Mother’s Day Special: सास-बहू की स्मार्ट जोड़ी

शादी हमें एक जोड़े में बांधती है – पति पत्नी की जोड़ी में. लेकिन एक और जोड़ी है जिसमें शादी के कारण हम बंधते हैं और वह है सास बहू की जोड़ी! एक समय था जब पर्दे पर भी सास का किरदार निभाने के लिए किसी निर्दई इमेज वाली एक्ट्रेस जैसे ललिता पवार या शशि कला को चुना जाता था. जिंदगी हो या पर्दा – सास बहू का रिश्ता कड़वाहट भरा होता था. लेकिन यह बीते जमाने की बात होने लगी है. आज के दौर में जहां बहुएं पढ़ी लिखी, नौकरी पेशा, फैशन परस्त और हर लिहाज से स्मार्ट होने लगी हैं वही सासें भी पीछे नहीं रही. आज की सास ने अपनी पुरानी छवि उतार फेंकी है क्योंकि वह अच्छे से जानती है कि बेटे के साथ आजीवन मधुर संबंध बनाए रखने के लिए बहू से अच्छे संबंध रखना बेहद जरूरी है.

स्मार्ट सास और बहू वही है जो एक दूसरे की अहमियत समझती है. बहू जानती है कि सास से अनबन के कारण उसकी गृहस्थी में कलेश घुलेगा और रोजमर्रा का जीवन चलाना कठिन होगा, वहीं सास समझती है कि बहू से बना कर रखा तो पूरे परिवार का सुख मिलता रहेगा और बुढ़ापा भी चैन से गुजरेगा. और फिर जब संबंध इतने निकट का हो तो क्यों ना आपसी मेलजोल और माधुर्य से अपने साथ सामने वाले के जीवन को भी सुखमय बना लिया जाए. कितना अच्छा हो कि बहू जब सास को ‘मम्मी ‘ पुकारे तो वह उसके हृदय से निकले; कि जब सास ‘बेटा ‘ कहे तो उसका तात्पर्य अपने बेटे से नहीं वरन बहू से हो! ऐसा जरूर हो सकता है पर अपने आप नहीं. इसके लिए चाहिए थोड़ी स्मार्टनेस जो दोनों पलड़ों में होनी आवश्यक है. समझदार हैं वे सास बहू जो इस अनमोल रिश्ते की कीमत और गरिमा को पहचानती हैं और देर होने से पहले सही कदम उठा लेते हैं.

एनी चेपमेन, अमेरिकी संगीतकार तथा लोकप्रिय वक्ता, जो स्वयं बहू रही और अब सास बन चुकी हैं, ने कई पुस्तके लिखी, जैसे – ‘ द मदर इन लॉ डांस ‘ , ‘ ओवरकमिंग नेगेटिव इमोशंस ‘ , ’10 वेज़ टू प्रिपेयर डॉटर फॉर लाइफ ‘ आदि. आज के समय में सास बहू के रिश्ते को सुनहरा बनाने के लिए कुछ नियम बताती हैं जो हैं कि न तो सास को बहू की तुलना अपनी बेटी से करनी चाहिए और ना ही बहू को सास की तुलना अपनी मां से करनी चाहिए. साथ ही एनी कहती हैं कि स्मार्ट वो सास और बहू हैं जो एक दूसरे के व्यक्तित्व को पहचान लें. यदि सास या बहु कुछ हठीले स्वभाव की है तो दोनों को चाहिए वे परस्पर नम्रता बनाए रखें लेकिन साथ ही थोड़ी दूरी भी रखें.

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जैसे बहू नई वैसे सास भी

जैसे बहु नई नवेली होती है ठीक वैसे ही सास के लिए भी यह पहला अनुभव होता है. उसे भी नए रिश्ते में ढलना वैसे ही सीखना होता है जैसे बहू सीखती है. इसलिए दोनों को पर्याप्त समयावधि मिलनी चाहिए. हथेली पर सरसों नहीं उगती. इस रिश्ते को सुदृढ़ बनाने के लिए समय और स्पेस की जरूरत होती है. स्मार्ट वो सास बहू हैं जो इस बात को समझते हुए एक दूसरे को पूरा समय और स्पेस दें.

जब वरिष्ठ लेखिका सुधा जुगरान की इकलौती बहू आई तब उन्होंने इस बात को सहर्ष स्वीकारा कि अब उनके बेटे के जीवन और उनके घर में एक अन्य स्त्री का प्रवेश हो रहा है. आम सासु मां की तरह इन्होंने कभी अपनी बहू चारू को खाने, पहनने व सोने को लेकर कोई निर्देश नहीं दिए क्योंकि इनका मानना है कि यह तीनों चीजें किसी भी इंसान की नैसर्गिक जरूरत है और इच्छाएं हैं. इन बातों पर बंधन किसी भी लड़की के जीवन का संतुलन तो डगमगाता ही है अपितु सास बहू के रिश्ते में भी कड़वाहट ला देता है. बेटे के विवाह के बाद सुधा जी ने समझ लिया कि अब उनके लिए केवल उनकी बहू ही हर तरह से महत्वपूर्ण है – उसी की तारीफ, उसी की पसंद, उसी के क्रियाकलाप. उन्होंने सास बहू के रिश्ते को मीठा बनाने का फार्मूला जान लिया था – बेटा तो अपना है ही, सींचना तो उस पौधे को पड़ता है जिसे नया-नया रोपा गया है. शुरू के सालों में इनकी इन्हीं कोशिशों का परिणाम है कि शादी के 6 साल बाद भी दोनों के बीच छोटी-मोटी गलतफहमियां तक सिर नहीं उठा पातीं. वहीं चारु ने भी खुद को बिल्कुल सहजता से नए वातावरण में ढाल लिया. आज वह अपनी सासू मां के साथ शॉपिंग जाती है, दोनों एक जैसी पोशाकें पहनती हैं, गप्पें लगाती हैं ताकि प्यार में यह रिश्ता मां बेटी जैसा, समझदारी में सहेलियों जैसा, और मान सम्मान में सास बहू जैसा बन पाए. सुधा जी के शब्दों में, ” मेरा मानना है विचार बदलो और नजर बदलो, नजारे अपने आप बदल जाएंगे.”

शब्दों का खेल

याद रखिए, सास और बहू अलग परिवेशों से आती हैं, दोनों वयस्क हैं, आज तक की अपनी जिंदगी निश्चित ढंग से जीती आई हैं. शब्दों रिश्तों को पत्थर सा मजबूत भी बना सकते हैं और कांच सा तोड़ भी सकते हैं. सोच समझकर शब्दों का प्रयोग करें. जो भी बोलें, नाप तोल कर बोलें.कोशिश करें कि पहले आप दूसरे की भावनाएं समझें और बाद में मुंह खोले. याद रखें शब्द बाण एक बार कमान से निकल गए तो उनकी वापसी असंभव है, साथ ही, उनके द्वारा दिए घाव भरना भी बहुत मुश्किल. यदि चुप्पी से काम चल सके तो चुप रहे.

बने स्मार्ट बहू

जब बहू अपना घर परिवार, माता पिता, भाई बहन सब कुछ छोड़कर ससुराल आती है तब सास ही उसे प्यार और अपनेपन से दुलार कर ससुराल में मां की कमी महसूस नहीं होने देती. साथ ही बहु को उसके पति (अपने बेटे) के स्वभाव, आदतों, अच्छाइयों, बुराइयों तथा पसंद-नापसंद से परिचित करवाती है. साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों की आवश्यकताओं के बारे में भी समझाती है. नए घर के रीति-रिवाज, परंपराएं एवं रस्में भी बहू सास से ही सीखती है. तो बहू को चाहिए कि अपनी स्मार्टनेस से इस महत्वपूर्ण रिश्ते को मधुर बनाए.

– बहुओं को चाहिए कि वह सास को बुजुर्ग होने के साथ अनुभवी भी माने. अपनी सास से उनके जमाने के मजेदार किस्से सुने – बचपन के, शादी के बाद के, बच्चों को पालते समय संबंधित अनुभव आदि. जब एक सास अपनी बीती हुई जिंदगी के अनुभव अपनी नई बहू से बांटेगी तो उसके मन में बहू के प्रति लगाव बढ़ना स्वाभाविक है जिससे उन दोनों का रिश्ता और सुदृढ़ हो जाएगा.

– बहू अपनी सास से सुझाव लेने में हिचकिचाए नहीं. हो सकता है कि आप अपनी सास के हर सुझाव से इत्तफाक ना रखती हो, फिर भी उनके अनुभव को देखते हुए उनसे सुझाव लेने में कोई हर्ज नहीं है. लेकिन कभी भी उनके दिए सुझावों को व्यक्तिगत लेते हुए उन पर बहस ना करें. सुझाव मानना आपकी इच्छा पर निर्भर करता है, पसंद आए तो माने वरना सास को अपनी सोच से अवगत करा दें.

– रिश्तो में स्पेस देना भी बहुत जरूरी है. आपका पति जो अब तक केवल एक बेटा था और जो अभी तक मां के अनुसार ही चल रहा था, शादी के बाद उसके व्यवहार में परिवर्तन आना स्वाभाविक है. इससे कभी-कभी मां के मन में असुरक्षा की भावना आने लगती है और यह चिढ़ बात- बेबात टोकाटाकी या तानों के रूप में बाहर आती है. यहां एक स्मार्ट बहू का कर्तव्य है कि वह मां बेटे के बीच दरार की वजह ना बने और मां बेटे की आपसी बातचीत का बुरा ना माने, साथ ही हस्तक्षेप ना करे.

नए घर की जिम्मेदारियों को और परिवार के रखरखाव के विषय में जितना बेहतर सास समझा सकती है उतना कोई भी नहीं. नए परिवार में बैलेंस बनाने के लिए सास से अपना रिश्ता एक दूसरे को सुविधा देने की भावना का बनाने की कोशिश कीजिए.

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बने स्मार्ट सास

स्मार्ट सास वह है जो यह बात समझ जाए कि अब नई बहू भी उसके परिवार का हिस्सा बन चुकी है. घर का माहौल सरल रखें ताकि यदि बहू कुछ कहना चाहे तो बेझिझक अपनी बात रख सके. सभी की अपनी कुछ आदतें होती है जिसे हम हमेशा फॉलो करना चाहते हैं. आखिर बहू 25 – 26 वर्ष की आयु में घर में प्रवेश करती है. अगर उसकी कुछ ऐसी आदतें हैं जो सास को पसंद नहीं आ रही तब भी जबरन दबाव डालकर न रोकें. उसे अपनी खास इच्छा या शौक पूरे करने दें तभी वह सब को अपना समझ पाएगी.

– सास होशियारी से बहू की छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करके उसे बेटी की तरह प्यार दुलार दे ताकि उसे मां की कमी महसूस ना हो. तब आपका घर, घर नहीं स्वर्ग बन जाएगा.

– बहू को खुले दिल से अपने परिवार का हिस्सा बनाएं. सास बहू के संबंधों का प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है. यदि सास बहू के बीच संबंध मधुर होते हैं तो घर में व्यर्थ का तनाव नहीं पनपता तथा घर के सभी सदस्य प्रसन्नचित्त रहते हैं.

– सास को चाहिए कि जिस लाड प्यार पर अब तक केवल उसके बेटे का अधिकार था, अब वही प्यार वह बहू बेटे को साथ में बांटे.

टोने-टोटके की दुनिया

सास बहू की नोक झोंक एक ऐसा विषय है जो सदियों से चला आ रहा है. अमूमन हर घर में कभी ना कभी कोई समस्या उभर ही आती है. इसलिए इस विषय पर भी पंडित और धार्मिक दुकानदार अपनी रोटी खूब चालाकी से सेंकने के भरपूर प्रयास करते रहते हैं.

– राजस्थान के वैदिक अनुष्ठान संस्थान के आचार्य अजय द्विवेदी कहते हैं कि मंत्र “ॐ क्रां क्रीं क्रों” का 108 बार जाप करें. सास अपने बेडरूम में मोर पंख रखें जो कि प्रेम और वात्सल्य का प्रतीक होता है. साथ ही बहू पूर्णिमा का व्रत करें. सास और बहू दिन के दोनों पहरों में अपने इष्टदेव का ध्यान करें, उन्हें नैवेद्य अर्पण करें ताकि सास बहू में नकारात्मकता समाप्त हो.

– वेबदुनिया नामक ऑनलाइन चैनल बताता है कि सास व बहू में आपसी संबंध कटु होने पर बहू चांदी का चौकोर टुकड़ा अपने पास रखें. साथ ही शुक्ल पक्ष के प्रथम बृहस्पतिवार से हल्दी या केसर की बिंदी माथे पर लगाना शुरू करें. गले में चांदी की चेन धारण करें. और सबसे महत्वपूर्ण बात – किसी से भी कोई सफेद वस्तु ना लें.

– इसी का ठीक उलटा उपाय एस्ट्रो मां त्रिशला बताती हैं कि हर सोमवार को बहू अपनी सास को कोई सफेद चीज खिलाए. साथ ही कुछ सरल उपाय जैसे सास बहू दोनों की फोटो फ्रेम करवाकर उत्तर में लगाएं. और सास हर महीने आने वाली दोनों चौथ पर बहू को सिंदूर का टीका करते हुए “ॐ गंग गणपतए नमः” का जाप करें. बहू को थोड़ा सा गुण और एक मुट्ठी गेहूं किसी चौराहे पर रखते हुए प्रार्थना करनी है कि हे प्रभु हमारे रिश्ते को मां बेटी सा बना दीजिए.

– डॉ आर बी धवन गुरु जी कहते हैं कि 5.5 रत्ती का चंद्रकांत मणि पत्थर लेकर चांदी में बनवाकर बहू को छोटी उंगली में और सास बीच वाली उंगली में सोमवार के दिन धारण करने से गृह क्लेश दूर होगा.

– यूट्यूब पर ‘आपके सितारे’ नाम से अपना चैनल चला रहे वैभव नाथ शर्मा के अनुसार सास बहू के क्लेश को दूर करने के लिए गाय के गोबर का दीपक बनाकर सुखा लें. फिर उसमें तिल का तेल और एक डली गुड़ डालकर दीपक जलाएं जो रात को घर के मुख्य द्वार के मध्य में रखें. मंगलवार की रात को यह करने से सास बहू की दुर्भावना दूर होगी.

ऊपर दिए टोटके तो सिर्फ ट्रेलर है; पिक्चर अभी बाकी है! टोने टोटकों की भरमार इसलिए है क्योंकि लोग अपनी समझदारी पर विश्वास करने की जगह इन अंधविश्वासों की दुनिया में डूबना पसंद करते हैं. पर आप ऐसा कतई न करें. बातों के चक्कर में ना आए, ना ही किसी ढोंगी बाबा – मां ही बातों में फंस कर अपना जीवन दूभर करें. समझदारी से काम लें. अपने आसपास की सास बहू की जोड़ियों को देखें और उनसे सीखने का प्रयास करें.

रीयल लाइफ उदाहरण

दिल्ली की मालती अरोड़ा के पति की मृत्यु बहुत कम उम्र में हो गई थी. उन्होंने नौकरी की, अपने बच्चे पाले. फिर उनकी बहू आ गई जोकि आज के जमाने की थी. उसने इच्छा जताई कि उसकी सास भी उसके साथ मॉल जाएं, शॉपिंग करें और आज के परिधान जैसे जींस और स्कर्ट पहने. मालती जी ने पहले कभी यह सब नहीं किया था. उनका जीवन तो बस जिम्मेदारियों की भेंट चढ़ा रहा था. लेकिन उन्होंने अपनी बहू का पूरा साथ दिया. उन्होंने अपने संकोच को दरकिनार कर जींस और लॉन्ग स्कर्ट पहनना शुरू कर दिया. बहू के दिल में जगह बनाने का यह स्वर्णिम अवसर उन्होंने दोनों हाथ से लपका. आज सब इस सास बहू की जोड़ी को देखकर हैरान हो जाते हैं. मालती जी की समझदारी ने उनके घर को एक मजबूत धागे से बांधे रखा है.

ग्वालियर की गौरी सक्सेना को हर दोपहर में थोड़ा सुस्ताने की आदत थी. जब उनकी बहू आई तो उसने दोपहर में दोनों के पतियों के ऑफिस चले जाने के बाद कभी शॉपिंग तो कभी मूवी का प्रोग्राम बनाना शुरू किया. गौरी ने अपनी आदत को टालते हुए उसका साथ दिया. जैसा प्रोग्राम बनता, वह वैसे ही चल पड़ते. एक बार जब गौरी की बहन मिलने आई और उन्होंने बताया कि तुम्हारी सास बिना दोपहर में सुस्ताए रह नहीं पातीं तब बहू के मन में सास के प्रति आदर भाव और बढ़ गया.

जयपुर की संध्या की जब शादी हुई तब वो एक संयुक्त परिवार का हिस्सा बनी. ऐसे में सबका दिल जीतने के लिए उसने अपनी सास का दामन थामा. जैसाजैसा सास बतातीं, वो वैसा ही करती. धीरे-धीरे पूरा परिवार संध्या का मुरीद हो गया. यहां तक कि शाकाहारी होते हुए भी संध्या ने अपने नए परिवार के स्वादानुसार चिकन भी पकाना सीखा. संसार त्यागने तक उसकी सास केवल उसी के पास रहना पसंद करती रहीं.

कुछ ऐसे टिप्स भी होते हैं जो सास बहू के रिश्ते को और भी मजबूत और प्यारा बना सकते हैं बशर्ते इन्हें सास और बहू साथ में फॉलो करें –

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शेयर करें अपने दिल की बातें: शादी के बाद जहां बहू को नए घर में रहने के रीति रिवाज और रंग ढंग सीखने होते हैं वही सास के मन में भी यह दुविधा होती है कि क्या बहू उनके परिवार के अनुसार खुद को ढाल पाएगी. ऐसे में बेहतर ऑप्शन है कि आप एक दूसरे के साथ अपने मन की बात शेयर करें. इससे आप दोनों को एक दूसरे के विचारों का पता चलेगा और रिश्ता निभाने में आसानी होगी.

अपने विचार एक दूसरे पर न थोपे : यह बात केवल न केवल सास बल्कि बहू को भी समझनी चाहिए कि हर किसी की सोच और विचार अलग होते हैं. अपने विचार दूसरों पर थोपने से उन्हें गुस्सा आना वाजिब है. अगर आप अपने सास बहू के रिश्ते में मिठास रखना चाहते हैं तो एक दूसरे के विचारों का आदर करें. इससे आप दोनों के बीच प्यार बढ़ेगा और रिश्ता मजबूत होगा.

एक दूसरे को दे भरपूर समय : अपनी नई शादी की खुमारी में बहू केवल अपने पति या फिर मायके वालों को ही टाइम दे, यह उचित नहीं. वहीं सास भी अपनी बहू के साथ बैठकर कुछ बातें शेयर करें. एक दूसरे के साथ टाइम स्पेंड करने से न केवल आपको एक दूसरे को समझने का मौका मिलेगा बल्कि प्यार भी बढ़ेगा.

व्यवसाय के क्षेत्र में भी साथ सास बहू

रुचि झा एक इन्वेस्टमेंट बैंकर थीं. एक बार छुट्टियों के दौरान वह अपने गांव पहुंची. रुचि बताती है “उस समय मिथिला पेंटिंग से जुड़े कुछ राज्य और राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों से मिलने का संयोग बना. उन पेंटिंग्स को देखकर मुझे महसूस हुआ कि मैं इस कला को दुनिया के कोने कोने तक पहुंचाना चाहती हूं.” रुचि ने कॉर्पोरेट दुनिया से विदा लेने की सोची तो खुद का काम शुरू करने के लिए उन्हें किसी साथी की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि इस काम के लिए उनकी सास रेणुका कुमारी आदर्श साझेदार थीं. दोनों ने मिलकर ‘आइमिथिला हैंडीक्राफ्ट और हैंडलूम प्राइवेट लिमिटेड’ की शुरुआत की तथा अपने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ‘आईमिथिला ‘ से उद्यमिता के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई. साथ ही स्थानीय कलाकारों को भी अपना हुनर दिखाने के लिए एक प्लेटफार्म दिया.

रुचि नोएडा और दिल्ली से मार्केटिंग का काम संभालती हैं जबकि उनकी सास, जोकि वनस्पति विज्ञान प्रोफेसर के रूप में काम कर चुकी हैं, दरभंगा जो मधुबनी आर्ट के लिए मशहूर है, से प्रोडक्शन यूनिट में कलाकारों के साथ समन्वय स्थापित करती हैं. इस सास बहू की जोड़ी ने सुपर स्टार्टअप का अवार्ड भी जीता है.

सास बहू का रिश्ता जितना प्यारा होता है उतना ही नाजुक भी. पूरे परिवार के प्यार और सामंजस्य की धुरी इसी रिश्ते पर टिकी होती है. थोड़ी सी समझदारी से इस रिश्ते को मीठा और मजबूत बनाया जा सकता है. आवश्यकता है तो बस सास और बहू दोनों को इस रिश्ते को निभाने में स्मार्टनेस अपनाने की.

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और भी गम हैं जमाने में…

आन्या 22 वर्षीय खूबसूरत होनहार और स्वतंत्र विचारों वाली युवती है. बचपन से ले कर आज तक अपने सारे फैसले खुद करती आई है. फिर वह हुआ जो आमतौर पर आजकल के युवकयुवतियों के साथ होता है यानी मुहब्बत. स्वतंत्र आन्या मुहब्बत की बेडि़यों में ही अपनी पहचान ढूंढ़ने लगी थी. अपने बौयफ्रैंड के साथ आन्या ने सतरंगी जीवन के सपने बुनने आरंभ कर दिए थे. अपने शौक, कपड़े पहनने का तरीका सबकुछ उस ने मुहब्बत के फेर में पड़ कर बदल लिया. और फिर टूटे दिल के साथ डिप्रैशन में चली गई.

दीया बचपन से बड़े होने तक एक ही सपना देखती आई कि उस की जिंदगी में एक राजकुमार आएगा. पासपड़ोस, रिश्तेदारों में सब की लव स्टोरी थी. ऐसे में दीया को लगने लगा कि उस की जिंदगी बिना साथी के बेमानी है और फिर इसी विचारधारा के कारण वह जल्द ही एक लंपट किस्म के लड़के के चंगुल में फंस गई.

आखिर ऐसा क्यों है कि हर लड़की चाहे वह शहर की हो या कसबे की या फिर महानगर की अपनी पूर्णता एक साथी के साथ ही ढूंढ़ती है? इस के पीछे छिपी है वही पुरानी सोच कि लड़की की जिम्मेदारी तब तक पूरी नहीं होती है जब तक उस का घर नहीं बसता है.

कसबों में तो आज भी बहुत सारी लड़कियां पढ़ाई ही विवाह करने के लिए करती हैं. वहीं महानगरों में नौकरी करना एक बेहतर जीवनसाथी और शादी के लिए जरूरी हो गया है.

यानी लड़कियों की जीवनयात्रा में पुरुष नामक जीव का बहुत महत्त्व है. उन के अधिकतर कार्यकलाप पुरुष मित्रों, प्रेमी या पति के इर्दगिर्द ही घूमते हैं और जैसे ही पुरुष नामक धुरी उन की जिंदगी से अलग हो जाती, उन का अस्तित्व गौण हो जाता है.

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एक नाकामयाब मुहब्बत के कारण ये लड़कियां अपनी जिंदगी तक खत्म कर लेती हैं और इस के पीछे छिपी है वही रूढि़वादी सोच कि अकेली औरत कैसे रह पाएगी. एक अकेली औरत के साथ बेचारी शब्द क्यों जुड़ जाता है? क्यों हम अपनी बेटियों के मन में यह बात बैठा देते हैं कि उन का औरत होना तभी सार्थक है जब उन की जिंदगी में कोई आदमी हो?

अगर थोड़ा गहराई से सोचें तो लड़कियां ही हैं जो विवाह के बाद अपनेआप को नख से शिख तक बदल लेती हैं, क्योंकि उन्हें बचपन से यही सिखाया जाता है कि प्यार का मतलब है बलिदान, चाहे इस में वह खुद का अपमान भी कर रही हो.

ऐसे में हम क्यों न अपनी बेटियों को यह बात सिखाएं कि प्यार जिंदगी का बस एक और रंग है परंतु प्यार जिंदगी नहीं है. किसी के होने या न होने से वे खुद को नकारना बंद करे. किसी का साथ होना अच्छा है, परंतु बिना साथ भी वे जिंदगी अच्छी तरह गुजार सकती हैं. किसी के साथ की चाह में अपनी खूबसूरत जिंदगी को बेवजह जाया न करें.

अगर आप की बेटी, भानजी, भतीजी, छोटी या बड़ी बहन या कोई सहेली इस मुहब्बत के गम से गुजर रही हो तो आप इन छोटेछोटे टिप्स से उस की मदद कर सकती हैं:

एकला चलो रे:

आप का जीवन एक यात्रा है और हर शख्स के साथ आप को एक पड़ाव तय करना होता है. जरूरी नहीं है कि आप का साथी आप के साथ जिंदगी के हर पड़ाव पर साथ चले. कुछ लोग आप की जिंदगी में कुछ सिखाने ही आते हैं. जरूरी है कि आप उन लोगों से जो सीख सकते हैं, सीखें और फिर अपनी यात्रा  जारी रखें.

याद रखिए कि यह जीवन आप की अपनी यात्रा है और अब यह आप को ही तय करना है कि आप को इस यात्रा को रोते हुए पूरा करना है या फिर हर अच्छेबुरे अनुभवों से गुजरते हुए अपनी खुशियों की जिम्मेदारी खुद लेते हुए अपने सफर को पूरा करना है.

खुद से ही आप की पहचान:

अगर अपने नाम के साथ किसी और का नाम जोड़ कर ही आप अपनी पहचान देखती हैं तो साथी का जिंदगी से चले जाना आप को बहुत दर्द देगा. आप की पहचान आप से ही है. किसी की गर्लफ्रैंड या बीवी बन कर आप उस शख्स की जिंदगी का एक हिस्सा बन सकती हैं, मगर जिंदगी नहीं. इस बात को आप जितनी जल्दी समझ जाएंगी उतना ही अच्छा होगा.

खुद को न बदले:

अकसर देखने में आता है लड़कियां प्यार में पड़ कर या विवाह के बाद अपनेआप को इतना अधिक बदल लेती हैं कि उन को पहचानना मुश्किल हो जाता है. अपने साथी की पसंद के कपड़े, गहने, हेयरकट अपनाना और हद तो तब हो जाती है जब कुछ लड़कियां पति या प्रेमी के कारण मदिरा आदि का सेवन भी आरंभ कर देती हैं. उन का हर प्रोग्राम अपने साथी के मूड या काम पर निर्भर होता है. अगर कम शब्दों में कहें कि ऐसी लड़कियां खुद को इतना अधिक बदल लेती हैं कि साथी के न रहने या धोखा देने पर उन के जीवन की नींव ही हिल जाती है.

मित्रों का दायरा बढ़ाएं:

आप की चाहे शादी हो गई हो या आप किसी के साथ रिलेशनशिप में हों फिर भी अपने मित्रों से मिलनाजुलना न छोड़ें. याद रखिए कोई भी एक व्यक्ति आप की सारी जरूरतों को पूरी नहीं कर सकता है. मित्रों का जीवन में होना बेहद जरूरी होता है. अगर प्यार जरूरी है तो दोस्तों का होना और भी अधिक जरूरी है. अपने मित्रों का दायरा थोड़ा सा विस्तृत रखिए ताकि आप को बुरे समय में अकेलापन न लगे.

परिवार भी है जरूरी:

शादी होते ही लड़कियां परिवार से कट जाती हैं. पति की नींद ही सोना और पति की नींद ही जगना. जिंदगी में हर रिश्ते का अपना महत्त्व होता है. जैसे आप के साथी या पति की जगह कोई नहीं ले सकता है ठीक उसी तरह आप के परिवार की जगह भी कोई नहीं ले सकता है. ऐसा न हो अपने साथी के प्यार में डूब कर आप अपने परिवार को इग्नोर कर दें. परिवार की इकाई ही आप को भावनात्मक संबल दे सकती है.

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काम से कर ले दोस्ती:

समय चाहे अच्छा हो या बुरा, काम ही एक ऐसी चीज है, जो आप के गम को भुलाने में सहायक होती है. जिंदगी में साथी तो बहुत मिल जाएंगे, मगर यदि आप ने अपने काम का सम्मान नहीं किया तो आप खुद को भी खो देंगी. आप का काम भी आप के साथी की तरह आप के साथ हमेशा रहेगा. आप के साथी की तो फिर भी आप से कुछ अपेक्षाएं होंगी, मगर आप का काम बिना किसी अपेक्षा के आप को नाम और सम्मान दिलाने में सक्षम है.

वर्क फ्रॉम होम में कपल्स ऐसे बिठाएं तालमेल, रिलेशनशिप रहेगा ठीक

कोविड-19 ने सभी वर्क करने वाले लोगों को घर पर रहने और घर से ही काम करने को मजबूर कर दिया है. वैसे तो ज्यादातर घर के पुरुष ही वर्क करते हैं और पैसे कमाते हैं अपने परिवार के लिए लेकिन अब चूंकि जमाना बदल चुका है और लड़के- लड़कियां सभी नौकरी करते हैं.इस दौर में ज्यादातर परिवारों में पति-पत्नी दोनों ही वर्किंग हैं. वर्क फ्रॉम होम में पति-पत्नियों को कई तरहों की समस्याओं को झेलना पड़ रहा है, जिस वजह से पति- पत्नी के आपसी रिश्ते में दूरियां बढ़ने लगी हैं.

जैसे कि उनकी क्या टाइमिंग है ऑफिस की उसके कारण आमतौर पर पति-पत्नी जब बाहर काम करते थें तो वो अपने ऑफिस की सारी टेंशन सारी थकान सब बाहर ही छोड़ कर आते थें और घर में अपना फैमिली टाइम बिताते थे. लेकिन अब चूंकि कोरोना काल चल रहा है तो ऐसे में पति-पत्नी दोनों ही वर्क फ्रॉम होम कर रहे है.लेकिन इसका उनकी नीजि जिंदगी पर कोई असर ना पड़े और वो दोनों बेहतर तरीके से एक-दूसरे को समय दे पाएं ये बहुत ही जरूरी है.जिसके लिए उन्हें खुद भी इन बातों का खयाल एक-दूसरे के बारे में सोच कर रखना होगा.

1. काम के बीच- बीच में ब्रेक लेकर अपने पाटर्नर से बात करते रहें,उनके साथ थोड़ी सी मस्ती करें. ऐसा करने से मानसिक तनाव भी नहीं होगा और आपका रिश्ता भी मजबूत होगा। अपने जीवनसाथी को खुश रखने के लिए आप चाय या कॅाफी ब्रेक ले सकते हैं आप अपने वाइफ के साथ वक्त निकाल कर थोड़ा सा किचन में भी हेल्प कर सकते हैं.इससे आप दोनों का ही मूड फ्रेश होगा और खाना भी जल्दी बन जाएगा और फिर से अपना काम जल्दी कर सकते हैं.

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2. पति-पत्नी को साथ मिलकर घर के काम करने चाहिए.वर्किंग कपल्स को इस बात को समझना होगा कि इस कोरोना काल में काम का दबाव दोनों पर है क्योंकि उन्हें घर और ऑफिस दोनों संभालना है इसलिए घर के सभी काम मिलकर किए जाएं। ऐसा करने से किसी एक व्यक्ति पर दबाव भी नहीं पड़ेगा और घर के काम भी जल्दी हो जाएंगे। एक साथ घर के काम करने से आप दोनों का रिलेशनशिप भी मजबूत होगा।

3. घर से काम कर रही महिलाएं को भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है क्योंकि उन्हें जयादातर घरों में जो वर्किंग वुमन हैं उन्हें ऑफिस के साथ घर का और यदि वो फैमिली में हैं तो पूरी फैमिली का भी ध्यान रखना होता है.घर के हर सदस्य को यह समझाएं कि आपके लिए जितना जरूरी घर का काम है, उतना ही जरूरी ऑफिस के काम भी है। छोटे-छोटे कामों का तनाव लेने के बजाय काम को घर के हर सदस्य के साथ शेयर करें और ऐसी और ऐसी सिचुएशन में पुरुषों को भी अपनी पार्टनर का पूरा ध्यान रखना चाहिए और साथ ही उनकी मदद भी करनी चाहिए.

4. पति-पत्नी को इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि उन्हें अपनी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ को अलग रखना है। अपने ऑफिस के काम के समय सिर्फ काम करें और घर के काम करते वक्त सिर्फ घर की बातें और घर के काम हों. पर्सनल और प्रोफेशन को कभी भी आपस में ना मिलाएं. अगर इस बात खयाल दोनों रखें तो रिश्ते बने रहने के साथ ही मजबूत भी होते हैं.

5. कभी-कभी काम के प्रेशर में आप इरिटेट होने लगते हैं लेकिन इसका मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि आप पर काम का दबाव अधिक और अचानक से आपको गुस्सा आ जाए तो आप वो गुस्सा किसी पर भी या अपनी पत्नी पर निकाल दें.ऐसा कभी ना करें. बल्कि आपको अपने गुस्से पर नियंत्रण में रखना है और अपने पाटर्नर से प्यार से बातें करनी हैं. इस समय आपका पाटर्नर आपसे गुस्से में कुछ बोल दे तो उस ओर ध्यान न दें.

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9 टिप्स: ऐसे रहेंगे खुश

क्या आप चुपचुप रहने लगी हैं? लोग आप से शिकायत करने लगे हैं कि आप ज्यादा बात नहीं करतीं और खुद में ही खोई रहती हैं? आप का मन बेचैन रहता है और आप अकेलापन महसूस करती हैं? आप को लगता है कि अब आप खुश नहीं रह सकतीं? माना कि आज के समय में खुद के लिए समय निकालना, डिप्रैशन और तनाव से दूर रहना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन बिलकुल नहीं. इसलिए उदास होना और अकेले में सोचना छोड़ दीजिए. साइकोलौजिस्ट डा. अनामिका पापड़ीवाल के इन टिप्स पर गौर करने से यकीनन आप को फायदा मिलेगा:

1. खुद को स्वीकार करें

आप जो भी हैं, जैसी भी हैं बहुत अच्छी हैं. कोई भी अपनेआप में पूर्ण नहीं होता. इसलिए खुद को हमेशा सर्वश्रेष्ठ समझने की कोशिश छोड़ दें.

2. सुख और दुख जीवन के दो पहलू

कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिस के जीवन में दुख नहीं आता. इसलिए खुद को दुनिया की सब से दुखी महिला न समझें. सुख और दुख ही जीवन जीने के तरीकों को बताते हैं. जिस ने सुख के समय में खुद पर नियंत्रण रखा और दुख के समय संयमित रहना समझिए खुश रहने की कुंजी उसी के पास है.

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3. खुशी आसपास ही है

आप जब भी परेशान या दुखी हों तो थोड़ा मुसकराएं. खुशी हमारे आसपास ही होती है. बस उसे स्वीकार करने की जरूरत है. जिस तरह दिन के बाद रात होती है और रात में अंधेरा होने की वजह से हम सो जाते हैं ताकि अंधेरे की वजह से कोई काम गलत न हो, ठीक उसी तरह जब कभी आप परेशान या किसी मुसीबत में हों तो यह मान कर चलें कि अभी रात है. आप को किसी भी चीज को इधरउधर नहीं करना है, बल्कि शांत रहना है, साथ ही यह यकीन रखना है कि जल्द ही सुबह होगी और आप फिर से अपनी नियमित दिनचर्या शुरू करेंगी. रात कभी हमेशा के लिए नहीं रहती, बल्कि वह तो सुबह का संदेश ले कर आती है.

4. दूसरों की खुशी में खुश

खुद को खुश रखने की सब से अच्छी दवा है दूसरों की खुशी में खुश होना. ऐसा करने से जल्द ही आप की जिंदगी में भी खुशियां आ जाएंगी. अकसर महिलाएं छोटीछोटी बातों को दिल से लगा लेती हैं और फिर घंटों सोचती रहती हैं. लेकिन जिस बात को ले कर किसी अपने के प्रति मन में कड़वाहट ले कर अंदर ही अंदर आप घुटती रहती हैं, उस से आप की हैल्थ पर तो असर पड़ता ही है, साथ ही आप का किसी काम में मन भी नहीं लगता. इसलिए चाहे कितनी ही छोटी या बड़ी घटना क्यों न हो, उसे ले कर दुखी होने के बजाय उस से सबक ले कर आगे बढ़ें और उस का दुख मनाना छोड़ कर जीवन की खुशियों को ऐंजौय करें.

5. दर्द की दवा है जरूरी

जब भी खुद को परेशान महसूस कर रही हों या बहुत दुखी हों तब यह मान कर चलें कि जब दर्द होता है तभी दवा ली जाती है. जब ऐसी स्थिति से गुजरें तो अपने किसी करीबी से दर्द की दवा लें यानी अपनी परेशानी साझा करें. कोई करीबी नहीं है तो इन बातों का पालन करें:

6. बचपन में लौट जाएं

सच ही कहा गया है कि बचपन का जमाना सब से सुहाना. घर में छोटा बच्चा हो तो कहने ही क्या. बच्चे के साथ उस की टैंशनफ्री दुनिया का हिस्सा बन जाएं. यकीन मानिए अपनी सारी परेशानियां भूल

जाएंगी या फिर अपने बचपन को याद करें जब आप अकेली या बोर होती थीं तो क्या करती थीं. पेंटिंग बनाएं, कुकिंग करें या घर की साफसफाई में मन लगाएं. इस बहाने आप के कई अधूरे काम भी पूरे हो जाएंगे और अकेलापन भी महसूस नहीं होगा. इस के साथसाथ अपनी मनपसंद किताब पढ़ें, कहीं घूमने जाएं.

7. गुनगुनाएं

यदि आप के पास एफएम है तो उसे औन कर लें, क्योंकि इस से आप खुद को अकेला महसूस नहीं करेंगी, बल्कि लगेगा साथ में कोई और भी है. एफएम नहीं है तो खुद कुछ गुनगुना लें. कई शोधों में भी म्यूजिक को बैस्ट हीलर माना गया है. ऐंग्जाइटी से राहत दिलाने में गीतसंगीत का कोई तोड़ नहीं.

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8. अकेली बिलकुल न रहें

किसी अपने से बात करें, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि आप दुखी हैं तो इस का मतलब यह नहीं कि सामने वाले को भी दुखी कर दें. उस से पौजिटिव बात करने की कोशिश करें.

9. नकारात्मक विचारों का सकारात्मक ट्रांसलेशन

अपने मन में आने वाले हर नकारात्मक विचार को सकारात्मक विचार में बदल कर बोलें. बिलकुल वैसे ही जैसे बचपन में हिंदी और इंगलिश में वाक्य परिवर्तन के प्रश्न करती थीं.

सब से जरूरी बात यह कि अपने दुखी होने का कारण ढूंढ़ें. यदि न ढूंढ़ पाएं तो किसी साइकोलौजिस्ट से काउंसलिंग लें, क्योंकि कारण पता लगने पर समाधान आसपास ही होता है.

बच्चा सब सीख लेता है

बच्चा तो एक कोरी स्लेट की तरह होता है वो बहुत सारी चीजों के बारे में तब तक जागरूक नहीं हो सकता जब तक कि माता पिता उसको न समझायें. इसी लिए बच्चे की पहली पढाई तो उसके घर पर ही होती है. माता पिता को इसके लिए बहुत पहाड़ नहीं तोड़ना पड़ता है बस कोशिश करते रहना चाहिए कि

बच्चे को जब समय मिले अच्छी आदते सिखाई जाएं मिसाल के तौर पर हाथ साफ रखने की आदत सिखाना. बच्चों पर एक शोध किया गया तो देखा गया कि वो जीभ से हथेली को चाटना और उस पर दांत लगाने में बहुत आनंद महसूस कर रहे थे. यही बच्चे पेट मे कृमि की तथा पेचिश और अतिसार की समस्या से भी पीड़ित हो रहे थे. इन बच्चों को बार बार हाथ धोने के लिए प्रेरित किया गया. इसका परिणाम यह हुआ कि पंद्रह दिन बाद वो पेट की बीमारी से मुक्त हो चुके थे.

इसके लिए उनको कुछ जानवरों की कहानियाँ सुनाई जो हाथ नहीं धोते थे और हमेशा डाक्टर के पास जाते थे. यह कहानी बहुत काम की साबित हुई.

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आजकल तो बच्चो को सड़क पर कचरा न फैलाने की , कूड़ा सदैव कूडे़दान मे डालने की , हमेशा किनारे चलने की आदतें कहानी बनाकर सिखाई जाती हैं जो उनको बहुत भाती हैं. यह बहुत जरूरी भी है कि जितना हो सके बच्चे को सफाई पसंद और जागरूक बनाना चाहिए इससे उसका अपना भविष्य बहुत उज्जवल होगा. किसी बाल मनोवैज्ञानिक ने यह बिलकुल सच ही कहा है कि बच्चों को अगर उनकी रुचि के हिसाब से कुछ भी समझाया जाता है तो उसे सारी जिंदगी यह चीजें नहीं भूलती. लेकिन यह बात भी सही है कि छोटे बच्चे को कुछ सिखाना आसान काम नही है. इसके लिए मां को बहुत मेहनत करनी पड़ती है. हर समय बच्चे का ध्यान रखना पड़ता है, बच्चे ने खाना खाने से पहले हाथ धोए या नहीं,गंदे हाथ साफ किए या नहीं आदि क्योंकि छोटे से मासूम बच्चे यह समझ नहीं पाते कि क्या ठीक है और क्या गलत. इसके लिए उन्हें कुछ खास चीजों को सिखाना बहुत जरूरी है.

बच्चे का एक प्रमुख स्वभाव यह होता है कि वो हर अच्छी और बुरी चीज को बिलकुल पास जाकर अपने हाथों से छूते हैं वो जानना चाहते हैं कि यह क्या है. फिर चाहे वो कोई खाने की चीज हो, कोई भी सामान हो , मिट्टी हो, कोई पालतू जानवर या फिर कंकड पत्थर वो बहुत ही जिज्ञासु होते हैं उन पर पूरी नजर रखनी ही चाहिए . बच्चों को समय-समय पर उसकी गलती बताएं कि जो चीज वे छू रहे हैं, उसमें कीटाणु हो सकते हैं. इनके के बारे में बच्चे को सही जानकारी देना और गंदगी से कितनी खुजली हो सकती है बीमारी हो सकती है यह सब समझाना बहुत जरूरी है.

उठने-बैठने के कायदे क्या होते हैं और हमको अपनी गरदन झुकानी नहीं चाहिए और बहुत खुश होकर बातचीत करनी चाहिए बहुत सारे बच्चे किसी कारण से शर्मीले हो जाते हैं उनको यह सिखाना चाहिए कि किसी की बात का जवाब देते समय उनसे आंखें मिलाकर हंसकर बात कीजिये .

बच्चे को खांसते हुए रूमाल या टिशू रखने और किसी के सामने नहीं दूर हटकर छींकने,टेबल पर बगैर हिले डुले बैठने और चम्मच से खाने और बगैर सुडुक बुडुक की आवाज के पीने की चीजें कैसे उपयोग मे लेते है यह सब करके ही बताएं. बच्चे किसी को देखने के बाद आंख,नाक कान आदि में अंगुलिया डालते हैं तो उन्हें बताएं कि नाक साफ करना कोई गलत बात नहीं है लेकिन इसे किसी के सामने नहीं बल्कि बाथरूम में जाकर टीशू से साफ करें और नाक कान, आंख, दांत आदि को उंगली से छू लिया है तो साफ करने के बाद हाथ जरूर धो लें. यह भी एक प्रमाणित तथ्य है कि बच्चे बहुत ही जल्दी सीख लेते हैं जरा सा उनकी तारीफ कर दी जाती है तो वह आगे बढ़कर अपना काम खुद करेंगे. जैसे टॉयलेट जाने के बाद खुद को साफ करना. जब बच्चा ऐसा करने लगे तो समझ जाएं कि यही वह समय है जब आप उन्हें टॉयलेट जाने का सलीका सीखा सकते हैं. पहले-पहले अभिभावक और बच्चे को यह काम बहुत अटपटा और जटिल जरूर लगेगा लेकिन धीरे-धीरे बच्चा जल्दी सीख जाएगा.

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बच्चे को कुछ गुनगुनाकर या फिर किसी कहानी से जोड़कर यह बता सकते हैं कि हर रोज दांतों को साफ करना बहुत जरूरी है. बच्चों के लिए शुरू में यह काम आलस वाला जरूर लगता है. मगर वो बस एक बार भी यह समझ जायें कि दांत न होने से कुछ भी नहीं खाया जा सकता तो दिन में दो बार दांत साफ करने की आदत वो अपने आप ही पक्की कर डालेंगे.

बच्चों को चुगलखोर न बनायें 

चुगली की शुरुआत ही किसी मसालेदार या चटपटी  ख़बर से होती है, इसलिए बाल मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चो को ऐसी कोई भी बात बहुत रोचक लगती है वो  इन्हें उच्च श्रेणी की कहानी  मान लेते हैं. आपको यदि आपके बच्चे भी  अपने आसपास की चटपटी ख़बरें, वो भी नमक-मिर्च लगाकर सुना रहे  हों, तो आप एकदम सजग हो जायें.  ये आदत आपके बच्चे के  पूरे व्यक्तित्व को  खराब कर सकती है और उनको कल्पना की ऐसी दुनिया में ले जाएगी जो बहुत ही अवसाद वाली होगी  जहां वास्तविकता तो मुश्किल से  एक प्रतिशत भी नहीं  होगी और मसाला तथा झूठ सौ प्रतिशत.

बच्चे का  नजरिया बिगड़ने लगेगा वो सच को अनदेखा करना सीख जायेगा चुगलखोरी उसको बेसिर पैर की  बातें बनाना सिखा देगी. यह बहुत ही  जोखिम भरा स्वभाव है जो बच्चे में तब ही विकसित होता है जब माता पिता उसमें रूचि लेते  हैं, क्योंकि इनके द्वारा बताई जानेवाली ख़बरों का अंदाज बहुत ही रोचक होता है भले ही आधार ख़ुद बच्चे को  भी मालूम नहीं होता. ऐसी बातों को अहमियत न दें वरना बच्चे का सोचने का  तरीका बेढंगा  होगा और भविष्य अंधकारमय .बालमन बहुत ही उत्सुक हुआ करता है.अक्सर बच्चों की आदत होती ही  है वे अपने तथा औरों के घर की बातें आते-जाते कान लगाकर  सुनने की कोशिश करते हैं. ऐसे में कोशिश कीजिए कि आप जब भी कोई ऐसी बात कर रहे हों तो सामान्य बनकर करें ताकि बच्चे में कान लगाने वाली आदत विकसित न हो एक घटना सबके लिए सबक है. मीता का अपनी भावनाओं पर कभी कोई काबू नहीं है इसलिए वो तैश  मे आकर बगैर कुछ सोचे समझे अडो़स -पड़ोस, नाते रि-श्तेदार सबकी बातें बच्चों के सामने बेहिचक कर देती थी.मीता की  बातें सुनकर उसके बच्चों के मन मे भी संबंधित व्यक्ति के लिए बहुत ही गलत भावना पैदा होने लगी. और एक दिन इसी बात पर किसी पारिवारिक उत्सव मे मीता के बच्चों ने उस रिश्तेदार की  बहुत सारी चुगली  खुलेआम कर दी.

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मीता और वहां उपस्थित  बाकी सब भी  हक्के -बक्के से  रह गये कि बच्चों के  मुख से ऐसी बातें आखिर निकलीं भी तो कैसे ? और बाद मे हरेक ने  इसके लिए सिर्फ मीता को ही जिम्मेदार ठहराया.और वहां पर बहुत बड़ा हंगामा हुआ.

अच्छा माहौल था पर रंग मे भंग पड़ गया. मीता को बहुत शर्मिंदा होकर वापस लौटना पड़ा. आखिर गलती तो उसी की  थी. उसने बच्चों मे नफरत का  बीज बो दिया था.

मीता जैसी गलती  बहुत सारी मां कर देती हैं. किसी से नाराज होकर अपना मन हलका करना हो तो यह नहीं सोचती कि बच्चे तो बिलकुल अबोध है उन पर इसका गलत असर पडे़गा. मन मे जब गुस्से का  जहर भरा हुआ होता है तब कुछ भी समझ नहीं आता कि क्या बोलें और क्या नहीं. पर यह तो हमारे हाथ मे ही है कि किसी भी तरह की चुगली आदि से बच्चों को दूर ही रखें वो हमारा भविष्य हैं.किसी ने कहा  है कि “निंदा रस में बड़ा मजा आता है, परंतु यह निंदा रस आप के अंदर तो नकारात्मकता भरता ही है, कई बार दूसरों के सामने भी आप की स्थिति को खराब कर देता है. कहा जाता है कि दीवारों के भी कान होते हैं, इसलिए आज आप के द्वारा दूसरों के बारे में कही गई बात कभी न कभी सामने वाले के पास पहुंच ही जाएगी. ऐसे में आप के संबंध बिगड़ते देर नहीं लगेगी.”

हमको अपना जीवन सहजता से जीना चाहिए हर इंसान मे कुछ न कुछ कमी तो होती ही है कमी की  तरफ ध्यान देते रहेंगे तो बार बार चुगली  करने का  ही मन होगा और कभी न कभी वो बात अपने बच्चों के  सामने भी कह देंगे बस वहीं से बच्चों की  आदत भी वैसे ही ढलने लगेगी.जब भी किसी से नाराजगी हो तो उसी समय अपनी दो चार खराब आदतें भी याद कर लेनी चाहिए ताकि हम संतुलित होकर रहे और  कम से कम हमारे मुंह से गलत बात निकलकर बच्चों के कान मे तो नहीं जायेगी.

बच्चे अपनी मां की  विचारधारा से बहुत प्रभावित रहते हैं. वो वैसे ही बनना चाहते हैं जैसी उनकी मां है . अगर वो बार- बार अपनी मां को चुगली करते हुए सुनेंगे तो खुद भी वैसे ही बनना चाहेंगे.अगर ऐसा हुआ तो बहुत मुश्किल होगी.चुगली, पर निंदा, दूसरों के चटपटे  किस्से, फालतू गपशप मे बहुत रस आता है और फोन वगैरह पर यह सब बार बार बच्चों के सामने दोहराया जाता है तो हौले हौले वो भी स्कूल कालोनी आदि मे हर किसी मे अनुकरणीय बातों की बजाय हमेशा कुछ  चटपटे से किस्से् खोजने लगते हैं यही उनका सबसे पसंदीदा काम बन जाता है.

अब दुष्परिणाम यह होता है कि बच्चों की सोच संकुचित होने लगती है. उनका विकास अवरूद्ध होता है जो बहुत ही घातक है.

केवल जीवन जी लेना ही सब कुछ नहीं होता है इससे भी महत्वपूर्ण होता है अच्छी विचारधारा का पालन करना इसको अपनी नियमित आदत बनाना. दिमाग को खूबसूरत सोचने के  लिए यथासंभव प्रेरित करना चाहिए यह बहुत आसान है और बडा ही लाभदायक भी. चुगली करने वाले व्यक्ति के मन में चुगली के साथ-साथ झूठ बोलना, बुराई करना, मतभेद करवाना, निंदा करना आदि अनेक बुरी आदतें भी जन्म ले लेती है.इससे वह इन सब से बच नहीं पाता और समय के साथ-साथ अपना अस्तित्व खो बैठता है. न तो वह भरोसे के  काबिल रहता है न किसी मान सम्मान के.

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हर किसी का जीवन एक ही तरह से नही गुजरता है, इसलिए कहीं किसी के  निजी जीवन मे  कुछ

अटपटा है तो  एक व्यक्ति की बात मसालेदार बनाकर उसको अन्य लोगों  तक फैलाना और  उनके मध्य मनमुटाव पैदा करने के उद्देश्य से कहना बहुत ही विस्फोटक काम है.

आमतौर पर देखा जाता है कि बच्चों  में अपने परिवार के  किसी सदस्य की  बोली के अंदाज़ मे ही चुगली करने की बुरी आदत हौले हौले बनती रहती है. यह आदत बालक को समाज और व्यक्तित्व से पूर्णतया अलग कर देती है.

किसी की  निजी बातें आखिर इस तरह मजे लेकर  करनी ही क्यों हैं यह मानवीयता  नहीं है और यह आदत बहुत ही  गंदी भी  है, इससे बचकर रहना ही आपके लिए श्रेष्ठ है.

मुंह से निकली हुई बात बहुत लंबा सफर तय करती है.दिमाग की  ऊर्जा को सही जगह पर लगाना चाहिए.

नकारात्मक बातों से इस पर बहुत दबाव पड़ता है.

बच्चों को प्रगति करते हुए देखना चाहते हैं तो घर पर किसी की  भी चुगली  मत कीजिये. मन मे शीतलता, स्फूर्ति, गतिशीलता वाली बातें ही साझा करें. सोचिये  क्या हमारे देश को शिवाजी, ध्रुव, आरूणि,

प्रहलाद जैसे बालक मिलते अगर वहां भी चुगलियों का  सिलसिला चल रहा होता.कुदरती तौर पर बच्चे सचमुच बहुत ही संवेदनशील होते है, कोमल हृदय के  होते हैं.आपके मुँह से बार बार  चुगली, निंदा आदि से उनको अनावश्यक तनाव हो सकता है और उनकी पढ़ाई मे बाधा आ सकती है. अपनी जुबान को बेवजह  खराब न करें. आत्मविश्वास ही दिमाग की  खुराक है और  चुगली नहीं बल्कि सहयोग, सामूहिकता, सबके साथ निरंतर प्रसन्नता  ही इसकी असली  सुगंध है.

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4 टिप्स: जब रिश्तों में सताए डर

किसी भी रिश्ते को लौंग टाइम तक चलाने के लिए सबसे पहले उसमें एक-दूसरे को लेकर डर दूर करना आवश्यक होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि अगर आप अपने रिश्ते से डर दूर नहीं करेंगी तो आप अपने विचार खुलकर साझा नहीं कर पाएंगी और आपके रिश्ते पर इसका गलत असर पड़ेगा.

चलिए जानते हैं वो कौन से ऐसे तरीके  हैं जिनकी मदद से आप अपने डर को दूर कर सकती हैं.

1. जब आपको जरूरत हो मदद के लिए तो खुलकर बोलें

कभी भी अपने डर को अपने रिश्ते पर हावी नहीं होने देना चाहिए वरना इससे आपका रिश्ता टूट सकता है. अगर आपको किसी भी तरह की मदद की जरूरत पड़ें तो आपको बिना किसी झिझक के अपने पार्टनर से बात करनी चाहिए.

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2. अपने सुझाव जरूर दें

हमेशा अपने पार्टनर को सुझाव दें. बिना इस डर के, कि वह आपके सुझाव को मानेगा या नहीं. इससे आपका पार्टनर आपकी बातों पर कैसी प्रतिक्रिया देता है आपको यह पता चलेगा. साथ ही झिझक खत्म होने से आप अपने रिश्ते को और मजबूत बना सकती हैं.

3. स्पष्ट रूप से बातचीत करें

अगर आप अपने साथी से किसी बात को लेकर डरती हैं, तो आपको खुलकर उनसे बात करनी चाहिए क्योंकि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो यह आपके रिश्ते को गलत दिशा में ले जा सकता है और शायद इससे आपका रिश्ता टूट भी सकता है. किसी भी रिश्ते में डर को दूर करने के लिए आपको हर एक बात को शेयर करना चाहिए.

4. पूरी वफादारी से जवाब

कभी भी अपने साथी से किसी भी बात को लेकर झूठ बोलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. यह आपके साथ-साथ आपके रिश्ते को भी कमजोर कर देता है. किसी भी बात का जवाब पूरी वफादारी से दें और अपने अंदर के डर को दूर करें. अगर आप गलत भी हो तो भी आपको बिना डरे अपने पार्टनर से उस बारे में बात करनी चाहिए. यह आपके डर को खत्म करने के साथ-साथ आपके रिश्ते को और भी गहरा कर देगा.

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क्या आपकी मां भी पूछती है आपसे ये 5 सवाल

व्यक्ति के जीवन की सबसे पहली गुरु एक मां ही होती है जो उसे चलना, हंसना, बोलना आदि सिखाती है. और बच्चा कितना भी बड़ा क्यों ना हो जाए एक मां के लिए तो वह बच्चा ही रहता हैं. मां का प्यार बच्चों के लिए हमेशा वैसा ही रहता है जैसा बचपन में रहता है.

बड़े हो जाने पर आप मां की बातों को भूल सकते हैं लेकिन एक मां आपकी छोटी से छोटी बात को भी याद रखती है. आज हम आपको मां के पूछे गए उन सवालों को बताने जा रहे हैं जो एक मां की ममता को दर्शाते हैं और ये सवाल सिर्फ एक मां ही पूछती हैं. तो आइये जानते हैं उन सवालों को.

1. खाया या नहीं?

भले ही बच्चा कितनी भी देर से घर क्यों न आए लेकिन आपकी मां आपसे यह जरूर पूछेगी कि खाना खाया या नहीं.

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2. मेरा बच्चा सबसे सुंदर

हर मां के लिए उसका बच्चा दुनिया में सबसे खूबसूरत होता है. आपकी मां के लिए आप हमेशा राजा बेटा या रानी बिटियां ही रहेगें, जोकि उनके प्यार को दर्शाता है.

3. ये क्या पहना है?

जब भी आप कोई नया फैशन या कपड़े ट्राई करते हैं तो हर मां का सवाल होता है कि ये क्या पहना है. हर बच्चे की मां उनसे यह सवाल तो पूछती ही होगी.

4. आज क्या खाओगे?

बच्चे जब स्कूल या औफिस से वापिस आता है तो मां का सबसे पहला सवाल होता है आज क्या खाओगे. सिर्फ अभी ही नहीं अगर आप 50 साल के भी क्यों ना हो जाएं मां का ये सवाल हर बार यही रहेगा.

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5. तबीयत ठीक है?

जितनी केयर मां कर सकती है उतना कोई भी नहीं कर सकता. ऐसे में आपके थोड़ा-सा बीमार पड़ने पर आपकी मां आपसे जरूर पूछेंगी कि तबीयत ठीक है. अगर आप थोड़ा-सा थक कर भी घर पहुंचेगे तो आपकी मां का यही सवाल होगा.

कहीं आप तो बेवजह नहीं सोचतीं

मृदु को अधिक सोचने की बीमारी थी. अगर वह घर में कभी अपने पति को सास या ससुर से बात करते देख लेती है तो उसे लगता है उस की बुराई कर रहे होंगे. अगर सास प्यार से कह देती हैं कि हमारी मृदु की शादी के बाद सेहत अच्छी हो गई है तो उसे लगता है कि वह उसे काम न करने का ताना मार रही हैं.

अगर मृदु की ननद उस के खाने की तारीफ करे तो उसे लगता है वह जानबूझ कर कर रही है ताकि वह हर समय रसोई में लगी रहे. मृदु हर छोटीबड़ी बात पर इतना अधिक सोचती है कि उस ने अपने इर्दगिर्द एक मकड़जाल बुन लिया है. उस जाल में फंस कर न केवल वह अपने रिश्ते खराब कर रही है, बल्कि अपनी मानसिक शांति भी भंग करने पर तुली है.

सरला के भांनजे की बेटी का जन्मदिन था. जब केक कटने लगा तो सरला को स्टेज पर नहीं बुलाया गया. उन 2 घंटों में ही सरला ने इस बात के बारे में इतना सोचा कि वह उस जन्मदिन पार्टी के बीच में ही उठ कर चली गई. सरला के अनुसार, ‘‘भानजे ने जानबूझ कर उसे नीचा दिखाने के लिए ऐसा किया, क्योंकि वह बच्ची के लिए महंगा तोहफा नहीं ला पाई थी.’’

मगर अगर सरला के भानजे मनुज से पूछें तो उस के दिमाग में यह बात दूरदूर तक भी नहीं थी.

भीड़भाड़ में उसे मौसी दिखाई नहीं दी थी और उस ने कभी यह नहीं सोचा था कि वह इस बात को इस दिशा में ले जाएगी.

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ऋतु के पति और बेटी जब तक दफ्तर से नहीं लौटते तब तक वह इतना अधिक सोचती है कि उस की हालत खराब हो जाती है. हर फोन कौल पर उसे लगता है कि उस के पति या बेटी का ऐक्सीडैंट न हो गया हो.

पति अगर मोबाइल पर कुछ देख कर मुसकराते हैं तो उसे लगता है उन का अफेयर चल रहा है. उस की बेटी अकसर कमरे को बंद कर के काम करती है पर ऋतु इस बारे में इतना अधिक सोचती है कि उसे लगता है बेटी जरूर न्यूड शेयर कर रही होगी. कहीं वह किसी गलत लड़के के साथ तो नहीं है.

इन सभी उदाहरणों से यह बात तो तय है कि अगर हम अधिक सोचते हैं तो अकसर वह गलत दिशा में ही होता है. ज्यादा सोचने वाले इंसान अपने ही सब से बड़े दुश्मन होते हैं और ब्लड प्रैशर, शुगर और न जाने कितने रोगों के शिकार हो जाते हैं.

अपनी जिंदगी को सही दिशा में ले जाने के लिए सोचना जरूरी है. मगर अधिक सोचने से कोई लाभ नहीं है.

आज में जीएं: यह हम सब की समस्या है. कोई भी बात आते ही हम बहुत दूर तक की सोचने लगते हैं, जो हमें बेवजह तनाव देता है. रागिनी अपनी बेटी के पैदा होने के बाद. उस के भविष्य को ले कर बेवजह तनाव में आ गई थी.

अपनी बेटी की बालसुलभ हरकतों को जीने के बजाय वह आने वाले खर्चे और जिम्मेदारियों को ले कर तनाव में रहने लगी थी. कोई भी नई जिम्मेदारी या नया रोल मिलते ही बहुत दूर की न सोचें. आज में जीएंगे तो कल अपनेआप सुनहरा हो जाएगा.

छोटेछोटे गोल बनाएं: अगर आप आसमान छूना चाहते हैं तो थोड़ा सब्र रखें. छोटेछोटे गोल बनाएं और धीरेधीरे अपने टारगेट के करीब पहुंचें. छोटेछोटे गोल आप को मन की शांति प्रदान करेंगे. ये छोटेछोटे गोल अधिक सोचने की आदत से छुटकारा दिलाने में सहायक होते हैं.

डायरी को मैंटेन करें: एक सर्वे से यह बात सामने आई है कि जो लोग ढंग से प्लैनिंग नहीं करते हैं, उन का दिमाग हमेशा चिंतनमनन करता रहता है. अगर आप काम में बिजी रहेंगे तो अत्यधिक सोचने की आदत से छुटकारा मिल सकता है. अपनी प्लैनिंग के लिए डायरी मैंटेन करने की आदत डालिए.

1 साल या 1 माह के बजाय, रोज के काम डायरी में लिखें और जो कार्य हो जाए उस पर टिक कर लीजिए. ऐसा करना आप के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा.

मन के घोड़े पर लगाम लगाएं: जैसे ही आप के मन के घोड़े इधरउधर भागने लगें तो आप 2 मिनट के लिए आंखें बंद कर ठंडी सांस लें. सांसों पर ध्यान लगाएंगी तो आप का मन आप के काबू में रहेगा.

हंसें और खिलखिलाएं: हर छोटीबड़ी बात पर हंसने और खिलखिलाने की आदत डालें. जिंदगी में हंसने और खिलखिलाने की कोई वजह नहीं होती है. ये मौके हमें खुद ढूंढ़ने पड़ते हैं और अधिकतर बनाने पड़ते हैं. जितना अधिक खुश रहेंगी, फालतू की चिंतामनन से ध्यान हट जाएगा.

शौक को जिंदा रखें: जब भी आप के दिमाग में नकारात्मक विचार आने लगें, आप किसी भी ऐसे कार्य में लग जाएं जो आप को पसंद हो. इस से एक तो आप का दिमाग हलका रहेगा और दूसरे आप अंदर से ऊर्जावान भी महसूस करेंगी.

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खुद पर रखें विश्वास: अगर आप के अंदर आत्मविश्वास की कमी है तो हर नया काम या जिम्मेदारी आप को गहरी सोच में डाल देती है. आप को लगता है पता नहीं आप कर पाएंगे या नहीं. अगर नहीं कर पाए तो लोग क्या कहेंगे? अपने ऊपर विश्वास बना कर रखें, आप से बेहतर कोई नहीं है. किसी भी नई जिम्मेदारी को निभाने के लिए रातभर सोचने की नहीं, बल्कि एक अच्छी प्लैनिंग की आवश्यकता है.

खुल कर बातचीत करें: अगर आप को किसी की बात या व्यवहार बुरा लगता है तो उस के बारे में सोचसोच कर गलत धारणा न बनाएं. खुल कर बातचीत करें, आप को बेवजह सोचने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

घरेलू काम में क्या हो पति की भूमिका

मेरी दीदी को औफिस के लिए जीजाजी से पहले निकलना होता था. अत: सुबह के नाश्ते की जिम्मेदारी जीजू पर थी. एक दिन सुबहसुबह किसी कारणवश जीजाजी को नीचे जाना पड़ा. उस समय उन के हाथों में आटा लगा था. बस फिर क्या था. जैसे ही वे नीचे पहुंचे उन की पड़ोसिन ने उन के हाथों में आटा लगा देखा तो हैरान हो बोलीं, ‘‘भैया, क्या आप रोटियां बना रहे थे?’’

वे इस तरह से बोल रही थीं जैसे जीजू ने कोई बड़ा गलत काम कर दिया हो. आसपास कुछ और महिलाएं भी थीं. अत: सब को बातें बनाने का मौका मिल गया.

यह देख जीजाजी भी दुविधा में पड़ गए कि क्या सच में उन्होंने कुछ गलत कर दिया है. दरअसल, वे हैरान इसलिए भी थे, क्योंकि वे शादी से पहले भी अपना खाना खुद बनाते थे. आसपास के लोग यह जानते थे.

खैर, हद तो उस दिन हुई जब इसी बात पर सोसाइटी के पुरुषों ने उन्हें समझाया, ‘‘आप औरतों वाले काम न किया करें. घर की सफाई और रसोई का काम तो औरतों को ही करना चाहिए. आप ऐसा क्यों करते हैं? क्या आप दोनों के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है? क्या आप की पत्नी की कमाई आप से ज्यादा?’’

इतना ही नहीं. पासपड़ोस की औरतों ने दीदी को भी समझाया गया कि पति की इज्जत करनी चाहिए. औरतों के काम मर्दों से नहीं कराने चाहिए.

दीदी व जीजू दोनों ने आसपास के लोगों को समझाने की बहुत कोशिश कि पतिपत्नी दोनों को घर के काम मिल कर करने चाहिए, बावजूद इस के वे कई बार मजाक के पात्र बने. दीदी को खासतौर पर सुनने को मिला कि वह एक संवेदनहीन पत्नी हैं.

बदलनी होगी सोच

दरअसल, इस सोच के पीछे कई कारण हैं जैसे लिंग के आधार पर काम का विभाजन, महिलाओं से संबंधित हर काम, हर चीज को निचले दर्जे का मानना, बदलते परिवेश के साथ खुद की सोच को न बदलना आदि.

मगर जब पत्नी कामकाजी बन कर पति को आर्थिक सहयोग दे सकती है, तो पति से घरेलू कामों में मदद की उम्मीद भी कर सकती है. इस में कोई बुराई नहीं है. पतिपत्नी दोनों मिल कर अपना घर बसाते हैं. फिर घर की जिम्मेदारियां सिर्फ पत्नी के हिस्से ही क्यों रहें?

जमाना बदल रहा है. अब घर के कामकाज में पति की भागीदारी भी बढ़ रही है. आप भी इस के लिए अपने पति को प्रोत्साहित करें ताकि आप का वर्कप्रैशर थोड़ा कम हो.

पत्नियां पति से घर के काम कराने के लिए निम्न तरीके अपना सकती हैं:

विवाद का विषय न बनाएं: पति के काम करने का तरीका अजीब भी हो सकता है. अत: इस बात को विवाद का विषय न बनाएं. पहले काम कराने की आदत डालें. धीरेधीरे काम करने का सलीका भी आ जाएगा.

गलती न निकालें: काम गलत होने पर पति की गलती निकालने के बजाय दोनों मिल कर काम करें.

लंबी लिस्ट न हो: पति के औफिस से आते ही उन्हें कामों की लंबी लिस्ट न पकड़ाएं. पहले चायनाश्ता कराएं. फिर प्यार से कहें कि प्लीज फलां काम कर देना.

जिम्मेदारियां बांट लें: जिम्मेदारियों का बंटवारा कर लें ताकि पति समझ जाएं कि ये काम उन्हीं के हैं, क्योंकि अगर आप ने सभी कामों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली तो वे जिम्मेदारी लेने से बचेंगे. आप चाहे कामकाजी हों या फिर गृहिणी घर के कामों में पति की मदद जरूर लें.

किन कामों में लें मदद

सवाल यह उठता है कि ऐसे कौन से काम हैं जिन में पति की मदद ली जा सकती है? अगर आप उन पर काम का बोझ नहीं डालना चाहती हैं तो छोटेमोटे काम जैसे घर की डस्टिंग, बच्चों का होमवर्क, कपड़े ठीक करना, बाजार से सामान लाना आदि कामों में आप उन की मदद ले सकती हैं.

अगर आप किचन में खाना बना रही हैं तो पति से सब्जी कटवा सकती हैं या फिर फ्रिज से जरूरत का सामान निकलवा सकती हैं. किचन समेटने में उन की मदद ले सकती हैं. ये छोटेमोटे काम कराने से ही आप का वर्कलोड काफी कम हो जाएगा. इस का एक फायदा यह भी होगा कि आप पति की मदद से घर के कामों से जल्दी फ्री हो जाएंगी और फिर आप पति के साथ ज्यादा समय बिता सकेंगी. इस के अलावा आप के इस कदम से आप का रिश्ता मजबूत होगा. घर में शांति और खुशहाली रहेगी.

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