हैप्पी लाइफ के लिए बनिए स्मार्ट वूमन

रक्षिता एक संयुक्त परिवार की छोटी बहू है. परिवार का रैडीमेड कपड़ों का बड़ा व्यवसाय है, पढ़ीलिखी तो थी ही, सो शादी के बाद वह भी व्यवसाय में मदद करने लगी. जहां उस की 2 जेठानियां घर पर रहतीं, वह हर दिन तैयार हो कर दुकान जाती और बिजनैस में सहभागी होती. परंतु उस की आर्थिक स्वतंत्रता बिलकुल अपनी जेठानियों के ही स्तर की रही. वह एक कर्मचारी की ही तरह काम करती और वित्तीय मामलों में उस के सुझवों को उस के अधिकारों का अतिक्रमण माना जाता है.

रक्षिता को भी इस व्यवस्था में कोई खामी नजर नहीं आती है और घर से बाहर जाने के मिले अधिकार की खुशी में ही संतुष्ट रहती है. उस के ससुर, जेठ या उस के पति यह सोच भी नहीं सकता कि घर की औरतों को आयव्यय, बचत, हिसाब जानने की कोई जरूरत भी है. वहीं कुछ महिलाएं खुद ही यह मान कर चलती हैं कि घर के वित्तीय मामले उन के लिए नहीं हैं.

शर्माजी कोविडग्रस्त हो 75 साल की उम्र में गुजर गए. सबकुछ इतना अचानक हुआ कि उन की पत्नी जिंदगी में आए इस बदलाव से भौचक सी रह गई. आर्थिक रूप से शर्मा दंपती बेहद संपन्न थे. शर्माजी के गुजरने के बाद भी मजबूत बैंक बैलेंस, पैंशन और इंश्योरैंस की मजबूत आर्थिक सुरक्षा थी. परंतु अफसोस यह है कि शर्माजी की पत्नी अपनी आर्थिक सुदृढ़ता से पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं.

विवाह के शुरुआती दिनों से उन्होंने कभी भी यह सीखने या जानने की कोशिश नहीं की कि घर में कितने पैसे आ रहे हैं, कहां खर्च हो रहे हैं या फिर कहां क्या बचत हो रही है. शर्माजी उन के लिए सदा एटीएम बने रहे.

बच्चों पर निर्भरता

बेटे के बड़े होने और अवकाशप्राप्ति के बाद शर्माजी ने बड़ी कोशिश करी उर्मला को अपना वित्तीय स्टैटस समझने की, बैंक और औनलाइन ट्रांजैक्शन समझने की, परंतु उर्मला को यही लगता कि कौन इस झमेले में पड़े, जब उन के पति सब कर ही लेते हैं.

अब जब शर्माजी नहीं रहें तो अचानक वे पूरी तरह अपने बेटे पर निर्भर हो गईं, अकेले रहने लायक वे थी ही नहीं. अब पाईपाई के लिए बेटे पर निर्भरता उन्हें बेहद खलती है पर अब कोई चारा नहीं है.

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उर्मला के विपरीत कंचन बाजपेयी ने देर से ही सही पर सबकुछ सीखा और अपने आत्मसम्मान के साथ एक आत्मनिर्भर जीवन व्यतीत कर रही हैं. यदाकदा जरूरत पड़ने पर बच्चों या किसी और की मदद लेती हैं. वे भी उर्मला की ही तरह गृहिणी थीं और वित्तीय जानकारी उन की भी शून्य ही थी.

यहां बाजपेयी ने कभी बताने की भी जरूरत नहीं समझ थी कि ‘मैं तो हूं’ ही. परंतु मरने से 10 वर्ष पहले जब उन्हें पहली बार हार्टअटैक आया तो अपनी पत्नी की अनभिज्ञता के चलते उन्हें रिश्तेदारों और दोस्तों पर निर्भर होना पड़ा. अस्पताल के बिल चुकाने से ले कर अन्य बातों के लिए. बाद में स्वस्थ होने पर उन्होंने ठान लिया कि पत्नी को सब सिखाना है.

60 वर्षीय कंचन बाजपेयी न सिर्फ एटीएम से पैसे निकालना जानती हैं बल्कि विभिन्न औनलाइन पोर्टल से ट्रांजैक्शन करना भी उन्हें आता है. कहां किस बैंक में कितने पैसे हैं, कौन नौमिनी है, खर्चों के पैसों को किस अकाउंट से निकालना है इत्यादि उन्हें सब पता है. अपनी इस वित्तीय जागरूकता के चलते वे निर्णय लेने की क्षमता भी रखती हैं और बच्चों के घर में एक फर्नीचर की तरह रहने की जगह वे अपने घर में अपनी इच्छानुसार रहती हैं.

आर्थिक गुलामी

आर्थिक आत्मनिर्भरता हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है. अब दिनोंदिन कामकाजी और आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाओं की गिनती बढ़ रही है पर अब भी उन महिलाओं की गिनती अधिक है जो आर्थिक स्वावल?ंबन से दूर हैं. यह लेख मूलतया उन्हीं महिलाओं के लिए है, जो संपन्न होने के बावजूद आर्थिक गुलामी की जिंदगी चुन लेती हैं.

अधिकतर महिलाएं आर्थिक रूप से निर्भर होती हैं चाहे पिता पर, पति पर या फिर पुत्र पर. माइंड कंडीशनिंग कुछ ऐसी होती है महिलाओं

की कि उन्हें बुरा भी नहीं महसूस होता है. मगर उन्हें मालूम होना चाहिए कि यह गुलामी का ही प्रतीक है.

बेटियों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना हर मातापिता का फर्ज है. फिर भी यदि किसी कारणवश एक लड़की आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं प्राप्त कर पाती है तो भी उस का यह हक है कि अपनी गृहस्थी के फाइनैंशियल स्टेटस को पूरी तरह सम?ो.

जरूरतें और मुसीबतें कभी बता कर नहीं आती हैं. हर परिस्थिति के लिए पतिपत्नी को शुरू से प्लानिंग करनी चाहिए और महत्त्वपूर्ण बातों को आपस में शेयर करना चाहिए. पतिपत्नी दोनों को मिल कर अपने भविष्य की तैयारी करनी चाहिए, न कि पति अपनी घरवाली को सिर्फ घरेलू काम की ही इंसान सम?ो. बहुत लोग दोस्तों से, रिश्तेदारों से अपनी वित्तीय जानकारी शेयर करते हैं पर अपनी घरवाली को अनभिज्ञ रखेंगे. घर की महिलाओं को पता ही नहीं रहता है कि आड़े वक्त में पैसे कहां से आएंगे.

कदमकदम पर धोखा

रामकली घर पर ब्लाउज सिलने का काम करती थी. वह कुछ दर्जियों से जुड़ी हुई थी जो उस से सिलवा कर अपने ग्राहकों को देते थे. ठीकठाक कमा लेती थी. वह जो कमाती अपने पति रणबीर के हाथों में दे कर निश्चिंत हो जाती थी जो खुद टैंपो चलाता था. एक दिन रणबीर टेम्पो सहित दुर्घटनाग्रस्त हो गया. आसपास के लोगों की मदद से उसे पास के अस्पताल में भरती करवाने के बाद रामकली को समझ नहीं आ रहा था कि अब वह अस्पताल के बिल कैसे और कहां से भरे.

उस ने पूरा घर छान मारा पर कुछ हजार रुपयों के अलावा उसे कुछ नहीं मिला. रणबीर तो बेहोश था. इसलिए वह कैसे पूछती कि पैसे कहां रखे हैं. नतीजा समय पर पैसे नहीं जमा करने के कारण उस के इलाज में देरी हो गई. सिलाईमशीन छोड़ वह घर का 1-1 समान बेच कर किसी तरह इलाज करवा और सदा के लिए अपंग हो गए पति को घर ला पाई.

बाद में पता चला कि रणबीर अपनी और रामकली की सारी कमाई अपने दोस्त को ब्याज पर उधार दे रखी थी, जिस ने पूरी रकम डकार ली. इस धोखे के बाद रामकली ने फिर से ब्लाउज सिलने शुरू किए तो खुद अपनी कमाई का हिसाबकिताब रखने लगी.

गलती किस की

बिल गेट्स की एक प्रसिद्ध उक्ति है कि यदि आप गरीब परिवार में जन्म लेते हैं तो यह आप की गलती नहीं है पर यदि आप गरीब ही मर जाते हैं तो यह आप की गलती है.

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इसी तर्ज पर यदि कोई महिला पूर्णरूपेण समृद्ध होते हुए भी अपनी नासमझ और अज्ञानता के कारण किसी पर आश्रित हो कर जीती है तो यह उस की गलती है. अपने आसपास ऐसी कई औरतें दिख जाएंगी जो हर तरह से समृद्ध होते हुए भी पति के गुजरने पर बेबस और पराश्रित हो जाती हैं. अफसोस होता है उन की पराधीनता पर. अकसर घरेलू और कई बार कामकाजी कमाऊ पत्नियां भी पति के बताने के बावजूद फाइनैंशियल ज्ञान से बेखबर रहना पसंद करती  हैं. यह गलत है. शुरू से ही पति की सहायिका बन कर सारी जानकारी रखनी चाहिए. बदलते वक्त के साथ खुद को अपडेट भी करते रहना चाहिए. बैंकिंग और टैक्नोलौजी के प्रति आप  की थोड़ी सी जागरूकता भविष्य में बहुत  सहायक होगी.

सरला माथुर 72 वर्ष की आयु में भी काफी सक्रिय रहती हैं. माथुर साहब कुछ वर्षों से बहुत बीमार रहने लगे तो न सिर्फ सरलाजी ने सारी जिम्मेदारियों को अपने पर ले लिया बल्कि बैंक, पोस्ट औफिस, पैंशन और मैडिकल इंश्योरैंस सहित सभी वित्तीय मामलों की लगाम अपने हाथों में थाम लिया. कभी बच्चों के घर जा कर रहने पर भी वे उन पर आश्रित नहीं रहतीं. गृहस्थी की शुरुआत से ही पतिपत्नी के बीच एक मधुर सामंजस्य रहा. जब जिंदगी में जैसी जरूरत पड़ी रोल बदल कर उन्होंने जिंदगी आसान और खुशनुमा बनाए रखी.

यह एक कड़वा सत्य है कि पतिपत्नी में एक को पहले गुजरना है, उम्र में कम होने के चलते ज्यादातर पत्नियां रह जाती हैं. एक तो जुदाई का गम दूसरा अपनी परतंत्रता स्त्रियों पर दोहरी गाज बन गिरती है, इसलिए स्मार्ट वूमन बनिए और जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीते रहने की कला से वाकिफ रहिए. आर्थिक स्वतंत्रता ही सुखद, उन्मुक्त जीवन की कुंजी है ताउम्र. -रीता गुप्ता द्य

लेनदेन का व्यवहार 

लेखक- वीरेंद्र बहादुर सिंह 

“नेहा मेरी नैंसी को तुम ने गुस्से में कुछ कहा क्यों?” गुस्से में लालपीली होते हुए मालती जोरजोर से कह रही थी.

“अरे मालती मैं तो नैंसी और विश्वा, दोनों पर गुस्सा कर रही थी. वह भी इसलिए कि दोनों बहुत धमाल कर रही थीं.” नेहा ने शांति से कहा.

“बच्चे धमाल नहीं करेंगें तो कौन करेगा?” कटाक्ष करते हुए मालती बोली.

“अगर बच्चे इतने ही प्यारे हैं तो अपने घर बुला कर धमाल कराओ न. मुझे नहीं अच्छा लगता. एक तो सभी को संभालो, ऊपर से ताना भी सुनो.” मालती की बातों से तंग आ कर नेहा गुस्से में बोली.

“मुझे सब पता है. नैंसी ने मुझे सब बताया है, जो तुम ने उसे कहा है. तुम ने उसे घर जाने के लिए भी कहा है. यह लड़की समझती ही नहीं, वरना किसी के घर जाने की क्या जरूरत है?”

“किसी के घर नहीं मालती, जिस तरह मैं अपनी विश्वा को रखती हूं,  उसी तरह नैंसी को भी रखती हूं. अगर कभी गुस्सा आ गया तो इसमें क्या हो गया? अगर विश्वा कभी कोई गलती करती है तो मैं उस पर भी गुस्सा करती हूं.”

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दोनों पड़ोसन सहेलियों ने छोटी सी बात पर पूरी कालोनी सिर पर उठा ली थी. एक छोटी सी बात ने बहुत बड़ा रूप ले लिया था. दोनों के गुग्स्से का पारा लिमिट के ऊपर जा रहा था. अगलबगल वाले अपना काम छोड़ कर जुगल जोड़ी कही जाने वाली सहेलियों का झगड़ा देखने लगी थी. वैसे भी जिनके पास कामधाम नहीं होता, इस तरह के लोग किसी के घर आग लगने पर उसे बुझाने के बजाय उसमें तेल डाल कर रोटी सेंकने में माहिर होते हैं. यहां भी लोगों के लिए रंगमंच पर नाटक जमा हुआ था और कोई भी यह मजा छोड़ना नहीं चाहता, इस तरह जमा हुआ था.

देखतेदेखते दोनों पक्षों से उनके पति भी उन्हें शांत कराने के लिए सामने आ गए. अब सभी को और मजा आने लगा था. छोटी सी बात का बतंगड़ बन गया था और छोटे बच्चों को ले कर बड़े झगड़ने लगे थे. कोई ऐसा नहीं था, जो इन लोगों को शांत कराता. हर कोई दोनों ओर से अच्छा बन कर होम में घी डाल कर हाथ सेंकना चाहता था. इस बात को नेहा और मालती समझे बगैर लोगों का मनोरंजन करते हुए मूर्ख बन रही थीं. दोनों के बीच हमेशा छोटी से छोटी चीज को ले कर मित्र भाव से लेनदेन का व्यवहार चलता रहता था. उस दिन भी जब एक शब्द पर दो कटाक्ष भरे शब्दों के बाण द्वारा लेनदेन का व्यवहार चल रहा था. दोनों में से कोई भी समझने को तैयार नहीं था.

उन दोनों का झगड़ा कम होने का नाम नहीं ले रहा था. उसी बीच नैंसी के जोरजोर से रोने की आवाज आई तो सभी का ध्यान उसकी तरफ चला गया. नैंसी और विश्वा आपस में झगड़ रही थीं. उसी की वजह से नैंसी रोने लगी थी. बिटिया को रोते देख मालती का गुस्सा और बढ़ गया. गुस्से में पैर पटकते हुए बेटी के पास जा कर वह लगभग चीखते हुए बोली, “तुम से कितनी बार कहा कि इसके साथ मत खेला करो, क्या किया विश्वा तुम ने?”

“मम्मी आप ने ही तो कहा था कि जिसका लेना चाहिए, उसे वापस भी करना चाहिए. आप नेहा आंटी से कुछ लेती हैं तो ज्यादा ही वापस करती हैं. आप कहती हैं कि इसे लेनदेन का व्यवहार कहा जाता है. मैं भी वही कर रही थी. विश्वा ने कल मुझे अपनी चाकलेट दी थी. अब मैं अपनी चाकलेट दे रही हूं तो यह मना कर रही है. यह कह रही है कि इसकी मम्मी ने कहा है कि अगर दोस्तों को कुछ देते हैं तो उनसे वापस नहीं लेते. इसमें व्यवहार नहीं होता.” रोते हुए नैंसी ने मालती की ओर देखते हुए कहा.

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जिनके लिए अब तक झगड़ा हो रहा था, वे एकदूसरे को खुश करने के लिए परेशान थीं. यह संस्कार भी तो इन्हीं लोगों का दिया हुआ था. इन छोटे बच्चों की समझदारी देख कर मालती और नेहा को अपनी गलती का अहसास हो गया. दोनों ही एकदूसरे से माफी मांगते हुए अपनीअपनी बेटी पर गर्व महसूस करते हुए खुश हो रही थीं. घड़ी भर पहले जो मुस्से की आग बरस लही थी, अब उस पर होने वाली इस प्रेम की बरसात ने वातावरण को एकदम शीतल बना दिया था. जिससे सभी के चेहरे चमक रहे थे.

न बढ़े भाई-बहनों में जलन

सगे भाईबहनों के बीच ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता का भाव यानी एकदूसरे से बेहतर करने की प्रतिस्पर्धा या होड़, जिसे सिबलिंग जेलेसी कहते हैं, में कुछ भी गलत या अजीबोगरीब नहीं है. जब किन्हीं भी 2 लोगों के बीच यह सहज और स्वाभाविक भाव है, तो फिर सगे भाईबहन इस से अछूते कैसे रह सकते हैं? लेकिन जब यह प्रतिस्पर्धा उग्र रूप धारण कर ईर्ष्या में परिवर्तित होने लगती है और सगे भाईबहन एकदूसरे का काम बिगाड़ने और नीचा दिखाने के मौके तलाशने लगते हैं, तो यह निश्चित रूप से मातापिता के लिए चिंता का विषय बन जाता है. अगर हम अपने आसपास झांक कर देखें तो हमें बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे, जिन में सगे भाईबहनों ने ईर्ष्या के चलते एकदूसरे पर जानलेवा हमले तक किए हैं. कुछ नामीगिरामी परिवारों के झगड़े तो घर की दहलीज लांघ कर सड़कों तक पहुंच जाते हैं.

हमारे समक्ष प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या का ताजा उदाहरण हैं दिवंगत धीरूभाई अंबानी के पुत्र मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी. विश्व के 10 अमीर व्यक्तियों की सूची में 5वें और छठे नंबर पर विराजमान इन भाइयों ने स्वयं को दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने की जिद में न केवल सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप लगाए, बल्कि अपने घरेलू और व्यावसायिक झगड़ों को कोर्ट तक ले जाने में भी नहीं हिचकिचाए. अनिल अंबानी ने तो प्राकृतिक गैस विवाद के मामले में मीडिया के समक्ष भारत सरकार के पैट्रोलियम मंत्रालय पर ही सीधेसीधे आरोप लगाया था कि पैट्रोलियम मंत्रालय उन के भाई मुकेश अंबानी की तरफदारी कर उसे निजी लाभ पहुंचा रहा है. उन के इस बयान पर तत्कालीन पैट्रोलियम मंत्री मुरली देओरा ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि मुझे यह देख कर बहुत आश्चर्य हो रहा है कि ये दोनों भाई सार्वजनिक रूप से उस चीज के लिए लड़ रहे हैं, जो उन की है ही नहीं.

उन की मां कोकिलाबेन अंबानी ने शायद दोनों भाइयों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या की भावना को भांप लिया था, इसीलिए उन्होंने पति की मृत्यु के बाद उन के व्यवसाय को दोनों भाइयों में बांट दिया था. लेकिन इस के बावजूद ये दोनों भाई आपसी झगड़ों के लिए निरंतर चर्चा में रहते हैं. एक अन्य खबर के अनुसार, अनिल अंबानी अपने नए घर को 150 मीटर ऊंचा बनाना चाहते हैं (उन के पास स्वीकृति सिर्फ 66 मीटर ऊंचा बनाने की है) क्योंकि उन के भाई मुकेश अंबानी का घर 170 मीटर ऊंचा है. जानीमानी लेखिका शोभा डे ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि यह और कुछ नहीं सिबलिंग राइवलरी है.

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‘सिबलिंग राइवलरी: सैवन सिंपल सौल्यूशंस’ पुस्तक की लेखिका करेन दोहर्टी, जिन के अपने 4 बच्चे हैं, कहती हैं, ‘‘सिबलिंग राइवलरी यानी भाईबहनों के मन में एकदूसरे के लिए ईर्ष्या का भाव एक ऐसा जख्म है, जिस का उपचार न किया जाए तो वह नासूर बन जाता है और रिश्तों में इतनी कड़वाहट पैदा कर देता है कि हम अपने सगे भाईबहनों की तरक्की को भी सहन नहीं कर पाते हैं. उलटे उन की असफलताओं से हमें खुशी मिलती है.’’

प्रतिस्पर्धा की अहमियत

बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए उन के बीच प्रतिस्पर्धा का भाव जरूरी है. छोटे बच्चों में यह प्रतिस्पर्धा उन्हें एकदूसरे के करीब लाती है, एकदूसरे से बेहतर करने की प्रेरणा देती है, जिस से बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायता मिलती है. लेकिन जैसेजैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, यह प्रतिस्पर्धा ईर्ष्या में परिवर्तित होने लगती है और बच्चे एकदूसरे से आगे निकलने की होड़ में एकदूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं या फिर एकदूसरे के काम बिगाड़ते हैं. यह बहुत नाजुक समय होता है, जिस में बच्चों को कदमकदम पर मार्गदर्शन की जरूरत होती है. बच्चों की नकारात्मक सोच को नियंत्रित कर सही दिशा प्रदान करना ही हर मातापिता का कर्तव्य है.

हरकतों पर नजर रखें

मातापिता को बड़े होते बच्चों की हर छोटीबड़ी हरकतों पर नजर रखनी चाहिए. अगर बच्चों की बातों में तनिक भी ईर्ष्या का भाव झलकता है, तो प्यार से समझाबुझा कर उन के बीच पनप रही ईर्ष्या की भावना को उसी समय दबा देना चाहिए. इस के लिए सब से जरूरी है कि मातापिता बच्चों में तुलना कभी न करें, न ही एक के मुकाबले दूसरे को ज्यादा होशियार, समझदार सिद्ध करने का प्रयास करें. इस से दूसरे बच्चे का मन आहत होता है और उस के मन में हीनभावना पनपने लगती है, जो आगे चल कर ईर्ष्या का रूप धारण कर लेती है.

बच्चों को समय दें

मातापिता सभी बच्चों को अधिक से अधिक समय दें. सभी के साथ एकसाथ बैठें, अलगअलग नहीं. अगर मातापिता बच्चों को पूरा समय नहीं देते, तो वे खुद को असहाय सा पाते हैं और उन का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए अजीबोगरीब हरकतें करते हैं. अगर वे एक बच्चे के साथ अधिक समय व्यतीत करते हैं, तो दूसरा बच्चा निश्चित रूप से आहत होता है और उन का ध्यान आकर्षित करने के लिए कई बार वह खुद को नुकसान भी पहुंचाता है. अगर वे दोनों बच्चों को पूरा समय देते हैं, तो एक बच्चे को थोड़ा अधिक समय देने से दूसरे बच्चे को उतना बुरा नहीं लगता. जहां मातापिता दोनों कामकाजी हैं, उन्हें बच्चों को समय देने के लिए कुछ अधिक मेहनत करनी पड़ती है. ज्यादा नहीं, तो सोने के समय बच्चों के कमरे में उन के साथ एकाध घंटा व्यतीत करें, स्कूल में क्या हुआ, सुनें. उन के साथ बिस्तर में लेटें, किस्सेकहानियां सुनेंसुनाएं, घरपरिवार की बातें करें. इस तरह वे न केवल मातापिता से बल्कि एकदूसरे से भी तन और मन से जुड़े रहेंगे.

तुलना न करें

जब मातापिता दोनों बच्चों के बीच तुलना कर एक को दूसरे से बेहतर साबित करने की कोशिश करते हैं, तो वे नहीं जानते कि अनजाने में ही वे दूसरे बच्चे के मन में पनप रही ईर्ष्या की आग को हवा दे रहे हैं. अपने बच्चे की तुलना किसी बाहर वाले बच्चे से कर उसे छोटा दिखाने की कोशिश भी न करें. ‘जब रोहन तीसरी कक्षा में था तो वह हमेशा कक्षा में प्रथम आता था, तुम्हारी रैंक इतनी नीचे क्यों है?’ ‘तुम्हें तो बात करने की तमीज तक नहीं है, रिया ने तो कभी हमें पलट कर जवाब नहीं दिया. अपनी बहन से कुछ सीखो.’ इस तरह की बातें सुन कर बच्चों में ईर्ष्या की भावना जोर पकड़ने लगती है.

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हर बच्चे की सुनें

अगर आप के बच्चे आपस में झगड़ते हैं, एकदूसरे पर चीखतेचिल्लाते हैं, तो कभी भी एक बच्चे को दोषी ठहरा कर दूसरे को डांटें या डराएंधमकाएं नहीं. दूसरे को भी अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दें. इस से उन्हें लगता है कि आप दोनों की बात को महत्त्व देते हैं. किस की गलती है, यह फैसला पूरी ईमानदारी से करें. मातापिता आमतौर पर छोटे बच्चे का साथ देते हैं और बड़े बच्चे को हमेशा पीछे हटने के लिए कहते हैं, जिस से उस का अहं आहत होता है. जहां बच्चों में अंतर कम होता है, वहां बड़ा बच्चा 2 साल की उम्र से ही बड़ा हो जाता है और छोटा 10 वर्ष की उम्र तक भी छोटा रहता है. इस से न केवल वह बिगड़ता है, बल्कि गलत काम करने से भी नहीं हिचकिचाता, क्योंकि वह जानता है कि उसे छोटे होने का फायदा मिलेगा. दूसरी तरफ मातापिता का स्नेह छोटे को ज्यादा मिलता है, यह देख कर बड़े भाई या बहन का मन आहत होता है और मातापिता व भाई या बहन के प्रति उस की सोच नकारात्मक होती चली जाती है. जब युवा बच्चे किसी विषय पर बहस कर रहे हों, तो बीच में न पड़ें. उन्हें अपनी बात कहने का और दूसरे की सुनने का मौका दें. किसी एक का पक्ष ले कर न बोलें. अगर बहस ज्यादा गरम हो जाए, तो विषय बदल कर बहस को खत्म करने के लिए कहें. जैसे, खाने का समय हो तो खाने के लिए बुला लें या फिर घूमने अथवा फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाने के लिए कहें.

जब बच्चा हो घर पर अकेला

माता पिता की जगह और कोई नहीं ले सकता. किसी भी मातापिता के लिए उन के बच्चे ही उन की दुनिया होते हैं. बच्चों की उपस्थिति मात्र से ही उन की जिंदगी अर्थपूर्ण हो जाती है. मातापिता बच्चों की सभी इच्छाओं को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं और इस कोशिश में उन्हें न चाहते हुए भी बच्चों को घर पर अकेले छोड़ने का कठोर निर्णय तक लेना पड़ता है. माना कि बच्चों को घर पर अकेला छोड़ना 21वीं सदी की एक आवश्यकता और पेरैंट्स के लिए एक मजबूरी बन गई है, लेकिन यह मजबूरी आप के नौनिहालों के व्यक्तित्व और व्यवहार में क्या बदलाव ला सकती है, यह किसी भी पेरैंट्स के लिए जानना बेहद जरूरी है.

शेमरौक ऐंड शेमफोर्ड ग्रुप औफ स्कूल्स की डायरैक्टर मीनल अरोड़ा के अनुसार मातापिता की गैरमौजूदगी में अकेले रहने वाले बच्चों के व्यवहार में निम्न समस्याएं देखने में आती हैं:

डरने की प्रवृत्ति

घर पर अकेले रहने से बच्चों में खाली घर में सामान्य शोर से भी डरने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है, क्योंकि उन्हें बाहरी दुनिया का बहुत कम अनुभव होता है. इस के अतिरिक्त अकेले रहने वाले बच्चे पेरैंट्स से अपना डर शेयर नहीं करते, क्योंकि वे नहीं चाहते कि उन्हें अभी भी बच्चा समझा जाए. कई बार बच्चे अपनी सुरक्षा को ले कर पेरैंट्स को चिंतित नहीं करना चाहते, इसलिए भी वे अपने मन की बात छिपा जाते हैं.

अकेलापन

घर पर अकेले रहने वाले बच्चों को उन के दोस्तों से मिलने, किसी भी ऐक्स्ट्रा क्यूरिकुलर ऐक्टिविटी में भाग लेने अथवा कोई सोशल स्किल विकसित करने की अनुमति नहीं होती. इस से उन की सोशल लाइफ प्रभावित होती है और वे अकेलेपन का शिकार होते हैं. ऐसे बच्चे अपनी चीजों को शेयर करना भी नहीं सीख पाते हैं. वे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं. बाहर की दुनिया से कटे रहने के कारण वे स्वार्थी, दब्बू और चिड़चिड़े हो जाते हैं.

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सेहत के लिए खतरा

घर पर रहने वाले बच्चे शरीर को ऐक्टिव रखने वाली कोई भी आउटडोर ऐक्टिविटी नहीं करते, जिस से आलस बढ़ता है और अधिकांश बच्चे मोटे हो जाते हैं. ऐसे बच्चों में खानपान, सेहत व विकास संबंधी समस्याएं भी देखने को मिलती हैं. अकेले रहने के कारण ऐसे बच्चे डिप्रैशन का शिकार भी हो जाते हैं. उन की रोजमर्रा की जिंदगी अस्तव्यस्त हो जाती है. कई बार समय न होने की कमी के चलते अभिभावक बच्चों की हर जिद पूरी करते हैं, यह आदत उन्हें स्वार्थी बना देती है और वे अपनी हर जरूरी गैरजरूरी जिद, मांग पूरी करवाने लगते हैं.

जिद्दी व स्वार्थी

घर पर अकेले रहने वाले बच्चों के लिए मातापिता कुछ नियम तय करते हैं जैसेकि टीवी देखने से पहला अपना होमवर्क पूरा करना, अजनबियों से बात नहीं करना, उन की गैरमौजूदगी में किसी दूसरे व्यक्ति को घर में नहीं आने देना आदि. लेकिन ऐसे में अगर उन पर नजर रखने वाला कोई नहीं हो, तो उन्हें अपनी मनमरजी से कुछ भी करने की आजादी मिल सकती है. इस के खतरनाक परिणाम हो सकते हैं.

हालांकि कोई भी 2 बच्चे एकजैसे नहीं होते. वे भिन्न हालात में अलगअलग तरह से व्यवहार करते हैं. इसलिए यह जानना पेरैंट्स की ही अकेली जिम्मेदारी होती है कि क्या उन के बच्चे वास्तव में घर पर अकेले रहने के लिए तैयार हैं. अगर हां, तो बच्चों को घर पर अकेला छोड़ने से पहले कुछ खास बातों को ध्यान में रखना चाहिए जैसेकि बच्चे की उम्र एवं मैच्युरिटी.

उदाहरण के लिए घर पर छोड़े गए बच्चों की उम्र 7 साल से कम नहीं होनी चाहिए, उन के घर पर अकेले रहने का समय उदाहरण के लिए 11-12 साल के बच्चों को कुछ घंटों के लिए घर अकेले छोड़ा जा सकता है पर सिर्फ दिन के समय. बच्चों पर नजर रखने के लिए पड़ोसियों की उपलब्धता सब से महत्त्वपूर्ण यह कि जब बच्चों को घर पर छोड़ा जाए तो वे वहां सुरक्षित महसूस करें.

यदि आप ने निम्न बातों को ध्यान में रखते हुए अपने बच्चों को घर में छोड़ने का मन बना लिया है, तो उन की सुरक्षा के लिए निम्न उपाय जरूर अपनाएं:

– बच्चे से संपर्क का एक समय निर्धारित कर लें. इस से आप को यह पता रहेगा कि बच्चे सुरक्षित हैं या नहीं. घर से दूर रहते समय भी उन पर निगरानी रखें. दिन में बच्चों को फोन कर के उन की खैरियत पूछते रहें. उन्होंने लंच किया या नहीं, स्कूल में उन का दिन कैसा बीता, स्कूल या पढ़ाई से संबंधित उन की समस्याओं की जानकारी लें और उन का समाधान सुझाएं. आप का ऐसा करना आप को बच्चों से जोड़े रखेगा.

– बच्चों को बताएं कि किसी अजनबी के लिए दरवाजा कतई न खोलें. इस के अलावा दरवाजे की घंटी कोई बजाए तो विंडो या डोरआई से देखें कौन है. अगर कोई जानकार, रिश्तेदार या पड़ोसी है तो तुरंत पेरैंट्स को सूचना दें. घर को चाइल्डप्रूफ रखें. घर में सिक्युरिटी लगवाएं ताकि आप के पीछे से बच्चों के साथ कोई दुर्घटना न घटे और बच्चे सुरक्षित रहें.

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– बच्चों को इस बात की भी जानकारी दें कि घरपरिवार के बारे में कौन सी बातें और कितनी बातें किसी को बतानी हैं. यही नहीं, उन्हें बड़ों की गैरमौजूदगी में गैस जलाने या किसी धारदार चीज से काम करने की कतई अनुमति न दें.

– घर में अलकोहल या अन्य किसी भी प्रकार का नशीला पदार्थ न रखें. कार या बाइक की चाबी छिपा कर रखें.

– आप की अनुमति के बिना किसी पड़ोस के घर में अकेले न जाने का निर्देश दें. लेकिन साथ ही इमरजैंसी की स्थिति में किसी पड़ोसी के बारे में जरूर बताएं ताकि इमरजैंसी की स्थिति में आप के घर पहुंचने तक वह उन के संपर्क में रहे.

– इमरजैंसी काल की स्थिति के लिए उन्हें स्थानीय अथवा दूर के रिश्तेदारों के फोन नंबर दें. अपने खास पड़ोसी को अपनी गैरमौजूदगी  के बारे में सूचित करें. उन से बच्चों की देखरेख के लिए कहें.

मां के लाड़ले को कैसे संभालूं

औफिस से आते ही महाशय शर्ट उतार कर ऐसे फेंकते हैं जैसे वह शर्ट न हो गेंद हो. जूते कभी शू रैक में नहीं मिलेंगे. वे या तो सोफे के नीचे पड़े होंगे या फिर बैड के नीचे सरका दिए जाते हैं. औफिस बैग भी आते ही इधरउधर फेंक दिया जाता है. कपड़े भी अलमारी में कम दरवाजे के पीछे ज्यादा टंगे मिलते हैं. कुछ खाएंगे तो महाशय कूड़ा डस्टबिन में डालने के बजाय बाहर ही फेंक देंगे. यह हालत किसी एक पुरुष की नहीं वरना ऐसा करीबकरीब सभी करते हैं और फिर उन के फैले सामान को या तो नौकरानी की तरह उन की मां समेटती है या फिर पत्नी.

ऐसे पुरुष विरले ही होते हैं, जो घर के हर काम में पत्नी की मदद करते हैं. मदद तो छोडि़ए कम से कम पति अपना सामान ही समेट ले वही काफी है.

क्या कभी आप ने सोचा है पुरुष के काम न करने के पीछे क्या वजह है? आखिर काम करना पुरुष को अखरता क्यों है? क्यों वह काम से जी चुराता है?

महिलाएं हैं जिम्मेदार

पुरुष की इस आदत के पीछे मांएं जिम्मेदार हैं. घर में रहने की वजह से घर के सारे काम की जिम्मेदारी समझ लेती हैं. पूरा दिन घर के काम करते निकल जाता है. लेकिन औफिस या स्कूल से आते ही फिर सामान बिखर जाता है. उसे समेटने वाली मां अकेली जान होती है. अकेले ही सारा काम करती है. विवाह बाद पत्नी यह काम करने लगती है. पति को कभी यह नहीं बोलती कि आप फलां काम कर दो या सामान न फैलाओ. अकसर महिलाएं बेटों से काम नहीं करातीं. मां के यही डायलौग होते हैं- ‘छोड़ बेटा तू मत कर, मैं कर लूंगी,’ ‘मेरा तो रोज का काम है.’ मां की इसी आदत की वजह से बेटा धीरेधीरे काम से जी चुराने लगता है, जिस के चलते वह और काम करना तो दूर की बात अपना खुद का सामान संभालना भी बंद कर देता है.

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पति कामचोर, पत्नी की आफत: मां के साथ रहतेरहते आदत इतनी खराब हो जाती है कि उस का परिणाम पत्नी को भुगतना पड़ता है. पूरा दिन घर का सामान समेटतेसमेटते निकल जाता है.   कर चूर होने के बावजूद खाना बनाती है, जबकि पति आते ही सामान फैला देते हैं और खाना खा कर सो जाते हैं. पति की यह आदत सविता को बहुत अखरती है.

वरना बढ़ेगी तकरार: अगर आप के लाड़ले की आदत ऐसी ही रही तो घर में पतिपत्नी के बीच तकरार बढ़ेगी. आएदिन झगड़े होंगे, क्योंकि हर चीज की एक सीमा होती है. नौकरानी बन कर काम करना किसी को पसंद नहीं. कई बार देखा गया है कि पुरुष अपने अंदरूनी वस्त्र भी ऐसे ही छोड़ कर चले जाते हैं. उन को भी या तो मां धोती है या फिर बीवी, यह सरासर गलत है.

मां बच्चे की पहली पाठशाला: कहा जाता है कि मां बच्चे की पहली पाठशाला होती है. मां से ही बच्चा सब चीजें सीखता है- बोलना, चलना, हंसना आदि. लिहाजा अपने बच्चे में शुरू से ही अपने काम करने की आदत डालें.

बेटी के साथसाथ बेटे को भी सिखाएं: सिर्फ बेटी को ही घर का काम न सिखाएं, बल्कि बेटे को भी सिखाएं. खाना बनाना, पेड़पौधों को पानी देना, घर की साजसज्जा करना ताकि उस का इंटै्रस्ट बना रहे और भविष्य में होने वाली परेशानी से बचा जा सके.

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सास भी संभल जाए जरा: अगर बेटा बहू की काम में मदद करता है, तो सास चिढ़े नहीं.  कई मामलों में देखा जाता है कि सास बहू  को ताना मारने से बाज नहीं आती. अगर बेटा घर के काम में मदद कर रहा है तो कौन सा आसमान टूट पड़ा? सास बहू को बेटी समान समझे. काम लादने के बजाय उस की मदद करे ताकि वह हर काम खुशीखुशी निबटा सके. अगर काम का बोझ ज्यादा होगा तो काम उस के लिए तनाव बन जाएगा.

बातबात पर न करें गुस्सा: अगर आप पति की आदतों से परेशान हैं तो बातबात पर गुस्सा न करें. गुस्से को काबू करना सीखें. अगर आप को अपने पति की आदतें पसंद नहीं हैं तो पति को प्यार से समझाएं. बेहतर होगा कि अकेले में समझाएं, क्योंकि प्यार से बड़ी से बड़ी जंग जीती जा सकती है. लड़ाई करने से कुछ हासिल नहीं होगा.

अपनी तलाकशुदा पत्नी से विवाह

शायद ही कभी किसी ने देखासुना हो कि तलाक के 4 साल और अलगाव व खटपट के 12 वर्षों बाद पतिपत्नी ने दोबारा शादी कर ली. मामला कुछकुछ विचित्र किंतु सत्य है जिस के बारे में जान कर महसूस होने लगा है कि तलाक के बाद पतिपत्नियों की हालत या मानसिकता पर कोई एजेंसी अगर सर्वे व काउंसलिंग करे तो पतिपत्नी का दोबारा मिल कर उजड़ी गृहस्थी को संवार लेना एक संभव काम है.

तलाक व्यक्तिगत, कानूनी, सामाजिक, पारिवारिक हर लिहाज से एक तकलीफदेह प्रक्रिया है जिस की मानसिक यंत्रणा के बारे में शायद भुक्तभोगी भी ठीक से न बता पाएं. इस के बाद भी तलाक के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं. इस से यही उजागर होता है कि अकसर पतिपत्नी या तो गलतफहमी का शिकार रहते हैं या फिर मारे गुस्से के अपना भलाबुरा नहीं सोच पाते. तलाक में नजदीकी लोगों की भूमिका कहीं ज्यादा अहम हो जाती है जो बजाय बात संभालने के, बिगाड़ते ज्यादा हैं.

यह ठीक है कि कुछ मामलों में तलाक अनिवार्य सा हो जाता है पर अधिकांश मामलों में यह जिद व अहं का नतीजा होता है जो खासतौर से पत्नी के हक में अच्छा नहीं होता. समाज के लिहाज से यह दौर बदलाव का है जिस में महिलाएं पहले सी दोयम दरजे की नहीं रह गई हैं. वे हर स्तर पर समर्थ, सक्षम और जागरूक हुई हैं लेकिन तलाक के बाद ये सभी बातें हवा हो जाती हैं जब उन्हें अपने अकेलेपन का एहसास होता है और वे एक स्थायी असुरक्षा में जीने को मजबूर हो जाती हैं.

मुमकिन है कभीकभी उन्हें लगता हो कि तलाक बेहद जरूरी भी नहीं था. इस से बच कर तलाक के बाद की दुश्वारियों से भी बचा जा सकता था लेकिन बात ‘अब पछताए होत का जब चिडि़या चुग गई खेत’ सरीखी हो जाती है. तलाक का कागज उन्हें नए माहौल और हालत में जीना सिखा देता है, इसलिए चाह कर भी वापस नहीं मुड़ा जा सकता क्योंकि तलाक के बाद पति दूसरी शादी कर नई पत्नी के साथ शान से गुजर कर रहा होता है. वहीं, अधिकांश पत्नियां, जो भारतीय संस्कारों से ग्रस्त ही कही जाएंगी, किसी दूसरे को सहज तरीके से पति मानने या स्वीकारने के लिए खुद को तैयार या सहमत नहीं कर पातीं और जब तक खुद को तैयार कर पाती हैं तब तक उम्र का सुनहरा हिस्सा उन के हाथों से फिसल चुका होता है.

शशिकांत संग वंदना

मध्य प्रदेश के भिंड जिले के इस दिलचस्प मामले को बतौर मिसाल लिया जाए तो तलाकशुदाओं के लिहाज से यह एक अच्छी पहल सिद्ध हो सकती है. वंदना और शशिकांत की शादी साल 2001 में हुई थी. ये दोनों साधारण खातेपीते कायस्थ परिवार के हैं और दोनों के ही पिता पुलिस विभाग में नौकरी करते हैं. शादी के बाद वंदना ससुराल आई तो उसे नया कुछ खास नहीं लगा क्योंकि उस का मायका भी भिंड में ही है. संयुक्त परिवार से संयुक्त परिवार में आने से उसे तालमेल बैठाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आई.

शशिकांत प्राइवेट नौकरी करता था. उस की कोई खास आमदनी नहीं थी. संयुक्त परिवारों में खर्चे का पता नहीं चलता, न ही कोई कमी महसूस होती. देखते ही देखते एक साल गुजर गया और वंदना ने एक बच्ची को जन्म दिया जिस का नाम घर वालों ने प्रिया रखा.

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शायद आपसी समझ का अभाव था या फिर संयुक्त परिवार की बंदिशें थीं कि दोनों एकदूसरे से असंतुष्ट रहने लगे और जल्द ही आरोपोंप्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हो गया जिन में कोई खास दम नहीं था. यह बात वक्त रहते दोनों समझ नहीं पाए, लिहाजा रोजरोज की खटपट शुरू हो गई. पतिपत्नी के बीच का तनाव और विवाद उजागर हुए तो दोनों के घर वालों ने दखल देते समझाया पर बजाय समझने के दोनों भड़कने लगे और आखिरकार अपना फैसला भी सुना दिया कि अब हम साथ नहीं रह सकते. लिहाजा, हमारा तलाक करा दिया जाए.

दोनों ही परिवारों की भिंड में इज्जत है, इसलिए घर वाले कतराए, लेकिन तमाम समझाइशें बेकार साबित हो चुकी थीं. दोनों कुछ समझने को तैयार नहीं थे. एक दिन वंदना प्रिया को ले कर अपने मायके चली गई तो शशिकांत ने भी आपा खो दिया और तलाक का मुकदमा दायर कर दिया.

8 साल मुकदमा चला. तारीखें पड़ीं, पेशियां हुईं और आखिरकार 2012 में तलाक यानी कानूनन विवाहविच्छेद इस शर्त पर हुआ कि पत्नी व बेटी को गुजारे के एवज शशिकांत 2 हजार रुपए महीने देगा जो कि कुछ साल उस ने दिए भी.

2014 में शशिकांत ने अदालत में एक अर्जी दाखिल कर अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते भरणपोषण राशि देने में असमर्थता जताई तो अदालत ने भरणपोषण का आदेश रद्द कर दिया. अब तक घर और समाज वालों की दिलचस्पी इन दोनों से खत्म हो गई थी. वंदना मायके में थी लेकिन सहज तरीके से नहीं रह पा रही थी. उधर, शशिकांत को भी लग रहा था कि जो कुछ भी हुआ वह ठीक नहीं हुआ.

शशिकांत और वंदना दोनों कशमकश की जिंदगी जी रहे थे. बेटी प्रिया का भी कोई भविष्य नहीं था और सब से ज्यादा तकलीफदेह बात दोनों का एकदूसरे को न भूल पाना थी. झूठा अहं, गुस्सा और ठसक दम तोड़ रहे थे. दोनों को ही बराबर से समझ आ रहा था कि वे जानेअनजाने  जिंदगी की सब से बड़ी गलती या बेवकूफी कर चुके हैं, पर अब कुछ हो नहीं सकता था, इसलिए कसमसा कर रह जाते थे.

जब सब्र टूटा

बीती 9 अक्तूबर को वंदना बेटी प्रिया को ले कर भिंड के एएसपी अमृत मीणा के दफ्तर पहुंची और बगैर किसी हिचक के उन से कहा कि अब उस के सामने खुदकुशी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. अमृत मीणा ने सब्र से उस की पूरी बात सुनी और तुरंत शशिकांत को तलब किया. थाने में ही उन्होंने दोनों को साथ बैठा कर चर्चा की. 14 साल की होने जा रही प्रिया का हवाला दिया और जमानेभर की ऊंचनीच समझाई तो वंदना और शशिकांत हद से ज्यादा जज्बाती हो उठे और फिर से साथ रहने को तैयार हो गए.

अमृत मीणा भी अपनी पहल और समझाइश का वाजिब असर देखते उत्साहित थे. लिहाजा, उन्होंने इन दोनों की हिचक दूर करते तुरंत दफ्तर में ही उन की दोबारा शादी का इंतजाम कर डाला. दोनों 14 साल का गुबार और भड़ास निकाल चुके थे, इसलिए दोनों शादी के लिए तैयार हो गए ताकि तलाक और अलगाव का एहसास खत्म हो जाए.

एएसपी के रीडर रविशंकर मिश्रा ने पंडित की भूमिका निभाई और मंत्र पढ़ते हुए दोनों की शादी करा दी. 14 साल बाद इन पतिपत्नी ने दोबारा एकदूसरे को जयमाला पहनाई और शशिकांत वंदना को घर ले कर आ गया. बाकायदा विदाई भी हुई, अमृत मीणा अपनी गाड़ी से दोनों को घर छोड़ कर आए. बहुत कम मौकों और मामलों पर पुलिस वालों का मानवीय पहलू देखने में आता है, जो इस मामले में दिखा.

दोबारा विवाह का यह अनूठा मामला था. इस प्रतिनिधि ने बीती 25 नवंबर को वंदना और शशिकांत से बात की. दोनों खुश थे. वे बीती बातें नहीं करना चाहते थे जिन में उन्होंने बेहद तनाव झेला था. वंदना की चहक और शशिकांत की परिपक्वता बता रही थी कि वे इस नई जिंदगी से खुश हैं और चाहते हैं कि दूसरे तलाकशुदा पतिपत्नी भी गुस्सा और पूर्वाग्रह छोड़ कर शादी करें. अगर वे ऐसा करते हैं तो पहले जो खो चुके हैं उसे वे मय ब्याज के हासिल कर सकते हैं.

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जल्दबाजी, गुस्सा, अहं, जिद और अपनों के ही भड़काने पर पतिपत्नी तलाक तो ले लेते हैं पर इन में से अधिकांश बाद में पछताते हैं. वजह, दूसरी शादी आसान नहीं होती और अगर हो भी जाए तो तलाक का धब्बा सहज तरीके से जीने नहीं देता और इस पर भी, दूसरे जीवनसाथी के मनमाफिक होने की गारंटी नहीं रहती.

तो फिर तलाक के बाद क्यों न पहले जीवनसाथी की तरफ सुलह का हाथ बढ़ाया जाए, इस अहम सवाल पर वंदना और शशिकांत के मामले से सोचा जाए तो बात बन सकती है.

तलाक के बाद अधिकांश पतिपत्नी अवसाद में ही जीते नजर आते हैं खासतौर से उस सूरत में जब तलाक की कोई ठोस वजह न हो. ज्यादातर तलाकों की वजह बेहद हलकी होती है. ऐसा आएदिन के मामलों से उजागर भी होता रहता है. अगर शादी के बाद एक साल या उस से भी ज्यादा का वक्त पतिपत्नी ने एकसाथ गुजारा है तो एकदूसरे को भुला देना उन के लिए आसान नहीं होता.

तलाक के पहले परिवार परामर्श केंद्र, अदालत और काउंसलर सोचने के लिए वक्त देते हैं लेकिन उस वक्त पतिपत्नी दोनों के दिलोदिमाग में इतना गुस्सा व नफरत का गुबार भरा होता है कि वे सोचते कम, झल्लाते ज्यादा हैं.

तलाक के बाद की दुश्वारियां, अकेलापन, अपनों की अनदेखी वगैरा उन्हें समझ आने लगती हैं. पर चूंकि तलाकशुदा पतिपत्नी की दोबारा शादी की पहल किसी भी स्तर पर नहीं होती, इसलिए सुलह की गुंजाइशें होते हुए भी बात नहीं बन पाती. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि भिंड के इस प्रयोग को दोहराया जाए क्योंकि संभव है पति और पत्नी अपनी गलतियां महसूस करते हुए दोबारा साथ रहना चाहते हों.

क्या जरूरी है रिश्ते का नाम बदलना

गुरुग्राम की रहने वाली रंजना के बेटे की शादी का अवसर था. विदाई के समय दुलहन की मां अपनी बेटी से गले मिलते हुए बोलीं, ‘‘अब एक मम्मी से नाता तोड़ कर दूसरी मम्मी को अपना बनाने जा रही हो. आज से तुम्हारी मम्मी रंजनाजी हैं. अब इन की बेटी हो तुम.’’

रंजना ने तुरंत उन की बात काटते हुए कहा, ‘‘नहीं, मैं आप से एक मां का अधिकार नहीं छीनना चाहती. मम्मी तो आप ही रहेंगी इस की. मैं अभी तक अपनी बेटी का प्यार तो पा ही रही थी, अब मुझे बहू का प्यार चाहिए. मैं मां के साथसाथ खुद को अब ‘सासूमां’ कहलवाना भी पसंद करूंगी. सासबहू के सुंदर रिश्ते को महसूस करने का समय आया है. मैं भला क्यों वचिंत रहूं इस सुख से?’’

प्रश्न है कि आखिर आवश्यकता ही क्यों पड़ती है रिश्तों के नाम बदलने की या किसी अन्य रिश्ते से तुलना करने की? सास शब्द इतना भयंकर सा क्यों हो गया कि बोलते ही मस्तिष्क में ममतामयी स्त्री के स्थान पर एक कू्रर, डांटतीफटकारती अधेड़ महिला की तसवीर उभरने लगती है. बहू शब्द क्यों इतना पराया लगने लगा कि अपनत्व की भावना से सजाने के लिए उस पर बेटी शब्द का आवरण डालना पड़ता है. कारण स्पष्ट है कि कुछ रिश्तों ने अपने नामों के अर्थ ही खो दिए हैं.

अहम और स्वार्थ के दलदल में फंस कर एकदूसरे के प्रति व्यवहार इतना रूखा हो गया है कि रिश्तों का केवल एक पक्ष ही उजागर हो रहा है. उन रिश्तों का सुखद पहलू दर्शाने के लिए किसी अन्य रिश्ते के नाम का सहारा लेना पड़ रहा है. मगर केवल नाम बदल देने से कोई भी रिश्ता उजला नहीं हो सकता. इस के लिए आवश्यक है कि व्यवहार व सोच में बदलाव लाया जाए.

क्यों बदनाम है सासबहू का संबंध

सास और बहू का रिश्ता आपसी अनबन के लिए बदनाम है. इसे सुंदर रूप देने के लिए यह समझना होगा कि इस में अब समय के साथ बदलाव लाया जाए. वर्तमान परिवेश में अधिकतर बहुएं कामकाजी हैं तथा सास भी पहले की तरह घर में बंद रहने वाली नहीं रहीं. अब इस रिश्ते में मांबेटी जैसे स्नेह के अतिरिक्त आपसी सामंजस्य व मित्रता की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है. यदि दोनों पक्ष कुछ बातों को ध्यान में रख एकदूसरे से अच्छा व्यवहार करें तो इस रिश्ते का नाम बदलने की आवश्यकता ही नहीं होगी.

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सास शब्द से परहेज क्यों

‘सास’ शब्द सब का चहेता बन जाए और सासबहू का रिश्ता प्रेम की भावना से पगा एक मोहक रिश्ता कहलाए, इस के लिए सास को निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए:

– बहू पर अपना भरपूर स्नेह उड़ेल देने के साथ ही उस में एक मित्र की छवि देखने का प्रयास करना होगा.

– एक स्त्री होने के नाते बहू की भावनाओं को बखूबी समझना होगा.

– दकियानूसी सोच से ऊपर उठ कर व्यर्थ के व्रत और रीतिरिवाजों का बोझ उस पर लादने से बचना होगा.

– वर्तमान में कपड़ों का वर्गीकरण विवाहित अथवा अविवाहित को ले कर नहीं होता. अत: ड्रैस को ले कर उस पर ऐसा कोई नियम लागू करने से बचना होगा.

– घर में रह रही बहू को मशीन न समझ कर संवेदनाओं से परिपूर्ण व्यक्ति समझना होगा.

– यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति के अपने अलगअलग विचार होते हैं. किसी विषय पर मतभेद हों तो सास नाहक ही तंज कसने के स्थान पर प्रेम की भाषा में अपनी बात कह दे तथा बहू के विचार सुन कर समझने का प्रयास करे तो टकराव के लिए कोई स्थान ही नहीं होगी.

– बहू से किसी बात पर भी दुरावछिपाव न करते हुए उसे परिवार का अंग समझ सब कुछ साझा किया जाए.

– बहू के साथ कभीकभी आउटिंग करना रिश्ते में स्नेह बढ़ाने का काम करेगा.

बहू शब्द अप्रिय क्यों

बहू बन जाने पर लड़की की दुनिया बदल जाती है. उसे कर्त्तव्यों की एक लंबी सी लिस्ट थमा दी जाती है. नए वातावरण में स्वयं को स्थापित करने की चुनौती स्वीकार करते हुए उसे रिश्तों में अपनेपन के नए रंग भरने होते हैं. बहू शब्द अप्रिय न रहे, इस के लिए उसे भी कुछ बातें ध्यान में रखनी होंगी:

– मन में ससुराल के प्रति अपनेपन की भावना के साथ प्रवेश करे.

– वहां के माहौल से जल्द ही परिचित होने का प्रयास करे. यदि हर बात में वह ससुराल की तुलना मायके से करेगी तो उस के हाथ निराशा ही लगेगी.

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– आज के समय पढ़ीलिखी लड़कियां परिस्थितियों को समझते हुए अपने जीवन से जुड़े फैसले स्वयं लेना चाहती हैं. एक बहू होने के नाते उन्हें चाहिए कि यदि किसी विषय में निर्णय लेते समय सासबहू की टकराहट हो तो कुछ अपनी मनवा कर कुछ उन की मान कर सामंजस्य बैठाएं.

– वह इस सत्य को न भूले कि उस के पति का परिवार के अन्य व्यक्तियों से भी नाता है और उन के प्रति उत्तरदायित्व भी है. अत: ‘मेरा पति सिर्फ मेरा है’ की सोच त्याग ईर्ष्या से दूर रहना होगा.

– सोशल मीडिया के इस युग में मोबाइल या व्हाट्सऐप के माध्यम से बहू अपने संबंधियों व मित्रों से जुड़ी रहती है. उसे चाहिए कि ससुराल की हर बात सब को न बताए. छोटीमोटी समस्याओं को तूल न देते हुए जल्द ही सुलझाने का प्रयास करे.

Arranged Marriage में दिलदार बनें, रिश्ता तय करने से पहले ध्यान रखें ये बातें

यदि किसी कारणवश युवा अपना भावी जीवनसाथी खुद न ढूंढ पाए या ढूंढना ही न चाहे और अपने मातापिता के सहयोग से ही विवाह बंधन में बंधने का निर्णय ले, तो आज के समय में पेरैंट्स के लिए अपने बच्चे की मैरिज करना खासा पेचीदा होता जा रहा है.

पेरैंट्स व बच्चों की किसी रिश्ते में किसी एक बिंदु पर सहमति बनना कोई आसान बात नहीं होती. वहां भी जैनरेशन गैप साफ दिखाई देता है और उस पर जब अधिकतर युवा लव मैरिज करने लगे हैं तो अरैंज्ड मैरिज के लिए विवाहयोग्य लड़केलड़कियों का जैसे अकाल सा पड़ने लगा है. और फिर बच्चे साथ में न रह कर दूसरे शहरों में या विदेश में हों तो वैवाहिक रिश्तों के बारे में चर्चा करना कठिन ही नहीं असंभव भी हो जाता है.

सुधा थपलियाल जो एक उच्च शिक्षित गृहिणी हैं, बताती हैं कि बेटी के लिए रिश्ते आते हैं पर जब फोन पर बेटी से रिश्तों के बारे में चर्चा करना चाहती हूं तो सुबह वह जल्दी में होती है, शाम को थकी होती है और छुट्टी के दिन आराम के मूड में होती है. विवाह के बारे में आखिर चर्चा करूं तो किस से करूं.

सावी शर्मा भी एक उच्च शिक्षित गृहिणी हैं. चर्चा छिड़ने पर कहती हैं कि मैं ने बेटे की अरैंज्ड मैरिज की लेकिन मुझे इतनी दिक्कत नहीं आई, क्योंकि बेटे ने पूरी तरह सब कुछ मुझ पर छोड़ दिया था. इसलिए जो रिश्ते मुझे पूरी तरह ठीक लगे, उन्हीं लड़कियों को मैं ने बेटे से मिलवाया और एक जगह बात फाइनल हो गई.

पेरैंट्स की मुशकिल समझें युवा:

अरैंज्ड मैरिज में आजकल पेरैंट्स की सब से बड़ी मुश्किल है बच्चों की कल्पना को धरातल पर उतारना, जोकि नामुमकिन होता है. साथ ही पारिवारिक, सामाजिक व धार्मिक पृष्ठभूमि को देखते हुए सही तालमेल वाले रिश्ते ढूंढना जिस में बच्चे बहुत कम सहयोग देते हैं.

कई युवा सोचते तो बहुत कुछ हैं पर विवाह को ले कर पेरैंट्स के साथ संवादहीनता की स्थिति कायम कर देते हैं, जैसे कि पेरैंट्स को पहली ही बार में उन की कल्पना को धरातल पर उतार देना चाहिए था और ऐसा नहीं हुआ तो यह उन की गलती है. लेकिन युवाओं को समझना चाहिए कि किसी की भी कल्पना धरातल पर नहीं उतरती.

सहज बातचीत से सामने से आए रिश्ते के माइनसप्लस पौइंट्स पर विचार किया जा सकता है. लव मैरिज में जहां बिना कुछ आगापीछा जानेबूझे, सोचेसमझे प्यार हो जाता है, मतलब कि प्यार की भावना ही प्रधान होती है वहीं अरैंज्ड मैरिज में आप के गुण, दोष, कमी, नौकरी, पैसा, सैलरी, खूबसूरती, सामाजिक रूतबा, घरपरिवार शिक्षा बगैरा देख कर ही रिश्ते आते हैं.

इसलिए यदि युवा स्वयं मनचाहा जीवनसाथी न ढूंढ पाए हों और भावी जीवनसाथी ढूंढने के लिए पेरैंट्स पर निर्भर हों तो पेरैंट्स के साथ सहयोग करें ताकि वे आप के लिए सुयोग्य जीवनसाथी का चुनाव कर सकें.

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बच्चों की मुश्किलें समझें पेरैंट्स:

दूसरी तरफ पेरैंट्स को भी चाहिए कि अरैंज्ड मैरिज में भी थोड़ा लव मैरिज वाला लचीलापन लाएं और दिलदार बनें. वर्षों से चली आ रही लकीर को न पीटें. जाति, जन्मपत्री, प्रथाएं, गोत्र, धर्म, रीतिरिवाज जैसी चीजों में उलझने के बाद जो रिश्ते छन कर बचते हैं वे शिक्षा व विचारों के लिहाज से आप के लाडले व लाडली के साथ कितने फिट बैठते हैं यह देखने व सोचने की जहमत भी उठाएं.

इसलिए अरैंज्ड मैरिज में भी इस तयशुदा चारदीवारी से बाहर आ कर थोड़ा उदार रवैया अपनाएं. खुद की सड़ीगली मान्यताओं को एकतरफ रख कर, जो बच्चों के साथ फिट बैठ सके, ऐसे साथी के बारे में सोचें. आजकल के समय में लड़कियों के लिए भी हर तरह का समझौता करना सरल नहीं है. इसलिए उन के लिए भी अरैंज्ड मैरिज करना कोई आसान बात नहीं रह गई.

अरैंज्ड मैरिज की मुश्किलें:

अरैंज्ड मैरिज में बिचौलिए, मातापिता या रिश्तेदार किसी रिश्ते के लिए भावनात्मक दबाव बनाने लगते हैं. यह सही नहीं है. इस के अलावा लड़कालड़की को एकदूसरे को समझने के लिए समय नहीं मिल पाता, यह मुश्किल तब और बड़ी हो जाती है जब वे अलगअलग शहरों में या उन में से एक विदेश में हो.

लव मैरिज में युवा एकदूसरे को लंबे समय तक जाननेसमझने के बाद विवाह का फैसला लेते हैं, इसलिए उन्हें अपने फैसले पर विश्वास होता है. लेकिन अरैंज्ड मैरिज में उन्हें फैसला लेने में घबराहट होती है. आजकल के युवा उम्र व मानसिक रूप से परिपक्व होने के कारण हर किसी के साथ सरलता से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते हैं.

लव मैरिज में जहां प्रेम गुणदोषों को साथ ले कर चलता है वहीं अरैंज्ड मैरिज में सब कुछ विवाह के बाद की स्थिति पर निर्भर करता है. लव मैरिज में जहां युवा आपसी सहमति से भविष्य की योजना बनाते हैं वहीं अरैंज्ड मैरिज में कई बार इन सब भावी फैसलों पर पारिवारिक दबाव बन जाता है और लड़कालड़की अपने साथी का मंतव्य ठीक से समझ नहीं पाते.

साथी से मिलें कुछ इस तरह:

जब यह तय है कि साथी मातापिता ही ढूंढेंगे तो उन पर भरोसा कीजिए. उन के फैसले के साथ अपनी पसंद भी मिलाइये और भावी साथी के साथ कुछ इस तरह मिलिए:

– साथी को अपने सामने खुलने का अवसर दें. स्थिति में तनाव को दूर करने की कोशिश करें. दोनों में से कोई भी सहज बातचीत शुरू कर के साथी को कंफर्टेबल कर सकता है. आप का उन के बारे में जो भी खयाल बने, अपने परिवार वालों को स्पष्ट तौर पर बताएं.

– गलत निर्णय लेने से अच्छा है देर से निर्णय लेना या फिर नहीं लेना. पर पेरैंट्स के साथ विवाह की चर्चा को ले कर सहज बातचीत या सकारात्मकता बनाए रखें ताकि वे आप के लिए सुयोग्य जीवनसाथी का चयन कर सकें.

– एकदूसरे का इतिहास जानने की कोशिश न करें, बल्कि भविष्य की योजनाओं, रूचियों, स्वभाव बगैरा समझने की कोशिश करें. अपनी नौकरी, वर्किंग आवर, टूरिंग, व्यस्तता, सैलरी आदि के विषय में स्पष्ट जानकारी देना व लेना एकदम सही रहेगा ताकि बाद में कोई विवाद न हो. इस के अलावा एकदूसरे के पुरुष व महिला मित्रों के बारे में रवैया और हद जान लेना भी सही रहेगा.

– खर्चे की बात भी साफ हो जानी चाहिए, क्योंकि अधिकतर लड़कियों की सोच होती है कि पति का पैसा तो सब का लेकिन उन का पैसा सिर्फ उन का. इस के अलावा आजकल की कामकाजी लड़कियां ऐसे लड़कों को पसंद करती हैं जो उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि घरपरिवार, बच्चे सिर्फ उन की जिम्मेदारी नहीं हैं.

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अरैंज्ड मैरिज में भी जगाएं लव मैरिज वाला जज्बा:

अब जब विवाह तय हो गया है और आप ने स्वयं को अरैंज्ड मैरिज के लिए तैयार कर लिया है तो एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताइए, चाहे एक शहर में हों या अलग या फिर विदेश में.

काम के बोझ तले यदि मन बेताब नहीं भी हो पा रहा है, दिल में कई सशंय घूम रहे हैं और साथी के प्रति इतना आकर्षण महसूस नहीं कर पा रहे हैं, तब भी बेताबी जगाइए. आकर्षण पैदा कीजिए एकदूसरे के लिए. सोचिए कि कुदरत ने उन्हें सिर्फ आप के लिए ही बनाया है. फ्लर्टिंग कीजिए, हंसिएहंसाइए, छोटेछोटे सरप्राइज दीजिए और महसूस कीजिए कि आप का प्यार बस अभीअभी शुरू हुआ है व आप को इसे कैसे जीत कर मंजिल तक पहुंचाना है.

अपने लिए साथी भले ही आप ने खुद नहीं ढूंढ़ा है पर पसंद तो आप ने ही किया है. इसलिए उस के प्रति भी वही जज्बा जगाइए जो प्रेम विवाह में होता है. चाहें तो छिपछिप कर मिलें या प्रेम का इजहार करें. फिर  देखिए कैसे अरैंज्ड मैरिज में भी लव मैरिज जैसा लुत्फ आता है.

संबंध को टेकेन फार ग्रांटेड लेंगी तो पछताना ही पड़ेगा

लेखक- वीरेंद्र बहादुर सिंह 

एक सुखी दांपत्य के लिए क्या जरूरी है? इस बात से जरा भी इनकार नहीं किया जा सकता कि दांपत्य जीवन के लिए हेल्दी फिजिकल रिलेशन जरूरी है. अलबत्त, यह जरूरी नहीं कि इसके अलावा भी ऐसा बहुत कुछ है जो संबंध को हमेशा सजीव रखता है.हग, स्पर्श, प्यार , कद्र, सम्मान और संवाद कभी संबंध को सूखने नहीं देते.

शबाना आजमी से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि जावेद साहब इतनी सारी कविताएं, गीत और गजल लिखते हैं तो आप पर भी रोजाना एक गीत या गजल लिखते होंगें? शबाना आजमी ने इस सवाल के जवाब में कहा था कि जावेद साहब मेरे ऊपर कविता या गीत नहीं लिखते, इतने लंबे वैवाहिक जीवन में मेरे ऊपर गिनती की 3-4 कविताएं लिखी होंगीं. पर सच बात तो यह है कि मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है. क्योंकि उनके व्यवहार में मैं अपने प्रति भरपूर स्नेह देखती हूं. मेरी छोटीछोटी बातों का ध्यान रखना, मेरी हर बात को शांति से सुनना, मेरी कोई प्राब्लम हो तो उसे हल करना, रोजाना प्रेम से हग करना,  यह सब मेरे लिए कविता से विशेष है. मैं अपने प्रति उनके स्नेह को आज भी वैसा ही अनुभव कर रही हूं, जो मेरे लिए कविता से बढ़ कर है. शबाना आजमी की पूदी बात में आखिरी बात बारबार  पढ़ने और समझने लायक है कि ‘मैं इतने सालों बाद भी उनके अपने प्रति स्नेह को उनके व्यवहार में अनुभव कर सकती हूं.’ यही सब से महत्वपूर्ण बात है.

पूरे दिन की दौड़भाग के बाद घर आने पर मिलने वाला पत्नी का प्रेम भरा एक हग दिन भर की थकान उतार सकता है. यह वाक्य हम न जाने कितनी बार पढ़ या सुन चुकी होंगीं, शादी के बाद शुरू के दिनों में कुछ समय तक पति-पत्नी के बीच यह घटनाक्रम चलता है. पर जैसेजैसे समय बीतता जाता है, वैसेवेसे यह आदत छूटने लगती है. अलबत्त, पति थक कर आया हो, पूरे दिन घर और घर के सदस्यों की देखभाल करने वाली पत्नी की भी इच्छा होती है कि उसका भी कोई ख्याल रखे. जिस तरह पति आफिस से थकामांदा आता है और पत्नी के हाथ की गरमामरम चाय पी कर उसकी थकान उतर जाती है, उसी तरह रोज सवेरे जल्दी उठ कर नाश्ता तैयार करने वाली पत्नी को भी किसी दिन आराम दे कर पति नाश्ता बनाए तो पत्नी के लिए इससे बढ़कर खुशी की बात दूसरी नहीं होगी.

डेप्थ अफेक्शन और एट्रेक्शन का खेल

यह समय ऐसा है कि संबंधों में डेप्थ मुश्किल से ही देखने को मिलता है. युवा अफेक्शन और एट्रेक्शन के बीच की पतली रेखा को भूलते जा रहे हैं. परिणामस्वरूप एट्रेक्शन को प्रेम मान लेने की गलती कर रहे हैं. एट्रेक्शन कुछ समय बाद कम होने लगता है, इसलिए एक समय जो व्यक्ति बहुत अच्छा लग रहा होता है, वही व्यक्ति कुछ समय बाद जीवन की भूल लगने लगता है. यहां महिला या पुरुष,  किसी एक गलती नहीं कही जा सकती, महिला और पुरुष दोनों की ओर से अब ऐसा होने लगा है. मार्डर्न कल्चर को मानने वाले युवाओं में यह चीज खास कर देखने को मिलती है. ये बहुत जल्दी किसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं. यह आकर्षण फिजिकल होता है, इसलिए कुछ दिनों बाद वह आदमी बोर लगने वगता है. फिर उस आदमी की बातें, विचार और पसंद अच्छी नहीं लगतीं.मन में उसे छोड़ कर भाग जाने का मन होने लगता है.

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 प्रेम को शारीरिक संबंध की बाऊंड्री में न लाएं

सेक्सुअल रिलेशन हम सब की जरूरत है. आदमी की बेसिक जरूरत में एक जरूरत है. पर प्रेम केवल शारीरिक संबंधों की बाऊंड्री में नहीं आता. प्रेम इस सब से परे है. हम जब अपने पार्टनर से जुड़ते हैं, तो शारीरिक रूप से खुश रखने के साथसाथ मानसिक रूप से भी खुशी देने के वचन का हमेशा पालन करना चाहिए. क्योंकि शारीरिक खुशी कहीं न कहीं स्वखुशी भी होती है. जबकि पार्टनर को दिया जाने वाला प्रेम, लगाव, स्नेह और अपनेपन की भावना पूरी तरह पार्टनर की खुशी के लिए किया गया कार्य है.

 छोटे स्टेप्स भी ध्यान देने लायक

ऐसा कहा जाता है कि प्रेम करने वाला व्यक्ति आप द्वारा की गई छोटी से छोटी बात पर ध्यान रखता है और यह बात उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है. जेसेकि पति उठे तो उसके लिए गरम पानी तैयार रखना, इससे पति को आप की केयरिंग का आभास होगा. पार्टनर की छोटी से छोटी बात का ध्यान रखने की आदत, रास्ते में जा रहे हों और पार्टनर को ठंड लगने पर अपनी जैकेट उतार कर ओढ़ाने की आदत, कार में जा रहे हों, पार्टनर जहां उतरे उसे हग कर के सीआफ करने की आदत, थोड़ा समय निकाल कर पार्टनर को सरप्राइज देने की आदत, सुबह उठने तथा रात को सोने के पहले उसी तरह बाहर से आने पर तुरंत स्नेहिल हग करने की आदत, पार्टनर को उसके कार्यस्थल से पिकअप करने की आदत, लांग ड्राइव पर गए हों तो पार्टनर की पसंद के गाने बजाने की आदत, जैसे छोटेछोटे काम भी आपको प्रेम करने के लिए अति महत्वपूर्ण हो सकते हैं. क्योंकि आपकी यही आदतें आपको अनुभव कराएंगी कि आप उसके लिए महत्वपूर्ण हैं.

 समय समय पर संबंध को पोसना जरूरी है

खैर, आप कहेंगे कि नयानया संबंध बना है तो सभी ऐसा करते हैं. यह बात सौ प्रतिशत सच है, नया संबंध बना हो, एकदूसरे को इम्प्रेश करने की शुरुआत हो तो इस तरह की तमाम छोटीछोटी चीजें एकदूसरे के लिए पार्टनर्स करते रहते हैं. पर जैसेजैसे समय गुजरता जाता है, वैसेवैसे ये चीजें भुलाती जाती हैं. कहो कि पार्टनर एकदूसरे को टेकेन फार ग्रांटेड लेना चाहते हैं. यह टेकेन फार ग्रांटेड लेने की आदत ही संबंधों में गैप लाने की शुरुआत करती है. ‘बारबार थोड़ा प्रेम जताना हो’?’ ‘यह तो पता ही हो न?’ ‘संबंध को कितना समय हो गया, अब यह बहुत अच्छा नहीं लग रहा’, ‘यह लपरझपर हमें नहीं आता’, ‘यह सब नयानया संबंध बना था तो किया था, अब हमेशा के लिए यह अच्छा नहीं लगता’, आदमी की यही मानसिकता संबंध में गैप लाने का काम करती है. एक सीधासादा उदाहरण देखते हैं. हम घर में एक पेड़ उगाते हैं. शुरूशुरू में उसकी खूब देखभाल करते हैं. उसमें खाद डालते हैं  पानी डालते हैं. थोड़ेथोड़े दिनों में उसकी गुड़ाई कर के उसे हराभरा रखने की कोशिश करते हैं. जब तक यह सब करते रहते हैं, तब तक पेड़ खूब हराभरा रहता है. उसमें सुंदर फूल भी आते हैं. पर जैसेजैसे समय गुजरता जाता है, पेड़ भी बड़ा हो जाता है, देखने में सुंदर लगने लगता है, तब उसकी देखभाल कम कर देते हैं. ऐसा करने से कुछ दिनों में पेड़ सूख जाएगा. संबंधों में भी ऐसा होता है. संबंध भी जतन मांगते हैं. इन्हें टेकेन फार ग्रांटेड लेने के बदले इनका जतन करें. संबंध में भी स्नेह, प्रेम लगाव की खाद और पानी डालते रहें. इस तरह करने से वह हमेशा हराभरा रहेगा.

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 जतन सब से ज्यादा जरूरी

लड़केलड़की के बीच संबंध बनता है तो सेक्सुअली क्लोजनेस आ ही जाती है, यह स्वाभाविक भी है. पर शारीरिक निकटता के साथ संबंध में स्नेह और मानसिक निकटता भी बनाए रखें, पार्टनर की छोटीछोटी बात का ध्यान रखें, यहां केवल लड़का या लड़की ही नहीं, दोनों की बात है. दोनों ही एकदूसरे के लिए ज्यादा समय न निकाल सकते हों तो भी छोटेछोटे काम से एकदूसरे के लिए लगाव फील कराएं, जैसेकि सुबह उठ कर एकदूसरे को स्नेह भरा हग करें, लंच बनाते समय एक साथ समय गुजारें, एकदूसरे की तमाम चीजों का ख्याल रखें, एकदूसरे को दिन में बारबार आई लव यू कहें, पूरे दिन क्या किया, रात को एकदूसरे से जानें, मन में क्या चल रहा है, एकदूसरे से शेयर करें. पार्टनर फ्रस्ट्रेट हो तो उस पर गुस्सा होने के बजाय उसे संभालें. छोटीछोटी सरप्राइज दें. जैसा पहले बताया कि संबंध भी हरेभरे पेड़ की तरह है. इसे टेकेन फार ग्रांटेड लेने के बजाय इसका जतन करना जरूरी है.

समय के साथ जरूरी है ग्रूमिंग

दादी, नानी बन कर घर व नातीपोते तक ही सीमित न रहें बल्कि बढ़ते समय के साथ आप अपनी ग्रूमिंग करती रहें. अपने रंगरूप के प्रति सचेत रहें. फेशियल मसाज, बालों का रखरखाव आदि के प्रति बेरुखी न अपनाएं. माह में 1 बार ब्यूटीपार्लर जाएं या घर पर ही ब्यूटी ऐक्सपर्ट को बुलाएं. आजकल तो घर पर जा कर भी ब्यूटी ऐक्सपर्ट अपनी सेवाएं उपलब्ध कराती हैं. यह सब रही बौडी की ग्रूमिंग की बात.

मनमस्तिष्क की ग्रूमिंग के लिए आज के आवश्यक वैज्ञानिक उपकरणों का प्रयोग करना अवश्य सीखें. ‘अब क्या करना है सीख कर’ जैसा विचार अपने पास फटकने न दें. आज मोबाइल पर फोटो खींच कर व्हाट्सऐप से भेजना, फेसबुक पर पोस्ट करना और गूगल द्वारा नईनई जानकारी प्राप्त करना सहज हो गया है. रोजमर्रा के सोशल नैटवर्क को अपना कर आप, घर बैठे ही, सब से  जुड़ी रहेंगी.

बुजुर्ग महिला विमला चड्ढा अपने 75वें जन्मदिन पर मोबाइल में व्हाट्सऐप व फेसबुक पर उंगलियां चला रही थीं. उन की बहू के साथसाथ उन के नातीनातिन बड़े ही गर्व से उन्हें निहार कर खुश हो रहे थे.

1980 में सोशल साइंटिस्ट विलियम जेम्स ने कहा था कि 30 वर्ष की उम्र तक बना व्यक्तित्व एक प्लास्टर की भांति ठोस हो कर पूरे जीवन हमारे साथ रहता है. यानी इस उम्र तक हम जो बन जाते हैं, वैसे ही पूरे जीवन रहते हैं. यह धारणा 90 के दशक तक चली.  आज के सोशल साइंटिस्ट के अनुसार, हमारा व्यक्तित्व एक खुला सिस्टम है जिस में हम जीवन के किसी भी समय में, वर्तमान स्टाइल, जीवन का नया तरीका अपना सकते हैं. प्लास्टिसिटी सिद्धांत के अनुसार, जिंदगी में उम्र के किसी भी पड़ाव में परिवर्तन किया जा सकता है.

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ऐसी कई छोटीछोटी राहें हैं, कदम हैं, जिन के द्वारा ग्रूमिंग होती रहती है, व्यक्तित्व निखरता रहता है, जैसे कि-

अंगरेजी शब्दों के आज के उच्चारण पर ध्यान दें. उन्हें याद रखें. जैसे कि ‘डाइवोर्स’ शब्द को आजकल ‘डिवोर्स’ बोला जाता है. ‘बाउल’ (कटोरा) को ‘बोल’ कहा जाता है. मुझे याद है, रीझ को ‘बीअर’ कहा जाता था अब ‘बेअर’ कहा जाता है. ऐसे और भी कई शब्दों के उच्चारण आत्मसात करते रहें.

औनलाइन शौपिंग करना, टिकट बुक कराना जैसे कार्य सीखें. हां, औनलाइन शौपिंग करने पर होशियार अवश्य रहें. शौपिंग से पूर्व, विके्रता कंपनी से वस्तु की गारंटी तथा उस की क्याक्या शर्तें हैं, यह जरूर जान लें. वस्तु पसंद न आने पर रुपयों के वापसी की गारंटी या वस्तु बदलने की गारंटी लें. एमेजोन और फ्लिपकार्ट जैसी शौपिंग साइटें गारंटी देती हैं. थर्डपार्टी से शौपिंग करने से बचें. इस में धोखा होने की संभावना होती है.

सांस्कृतिक कार्यों, गोष्ठियों में रुचि बनाए रखें. संभव हो तो उन में भाग लें. अपने विचारों का आदानप्रदान करें. इस से सकारात्मक भाव बना रहता है.

अपने बच्चों व नातीपोतों की फेवरिट बनी रहने के लिए नईनई रैसिपी सीखती रहें. इन्हें आप टीवी, यूट्यूब या गूगल द्वारा सीख सकती हैं. इस से आप में आत्मविश्वास, एक जोश पनपेगा. जब चाहें तब अपने बच्चों की पसंद की डिश बना कर आप उन्हें सरप्राइज दे सकती हैं.

बच्चों की इच्छा पर रैस्टोरैंट जा कर, उन की पसंद की डिशेज खाएं. हो सकता है वह आप को पसंद न भी आए, पर सब की खुशी में शामिल हो कर स्वयं को उन डिशेज के टेस्ट से ग्रूमिंग करें.

पुरानी मानसिकता त्याग दें. सब से प्रथम, अपना भविष्य देखना, सुनना (टीवी व रेडियो), अखबार में पढ़ना तुरंत छोड़ दें. ‘वृद्धावस्था तो बस माला जपने, धार्मिक पोथी पढ़ने के लिए ही बुक होती है,’ जैसी पुरानी मानसिकता का त्याग कर दें.

किसी भी पुरानी आदत को स्वयं से चिपकाए न रखें. किसी ने कहा है कि ‘आदत एक जबरदस्त रस्सी होती है जिसे प्रतिदिन हम अपने ही हाथों बंटते हैं.’ सो, इसे अपने ही हाथों खोल डालें. खुले हृदय से परिवर्तन को स्वीकारें. उदाहरण के तौर पर, आज बर्गरपिज्जा के समय में आप अपने बच्चों को अपने समय का सत्तू, गुड़धानी खिलाने की जिद करेंगी तो परिणाम आप स्वयं जानती हैं. समय के साथ बदलना, जीवन को सार्थकता देता है.

सो, उम्र के नाम पर, ग्रूमिंग की पंक्ति में पीछे खड़ी न रहें. आज की सासबहू, मांबेटी स्मार्ट पोशाक, स्मार्ट व्यक्तित्व व आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों की जानकारी के साथ जब बराबर कदम उठा कर चलती हैं, तब आसपास की उठती निगाहें ‘वाह, वाह’ कह उठती हैं.

बस, आप को ग्रूमिंग करते रहना है बदलते समय के साथ. न पीछे मुड़ कर देखें और न अडि़यल बनें. फिर देखिए, आप के चारों ओर खुशी और ऊर्जा बिखरी होगी.

बैंकिंग कार्य से परिचित व जुड़ी रहें, जैसे चैक जमा करना, रुपए निकालना, अपना लौकर औपरेट करना आदि. आप ने यह कार्य छोड़ रखा है तो अब शुरू कर दें. अगर कभी किया ही नहीं है तो सीख लें. इस तरह एक अलग ही आत्मविश्वास पनपेगा आप के व्यक्तित्व में.

समयानुसार अपने विचारों को बदलते रहें. आज के तरीकों व परिवेश को सहजतापूर्वक स्वीकारें. आज से कुछ दशकों पूर्व, शादी से पहले लड़कालड़की का खुलेआम घूमना, साथ समय व्यतीत करना संभव न था. पर अब शादी से पूर्व घूमनेफिरने के साथसाथ रहना तक भी संभव हो रहा है ताकि एकदूसरे की कंपैटिबिलिटी जानी जा सके. ऐसी बातों पर आप तनावग्रस्त न हों.

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अपने लिए कोई न कोई, चाहे छोटा ही हो, लक्ष्य चुनती रहें. चलते रहना जीवन है, रुक जाने का नाम मृत्यु है. तो चलती रहिए जीवनपर्यंत नईनई मंजिलों की ओर. इस तरह तनमन में एक जोश व ऊर्जा बनी रहती है. ‘अब तो आखिरी पड़ाव है, अब क्या करना है,’ ऐसे विचार को दिमाग से खुरच डालिए. अंगरेजी में कहावत है- ‘कावर्ड्स डाई मैनी टाइम्स, बिफोर देअर डैथ.

अपनी उम्र के अनुसार आधुनिक स्टाइल की पोशाकें खरीदें व बनवाएं. ‘अब तो उम्र निकल ही गई, अब क्या करना है नई पोशाकों का’, ऐसा बिलकुल न सोचें. अपनी वार्डरोब समयसमय पर बदलती रहें. बुजुर्ग महिला चांद वालिया अपनी उम्र के 80 दशक में भी कलफ लगी कौटन साड़ी, ट्राउजर आदि पहनती रहीं. सारा फ्रैंड सर्किल और पड़ोसी उन की पसंद पर दाद देते थे.

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