शादी के बाद आखिर क्यों निभाएं शराबी पति से

फरवरी के पहले हफ्ते में राज्य महिला आयोग के भोपाल के दफ्तर में सुमन की दास्तां सुन कर न केवल आयोग की मुखिया लता वानखेड़े, बल्कि मौजूद दूसरी मैंबर्स भी सकते में आ गई थीं.

सुमन की शादी पिछले साल 22 जनवरी को रेलवे कालोनी के वाशिंदे अमित गौतम के साथ हुई थी.

शादी के वक्त सुमन बहुत खुश थी क्योंकि पति फिल्में बनाने का काम करता था और रेलवे में अफसर भी था. सुमन को उम्मीद थी कि उसे ससुराल में किसी चीज की कमी नहीं होगी. जिंदगी खुशनुमा गुजरेगी क्योंकि रेलवे अफसर की पगार अच्छीखासी होती है और फिर फिल्में बनाने से भी बेशुमार पैसा मिलता है.

शादी के बाद कुछ दिन तो ठीकठाक गुजरे और सुमन ससुराल वालों की तिमीरदारी में लग गई. वह अपनी तरफ से किसी को शिकायत का मौका नहीं देना चाहती थी. यह बात उसे उस के मांबाप ने सिखाई भी थी कि ससुराल में सब से हिलमिल कर रहना, घर के काम करना और छोटीमोटी परेशानियां पेश आएं तो उन से घबराना नहीं बल्कि उन का मुकाबला करना और अपनी तरफ से समझौता करने से हिचकिचाना नहीं.

कुछ महीनों बाद ही सुमन को पता चल गया कि अमित न तो रेलवे में अफसर है और न ही फिल्में बनाता है, उस से झूठ बोल कर शादी की गई थी. बात गाज गिरने जैसी ही थी, लेकिन सुमन ने यह सोचते हुए खुद को तसल्ली दे ली कि इस झूठ की अनदेखी करना ही भविष्य के लिहाज से बेहतर होगा. हल्ला मचाने से कोई फायदा नहीं होने वाला. जो है उस से समझौता कर जिंदगी गुजारी जाए.

नशैला निकला पति

यहां तक तो बात बरदाश्त थी, लेकिन जल्द ही पति का दूसरा रूप भी सामने आया तो सुमन की सब्र जवाब दे गई. अमित तरहतरह के नशे का आदी था और इतना ही नहीं, नशा कर के ऐसी ऊटपटांग हरकतें करता था कि किसी भी बीवी की जिंदगी नर्क बन जाए.

पति के नशैले होने की शिकायतें ले कर आने वाली औरतों की तादाद कम नहीं होती, इसलिए महिला आयोग की अध्यक्ष को कोई खास हैरानी नहीं हुई थी पर जब उन्होंने सुबकती सुमन के मुंह से यह सुना कि पति रूमफ्रैशनर तक सूंघ कर नशा करता है और फिर नशे में नागिन डांस करता है तो उन्हें समझ आ गया कि सुमन की परेशानी वाकई बड़ी है.

सुनने वालों की आंखें उस वक्त और फटी की फटी रह गईं जब सुमन ने यह खुलासा भी किया कि पति की नशे की लत का बेजा फायदा ससुर भी उठाता है. वह अकसर उसे इधरउधर छूने की कोशिश करता है. इतना ही नहीं शायरमिजाज ससुर उस की आंखों और बालों पर गजलें भी लिखता है.

हालांकि सफाई मांगे जाने पर अमित और उस के पिता ने सुमन के आरोपों को झूठा बताया, लेकिन सुमन की बात में दम इसलिए भी था कि आमतौर पर ऐसे मामलों में बीवियां परेशान करने और दहेज का इलजाम लगाती हैं पर सुमन ने सीधे नशे की बात कही थी.

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जब पति नशे की आदी हो तो बीवी को किन और कैसी दुश्वारियों से रूबरू होना पड़ता है यह सुमन की हालत से समझ आता है कि वे कहीं की नहीं रह जाती. मायके वालों से शिकायत करो तो वे समझाते हैं कि पति से निभाने की कोशिश करो. आजकल तो हर कोई नशा करता है.

मगर बीवी पर क्या गुजरती है यह तो नशैले पति के गले बंध गई या बांध दी गई बीवी ही बेहतर जानती है. पति की इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए उस पर हर नीयत बिगाड़ लेता है और हैरत की बात तो यह है कि इस में घर के मर्द ससुर, जेठ और देवर अव्वल रहते हैं.

बीवी की परेशानियां उस वक्त और बढ़ जाती हैं जब नशे का गुलाम पति उस की न सुन कर घर वालों की ही तरफदारी करता है. ससुर, जेठ या देवर बुरी निगाह रखते हैं यह बात बीवी किसी से कहे तो खोट उस के ही चालचलन में लोग निकालना शुरू कर देते हैं.

कैसीकैसी परेशानियां

नशे के आदी मर्दों की बीवियों की जिंदगी आम बीवियों जैसी आसान नहीं रह जाती क्योंकि नशैला पति न केवल मारपीट करता है, बल्कि उसे तरहतरह से तंग कर अपनी कमजोरी को छिपाने की भी कोशिश करता है ताकि बीवी मुंह न खोले. इस मर्दानगी से परेशान बीवियों को सैक्स सुख भी ढंग से नहीं मिल पाता क्योंकि नशे के आदी पति सैक्स में फिसड्डी होते हैं.

बात सिर्फ सैक्स की नहीं रह जाती. इस से जुड़ी दूसरी ज्यादतियों का शिकार भी बीवी को होना पड़ता है तो उस का ससुराल में दम घुटने लगता है. पर कोई सहारा या ठिकाना न होने के चलते वह ज्यादतियां बरदाश्त करती जाती है, जिस से पति का हौसला बुलंद होने लगता है. इसी दौरान अगर एकाध बच्चा भी हो जाए तो नशैले पति से छुटकारा पाना और भी मुश्किल काम हो जाता है.

पैसों की बाबत भी बीवी कुछ नहीं बोल सकती क्योंकि कमाईका बड़ा हिस्सा तो पति नशे में ही उड़ा देता है और जब शरीर कमजोर पड़ने लगता है तो वह बेशर्मों, निकम्मों की तरह घर पर पड़ा रहता है. नशीले पति का उठनाबैठना भी नशैलों में रहता है. दिक्कत उस वक्त भी पेश आती है जब पति की ली गई उधारी का तकाजा करने देनदार घर आना शुरू कर देते हैं.

भोपाल के एक प्राइवेट दफ्तर में काम करने वाली सुधा 2 बच्चों की मां है. 5 साल पहले उस की शादी सुधीर से हुई थी. सुधीर को शराब की ऐसी लत थी कि जिस दिन शराब न मिले वह छटपटाने लगता था और खुदकुशी तक करने की धौंस देने लगता था. एक कंपनी में दिहाड़ी पर काम करने वाले सुधीर की नशे की लत से आजिज आ गई सुधा ने क्व6 हजार महीने की नौकरी कर ली तो सुधीर और भी मनमानी करने लगा.

शराब के लिए पैसे देने से सुधा मना करती तो वह चिल्लाचिल्ला कर उस के चालचलन पर उंगली उठाता था और जबरदस्ती पैसे छीन कर ठेके पहुंच जाता था. छोटेछोटे बेटों का मुंह देखती सुधा अब पछताती है कि फालतू इन्हें पैदा कर लिया जिन के हिस्से में बाप का सुख और हिफाजत नहीं.

सुधा को अब कुछ नहीं सूझ रहा है कि क्या करे. पति को छोड़ने पर उसे अंदाजा है कि जिंदगी और दुश्वार हो जाएगी. बाहर दूसरे मर्द भूखे भेडि़यों की तरह उस के जिस्म पर नजरें गड़ाए बैठे हैं जो अभी सुधीर की वजह से पूरी तरह अपनी बदनीयती जाहिर नहीं कर रहे पर इशारोंइशारों में दिल और दिमाग की गंदगी उस पर फेंकने से कतई नहीं चूकते.

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क्या करें

धोखे या इत्तफाक से ही सही जब नशैला पति गले पड़ जाए तो बीवियां क्या करें, इस बात का सटीक जवाब या परेशानी का हल किसी के पास नहीं. यह फैसला तो खुद बीवियों को ही करना पड़ता है कि वे नशैले पति की ज्यादतियों को बरदाश्त करते हुए उस के गले से बंधी रहें या फिर छोड़ कर अलग जिंदगी जीएं.

खतरे घर में भी हैं और बाहर भी, इसलिए बीवियां फैसला लेने में देर कर देती हैं और बाद में पछताती ही हैं, क्योंकि बाहर के खतरे पति की नशे की लत के चलते धीरेधीरे घर में दाखिल हो कर उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं. पति की रजामंदी भी इस में होती है जिसे बीवी से ज्यादा नशे की जरूरत होती है.

सुमन ने ठीक किया जो वक्त रहते महिला आयोग पहुंच गई जहां से उस की परेशानी दूर न हुई तो तय है वह तलाक के लिए अदालत जाएगी और मुमकिन है तलाक के बाद कोई दूसरा अच्छा हमसफर मिल जाए और न भी मिले तो इस बदतर जिंदगी और घुटन से तो वह छुटकारा पा ही जाएगी.

तेरा यार हूं मैं

अक़्सर देखा जाता है कि बच्चे अपने दिल की बात जितना खुलकर अपने दोस्तों के साथ कर लेते हैं, उतना खुलकर वह अपने माता पिता से नहीं कह पाते. कई बार तो बच्चे अपने माता-पिता के सामने इतना संकोच करते हैं कि वह अपनी बात तक नहीं रख पाते. आजकल इसीलिए ये जरूरी हो गया है कि पेरेंट्स अपने बच्चों के दोस्त बनकर रहें. जब दोनों के बीच दोस्ती का रिश्ता होता है तो संवाद भी काफी आसान हो जाता है. इस से माहौल सहज होने से दोनों एक दूसरे की बात को समझने का प्रयास करते हैं. लेकिन बड़ा प्रश्न ये है कि बच्चों से दोस्ती की किस तरह जाए. यदि आप भी चाहते हैं बच्चों के दोस्त बनना तो जरूरत है बस कुछ कदम बढ़ाने की उसके बाद बच्चों से दोस्ती का रिश्ता कायम करना मुश्किल नहीं है तो चलिए जानते हैं कुछ आसान तरीके जिनसे  ये करना आसान हो जाएगा.

अधिक नियंत्रण से बचें

कई माता पिता अपने बच्चों को कड़े अनुशासन के नाम पर कठोर नियंत्रण में रखते हैं जिस से वो गलत राह पर न जाएँ पर इसके परिणाम ठीक उलट हो जाते हैं. बच्चे बहुत जिद्दी और गुस्से वाले बन जाते हैं.इसलिए धैर्य रखें और उन्हें अपना जीवन अपने अनुरूप जीने दें. कोई गलती हो जाने पर उन्हें डांटने की बजाय प्यार से समझाएँ. उन्हें उस गलती से होने वाले नुकसान बता कर अगली बार उस गलती को न करने सलाह दें.उन्हें यकीन दिलाएं कि आपको उन पर पूरा विश्वास है कि अब वो ये ग़लती नहीं दोहरायेंगे .

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करें जीवन भर का वादा

अगर आप सच में बच्चों के नजदीक जाना चाहते हैं तो पहल आपको ही करनी होगी इसकी शुरूआत कुछ ऐसे करें कि उन्हें ये अहसास कराएँ कि जीवन के किसी भी वक़्त में आप उनके साथ होंगे. मसलन आप उन्हें कहें कि जीवन में चाहे कोई भी परिस्थिति हो वो अपनी हर छोटी बड़ी परेशानी या खुशी आपसे बाँट सकते हैं और यदि उनसे कोई छोटी या बड़ी ग़लती भी होती है तो आपके प्यार में कमी नहीं आएगी बल्कि आप उस से बाहर निकलने में उनकी मदद करेंगे . वैसे तो माता-पिता का प्यार बिना शर्त और जीवन भर के लिए ही होता है, लेकिन बच्चे को ये जताना  भी जरूरी होता है  इससे आपसी बॉन्ड मजबूत होता है. इसी तरह आप उन्हें कह सकते हैं कि एक दोस्त की तरह वो आपसे गंदी बात भी बांट सकते हैं आप उसे सुनकर उन्हें समझने का प्रयास करेंगे और उनके प्रति जजमेन्टल नहीं होंगे.

साथ समय बिताएँ

आज के इस भागमभाग वाले समय में पेरेंट्स बच्चों से दोस्ती तो करना चाहते हैं पर समय की कमी उनकी राह का रोड़ा होती है. हम यह नहीं कहते कि आप अपना सारा काम छोड़कर बच्चों के पास सारा दिन बैठे रहें पर दिन भर में कम से कम एक घंटा सिर्फ और सिर्फ उन्हीं के लिए सुरक्षित रखें, फिर भले ही वह आपका डिनर टाइम ही क्यों ना हो.इस तरह पूरे साल में आप अपने बच्चों के साथ पूरे 365 घंटे बिता पाएँगे जो कि आपके बीच दोस्ती विकसित करने में बेहद मददगार होगा. ध्यान रखें कि दोस्ती का रिश्ता एक दिन में नहीं बनता इसको पक्का बनाने के लिए लगातार प्रयास करने होते हैं.

बच्चों के लिए हमेशा उपलब्ध रहें

दिन में एक घंटा बच्चों के लिए निकल लेने भर से आपकी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती. आपको बच्चों में ये भरोसा जगाना होगा कि आप हमेशा उनके लिए मौजूद हैं. आपने कभी महसूस किया है की आपके दोस्तों से भले ही कई दिनों तक बात ना करें, लेकिन अगर आप किसी मुश्किल में हैं तो आपको यकीन होता है कि वह आपके लिए उपलब्ध होंगे, ठीक उसी तरह, बच्चों को भी यह विश्वास होना चाहिए कि अगर वह किसी तरह की मुश्किल में हैं या फिर उन्हें कोई बात आपसे शेयर करनी है तो आप उनके लिए हमेशा उपलब्ध रहेंगे.

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प्यार भरा स्पर्श

बच्चों के साथ एक प्यार भरे और दोस्ती के रिश्ते के लिए आपका स्पर्श भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. जब आप अपने बच्चे को प्यार से स्पर्श करते हैं तो इससे उसके मस्तिष्क में कई सन्देश जाते हैं. आपने अक्सर देखा होगा कि जब बच्चा गुस्से में होता है या फिर रो रहा होता है, ऐसे में अगर आप उसे प्यार से गले लगा लें तो वह एकदम से शांत हो जाता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि जो माता-पिता अपने बच्चों को दिन में कम से कम पांच या छह बार प्यार से गले लगाते हैं या स्पर्श करते हैं उनका जीवन काल पांच या छह साल बढ़ जाता है. आज के दौर में बच्चों में कई भावनात्मक समस्याओं से जूझना पड़ता है जिसका  मुख्य कारण सिर्फ स्पर्श, स्नेह भरे स्पर्श की कमी और प्यार को महसूस न कर पाना है. जब आप उन्हें प्यार से गले लगाते हैं तो इससे आपका बच्चा न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि भावनात्मक रूप से भी लाभान्वित होता है.

इन कुछ बातों का ध्यान रखने से आपके बच्चे न सिर्फ आपके अच्छे दोस्त बन जायेंगे बल्कि वो आपका अधिक सम्मान करने लगेंगे.

तो हमेशा रहेगा 2 बहनों में प्यार

‘‘वाह इस गुलाबी मिडी में तो अपनी अमिता शहजादी जैसी प्यारी लग रही है,’’ मम्मी से बात करते हुए पापा ने कहा तो नमिता उदास हो गई.

अपने हाथ में पकड़ी हुई उसी डिजाइन की पीली मिडी उस ने बिना पहने ही अलमारी में रख दी. वह जानती है कि उस के ऊपर कपड़े नहीं जंचते जबकि उस की बहन पर हर कपड़ा अच्छा लगता है. ऐसा नहीं है कि अपनी बड़ी बहन की तारीफ सुनना उसे बुरा लगता है. मगर बुरा इस बात का लगता है कि उस के पापा और मम्मी हमेशा अमिता की ही तारीफ करते हैं.

नमिता और अमिता 2 बहनें थीं. बड़ी अमिता थी जो बहुत ही खूबसूरत थी और यही एक कारण था कि नमिता अकसर हीनभावना का शिकार हो जाती थी. वह सांवलीसलोनी थी. मांबाप हमेशा बड़ी की तारीफ करते थे.

खूबसूरत होने से उस के व्यक्तित्व में एक अलग आकर्षण नजर आता था. उस के अंदर आत्मविश्वास भी बढ़ गया था. बचपन से खूब बोलती थी. घर के काम भी फटाफट निबटाती, जबकि नमिता लोगों से बहुत कम बात करती थी.

मांबाप उन के बीच की प्रतिस्पर्धा को कम करने के बजाय अनजाने ही यह बोल कर बढ़ाते जाते थे कि अमिता बहुत खूबसूरत है. हर काम कितनी सफाई से करती है, जब कि नमिता को कुछ नहीं आता. इस का असर यह हुआ कि धीरेधीरे अमिता के मन में भी घमंड आता गया और वह अपने आगे नमिता को हीन सम  झने लगी.

नतीजा यह हुआ कि नमिता ने अपनी दुनिया में रहना शुरू कर दिया. वह पढ़लिख कर बहुत ऊंचे ओहदे पर पहुंचना चाहती थी ताकि सब को दिखा दे कि वह अपनी बहन से कम नहीं. फिर एक दिन सच में ऐसा आया जब नमिता अपनी मेहनत के बल पर बहुत बड़ी अधिकारी बन गई और लोगों को अपने इशारों पर नचाने लगी.

यहां नमिता ने प्रतिस्पर्धा को सकारात्मक रूप दिया इसलिए सफल हुई. मगर कई बार ऐसा नहीं भी होता है कि इंसान का व्यक्तित्व उम्रभर के लिए कुंद हो जाता है. बचपन में खोया हुआ आत्मविश्वास वापस नहीं आ पाता और इस प्रतिस्पर्धा की भेंट चढ़ जाता है.

अकसर 2 सगी बहनों के बीच भी आपसी प्रतिस्पर्धा की स्थिति पैदा हो जाती है. खासतौर पर ऐसा उन परिस्थितियों में होता है जब मातापिता अपनी बेटियों का पालनपोषण करते समय उन से जानेअनजाने किसी प्रकार का भेदभाव कर बैठते हैं. इस के कई कारण हो सकते हैं.

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किसी एक बेटी के प्रति उन का विशेष लगाव होना: कई दफा मांबाप के लिए वह बेटी ज्यादा प्यारी हो जाती जिस के जन्म के बाद घर में कुछ अच्छा होता है जैसे बेटे का जन्म, नौकरी में तरक्की होना या किसी परेशानी से छुटकारा मिलना. उन्हें लगता है कि बेटी के कारण ही अच्छे दिन आए हैं और वे स्वाभाविक रूप से उस बच्ची से ज्यादा स्नेह करने लगते हैं.

किसी एक बेटी के व्यक्तित्व से प्रभावित होना:

हो सकता है कि एक बेटी ज्यादा गुणी हो, खूबसूरत हो, प्रतिभावान हो या उस का व्यक्तित्व अधिक प्रभावशाली हो, जबकि दूसरी बेटी रूपगुण में औसत हो और व्यक्तित्व भी साधारण हो. ऐसे में मांबाप गुणी और सुंदर बेटी की हर बात पर तारीफ करना शुरू कर देते हैं.

इस से दूसरी बेटी के दिल को चोट लगती है. बचपन से ही वह एक हीनभावना के साथ बड़ी होती है. इस का असर उस के पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है.

बहनों के बीच यह प्रतिस्पर्धा अकसर बचपन से ही पैदा हो जाती है. बचपन में कभी रंगरूप को ले कर, कभी मम्मी ज्यादा प्यार किसे करती है और कभी किस के कपड़े/खिलौने अच्छे हैं जैसी बातें प्रतियोगिता की वजह बनती हैं. बड़ा होने पर ससुराल का अच्छा या बुरा होना, आर्थिक संपन्नता और जीवनसाथी कैसा है जैसी बातों पर भी जलन या प्रतिस्पर्धा पैदा हो जाती है.

बहने जैसेजैसे बड़ी होती हैं वैसेवैसे प्रतिस्पर्धा का कारण बदलता जाता है. यदि दोनों एक ही घर में बहू बन कर जाएं तो यह प्रतिस्पर्धा और भी ज्यादा देखने को मिल सकती है.

पेरैंट्स न करें भेदभाव

अनजाने में मातापिता द्वारा किए भेदभाव के कारण बहनें आपस में प्रतिस्पर्धा करने लगती हैं. उन के स्वभाव में एकदूसरे के प्रति ईर्ष्या और द्वेष पनपने लगता है. यही द्वेष प्रतिस्पर्धा के रूप में सामने आता है और एकदूसरे से अपनेआप को श्रेष्ठ साबित करने का कोई अवसर नहीं छोड़तीं.

इस के विपरीत यदि सभी संतान के साथ समान व्यवहार किया गया हो और बचपन से ही उन के मन में बैठा दिया जाए कि कोई किसी से कम नहीं है तो उन के बीच ऐसी प्रतियोगिता पैदा नहीं होगी. यदि दोनों को ही शुरू से समान अवसर, समान मौके और समान प्यार दिया जाए तो वे प्रतिस्पर्धा करने के बजाय हमेशा खुद से ज्यादा अहमियत बहन की खुशी को देंगी.

40 साल की कमला बताती हैं कि उन की 2 बेटियां हैं. उन की उम्र क्रमश: 7 और 5 साल है. छोटीछोटी चीजों को ले कर अकसर वे आपस में   झगड़ती हैं. उन्हें हमेशा यही शिकायत रहती है कि मम्मी मु  झ से ज्यादा मेरी बहन को प्यार करती हैं.

दरअसल, इस मामले में दोनों बेटियों के बीच मात्र 2 साल का अंतर है. जाहिर है जब छोटी बेटी का जन्म हुआ होगा तो मां उस की देखभाल में व्यस्त हो गई होंगी. इस से उस की बड़ी बहन को मां की ओर से वह प्यार और अटैंशन नहीं मिल पाया होगा जो उस के लिए बेहद जरूरी था.

जब 2 बच्चों के बीच उम्र का इतना कम फासला हो तो दोनों पर समान रूप से ध्यान दे पाना मुश्किल हो जाता है.

इस तरह लगातार बच्चे होने पर बहुत जरूरी है कि उन दोनों के साथ बराबरी का व्यवहार किया जाए. नए शिशु की देखभाल से जुड़ी ऐक्टिविटीज में अपने बड़े बच्चे को विशेष रूप से शामिल करें. छोटे भाई या बहन के साथ ज्यादा वक्त बिताने से उस के मन में स्वाभाविक रूप से अपनत्व की भावना विकसित होगी.

रोजाना अपने बड़े बच्चे को गोद में बैठा कर उस से प्यार भरी बातें करना न भूलें. इस से वह खुद को उपेक्षित महसूस नहीं करेगा.

प्रतिस्पर्धा को सकारात्मक रूप में लें

आपस में प्रतिस्पर्धा होना गलत नहीं है. कई बार इंसान की उन्नति/तरक्की या फिर कहिए तो उस के व्यक्तित्व का विकास प्रतिस्पर्धा की भावना के कारण ही होता है. यदि एक बहन पढ़ाई, खेलकूद, खाना बनाने या किसी और तरह से आगे है या ज्यादा चपल है तो दूसरी बहन कहीं न कहीं हीनभावना का शिकार होगी. उसे अपनी बहन से जलन होगी.

बाद में कोशिश करने पर वह किसी और फील्ड में ही भले, लेकिन आगे बढ़ कर जरूर दिखाती है. इस से उस की जिंदगी बेहतर बनती है. इसलिए प्रतिस्पर्धा को हमेशा सकारात्मक रूप में लेना चाहिए.

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रिश्ते पर न आए आंच

अगर दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा है तो यह महत्त्वपूर्ण है कि आप उसे टैकल कैसे करती हैं. आप का उस के प्रति रवैया कैसा है. प्रतिस्पर्धा को सकारात्मक रूप में लीजिए और इस के कारण अपने रिश्ते को कभी खराब न होने दीजिए. याद रखिए 2 बहनों का रिश्ता बहुत खास होता है. आज के समय में वैसे भी ज्यादा भाईबहन नहीं होते हैं.

यदि आप का बहन से रिश्ता खराब हो जाए तो आप के मन में जो खालीपन रह जाएगा वह कभी भर नहीं सकता क्योंकि बहन की जगह कभी भी दोस्त या रिलेटिव नहीं ले सकते. बहन तो बहन होती है. इसलिए रिश्ते में पनपी इस प्रतिस्पर्धा को कभी भी इतना तूल न दें कि वह रिश्ते पर चोट करे.

मैं अपनी सासूमां से परेशान हूं?

सवाल-

मैं 25 वर्षीय महिला हूं. हाल ही में शादी हुई है. पति घर की इकलौती संतान हैं और सरकारी बैंक में कार्यरत हैं. घर साधनसंपन्न है. पर सब से बड़ी दिक्कत सासूमां को ले कर है. उन्हें मेरा आधुनिक कपड़े पहनना, टीवी देखना, मोबाइल पर बातें करना और यहां तक कि सोने तक पर पाबंदियां लगाना मुझे बहुत अखरता है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

आप घर की इकलौती बहू हैं तो जाहिर है आगे चल कर आप को बड़ी जिम्मेदारियां निभानी होंगी. यह बात आप की सासूमां समझती होंगी, इसलिए वे चाहती होंगी कि आप जल्दी अपनी जिम्मेदारी समझ कर घर संभाल लें. बेहतर होगा कि ससुराल में सब को विश्वास में लेने की कोशिश की जाए. सासूमां को मां समान समझेंगी, इज्जत देंगी तो जल्द ही वे भी आप से घुलमिल जाएंगी और तब वे खुद ही आप को आधुनिक कपड़े पहनने को प्रेरित कर सकती हैं.

घर का कामकाज निबटा कर टीवी देखने पर सासूमां को भी आपत्ति नहीं होगी. बेहतर यही होगा कि आप सासूमां के साथ अधिक से अधिक रहें, साथ शौपिंग करने जाएं, घर की जिम्मेदारियों को समझें, फिर देखिएगा आप दोनों एकदूसरे की पर्याय बन जाएंगी.

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सिर्फ 7 फेरे ले लेने से पतिपत्नी का रिश्ता नहीं बनता है. रिश्ता बनता है समझदारी से निबाहने के जज्बे से, पतिपत्नी का रिश्ता बनते ही सब से अहम रिश्ता बनता है सासबहू का. या तो सासबहू का रिश्ता बेहद मधुर बनता है या फिर दोनों ही जिद्दी और चिड़चिड़ी होती हैं. ऐसा बहुत कम पाया गया है कि दोनों में से एक ही जिद्दी और चिड़चिड़ी हो. जिद दोनों तरफ से होती है. एक तरफ से जिद हो और कहना मान लिया जाए तो झगड़ा किस बात का? एक तरफ से जिद होती है तो उस की प्रतिक्रियास्वरूप दूसरी ओर से भी और भी ज्यादा जिद का प्रयास होता है. यह संबंधों को बिगाड़ देता है. इस के नुकसान देर से पता चलते हैं. तब यह रोग लाइलाज हो जाता है.

कटुता से प्रभावित रिश्ते

सासबहू के संबंध में कटुता आना अन्य रिश्तों को भी बुरी तरह प्रभावित करता है. मनोवैज्ञानिक स्टीव कूपर का मत है कि संबंध में कटुता एक कुचक्र है. एक बार यह शुरू हो गया तो संबंध निरंतर बिगड़ते चले जाते हैं. बिगड़ते रिश्तों में आप जीवन के आनंद से वंचित रह जाते हैं. अन्य रिश्ते जो प्रभावित होते हैं वे हैं छोटे बच्चों के साथ संबंध, देवरदेवरानी, ननदननदोई, जेठजेठानी, पति के भाईभाभी आदि. ये वह रिश्ते हैं जो परिवार में वृद्धि के साथ जन्म लेते हैं. इन रिश्तों को निभाना रस्सी पर नट के बैलेंस बनाने के समान है. हर रिश्ते में अहं अपना काम करता है और अनियंत्रित तथा असंतुलित अहं के कारण घर का माहौल शीघ्रता से बिगड़ता है.

सास-बहू मजबूत बनाएं रिश्तों की डोर

सास और बहू का बेहद नजदीकी रिश्ता होते हुए भी सदियों से विवादित रहा है. तब भी जब महिलाएं अशिक्षित होती थीं खासकर सास की पीढ़ी अधिक शिक्षित नहीं होती थी और आज भी जबकि दोनों पीढि़यां शिक्षित हैं और कहींकहीं तो दोनों ही उच्चशिक्षित भी हैं. फिर क्या कारण बन जाते हैं इस प्यारे रिश्ते के बिगड़ते समीकरण के.

संयुक्त परिवारों में जहां सास और बहू दोनों साथ रह रही हैं वहां अगर सासबहू की अनबन रहती है तो पूरे घर में अशांति का माहौल रहता है. सासबहू के रिश्ते का तनाव बहूबेटे की जिंदगी की खुशियों को भी लील जाता है. कभीकभी तो बेटेबहू का रिश्ता इस तनाव के कारण तलाक के कगार तक पहुंच जाता है.

हालांकि भारत की महिलाओं का एक छोटा हिस्सा तेजी से बदला है और साथ ही बदली है उन की मानसिकता. उस हिस्से की सासें अब नई पीढ़ी की बहुओं के साथ एडजैस्टमैंट बैठाने की कोशिश करने लगी हैं. सास को बहू अब आराम देने वाली नहीं, बल्कि उस का हाथ बंटाने वाली लगने लगी है. यह बदलाव सुखद है. नई पीढ़ी की बहुओं के लिए सासों की बदलती सोच सुखद भविष्य का आगाज है. फिर भी हर वर्ग की पूरी सामाजिक सोच को बदलने में अभी वक्त लगेगा.

बहुत कुछ बदलने की जरूरत

भले ही आज की सास बहू से खाना पकाने व घर के दूसरे कामों की जिम्मेदारी निभाने की उम्मीद नहीं करती, बहू पर कोई बंधन नहीं लगाती और न ही उस के व्यक्तिगत मसलों में हस्तक्षेप करती है. पर फिर भी कुछ कारण ऐसे बन जाते हैं जो अधिकतर घरों में इस प्यारे रिश्ते को बहुत सहज नहीं होने देते. अभी भी बहुत कुछ बदलने की जरूरत है क्योंकि आज भी कहीं सास तो कहीं बहू भारी है.

वे कारण जो शिक्षित होते हुए भी इन  2 रिश्तों के समीकरण बिगाड़ते हैं:

– आज की बहू उच्चशिक्षित होने के साथ आत्मनिर्भर भी है, मायके से मजबूत भी है क्योंकि अधिकतर 1 या 2 ही बच्चे हैं. अधिकतर लड़कियां इकलौती हैं, जिस के कारण वे सास से क्या किसी से भी दब कर नहीं चलतीं.

– आज के समय में लड़की के मातापिता सास व ससुराल से क्या पति से भी बिना कारण समझता करने की पारंपरिक शिक्षा नहीं देते जो सही भी है.

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– बहुओं का आज के समय में खाना बनाना न आना एक स्वाभाविक सी बात है और बनाना आना आश्चर्य की.

– गेंद अब सास के पाले से निकल कर बहू के पाले में चली गई.

– बहू नई टैक्नोलौजी की अभ्यस्त है, इसलिए बेटा उसे अधिक तवज्जो देता है जो सास को थोड़ा उपेक्षित सा कर देता है.

– सास शिक्षित होते हुए भी और नए जमाने के अनुसार खुद को बदलने का दावा करने के बावजूद बहू के इस बदले हुए आधुनिक, आत्मविश्वासी व बिंदास रूप को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रही है.

– पतिपत्नी के बंधे हुए पारंपरिक रिश्ते से उतर कर बहूबेटे के दोस्ताने रिश्ते को कई सासों को स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है.

– बहू के बजाय बेटे को घर संभालना पड़े तो सास की पारंपरिक सोच उसे कचोटती है.

ये कुछ ऐसे कारण हैं जो आज की सासबहू दोनों शिक्षित पीढ़ी के बीच अलगाव व तनाव का कारण बन रहे हैं. फलस्वरूप विचारों व भावनाओं की टकराहट दोनों तरफ से होती है.

छोटीछोटी बातें चिनगारी भड़काने का काम करती हैं जिस की परिणति कभीकभी बेटेबहू को कोर्ट की दहलीज तक पहुंचा कर होती है.

यूनिवर्सिटी औफ कैंब्रिज की सीनियर प्रोफैसर राइटर और मनोचिकित्सक डा. टेरी आप्टर ने अपनी किताब ‘व्हाट डू यू वांट फ्रौम मी’ के लिए की गई अपनी रिसर्च में पाया कि 50% मामलों में सासबहू का रिश्ता खराब होता है. 55% बुजुर्ग महिलाओं ने स्वीकार किया कि वे खुद को बहू के साथ असहज और तनावग्रस्त पाती हैं, जबकि करीब दोतिहाई महिलाओं ने महसूस किया कि उन्हें उन की बहू ने अपने ही  घर में अलगथलग कर दिया.

दुनिया के सभी रिश्तों से कहीं ज्यादा जटिल रिश्ता है सासबहू का. भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में इसे कठिन रिश्ता माना गया है. भारत में यह समस्या ज्यादा इसलिए है क्योंकि यहां परिवार व बड़ेबुजुर्गों को अहमियत दी जाती है.

नई पीढ़ी की बहुओं की सोच:

नई पीढ़ी की लड़कियों की सोच बहुत बदल गई है. वे पारंपरिक बहू की परिधि में खुद को किसी तरह भी फिट नहीं करना चाहतीं. उन की सोच कुछकुछ पाश्चात्य हो चुकी है. उन्हें ढोंग व दिखावा पसंद नहीं है. वे विवाह बाद अपने घर को अपनी तरह से संवारना चाहती हैं. वे अपने जीवन में किसी की भी दखलांदाजी पसंद नहीं है. उन के लिए उन का परिवार उन के बच्चे व पति हैं. बेटी ही बहू बनती है.

आज बेटियों को पालनेपोषने का तरीका बहुत बदल गया है. लड़कियां आज विवाह, ससुराल, सासससुर के बारे में अधिक नहीं सोचतीं. उन के लिए उन का कैरियर, खुद के विचार व व्यक्तित्व प्राथमिकता में रहते हैं.

सास की सोच:

सास की पारंपरिक सामाजिक तसवीर बेहद नैगेटिव है. समाजशास्त्री रितु सारस्वत के अनुसार, सास की इमेज के प्रति ये ऐसे जमे हुए विचार हैं, जो इतनी आसानी से मिटाए नहीं जा सकते. आज की शिक्षित सास ने बहू के रूप में एक पारंपरिक सास को निभाया है. बहुत कुछ अच्छाबुरा ?ोला है. बड़ेबड़े परिवार निभाए हैं. नौकरी करते हुए या बिना नौकरी किए ढेर सारा काम किया है.

वहीं बहू का रूप इतना बदल गया कि खुद को बहुत बदलने के बावजूद सास के लिए बहू का यह नया रूप आत्मसात करना सरल नहीं हो रहा है जिस के कारण न चाहते हुए भी दोनों के रिश्ते तनावपूर्ण हो जाते हैं.

सास का डर:

सासबहू के तनावपूर्ण रिश्ते का सब से बड़ा कारण है सास में ‘पावर इनसिक्योरिटी’ का होना. सास बेटे की शादी होने के बाद इस चिंता में पड़ जाती है कि कहीं मेहनत से तैयार किया हुआ उन का बसाबसाया साम्राज्य छिन न जाए. जो सासें इस इनसिक्योरिटी के भाव से ग्रस्त रहती हैं, उन के अपनी बहू से रिश्ते अधिकतर खराब रहते है.

बेटेबहू का रिश्ता मजबूत बनाने में मां की अहम भूमिका: विवाह से पहले बेटा अपनी मां के ही सब से नजदीक होता है. विवाह के बाद बेटे की प्राथमिकता में बदलाव आता है. जहां सास चाहती है कि बेटा तो विवाह के बाद उस का रहे ही अपितु बहू भी उस की हो जाए. यह सुंदर भाव व अभिलाषा है. हर मां ऐसा चाहती है. लेकिन इस के लिए कुछ बातों का पहले ही दिन से बहुत ध्यान रखने की जरूरत है.

सब से पहले तो बहू को अपनी अल्हड़ सी बेटी के रूप में स्वीकार करने की जरूरत है जिस की हर उपलब्धि पर खुशियों व तारीफ के पुल बांधे जाएं व हर गलती को मुसकरा कर प्यार से टाल दिया जाए क्योंकि एक सुकुमार लाडली सी बेटी विवाह होते ही बहू की जिम्मेदारी के खोल में नहीं सिमट सकती.

बहू को बेटे की पत्नी व अपनी बहू मानने से पहले एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार करे. उस के विचारों, फ्रैंड सर्कल, उस के काम को भी उतना ही महत्त्व दे जितना बेटे को देती है. युवा लड़कों में अपनी कामकाजी पत्नी को ले कर बहुत बदलाव आया है, लेकिन अकसर देखने को मिलता है कि मां बेटे के इस भाव को पोषित नहीं कर पाती.

बहू बेटे की पीढ़ी की व उसी के समकक्ष शिक्षित है, नई टैक्नोलौजी की अभ्यस्त है. बेटा और बहू की कई आपसी बातें, सलाहें उन की अपनी पीढ़ी के अनुसार हैं जो अकसर सास को समझ नहीं आतीं और वह खुद को उपेक्षित महसूस करती है. बेटेबहू के आपसी रिश्ते को सहजता से लेने की जरूरत है, जैसे बेटीदामाद का लेते हैं. क्या वे मां को सबकुछ बता देते हैं?

निजी जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं: बेटे बहू के बीच छोटीमोटा झगड़ा होना आम बात है. वे दोनों इसे खुद ही सुलझ लेते हैं. लेकिन उन दोनों के बीच पड़ कर यह सोचना कि बहू गलती मान कर सुलह कर ले, छोटे से झगड़े को बड़ा कर देता है.

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एकदूसरे से जलन क्यों:

सास और बहू के बीच जलन यह बात थोड़ी अजीब लगती है क्योंकि दोनों का रिश्ता अच्छा हो या बुरा होता तो मांबेटी का ही है. लेकिन इन दोनों के बीच जलन कहां किस रूप में जन्म ले ले, कहा नहीं जा सकता. लड़के ने अपनी मां को ज्यादा पूछा, उन के लिए बिना पत्नी को बताए कुछ खरीद लाए, किसी मसले पर उन से सलाह मांग कर उन्हें तवज्जो दे, मां के बनाए खाने की अधिक तारीफ कर दी, पत्नी को मां से खाना बनाना व गृहस्थी चलाने के गुर सीखने की सलाह दे डाले तो बहू के दिल में सास के प्रति जिद्द व जलन के भाव आ जाते हैं. वहीं सास भी इन्हीं सब कारणों से बहू के प्रति ईष्यालु हो सकती है.

सास के जमाने में बहू के लिए अदबकायदे व जिम्मेदारियां बहुत थी. आज की लड़की के लिए अदबकायदे व जिम्मेदारियों के माने बदल गए हैं. उस के बदले हुए तरीके को सहर्ष स्वीकार करें. बेमन से स्वीकार करने पर रिश्ता हमेशा भार बना रहेगा. सासबहू के बीच की सहजता खत्म होगी तो इस का असर बेटेबहू के रिश्ते पर पड़ेगा.

बेटा तो अपना ही है. अगर कभी पक्ष लेने की जरूरत पड़े तो बहू का ले वरना तटस्थ बनी रहे.

बच्चों के रिश्ते को बचाए रखने की जिम्मेदारी दोनों परिवारों की: यह सही है कि बहू का असली घर उस के पति का ही घर माना जाता है. इसलिए उस के ससुराल वालों पर बच्चों के विवाह को मजबूत बनाने की और अलगाव की स्थिति में बचाने की जिम्मेदारी ज्यादा आती है. जो बेटा जितना अपनी मां के करीब होगा वह मां और भी इस के लिए प्रयासरत रह सकती है क्योंकि बेटा अपनी मां की सलाह सुन लेता है.

मगर आज के समय लड़की के मातापिता भी इस के लिए कम कुसूरवार नहीं हैं. वे भी छोटीछोटी बातों में बेटी को उकसा कर तिल का ताड़ बना देते हैं. बेटी पर कोई अत्याचार हो रहा है तो जरूर साथ दें, लेकिन छोटीछोटी बातों, परिस्थितियों में बेटी को समझतावादी नजरिया रखने को कहें क्योंकि एक विवाह टूट कर दूसरा इतना सरल नहीं होता.

तलाक सिर्फ एक रास्ता है, मंजिल नहीं है खास कर जब बच्चे हों, क्योंकि तलाक पतिपत्नी का होता है, मातापिता का नहीं होता. बच्चों को दोनों की जरूरत होती है.

हर छोटी सी बात को मानसम्मान का प्रश्न बना लेना कोई समझदारी नहीं है. ससुराल वालों को भी अपना नजरिया बदलने की जरूरत है.

बहू के रूप में आई लड़की के स्वतंत्र व्यक्तित्व को स्वीकार करना सीखें. ‘तारीफ करने की आदत’ व ‘स्वीकार करने’ का स्वभाव किसी भी रिश्ते को टूटने से ही नहीं बचाता, अपितु मजबूत भी बनाता है.

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जब मायके से न लौटे बीवी

पेशे से मैकैनिक 22 साल का शफीक खान भोपाल की अकबर कालोनी में परिवार के साथ रहता था. उस की कमाई भी ठीकठाक थी और दूसरी परेशानी भी नहीं थी. लेकिन बीते 18 अक्तूबर को उस ने घर में फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली. ऐशबाग थाने की पुलिस ने जब मामला दर्ज कर तफतीश शुरू की तो पता चला कि शरीफ की शादी कुछ महीने पहले ही हुई थी और उस की बीवी शादी के बाद पहली बार मायके गई तो फिर नहीं लौटी.

शरीफ और उस के घर वालों ने पूरी कोशिश की थी कि बहू घर लौट आए. लेकिन कई दफा बुलाने और लाने जाने पर भी उस ने ससुराल आने से इनकार कर दिया तो शरीफ परेशान हो उठा और वह तनाव में रहने लगा. फिर उसे परेशानी और तनाव से बचने का बेहतर रास्ता खुदकुशी करना ही लगा.

22 साल की उम्र ज्यादा नहीं होती. फिर भी इस उम्र में शादी हो जाए तो मियांबीवी हसीन सपने देखते हैं. एकदूसरे से वादे करते हैं और चौबीसों घंटों रोमांस में डूबे रहते हैं, पर कई मामलों में उलटा भी होता है. जैसाकि अगस्त के महीने में भोपाल के ही एक और नौजवान अभिषेक के साथ हुआ था. उस की शादी को भी ज्यादा दिन नहीं हुए थे. लेकिन बीवी मायके गई तो फिर उस ने ससुराल आने से साफ इनकार कर दिया.

अभिषेक खातेपीते इज्जतदार घराने का लड़का था. अच्छे काम की तलाश में था. घर में पैसों की कमी न थी और शादी के पहले ही उस की ससुराल वालों को बता दिया था कि नौकरी या करोबार अभिषेक की बहुत बड़ी जरूरत नहीं. लड़का अच्छा था, ग्रैजएुट था, सेहतमंद था और मालदार घराने का था, इसलिए ससुराल वालों ने अनामिका (बदला नाम) की शादी उस से धूमधाम से कर दी. जब पहली विदाई के लिए अभिषेक के घर वालों ने समधियाने फोन किया तो यह सुन कर सन्न रह गए कि बहू ससुराल नहीं लौटना चाहती. वजह पूछने पर कोई साफ जवाब नहीं मिला.

कुछ दिन में सब ठीक हो जाएगा. अभी बहू बच्ची ही तो है. मायके का लगाव नहीं छोड़ पा रही है जैसी बातें सोच कर अभिषेक के घर वाले सब्र कर गए. लेकिन अभिषेक ज्यादा सब्र नहीं रख पाया और उस ने भी शफीक की तरह जीवन समाप्त करने का कदम उठा डाला.

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मौज के दिनों में मौत

शादी के बाद के शुरुआती दिन शादीशुदाओं के लिए बेहद रंगीन, रोमांटिक, हसीन होते हैं, लेकिन शफीक और अभिषेक जैसे नौजवानों की भी कमी नहीं, जिन के हिस्से में महज इस वजह से मायूसी, तनाव और ताने आते हैं, क्योंकि उन की बीवियां मायके से नहीं लौटतीं. मौजमस्ती के इन दिनों अगर बीवी की यह बेरुखी कोई शौहर न झेल पाए तो बात कतई हैरत की नहीं, क्योंकि आमतौर पर इस का दोष उस के सिर मढ़ दिया जाता है जो खुद नहीं समझ पाता कि आखिरकार क्यों बीवी वापस नहीं आ रही.

बीवियों के मायके में रहने या वहां से न आने की कई वजहें होती हैं, लेकिन समाज और रिश्तेदार उंगली पति की मर्दानगी पर उठाने का लुत्फ उठाते हैं. कई दफा ये ताने कि इस में दम नहीं होगा या बीवी का पहले से ही मायके में किसी से चक्कर चल रहा होगा, इसलिए वापस नहीं आ रही. इस से नातजर बेकार पति परेशान हो उठता है. बीवी से बात करता है तो वह साफसाफ वजह नहीं बताती पर साफसाफ यह जरूर कह देती है कि मुझे नहीं रहना तुम्हारे और तुम्हारे घर वालों के साथ. तब शौहर के सपने चकनाचूर हो जाते हैं. एक मियाद के बाद वह भी यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि

उस का पहले से कहीं चक्कर चल रहा होगा. शादी तो उस ने घर वालों के दबाव में आ कर कर ली होगी.

पर मेरा क्या कुसूर, यह सवाल जब शौहर के जेहन में बारबार हथोड़े की तरह बजता है और इस का कोई मुकम्मल जवाब कहीं से नहीं मिलता तो उसे जिंदगी और दुनिया बेकार लगती है. उसे लगता है सारे लोग उसे ही घूरघूर कर यह कहते देख रहे हैं कि कैसे मर्द हो, जो बीवी को काबू में नहीं रख पाए? जरूर तुम्हीं में कोई कमी होगी.

धीरेधीरे शफीक और अभिषेक जैसे शौहरों की हालत पिंजरे में फड़फड़ाते पक्षी की तरह होने लगती है. वे गुमसुम रहने लगते हैं, लोगों से कन्नी काटते हैं, अपना काम सलीके और लगन से नहीं कर पाते. बीवी की याद आती है तो हर कीमत पर वे वापस लाना चाहते हैं, लेकिन बीवी किसी भी कीमत पर आने को तैयार नहीं होती तो इन का मरने की हद तक उतारू हो जाना चिंता की बात समाज के दबाव और कायदेकानून के लिहाज से है. कई दफा तो घर वाले भी शौहरों का साथ यह कहते हुए नहीं देते कि तुम जाने और तुम्हारी बीवी. हमारी जिम्मेदारी शादी कराने की थी जो हम ने पूरी कर दी. अब वह नहीं आ रही तो हम क्या उस की चौखट पर अपनी नाक रगड़ें?

क्या हैं वजहें

बीवी के ससुराल वापस न आने की वजहों पर गौर करें तो पहली और अहम बात है उस की नादानी, नासमझी और जिम्मेदारियां न उठा पाने की नाकामी. जाहिर है, इस का सीधा संबंध उम्र से है, जो वक्त रहते ठीक हो जाता है. लेकिन कई मामलों से समझ आता है कि वाकई लड़की का मायके में किसी से चक्कर था.

और वह आशिक के दबाव में है या ब्लेकमैलिंग की शिकार है. कई लड़कियां घर वालों की खुशी के लिए शादी तो कर लेती हैं, पर अपने पहले प्यार को नहीं भूल पातीं. इसलिए भी उन का शौहर से लगाव नहीं हो पाता.

विदिशा के उमेश की शादी को 2 साल हो चले हैं, लेकिन उस की बीवी भी ससुराल नहीं आती. पहली रात ही उस ने दिनेश को बता दिया था कि वह भरेपूरे परिवार में नहीं रह सकती, इसलिए वह अलग हो जाए. इस पर उमेश ने समझा कि ऐसा तो होता रहता है. आजकल हर लड़की आजादी से रहना चाहती है. धीरेधीरे बीवी घर वालों से घुलमिल जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा.

लेकिन जिस तालमेल की उम्मीद दिनेश कर रहा था वह बीवी और घर वालों के बीच नहीं बैठा तो 2-3 बार ससुराल आ कर बीवी ने ऐलान कर दिया कि अब कुछ भी हो जाए वह मायके में ही रहेगी.

उमेश जैसे पतियों की समझ में नहीं आता कि कैसे इस स्थिति से निबटें, क्योंकि ससुराल वाले भी अपनी बेटी का साथ देते हैं. उधर यारदोस्त, नातेरिश्तेदार और समाज वाले भी बातें बनाना शुरू कर देते हैं, तो पूरा घर हैरानपेरशान हो जाता है.

मगर उमेश ने बुजदिली का रास्ता न चुनते हुए अदालत की पनाह ली. एक वकील की सलाह पर कोर्ट में बीवी को वापस आने के लिए दरख्वास्त लगा दी. वह सोच रहा था कि इस से बीवी को अक्ल आ जाएगी. लेकिन हुआ उलटा. ससुराल वालों और बीवी ने उस के घर वालों के खिलाफ दहेज मांगने और परेशान करने का झूठा मामला दर्ज करा दिया. उमेश गिरफ्तार हो गया. कुछ दिन बाद जमानत पर छूट आया, लेकिन अब वह खुद नहीं चाहता कि ऐसी बेगैरत, झूठी और बेवफा औरत के साथ जिंदगी काटे, इसलिए अब वह तलाक चाहता है.

कई मामलों में बीवियां अपनी कोई कमजोरी या छोटीमोटी जिस्मानी या दिमागी बीमारी छिपाने के लिए भी ससुराल नहीं लौटतीं

इधर कानून भी ज्यादा मदद हैरानपेरशान शौहरों की नहीं कर पाता. वजह काररवाई का लंबा चलना, बदनामी होना और अदालत में गुनहगारों सरीखे खड़े रहना होती है. इसलिए अधिकतर शौहर अदालत के नाम से घबराते हैं. जाहिर है, बीवी का वापस न आना ऐसी समस्या है, जिस का कोई सटीक हल नहीं मगर हल यह भी नहीं है कि खुदकुशी कर ली जाए.

ऐसा भी नहीं है कि ससुराल न लौटने की जिम्मेदार बीवी ही हो. कुछ मामलों में पति की बेरोजगारी, निकम्मापन, घर में पूछपरख न होना, नामर्दी जैसी वजहें भी होतीं हैं.

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क्या है हल

ऐसे शौहर क्या करें, जिन की बीवियां लाख समझानेबुझाने पर भी ससुराल नहीं आतीं? इस का सटीक जवाब किसी के पास नहीं. वजह हर मामले में थोड़ी अलग होती है.

बीवी मायके में रहे तो शौहर को समझ और सब्र से काम लेना चाहिए और लोगों की बातों और तानों पर ध्यान नहीं देना चाहिए. सब से पहले वजह ढूंढ़नी चाहिए. अगर बीवी की पटरी घर वालों से नहीं बैठ रही है या वह जिद्दी और गुस्सैल स्वाभाव की है तो अलग रहना ही बेहतर रहता है. यह ठीक है कि जिन मातापिता ने जन्म दिया, पालापोसा, तामील दिलाई और अपने पैरों पर खड़ा किया उन्हें एक कल की लड़की के लिए छोड़ देने का फैसला खुद को धिक्कारने वाला ही नहीं शर्मिंदगी भरा भी होता है, लेकिन सवाल चूंकि पूरी जिंदगी का होता है, इसलिए कारगर यही साबित होता है.

बेहतर यह फैसला लेने से पहले घर वालों को भरोसे में ले कर सारी बात समझाई जाए. बेटे की इस मजबूरी को अब मातापिता समझने लगे हैं, इसलिए उन्हें रोकते नहीं. ससुराल वापस न आने की वजह अगर बीवी का शादी से पहले के प्यार का चक्कर हो तो अलग होने से भी कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि बीवी सुधरने या पहले को तो छोड़ने से रही. इसलिए ऐसे मामले में तलाक देना बेहतर होता है. लेकिन इस के लिए सब्र और हिम्मत की जरूरत होती है. पहले बीवी से इस बाबत खुल कर बात करना चाहिए. अपनी जिद पर नहीं अड़ना चाहिए, क्योंकि यह तय है कि वह आप की हो कर नहीं रह सकती.

धीरेधीरे जब वह समझ जाए और तलाक  के लिए तैयार हो जाए तो बजाय मुकदमे के रजामंदी से तलाक लेना बेहतर होता है. इस के लिए कानून की धारा हिंदू मैरिज ऐक्ट 13 (सी) में इंतजाम है, जिस के तहत मियांबीवी दोनों अदालत में दरख्वाहस्त देते हैं कि खयालात न मिलने से उन का साथ रहना मुमकिन नहीं, इसलिए तलाक कर दिया जाए. इस के लिए अदालत दोनों को सोचने के लिए 6 महीने या 1 साल का वक्त देती है, जिसे खामोशी से गुजार देना शौहर के लिए फायदेमंद रहता है. इस मियाद के बाद भी दोनों अदालत में अपनी बात पर कायम रहें तो तलाक आसानी से हो जाता है. आमतौर पर आपसी रजामंदी से तलाक में शौहर बीवी का सारा सामान और दहेज में मिले तोहफे व नक्दी लौटा देता है. लेकिन इस की लिखापढ़ी दरख्वाहस्त में जरूर करनी चाहिए.

कमउम्र बीवियां अगर ससुराल में तालमेल न बैठा पाने की शिकायत करें तो बजाय जल्दबाजी के सब्र से काम लेना चाहिए. ऐसी बीवियां शौहर से ज्यादा वक्त चाहती हैं इसलिए शादी के बाद हनीमून पर जाना और वक्तवक्त पर कुछ दिनों के लिए घूमने जाना कारगर साबित होता है ताकि बीवी का शौहर से लगाव बढ़े.

इस के बाद भी बात न बने तो समाज से घबरा कर शराब पीने लगना, बीवी और उस के घर वालों को धमकाना, लड़नाझगड़ना या फिर खुदकुशी कर लेना बेवकूफी है. थोड़ा इंतजार कर हालात देखना ठीक रहता है.

लोग क्या कहेंगे, बीवी बदचलन है या खुद को कमजोर समझने लगना जैसी बातें समस्या का हल नहीं हैं. समस्या का हल है तलाक जो आसानी से नहीं होता, लेकिन देरसबेर हो ही जाता है. इस दौरान बेहतर रहता है कि आने वाली जिंदगी के सपने नए सिरे से बुने जाएं और पैसा कमाया जाए. याद रखें जिंदगी जीने के लिए होती है, जिसे किसी दूसरे की गलती पर कुरबार कर देना कतई बुद्धिमानी की बात नहीं.

सैक्स में जल्दबाजी नहीं

यह दिलचस्प मामला भी भोपाल का है, जिसे शौहर के बहनोई ने सुलाझाया. हुआ यों कि उस के साले की बीवी ससुराल नहीं आ रही थी. बात फैली तो तरहतरह की बातें होने लगीं. बहनोई ने साले को भरोसे में ले कर वजह पूछी तो पता चला कि गड़बड़ पहली ही रात हो हो गई थी.

शौहर जबरन हमबिस्तरी करने पर उतारू था और बीवी डर रही थी. जब वह नहीं मानी तो शौहर ने जबरदस्ती की कोशिश की लेकिन कायमयाब नहीं हो पाया. दूसरे दिन बीवी बहाना बना कर सास के पास सो गई और 4 दिन बाद विदा हो कर मायके चली गई. इस दौरान वह पति के वहशियाना बरवात से काफी डरीसहमी रही.

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मायके जा कर उस ने सुकून की सांस ली और मातापिता से कह दिया कि अब वह ससुराल नहीं जाएगी. मां ने पुचकार कर वजह पूछी तो उस ने सच बता दिया. दोनों के घर वालों के बीच बातचीज हुई. शौहर को उस के जीजा ने समझाया कि सैक्स के मामले में जल्दबाजी न करें. धीरेधीरे करे तो बीवी का डर खत्म हो जाएगा और वह खुद साथ देने लगेगी. बात शौहर की समझ में आ गई. अब 3 साल बाद हालात यह है कि बीवी मायके नहीं जाना चाहती क्योंकि उस के डर की जगह प्यार ने ले ली. 1 साल के बच्चे की मां भी है. यानी सैक्स से डर भी कभीकभार ससुराल न लौटने की वजह बन जाता है. ऐसे मामलों में जिम्मेदारी पति की बनती है कि वह पहली रात को ही शेर बनने के चक्कर में न पड़े. बीवी से प्यार से पेश आए, उस का डर खत्म करे.

ससुराल में रिश्ते निभाएं ऐसे

सिर्फ 7 फेरे ले लेने से पतिपत्नी का रिश्ता नहीं बनता है. रिश्ता बनता है समझदारी से निबाहने के जज्बे से, पतिपत्नी का रिश्ता बनते ही सब से अहम रिश्ता बनता है सासबहू का. या तो सासबहू का रिश्ता बेहद मधुर बनता है या फिर दोनों ही जिद्दी और चिड़चिड़ी होती हैं. ऐसा बहुत कम पाया गया है कि दोनों में से एक ही जिद्दी और चिड़चिड़ी हो. जिद दोनों तरफ से होती है. एक तरफ से जिद हो और कहना मान लिया जाए तो झगड़ा किस बात का? एक तरफ से जिद होती है तो उस की प्रतिक्रियास्वरूप दूसरी ओर से भी और भी ज्यादा जिद का प्रयास होता है. यह संबंधों को बिगाड़ देता है. इस के नुकसान देर से पता चलते हैं. तब यह रोग लाइलाज हो जाता है.

कटुता से प्रभावित रिश्ते

सासबहू के संबंध में कटुता आना अन्य रिश्तों को भी बुरी तरह प्रभावित करता है. मनोवैज्ञानिक स्टीव कूपर का मत है कि संबंध में कटुता एक कुचक्र है. एक बार यह शुरू हो गया तो संबंध निरंतर बिगड़ते चले जाते हैं. बिगड़ते रिश्तों में आप जीवन के आनंद से वंचित रह जाते हैं. अन्य रिश्ते जो प्रभावित होते हैं वे हैं छोटे बच्चों के साथ संबंध, देवरदेवरानी, ननदननदोई, जेठजेठानी, पति के भाईभाभी आदि. ये वह रिश्ते हैं जो परिवार में वृद्धि के साथ जन्म लेते हैं. इन रिश्तों को निभाना रस्सी पर नट के बैलेंस बनाने के समान है. हर रिश्ते में अहं अपना काम करता है और अनियंत्रित तथा असंतुलित अहं के कारण घर का माहौल शीघ्रता से बिगड़ता है.

जेठजेठानी

यह रिश्ता बड़े होने के साथ आदर व सम्मान चाहता है. बहू का कर्तव्य है वह रिश्तों को निभाते समय आदर व सत्कार से पेश आए. जेठजेठानी की तरफ से यह प्रयास होना चाहिए कि बहू को बच्चों के समान प्यार दें. उस की हर आवश्यकता का ध्यान रखें. यह प्यार दोतरफा है.

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देवरदेवरानी

देवरदेवरानी के साथ बहू का रिश्ता सौहार्दपूर्ण होना चाहिए. अगर देवरदेवरानी से कोई गलत व्यवहार हो जाए तो बहू को क्षमाशील और सहनशील होना चाहिए. यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि बहू को अपने सम्मान का खयाल नहीं रखना चाहिए. उस के आत्मसम्मान की रक्षा होनी चाहिए.

बच्चों के साथ व्यवहार

छोटे बच्चे संयुक्त परिवार में बड़े लाड़प्यार से पाले जाते हैं. सास तो उन को पूरा प्यार देती है. बहू को चाहिए वह भी उन्हें मां की तरह प्यार करे. उन का स्वभाव कोमल होता है. उन्हें कू्रर स्वभाव वाली बहू अच्छी नहीं लगती.

ननद-ननदोई के साथ व्यवहार

ननद शादी के बाद अकसर पति के साथ मायके आती है. वह बेशक थोड़े समय के लिए ही आए उस का स्वागत और सत्कार खुले दिल से होना चाहिए. घर के दामाद का भी आदर से भरपूर स्वागत होना चाहिए. बहू को चाहिए वह बढ़चढ़ कर परिवार के लोगों के साथ उन के सत्कार में भागीदार बने. उन्हें एहसास कराए कि उन का परिवार में आनाजाना उसे अच्छा लगता है. ननद परिवार की लड़की है. इस के लिए जाते समय ननदननदोई को उचित उपहार दे कर विदा किया जाए. सासबहू दोनों आपस में बातचीत कर के उपहार की व्यवस्था करें. जब पत्नी सब रिश्तों में अपने सद्भाव की मिठास भरती है, उन्हें अपने व्यवहार से सम्मान और प्यार देती है तो ऐसी बहू अपने पति की प्यारी और गर्व के योग्य बन जाती है. फिर कहा भी जाता है कि बहू वही जो पिया मन भाए.

वयस्क लड़का-लड़की

संयुक्त परिवार में जब बहू प्रवेश करती है तो सब से अधिक खुश होते हैं परिवार के कुंआरे लड़कालड़की. उन्हें मित्रवत व्यवहार की जरूरत होती है. अगर ससुराल आने पर बहू का रवैया उन के साथ मित्रवत होता है तो वह सास का दिल जीत लेती है. बहू उन का मार्गदर्शन करने की स्थिति में होती है.

सासबहू से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा

नकचढ़ी और जिद्दी स्वभाव से हार न मानते हुए, सभी रिश्तेदारों की जिम्मेदारी होती है कि वे उन्हें अवसर दें कि निम्न बिंदुओं पर खुद को पू्रव कर सकें.

दूसरे रिश्तेदारों की स्थिति में खुद को रख कर सोचें. उन की अपेक्षा क्या है, उस के अनुसार व्यवहार द्वारा घर वालों का दिल जीतें.

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उन से व्यवहार करने में क्षमाशील और सहनशील बनें. गलती सभी से हो सकती है, यह मान कर चलें. अपनी गलती सहर्ष स्वीकारें.

अपना नजरिया सैक्रीफाइस वाला रखें. पौजिटिव सोच रिश्तों के पोषण के लिए टौनिक का काम करती है. गिव ऐंड टेक अच्छी नीति है. 

लाडली को सिखाएं रिश्ते संवारना

‘मैं मायके चली जाऊंगी तुम देखते रहियो,’ टीवी पर आ रहे इस सीरियल की नायिका जब विवाह कर के अपनी ससुराल पहुंचती है, तो उस की मां उस की हर गतिविधि पर नजर रखने लगती है. मां वीडियो कौलिंग कर बेटी की घरगृहस्थी में घुसी रहती है, जो कतई उचित नहीं होता है.

भले मां बेटी को जन्म देती हैं, उसे पालपोस कर बड़ा करती हैं, हर पल बेटी का हित चाहती हैं, पर कई बार उन की जरूरत से ज्यादा फिक्रमंद रहने की आदत बेटी के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है. मांबेटी का रिश्ता प्यार की डोर से बंधा होता है.

शुरुआत में बरतें सावधानी

बेटी की सुरक्षा और उस के सुखद भविष्य के लिए मां हर मुमकिन प्रयास करती है. दोनों एकदूसरे की दुनिया होती हैं, पर जब बेटी की शादी हो जाती है तो बेटी एक दूसरी दुनिया में प्रवेश करती है. उस के जीवन में नए लोग और नए रिश्ते आते हैं. इन नए रिश्तों को प्यार से सींचने के लिए बेटी को काफी कंप्रोमाइज करने होते हैं और यह जरूरी भी है, क्योंकि रिश्तों का पौधा मजबूत बन सके, इस के लिए शुरुआती दिनों में ही ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

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बेटी को संवारने दें अपनी दुनिया

बेटी जब बिदा हो कर ससुराल चली जाए तो मां को बाद में भी उस के साथ चिपके नहीं रहना चाहिए. बेटी को अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीने दें. अपनी समस्याओं को स्वयं सुलझाने का मौका दें. अपनी परिस्थितियों के साथ एडजस्ट करने दें.

बातबात पर यदि मां बेटी को अपनी सलाह देती रहेगी तो बेटी कभी स्वतंत्र निर्णय लेना नहीं सीख पाएगी. वैसे भी जब मां उस घर में नहीं है, तो सारी परिस्थितियों को समझे बगैर दी गई सलाह एकतरफा ही रहेगी और बेटी की समस्याएं सुलझने के बजाय उलझती चली जाएंगी.

बेटी समझे ससुराल को अपना घर जब शादी कर के लड़की पति के घर आती है तो फिर वही उस का अपना घर बन जाता है. नए रिश्ते ज्यादा करीब हो जाते हैं और ससुराल का मानसम्मान उस का अपना हो जाता है. लड़की को सदैव इस हकीकत को समझना चाहिए.

हमेशा यह याद रखना चाहिए कि रिश्ता टूटने में एक भी पल नहीं लगता, अगर एक बार रिश्ते में दरार आ जाए तो फिर उसे पाटा नहीं

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जा सकता. यदि दरार भर भी जाए तो खटास फिर भी नहीं जाती. इसलिए रिश्ते की डोर को अपने प्रयासों से मजबूत बनाने का प्रयास करें. एक बार रिश्ता मजबूती से जुड़ जाए तो फिर उसे कोई नहीं तोड़ सकता.

जब माता या पिता का हो एक्सट्रा मैरिटल अफेयर

दिल्ली के एक कौलेज में छात्रों को साइकोलौजिकल सपोर्ट देने के उद्देश्य से बनाये गए क्लिनिक में काउंसलरका एक दिन किसी छात्रा द्वारा बताई गयी ऐसी समस्या से सामना हुआ जो पहले कोई और लेकर नहीं आया था. प्रौब्लम लड़की के पिता से जुड़ी थी, लेकिन वह छात्रा अपने अन्य मित्रों के समान पिता के अनुशासनपूर्ण रवैये से परेशान नहीं थी. उसकी समस्या तो यह थी कि उसके पिता अनुशासन में नहीं हैं. लड़की के अनुसार उसके पिता समाज व परिवार के क़ायदे भूलकर अपने औफ़िस की एक महिला मित्र संग अवैध सम्बन्ध बनाये हुए हैं. एक दिन जब वहछात्रा अपनी कुछ सहेलियों के साथ एक कौफ़ी शौप में पहुंची तो पिता उस युवती के साथ सटकर बैठे थे. ग़नीमत यह रही कि सखियों में से कोई भी उसके पिता को नहीं पहचानती थी, वरना छात्रा के अनुसार वह आत्महत्या ही कर लेती.

एक अन्य घटना मध्य प्रदेश की है, जहां अपने पति के मित्र से सम्बन्ध रखने पर एक मां को जान से हाथ धोना पड़ा. 15 वर्षीय बेटे को मां के विवाहेतर सम्बन्ध का पता लगा तो वह आग-बबूला हो उठा और उसने अपनी मां की हत्या कर दी.

विवाहेतर सम्बन्ध या एक्स्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर से जुड़े समाचार प्राय सुनने में आ ही जाते हैं. आज जब समाज में ‘मेरा जीवन मेरे नियम’ का चलन ज़ोर पकड़ने लगा है तो इस प्रकार की समस्याएं भी खड़ी हो रही हैं. युवा हो रहे बच्चों को जब अपने माता या पिता के विवाहेतर सम्बन्ध की जानकारी होती है तो उनके दिल पर क्या गुज़रती होगी इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है. ऐसी परिस्थिति का सामना वे किस प्रकार करें इस पर विचार तभी हो सकता है जब उन पर पड़ने वाले प्रभावों को समझ लिया जाए.

माता-पिता के एक्स्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर का बच्चों पर प्रभाव

– अभिभावक की रुचि कहीं और देखकर वे स्वयं को उपेक्षित समझने लगते हैं और हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं.

– इस प्रकार के सम्बन्धों और उसके कारण माता-पिता के बीच होने वाले विवाद से वे तनाव में आ जाते हैं औरस्वयं कोअकेलामहसूस करने लगते हैं.

– माता-पिता तो एक-दूसरे से लड़ झगड़कर अपनी बात कह सकते हैं लेकिन बच्चे की यह समस्या हो जाती है कि वह क्या करे? न तो पीड़ित अभिभावक का पक्ष ले सकता है और न ही अफ़ेयर में फंसे अभिभावक को खरी-खोटी सुना सकता है.

– माता-पिता के बीच सम्बन्ध टूट जाने का भय उसमें असुरक्षा की भावना को जन्म देता है.

– विवाहेतर सम्बन्ध बनाने वाले अभिभावकों की गतिविधियों पर प्रभावित बच्चे आते-जाते नज़र रखने लगते हैं, जिससे उनके भीतर संदेह की प्रवृत्ति घर करने लगती है.

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– मित्रों को इस बात का पता लग जाएगा तो उनकी प्रतिक्रिया न जाने क्या होगी, इस बात का भय उनको दोस्तों से दूर कर देता है और वे समाज से कटना शुरू कर देते है.

– युवा बच्चों का ध्यान अपना करियर बनाने में रहता है. इस प्रकार के सम्बन्धों के विषय में जानकर उनका मन पढ़ाई या किसी परीक्षा की तैयारी आदि में नहीं लग पाता. इसका प्रभाव उनके सम्पूर्ण जीवन पर पड़ सकता है.

– बच्चे माता-पिता को अपना आदर्श मानते हैं. जब उनके रिश्ते में वे किसी तीसरे का प्रवेश देखते हैं तो उनका अभिभावकों से विश्वास उठने लगता है.

– युवा हो रहे बच्चे पर कभी-कभी इस बात का प्रभाव इतना गहरा पड़ जाता है कि क्रोध के कारण उसकी प्रवृति हिंसात्मक होने लगती है.

क्या करें जब माता या पिता के हों विवाहेतर सम्बन्ध

• यह सच है कि बच्चों को इस प्रकार का आघात सहन करना भारी पड़ता है, लेकिन इसका परिणाम घर से चले जाना या पढ़ाई से दूर हो जानानहीं होना चाहिए. एक ग़लत कदम के लिए कोई दूसरा ग़लत कदम उठा लेना समझदारी नहीं.

• माता या पिता द्वारा यदि एक भूल हो गयी तो इसका यह अर्थ नहीं कि उनका अपनी संतान के प्रति स्नेह भी समाप्त हो गया. इसलिए अपने को उपेक्षित मानकर आत्महत्या करने की बात सोचना बिल्कुल ग़लत होगा.

• इस बात की चिंता कि समाज इस बारे में क्या सोचेगा, माता या पिता को भी होगी. इसलिए अभिभावकों के अवैध सम्बन्धों को लेकर बच्चों को दिन-रात इस चिंता में घुलना कम करना चाहिए कि लोग क्या कहेंगे? अपने मित्रों से मिलना-जुलना उन्हें पूर्ववत जारी रखना चाहिए.

• संयम से काम लेना होगा. आवश्यकता पड़ने पर अभिभावकों को अपनी मनोदशा बताई जा सकती है. यदि साफ़-साफ़ कहने में संकोच हो तो लिखकर विनम्रतापूर्वक अपने दिल की बात बताना सही होगा.

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• मां या पिता के विषय में कुछ भी अप्रिय देखा अथवा सुना गया हो तोअपनी बातजल्दी ही पेरेंट्स तक पहुंचा देनी चाहिए. शुरू-शुरू में बच्चे द्वारा अपनी बात कह देने से एक लाभ तो यह होगा कि उस पीड़ित बच्चे के मन-मस्तिष्क में पनप रहा तनावहिंसात्मक रूप नहीं लेगा और दूसरा सम्बन्ध में लिप्त अभिभावक को संभलने में अधिक समय नहीं लगेगा.

• अपने मन की बात कह देने के बाद बच्चों को चाहिए कि इस विषय में अधिक न सोचें और चिंताग्रस्त होने के स्थान पर पढ़ाई में मन लगाकर अपने सपनों को पूरा करने में जुटे रहें. कोई भी समस्या दूर होने में कुछ समय तो लगता ही है.

यह सच है कि युवा बच्चे अपनी समझदारी दिखाते हुए विवाहेतर सम्बन्धों में रुचि ले रहे अभिभावकों को अपनी दुर्गति से परिचित करवा सकते हैं, लेकिन एक अहम् बात जो समझना आवश्यक है कि माता-पिता पेरेंट्स होने के साथ-साथ एक इंसान भी हैं और भूल तो किसी भी व्यक्ति से हो सकती है.समस्या कोई भी हो उसका समाधान ढूंढा जा सकता है. इसलिए यह याद रखना होगा कि माता या पिता को कहीं सम्बन्ध बढ़ाते देख अपना आपा खोकर कुछ भी अनुचित करने से बचना होगा.

बेटे नहीं बेटियां हैं बुढ़ापे की लाठी

कुछ अरसा पहले दिल्ली से सटे गे्रटर नोएडा की यह खबर अखबारों की सुर्खियां बनी कि मां के शव को ले कर 4 बेटियां भाई के दरवाजे पर 3 घंटे तक अंतिम संस्कार के लिए रोती रहीं, लेकिन भाई ने दरवाजा नहीं खोला. सैक्टरवासियों और पुलिस के समझाने पर भी उस का दिल नहीं पसीजा, तो अंतत: बेटियों ने ही मां के शव को मुखाग्नि दी. भाई के अपनी मां को मुखाग्नि न देने का कारण चाहे जो भी हो, मगर आज भी घर में बेटा पैदा होने पर मातापिता बेहद खुश होते हैं, क्योंकि आज भी समाज में ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि बेटा घर का कुलदीपक होता है और वही वंश को आगे बढ़ाता है. जबकि आज के बदलते परिवेश में बेटों की संवेदनाएं अपने मातापिता के प्रति दिनबदिन कम होती जा रही हैं. बेटियां जिन्हें पराया धन कहा जाता है, जिन के पैदा होने पर न ढोलनगाड़े बजते हैं, न जश्न मनाया जाता है और न ही लड्डू बांटे जाते हैं. डोली में बैठ कर वे ससुराल जरूर जाती हैं पर वही आज के परिवेश में मांबाप के बुढ़ापे की लाठी बन रही हैं.

बेटियों ने दिया सहारा

कुछ महीने पहले बरेली की रहने वाली कृष्णा जिन की उम्र 80 वर्ष है, रात सोते समय पलंग से गिर गईं. डाक्टरों ने कहा कि कौलर बोन टूट गई है अत: इन्हें बैड रैस्ट पर रहना पड़ेगा. वकील बेटे की पत्नी को उन की देखरेख यानी कपड़े बदलवाना, खाना खिलाना आदि करना ठीक नहीं लगा, तो रोज पतिपत्नी के बीच झगड़ा होने लगा. अंतत: लखनऊ से बेटीदामाद ऐंबुलैंस ले कर आए और मां को अपने घर ले गए. अब बेटी के घर उन की अच्छी तीमारदारी हो रही है. पर बेटे ने वहां जाना तो दूर एक बार फोन कर के भी मां का हालचाल नहीं पूछा. जबकि मां की नजरें हर समय बेटे को खोजती रहती हैं.

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ऐसे न जाने कितने मांबाप होंगे जिन्हें उन के बेटे अपने पास नहीं रखना चाहते. अब रामकुमारजी को ही लें. 10 साल पहले रिटायर हो गए थे. सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर थे. पत्नी रही नहीं. बेटे की शादी की. फिर घर के एक कोने में पड़े रहते थे. बेटे ने पूरे घर में अपना कब्जा कर रखा था. बहू उन से बात नहीं करती थी. हाल ही में उन्हें कैंसर होने का पता चला तो बेटी आ कर ले गई. वह पिता का इलाज करवा रही है. बेटे को इस से कोई मतलब नहीं है. घर रामकुमारजी का पर अधिकार बेटे का. रामकुमारजी बताते हैं कि बेटी ने जब लव मैरिज की थी तो वे उस से काफी समय तक नाराज रहे थे. फिर भी आज वही बेटी मेरे बुढ़ापे का सहारा बन रही है. कई महिलाएं तो वृद्धाश्रम में इसलिए रह रही हैं कि उन के बेटे उन की देखभाल नहीं करते और बेटी कोई है नहीं. कर्नाटक की रहने वाली 73 वर्षीय शकुंतला बताती हैं कि उन के पति का बिजनैस था. पति के निधन के बाद इकलौते बेटे ने बिजनैस संभाला. फिर वह गुड़गांव आ कर रहने लगा और घर में पोते के लिए जगह कम होने का हवाला दे कर उसे वृद्धाश्रम में छोड़ गया. इसी तरह केरल की रहने वाली 65 वर्षीय विजयलक्ष्मी का बेटा उन्हें अपने परिवार के साथ मस्कट ले गया. वहां वे घर का काम करती थीं व बेटे के छोटे बच्चे को संभालती थीं. पर जब वे बीमार हुईं और घर का काम करने में असमर्थ हो गईं तो बेटे ने उन्हें घर से निकाल दिया. तब केरल के ही रहने वाले एक व्यक्ति को उन पर दया आई और उस ने उन की भारत वापसी का इंतजाम कराया. अब वे अपनी बेटी के पास हैं. वही उन की देखभाल कर रही है.

इसी तरह एटा के रहने वाले शर्माजी की पत्नी नहीं रहीं तो वे अपने इंजीनियर बेटे के पास नोएडा आ गए. उन के आते ही बहू ने भी जौब शुरू कर दी और अपने बच्चे को क्रैच में न भेज कर उसे सुबह स्कूल की बस में चढ़ाना, दोपहर को घर लाना और खाना खिलाना आदि सभी काम शर्माजी पर डाल दिए. एक दिन वे गिर पडे़ और पैर की हड्डी टूट गई. बस तभी से बेटेबहू ने उन से मुंह मोड़ लिया. अपनी बेटी से मोबाइल पर बात करते थे तो मोबाइल भी उन्होंने ले लिया. वे उन से बात नहीं करते थे. खाना भी मुश्किल से एक समय और वह भी बेसमय मिलता. अंतत: बेटी आई और अपने पिता को देहरादून अपने साथ ले गई. अब वे ठीक हैं. बेटे ने तो उन का हालचाल भी नहीं पूछा. ऐसे किस्से आज समाज के हर वर्ग में और हर दूसरेतीसरे घर में घट रहे हैं.

बेटों के विचार

सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है जो बेटे अपने जन्म देने वाले मांबाप की देखभाल करना नहीं चाहते? क्या उन की संवेदनाएं मर गई हैं अथवा अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं? आइए, जानें कुछ बेटों ने इस संबंध में क्या बताया: बेटे चाहते हैं कि बुढ़ापे में अपने मातापिता की देखभाल करें, पर नौकरी के कारण दूसरे शहर में जाना, बारबार ट्रांसफर होना, छोटा घर, बच्चों की पढ़ाई का बढ़ता खर्चा और सब से मुख्य बात पत्नी का भी नौकरीपेशा होना अथवा सहयोग न देना, जिस की वजह से वे ऐसा नहीं कर पाते. फिर बड़े शहरों में एक तो विश्वासपात्र नौकर नहीं मिलते और अगर कोई मिल भी जाता है तो मोटा वेतन मांगता है. तो भी डर बना रहता है कि कहीं घर में कोई दुर्घटना न घट जाए. उस पर मातापिता का जिद्दी होना, हर समय की टोकाटोकी, खानपान में नुक्ताचीनी जैसी कई समस्याएं हैं. घर आने पर हर व्यक्ति सुकून चाहता है, पर ऐसे हालात में यह संभव नहीं हो पाता. कई बार मातापिता स्वयं भी साथ नहीं रहना चाहते. फिर आज के माहौल में छोटा परिवार की धारणा को भी बढ़ावा मिल रहा है.

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ऐसा क्यों हो रहा

सवाल यह उठता है कि आज के समय में ऐसा क्यों हो रहा है, जबकि मातापिता भी शिक्षित हैं और बच्चे भी?

मनोचिकित्सक दिव्या बताती हैं कि बेटा और बेटी के साथ समान व्यवहार करना व बेटी को भी प्रौपर्टी में समान हिस्सा देने से लड़कों के मन में यह विचार आने लगा है कि मांबाप के देखभाल की जितनी जिम्मेदारी उन की है उतनी ही बेटी की भी यानी मांबाप की देखभाल की जिम्मेदारी अकेले उन की नहीं है. वैसे भी भावनात्मक रूप से लड़कियां अपने मातापिता से ज्यादा जुड़ी रहती हैं. दूसरे अब वे भी आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो रही हैं, अत: ससुराल वाले भी उन से कुछ नहीं कह पाते. अब पतियों को भी यह समझ में आने लगा है कि पत्नी के मातापिता भी उतने ही जरूरी हैं जितने अपने. इसी कारण वे पत्नी को पूरापूरा सहयोग देते हैं.

मातापिता स्वयं भी जिम्मेदार होते हैं. बहू में हर समय कमी देखते हैं, उस के साथ जुड़ाव नहीं कर पाते. कोई बात करनी हो तो भी बेटे से अलग करते हैं. बहू के सामने नहीं. दूसरे हर बात में अपनी बेटी को बहू के मुकाबले ज्यादा आंकते हैं. गाहेबगाहे बेटी को तो तोहफे देते रहते हैं पर बहू को नहीं. यह सच है कि उम्र के साथ कुछ बीमारियों का लगना आम बात है तो भी वे मांबाप हैं और उन्हें भावनात्मक सहारा अपने बच्चों से मिलना ही चाहिए ताकि वे उम्र के आखिरी पड़ाव पर खुद को उपेक्षित न महसूस करें.

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