इस से बेहतर मौका नहीं मिलेगा. घर में दीवाली पार्टी और्गनाइज करें और लोगों को बुला कर खूब मस्ती करें.

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एकल परिवार

यदि आप शादी के बाद किसी वजह से इनलौज से अलग रह रही हैं तो आप की चुनौतियां कुछ अलग होंगी. आप को ध्यान रखना होगा कि जिस प्रकार आप होमसिकनैस महसूस कर रही हैं वैसे ही आप के पति भी परिवार से दूर पहली दफा दीवाली मना रहे हैं. ऐसे में आप को प्रयास करना होगा कि पति को खास महसूस कराएं और उन के लिए खास सरप्राइज तैयार कर के रखें.

इस संदर्भ में आप अपनी मां से यह पूछ सकती हैं कि उन्होंने अपनी पहली दीवाली में क्या खास किया था? अपनी सास को फोन करें और बताएं कि आप ने दीवाली के लिए क्या स्पैशल सरप्राइजेज तैयार किए हैं. उन से कहिए कि वह आप के पति को ज्यादा बेहतर जानती हैं इसलिए आप की सहायता करें. आप की सास यह जान कर स्पैशल महसूस करेंगी कि आप उन के बेटे के जीवन में उन की खास जगह को स्वीकार करती हैं और महत्त्व देती हैं. वह आप की सहायता कर के खुश होंगी.

अपने पति के लिए एक खास दीवाली तोहफा खरीदें. यह कोई गैजेट हो सकता है या नई ड्रैस या फिर अपनी बजट के हिसाब से कुछ और खरीदें. उन की पसंद की मिठाइयां तैयार करें, फैवरिट डिश बनाएं और फिर खास उन के लिए सजें. रात में घर का कोनाकोना रोशन करें. आज के समय में आप स्काइप या फेसबुक आदि की सहायता से इस खास मौके को यादगार बनाते हुए इन लमहों को दूसरों से शेयर भी कर सकती हैं.

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