बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाने के 6 टिप्स

2 साल के अस्मित ने अभी नया नया ही चलना सीखा है पर जैसे ही वह खुद चलने की कोशिश करता है तो उसके गिरने के डर से मां मीता उसे गोद में उठा लेती है या फिर हाथ पकड़ कर चलाती है…इससे अस्मित भी धीरे धीरे चलने से डरने लगा है.

5 वर्षीया अनाया जब भी खुद से खाना खाने या अपना बैग लगाने की कोशिश करती है तो मां रीना यह कहकर उसे रोक देती है कि रहने दो तुम नहीं कर पाओगी इससे अनाया को भी अब लगने लगा है कि वह नहीं कर पायेगी क्योंकि अब वह स्वयं कोशिश करने की अपेक्षा पहले ही बैग लगाने के लिए आवाज लगाती है.

बच्चा जन्म के समय बिल्कुल गीली मिट्टी अथवा आटे के समान होता है आप जैसा उसे बनाते हैं वह वैसा ही बन जाता है. वर्तमान में परिवार में आमतौर पर एक या दो बच्चे ही होते हैं जिन्हें अभिभावक बड़े लाड़ प्यार से पालते हैं परन्तु कई बार उनका यह अति लाड़ प्यार धीरे धीरे उनके आत्मविश्वास को कम करने लगता है जिससे उनके व्यक्तित्व का समुचित विकास ही नहीं हो पाता जो बड़े होने पर उसके लिए ही नुकसानदेह साबित होता है. प्रस्तुत हैं कुछ टिप्स जिनका ध्यान रखकर आप अपने बच्चे में आत्मविश्वास की वृद्धि कर सकते हैं-

 -प्रशंसा करें

रीमा ने जैसे ही ऑफिस से आकर घर में प्रवेश किया तो देखा कि रोज की अपेक्षा आज घर बड़ा ही व्यवस्थित नजर आ रहा है ….उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसकी 5 वर्षीया बेटी ने किया है उसने अपनी बेटी को गले लगाकर शाबासी दी जिससे बेटी हर रोज ही कोई न कोई कार्य करने का प्रयास करती है. बच्चा जब भी कोई कार्य करे भले ही वह उस कार्य को करने में असफल हो जाये आप उसके प्रयास की सराहना अवश्य करें ताकि भविष्य में वह कार्य को करने से डरे नहीं. आपके द्वारा की गई तारीफ उसके उत्साह में वृध्दि करेगी जिससे वह नए कार्य को करने में भी हिचकिचएगा नहीं.

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-आदर्श प्रस्तुत करें

बच्चों के लिए माता पिता सबसे बड़े उदाहरण होते हैं क्योंकि बच्चे का सबसे पहला स्कूल घर होता है और वे जैसा व्यवहार अपने माता पिता को करते हुए देखते हैं वैसा ही सीखते हैं. जिन घरों में माता पिता एक दूसरे के कार्यों में परस्पर मदद करते हैं वहां बच्चे भी अभिभावकों के साथ मिलजुलकर घर बाहर के कार्यों को करते हैं जो निस्संदेह उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायक होते हैं.

-दें छोटी छोटी जिम्मेदारियां

बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार अपने खिलौनों , किताबों को व्यवस्थित रखना अथवा अपनी शेल्फ को जमाने जैसे कार्य करने को दें इससे उनमें अपने कार्य को स्वयं करने की प्रवृत्ति का विकास होगा. कई बार माताएं काम फैल जाने के डर से बच्चों को काम नहीं करने देतीं परन्तु हर समय उन्हें सब कुछ रेडी करके देने से उनके मेहनत करने की आदत का विकास हो ही नहीं पाता जो उनके ही भविष्य के लिए अत्यंत घातक होता है क्योंकि जिंदगी में बिना परिश्रम के कुछ भी हासिल नहीं होता.

– निर्णय को तरजीह दें

आजकल 5-6 वर्ष की आयु के बच्चे भी अपनी पसन्द की ड्रेस पहनना पसंद करते हैं परन्तु अक्सर अभिभावक उनकी बातों पर ध्यान न देकर अपनी इच्छा उन पर थोपते हैं परन्तु इससे उनके आत्मविश्वास में कमी होने लगती है. बच्चे का कोई भी कार्य यदि आपको नापसन्द है तो उसे अनुभव से सीखने दें और फिर उसे तर्क सहित अपनी बात बेहद प्यार से समझाएं.

-बात बात पर न टोकें

छोटी छोटी बातों पर हरदम टोकने की अपेक्षा सप्ताह में एक बार बच्चे को अपने पास बैठाकर प्यार से अपनी बात समझाएं. जहां तक सम्भव हो अपनी बात को सीधे कहने की अपेक्षा उदाहरण देकर अप्रत्यक्ष रूप से समझाने का प्रयास करें.

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-तुलना न करें

बच्चे की कभी भी उसके भाई बहन या दोस्तों से तुलना न करें क्योंकि संसार में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी खूबियां और खामियां होती हैं. दूसरे से तुलना करने पर बच्चे का स्वाभिमान आहत होता है जिससे धीरे धीरे उसके अंदर हीन भावना का जन्म होने लगता है.

महिलाओं के इन 10 नखरों के बारे में जान कर आप मुस्कुराए बिना नहीं रहेंगे

महिलाएं किसी माने में पुरुषों से कम नहीं हैं. कई क्षेत्रों में तो वे पुरुषों को भी पछाड़ चुकी हैं. बात बचत की हो या फिर परिवार को बांधे रखने की, महिलाएं अपनी सारी भूमिकाएं बखूबी निभाती हैं. उन में खूबियों के साथसाथ कुछ ऐसी हरकतें भी होती हैं, जिन का जवाब मिल पाना मुश्किल है. आइए, जानते हैं वे हरकतें कौन सी हैं :

पीछे बुराई सामने बखान:

आप ने अकसर अपनी श्रीमती को अपनी सहेली से कहते सुना होगा कि अरे वह नीलिमा न जाने खुद को क्या समझती है. थोड़े अच्छे कपड़े क्या पहनती है, उसे लगता है उस से सुंदर कोई और है ही नहीं. लेकिन जैसे ही श्रीमती की मुलाकात नीलिमा से किसी पार्टी या फंक्शन में होती है तो उन की राय तुरंत बदल जाती है. तब वे कहती हैं कि हाय नीलिमा, आप की साड़ी बहुत सुंदर है. साडि़यों का कलैक्शन आप के पास कमाल का है. कोई कुछ भी कहे, मुझे आप की ड्रैसिंग सैंस बेहद पसंद है. भई, जब आप को तारीफ करनी ही थी तो पीठ पीछे बुराई क्यों की और अगर सच में मन में नफरत थी तो फिर यह तारीफ क्यों? अब आप ही बताएं कि है न यह सोचने वाली बात?

सलाह लेंगी पर मन की करेंगी:

‘‘अच्छा मांजी मैं व्यायाम क्लास के लिए कहां जाऊं सरकार नगर या बगल वाली बिल्डिंग में?’’

मान लें कि मांजी ने कहा सरकार नगर, लेकिन तब भी वे पति से पूछेंगी, ‘‘आप को क्या लगता है मुझे व्यायाम क्लास के लिए कहां जाना चाहिए?’’

माना पति ने भी कहा सरकार नगर. पर 2 लोगों से एक सा जवाब पाने के बाद भी उन के दिल को तसल्ली नहीं मिलती. अपनी 2-4 सहेलियां से भी यही सवाल पूछेंगी और आखिर में कहेंगी, ‘‘मैं सोच रही हूं बगल वाली बिल्डिंग ठीक रहेगी. सरकार नगर वाली क्लास में बाकी सुविधाएं तो ठीक हैं, लेकिन वह घर से थोड़ा दूर है.’’

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श्रीमतीजी, जब आप को अपने मन की करनी ही थी तो लोगों की सलाह क्यों ली?

खाएंगी भी मोटापे से भी डरेंगी:

‘‘बस…बस थोड़ा ही देना’’  ‘‘अरे यह ज्यादा है थोड़ा कम करो’’, ‘‘चलो आप कह रही हैं तो चख ही लेती हूं’’, ‘‘इतना काफी है ज्यादा खाऊंगी. तो मोटी हो जाऊंगी.’’ जब भी खानेखिलाने की बात होती है महिलाएं अकसर इन जुमलों का इस्तेमाल करती हैं. लेकिन खाती जरूर हैं. इतना ही नहीं, खाने की सामग्री थोड़ाथोड़ा कहतेकहते अधिक भी हो जाती है और किसी को पता भी नहीं चलता. उन्हें भी नहीं.

अगर वाकई में उन्हें नहीं खाना है तो इतनी सारी बातें कहने के बजाय एक साधारण सा न भी कह सकती हैं.

5 मिनट कहेंगी सजने में घंटों लगा देंगी:

‘‘बस 5 मिनट में रैडी हो कर आई’’, ‘‘हां…हां… मैं तैयार हूं बस 3 मिनट’’, ‘‘बस आ ही रही हूं.’’ महिलाओं के मुंह से ये वाक्य तब सुनने को मिलते हैं जब वे तैयार हो कर कहीं जाने के मूड में होती हैं. पूछने पर हर बार कहती हैं कि बस ‘‘5 मिनट’’ और उन के ये 5 मिनट 5 से 10, 10 से 15, 15 से 20 बढ़ते जाते हैं. हैरान करने वाली बात तो यह है कि तैयार होने में 30 मिनट से भी अधिक समय लगाने के बावजूद कुछ न कुछ बाकी ही रहता है. इस का खुलासा तब होता है जब कोइ उन्हें कहता है कि मिसेज शर्मा, आप बहुत खूबसूरत नजर आ रही है और वे जवाब में कहती हैं, ‘‘क्या खूबसूरत. मैं तो अच्छी तरह से तैयार भी नहीं हो पाई, शर्माजी को आने की जल्दी जो पड़ी थी.’’ क्यों यह भी सच है न?

साथी को बदलेंगी फिर बदलाव से चिढ़ेंगी:

हमसफर भले कितना भी अच्छा क्यों न हो, महिलाओं के लिए वह कभी परफैक्ट नहीं होता है. बारबार टोक कर वे उसे हमेशा सुधारने में लगी रहती हैं. ‘‘भई, पार्टी में कभी आगे बढ़ कर आप भी लोगों से बात कर लिया करो,’’ ‘‘आप कभी खुद शौपिंग पर जा कर हमारे लिए कुछ नहीं लाते हो.’’

बेचारे पति कई बार ये ताने सुनने के बाद खुद को बदल लेते हैं. तब वही पत्नियां उन से कहती हैं, ‘‘पार्टी में तुम्हें लोगो से मिलने की बड़ी जल्दी होती है’’, ‘‘यह अपने मन से क्या उठा लाए? जब शौपिंग करनी नहीं आती है तो करते क्यों हो?’’ अब आप ही बताएं कुसूरवार कौन है?

शौपिंग के लिए हर वक्त रहेंगी रैडी:

‘‘मैं औनलाइन शौंपिंग में यकीन नहीं रखती,’’  कहने वाली महिलाएं को अगर इंटरनैट पर कोई काम करते वक्त साड़ी, सूट या ज्वैलरी का विज्ञापन दिख जाए, तो क्लिक कर के एक बार उसे देखती जरूर हैं. भई, अगर खरीदना नहीं है तो देखना क्यों? कुछ कहती हैं, ‘‘मैं तो बस फलां मौल से शौपिंग करती हूं.’’ लेकिन अगर पता चल जाए कि पास में ज्वैलरी की नई शौप खुली है तो देखने जरूर पहुंच जाती हैं. खरीदें या न खरीदें यह बाद की बात है.

‘‘मैं तो बस संडे को शौपिंग करती हूं.’’ ऐसा कहने वाली महिलाओं की भी कोई कमी नहीं है, लेकिन यह भी बस कहने की बात है. कुछ दिनों बाद वे खुद कहती हैं, ‘‘सोच रही हूं मंडे को शौपिंग पर चली जाऊं, घर में अकेली बैठ कर क्या करूंगी?’’

कहने का मतलब बस यही है कि महिलाएं किसी भी स्थिति में और कहीं भी शौपिंग के लिए तैयार रहती हैं.

हर बात को ले कर रहती हैं कन्फ्यूज्ड:

‘‘जानू शादी में क्या पहनूं, लहंगासाड़ी या फिर घाघराचोली’’, ‘‘मांजी नास्ते में क्या बनाऊं डोसा या ढोकला’’, ‘‘क्या करूं यार समझ नहीं पा रही पार्टी में जाऊं या नहीं.’’ बात छोटी हो या बड़ी, फैसले को ले कर महिलाएं हमेशा कन्फ्यूज्ड रहती हैं. ‘करूं या न करूं, जाऊं या नहीं. क्या पहनूं, क्या नहीं खाऊं या न खाऊं’ जैसी तमाम बातें महिलाओं से जुड़ी होती हैं, लेकिन फैसले को ले कर वे हमेशा हां, न में ही उलझी रहती हैं. मजेदार बात यह है कि महिलाएं जिन बातों को ले कर उलझन में रहती हैं, उन को छोड़ कर कुछ तीसरा ही करती हैं.

लड़ेंगी भी रोएंगी भी:

यह कहना गलत नहीं होगा कि पत्नियां पतियों के सामने अपने आंसुओं का इस्तेमाल तलवार की तरह करती हैं, जिन्हें देख कर बेचारे पति खुद घुटने टेक देते हैं. मजेदार बात तो तब होती है जब गलती खुद पत्नी की होती है, लेकिन वे पति पर बरस पड़ती हैं और आखिर में आंसू बहा कर पति को यों एहसास दिलाती हैं जैसे गलती उन की है. बेचारे पति भी कुछ समझ नहीं पाते. पत्नी की आंखों में आंसू देख कर सौरी बोल कर मामले को रफादफा कर देते हैं और पत्नियां मन ही मन मुसकराती हैं. न जानें वे ऐसी क्यों हैं?

हर हाल में कहेंगी मैं ठीक हूं:

‘‘आप को मेरी कोई फ्रिक नहीं है’’, ‘‘कल से मेरी तबीयत खराब है. पर आप को क्या’’, ‘‘मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा है, लेकिन आप को क्या.’’  जैसी न जानें कितनी बातें हैं, जो पत्नियां अपने पति से अकसर गुस्से में कहती हैं खासकर तब जब पति उन का हालचाल उन से न पूछे. लेकिन पत्नियों के तानों के बाद जब कभी पति पत्नी से पूछता है कि अब दर्द कैसा है या तबीयत कैसी है  तो पत्नी कहती है कि मैं ठीक हूं, फिर चाहे दर्द ज्यों का त्यों क्यों न हो. अब आप ही बताएं जब ठीक ही थी तो पति को इतनी बातें सुनाने की क्या जरूरत थी.

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नाराज भी रहेंगी फिक्र भी करेंगी:

चाहे पति आसमान से चांद ही क्यों न ले आएं, लेकिन पत्नियां हमेशा उन से नाराज ही रहती हैं. लेकिन यह भी सच है कि  उन की नाराजगी में फ्रिक भी छिपी होती है. नाराजगी के चलते वे भले फोन लगा कर आप से प्यार भरी बातें न करें, लेकिन नाराजगी के अंदाज में आप की खैरियत का जायजा ले ही लेती हैं. इतना ही नहीं, अपनी नाराजगी को वे हमेशा एक ओर रखती हैं और पति की चायपानी, टिफिन जैसी जरूरतों को एक तरफ, कभी वे अपनी नाराजगी में पति का नुकसान नहीं करती हैं. अब आप ही बताएं क्या वे ऐसी नहीं हैं?

इमोशनल ब्लैकमेलिंग : संबंधों के माध्यम से शोषण

लेखक- वीरेन्द्र बहादुर सिंह 

एक कार्पोरेट कंपनी में सीए धर्मेश अपने काम से काम रखने वाला युवक था. इसलिए उसे किसी लड़की से प्रेम करने का मौका ही नहीं मिला. उसके मां-बाप ने उसके लिए लड़की खोजनी शुरू कर दी. कई लड़कियां देखने के बाद यात्री नाम की एक लड़की उन्हें पसंद आ गई. यात्री ने एमकाॅम कर रखा था. वह एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर थी. वह सुंदर और प्रतिभाशाली युवती थी. मैनेजमेंट को उस पर गर्व था. मनचाहा परिणाम लाती थी वह.

यात्री और धर्मेश ने एकदूसरे को पसंद कर लिया था. एक दो बार मिले, रेस्टोरेंट में साथ खाना खाया, थोड़ा घूमे-फिरे, एकदूसरे के विचारों को जाना. धर्मेश की मां का स्पष्ट कहना था कि लड़के और लड़की ने एकदूसरे को पसंद कर लिया, बात पूरी हो गई. बाकी सब गौड़ है. यात्री और धर्मेश की खुशीखुशी शादी हो गई. दोनों हनीमून टूर पर विदेश गए. सब कुछ बढ़िया चल रहा था. बस, एक बात की तकलीफ थी. यात्री का स्वभाव सीधी लाइन जैसा नहीं था. वैसे तो वह योग्य और प्रतिभाशाली थी, पर बातबात में उसकी नाराज हो जाने की आदत थी. उसे जो चाहिए, वह नहीं मिलता तो वह नाराज हो जाती. उसके मन का काम न होता तो वह खाना न खाती.

वैसे तो दांपत्यजीवन में रिसाने और मनाने का एक अलग ही मजा और लिज्जत होता है. पर यहां बात एकदम अलग थी. यहां यात्री बारबार जो नाराज हो रही थी, वह इमोशनल ब्लैकमेलिंग थी. शुरूआत के दिनों में तो धर्मेश ने यह सब सहम किया, पर बात गले तक आ गई तो परशानी होने लगी. पति के रूप में उसे जितना सहन करना चाहिए था, उसने सहन किता. वह एक परिपक्व और समझदार पति था. वह घंटोंघंटो यात्री को समझाता. वह कहता कि यात्री तुम यह जो कर लही हो, वह उचित नहीं है. तुम्हारा हर मामले में रोकटोक लगना ठीक नहीं है. जब देखो, तब तुम नाराज हो जाती हो और घर वालों से बोलना बंद कर देती हो.

दूसरी ओर यात्री के लिए अपना स्वभाव बदलना मुश्किल था. समयसमय पर वह अपने स्वभाव के अनुसार घर में अपनी चलाती, जिससे घर का वातावरण भारी हो जाता. धर्मेश के माता-पिता दुखी हो ग्ए. हंसता-खेलता, किल्लोल करता परिवार अचानक मौन हो गया. जब देखो, तब घर का वातावरण भारी रहता.

ऐसा अक्सर होता है. इमोशनल ब्लैकमेलिंग एक तरह की बीमारी है. यह एक तरह की अवस्था है. ऐसे तमाम लोग होते हैं, जिनकी इमोशनल ब्लैकमेलिंग करने की गलत आदत होती है. भावनात्मक ब्लैकमेल एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कोई व्यक्ति जो चाहता है, उसे पाने के लिए धमकाता है. ये धमकियां अलग-अलग स्तर की होती हैं. भावनात्मक ब्लैकमेलिंग इस तरह का वातावरण बना देती है, जिसमें वातावरण बोझिल, भारी, तनावपूर्ण, अनिश्चित और दुखी करने वाला हो जाता है.

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ब्लैकमेल करने वाले व्यक्ति की एक निश्चित प्रकार की मानसिकता होती है. इमोशनल ब्लैकमेलिंग कर के अपना काम कराने की उसकी गंदी आदत पड़ चुकी होती है. इमोशनल ब्लैकमेलिंग करने वाला व्यक्ति प्यार को एक हथियार के रूप में काम करता है. इस तरह के व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति के हृदय की संवेदना का क्रूर उपयोग करते हैं.

प्रेम तीन स्तर पर व्यक्त किया जाता है.

1) संवेदना

2) स्नेह

3) भावनात्मकता

संवेदना प्रेम को व्यक्त करने का सर्वोत्तम स्तर है. संवेदना प्रेम का एक स्वरूप है. स्नेह के स्तर पर प्रेम व्यक्त होता है. स्नेह के स्तर पर व्यक्त किए जाने वाले प्रेम में संबंध चमकते रहते हैं. संबंधों के अलग-अलग शेड होते हैं. संबंधों के अलग-अलग प्रवाह होते हैं. हर संबंध की तरह सौंदर्य होता है, उसी तरह हर शब्द के अंदर का और बाहर का भी प्रवाह होता है. इसी प्रवाह के अनुरूप लगाव उसके साथ जुड़ा होता है. स्नेहशीलता प्रेम का ही एक स्वरूप है. स्नेहशीलता व्यक्त करने वाला प्रेम मुग्ध होता है. ये ऊपरी भी हो सकता है और छिछला भी. इस प्रेम में प्रेम करने वाले का व्यवहार प्रतिबिंबित होता रहता है. महिलाएं प्रेम का स्वरुप हैं. महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अधिक श्रद्धा और प्रेम के आधार पर सोचती और जीती हैं. महिला यानी प्रेम, ममता, वात्सल्य, भावना, स्नेह, करुणा के फूलों की क्यारी. महिला और पुरुष में तार्किक फर्क यह है कि महिला पहले श्रद्धा और प्रेम के आधार पर जीती है. जब श्रद्धा थक जाती है, तब बुद्धि की शरण में जाती है. पुरुष का इससे उल्टा है. पुरुष बुद्धिप्रधान है. वह बुद्धि से सोचता और जीता है. जब उसकी बुद्धि थक जाती है, तब वह प्रेम की शरण में जाता है.

महिलाएं स्नेह के आधार पर सोचती हैं, तभी ठगी जाती हैं. अनेक परिवारों में संतानें मां को महिला के रूप में इमोशनल ब्लैकमेल करते रहते हैं. कभी-कभी यह काम पति भी करते हैं. अगर भारत की महिलाएं स्नेहशीलता से ऊपर उठ कर भावना या संवेदना की भूमिका में जीवन जीने लगेंगी, तब वे अच्छी तरह प्रेम व्यक्त कर सकेंगी और उचित प्रेम पा भी सकेंगीं.

महिलाएं अपने साथ हुए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खराब या कड़वे अनुभव की वजह से इमोशनल ब्लैकमेलिंग के लिए प्रेरित होती हैं. शुरू में यात्री की जो बात की गई है, उसके मामले में भी ऐसा ही हुआ है. यात्री की मम्मी उर्मिला के जीवप में भारी उथल-पुथल हुई थी. उनका जीवन अनेक समस्याओं और आरोह-अवरोह से भरा था. यात्री के पालन-पोषण में तमाम कमियां रह गईं थीं. जब वह बच्ची थी, तब घर में उसे सहज रूप से कुछ नहीं मिलता था. एकाध बार उसने जिद की, भावनात्मक ब्लैकमेलिंग की, तुरंत उसका काम हो गया. उसे पता चल गया कि अपने मन का कराने का यह शार्टकट है. यह उत्तम रास्ता है. बस, उसी के बाद उसकी आदत पड़ गई. सहजता और सरलता से जो मिलता, वह उसे अच्छा न लगता. वह ब्लैकमेल कर के लेती, तब उसे लगता, यह ठीक है.

मानव मन बहुत जटिल है. अगर इसे सही दिशा में ले जाया जाए तो निश्चित यह बढ़िया परिणाम देता है. अगर इसे गलत दिशा में विकसित किया जाए तो यह गलत बर्ताव करता है. इसकी शक्ति तो है ही, इस शक्ति का रचनात्मक उपयोग किया जाए तो सब बढ़िया होगा. धर्मेश ने एक मनोचिकित्सक से संपर्क किया. पूरी घटना को समझ कर मनोचिकित्सक ने रास्ता बताया.

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वह रास्ता धीरज और संयम का था. धर्मेश अपनी जगह दृढ़ था. वह किसी भी संयोग में अपने विशाल परिवार को हरा-भरा और खुशहाल देखना चाहता था. उसे अपने प्रेम पर विश्वास था. समय बीतता गया और समय के साथ यात्री के स्वभाव में परिवर्तन आता गया. कुछ समय में यात्री की इमोशनल ब्लैकमेलिंग करने की मंशा और आदत लगभग छूट गई. धर्मेश का मानना है कि दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिजका हल नहीं है. समस्या मात्र, हल के पात्र, अगर धीरज से, सच्ची निष्ठा से, प्रेम से समस्या हल की जाए तो परिणाम निश्चित और अच्छा आता है. धर्मेश ने इमोशनल शब्द से इमोशंस को पकड़ा. सच्चे प्यार में ताकत होती है. उसने उसी शक्ति का प्रयोग और विनियोग किया.

हर बार इसी तरह जीत मिल जाए ऐसा भी नहीं है. इमोशनल ब्लैकमेलिंग के मामले में अलग-अलग समाधान खोजना पड़ता है. कभी-कभी ब्लैकमेलिंग करने वाले के सामने सख्त होना पड़ता है. कभी-कभी सख्ती और प्रेम दोनों से काम लेना पड़ता है. जिंदगी अजब है, गजब है. प्रेम के बिना जिया नहीं जा सकता और वही प्रेम अलग-अलग स्वरूप में प्रकट होता है. जिंदगी के हर स्वरूप के आनंद को स्वीकार कर जीने में ही सच्ची मजा है.

पति के वर्कहोलिज्म को समझना है जरुरी

भावना शाह का विवाह एक मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत ऐग्जीक्यूटिव से हुआ था, जो 2 साल से अधिक नहीं चला. वजह थी पति का काम से अत्यधिक प्यार. अपने वर्कहोलिक पति से दुखी भावना 16 घंटे अकेले गुजारती थी, क्योंकि उस का पति आधी रात को घर आता था. उस की जिंदगी में न कोई उत्साह रहा था, न रोमांस के लिए समय बचा था. इस कारण उन की सैक्स लाइफ पूरी तरह से प्रभावित हो रही थी. भावना चाहती थी कि कुछ घंटे तो कम से कम पति के साथ बिताए और इसीलिए उस ने अपनी नौकरी भी छोड़ी थी ताकि दोनों की व्यस्तता उन के वैवाहिक जीवन में कड़वाहट न घोल दे.

हफ्ते के 5 दिन मुश्किल से दोनों में कुछ मिनट बात हो पाती और शनिवार, रविवार घर के किसी काम, मेहमानों की आवभगत में गुजर जाते. तब भावना ने तंग आ कर अपने पति से तलाक ले लिया. हालांकि तलाक लेना समस्या का समाधान नहीं है, पर पति की हर समय काम करने की आदत से अधिकांश पत्नियां परेशान रहती हैं. वर्कहोलिक पति वे होते हैं, जिन के लिए उन का काम सब से पहले होता है और उस के सामने पूरा परिवार या अन्य सामाजिक सरोकार गौण होता है. ऐसे पति की पत्नी उस के साथ के लिए तरसती रहती है और वह काम में डूबा रहता है वर्कहोलिक पति की पत्नी अकसर तनाव में रहती है या पति का साथ न मिल पाने की वजह से हर समय चिड़चिड़ी रहती है. बातबात पर लड़ाई करना उस की आदत बन जाता है, जिस से चिढ़ कर पति और देर तक घर से बाहर रहने लगता है.

‘‘मैं अपने पति की हर समय काम में डूबे रहने की आदत से इस कदर परेशान हो गई थी कि कभीकभी तो मुझे लगता था कि जैसे मैं शोकेस में रखी कोई चीज हूं, जिसे 5-10 मिनट के लिए मेरे पति नजर उठा कर देख लेते हैं. वे घर में होते तब भी मैं उन से बात न कर पाने के कारण बोरियत महसूस करती. कितनी ही छोटीछोटी बातें मैं उन से करना चाहती, पर उन के पास टाइम ही कहां था मेरी बातोें के लिए.लड़ाईझगड़ा करने का भी जब उन पर कोई असर नहीं हुआ तो मुझे एहसास हुआ कि वे भी टाइम इज मनी के इस दौर का शिकार हैं. मैं ने धीरेधीरे जब उन के वर्कहोलिज्म को समझना शुरू किया तो मुझे उन का काम करना अब उतना बुरा नहीं लगता, बल्कि अब मैं उन्हें काम में सहयोग देने की कोशिश भी करती हूं,’’ यह कहना है हाउसवाइफ शालू का.

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मैरिड टू वर्क

आज के समय में हम अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने में इतने व्यस्त हैं कि हमारी सारी भावनात्मक ऊर्जाएं काम की ओर लगी हैं. हम काम के प्रति इतने आसक्त हो जाते हैं कि अपने निजी संबंधों के बारे में सोचना तक भूल जाते हैं. काम इस तरह हावी हो जाता है कि यह भी याद नहीं रहता कि पत्नी भी साथ व समय चाहती है. मैरिड टू वर्क की वजह से कई युगलों का वैवाहिक जीवन खतरे में पड़ जाता है दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल के मनोविज्ञान विभाग की सीनियर कंसल्टैंट डा. स्वाति कश्यप का कहना है, ‘‘अगर आप का पति वर्कहोलिक है, तो उसे इस बात के लिए ताना देने या उस से लड़ने के बजाय उस के साथ बैठ कर बातचीत करें. फिर ऐसा समाधान ढूंढ़ें, जो आप दोनों के लिए उपयुक्त हो. जब बात करने बैठें तो आमनेसामने बैठने के बजाय साथसाथ बैठें और मैं या तुम के बजाय हम का प्रयोग करें. बात करते हुए अपने पति को उन की इस आदत के लिए दोष न दें, न ही अपने प्रश्नों से उन्हें आहत करने की कोशिश करें. आप कह सकती हैं कि उन का साथ आप को अच्छा लगता है और आप उन के साथ अधिक से अधिक समय गुजारना चाहती हैं.’’

स्थिति का पता लगाएं

सब से पहले पति के वर्कहोलिक होने के कारण को समझना जरूरी है. क्या यह व्यवहार स्थायी है या कुछ समय के लिए? हो सकता है पति को प्रोमोशन मिलने वाला हो और इस के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही हो या किसी प्रोजैक्ट की डैडलाइन हो या फिर उन के बौस का दबाव उन पर ज्यादा हो. बौस को खुश करने और उन की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए वे काम में डूबे रहते हों. यह देखें कि किसी एक महीने या त्योहारों के समय वे ज्यादा काम करते हैं क्या? अगर ऐसा है तो यह स्थिति अस्थायी हो सकती है. यह समझने का प्रयास करें कि वे क्या सचमुच काम को ले कर गंभीर हैं या झगड़ालू बीवी से तंग आ कर ज्यादा समय औफिस में बिताते हैं. जब पति को घर में सुकून नहीं मिलता है, तो वह जल्दी घर आने से कतराता है. अगर पत्नी उस के वर्कहोलिज्म का कारण है तो समाधान मिलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी. अगर सचमुच पति को काम की लत है और वे आप को नजरअंदाज करने या आप से बचने के लिए काम में नहीं डूबे रहते तो यह स्वीकार कर लें कि आप अपने पति को नहीं बदल सकती हैं. आप स्वयं को बदल सकती हैं. आप के व्यवहार के बदले में आप के पति में परिवर्तन आ सकता है.

कैसे निबटें पति के Workaholism से

पति के काम की कद्र करें:

अगर आप के पति ही अकेले कमाने वाले हैं और उन पर पूरे परिवार का दायित्व है, तो यह समझना आवश्यक है कि उन का काम उन के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है. वे आप की और परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही दिनरात मेहनत करते हैं. अगर आप उन के काम में सहयोग दे सकती हैं तो दें, लेकिन उन्हें उलाहने देते हुए परेशान न करें. दिन में 1-2 बार फोन कर के उन का हालचाल पूछें ताकि उन्हें एहसास हो कि आप उन की चिंता करती हैं और उन के काम की कद्र भी. काम शेयर करें: अगर पति औफिस के काम में उलझे रहते हैं, तो घर के अन्य कामों को करने के लिए उन पर जोर न डालें. घर के अन्य दायित्व अपने ऊपर ले लें ताकि वे निश्चिंत हो कर काम कर सकें.

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पानी या बिजली का बिल आदि जमा करने या घर के लिए खरीदारी का काम अपने हाथ में ले कर उन के काम को शेयर करें. आप के इस सहयोग को वे समझेंगे और आप के लिए समय निकालने का प्रयास अवश्य करेेंगे. घरपरिवार या बच्चों की छोटीछोटी समस्याओं का समाधान खुद कर लें. पति को परेशान न करें. घर का माहौल सुखद बनाएं: अकसर पत्नी के तानों व हर समय बड़बड़ाने की आदत से परेशान हो कर पति काम को उस से दूर रहने का जरिया बना लेता है. अगर घर में शांति का माहौल नहीं होता तो उस का घर आने का मन नहीं करता. घर का वातावरण सुकून भरा हो और अपनेपन की खुशबू उस में बहती हो, ऐसा करना पत्नी का दायित्व होता है. अगर घर में उसे प्यार मिलेगा तो वह घर आने के लिए लालायित रहेगा. कोई हौबी अपनाएं : अगर पति के लिए इतना काम करना अनिवार्य है, तो अपने समय को काटने के लिए किसी हौबी को अपनाएं. किताबें पढ़ें, अपने दोस्तों का दायरा बढ़ाएं. कुछ ऐसा करें, जिस में आप को खुशी मिले. इस से आप पति को ताने देने से भी बच जाएंगी और कुछ रचनात्मक काम करने का भी मौका मिलेगा. फिर जितना भी समय आप साथ होंगे, वह दोष देने व शिकायतें करने में ही नहीं बीतेगा.

अपने तरीके से जीने दें बेटे की पत्नी को

भारत के विक्रांत सिंह चंदेल ने रूस की ओल्गा एफिमेनाकोवा से शादी की. शादी के बाद वे गोवा में रहने लगे. कारोबार में नुकसान होने के बाद ओल्गा पति के साथ उस के घर आगरा रहने आ गई. लेकिन विक्रांत की मां ने ओल्गा को घर में आने देने से साफ मना कर दिया. कारण एक तो यह शादी उस की मरजी के खिलाफ हुई थी, दूसरा सास को विदेशी बहू का रहनसहन पसंद नहीं था.

सुलह का कोई रास्ता न निकलता देख ओल्गा को अपने पति के साथ घर के बाहर भूख हड़ताल पर बैठना पड़ा. ओल्गा का कहना था कि उस की सास दहेज न लाने और उस के विदेशी होने के कारण उसे सदा ताने देती रही है.

जब मामला तूल पकड़ने लगा तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को हस्तक्षेप करते हुए राज्य के मुख्यमंत्री से विदेशी बहू की मदद करने के लिए कहना पड़ा. उस के बाद सास और ननद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए गए. तब जा कर सास ने बहू को घर में रहने की इजाजत दी और कहा कि अब वह उसे कभी तंग नहीं करेगी.

नहीं देती प्राइवेसी

सास-बहू के रिश्ते को ले कर न जाने कितने ही किस्से हमें देखने और सुनने को मिलते हैं. सास को बहू एक खतरे या प्रतिद्वंद्वी के रूप में ही ज्यादा देखती है. इस की सब से बड़ी वजह है सास का अपने बेटे को ले कर पजैसिव होना और बहू को अपनी मनमरजी से जीने न देना. सास का हस्तक्षेप ऐसा मुद्दा है जिस का सामना बेटाबहू दोनों ही नहीं कर पाते हैं. वे नहीं समझ पाते कि पजैसिव मां को अपनी प्राइवेसी में दखल देने से कैसे रोकें कि संबंधों में कटुता किसी ओर से भी न आए.

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अधिकांश बहुओं की यही शिकायत होती है कि सास प्राइवेसी और बहू को आजादी देने की बात को समझती ही नहीं हैं. उन्हें अगर इस बात को समझाना चाहो तो वे फौरन कह देती हैं कि तुम जबान चला रही हो या हमारी सास ने भी हमारे साथ ऐसा ही व्यवहार किया था, पर हम ने उन्हें कभी पलट कर जवाब नहीं दिया.

आन्या की जब शादी हुई तो उसे इस बात की खुशी थी कि उस के पति की नौकरी दूसरे शहर में है और इसलिए उसे अपनी सास के साथ नहीं रहना पड़ेगा. वह नहीं चाहती थी कि नईनई शादी में किसी तरह का व्यवधान पड़े. वह बहुत सारे ऐसे किस्से सुन चुकी थी और देख भी चुकी थी जहां सास की वजह से बेटेबहू के रिश्तों में दरार आ गई थी.

शुरुआती दिनों में पतिपत्नी को एकदूसरे को समझने के लिए वक्त चाहिए होता है और उस समय अगर सास की दखलंदाजी बनी रहे तो मतभेदों का सिलसिला न सिर्फ नवयुगल के बीच शुरू हो जाता है बल्कि सासबहू में भी तनातनी होने लगती है.

आन्या अपने तरीके से रोहन के साथ गृहस्थी बसाना, उसे सजानासंवारना चाहती थी. उस की सास बेशक दूसरे शहर में रहती थी पर वह हर 2 महीने बाद एक महीने के लिए उन के पास रहने चली आती थी क्योंकि उसे हमेशा यह डर लगा रहता था कि उस की नौकरीपेशा बहू उस के बेटे का खयाल रख भी पा रही होगी या नहीं.

आन्या व्यंग्य कसते हुए कहती है कि आखिर अपने नाजों से पाले बेटे की चिंता मां न करे तो कौन करेगा. लेकिन समस्या तो यह है मेरी सास को हददरजे तक हस्तक्षेप करने की आदत है, वे सुबह जल्दी जाग जातीं और किचन में घुसी रहतीं. कभी कोई काम तो कभी कोई काम करती ही रहतीं.

मुझे अपने और रोहन के लिए नाश्ता व लंच पैक करना होता था पर मैं कर ही नहीं पाती थी क्योंकि पूरे किचन में वे एक तरह से अपना नियंत्रण  रखती थीं. यही नहीं, वे लगातार मुझे निर्देश देती रहतीं कि मुझे क्या बनाना चाहिए, कैसे बनाना चाहिए और उन के बेटे को क्या पसंद है व क्या नापसंद है.

सुबहसुबह उन का लगातार टोकना मुझे इतना परेशान कर देता कि मेरा सारा दिन बरबाद हो जाता. यहां तक कि गुस्से में मैं रोहन से भी नाराज हो जाती और बात करना बंद कर देती. मुझे लगता कि रोहन अपनी मां को ऐसा करने से रोकते क्यों नहीं हैं?

सब से ज्यादा उलझन मुझे इस बात से होती थी कि जब भी मौका मिलता वे यह सवाल करने लगतीं कि हम उन्हें उन के पोते का मुंह कब दिखाएंगे? हमें जल्दी ही अपना परिवार शुरू कर लेना चाहिए. जो भी उन से मिलता, यही कहतीं, ‘मेरी बहू को समझाओ कि मुझे जल्दी से पोते का मुंह दिखा दे.’ रोहन को भी वे अकसर सलाह देती रहतीं. प्राइवेसी नाम की कोई चीज ही नहीं बची थी.

रोहन का कहना था कि  हर रोज आन्या को मेरी मां से कोई न कोई शिकायत रहती थी. तब मुझे लगता कि मां हमारे पास न आएं तो ज्यादा बेहतर होगा. मैं उस की परेशानी समझ रहा था पर मां को क्या कहता. वे तो तूफान ही खड़ा कर देतीं कि बेटा, शादी के बाद बदल गया और अब बहू की ही बात सुनता है.

मैं खुद उन दोनों के बीच पिस रहा था और हार कर मैं ने अपना ट्रांसफर बहुत दूर नए शहर में करा लिया ताकि मां जल्दीजल्दी न आ सकें. मुझे बुरा लगा था अपनी सोच पर, पर आन्या के साथ वक्त गुजारने और उसे एक आरामदायक जिंदगी देने के लिए ऐसा करना आवश्यक था.

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परिपक्व हैं आज की बहुएं

मनोवैज्ञानिक विजयालक्ष्मी राय मानती हैं कि ज्यादातर विवाह इसलिए बिखर जाते हैं क्योंकि पति अपनी मां को समझा नहीं पाता कि उस की बहू को नए घर में ऐडजस्ट होने के लिए समय चाहिए और वह उन के अनुसार नहीं बल्कि अपने तरीके से जीना चाहती है ताकि उसे लगे कि वह भी खुल कर नए परिवेश में सांस ले रही है, उस के निर्णय भी मान्य हैं तभी तो उस की बात को सुना व सराहा जाता है.

बहू के आते ही अगर सास उस पर अपने विचार थोपने लगे या रोकटोक करने लगे तो कभी भी वह अपनेपन की महक से सराबोर नहीं हो सकती.

बेटेबहू की जिंदगी की डोर अगर सास के हाथ में रहती है तो वे कभी भी खुश नहीं रह पाते हैं. सास को समझना चाहिए कि बहू एक परिपक्व इंसान है, शिक्षित है, नौकरी भी करती है और वह जानती है कि अपनी गृहस्थी कैसे संभालनी है. वह अगर उसे गाइड करे तो अलग बात है पर यह उम्मीद रखे कि बहू उस के हिसाब से जागेसोए या खाना बनाए या फिर हर उस नियम का पालन करे जो उस ने तय कर रखे हैं तो तकरार स्वाभाविक ही है.

आज की बहू कोई 14 साल की बच्ची नहीं होती, वह हर तरह से परिपक्व और बड़ी उम्र की होती है. कैरियर को ले कर सजग आज की लड़की जानती है कि उसे शादी के बाद अपने जीवन को कैसे चलाना है.

फैमिली ब्रेकर बहू

आर्थिक तौर पर संपन्न होने और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए एक टारगेट सैट करने वाली बहू पर अगर सास हावी होना चाहेगी तो या तो उन के बीच दरार आ जाएगी या फिर पतिपत्नी के बीच भी स्वस्थ वैवाहिक संबंध नहीं बन पाएंगे.

एक टीवी धारावाहिक में यही दिखाया जा रहा है कि मां अपने बेटे को ले कर इतनी पजैसिव है कि वह उसे उस की पत्नी के साथ बांटना ही नहीं चाहती थी. बेटे का खयाल वह आज तक रखती आई है और बहू के आने के बाद भी रखना चाहती है, जिस की वजह से पतिपत्नी के बीच अकसर गलतफहमी पैदा हो जाती है.

फिर ऐसी स्थिति में जब बहू परिवार से अलग होने का फैसला लेती है तो उसे फैमिली यानी घर तोड़ने वाली ब्रेकर कहा जाता है. सास अकसर यह भूल जाती है कि बहू को भी खुश रहने का अधिकार है.

विडंबना तो यह है कि बेटा इन दोनों के बीच पिसता है. वह जिस का भी पक्ष लेता है, दोषी ही पाया जाता है. मां की न सुने तो वह कहती है कि जिस बेटे को इतने अरमानों से पाला, वह आज की नई लड़की की वजह से बदल गया है और पत्नी कहती है कि जब मुझ से शादी की है तो मुझे भी अधिकार मिलने चाहिए. मेरा भी तो तुम पर हक है. बेटे और पति पर हक की इस लड़ाई में बेटा ही परेशान रहता है और वह अपने मातापिता से अलग ही अपनी दुनिया बसा लेता है.

शादी किसी लड़की के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण व नया अध्याय होता है. पति के साथ वह आसानी से सामंजस्य स्थापित कर लेती है, पर सास को बहू में पहले ही दिन से कमियां नजर आने लगती हैं. उसे लगता है कि बेटे को किसी तरह की दिक्कत न हो, इस के लिए बहू को सुघड़ बनाना जरूरी है. और वह इस काम में लग जाती है बिना इस बात को समझे कि वह बेटे की गृहस्थी और उस की खुशियों में ही सेंध लगा रही हैं.

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इस का एक और पहलू यह है कि बेटे के मन में मां इतना जहर भर देती है कि  उसे यकीन हो जाता है कि उस की पत्नी ही सारी परेशानियों की वजह है और वह नहीं चाहती कि वह अपने परिवार वालों का खयाल रखे या उन के साथ रहे.

जरूरी है कि सास बेटे की पत्नी को खुल कर जीने का मौका दें और उसे खुद

ही निर्णय लेने दें कि वह कैसे अपनी जिंदगी संवारना व अपने पति के साथ जीना चाहती है. सास अगर हिदायतें व रोकटोक करने के बजाय बहू का मार्गदर्शन करती है तो यह रिश्ता तो मधुर होगा ही साथ ही, पतिपत्नी के संबंधों में भी मधुरता बनी रहेगी.

बच्चों की मस्ती पर न लगाएं ब्रैक

कोरोनाकाल में विशाल का बर्थडे फिर पास आ रहा था वह अब तक अपना बर्थडे बहुत ही जोशखरोश के साथ मनाता आया था. उस के दोस्त संदली, तनु, मयंक और रजत चारों उस से वीडियो कौल पर बात कर रहे थे.

संदली ने कहा, ‘‘यार तेरा पिछला बर्थडे भी ऐसे ही चला गया था. लौकडाउन में ही तेरा पिछला बर्थडे निकल गया. घर में रहरह कर पक गए हैं. तेरा बर्थडे मिस करने का तो मन ही नहीं करता.’’

विशाल ने कहा, ‘‘देखो, तुम लोग भी घर से नहीं निकल रहे हो. मैं भी घर पर ही रहता हूं. मेरी मम्मी कह रही हैं कि सब लोग एक दिन के लिए मेरे घर आ कर ही रहो. बढि़या सैलिब्रेशन करते हैं. मम्मी तुम सब को बहुत मिस करती हैं. प्रोग्राम बनाओ, सब आ जाओ.’’

तो तय हो ही गया कि विशाल का बर्थडे तो इस बार जरूर मनेगा. सारा दिन लैपटौप पर बैठे बच्चे इस प्रोग्राम को ऐंजौय करने का मोह नहीं छोड़ पाए.

 मस्ती मगर कैसे

मुंबई में अंधेरी में ही आसपास सब रहते थे. यह 25 से 30 साल के युवाओं का गु्रप था. लंबे समय से कोरोना में हुए लौकडाउन के कारण घर में बंद था. विशाल और उस की मम्मी सुधा बस घर में 2 ही लोग थे. विशाल के पिता थे नहीं, मम्मी वर्किंग थीं जो अब वर्क फ्रौम होम कर रही थीं.

घर में 2 ही लोग थे. टू बैडरूम फ्लैट था. बच्चों को मस्ती करने के लिए काफी जगह मिल जाती थी पर सब बच्चे विशाल की मम्मी सुधा आंटी के बारे में सोचते तो जाने का सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता पर आपस में मिल कर मजा भी आता था और अब तो घर में बंद हो कर ही बहुत समय बिता लिया था तो विशाल के बर्थडे के लिए सब ने अपने घर वालों को जाने देने के लिए मना ही लिया.

संदली अपनी मम्मी से हंसते हुए कह रही थी, ‘‘सब जा तो रहे हैं, औफिस से सब ने छुट्टी भी ले ली है. रात उस के घर रुकने तो जा रहे हैं पर देखते हैं. आंटी इस बार ऐंजौय करने देंगीं या नहीं क्योंकि उन्हें भी इतने दिन से कोई मिला नहीं होगा, काफी भरी होंगी.’’

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 दिल खोल कर स्वागत

सब बच्चे विशाल के घर पहुंचे तो सुधा ने दिल खोल कर उन का स्वागत किया. सब आपस में बहुत दिन बाद मिले थे. बहुत कुछ था जो कहनासुनना था. गेम्स खेलने का प्रोग्राम था. साथ बैठ कर कोई मूवी देखनी थी. फोन पर टच में रहना अलग था. सामने मिल कर बातें करने में अलग मजा आता है. सुधा ने हमेशा की तरह खानेपीने की बहुत अच्छी तैयारी की थी. काफी चीजें और्डर भी की गईं ताकि सुधा पर ज्यादा काम का बो झ न पड़े.

जब तक बच्चे डिनर कर के फ्री हो कर साथ बैठे, सुधा भी हमेशा की तरह उन के बीच आ बैठीं. इस समय रात के 10 बज रहे थे. सुधा ने सब को अब ध्यान से देखा. संदली काफी हैल्थ कौंशस थी. जंक फूड से बहुत दूर रहती. काफी स्लिमट्रिम थी. सुधा खुद काफी भारी शरीर की महिला थीं. संदली से बोलीं, ‘‘यह क्या हाल बना लिया है तुम ने अपना?’’

‘‘क्यों आंटी, क्या हुआ?’’

‘‘इतना स्लिम क्यों हो गई?’’

‘‘आंटी, मोटा हो कर क्या करना है,’’ संदली हंसी.

‘‘तुम्हारी मम्मी क्या तुम्हारी डाइट का ध्यान नहीं रखतीं?’’

‘‘अरे आंटी क्यों नहीं रखेंगी?’’

‘‘चलो, अपनी पूरी डाइट बताओ दिन  की मु झे.’’

‘‘आंटी, नाश्ते में कभी पोहा, कभी उपमा, कभी आमलेट तो कभी परांठा खाती हूं. लंच में दाल, सब्जी, रायता होता है तो कभी कुछ…’’

सुधा बीच में ही बोलीं, ‘‘फू्रट्स कहां हैं तुम्हारी डाइट में?’’

‘‘आंटी, फ्रूट्स 4-5 बजे खाती हूं, फिर 8 बजे डिनर.’’

‘‘इस डाइट में कमी लग रही है. स्वीट्स में क्या खाती हो?’’

‘‘आंटी, स्वीट्स का तो मु झे शौक नहीं है.’’

‘‘पर ऐनर्जी कैसे मिलेगी?’’

‘‘आंटी, मैं ठीक हूं, कोई परेशानी नहीं है मु झे,’’ अंदर ही अंदर इन बातों पर चिढ़ती संदली बाहर से मुसकराते हुए पानी पीने का बहाना कर के उठ गई.

उस के जाते ही सुधा तनु से बोलीं, ‘‘बेटा, आप के पेरैंट्स आप की शादी का क्या सोच  रहे हैं?’’

अब तनु के इंटरव्यू का नंबर था, ‘‘आंटी, मैं ने मम्मीपापा को कह दिया है कि अभी मु झे थोड़ा टाइम चाहिए.’’

‘‘तुम्हारे कहने से क्या होता है. उन्हें सोचना चाहिए. अब तुम 26 की हो गई न?’’

‘‘आंटी, उन्हें मेरी बात सम झ आ गई है. वे मु झ पर प्रैशर नहीं डाल रहे हैं.’’

‘‘अब उन्हें सोचना चाहिए. उन्होंने तुम्हारे लिए शादी की क्याक्या तैयारी की है.’’

‘‘अभी क्या करें? जब कोई बात ही नहीं  है अभी.’’

‘‘फिर भी सोना तो खरीद कर रखना ही चाहिए न.’’

फिर उन की नजर मयंक पर गई, ‘‘मयंक, तुम कितनी सेविंग करते हो?’’

मयंक ने बताया, ‘‘काफी, आंटी, कई इंश्योरैंस प्लान ले रखे हैं.’’

‘‘क्यों? इतने क्यों? अरे, खाओपीयो, ऐंजौय करो, किस के लिए बचाना है?’’

सब बच्चे इस बात पर उन का मुंह देखने लगे और वे सब को यही सम झाती रहीं कि लाइफ में बचत की जरूरत क्या है, ऐंजौय करना चाहिए.

बच्चों के साथ ऐंजौय

सब बच्चे अपने पेरैंट्स से मिले सु झाव  से बिलकुल उलट इस ज्ञान पर हैरान रह गए.  2 घंटे सिर्फ सुधा ही बोलती रहीं. बच्चे आपस  में बिलकुल बात नहीं कर पाए और रात के  12 बजे विशाल के बर्थडे केक काटने की तैयारी होने लगी. तब जा कर सुधा से बच्चों को थोड़ा ब्रेक मिला.

केक और स्नैक्स में एक घंटा और बीत गया. इस दौरान सुधा ने भी बच्चों के साथ बहुत ऐंजौय किया. फिर सुधा बच्चों के साथ ही बैठ गईं तो विशाल ने कहा, ‘‘मम्मी, अब आप सो जाओ न. हम लोग कोई मूवी देखेंगे.’’

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‘‘हां, देखो, मैं भी सब के साथ देखती हूं.’’

‘‘ऊफ, मम्मी, आप सो जाओ न. इतनी रात हो गई है.’’

‘‘बाद में सो जाऊंगी,’’ सुधा ने फिर  बच्चों के साथ ही मूवी देखी. फिर संदली,  तनु और प्रिया सुधा के ही रूम में सोईं. विशाल, मयंक और रजत एकसाथ सो गए. सोते समय  भी सुधा प्रिया से कह रही थीं, ‘‘तम्हारे पेरैंट्स  ने तुम्हारे लिए कोई लड़का देखना शुरू किया?’’

प्रिया ने ऐसी ऐक्टिंग की जैसे वह बहुत नींद में है और जल्दी से ‘न’ कह कर चादर मुंह तक ओढ़ ली.

सब सुबह सो कर उठीं तो देखा सुधा रूम में नहीं थीं. प्रिया ने कहा, ‘‘यार, आंटी का क्या करें? आपस में तो बात कर ही नहीं पाते. इंटरव्यू ही देते रह जाते हैं.’’

तनु ने कहा, ‘‘यार संदली, जब तेरे घर आते हैं, कितनी शांति रहती है, कितना स्पेस देती हैं तेरी मम्मी. थोड़ी देर हम सब से मिल कर उठ जाती हैं. यहां तो ऐसे लगता है जैसे आंटी की जेल में बंद हो गए.’’

संदली फुसफुसाई, ‘‘धीरे बोल, कहीं आंटी अभी फिर न आ जाएं. मेरा तो रात में मन कर रहा था कि कार निकालूं और घर चली जाऊं. हर बार यही होता है कि हम आपस में कभी समय बिता ही नहीं पाते. ठीक है, आंटी को हमारे साथ अच्छा लगता होगा पर हमें तो जरा भी ऐंजौय नहीं करने देतीं. कितनी पर्सनल बातों पर कमैंट करती हैं. जरा भी अच्छा नहीं लगता. मेरी डाइट तो उन का प्रिय टौपिक है. ऐसे कहती हैं जैसे मेरे पेरैंट्स मु झे खिलाते ही नहीं.’’

इतने में सुधा आ गईं, ‘‘अरे, उठ गए तुम लोग. चलो, फ्रैश हो जाओ. नाश्ता बनाया है. उन लोगों को भी उठाती हूं. फिर बैठ कर थोड़ी बातें करते हैं.’’

संदली, तनु और प्रिया ने एकदूसरे को देखा और बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोकी. सुधा ने बड़े प्यार से सब बच्चों को नाश्ता करवाया.

फिर संदली ने कहा, ‘‘आंटी, बहुत अच्छा लगा आ कर, अब हम घर चलते हैं.’’

‘‘अरे, चले जाना, इतने दिन बाद तो  आए हो.’’

कोई फायदा नहीं

सुधा ने फिर शुरू किया अपने परिवार के बारे में वही सब बताना जो बच्चे पिछले कई सालों से सुनते आ रहे थे. अब तो बच्चों को ये किस्से याद हो गए थे. उन के रिश्तेदारों के नाम तक याद हो चुके थे.

विशाल ने बीचबीच में कहा, ‘‘मम्मी, बस कर दो न. आप पिछली बार भी तो यही सब बता रही थीं.’’

पर कोई फायदा नहीं था. 2 घंटे सुधा ने अपने किस्से हमेशा की तरह सुनाए जिन में किसी की भी रुचि नहीं थी. विशाल अपने दोस्तों के चेहरे देख रहा था पर सब उस के इतने अच्छे पुराने दोस्त थे कि कोई भी ऐसा रिएक्शन न देते जिस से किसी भी तरह का सुधा के लिए अपमान दिखे. सुधा ने कहा, ‘‘अरे, बच्चो, तुम्हें पता है मैं ने तुम लोगों के साथ आज टाइम पास करने के लिए छुट्टी ली हुई है, शाम तक जाना.’’

बच्चे रुक सकते थे पर हमेशा की तरह वे उन की बातों से मानसिक रूप से इतने थक  गए थे कि जैसे उन की सारी ऐनर्जी खत्म हो गई है. सब घर जाने के लिए उठ ही गए.

संदली ही अपनी कार से प्रिया और तनु को उन के घर तक छोड़ रही थी. सब एक ही एरिया के थे.

प्रिया ने कहा, ‘‘यह ब्रेक लिया हम ने? थका देती हैं यार आंटी तो. मैं हर बार सोचती हूं कि नहीं जाऊंगी, पर विशाल की वजह से फिर आ जाती हूं. इस से तो अच्छा कि मैं छुट्टी ले कर आराम से घर पर सो लेती, अच्छा ब्रेक मिलता.’’

तनु ने कहा, ‘‘आंटी को शायद हम लोगों से बातें करना अच्छा लगता है. थोड़ी देर तो हमें भी अच्छा लगता है पर आंटी तो हम लोगों को आपस में भी कोई बात नहीं करने देतीं लगातार बोलती  हैं यार.’’

‘‘इन की अपनी फ्रैंड्स नहीं हैं क्या, यार?’’

संदली ने ठंडी सांस लेते हुए कहा, ‘‘बस अब तुम लोग अपनी बात कर लो. भई, अब भी आंटी की ही बातें करनी हैं क्या? घर आने वाला है. मु झे तो लगता है हम बस अब फिर फोन पर ही बातें कर पाएंगें अपनी.’’

सवालों की बौछार

शामली में रहने वाली मीता अपनी सहेली अनु के घर जब भी जाती, उस की तलाकशुदा बुआ जो अनु के घर ही रहती थीं, उन दोनों के पास आ कर बैठतीं और ऐसेऐसे सवाल पूछतीं कि मीता घबरा जाती, ‘‘बौयफ्रेंड है? बहन अपने ससुराल में खुश है? लड़कों से दोस्ती है तुम्हारी?’’

फिर अगर अनु मीता के लिए कुछ चाय, पानी लेने किचन में जाती तो उस के जाते ही बुआ मीता से पूछती, ‘‘इस अनु का कोई बौयफ्रैंड तो नहीं है? कालेज में लड़कों से ज्यादा बातें करती है क्या? तुम तो इस की सहेली हो, सब जानती होगी, जल्दी बताओ कुछ.’’

मीता बस यही मनाती कि अनु जल्दी से आ जाए और बूआ के सवाल बंद हों.

ओमैक्स रैजीडैंसी, लखनऊ में रहने वाली अरीशा की कालेज में आरती से बहुत अच्छी दोस्ती हो गयी थी. वे बताती हैं, ‘‘मेरे डैड हमेशा उस समय मेरे आसपास घूमते, हमारी बातें सुनने की पूरी कोशिश करते जब भी आरती घर आती. मेरी बड़ी बहन अंजुम को तो हमेशा यही खोजबीन करनी होती कि आरती का कोई भाई तो नहीं है. जब पता चला, 2 भाई हैं, तो मैं जब भी आरती के घर जाने की बात करती, तो मेरी बहन कहतीं कि क्यों कर रखी है उस से दोस्ती.

‘‘कालेज में जितनी बात हो जाए हो जाए. एकदूसरे के घर बैठ कर तो बात करना ही मुश्किल था. हमारी बातें सुनने के लिए सब अपना काम छोड़ कर हमारे आसपास मंडराते कि पता नहीं क्या बातें कर लेंगे. जब घर में ही आराम से किसी दोस्त के साथ बैठ कर बातें न कर पाएं तो बड़ी कोफ्त होती है.’’

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एक अजीब स्थिति

मेरठ में रहने वाली रिद्धि का ऐक्सीडैंट हुआ. उस का पैर टूट गया था जिस वजह से बैड पर लेटेलेटे उस का कुछ वजन बढ़ गया था. सब बच्चे उसे देखने गए. उस की दादी भी वहीं आ कर बैठ गईं. एक एक बच्चे को ध्यान से देखती रहीं और फिर रिद्धि से कहने लगीं, ‘‘तू मोटी  हो जाएगी लेटेलेटे, देख इन में से कोई मोटा  नहीं है.’’

फिर ग्रुप में जो 2 लड़के भी उसे देखने गए थे, दादी ने उन से उन के घरपरिवार के बारे में इतने सवाल पूछे कि बच्चे जल्द ही शर्मिंदगी से भाग खड़े हुए. रिद्धि को अपनी दादी के सवाल बहुत नागवार गुजरे.

कई बार ऐसी गलतियां कर के बड़े बच्चों और उन के दोस्तों को एक अजीब स्थिति में डाल देते हैं जिन का उन्हें अंदाजा नहीं होता. कहीं आप भी तो यह गलती नहीं करतीं जब आप के बच्चों के दोस्त आप के घर आते हैं? युवा पीढ़ी से बात करते हुए बहुत सी बातों का ध्यान रखते हुए तालमेल बैठाना होता है.

आजकल इतने स्ट्रैस के माहौल में जब बच्चे दोस्तों के साथ इकट्ठे बैठ कर हंसनाबोलना चाहें तो उन्हें एक स्पेस दें. उन से मिलें, कुछ देर बातें भी करें पर अपना टाइम पास करने के चक्कर में उन के सिर पर न बैठे रहें. अपनी भपियाने की आदत पर कंट्रोल रखें. युवा बच्चों से उन की पर्सनल लाइफ पर सवाल करने की गलती न करें.

रिश्तों की अजीब उलझनें

सिचुएशन 1

आप किसी परिचित के यहां खाना खाने गए हैं लेकिन खाना या तो बेस्वाद है या फिर इतना स्पाइसी कि गले से नीचे उतारना मुश्किल है. कई बार आप जिन चीजों को हाथ तक नहीं लगाते, यदि वे आप के आगे परोस दी जाएं तो भी मुश्किल होती है, जैसे प्याज व लहसुन से बना भोजन या कद्दू, करेले जैसी सब्जियां.

ऐसे संभालें

किसी ने बड़े चाव से भोजन परोसा और आप नखरे दिखाएं कि आप को यह भोजन कतई पसंद नहीं, तो यह अशिष्टता होगी और मेजबान का अपमान भी होगा. मेजबान का दिल दुखाने के बजाय आप को कुछ बहाने बनाने होंगे, जैसे आज मेरा फास्ट है, तबीयत ठीक नहीं है इसलिए दिन में एक बार खाती हूं, पेट गड़बड़ है या अभीअभी घर से खा कर ही आए हैं. साथ ही, उन से कहें, ‘ऐसा कीजिए आप मुझे एक कप चाय पिला दीजिए.’ इस से उन का मान भी रह जाएगा और आप अरुचिकर भोजन खाने से भी बच जाएंगे.

सिचुएशन 2

आप की फ्रैंड की नईनई शादी हुई है. आप को पता चल गया है कि उस का पति अच्छा इंसान नहीं है. वह आवारा है, नशेड़ी है या फिर बदनाम इंसान है. ऊपर से सहेली पूछ रही है कि बता, मेरा पति कैसा लगा?

ऐसे संभालें

बसीबसाई गृहस्थी को उजाड़ना बुद्धिमानी की बात नहीं. जब शादी हो ही चुकी है तो सहेली को उस के पति के बारे में सबकुछ साफसाफ बता देना ठीक नहीं होगा. कई बार शादी के बाद इंसान बदल भी  जाता है.  हो सकता है जिसे आप आवारा या बदनाम समझ रही हों, वह शादी के बाद सुधर जाए. लेकिन सहेली से आप अपने मुंह से यह सब कहेंगी, तो उस का दांपत्य जीवन शुरू से ही खटाई में पड़ जाएगा और वह अपने पति के बारे में बुरी धारणा बना लेगी या तो दुखी होगी या फिर पति के साथ दुर्व्यवहार करेगी और उसे उसी नजरिए से देखने लगेगी. इस से बात बनने के बजाय बिगड़ जाएगी. बेहतर होगा कि सहेली के पूछने पर, ‘हां, अच्छे लग रहे हैं. इन्हें भरपूर प्यार देना और सुखी जीवन जीना.’ फिर मजाकमजाक में यह भी कह दें कि शुरू से ही ध्यान रखना, इन्हें कोई बुरी आदत न लग जाए.

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सिचुएशन 3

आप किसी के बारे में बुराभला कह रही हैं और पता चले कि वह तो आप के ठीक पीछे खड़ा है और सबकुछ सुन चुका है.

ऐसे संभालें

बात को छिपाने या बहाने बनाने से कोई फायदा नहीं. या तो आप को बेहद कुशल अभिनेता बनते हुए यह जताना होगा कि आप उस की उपस्थिति के बारे में जानती थीं और आप ने जानबूझ कर ऐसा सुनाने व छेड़ने के लिए कहा या फिर सीधेसीधे माफी मांग लेने में ही फायदा है. भले ही वह बुरी तरह नाराज हो जाए और उस वक्त आप को माफ न करे, लेकिन फिर भी गुस्से की आंच जरा धीमी तो पड़ ही जाती है.

सिचुएशन 4

आप की फ्रैंड अचानक आप के सामने अजीब तरह की ड्रैस पहन कर आती है और पूछती है कि कैसी लग रही हूं मैं. सच यह है कि वह बहुत बेढंगी और फनी लग रही है. न तो ड्रैस अच्छी है और न ही उस की बौडी पर पहनने लायक है.

ऐसे संभालें

फ्रैंड का मजाक उड़ाने की गलती न करें. इस से उस का मन दुखी होगा, शर्मिंदगी महसूस होगी और रिश्तों पर विपरीत असर पड़ेगा लेकिन, वह आप की फास्ट फ्रैंड है इसलिए उस से किसी गलतफहमी में रखना भी ठीक नहीं वरना दूसरे उस का मजाक बनाएंगे. उसे कुछ ऐसा कहें, ‘अरे वाह, कलर तो काफी अच्छा चूज किया, लेकिन यह स्टाइल मुझे जरा कम जंचा. आजकल ऐसी स्टाइल कम चल रही है. इस से अच्छा होता कि तुम मौजूद फैशन के मुताबिक ड्रैस खरीदतीं.  एक काम करो, इसे घर में या कौंप्लैक्स में ही पहनना. बाहर जाना हो, तो इस के बजाय अपनी अमुक ड्रैस पहनना. तेरी कदकाठी और फिगर पर वह ज्यादा मस्त लगती है. इस प्रकार आप इशारों ही इशारों में उसे ड्रैस की कमी बता देंगी.

सिचुएशन 5

पड़ोसिन का निकला हुआ पेट देख कर आप को लगा कि वह गर्भवती है और आप ने बिना आगापीछा सोचे पूछ डाला, ‘कब की डेट है?’ भौचक्की पड़ोसिन ने कहा, ‘काहे की डेट है? मैं प्रैग्नैंट थोड़ी हूं?’

ऐसे संभालें

बात को तुरंत ट्विस्ट देते हुए मजाकिया लहजे में अपनापन जताते हुए कुछ ऐसा कहें, ‘अरी बावली बहन, मैं ने तो तुझे जानबूझ कर ऐसा कहा. अपनी सेहत पर ध्यान दे. मोटा पेट हजार बीमारियों की जड़ है. सुबहशाम वाक, जौगिंग वगैरा किया कर वरना आज जो सवाल मैं ने मजाक में किया है वही सवाल लोग सचमुच तुझ से करने लगेंगे. मुझे ही देख, मैं ने खानपान कितना कंट्रोल किया, तब जा कर मोटापा काबू में आया है वरना टुनटुन हो जाती. मेरे हसबैंड तो सुबहशाम वाक पर जाते हैं और व्यायाम भी करते हैं.’

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सिचुएशन 6

आप के मित्र दंपती में अनबन हो गई. अनबन भी ऐसी कि तलाक तक बात पहुंच गई. दोनों ही आप के दोस्त हैं. दोनों आप से अलगअलग मिल कर एकदूसरे की बुराई करते हैं, आप से राय मांगते हैं और दूसरे पक्ष से संबंध तोड़ने के लिए कहते हुए संबंधों की दुहाई देते हैं.

ऐसे संभालें

इस स्थिति में आप दोनों को कभी खुश नहीं रख सकते. दोनों को खुश रखने की कोशिश करेंगी तो दोनों से ही संबंधों में खटास आ जाएगी. चूंकि स्थिति काफी बिगड़ चुकी है और तलाक तक की नौबत आ गई है, इसलिए दोनों में तालमेल बैठाने या उन के संबंधों को जोड़ने की कोशिश भी बेकार साबित होगी. बेहतर यह होगा कि आप किसी एक से हमदर्दी रखें, उसे भावनात्मक या आर्थिक सहारा दें, उस का संबल बन कर एक अच्छी दोस्त साबित हों. हां, इस के लिए उसे चुनें जो दिल से आप के ज्यादा करीब हो, कम दोषी हो और जिस के साथ आप के रिश्ते ज्यादा पुराने रहे हों.

जानें क्या हैं Married Life के 9 वचन

समय के साथसाथ परिवर्तन भी जरूरी है. आज के युग में दंपतियों विशेषकर नवविवाहित जोड़ों को अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए अपने विचारों, अपनी भावनाओं का नजरिया थोड़ा बदलना ही चाहिए. पहले विवाह का मतलब सिर्फ प्यार और समर्पण था, जिस में ज्यादातर पत्नियां ही पति और उस के घरपरिवार के लिए समर्पित रहने में अपने जीवन की सार्थकता मानती थीं और त्याग व कर्तव्य की प्रतिमा बनीं सारा जीवन खुशीखुशी गुजार देती थीं. घरपरिवार में इसी से उन्हें इज्जत भी मिला करती थी.

पुरुष भी ऐसी पत्नी पा कर खुश होते थे. उन की सोच भी औरतों के लिए बस यही थी. पर आज हालात बदल गए हैं. स्त्रीपुरुष दोनों इस बात को समझ चुके हैं. आज औरतें भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर हर क्षेत्र में काम कर रही हैं, आगे बढ़ रही हैं. आज प्यार और समर्पण की शक्ल प्यार और साझेदारी ने ले ली है, जो व्यावहारिक भी है.

वरवधू शादी के समय रस्म के तौर पर 7 वचन लेते हैं और शायद बहुत जल्दी भूल भी जाते हैं पर दंपती सर्वेक्षण के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप निकले इन वचनों को शादी के बाद भी लें, इन्हें याद रखें और निभाएं भी. विवाह का यह प्यारा बंधन प्यार, विश्वास और साझेदारी का ही तो है, जहां पतिपत्नी दोनों ही घरबाहर के काम करते हैं, तो दोनों को ही एकदूसरे के काम में सहयोग द्वारा तालमेल बैठा कर चलने की जरूरत है, जिस में ये सब के विचार मंथन से निकले निम्न वचन बड़े काम के हैं:

जो मेरा है वह तुम्हारा भी

लखनऊ के आर्किटैक्ट सुहास और उन की पत्नी सीमा में शुरूशुरू में छोटीछोटी बातों को ले कर अकसर अनबन हो जाती थी. सीमा कहती है, ‘‘जैसे मायके से मिले महंगे बैड कवर, क्रौकरी आदि को अगर सुहास अपने दोस्तों, रिश्तेदारों के लिए इस्तेमाल करते, तो मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता. इसी तरह इन्हें भी मेरे रिश्तेदारों, सहेलियों द्वारा इन के म्यूजिक सिस्टम, नौवलों से छेड़छाड़ एकदम नागवार गुजरती. फिर एक दिन हम ने तय किया कि हम एक हैं, तो एकदूसरे की चीजों का इस्तेमाल क्यों न करें? उस दिन से सारा परायापन दूर हो गया.’’

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जैसे मुझे अपने मम्मीपापा, भाईबहन, दोस्तरिश्तेदार प्यारे हैं वैसे ही तुम्हें भी अपने

जयपुर के डा. राजेश और उन की होममेकर पत्नी ईशा ने इस बात का खुलासा किया कि पतिपत्नी दोनों के परिवारों का, रिश्तेदारों का घर में बराबर का सम्मान जरूरी है. राजेश ने अपनी बहन रीमा के घर में अपने व अपने मातापिता के बारबार अपमानित होने की घटना बताई. बहन अपने पति के इस अपमानित व्यवहार से आहत रहती है.

इस से उन के आपसी रिश्ते कभी मधुर नहीं हो पाए. यह तो गलत अपेक्षा है कि केवल पत्नी पति के घर वालों को पलकों पर बैठाए और पति उस के पीहर के लोगों को सम्मान न दे कर जबतब अपमानित करता फिरे. पति का भी उतना ही फर्ज है. पत्नी अर्धांगिनी है, सहचरी है कोई गुलाम नहीं.

जैसे मेरी जरूरतें जरूरी वैसे तुम्हारी भी

सुजाता एक कौरपोरेट औफिस में काम करती है. अकसर उसे घर आने में देर हो जाती है. घर पर भी कभीकभी उसे औफिस का काम निबटाना पड़ता है. इस पर पति विशाल चिड़चिड़ करता था. एक दिन सुजाता ने उसे बैठा कर अच्छी

तरह समझाया कि विशाल मैं ने शादी के पहले ही तुम्हें बता दिया था. तब तो तुम्हें मेरे अच्छे पैकेज के आगे सब मंजूर था. जब तुम अपनी बिजनैस मीटिंग से लेट आते हो तब मुझे तो कोई आपत्ति नहीं होती. फिर तुम क्यों नहीं समझते? मैं नौकरी नहीं छोड़ सकती. मां का हर महीने ब्लड ट्रांसफ्यूजन मैं नहीं रोक सकती. बेशक तुम मुझे छोड़ सकते हो. मुझे इस में भी कोई आपत्ति नहीं. मैं तलाक के लिए तैयार हूं.

मैं कल ही कहीं और शिफ्ट हो जाती हूं. पर सोचो मेरी मां की जगह तुम्हारी मां होती तो भी तुम यही कहते? अपनीअपनी जौब, जरूरत व जिम्मेदारी पूरी करने में एकदूसरे का सहयोग होगा तभी संबंधों में मधुरता आएगी और संबंध बना रहेगा वरना अपनेअपने रास्ते जाना ही बेहतर है.

उस दिन से विशाल समझ गया. अब बड़ीबड़ी क्या मेरी भूखप्यास, नींद जैसी छोटी जरूरतों को भी तवज्जो देने लगा है. मेरा दर्द, मेरी थकान उसे सब समझ आता है. लाइफ पार्टनर बने हैं तो यह जरूरी भी है.

अपनी आदतें, शौक, संस्कार जैसे मेरे वैसे तुम्हारे

पतिपत्नी अलग परिवारों से अलग परवरिश से आते हैं पर दूसरे से अपने जैसा व्यवहार, रहनसहन की ही अपेक्षा रखते हैं या अलग देख मखौल उड़ाते हैं तो वह ठीक नहीं, बल्कि हल ढूंढ़ना उचित है. स्कूल टीचर दीप्ति अपने बैंक मैनेजर पति शिखर के नंगे पांव घर में घूमने के बाद बिस्तर में घुसने से परेशान रहती थी, तो शिखर उस के कहीं से आने के बाद कपड़े चैंज कर बिस्तर पर छोड़ देने से परेशान रहता था. आखिर एक दिन बैठ कर दोनों ने समस्या का हल निकाला. अब पैरों की गंदगी से बचने के लिए शिखर ने कारपेट बिछा दिया तो दीप्ति ने भी शिखर की देखादेखी कपड़े सलीके से हैंग करने शुरू कर दिए. उन की जिंदगी फिर से गुनगुनाने लगी है.

दूसरों के सामने एकदूसरे की मीनमेख या मखौल नहीं

दिल्ली के ग्रेटर कैलाश की माला पहली बार विवाह के बाद हवाईयात्रा कर रही थी. पति अंश पेशे से चार्टर्ड अकाउंटैंट था. उस का एक दोस्त भी सपत्नीक उन के साथ था. सब किसी तीसरे दोस्त की शादी में जा रहे थे. बैल्ट बांधने की घोषणा हुई तो माला ने जल्दी से बगल वाली सीट की बैल्ट उठा ली और लगाने की कोशिश करने लगी. यह देख अंश हंस पड़ा, ‘‘अकल घास चरने गई है क्या? इतना भी नहीं आता क्या?’’ यह देख सब मुसकराने लगे तो माला को बहुत बुरा लगा. अत: बोली, ‘‘तुम्हें हंसने के बजाय मेरी मदद करनी चाहिए थी या इन की तरह अमीर घर की पत्नी लाते.’’

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अंश को अपनी गलती का एहसास हुआ कि उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए था.

इसी तरह बरेली निवासी गीता के भैयाभाभी उस से मिलने आए तो पति दीपक बोतल से ही पानी पी रहा था. उस ने भैया को भी पानी की वही बोतल औफर कर दी.

‘‘रुकिए, मैं गिलास लाती हूं. हमारे यहां कोई गंवारों जैसे नहीं पीता,’’ गीता बोली.

दीपक को उस की बात चुभ गई. बोला, ‘‘और हमारे यहां भी पति से ऐसे कोई बात नहीं करता.’’

‘‘भैया ने गीता को टोक कर बात संभाली. बाद में दोनों ने एकदूसरे को सौरी बोला और दूसरों के सामने एकदूसरे का मखौल न उड़ाने और मीनमेख न निकालने का वादा किया.’’

जैसी मेरी सोशल बौंडिंग वैसी तुम्हारी भी

दीपांकर की पत्नी जया शादी से पहले के ही बड़ी सोशल रही है. सब के दुखसुख, उत्सवत्योहार इत्यादि में शामिल होती आई है. औफिस हो या पड़ोसरिश्तेदार सब से निभाती आई है और अब भी निभा रही है. दीपांकर भी उसे सहयोग करता है, सो जया भी दीपांकर के सामाजिक रिश्तों को निभाने में कोई गुरेज नहीं करती.

जैसे मुझे कुछ स्पेस चाहिए वैसे ही तुम्हें भी

पारुल ने बताया सारा दिन तो वह पति रवि के सिर पर सवार नहीं रहती. कुछ वक्त उसे अकेला छोड़ देती है ताकि वह अपना कुछ काम कर सके. पति भी इस बात का ध्यान रखता है कि मुझ को स्पेस मिलता रहे. दोनों में इस बात को ले कर कभी कोई तकरार नहीं होती. अगले दिन के लिए अपना होमवर्क भी आसानी से कर लेते हैं. साथ होते हैं तो खूब छनती है.

जैसी मेरी कुछ सीक्रेट्स न बताने की मेरी इच्छा वैसी ही तुम्हारी भी

शादी के पहले क्या हुआ था पति के साथ या पत्नी के साथ या उन के घरखानदान में. यदि यह बात कोई नहीं बताना चाहता है तो ठीक है, कुरेदकुरेद कर पूछना क्यों? शक में रहना बेकार है. कालेज के अंगरेजी के व्याख्याता डा. नगेंद्र और उन की हिंदी की व्याख्याता पत्नी नीलम का यही मानना है. उन के अनुसार रिश्ते की प्रगाढ़ता के लिए यह आवश्यक है. वर्तमान को देखें, एकदूसरे का आत्मसम्मान बना रहने दें.

पौकेट मनी खर्च पर नो रोकटोक

‘‘अपन दोनों की मस्त लाइफ का यही तो सीधा फंडा है. घर खर्च में हम सहमति से बराबर शेयर करते हैं और पौकेट मनी पर एकदूसरे की नो टोकाटोकी,’’ स्टेट बैंक कर्मी प्रिया और उन के असिस्टैंट मैनेजर पति करण ने अपनी मजेदार बातों में एक और महत्त्वपूर्ण वचन भी बता दिया.

तो अब देर किस बात की. शादी के समय 7 वचन लिए हैं, तो शादी के बाद पतिपत्नी दोनों इन वचनों को आत्मसात कर लें और फिर प्रेमपूर्वक निभाएं यह रिश्ता.

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हमेशा बुरी नहीं जलन

जलन या ईर्ष्या की भावना को आजकल मनोवैज्ञानिक तथा समाज विश्लेषक एक नए अंदाज में देखने लगे हैं. उन के शोध यह साबित कर रहे हैं कि अगर उन्हें किसी की तरक्की का ग्राफ देख कर जलन महसूस होती है तो घबराई सी दशा में रहने के बजाय उस के सकारात्मक पक्ष टटोलें. अगर जलन से प्रेरित हो कर अपनी दशा सुधारने में लग जाएंगे तो हालात सुधरने लगेंगे. इस का लाभ यह होगा कि यह ईर्ष्या कुंठा तक जाने के बजाय खुशियों की राह आसान करती जाएगी.

दूसरे की तरक्की या सफलता देख कर अगर मारे जलन के आप अच्छी मेहनत करने का संकल्प लेते हैं, तो यह ईर्ष्या आप के लिए सुखद परिणाम ला सकती है. यह भविष्य के लिए शुभ संकेत है.

नए प्रयोग करें

कहते हैं न कि भावनाओं पर तो किसी का भी वश नहीं चल पाता, परंतु अपना नजरिया तो ठीक किया ही जा सकता है न? कहने का तात्पर्य यह है कि दृष्टिकोण को सही फ्रेम में लगा कर अपने को अच्छे वातावरण के लिए तैयार करते रहें वरना खाली ईर्ष्या ही ईर्ष्या करने से मानसिक शांति का तो सर्वनाश होगा ही, साथ ही हृदय, लिवर, रक्तचाप आदि बीमारियां भी अपना ठिकाना आप के शरीर में ही बना लेंगी.

समय के मिजाज को भांप कर भी अपनी जलन का लाभ उठाया जा सकता है यानी दुनिया नए प्रयोग कर के आगे बढ़ रही है तो आप भी करिए. अगर समय नवीनता और ताजापन चाहता है तो आप भी वैसा करने की तरफ अपना ध्यान दीजिए.

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लक्ष्य बना लें

मन में जलन की भावना पैठ बना ले तो अपना ध्यान कुछ करने के जज्बे की तरफ मोड़ लेना बहुत लाभकारी हो सकता है. इस मामले में आलसी, निकम्मे लोग बस सोचत ही रह जाते हैं या वक्त को कोसते रहते हैं जबकि सही सोच रखने वाले खुद को भटकने नहीं देते. फट से अपनी कमियों की तरफ ध्यान देते हैं. अपना एक लक्ष्य तय करते हैं और ईर्ष्या को रोग की जगह बना डालते हैं अपनी बहुत अच्छी औषधि.

ईर्ष्या अगर सकारात्मक भाव पैदा करने लगी है, तो ऐसी कथाएं बारबार सुनते हुए या पढ़ते रहना भी लाभदायक है जो आप में एक तरंग पैदा कर दें, आप की ताकत को कई गुना बढ़ा दें और आप एक अच्छा पद, अच्छी स्थिति या फिर अच्छा नाम प्राप्त करने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा दें.

मूल्यांकन करें

अपनी स्पर्धा अपनेआप से ही करना अति उत्तम होता है यानी हर दिन पिछले दिनों से अच्छा और उत्पादक बने, इस के लिए एक कैलेंडर बना कर रखना बहुत ही मददगार साबित होता है. अपनेआप का सच्चा मूल्यांकन भी करते रहना चाहिए. इस में कैलेंडर सहायक रहता है. समय का चक्र और प्रकृति हमारे लिए हमेशा बेहतर से बेहतर व्यवस्था बना कर रखती है. इस पर विचार अवश्य करते रहना चाहिए.

खुद से ही रायमशविरा करेंगे तो आप की हर कमजोरी खुद आप के सामने आएगी. अपनी कमजोरी को अपनी चुनौती बना कर हौसला रखना सचमुच जिंदादिली का पर्याय है. हिचकिचाएं बिलकुल नहीं, बस नाराजगी और शिकायतों में थोड़ी सी कटौती कर संभावनाएं जाग्रत करें और जीवन को संवार लें.

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छोटी बहन के लिए आपराधिक इतिहास वाले परिवार से रिश्ता आया है, मैं क्या करुं?

सवाल

मेरी छोटी बहन जो स्कूल टीचर है, के लिए हम ने एक लड़के से बात चलाई थी. लड़का सरकारी नौकरी में था. तहकीकात करने पर पता चला कि उस के बड़े भाइयों का आपराधिक इतिहास रहा है. इसलिए हम वहां रिश्ता करने से इनकार कर रहे हैं. लेकिन जो व्यक्ति यह रिश्ता करा रहा था उस का कहना है कि आप जिस लड़के से रिश्ता करने जा रहे हैं वह तो ठीक है, उस के भाइयों की गतिविधियों से आप को क्या लेना? कृपया बताएं कि क्या हमें ऐसे लड़के से बहन का रिश्ता करना चाहिए?

जवाब

शादी ब्याह से केवल 2 व्यक्तियों का ही नहीं वरन 2 परिवारों का भी रिश्ता जुड़ता है. इसलिए यदि उस लड़के के बड़े भाइयों के आपराधिक इतिहास के कारण रिश्ता करने से इनकार कर रहे हैं तो यह सही फैसला है.

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बहन की शादी, निभाएं फर्ज

बड़ी बहन की शादी का मौका हो तो घर में खुशी का माहौल होता ही है. ऐसे में फुल ऐंजौय करने का मौका भी मिलता है, लेकिन अगर हम सिर्फ ऐंजौय करने के चक्कर में सारी जिम्मेदारियों को पेरैंट्स के सिर पर डाल कर खुद फ्री हो जाएं तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि इस से जहां उन का स्ट्रैस बढ़ेगा वहीं अकेले होने के कारण वे चीजों को ज्यादा अच्छी तरह से हैंडिल नहीं कर पाएंगे और कोईर् न कोई गलती कर ही जाएंगे, जिस से सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा. ऐसे में घर में छोटे होने के बावजूद आप की जिम्मेदारी बनती है कि अपने पेरैंट्स के साथ हाथ बंटाएं ताकि इस बेहतरीन माहौल का सभी मजा ले पाएं औैर किसी को शिकायत का मौका भी न मिले.

आप निम्न चीजों में अपना रोल अदा कर सकते हैं :

शौपिंग में करें हैल्प

चाहे रिश्तेदारों के देनेलेने के कपड़े हों या फिर खुद बहन के लिए शौपिंग करनी हो, आप पेरैंट्स के इस काम को हलका कर सकते हैं, जैसे अगर पापा किसी काम में बिजी हैं और वे मार्केट जाने के लिए समय नहीं निकाल पा रहे है, तो आप मम्मी व बहन को शौपिंग कराने के लिए ले जाएं ताकि पापा भी अपना काम कर लें और शौपिंग का काम भी निबट सके.

सामान की पैकिंग का जिम्मा लें खुद पर

मैरिज में दिया जाने वाला सामान तो खरीद लिया है, लेकिन अब उसे पैक करने की जिम्मेदारी भी है. बाहर से पैकिंग करवाना काफी महंगा पड़ता है. इसलिए अगर आप सब भाईबहन मिल कर इस काम को कर लें तो न केवल यह काम आसानी से होगा बल्कि सस्ता भी पड़ेगा.

वैडिंग कार्ड के लिए करें मार्केट रिसर्च

वैडिंग कार्ड का और्डर देने से पहले मार्केट में रेट पता कर लें कि सिंपल से ले कर क्रिएटिव कार्ड की क्या कौस्ट है और कौन सा दुकानदार ज्यादा डिस्काउंट दे रहा है. इस से आप के पापा पर सिर्फ और्डर देने का काम रह जाएगा. हो सके तो जिन फ्रैंड्स के घर अभी हाल में ही शादी हुई है, उन से भी आप एक अंदाजा ले सकते हैं.

मेहमानों के रहने का बंदोबस्त

अगर आप के घर में मेहमानों को ठहराने के लिए पर्याप्त स्पेस नहीं है, तो आप को उन के रहने का बंदोबस्त करना पड़ेगा, इस के लिए आप अपने पापा की हैल्प यह बता कर कर सकते हैं कि पापा हमारे एरिया में फलांफलां मकान खाली हैं, हम उन के मालिकों से इन्हें किराए पर लेने की बात कर सकते हैं. आप अपने फ्रैंड्स से भी रिक्वैस्ट कर सकते हैं कि क्या उन के खाली फ्लोर को 1-2 दिन के लिए हम इस्तेमाल कर सकते हैं. अगर वे इस में हामी भर दें तो आप के पापा का काम काफी आसान हो जाएगा.

संगीत नाइट का अरेंजमैंट करें

बहन के संगीत प्रोग्राम में जान डालने के लिए आप पहले से ही बहन के फेवरिट गानों के साथसाथ हिट सौंग्स को भी डाउनलोड कर के पैनड्राइव में सेव कर लें, साथ ही म्यूजिक प्लेयर का भी बंदोबस्त कर के रखें ताकि ऐनवक्त पर कोई प्रौब्लम न हो. अगर डीजे वाला धोखा दे जाए तो आप का अपना अरेंजमैंट संगीत की रात का मजा खराब नहीं होने देगा.

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वैन्यू के बंदोबस्त की देखरेख

वैन्यू बुक कराने की जिम्मेदारी तो पापा को ही बखूबी निभाने दें, क्योंकि बुकिंग में जरा सी गड़बड़ी होने पर काफी परेशानी हो सकती है. लेकिन आप यहां इस तरह अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं कि मैरिज से एक दिन पहले जिस से वैन्यू बुक कराया है उसे कौल कर के रिमाइंड करवा सकते हैं औैर मैरिज वाले दिन वहां जा कर जायजा लें कि सबकुछ ठीक चल रहा है न.

बहन की ख्वाहिशों को करें सपोर्ट

इस दिन को ले कर हर लड़केलड़की के मन में कई तरह की ख्वाहिशें होती हैं, लेकिन घर के रीतिरिवाजों के कारण उन्हें अपनी इच्छा को दबाना पड़ता है. ऐसे में आप अपनी बहन की हर जायज ख्वाहिश को सपोर्ट करें, जैसे अगर आप की फैमिली में चूड़ा पहनने का रिवाज नहीं है, लेकिन बहन पहनना चाहती है तो आप इस के लिए घर के बड़ों को राजी करें कि इस से किसी का कोई नुकसान नहीं होने वाला बल्कि समय के साथ खुद में बदलाव लाना जरूरी है. इस से वे आप की बात को जरूर मानेंगे औैर बहन के चेहरे पर भी खुशी आएगी.

बैंक के कार्यों में करें हैल्प

अगर आप के पापा को ईबैंकिंग की नौलेज नहीं है और इस चक्कर में उन का काफी समय बरबाद हो रहा है तो बैंक के कार्यों को निबटाने में आप उन की सहायता कर सकते हैं. यहां तक कि एटीएम से पैसा निकालने में भी उन की हैल्प करें.

खुद के पास भी रखें थोड़ा पैसा

घर में शादी का माहौल हो, ऐसे में हर छोटीछोटी चीज के लिए पापा को डिस्टर्ब करते रहने से काम नहीं बनने वाला. इसलिए आप पहले से ही पापा से 5-6 हजार रुपए ले कर रखें ताकि अगर ऐनवक्त पर कोई चीज खरीदनी पड़ जाए या बहन को ही कुछ मंगाना पड़ जाए तो इस के लिए आप को पापा या मम्मी का इंतजार न करना पड़े बल्कि आप खुद ही सब आसानी से हैंडिल कर लें. इस से आप छोटी उम्र से ही चीजों को हैंडिल करना सीख जाएंगे.

बहन का रखें खयाल

नए परिवार में जाने के डर से अगर  बहन खानापीना छोड़ देगी तो इस से वे इस मूवमैंट को ऐंजौय भी नहीं कर पाएगी औैर चक्कर वगैरा आने का डर भी बना रहेगा. इसलिए आप उस के खानेपीने का खयाल रखें, समय पर उसे जूस वगैरा देते रहें. साथ ही मम्मीपापा की भी प्रौपर केयर करें, तभी आप इस जिम्मेदारी को अच्छे से निभा पाएंगे.

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बरातियों के वैलकम में न छोड़ें कमी

पापा को पहले ही कह दें कि आप चाचा वगैरा के साथ मेन वैन्यू पर जिम्मेदारी संभालें और हम कजिंस के साथ मिल कर रीअसैंबल पौइंट पर. इस से काम बंट जाएगा. ध्यान रखें बरातियों के वैलकम में कमी न रहने पाए. साथ ही बहन के फ्रैंड्स को भी पूरा ऐंटरटेन करें. यहां तक कि उन्हें छोड़ने या फिर अपने यहां ठहराने का बंदोबस्त करें.

अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के बीच आप को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि हर काम बजट में हो. इस तरह आप छोटे होते हुए भी बड़ों की काफी मदद कर पाएंगे.

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