मेरी कमाई, मेरा हक

सोमी के ऑफिस में आज सभी के चेहरे गुलाब की तरह खिले हुए थे.हो भी क्यों ना आज सब कर्मचारियों को 10 प्रतिशत इन्क्रीमेंट मिला था.सोमी पर बुझी बुझी सी लग रही थी. जब कायरा ने पूछा तो सोमी फट पड़ीमेरी सैलरी पर मेरा नही ,बल्कि पूरे परिवार का हक हैं

इन्क्रीमेंट का मतलब हैं ज़्यादा काम ,पर मुझे क्या मिलेगा कुछ नही.हर महीने एक बच्चे की तरह मेरे पति मुझे चंद हज़ार पकड़ा देते हैं. पूछने पर बोलते हैंसब कुछ तो मिल रहा हैं क्या करोगी तुम इन पैसों का ,फिजूलखर्ची करने के अलावा

सोमी अकेली महिला नही हैं. सोमी जैसी महिलाएं हर घर मे मौजूद हैं जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर भी पराधीन हैं.वो बस अपने पति और परिवार के लिए एक कमाई की मशीन हैं.उनके पैसों को कैसे ख़र्च करना हैं और कहाँ निवेश करना हैं ये पति महोदय का मौलिक अधिकार होता हैं.

  रितिका की कहानी भी सोमी से कुछ अलग नही हैं.रितिका की सैलरी आते ही,पूरा पैसा विभाजित हो जाता हैं.बच्चों के स्कूल की फ़ीस, घर की लोन की किस्तें और घर ख़र्च सब रितिका की सैलरी पर होता हैं.परन्तु रितिका के पति प्रदीप की सैलरी कैसे ख़र्च होती हैं ये प्रदीप के अलावा कोई नही जानता हैं.

हर छुट्टियों में घूमने की प्लानिंग करना, दूर पास के रिश्तेदारों के लिए तोहफ़े खरीदना ,पत्नी बच्चो के लिए कपड़े इत्यादि खरीदना प्रदीप अपनी सैलरी से करता हैं और सबकी आंखों का तारा हैं.वहीं रितिका के बारे में प्रदीप कहता हैंअरे औरतों की लाली लिपस्टिक पर ख़र्च रोकना का ये नायाब तरीका हैं कि उनकी सैलरी पर लोन इत्यादि ले लो

रितिका जो 80 हज़ार मासिक कमा रही हैं ना अपनी पसंद के कपड़े पहन सकती हैं और ना ही अपनी पसंद के तोहफ़े किसी को दे सकती हैं.इतना कमाने के बाद भी वो पूरी तरह से अपने पति पर निर्भर हैं.

  अगर ऊपर की दोनो घटनाओं को देखे तो एक बात दोनो में समान हैं कि सोमी और रितिका अभी भी गुलामी की बेड़ियों में मानसिक रूप से कैद हैं.दोनो ही महिलाओं में एक समानता हैं कि दोनों ही मानसिक रूप से स्वतंत्र नही हैं. दोनो को ये भी नही मालूम हैं कि उन्हें अपने गाढ़े पसीने की कमाई कैसे ख़र्च करनी हैं.

ये भी पढ़ें- उफ… यह मम्मीपापा की लड़ाई

ये कहना गलत ना होगा कि सोमी और रितिका जैसी महिलाओं की दशा उन महिलाओं से भी बदतर हैं जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नही हैं.कभी प्यार में तो कभी डर के कारण वो अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की कुंजी अपने पति के हाथों में थमा देती हैं जो बिल्कुल भी सही नही हैं.

आज के समय मे ज़िन्दगी की गाड़ी तभी सुचारू रूप से चल सकती जब दोनों जीवनसाथी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो.जैसे गाड़ी के दोनो पहिए यदि समान नही होते तो गाड़ी नही चल सकती हैं, उसी तरह से पति और पत्नी में भी समानता होनी चाहिए ताकि ज़िन्दगी सुचारू रूप से चल सके.

अगर आप इन छोटी छोटी बातों का ध्यान रखेगी तो अपनी कमाई को अपने हिसाब से ख़र्च कर पाएगी.

1.प्यार का मतलब नही हैं ग़ुलामी-

महिलाएं स्वभाव से ही कोमल और भावुक होती हैं.प्यार की डोर में बंधी हुई वो अपने वेतन का पूरा ब्यौरा अपने पति को दे देती हैं.पति अपने वेतन के साथ साथ अपनी पत्नी के वेतन को भी अपने हिसाब से ख़र्च करने लगते हैं.शुरू शुरू में तो पत्नियों को ये सब बड़ा प्यारा लगता हैं पर शादी के एक दो वर्ष के बाद उन्हें कोफ़्त होने लगती हैं.पति के हाथों में अपने वेतन या एटीएम कार्ड को पकड़ना प्यार या वफ़ा का नही ,गुलामी का परिचायक हैं.

2.अपने ऊपर ख़र्च करना हैं आपका मौलिक अधिकार-

बहुत से मामलों में देखने को मिलता हैं कि विवाह के पश्चात लड़कियां अपने ऊपर ख़र्च करने में हिचकिचाने लगती हैं.उन्हें लगता हैं कि अब घर की ज़िम्मेदारी ही उनकी सर्वपरिता हो जाता हैं. पार्लर जाना या खुद के ऊपर ख़र्च करना, सहेलियों के साथ बाहर जाना ,सब कुछ उन्हें बेमानी लगने लगता हैं जो सही नही हैं.आपका सबसे पहला रिश्ता अपने साथ हैं तो इसलिए उसे खुश रखना आपका मौलिक अधिकार हैं.

3.अपने भविष्य को सुरक्षित करे-

ज़िन्दगी आपकी हैं तो उसकी बागड़ोर अपने हाथों में ही रखे. विवाह का मतलब ये नही होता कि सबकुछ पति के भरोसे छोड़ कर हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाए.अपने भविष्य को सुरक्षित रखना ,आपकी ज़िम्मेदारी हैं.अपनी कमाई को सही जगह पर लगाकर अपने भविष्य को सुनिश्चित कर ले.

4.लेन देन करे अपनी हैसियत के हिसाब से-

बहुत बार देखने मे  आता हैं कि पत्नी के वेतन के कारण ,पति अपनी झूठी शान दिखाते हुए बहुत महँगे महँगे तोहफे शादी और फंक्शन में दे देते हैं.अगर आपकी पति की भी ये आदत हैं तो आप उन पहले ही अवसर पर टोक दे.मायके और ससुराल दोनो ही जगह समान  रूप से और अपनी हैसियत के अनुरूप ही लेन देन करे.

5.निवेश करे सोच समझ कर-

अपने पैसों को सोच समझ कर निवेश करे क्योंकि ये आपकी मेहनत की कमाई हैं. आपको अपने पैसे शेयर मार्केट में लगाने हैं या उन पैसों से कोई बांड खरीदना हैं या फिर किसी प्रोपेर्टी में लगाना हैं आपका ही फैसला होना चाहिए.अपने पति से आप सलाह अवश्य ले सकती हैं पर उन्हें अपने पैसों का कर्ता धर्ता मत बनाइए.

ये भी पढ़ें- माता-पिता का डिवोर्स बच्चे पर कितना भारी, आइए जानें

6.धन हैं बड़ा बलवान-

ये बात हालांकि कड़वी हैं पर सत्य हैं.धन में बहुत ताकत होती हैं.जब तक आपके पास अपने पैसे हैं तब तक आपकी ससुराल में इज़्ज़त बनी रहेगी.आपके पति भी कुछ उल्टा सीधा करने से पहले सौ बार सोचेंगे क्योंकि उन्हें पता होगा कि आपकी ज़िंदगी की लगाम आपके ही हाथों में हैं.वो अगर कुछ ग़लत करेंगे तो आप उनको छोड़ने में जरा भी हिचकिचायेगी नही. पति महोदय को ये भी अच्छे से मालूम होगा कि आपके द्वारा भविष्य के लिए संचित किया हुआ धन आपके साथसाथ उनके बुढ़ापे की भी लाठी हैं

शादी निभाने की जिम्मेदारी पत्नी की ही क्यों

गौतम बुद्ध की शादी 16 वर्ष की आयु में यशोधरा नाम की एक कन्या से होती है और 29 वर्ष की आयु में उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति होने के बाद यानी शादी के 13 वर्ष बाद उन्हें यह ध्यान आता है कि उन्हें संन्यास लेना है और तभी वे अचानक एक दिन आधी रात को बिना अपनी पत्नी को बताए अपनी पत्नी और नवजात शिशु को सोता छोड़ घर से चुपचाप निकल जाते हैं.

सांसारिक दुख उन्मूलन की तथा ज्ञान के खोज की ऐसी उत्कट अभिलाषा कि पत्नी और बेटे की जिम्मेदारी तक भूल गए, उन के पीछे उन के कष्टों का भी ज्ञान न रहा.

गौतम बुद्ध के विषय में यह कहा जाता है कि वे बचपन से ही बेहद करुण हृदय वाले थे किसी का भी दुख नहीं देख सकते थे और ऐसे करुण हृदय वाले बुद्ध को अपनी पत्नी का ही दुख नजर नहीं आया.

अपनी पत्नी की ऐसी उपेक्षा करने वाले करुण हृदय बुद्ध के अनुसार, दुख होने के अनेक कारण हैं और सभी कारणों का मूल है तृष्णा अर्थात पिपासा अथवा लालसा.

तो क्या ज्ञानप्राप्ति की उन की पिपासा ने उन के पीछे उन की पत्नी और उन के नवजात की जिंदगी को असंख्य दुखों की ओर नहीं धकेला था? बुद्ध के अष्टांगिक मार्गों में एक सम्यक संकल्प अथवा इच्छा तथा हिंसा से रहित संकल्प करना तथा दूसरा सम्यक स्मृति अर्थात् अपने कर्मों के प्रति विवेक तथा सावधानी का स्मरण भी है.

मानसिक कष्ट देना भी हिंसा

इच्छा तथा हिंसा से रहित संकल्प… तो क्या, जब गौतम बुद्ध ने अपनी पत्नी का त्याग किया तो उन के इस कृत्य से उन की पत्नी को जिस प्रकार की मानसिक वेदना  झेलना पड़ी थी वह क्या हिंसा नहीं थी? किसी को शारीरिक आघात पहुंचाना ही हिंसा नहीं होता, बल्कि मानसिक कष्ट देना भी एक तरह की हिंसा ही तो है. अब यदि उन के अष्ट मार्ग में से सातवें मार्ग पर भी नजर डालें तो इन के अनुसार, ‘अपने कर्मों के प्रति सावधानी तथा विवेक का स्मरण.’

अब यदि देखा जाए तो अपनी पत्नी और पुत्र का त्याग करते वक्त क्या बुद्ध ने विवेकपूर्ण दृष्टि से उन के प्रति अपने दायित्वों के विषय में विचार किया नहीं न…

उन की पत्नी ने यह दायित्व अकेले ही निभाया होगा और उन्हें भी उस समय के समाज ने पतिव्रता नारी के गुण पति धर्म आदि का पाठ पढ़ा कर उन्हें चुप करा दिया होगा…

ये भी पढ़ें- आर्टिस्ट कृपा शाह से जानें कैसे भरे जीवन में रंग

बुद्ध तो अपनी पत्नी का त्याग कर महान ज्ञानी बन गए परंतु उन की पत्नी का क्या? उस पत्नी के अनजानेअनचाहे कष्टों का क्या जिसे बुद्ध सांसारिक दुखों के उन्मूलन हेतु छोड़ कर अकेले निकल गए?

इस समाज ने नारी को ही पत्नी धर्म के पाठ पढ़ाए. पुरुषों को कभी उन के उत्तरदायित्व से मुंह मोड़ने पर कुसूरवार नहीं ठहराया.

आश्चर्य है इस दलील पर

मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा भारतीय संस्कृति के भाव नायक राम ने तो सीता जैसी परम पवित्र और आदर्श नारी का त्याग सिर्फ समाज द्वारा सवाल उठाए जाने पर अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए किया था क्योंकि समाज के किसी वर्ग में यह संदेह उत्पन्न हुआ कि सीता पहले की तरह ही पवित्र और सती नहीं हैं क्योंकि उन्हें रावण हरण कर के ले गया था.

वैसे दलील तो यह दी जाती है कि सीता ने खुद वन जाने की इच्छा जताई थी क्योंकि पति को बदनामी का दुख  झेलना न पड़े और राम ने इसे होनी सम झ कर मान लिया था.

आश्चर्य है ऐसी दलील पर कि जिन्हें अपनी पत्नी के सतीत्व पर पूर्ण विश्वास है वे समाज के किसी वर्ग के कहने पर बदनामी के दुख से दुखी या आहत हो जाएं और पत्नी उन के दुख से दुखी हो कर स्वयं ही गृह का त्याग कर दे और वह भी तब जबकि वह गर्भवती थी.

मर्यादापुरुषोत्तम राम उस समाज पर क्रोधित होने की जगह अपनी पत्नी के साथ खड़े होने की जगह, दुखी हो गए और उसे होनी सम झ लिया. यह दलील कुछ अजीब नहीं है?

जब राम ने रावण के द्वारा सीता के हरण को होनी नहीं सम झा अर्थात् यही किस्मत में लिखा था. तब यह नहीं सम झा और रावण का सर्वनाश कर दिया. वे अपनी पत्नी के सतीत्व पर उठे इस सवाल पर दुखी हो कर चुप रह जाते हैं और अपनी पत्नी को जंगल में भटकने के लिए छोड़ देते हैं.

यह किस प्रकार का आदर्श है जो समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया गया. क्या यह तर्क इसलिए नहीं दिया जाता ताकि समाज में नारियों को सीता का उदाहरण दे कर अन्याय के खिलाफ खड़े होने की जगह त्याग का पाठ पढ़ाया जा सके ताकि कभी कोई स्त्री अपने हक के लिए सवाल उठाए तो उसे सीता का उदाहरण दे कर पतिव्रता बने रहने की सलाह दे कर आदर्श नारी बनने का पाठ पढ़ा कर उस का मुंह बंद किया जा सके.

मर्यादापुरुषोत्तम राम ने यह किस प्रकार का उदाहरण भारतीय पुरुषों के समक्ष पेश किया कि यदि पत्नी के सतीत्व पर सवाल उठे तो पति को बदनामी का दुख हो तो पत्नी के साथ खड़े होने की जगह अपनी प्रतिष्ठा की वे चिंता करें और उसे भाग्य का लिखा सम झ लें और अपनी पत्नी की प्रतिष्ठा की रक्षा करने की जगह उसे घर त्याग कर चुपचाप जाने दें जबकि उस का कोई कसूर ही न था. क्या यह अन्याय नहीं था?

त्याग स्त्री ही क्यों करे

राजा दुष्यंत जो कि पूरू वंशी राजा थे, एक बार मृग का शिकार करते हुए महर्षि कण्व के आश्रम में पहुंचे और शकुंतला पर आसक्त हो कर गंधर्व विवाह कर लिया और कुछ समय उस के साथ व्यतीत कर अपने नगर लौट गए. आश्रम में शकुंतला उन के पुत्र को जन्म देती है परंतु बाद में शकुंतला जब राजा दुष्यंत के पास जाती है तो राजा उन्हें पहचानने से इनकार कर देते हैं.

दलील यह दी जाता है कि राजा किसी श्राप के कारण शकुंतला को भूल गए थे. खैर, शकुंतला वापस अकेले ही अपने पुत्र का पालनपोषण करती है और एक दिन राजा दुष्यंत वापस कण्व ऋ षि के घर पहुंचते हैं और उन का अपने पुत्र के प्रति प्यार भी अचानक उमड़ पड़ता है साथ ही खोई हुई अंगूठी भी मिल जाती है जिस से उन की खोई हुई याददाश्त वापस आ जाती है.

लेकिन इतने समय तक शकुंतला वन में अकेले ही दुख उठाती हुई अपने पुत्र का भरणपोषण करती है.

यहां भी बड़ी आसानी से समाज के ठेकेदारों ने पत्नी के लिए त्याग का उदाहरण पेश कर दिया कि एक पुरुष अपनी पत्नी का त्याग कर सकता है और वह भी बड़ी आसानी से तथा पत्नी उस की याददाश्त के वापस आने तक उस का इंतजार करती है. यहां भी त्याग की कहानी सिर्फ एक स्त्री के लिए. पुरुष चाहे तो कैसे भी अपनी पत्नी का त्याग कर दे परंतु पत्नी को पतिव्रता बने रहना है. यहां भी पति के कृत्य पर कोई सवाल नहीं. पत्नी और बेटे का त्याग कर पुरुष फिर भी महान बना रह जाता है.

ये भी पढ़ें- #coronavirus: रोजाना 90 लाख वैक्सीन देने का दावा कितना सही?

यह कैसा क्रोध

राजा उत्तम ने तो क्रोध में ही अपनी पत्नी का त्याग कर दिया. उसे राजमहल से निकाल दिया उन्हें अपनी पत्नी का त्याग करने के लिए किसी ठोस कारण की जरूरत भी नहीं पड़ी बस पत्नी पर क्रोध आना ही काफी था. लेकिन बाद में निंदा और तिरस्कार के डर से अपनी पत्नी को वापस अपना लेते हैं परंतु सिर्फ क्रोध आया और पत्नी को घर से निकाल दिया यह उदाहरण भी समाज के लिए निंदनीय ही है.

ऋ षि गौतम ‘अक्षपाद गौतम’ के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हैं और न्याय दर्शन के प्रथम प्रवक्ता भी माने जाते हैं. महर्षि गौतम को परम तपस्वी और बेहद संयमी भी बताया जाता है. महाराज वृद्धाश्रव की पुत्री अहिल्या उन की पत्नी थी जोकि बहुत ही सुंदर और आकर्षक थी. एक दिन ऋ षि स्नान के लिए आश्रम से बाहर गए तभी इंद्र ने गौतम ऋ षि का रूप ले कर उन के साथ छल किया और बिना किसी अपराध के ही अहिल्या को दंड भोगना पड़ा. ऋ षि गौतम ने आश्रम से इंद्र को निकलते देख लिया था और पत्नी के चरित्र पर ही शक कर बैठे और अपनी पत्नी को श्राप दे दिया और वह हजारों वर्षों तक पत्थर बनी रही.??

छल इंद्र का दंड पत्नी को

यहां सम झने वाली बात यह है कि न्याय दर्शन के प्रवक्ता परम तपस्वी बेहद संयमित ऋ षि अपनी पत्नी के साथ ही घोर अन्याय कर जाते हैं. वे इंद्र के छल के लिए दंड अपनी पत्नी को दे देते हैं जो उस ने किया ही नहीं था. उस कृत्य का दंड पा कर वह हजारों वर्षों तक पत्थर बनी रहती है. यहां एक ऋ षि का संयम जवाब दे देता है. इतने क्रोधित हो उठते हैं कि अपनी पत्नी को ही पत्थर बनाने का श्राम दे देते हैं.

यह कहानी पुरुषों की उस मानसिकता का उदाहरण है जहां एक पत्नी को मात्र उपभोग की वस्तु सम झा जाता रहा है और कभी भी अर्थहीन पा कर उस का त्याग करने में उसे दंडित करने में थोड़ा भी विलंब नहीं होता.

उन्होंने भी एक ऐसा दृष्टिकोण पत्नी को देखने का, सम झने का ऐसा ही नजरिया समाज के समक्ष प्र्रस्तुत किया था और फिर भी उन्हें महानता के शिखर पर बैठा कर यह समाज उन्हें पूजता रहा है. क्या अहिल्या के प्रति उन का अपराध क्षमा करने योग्य था?

पत्नी की अवहेलना

सम्राट अशोक ने भी अपनी पहली पत्नी जिस का नाम देवी था जोकि एक बौद्ध व्यापारी की पुत्री थी जिस से अशोक को पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा प्राप्त हुई थी को छोड़ कर एक मछुआरे की पुत्री करुणावकि से विवाह कर लेते हैं और उन के शिलालेखों में कहीं भी उन की पहली पत्नी का नाम तक नहीं होता है. सम्राट अशोक भले ही एक महान शासक के रूप में प्रसिद्धि पाए हों परंतु अपनी पत्नी की अवहेलना उन्होंने भी की.

और फिर संत कवि तुलसीदास जिन का विवाह रत्नावली नाम की अति सुंदर कन्या से हुआ था. ये पहले तो पत्नी प्रेम में इतना डूब जाते हैं कि लोकमर्यादा का होश तक नहीं रहता और फिर एक दिन अचानक पत्नी का त्याग कर देते हैं और संत कवि बन जाते हैं.

अटपटी दलील

ठीक इन्हीं की तरह कालिदास ने भी पारिवारिक जीवन का त्याग कर दिया और दुनिया के महान कवि बन गए. इन दोनों कवियों में एक बात की समानता है जिस में इन के त्याग के पीछे पत्नी की फटकार को ही कारण बताया गया. यहां यह दलील थोड़ी अटपटी सी लगती है कि दोनों कवियों ने अपनीअपनी पत्नी को त्यागने के पीछे का कारण अपनी पत्नी की फटकार या उस के उपदेश को ही बताया और अपनी महानता को भी बनाए रखने की चेष्टा करते हैं.

कोईर् भी पत्नी यह बिलकुल नहीं चाहेगी कि उस का पति उस का त्याग कर दे परंतु यहां पत्नियों के कारण का एक अलग ही उदाहरण पेश कर दिया गया और अकसर उदाहरण के तौर पर पेश भी किया जाता है.

समाज के ठेकेदारों ने इन्हें अपनीअपनी पत्नी को त्यागने में भी इन की महानता को ही ढूंढ़ निकाला. अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने के बावजूद इन की महानता पर कोई आंच नहीं आने दी और पत्नियों को त्याग का पाठ पढ़ाने के लिए एक नया फौर्मूला भी तैयार कर लिया, जिस का सहारा आज भी किसी न किसी रूप में लिया जाता है.

औरत क्या सजावटी वस्तु

अकसर ऐसा कहते हुए सुना जाता है कि स्त्रियां घरों की शोभा होती हैं. शोभा यानी सजावट. सजावट शब्द ने एक औरत को वस्तु शब्द का पर्याय बना दिया और फिर सजावट जैसे शब्द को गढ़ने वाले अपनी सोच की परिधि में एक औरत रूपी चेतना को घुटघुट कर दम तोड़ने पर मजबूर कर देते हैं. इस मानसिकता की शुरुआत संभवत: उन कथित दरबारी कवियों ने ही की थी जो शृंगार रस में डूब कर नखशिख वर्णन यानी किसी औरत के नाखूनों से ले कर उस के सिर तक की सुंदरता का वर्णन राज दरबारों में राजाओं के मनोरंजन के लिए किया करते थे. तब से ले कर लगभग आज तक औरतों को देखने का एक ही दृष्टिकोण लगभग तय सा हो गया. यह समाज औरत को बस एक खूबसूरत वस्तु के पैमाने में ही मापता आ रहा है.

आज भी औरतों को अपनी इसी सोच के दायरे में रख कर देखने वाले पुरुषों की कमी नहीं है विवाह के बाद पत्नियों को त्याग कर किसी खूबसूरत युवती से शादी कर लेना भी एक चलन बन गया है गांव में ऐसी पत्नी आज भी हैं, जिन्हें जिन के पतियों ने शादी के काफी साल बाद त्याग कर अकेले ही जिंदगी जीने के लिए छोड़ दिया और वे पतिव्रता नारी धर्म का पालन किए जी रही हैं. वे किन कष्टों का सामना कर रही हैं. उन की जिंदगी कैसीकैसी कठिनाइयों से भरी हुई है इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता.

ये भी पढ़ें- सावधान ! बदल गई है जॉब मार्केट, खुद को काम का बनाए रखने की कोशिश करें  

औरतों की आजादी पर अंकुश

सदियों पहले मनु ने एक फतवा जारी किया. मनु के अनुसार स्त्री का बचपन में पिता के अधीन, युवा अवस्था में पति के आधिपत्य में तथा पति की मृत्यु के उपरांत पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिए. मनु का ऐसा कहना एक स्त्री के लिए फतवा नहीं है? स्त्रियों की आजादी को क्या ऐसा कह कर छीन नहीं लिया गया? क्या उन की आजादी पर अंकुश नहीं लगा दिया गया? क्या इस फतवे ने नारी के प्रति पुरुषों के अत्याचार के सिलसिले को और भी बढ़ावा नहीं दे दिया?

तमाम तरह की बंदिशें इस समाज में एक नारी के ऊपर ही लगानी शुरू कर दीं जैसे परदे में रहना, पुरुषों की आज्ञा का पालन करना, पुरुषों को पलट कर उत्तर न देना, चुपचाप उन के अत्याचारों को सहन करना इस सोच ने नारी को एक तरह से पुरुषों के अधीन बना दिया जैसे वे कोई संपत्ति हों जिन पर पहले पिता का, फिर पति का और फिर बाद में पुत्र का अधिकार हो गया और फिर स्त्री को सारे सुखों और अधिकारों से वंचित कर दिया गया.

इन सभी वजहों से वह एक वस्तु पर्याय बना दी गई, पुरुषों के अधीन हो गई. पुरुष जब चाहे उस का त्याग कर दे और वह मुंह तक न खोले, पलट कर जवाब तक न दे जैसे वह कोई वस्तु है जिस का त्याग पुरुष अपनी मरजी के हिसाब से कर सकता है.

पुरुषों के लिए कोई बंदिश नहीं

मनु और याज्ञवल्क्य जैसे स्मृतिकारों ने एक पत्नी के क्या कर्तव्य होते हैं जैसे निर्देश देते हुए पत्नी धर्म का पालन करना, पति को परमेश्वर मानना आदि फतवे जारी कर उन्हें पूर्णतया पति के उपभोग की वस्तु बना दिया, एक मानदंड तैयार कर दिया गया जिस के आधार पर उन्हें या तो देवी या तो फिर कुलक्षिणी करार दिया जाने लगा परंतु उसी समाज ने पुरुषों के लिए कभी कोई बंदिश क्यों नहीं लगाई?

पुरुष चाहे तो अपनी मरजी से पत्नी का साथ निभाए या फिर उस का अपनी मरजी से त्याग कर दे परंतु स्त्री के लिए सतीत्व का पालन करना, उस का देवी बने रहना क्यों अनिवार्य कर दिया गया? हमारा समाज आज भी नहीं बदला है. आज भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां पति अपनी पत्नी का त्याग कर महान बने बैठे हुए हैं. शादी की और उसे अकेला छोड़ दिया. खुद अपनी जिंदगी मजे में जी रहे हैं परंतु पत्नी को कोई पूछता नहीं. उस की हालत पर कहीं कोई चर्चा नहीं होती. बस पत्नियों को त्याग का पाठ पढ़ा दिया जाता है और वे देवी बने रहने के दायरे से कभी भी बाहर नहीं निकल पातीं.

दयनीय स्थिति

आज भी हमारे समाज में एक औरत पर ही हजारों पाबंदियां ज्यों की त्यों बनी हुई हैं. पुरुष चाहे तो कितने भी प्रेम करे. वह चाहे तो अपनी पहली पत्नी के होते हुए भी दूसरी शादी रचा ले. उसे समाज बहिष्कृत नहीं करता. उस के चरित्र पर सवाल उठाने की जगह उसे महान बना दिया जाता है. उसे कोई कुलटा नहीं कहता क्योंकि वह पुरुष है. त्याग का पाठ बस पत्नियों को ही पढ़ाई जाने की चीज है.

आज भी इस समाज में कईर् ऐसी पत्नियां हैं जिन के पति स्वयं तो समाज के कई प्रतिष्ठित स्थानों पर विराजमान हैं. उन में कोईर् अभिनेता है, फिल्म अभिनेता है, महान गायक है या फिर कोई राजनेता है और ये सब बिना किसी ठोस कारण अपनीअपनी पत्नी का त्याग कर महान बन बैठे हैं और फिर भी यह समाज उन्हें पूरी इज्जत व प्रतिष्ठा दे रहा है या देता आ रहा है. परंतु उन पत्नियों का जीवन कैसा है, वे किस प्रकार जी रही हैं, किसी को कोई चिंता नहीं है.

गांवों में तो ऐसी स्थिति और भी दयनीय है. जिस का पति बिना तलाक दिए मजे में अपनी जिंदगी बिता रहा है क्या वह पत्नी न्याय की हकदार नहीं है? क्यों उस के कष्टों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता? तीन तलाक बेशक निंदनीय अपराध है परंतु उन हिंदू औरतों, उन पत्नियों का क्या अपराध जिन के पतियों ने बिना तलाक दिए उन्हें अकेले जिंदगी जीने को लाचार कर रखा है.

आज ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो शादी कर अपनी पत्नी को छोड़ के विदेशों में भाग गए हैं. हाल के ही एक ताजा समाचार के अनुसार ऐसी 15 हजार महिलाओं की शिकायतें मिली हैं जिन के पति उन्हें छोड़ कर विदेश भाग गए हैं. हम हिंदू औरतों पर हो रहे खुले अत्याचार को भाग्य की देन कैसे मान सकते हैं. यदि साथ नहीं रख सकते तो तलाक दे कर उन्हें सम्मान के साथ जीने का हक तो दें.

ये भी पढ़ें- बस 3 मिनट का सुख और फिर…

उफ… यह मम्मीपापा की लड़ाई

आजकल आमतौर पर घरों में कभी नौकरी को ले कर तो कभी पारिवारिक समस्याओं को ले कर कलहकलेश होता ही है. महानगरों में अकसर महिलाएं एवं पुरुष दोनों ही कामकाजी होते हैं. ऐसे में गृहस्थी की गाड़ी चलाना आसान नहीं बड़ा ही मुश्किल होता जा रहा है. आर्थिक स्थिति सुधरती है तो पारिवारिक समस्याएं आने लगती हैं. आर्थिक स्थिति ठीक नहीं तो भी गृहस्थी के खर्चों को ले कर समस्याएं हैं.

कभीकभार पतिपत्नी एकदूसरे से तंग आ कर तलाक लेने की स्थिति तक पहुंच जाते हैं. सिर्फ तलाक ही नहीं यदि पतिपत्नी एकदूसरे से ईमानदारी न रखें और ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर में पड़ जाएं तो घर में युवा बच्चों के मन पर बहुत नकारात्मक असर पड़ता है. लेकिन समस्या है कि ऐसे में आखिर बच्चे जाएं कहां? क्या करें या क्या न करें?

रिश्तेदारों के कारण तलाक देने के धमकी

बैंगलुरु में रहने वाले निखिल एक सौफ्टवेयर प्रोफैशनल हैं. उन की अपनी पत्नी से घर में अकसर तूतू, मैंमैं होती रहती है. पहले तो वे पूरा दिन औफिस रहते तो यह तकरार ज्यादा नजर नहीं आती थी. किंतु जब से कोरोना फैला और वर्क फ्रौम होम हुआ यह खिचखिच बढ़ गई. समस्या यह है कि जवान बेटा जो कालेज में पढ़ता है और होस्टल में रहता है वह अब घर से औनलाइन क्लासेज कर रहा है. बेटी भी कक्षा  8 में पड़ती है, जो सारा दिन घर में रहती है.

अब यह झगड़ा अकसर बच्चों के सामने होता है. इस में खास बात यह है कि झगड़े के मुद्दे कोई बड़े खास नहीं होते हैं. छोटेछोटे काम को ले कर बहस, स्वयं को अपने पार्टनर से सुपीरियर दिखाने की होड़ और पहले दूसरा चुप हो इसलिए उसे नीचा दिखाया जाता है.

जबजब झगड़ा होता निखिल पुरानी बातें निकाल लाता और अपनी पत्नी से कहता कि तुम ने मेरी मां से झगड़ा किया, मेरी बहन को घर में आने से रोका आदि. जब वे संयुक्त परिवार में थे बच्चे बहुत छोटे थे. सासननद आदि से उस की पत्नी का सामंजस्य नहीं बैठा था. इसलिए वे अकेले रहने लगे, सो ननद एवं सास ने उन के बच्चों व उस की पत्नी से किसी भी तरह का संबंध नहीं रखा.

ये भी पढ़ें- माता-पिता का डिवोर्स बच्चे पर कितना भारी, आइए जानें

बदला व्यवहार

करीब 5 वर्ष पहले ननद चाहती थी कि उस का बच्चा बैंगलुरु में पढ़ने आ रहा है तो वह निखिल के घर में ही रहे. उस की पत्नी ने इस से इनकार किया तो निखिल ने उसे तलाक देने के धमकी दी. तब से अब तक दोनों में अकसर तनातनी रहती है. उस ने मन ही मन सोच लिया कि यदि निखिल उसे इस तरह धमकाता है तो यह समझ लो कि तलाक हो ही गया. उस ने भी अपना व्यवहार बदल लिया है और दोनों के आपसी प्रेम में कमी आ गई है.

इसलिए अब झगड़े होने तो लाजिम हैं. अब तक यह बात बच्चों से छिपी थी, किंतु अब बच्चे घर हैं तो उन्हें समझ आया कि मातापिता बस जिंदगी ढो रहे हैं.

एक दिन युवा बेटे ने अपने पिता को नाराजगी दिखाई कि आप मां को तलाक देने की बात करते हैं यह भी नहीं सोचते कि छोटी बहन पर क्या असर पडे़गा? मैं तो बड़ा हो चुका हूं पर वह लोगों को क्या जवाब देगी? निश्चित रूप से उन का बेटा समझदार है जो इतनी गहरी बात कह गया.

कई बार वह स्वयं भी परेशान हो जाता है कि दोनों कैसे झगड़ा करते हैं.

एक दिन गुस्से में बोला कि आप दोनों ही बुरे हो. जब देखो झगड़ते हो और वह खाना खाते हुए बीच में ही उठ कर चला गया. इस घटना से यह तो समझ आता है कि उसे यह रोजरोज का झगड़ा पसंद नहीं.

आर्थिक तंगी में युवा बच्चों का कदम

जब से नौकरी गई, चेन्नई में रहने वाले श्रीनिवासन के घर में अकसर रुपयोंपैसों को ले कर झगड़ा होता रहता है. पहले अच्छी सोसायटी में रहते थे, बच्चे भी अच्छे स्कूल में थे. लेकिन नौकरी क्या गई, अपना घर किराए पर दे कर स्वयं कहीं दूर किराए पर रहने चले गए ताकि स्वयं के घर से अच्छा भाड़ा मिले और स्वयं कम भाड़ा दे कर कुछ रुपये बचा सकें. बच्चों का स्कूल भी बदल दिया ताकि कम फीस लगे. लेकिन मन मसोस कर जब परिवार को रहना पड़े तो घर में खटपट तो होनी ही थी.

घर में बैठे श्रीनिवासन अपनी पत्नी पर ही नजर रखते. यह क्यों कर रही हो? ऐसा क्यों नहीं किया? पत्नी भी कितना सहन करे? एक तो पैसे की तंगी, ऊपर से पति की टोकाटोकी. परेशान हो कर वह भी तूतड़ाक पर उतर आई. कभीकभार दोनों का झगड़ा इतना बढ़ जाता कि वह गुस्से में अपने बच्चों को पीट डालती.

युवा होते बच्चे बेचारे एक तरफ तो पैसों की मार सहन कर रहे थे. जहां इस उम्र में शौक पूरे किए जाते हैं, लड़कियां सजधज करती हैं वहीं श्रीनिवासन बातबात पर बच्चों को उन के खर्च के लिए ताने सुनाते. लेकिन उन के बच्चे बड़े समझदार निकले. दोनों भाईबहन ने मिल कर तय किया कि वे अपना खर्च स्वयं उठाएंगे और अपने मातापिता के झगड़ों को नजरअंदाज कर अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीएंगे बेटी तो आसपास के बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर अपने खर्च का इंतजाम करने लगी. बेटे ने एक स्टोर में पार्टटाइम नौकरी कर ली. इस से दोहरा फायदा हुआ. एक तो घर की खिचखिच से दूर रहे, दूसरा आत्मनिर्भर भी बने.

ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर

पति विवेक अकसर अपने काम के सिलसिले में विदेश यात्रा पर रहता और युवा होते 2 बच्चे लड़की 10वीं कक्षा एवं बेटा 12वीं कक्षा में था. विवेक की पत्नी के लिए समस्या थी टाइम पास की सो अपनी सहेलियों के साथ किट्टी एवं डिस्को पब्स में जाया करती. युवा होते बच्चों को तो विवेक निर्देश देता कि अपना मन पढ़ाई में लगाओ और मेरी अनुपस्थिति में अपनी मां की बात सुनो.

लेकिन एक दिन जब बेटा रात को देर तक पढ़ रहा था, तो सोसायटी में नीचे वाक के लिए उतर गया. देखा उस की मां किसी गैर पुरुष के साथ गाड़ी में आई और वह पुरुष उसे सोसायटी के बाहर ड्रौप कर अपने घर चला गया. लेकिन जब बेटे ने देखा कि मां ने उस पुरुष को बाय के साथ एक किस भी किया तो उसे अपनी नजरों पर भरोसा न हुआ. लेकिन चोरी कभी छिपती नहीं.

कुछ ही दिनों में सोसायटी में उस की मां के अफेयर की खबरें फैलने लगीं. एक घर से दूसरे बात फैलते हुए वापस उन के घर तक पहुंची. विवेक को जब पता चला तो घर में तहलका मच गया. अब यदि उस की पत्नी किसी भी पुरुष से बोलती तो वह उसे शक की नजर से देखता. अकसर घर में कलहक्लेश रहता. कई बार सोसायटी के लोगों की खुसरफुसर बच्चों के भी कानों में भी पड़ती, उन्हें ताने सुनने पड़ते. सुन कर उन्हें बुरा तो बहुत लगता, अपने मातापिता पर गुस्सा भी आता, लेकिन बेटे को अपने कैरियर की फिक्र थी, वह जानता था कि यदि पढ़ाई में मन न लगाया तो उस का रिजल्ट खराब होगा.

उस के मातापिता बारबार अपने दोनों बच्चों से एकदूसरे की बुराई भी करते तो एक दिन बेटे ने कह दिया कि हमें अपनी जिंदगी जीने दो, आप दोनों आपस में निबटो. बेटा पढ़ाई करता और अपने दोस्तों के साथ कभी फिल्म देखने जाता तो कभी पार्टी कर अपना पूरा ऐंटरटेनमैंट करता. बड़े भाई की देखादेखी छोटी बहन ने भी यही रास्ता अपना लिया.

ये भी पढ़ें- बौयफ्रैंड न बन जाए मुसीबत

स्वयं की जिम्मेदारी

शो बिजनैस में कार्यरत निहाल अपने क्लाइंट्स के साथ तो खूब अच्छा और ईमानदार व्यवहार रखते हैं, किंतु अपनी पत्नी के साथ वफादार नहीं. अकसर अपने बच्चों की उम्र की लड़कियों से घिरे रहने वाले निहाल अपनी पत्नी को पैर की जूती के समान समझते हैं. दोनों का लड़ाईझगड़ा इतना बढ़ गया कि अब तलाक की प्रक्रिया चालू है. जब उन के युवा बच्चों से पूछा गया कि वे किस के साथ रहना चाहेंगे तो दोनों का सहमति से एक ही जवाब था कि इन दोनों के साथ नहीं, हम कहीं भी अकेले रह लेंगे पर इन के झगड़े हमें बरदाश्त नहीं.

दरअसल, बच्चे उन्हें झगड़ते हुए देखते हुए ही बड़े हुए. न तो उन्हें अपने मातापिता से प्यार है और न ही शायद उन को. कितनी बार तो उन के झगड़ों के फलस्वरूप घर में खाना भी नहीं बनता था. कितने ही त्योहार कलहक्लेश में मने. जब गैस्ट घर पर आते तो दिखावा होता कि बहुत समृद्ध, सुशील परिवार है, लेकिन उन के जाते ही वही ढाक के तीन पात वरना बच्चों की खातिर भी कई बार परिवार में शांति रखी जाती है. लेकिन उन के मातापिता तो अपने अहम और जिद में अड़े रहे. बच्चों ने समय रहते इस कटु सत्य को समझ लिया और अपना फैसला सुना दिया.

इन सभी उदाहरणों में मातापिता के झगड़ों से बच्चे परेशान तो हुए, किंतु उन्होंने यह तय कर लिया कि वे उन के झगड़ों का असर अपने निजी जीवन पर नहीं पड़ने देंगे. उन दोनों का जैसा भी रिश्ता है वे आपस में निबटें और निभाएं. हम बच्चों को झगड़े के बीच न खींचें और हम स्वयं भी उन के झगड़ों से अपना मूड और जीवन खराब न करें.

ये बच्चे बड़े ही समझदार हैं. आखिर हमें जो जीवन मिला है वह हमारे लिए है. यदि मातापिता परिस्थितियों को देखते हुए आपस में सामंजस्य न बैठा पाएं तो यह उन की स्वयं की जिम्म्मेदारी है.

बहनों के बीच जब हो Competition

” वाह इस गुलाबी मिडी में तो अपनी अमिता शहजादी जैसी प्यारी लग रही है,” मम्मी से बात करते हुए पापा ने कहा तो नमिता उदास हो गई.

अपने हाथ में पकड़ी हुई उसी डिज़ाइन की पीली मिडी उस ने बिना पहने ही आलमारी में रख दी. वह जानती है कि उस के ऊपर कपड़े नहीं जंचते जब कि उस की बहन पर हर कपड़ा अच्छा लगता है. ऐसा नहीं है कि अपनी बड़ी बहन की तारीफ सुनना उसे बुरा लगता है. मगर बुरा इस बात का लगता है कि उस के पापा और मम्मी हमेशा अमिता की ही तारीफ करते हैं.

नमिता और अमिता दो बहनें थीं. बड़ी अमिता थी जो बहुत ही खूबसूरत थी और यही एक कारण था कि नमिता अक्सर हीनभावना का शिकार हो जाती थी. वह सांवलीसलोनी सी थी. मांबाप हमेशा बड़ी की तारीफ करते थे. खूबसूरत होने से उस के व्यक्तित्व में एक अलग आकर्षण नजर आता था. उस के अंदर आत्मविश्वास भी बढ़ गया था. बचपन से खूब बोलती थी. घर के काम भी फटाफट निबटाती. जब कि नमिता लोगों से बहुत कम बात करती थी.

मांबाप उन के बीच की प्रतिस्पर्धा को कम करने की बजाय अनजाने ही यह बोल कर बढ़ाते जाते थे कि अमिता बहुत खूबसूरत है. हर काम कितनी सफाई से करती है. जब की नमिता को कुछ नहीं आता. इस का असर यह हुआ कि धीरेधीरे अमिता के मन में भी घमंड आता गया और वह अपने आगे नमिता को हीन समझने लगी.

नतीजा यह हुआ कि नमिता ने अपनी दुनिया में रहना शुरू कर दिया. वह पढ़लिख कर बहुत ऊँचे ओहदे पर पहुंचना चाहती थी ताकि सब को दिखा दे कि वह अपनी बहन से कम नहीं. फिर एक दिन सच में ऐसा आया जब नमिता अपनी मेहनत के बल पर बहुत बड़ी अधिकारी बन गई और लोगों को अपने इशारों पर नचाने लगी.

यहां नमिता ने प्रतिस्पर्धा को सकरात्मक रूप दिया इसलिए सफल हुई. मगर कई बार ऐसा नहीं भी होता है कि इंसान का व्यक्तित्व उम्र भर के लिए कुंद हो जाता है. बचपन में खोया हुआ आत्मविश्वास वापस नहीं आ पाता और इस प्रतिस्पर्धा की भेंट चढ़ जाता है.

ये भी पढ़ें- जब बेवजह हो चिड़चिड़ाहट

अक्सर दो सगी बहनों के बीच भी आपसी प्रतिस्पर्धा की स्थिति पैदा हो जाती है. खासतौर पर ऐसा उन
परिस्थितियों में होता है जब माता पिता अपनी बेटियों का पालनपोषण करते समय उन से जानेअनजाने किसी प्रकार का भेदभाव कर बैठते हैं. इस के कई कारण हो सकते हैं;

किसी एक बेटी के प्रति उन का विशेष लगाव होना- कई दफा मांबाप के लिए वह बेटी ज्यादा प्यारी हो जाती जिस के जन्म के बाद घर में कुछ अच्छा होता है जैसे बेटे का जन्म, नौकरी में तरक्की होना या किसी परेशानी से छुटकारा मिलना. उन्हें लगता है कि बेटी के कारण ही अच्छे दिन आए हैं और वे स्वाभाविक रूप से उस बच्ची से ज्यादा स्नेह करने लगते हैं.

किसी एक बेटी के व्यक्तित्व से प्रभावित होना – हो सकता है कि एक बेटी ज्यादा गुणी हो, खूबसूरत हो, प्रतिभावान हो या उस का व्यक्तित्व अधिक प्रभावशाली हो. जब कि दूसरी बेटी रूपगुण में औसत हो और व्यक्तित्व भी साधारण हो. ऐसे में मांबाप गुणी और सुंदर बेटी की हर बात पर तारीफ करना शुरू कर देते हैं. इस से दूसरी बेटी के दिल को चोट लगती है. बचपन से ही वह एक हीनभावना के साथ बड़ी होती है. इस का असर उस के पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है.

बहनों के बीच यह प्रतिस्पर्धा अक्सर बचपन से ही पैदा हो जाती है. बचपन में कभी रंगरूप को ले कर, कभी मम्मी ज्यादा प्यार किसे करती है और कभी किस के कपड़े / खिलौने अच्छे है जैसी बातें प्रतियोगिता की वजह बनती हैं. बड़े होने पर ससुराल का अच्छा या बुरा होना, आर्थिक संपन्नता और जीवनसाथी कैसा है जैसी बातों पर भी जलन या प्रतिस्पर्धा पैदा हो जाती है. बहने जैसेजैसे बड़ी होती हैं वैसेवैसे प्रतिस्पर्धा का कारण बदलता जाता है. यदि दोनों एक ही घर में बहू बन कर जाए तो यह प्रतिस्पर्धा और भी ज्यादा देखने को मिल सकती है |

पेरेंट्स भेदभाव न करें

अनजाने में मातापिता द्वारा किए हुए भेदभाव के कारण बहनें आपस में प्रतिस्पर्धा करने लगती हैं. उन के स्वभाव में एकदूसरे के प्रति ईर्ष्या और द्वेष पनपने लगता है. यही द्वेष प्रतिस्पर्धा के रूप में सामने आता है और एक दूसरे से अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ती.

इस के विपरीत यदि सभी संतान के साथ समान व्यवहार किया गया हो और बचपन से ही उन के मन में बिठा दिया जाए कि कोई किसी से कम नहीं है तो उन के बीच ऐसी प्रतियोगिता पैदा नहीं होगी. यदि दोनों को ही शुरू से समान अवसर, समान मौके और समान प्यार दिया जाए तो वे प्रतिस्पर्धा करने के बजाए हमेशा खुद से ज्यादा अहमियत बहन की ख़ुशी को देंगी.

40 साल की कमला बताती हैं कि उन की 2 बेटी हैं. उन की उम्र क्रमश: 7 और 5 साल है. छोटीछोटी चीजों को ले कर अकसर वे आपस में झगड़ती हैं. उन्हें हमेशा यही शिकायत रहती है कि मम्मी मुझ से ज्यादा मेरी बहन को प्यार करती हैं.

दरअसल इस मामले में दोनों बेटियों के बीच मात्र दो साल का अंतर है. जाहिर है जब छोटी बेटी का जन्म हुआ होगा तो मां उस की देखभाल में व्यस्त हो गयी होंगी. इस से उस की बड़ी बहन को मां की ओर से वह प्यार और अटेंशन नहीं मिल पाया होगा जो उस के लिए बेहद जरूरी था. जब दो बच्चों के बीच उम्र का इतना कम फासला हो तो दोनों पर समान रूप से ध्यान दे पाना मुश्किल हो जाता है.

इस तरह लगातार के बच्चे होने पर बहुत जरूरी है कि उन दोनों के साथ बराबरी का व्यवहार किया जाए. नए शिशु की देखभाल से जुड़ी एक्टिविटीज में अपने बड़े बच्चे को विशेष रूप से शामिल करें. छोटे भाई या बहन के साथ ज्यादा वक्त बिताने से उस के मन में स्वाभाविक रूप से अपनत्व की भावना विकसित होगी. रोजाना अपने बड़े बच्चे को गोद में बिठा कर उस से प्यार भरी बातें करना न भूलें. इस से वह खुद को उपेक्षित महसूस नहीं करेगा.

प्रतिस्पर्धा को सकारात्मक रूप में लें

आपस में प्रतिस्पर्धा होना गलत नहीं है. कई बार इंसान की उन्नति / तरक्की या फिर कहिए तो उस के व्यक्तित्व का विकास प्रतिस्पर्धा की भावना के कारण ही होता है. यदि एक बहन पढ़ाई, खेलकूद, खाना बनाने या किसी और तरह से आगे है या ज्यादा चपल है तो दूसरी बहन कहीं न कहीं हीनभावना का शिकार होगी. उसे अपनी बहन से जलन होगा. बाद में कोशिश करने पर वह किसी और फील्ड में ही भले लेकिन आगे बढ़ कर जरूर दिखाती है. इस से उस की जिंदगी बेहतर बनती है. इसलिए प्रतिस्पर्धा को हमेशा सकारात्मक रूप में लेना चाहिए.

ये भी पढ़ें- धोखा खाने के बाद भी लोग धोखेबाज व्यक्ति के साथ क्यों रहते हैं?

रिश्ते पर न आए आंच

अगर दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा है तो यह महत्वपूर्ण है कि आप उसे टैकल कैसे करती हैं. आप का उस के प्रति रवैया कैसा है. प्रतिस्पर्धा को सकारात्मक रूप में लीजिए और इस के कारण अपने रिश्ते को कभी खराब न होने दीजिए. याद रखिए दो बहनों का रिश्ता बहुत खास होता है. आज के समय में वैसे भी ज्यादा भाईबहन नहीं होते है. यदि बहन से आप का रिश्ता खराब हो जाए तो आप के मन में जो खालीपन रह जाएगा वह कभी भर नहीं सकता. क्योंकि बहन की जगह कभी भी दोस्त या रिलेटिव नहीं ले सकते. बहन तो बहन होती है. इसलिए रिश्ते में पनपी इस प्रतिस्पर्धा को कभी भी इतना तूल न दें कि वह रिश्ते पर चोट करे.

यंगिस्तान: कही आप यूज तो नहीं हो रहे है!  

लॉक डाउन का समय चल रहा है , दिल दिमाग में नए -पुराने यादों के बीच महानता को ले कर संघर्ष चल रहा है. वही इस बदलते ज़माने के साथ रिश्ते नाते, दोस्ती और प्यार में आ रहे बदलाव का भी मूल्यांकन हो रहा है. इन सबके बीच कई बातें उभर कर सामने आ रही है. गिरती मानसिकता और बढ़ता स्वार्थ यंगिस्तान के एक बड़े समूह को मानसिक पतन को ओर अग्रसर कर रहा है. अपने पास खर्च के पैसे नही होते , लेकिन अगर उनके सबसे नजदीक साथी या उनका प्यार किसी चीज की मांग करे तो वह हर कीमत पर उसे पूरा करने में लग जाते है.

अपने मोबाईल में बैलेंस नहीं होता, लेकिन उनका रिचार्ज की उन्हें चिंता होती है. घरवालो को कभी फईनेसली मदद करे ना करे, लेकिन अपने खास दोस्त और प्यार के लिए पैसा जुटा कर उन्हें देना इनके लिए कोई बड़ा काम नही है . यंगिस्तान का एक बड़ा तबका भावनाओ में डूबा हुआ,आधुनिक रिश्ते नाते और प्यार में यह समझ ही नही पा रहा है ,कि कहा किसने उनका जम कर यूज किया. तो आइये 09 विन्दु के माध्यम से समझते है कही आप को कोई यूज तो नहीं कर रहा है.

1. किसी को आर्थिक रूप से दो या तीन बार सहायता करना बुरा नहीं है और वह भी ऐसा खास को जिसे आप पसंद करते हैं, जिसके साथ आपके मजबूत रोमांटिक संबंध हैं या जिसे आप अपने लिए सबसे खास सबसे अलग मानते है.लेकिन इस तरह की सहायता की भी सीमा होती है. अगर आप सीमा को नही समझ पा रहे है, और हर मांग को अपना खास मान कर पूरा करते जा रहे है, तो यह आपके लिए भारी पड़ सकता है.

ये भी पढ़ें- मैरिड लाइफ में हो सफल

2. सहायता किसी भी आर्थिक मदद के रूप में हो सकती है.अगर आपका साथी बार-बार और बहुत कम अंतराल में आपसे पैसों की डिमांड करता है और वह उन पैसों को वापस लौटाता भी नहीं है तो इसकी पूरी संभावना है कि वह पैसों के लिए आपको यूज कर रहा है. ऐसे में आप उसके मांग पर धीरे धीरे पैसे या सामान देना बंद कर दें, फिर देखें कि क्या वह तब भी आपके साथ है या नही ?

3. अगर आपका खास दोस्त या आपका प्यार आपसे हर बार मोबाईल बिल या रिचार्ज का बात कर आपका इमोशनल कर रही हो या कर रहा हो तो आप सावधान रहिए, हो सकता है आपका एक दो बार का मदद उसे आप पर निर्भर ना बना दे.

4. कभी कभी ऐसा भी होता है कि आप अपने उस खास के पार्टी में जाते है और जाने से पहले भी प्रेशर होता है एक महँगी गिफ्ट का ,तो उस समय आपका वह महंगा नही जरुरी लगता है लेकिन यही गिफ्ट  उसे आपके महंगे गिफ्टो कि आदत डालती है.इस तरह अगर आप इमोशन में डूबते उनके हर मांग को पूरा करते जायेगे तो आप एक साकेट दे रहे हाई कि आप खुद यूज होने के लिए तैयार है.

5. समाजशास्त्री डाँ प्रीति आरोड़ा का कहना है कि अधिकतर युवाओ कोइस बात का अहसास ही नहीं होता कि अपने फायदे और केवल टाइम पास के लिए उनका खास दोस्त, उनका पार्टनर या ब्वॉयफ्रैंड या गर्लफ्रैंड उनका यूज कर रहे होते है. सच्चाईतो यह है कि चाहे महिला हो या पुरुष, कोई भी किसी की स्वार्थपूर्ति के लिए यूज नहीं होना चाहता. लेकिन आज के युवाओ के बीच पनपी आधुनिक रिश्तो से एक दुसरे का समय पर उपयोग करने की प्रणाली बन गई है. यह अदृश्य प्रणाली हर साल ना जाने कितने युवाओ को सुनहरे रिश्ते और प्यार के बदले में धोका का जख्म दे रही है.

6. जब कोई केवल सेक्सुअल पर्पज के लिए किसी को यूज करता है तो उसमें पैसा, मौज-मस्ती और थोड़ी देर का साथ शामिल होता है. हालांकि यह बात आम है कि जब खुद के यूज होने की सच्चाई सामने आती है, तो लोग यूज करने वाले से किनारा काट लेते हैं, उससे विश्वास उठ जाता है.

ये  भी पढ़ें- औफिस की मुश्किल सिचुएशन

7. युवाओ को जन संचार की शिक्षा देने वाले संदीप दुबे का कहना है किअपनी आवश्यकताओं और स्वार्थ की पूर्ति के लिए साथी का मिसयूज करना कोई नई बात नहीं है. लेकिन आधुनिक दौर में यह बढ़ा है. जब यह सच्चाई जब सामने आती है तो बहुत दुख पहुंचाती है.

8. वही अपने खास प्यार के हाथो यूज होने के बाद इंजीनियरिंग छात्र सुनील कहते है कि पहले मैं इन बातो को नही मनाता था, लेकिन अब मनाता हूँ और किसी पर विश्वास करने से पहले दस दफा सोचता हूँ. जबकि 25 साल की सीमा का कहना है, कि यूज करने की बात तभी दमंग में आती है, जब हमारे रिश्तो में स्वार्थ  छिपा होता है और यूज होने के बाद किसी भी इंसान को जीवन का सबसे बड़ा दुःख होता है .

9. अगर आपको थोड़ा भी शक है कि आपको इस्तेमाल किया जा रहा है, तो आप जिस व्यक्ति के साथ रिलेशन में हैं, उसके साथ ज्यादा अलर्ट और ऑब्जव्रेट बने, साथ ही साथ उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां भी एकत्र करें. अगर आप फिर भी यूज होती हैं, तो जितनी जल्दी संभव हो, उस संबंध को तोड़ दें.

जब बेवजह हो चिड़चिड़ाहट

श्वेता को आजकल हर छोटीबड़ी बात मन पर लग जाती है. कोरोनाकाल में पूरा दिन घर में कैद रह कर उस का मन हर समय बु झाबु झा रहता था. अब कोरोनाकाल तो समाप्ति की तरफ है परंतु श्वेता के अंदर एक ऐसी मायूसी बैठ गई है कि अब  बातबात पर पति और बच्चों को  झिड़कना श्वेता की जिंदगी में आम हो गया है. परिणामस्वरूप पति और बच्चे श्वेता से कटेकटे रहते हैं.

मनीषा का किस्सा कुछ अलग है. नित नए पकवान, ब्यूटी ट्रीटमैंट और घर के कोनेकोने को चमकना सबकुछ मनीषा की दिनचर्या का हिस्सा था. परंतु जब शादी के 4 वर्ष बाद भी उसे कोई संतान नहीं हुई तो वह बेहद निराश हो गई. पासपड़ोस और रिश्तेदारों के बारबार तहकीकात करने पर मनीषा चिड़चिड़ी हो गई थी.

अब वह अपने पति और सासससुर की हर छोटी बात पर रिएक्ट कर देती है. उसे लगने लगा जैसे उस की जिंदगी से रौनक चली गई है. अब वह जिंदगी को बस ढो रही है.

गौरव की कंपनी में छंटनी शुरू हो गई है. वह पिछले 3 माह से एक अज्ञात भय में जी रहा है. हर समय घर के खर्चों पर टोकाटाकी करता रहता है. उस की पत्नी पूनम को अब सम झ ही नहीं आता कि वह गौरव के साथ कैसे डील करे. दोनों के बीच एक घुटन व्याप्त है जो कभी भी बम की तरह फूट सकती है.

नीति की समस्या कुछ अलग है. बेटी को जन्म देने के पश्चात पिछले 5 माह से नीति ने पार्लर का मुंह नहीं देखा है. अपने रूखेसूखे  झाड़ जैसे बाल, बढ़ी हुई आई ब्रोज और अपर लिप्स सबकुछ उसे चिड़चिड़ा रहा है.

नीति के अनुसार, ‘‘मैं खुद अपनी शक्ल आईने में देखने से डरती हूं, एक अजीब सी हीनभावना मन में घर कर गई है.’’

नीति को अपनी बेटी दुश्मन सी लगने  लगी थी.

ये भी पढ़ें- धोखा खाने के बाद भी लोग धोखेबाज व्यक्ति के साथ क्यों रहते हैं?

आजकल के समय में यह चिड़चिड़ापन, अकेलापन, अवसाद दिनप्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है. जिंदगी में कब क्या हादसा हो जाए, कोई नहीं जानता है. पर जिंदगी की खुशियों पर चिड़चिड़ाहट का ब्रेक न लगाएं. कुछ छोटेछोटे बदलाव कर के आप अपनेआप को स्थिर और शांत कर सकती हैं.

आदतों को स्वीकार करें:

चिड़चड़ाहट का मुख्य कारण होता है कि सामने वाला मेरे हिसाब से क्यों व्यवहार नहीं कर रहा है. परिवार के हर सदस्य को जैसा है वैसा ही स्वीकार करें. न खुद बदलें, न उन्हें बदलने को कहें.

आप उन्हें सलाह जरूर दे सकती हैं क्योंकि आप उन की शुभचिंतक हैं. उन्हें अगर ठीक लगेगा तो वे अवश्य उसे अपनाएंगे. अपनी मनोस्थिति को उन के व्यवहार के ऊपर निर्भर न होने दे.

खुद को समय दें:

जब तक आप खुद खुश नहीं रहेंगी तो दूसरों को कैसेखुश रखेंगी. इस के लिए खुद के साथ समय बिताएं. इस का मतलब यह नही है कि कमरा बंद कर के बैठ जाएं.

कोई भी ऐसा कार्य करें जो आप को स्फूर्ति और खुशी दे. आप अंदर से जितनी ऊर्जावान महसूस करेंगी उतना ही दूसरों के साथ आप के रिश्ते अच्छे बनेंगे.

प्लानिंग करें:

अधिकांश परिवारों में आर्थिक मंदी चिड़चिड़ापन बढ़ने का एक मुख्य कारण होता है. आर्थिक मंदी का अस्थायी दौर  होता है जो गुजर जाता है. यही वह समय है जब आप अपने पति या परिवार के सदस्यों को मानसिक एवं आत्मिक संबल दे सकती हैं.

हर माह के आरंभ में ही प्लानिंग करें और गैरजरूरी खर्चे जैसे बेवजह की औनलाइन शौपिंग, कपड़े, कौस्मैटिक्स आदि पर कटौती बड़े आराम से कर सकती हैं. जब यह प्लानिंग करें अपने परिवार के हर सदस्य को शामिल करें.

हर सदस्य को जब आर्थिक स्थिति का पता रहेगा तो कोई भी ताना या उलहाना नहीं देगा. यह परिवार में बेवजह का तनाव पनपने नहीं देगा.

सकारात्मक सोच रखें:

कैसी भी परिस्थिति हो, अगर आप नकारात्मक सोच रखेंगी तो चिड़चिड़ापन और अधिक बढ़ जाएगा. सकारात्मक सोच के साथ यदि परिस्थिति का सामना करेंगी तो बुरी से बुरी परिस्थिति का भी सामना बेहतर ढंग से कर पाएंगी. सकारात्मक सोच आप की सेहत के लिए भी एक रामबाण की तरह है.

ये भी पढे़ं- जरूरी है प्रीमैरिज काउंसलिंग

दिनचर्या को व्यवस्थित करें:

आजकल यह आम हो गया है कि लोग किसी भी समय सो रहे हैं और उठ रहे हैं. पहले बच्चों के स्कूल जाने के कारण बहुत हद तक सोनेउठने का समय व्यवस्थित था. अब समयसारिणी बिखर सी गई है.

याद रखें एक अव्यवस्थित दिनचर्या तनाव को बढ़ाने में सहायक होती है. घर पर रहने का मतलब यह नहीं कि आप किसी भी समय उठें या सोएं. ऐसा कर के अनजाने में आप बहुत सारी बीमारियों को भी न्योता दे रही हैं.

तुलना करना है व्यर्थ:

आप जहां भी हैं और जैसी भी हैं इस समय एकदम परफैक्ट हैं. जीवन के उतारचढ़ाव में आप को अपने से बेहतर भी और कमतर भी मिलेंगे. आप से कमतर लोग हो सकता है.

आप से बेहतर कर  रहे हों परंतु तुलना कर के चिड़चिड़ापन मत बढ़ाएं क्योंकि यह जीवन है और  इस का कोई फिक्स्ड फौर्मूला नहीं होता है. चिड़चिड़ापन आप के साथसाथ आप के रिश्तों पर भी बुरा प्रभाव डालेगा. ‘ये वक्त तो अपनों के सहारे कट जाएगा, संयम से आने वाला कल बेहतर हो पाएगा.’ –

रितु वर्मा

धोखा खाने के बाद भी लोग धोखेबाज व्यक्ति के साथ क्यों रहते हैं?

कई बार लोगों को पता होता है कि उनके पार्टनर ने उन्हें चीट किया है और वह फिर भी इस स्थिति से बाहर नहीं निकलते हैं. ऐसा माना जाता है कि अगर आप खुद को धोखा खा कर भी उसी जगह रखते हैं और आगे नहीं बढ़ते हैं तो आप खुद की कदर नहीं कर रहे हैं और खुद की कदर खुद ही घटा रहे हैं. लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता है. इसके अलावा भी बहुत से कारण होते हैं जिनकी वजह से लोग अपने धोखेबाज पार्टनर के साथ रह लेते हैं और इसका कारण यह नहीं होता कि वह खुद की वैल्यू नहीं समझते हैं. आज हम कुछ ऐसे ही लोगों के बारे में बात करेंगे जो धोखा खा कर भी धोखेबाज के साथ रहे हैं और जिन्होंने इसके पीछे का अपना अनुभव शेयर करते हुए बताया है कि ऐसी कौन कौन सी वजहें थी जिसकी वजह से उन्हें ऐसा करना पड़ा. आइए कुछ वजहों को जानते है.

परिवार उनके रिश्ते से अधिक आवश्यक होता है

एक 37 वर्षीय महिला अपना अनुभव बताती हुई कहती हैं कि उन्हें पता चल गया था कि उसके पति उन्हें धोखा दे रहे हैं लेकिन अलग होने से पहले उनके मन में उनकी बेटी के बारे में सवाल जागा कि अगर वह अलग हो गई तो उनकी बेटी का क्या होगा. उन्हें पिता का प्यार किस प्रकार मिलेगा. उनकी बेटी अब अपनी विकास होने वाली उम्र में थी और अगर अब वह अलग हो जाती हैं तो इससे उनकी बेटी के दिमाग पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता था और उनके लिए यह सब सह पाना आसान नहीं होता. इसलिए उन्हें अपने धोखेबाज पति के साथ ही रहना पड़ा.

ये भी पढ़ें- जरूरी है प्रीमैरिज काउंसलिंग

सामाजिक शर्मिंदगी का डर

कुछ महिलाएं इस स्थिति से बाहर इसलिए भी नहीं निकल पाती हैं क्योंकि उन्हें यह डर रहता है कि अगर वह अपने पति से अलग हो गई तो समाज उन्हें बहुत से ताने देगा. ऐसे में ही एक महिला कहती हैं कि अगर वह इस बात का खुलासा सब के आगे कर देंगी तो उनके आस पड़ोस की आंटी उस महिला को ही सारी स्थिति का जिम्मेवार ठहराएगी. उनके मुताबिक वह महिला ही होती है जो अपने पति की शारीरिक जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती जिस कारण वह दूसरी महिला के पास जाता है. यह भी महिलाओं के लिए एक सबसे बड़ी चुनौती होती है.

प्यार के लिए लड़ना

अगर हम किसी से प्रेम करते हैं और उन्हें किसी और व्यक्ति से प्रेम हो जाता है तो हम अपने रिश्ते को बचाने के लिए अंत तक कोशिश करते रहते हैं ताकि हम उनके प्यार को दोबारा पा सकें. ऐसा ही एक केस एक पुरुष के साथ भी हुआ. उनकी पत्नी उन्हें हर रोज बताती कि वह अपने सह कर्मी के साथ कैसा महसूस करती हैं और वह उसे कितना स्पेशल फील करवाता है. इसी बीच वह अपनी पत्नी का प्यार दुबारा पाने के लिए और अधिक प्रयास करने लग जाते हैं ताकि उन्हें उनका प्यार दोबारा से मिल सके.

इमोशनल जुड़ाव

जब दो लोग एक दूसरे से प्यार करते हैं और वह एक दूसरे का सहारा बन जाते हैं तो एक दूसरे से इस प्रकार जुड़ जाते हैं कि वह किसी और के साथ अपने पार्टनर को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. अगर वह अकेले रहने की भी सोचते हैं तो इस ख्याल से ही उनका दिल बहुत अधिक हर्ट होने लगता है. ऐसी ही एक महिला बताती हैं कि उनके पति ने किसी और को किस किया लेकिन वह चाह कर भी उन्हें नहीं छोड़ सकती क्योंकि जब उनके पिता की मृत्यु हुई तो उन्होंने उनका बहुत सपोर्ट किया था लेकिन तब से ही उनका रिश्ता खराब होने लगा था.

ये भी पढ़ें- महंगी डिमांड्स तो हो जाएं सतर्क

कुछ लोग लोगों के मजाक से डरते हुए भी एक दूसरे के साथ रहते हैं क्योंकि उन्होंने अपने पूरे फ्रेंड सर्कल को अपने रिश्ते के बारे में बताया होता है और ब्रेक अप के बाद उनके दोस्त कहीं उनका मजाक न उड़ाने लगे इसलिए वह ऐसा नहीं करते.

जरूरी है प्रीमैरिज काउंसलिंग

राघव एक दवा बनाने वाली कंपनी में काम करता है. जब उस का रिश्ता तय हुआ तो उसे लगा कि उस ने गलती से ‘हां’ कर दी है. बारबार उसे यह बात कचोटने लगी कि लड़की की शक्ल ठीक नहीं है. राघव का जीजा उस का घनिष्ठ मित्र था और उस पर उसे पूरा भरोसा भी था. जब वह लड़की देखने गया तो किसी कारण से जीजा आ नहीं सका था. सब के कहने पर उस ने हां कर दी पर अब वह तय नहीं कर पा रहा था.

राघव को जब एक काउंसलर के पास लाया गया तो उस ने अपने दिल की बात उस से की कि लड़की सुंदर नहीं है और वह अगर उस से शादी करेगा तो सारी जिंदगी उसे खुश नहीं रख पाएगा. आखिरकार रिश्ता तोड़ दिया गया और विवाह से पहले सलाह लेने से 2 जिंदगियां बरबाद होने से बच गईं.

पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी तलाक का ग्राफ निरंतर बढ़ता जा रहा है. इस की मुख्य वजह है नई पीढ़ी की अपनी एक सोच होना, जो उन्हें अपने ढंग से जीने के लिए उकसाती है. अपनी इच्छाओं को दबाती नहीं है बल्कि अपने हक की लड़ाई लड़ती है. इसलिए उम्मीदें पूरी न होने पर बात तलाक तक पहुंच जाती है.

तलाक की सब से बड़ी वजह है पतिपत्नी के बीच शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक असंगति होना. इस के नतीजतन देखा गया कि 90 प्रतिशत युगल अवसाद का शिकार हो जाते हैं.

असल में प्यार करना, रिश्तों में बंधना आसान है पर उन्हें निभाना मुश्किल है. विवाह से पहले क्या कोई बताता है कि किस तरह से भावनात्मक रूप से सुदृढ़ और शारीरिक रूप से संतुष्ट रिश्ता कायम किया जाए. शायद नहीं, क्योंकि अभी भी हमारे देश में मातापिता या भाईबहन खुल कर विवाह से जुडे़ मसलों पर बात नहीं करते हैं.

प्रीमैरिज काउंसलिंग का उद्देश्य होता है युवा पीढ़ी को विवाह के बंधन की पूरी जानकारी देना ताकि युवकयुवती एकदूसरे के प्रति सम्मान रखते हुए एक स्नेहपूर्ण व मर्यादित रिश्ता जी सकें. स्वस्थ यौन संबंधों की जानकारी वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने के लिए बहुत जरूरी है. अन्य विकासशील देशों की तरह भारत में यौन शिक्षा की जानकारी अभी भी स्कूलकालिज में नहीं दी जाती है इसलिए पतिपत्नी को एकदूसरे की जरूरतों को समझने और सही तरह से संबंध कायम करने के लिए प्रीमैरिज काउंसलिंग आवश्यक है.

ये भी पढे़ं- महंगी डिमांड्स तो हो जाएं सतर्क

 

अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. संदीप वोहरा का कहना है, ‘‘प्रीमैरिज काउंसलिंग की यह अवधारणा पूरी तरह से पश्चिमी है. भारत में करीब 5 साल पहले इसे मान्यता मिली है और अभी भी यह अपनी प्रारंभिक अवस्था में है. आज की पीढ़ी कैरियर पर ज्यादा ध्यान देती है और चाहती है कि उन के प्रोफेशन के सामने कोई अवरोध न आए. वे मानसिक रूप से सशक्त नहीं हैं इसलिए चाहे वह व्यक्तिगत संबंध हो या प्रोफेशनल, उन्हें समझने के लिए उन के पास न तो समय है न ही कोई दिशा. वे सब से पहले अपने होने वाले जीवनसाथी की शक्ल देखते हैं, आकर्षण को महत्त्वपूर्ण मानते हैं. हम उन्हें समझाते हैं कि यह गौण चीज है और जरूरी है हर स्तर पर संगति होना.’’

मनोवैज्ञानिक और काउंसलर हेमा गुप्ता का कहना है, ‘‘हमारे जीवन के 2 मुख्य पहलू काम और परिवार वाटर टाइट कंपार्टमेंट नहीं हैं, वे एकदूसरे से संबंधित हैं. विवाह से पहले इन दोनों विषयों पर स्पष्ट रूप से बात करना जरूरी है क्योंकि लड़के के लिए आज उस का काम जितना आवश्यक है उतना ही लड़की के लिए भी है. अगर इस स्तर पर वे सामंजस्य नहीं बिठा पाते हैं तो मतभेद होना स्वाभाविक ही है.

‘‘आज से 20-25 साल पहले तक मातापिता बच्चों से पूछते तक नहीं थे कि वे क्या चाहते हैं क्योंकि माना जाता था कि विवाह एक समझौते का नाम है पर अब विवाह का अर्थ है दोनों का समान रूप से विकास. विवाह 100 प्रतिशत सामंजस्य का नाम है पर उस का अर्थ है एकदूसरे को जैसे वे हैं उसी रूप में स्वीकारना. अकसर जब काउंसलिंग के लिए लड़कालड़की आते हैं तो एक ही सवाल उन्हें परेशान करता है कि उन्हें कैसे पता चले कि सामने वाला उन के लिए कैसा है? वे साथी के बारे में भी विस्तार से जानने को इच्छुक होते हैं.’’

आज जब लड़कालड़की दोनों ही अपनी स्वतंत्र सोच रखते हैं और आत्मनिर्भर रहते हुए आत्मसम्मान के साथ जीवन बिताना चाहते हैं, ऐसे में प्रीमैरिज काउंसलिंग बहुत ही प्रभावी जरिया है.

प्रीमैरिज काउंसलिंग के दौरान घरपरिवार, नौकरी, उत्तरदायित्व और समझौतों पर तो बात होती ही है, सेक्स संबंधी समस्याओं को ले कर भी लड़कालड़की में अनेक सवाल होते हैं. अपोलो अस्पताल की वरिष्ठ स्त्रीरोग विशेषज्ञ डा. गीता चड्ढा का कहना है, ‘‘अगर लड़की वर्जिन होती है तो उसे हम सेक्स की जानकारी देते हैं कि किस तरह पतिपत्नी को शारीरिक रिश्ता कायम करना चाहिए. विवाह के बाद भी ऐसे युगल आते हैं जो कहते हैं कि वे महीनों बीत जाने पर भी शारीरिक संबंध स्थापित नहीं कर पाए हैं.

जिन लड़कियों का हाइमन किसी वजह से फट गया है, उस मामले में हम लड़के को समझाते हैं कि ऐसा खेलकूद के दौरान हो जाता है और आवश्यक नहीं कि प्रथम सहवास के दौरान लड़की को रक्तस्राव हो. जो युगल विवाह होते ही संतान नहीं चाहते हैं उन्हें हम विभिन्न गर्भनिरोधकों की जानकारी देते हैं. विवाह से पहले ही लड़की को गर्भनिरोधक पिल्स देना शुरू कर देते हैं ताकि विवाह के बाद वह तनावग्रस्त न रहे.

‘‘कई लड़कियां जो 30 वर्ष से अधिक की होती हैं, वे चाहती हैं कि संतान जल्दी हो जाए तो हम जांच करते हैं कि वे स्वस्थ हैं कि नहीं और विवाह के तुरंत बाद गर्भवती होना ठीक रहेगा या नहीं.

ये भी पढे़ं- जानें क्या हैं हैप्पी मैरिड लाइफ के 5 टिप्स

विवाह से पूर्व यौनसंबंधों के बारे में स्वस्थ जानकारी होना नितांत आवश्यक है क्योंकि यह ऐसा संवेदनशील विषय है जिसे ले कर लड़कालड़की दोनों के मन में एक घबराहट रहती है.’’

वास्तविकता तो यह है कि बेशक प्रीमैरिज काउंसलिंग की अवधारणा पाश्चात्य सभ्यता की देन है पर हर समाज में इस की जरूरत है. खासकर भारत जैसे देश में जहां अभी भी विवाह को ले कर मांबाप और लड़केलड़कियों के मन में पूर्वाग्रह हैं. इस के द्वारा वह विवाह से पहले ही साथी की कमियों, खूबियों और उम्मीदों को समझ विवाह के बाद रिश्ते को बेहतर बना सकते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि वह जान जाते हैं कि उन्हें विवाह के बाद किस स्तर पर और कितना सामंजस्य करना होगा.

कमिटमेंट का मतलब गुलामी नहीं

‘‘शादी से पहले तो बड़े वादे किए थे कि तुम्हें पलकों पर बैठा कर रखूंगा, तुम्हें दुनिया भर की खुशियां दूंगा, तुम सिर्फ मेरी रानी बन कर रहोगी. कहां गए वे वादे? तुम्हें तो मेरी फीलिंग्स की कोई परवाह ही नहीं है. तुम आखिरी बार मुझे कब किस हिलस्टेशन घुमाने ले कर गए थे? अब तुम्हें मेरी कोई परवाह नहीं है. अब तुम मुझ से प्यार नहीं करते.’’

‘‘तुम तो जब देखो सिर्फ शिकायतें ही करती रहती हो, कोशिश करता तो हूं हर वादा पूरा करने की. तुम समझती क्यों नहीं? पहले हालात और थे अब कुछ और हैं. अब हमारी जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. हमें अपने भविष्य की प्लानिंग भी तो करनी है. तुम क्या चाहती हो नौकरी छोड़ कर तुम्हारे साथ घूमता रहूं? तुम भी तो कितनी बदल गई हो. तुम ने भी तो शादी के समय वादा किया था कि कभी कोई शिकायत नहीं करोगी. मेरे साथ हर हाल में खुश रहोगी. फिर आए दिन की ये शिकायतें क्यों? मैं तो तुम से कमिटमैंट कर के फंस गया. इस से अच्छा तो मैं शादी से पहले था. तुम तो हर समय मुझे अपने हिसाब से चलाना चाहती हो. हमारा रिश्ता बराबरी का है. हम लाइफपार्टनर हैं. मैं तुम्हारा कोई गुलाम नहीं हूं.’’

विवाह के 1-2 साल बाद हर पतिपत्नी के बीच कमिटमैंट का यह सीन आम देखने को मिलता है. दरअसल, विवाह के समय फेरों के वक्त वरवधू द्वारा लिए गए वचनों से ही कमिटमैंट की शुरुआत हो जाती है. अगर आप विवाह का शाब्दिक अर्थ जानेंगे तो पाएंगे कि इस का अर्थ है विशेष रूप से उत्तरदायित्व यानी जिम्मेदारियों का वहन करना. जबकि विवाह का बेसिक कौन्सैप्ट होता है एकदूसरे की योग्यताओं और भावनाओं को समझते हुए गाड़ी के 2 पहियों की तरह प्रगतिपथ पर अग्रसर होते जाना. एकदूसरे का पूरक होना. लेकिन कई बार विवाह के समय एकदूसरे से किए गए कमिटमैंट्स बाद में दोनों के बीच विवाद का कारण बन जाते हैं, जिस का परिणाम हत्या, आत्महत्या या फिर तलाक के रूप में निकलता है.

ये भी पढ़ें- बच्चों को झूठा बनाते हैं माता पिता

कमिटमैंट का अर्थ समर्पण नहीं

जब 2 लोग वैवाहिक बंधन में बंधते हैं, तो वे एकदूसरे से अनेक वादे करते हैं जैसे हम एकदूसरे को हर हाल में खुश रखेंगे, सारी जिम्मेदारियां मिलबांट कर निभाएंगे, एकदूसरे के साथ प्यार और विश्वास से रहेंगे, कभी एकदूसरे का विश्वास नहीं तोड़ेंगे आदिआदि. लेकिन जैसेजैसे वैवाहिक जीवन के साल गुजरने लगते हैं और जीवन वास्तविकता की पटरी पर चलने लगता है, सारे वादे हवा होने लगते हैं और दोनों एकदूसरे को टेकन फौर ग्रांटेड लेने लगते हैं. उन के साथ उन के अलावा अन्य रिश्ते जुड़ने लगते हैं और शुरू हो जाती हैं शिकायतें और एकदूसरे पर कमिटमैंट्स न पूरा करने के आरोप.

दरअसल, आज वैवाहिक रिश्तों का रूप बदल रहा है. आज इस रिश्ते में पर्सनल स्पेस, प्राइवेसी, सैल्फ रिसपैक्ट जैसे शब्द ऐंटर कर रहे हैं. अब इन शब्दों को आधार बना कर हर हाल में रिश्ता निभाना जरूरी नहीं रह गया. आज की वाइफ टिपिकल वाइफ नहीं रही. आज पतिपत्नी की जिम्मेदारियों की अदलाबदली हो रही है. जहां पत्नी ‘का’ बन कर घर की चारदीवारी लांघ कर आर्थिक जिम्मेदारियां संभाल रही है, वहीं पति भी ‘की’ बन कर घर की जिम्मेदारियां संभाल रहा है. आज वैवाहिक रिश्ते का कौन्सैप्ट पार्टनरशिप वाला यानी साझेदारी वाला हो गया है और दोनों में से कोईर् एक भी कमिटमैंट कर के समर्पण नहीं करना चाहता. आज की इन बदली परिस्थितियों में पार्टनरशिप यानी साझेदारी वाले इस रिश्ते में कमिटमैंट करना गलत नहीं है और हम यह भी नहीं कह रहे कि आप कमिटमैंट करने से बचें, लेकिन दोनों पार्टनर में से अगर कोई एक कमिटमैंट करता है, तो दूसरे को समझना होगा कि ऐसा कर के उस ने समर्पण नहीं किया है और न ही वह आप का गुलाम बन गया है.

क्यों ब्रेक होते हैं कमिटमैंट

शादी के समय चूंकि सब बहुत खुशनुमा होता है, सब कुछ अच्छा होता है, हालात फेवरेबल होते हैं, इसलिए पतिपत्नी एकदूसरे से ढेर सारे वादे कर लेते हैं, लेकिन उस समय वे यह नहीं जानते कि आने वाले समय में परिस्थितियां बदल सकती हैं. हो सकता है आज आप के पास एक बड़ी कंपनी में एक अच्छी नौकरी है, लेकिन आप नहीं जानते कल हो या न हो. आज आप का बिजनैस बहुत अच्छा चल रहा है, कल ऐसा चले या न चले. आज आप जौइंट फैमिली में हैं जहां आज भले ही आप को वैस्टर्न परिधान पहनने की आजादी न हो पर कल को हो सकता है आप की नौकरी विदेश में लग जाए जहां आप को सिर्फ वैस्टर्न परिधान ही पहनने को मिलें. दरअसल, परिस्थितियों के हिसाब से कमिटमैंट्स बदल जाते हैं. लेकिन परिस्थितियां बदल जाने से अगर आप अपने कमिटमैंट्स पूरे नहीं कर पाए, तो इस का अर्थ यह नहीं कि आप ने कमिटमैंट तोड़ दिया यानी आप ने गुनाह कर दिया और पार्टनर इस बात के लिए आप को दोषी ठहराए. इसलिए दोनों पार्टनर की इसी में भलाई है कि वे पुराने कमिटमैंट्स को भूल कर वर्तमान जिंदगी में जीएं.

रिश्ता बराबर की साझेदारी का

पति ने पत्नी से कमिटमैंट किया कि वह उसे हर साल कहीं घुमाने ले जाया करेगा. लेकिन 1 साल वह अपनी फाइनैंशियल प्रौब्लम के चलते ऐसा नहीं कर पाया, तो पत्नी को इसे कमिटमैंट तोड़ना नहीं समझना चाहिए वरन पति की स्थिति को समझ कर यह कहना चाहिए कि कोई नहीं जब हमारी आर्थिक स्थिति बेहतर होगी तब चले जाएंगे. विवाह प्रकृति की देन नहीं, मनुष्य की अपनी बनाई संस्था है, जो 2 लोगों को एकदूसरे का साथ, सुरक्षा और हमदर्द देती है. यह सुख का मामला है और सुख पाना है, तो पतिपत्नी को अपने कमिटमैंट्स खुद तय करने होंगे, दोनों को एकदूसरे का वजूद स्वीकारना होगा, क्योंकि मामला बराबरी का है. कमिटमैंट का अर्थ बंधन या अपनी आजादी खोना हरगिज नहीं है.

कमिटमैंट प्यार है पत्थर की लकीर नहीं

रिलेशनशिप ऐक्सपर्ट प्रांजलि मल्होत्रा का मानना है कि पतिपत्नी जब नएनए विवाह बंधन में बंधते हैं, तो उन के लिए एकदूसरे से कमिटमैंट करना आसान होता है, क्योंकि उस समय सारे हालात फेवरेबल होते हैं, लेकिन जैसेजैसे समय बीतता जाता है दोनों के लिए उन कमिटमैंट्स को निभाना मुश्किल होता चला जाता है और दोनों को लगता है कि वे वादे से मुकर रहे हैं या कहें दोनों एकदूसरे पर वादाखिलाफी का आरोप लगाने लगते हैं. परिणामस्वरूप रिश्तों में तूतू, मैंमैं यानी कड़वाहट बढ़ने लगती है. अगर पतिपत्नी के बीच विश्वास की बात की जाए तो भी समय के साथ दोनों के बीच विश्वास की जगह शक घर करने लगता है. पतिपत्नी दोनों में से कोई भी एक अगर किसी अपोजिट सैक्स से बात करता है, तो दूसरे को लगता है कि उस के पार्टनर ने अपना लौयल रहने का कमिटमैंट तोड़ दिया. जबकि वह चैटिंग या मीटिंग, प्रोफैशनल भी तो हो सकती है. मगर इस ओर दोनों का ध्यान नहीं जाता. पति अगर देर रात घर आए तो पत्नी को लगता है उस का किसी के साथ चक्कर है जबकि इस का कारण औफिस की जिम्मेदारियां भी तो हो सकती हैं. इसीलिए पतिपत्नी को विवाह के समय में एकदूसरे से कमिटमैंट करते समय यह भी कह देना चाहिए कि मैं जो भी वचन तुम्हें दे रहा हूं या दे रही हूं उसे निभाना उस समय के हालात पर डिपैंड करेगा. हां, समय के साथ भले ही मेरा कमिटमैंट, मेरी प्राथमिकताएं बदल जाएं पर मेरा तुम्हारे प्रति प्यार हमेशा बना रहेगा. हम मिल कर सारी जिम्मेदारियां निभाएंगे.

ये भी पढ़ें- 7 Tips: कहीं यह वजह इमोशनल Immaturity तो नहीं

प्रांजलि मल्होत्रा के अनुसार, पतिपत्नी के रिश्ते में जहां तक कमिटमैंट और सबमिटमैंट की बात है कई बार दोनों पार्टनर में से एक के नेचर में होता है सबमिसिव होना. उस के परिवार की परिस्थितियां, उस का पालनपोषण का तरीका जहां उसे हर बात के लिए दबाव डाला जाता रहा हो तो वह विवाह के बाद भी अपने उस स्वभाव को बदल नहीं पाता और अपने रिश्ते में लड़ाईझगड़े से बचने के लिए खुद का समर्पण करता चला जाता है, हर कमिटमैंट को पूरा करने की कोशिश में शोषित फ्रस्ट्रेटेड होता रहता है.

ऐसा नहीं कि कमिटमैंट में सिर्फ पत्नी को ही खुद को सबमिट करना पड़ता है. कई बार पति के स्वभाव में भी सबमिसिव नेचर होता है और वह हर बात को मानता चला जाता है, लेकिन कमिटमैंट का अर्थ यह कदापि नहीं कि आप ने कमिटमैंट कर के कोई डील साइन कर दी, जिसे हर हाल में फुलफिल करना होगा. कमिटमैंट पतिपत्नी के बीच आपसी प्यार है, खुशहाल जिंदगी के लिए कोई पत्थर की लकीर नहीं. कुछ लोग इसे समझौते का नाम देते हैं, जो सही नहीं है. ऐडजस्टमैंट सही शब्द है, जहां दोनों एकदूसरे की स्थिति को समझते हैं, समय के साथ खुद को बदल लेते हैं और एकदूसरे के वजूद का सम्मान करते हैं.

प्रांजलि मल्होत्रा का यह भी कहना है कि पतिपत्नी एकदूसरे से कमिटमैंट करने से डरें नहीं, क्योंकि यह किसी भी तरह से गलत नहीं है. लेकिन ध्यान रहे कमिटमैंट का अर्थ गुलामी बिलकुल नहीं है, क्योंकि यह रिश्ता बराबरी का है, साझेदारी का है.

बच्चों को झूठा बनाते हैं माता पिता

रश्मि इस बात को ले कर बहुत परेशान रहती है कि उस का 12 साल का बेटा गुंजन झूठ बोलने लग गया है. बातबात पर उसे झूठ बोलने की लत लग गई है. खेलने के चक्कर में वह कह देता है कि उस ने स्कूल का होमवर्क कर लिया है जबकि स्कूल से टीचर का फोन आता है कि गुंजन ने होमवर्क नहीं किया. जब उस से इस का कारण पूछा गया तो उस ने बताया कि रात को वह मम्मीपापा के साथ पार्टी में चला गया था, इसलिए होमवर्क करने का समय ही नहीं मिला. यह सुन कर रश्मि हैरान रह गई कि कल गुंजन ने उस से कहा था कि उस ने होमवर्क पूरा कर लिया है.

कुछ ऐसा ही हाल सौम्या का है. उस ने अपने 16 साल के बेटे रोहन को इंजीनियरिंग की कोचिंग क्लास में ऐडमिशन दिलाया. रोहन रोज नियत समय पर कोचिंग जाने के लिए घर से निकलता. एक दिन उस के पापा ने उसे दोस्तों के साथ चौराहे के एक ढाबे में बैठा देख लिया. रोहन के घर लौटने पर उस के पापा ने पूछा कि वह कहां गया था तो उस ने बेबाकी से कहा कि कोचिंग के लिए गया था. यह सुन उस के पापा और सौम्या का माथा ठनक गया. वे समझ चुके थे कि उन का बेटा पढ़ाई में मन नहीं लगा रहा, ऊपर से झूठ बोलने लगा है.

अधिकतर मातापिता की यह आम परेशानी है कि उन के बच्चे उन से झूठ बोलने लगे हैं. स्कूल से भी टीचर की शिकायतें आती हैं कि बच्चा होमवर्क नहीं करता है और डांट एवं पिटाई से बचने के लिए रोज नए बहाने बनाता है. ऐसी शिकायतों को ले कर खुद का सिरदर्द बढ़ाने वाले अभिभावक को दरअसल खुद की आंखें खोलने की जरूरत है. अगर अभिभावक से कहा जाए कि अपने बच्चों को झूठा बनाने या बिगाड़ने में उन का बड़ा हाथ है तो एकबारगी वे चौंक जाएंगे और उलटा सवाल दागेंगे कि क्या हम खुद अपने बच्चों को बिगाड़ेंगे? अरे भई, हर कोई अपने बच्चों को अच्छा आदमी बनाना चाहता है.

ये भी पढ़ें- 7 Tips: कहीं यह वजह इमोशनल Immaturity तो नहीं

कई अभिभावक तो अपने ऊपर लगे ऐसे आरोपों को सुन कर भड़क उठेंगे. पर अगर वे गंभीरता से सोचेंविचारें, तो बच्चों के बिगड़ने के ज्यादातर मामलों में वे खुद को ही जिम्मेदार पाएंगे. कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए. हमेशा सच बोलो. झूठ बोलने से जिंदगी बरबाद हो जाती है. अगर कोई गलती हो जाए तो सचसच बता देना चाहिए. मां, बाप और गुरु से कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए. यही सब हम अपने बच्चों को घुट्टी की तरह पिलाते रहते हैं और समझ बैठते हैं कि बच्चा ये बातें सीख कर सच्चा और अच्छा इंसान बनेगा. जब अभिभावकों को महसूस होता है कि उन का बच्चा वह नहीं सीख रहा है जो वे उसे सिखा रहे हैं, बल्कि वह तो दूसरा ही पाठ पढ़ चुका है. जब तक अभिभावकों को यह बात समझ में आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

बी एन कालेज के पिं्रसिपल पी के पोद्दार कहते हैं कि हर पेरैंट्स को यह बात समझने की जरूरत है कि उन के बच्चे वह नहीं सीखते जो वे उन्हें सिखाते हैं या सिखाने की कोशिशों में लगे रहते हैं. बच्चे वही सीखते हैं जो वह अपने मां, पिता और घर एवं आसपास के बड़ों को करते हुए देखते हैं. मम्मी, पापा, चाचा, दादा, नाना आदि के रंगढंग को देख कर ही बच्चे हर चीज सीखते हैं. बच्चे अपने से बड़ों के कथनी और करनी के अंतर को काफी जल्दी व गहराई से ताड़ लेते हैं.

बच्चों को यह देख कर हैरानी होती है कि पापा उसे तो झूठ नहीं बोलने को कहते हैं पर जब उन के औफिस से या किसी दोस्त का फोन आता है तो उस से ही कहलवा देते हैं कि पापा घर पर नहीं हैं या टौयलेट में हैं. पापा घर में बैठे रहते हैं और जब उन के बौस का फोन आता है तो कह देते हैं कि औफिस के काम से निकले हैं.

अपना व्यवहार ठीक रखें

मनोवैज्ञानिक बिंदु राय कहती हैं कि बड़ों को सिगरेट, तंबाकू, गुटखा, शराब आदि का सेवन करते देख बच्चों का मासूम दिल कचोट उठता है कि उन्हें जिन चीजों के लिए मना किया जाता है, वे काम उन के पापा, चाचा आदि खुद करते हैं. ऐसे में बच्चे चोरीछिपे उन चीजों का स्वाद लेने की पूरी कोशिश करते हैं. वे सोचते हैं कि जो चीज बड़ों के लिए ठीक है वह उन के लिए गलत क्यों और कैसे है. बच्चों के सामने खुद की कथनी और करनी को ठीक रखेंगे तो आप के बच्चे भी ठीक रहेंगे. अपने झूठ और फरेब के मकड़जाल में बच्चों को न उलझने दें. झूठे और किताबी पाठ पढ़ाने के बजाय पेरैंट्स बच्चों के सामने अपना व्यवहार ठीक रखेंगे तो निश्चित रूप से बच्चों पर उस का सकारात्मक असर पड़ेगा और तभी आप के बच्चे अच्छे इंसान बन कर आप का नाम रोशन कर सकेंगे.

ये भी पढ़ें- और वे जुदा हो गए

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें