थोड़ी सी बेवफ़ाई में क्या है बुराई

हाल ही में सोशल मीडिया पर ममता बनर्जी का एक पुराना वीडियो काफ़ी वायरल हो गया. इस वीडियो में ममता महिलाओं के प्रति अपने खुले विचारों का प्रदर्शन करती हुई नज़र आईं. वायरल वीडियो में ममता कहती हुई दिख रही हैं कि अगर कोई भी महिला अपने पसंद के पुरुष के साथ एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखना चाहती है तो वह बिलकुल रख सकती है.

उन के शब्दों में ,’ मैं सभी गृहिणियों को यह बताना चाहती हूँ कि यदि आप कभी भी एक्स्ट्रा मैरिटल संबंध में रहना चाहती हैं तो आप यह कर सकती हैं. इस के लिए मैं आप को अनुमति दूँगी.’

ममता बनर्जी द्वारा दिए गए इस टेंपटेशन का बहुत से लोगों ने विरोध किया, नाकभौं सिकोड़े. बहुतों ने इसे नैतिकता विरोधी बताया तो कुछ लोग महिलाओं के जीवन में सच्चरित्रता की आवश्यकता पर उपदेश देने बैठ गए. लोगों को यह बात हजम ही नहीं हुई कि औरतों को ऐसे संबंधों की छूट भी मिल सकती है.

पर जरा सोचिये क्या हमारे समाज में इस मामले में पूरी तरह से दोहरे मानदंड नहीं हैं? पुरुष वैश्याओं के पास जाएं, अपनी यौन क्षुधा की पूर्ति के लिए रेप करें, वासना की आग में जल कर छोटीछोटी बच्चियों की जिंदगी बर्बाद कर डालें तो भी ज्यादातर लोग मुंह पर टेप लगा कर बैठे रहते हैं. उस वक्त महिलाओं पर हो रहे शोषण को देख कर उन का खून नहीं खौलता. उस वक्त पुरुषों की सच्चरित्रता की आवश्यकता भी महसूस नहीं होती. पर जब बात स्त्रियों की आती है तो लोगों का नजरिया ही बदल जाता है. स्त्रियों पर नैतिकता के झूठे मानदंड स्थापित किये जाते हैं. सच्चरित्रता के नाम पर स्त्रियों पर बंधन डालना एक तरह से धार्मिक षड्यंत्र ही है. धर्मग्रंथों ने हमेशा हमें यही सिखाया है कि स्त्रियां पुरुषों की दासी हैं. पुरुष हर जगह अपनी मनमरजी से चल सकते हैं मगर स्त्रियों को एकएक कदम भी पूछ कर ही आगे बढ़ाना चाहिए.

यह वही समाज है जहां नीयत पुरुषों की खराब होती है और घूँघट औरतों को लगा दिया जाता है. बदचलनी पुरुष करते हैं और बदनाम औरतों को कर दिया जाता है. ऐसे में अगर कोई बराबरी की बात करे, महिलाओं को खुल कर जीने का मौका देने की वकालत करे तो धर्म के तथाकथित रक्षकों के सीने पर सांप लोटने लगते हैं. जब पुरुष बेवफाई करे तो मसला बड़ा नहीं होता मगर स्त्री बात भी कर ले तो हायतौबा मच जाती है.

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आज के समय में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर कोई बड़ी बात नहीं रह गई है. बड़े शहर हों या छोटे जब स्त्री पुरुष मिल कर काम करते हैं, एकदूसरे के साथ वक्त बिताते हैं तो ऐसे रिश्ते बनने बहुत स्वाभाविक हैं. अस्वाभाविक बस इतना है कि स्त्रियां ऐसा करें या करने की बात भी कर दें तो नैतिकता का पालन कराने वाले तथाकथित धर्म रक्षकों के सीने में आग लग जाती है.

शादी में समर्पण का बोझ सिर्फ महिलाओं पर

अगर एक पुरुष एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स में इन्वॉल्व होता है और इस की जानकारी घरवालों को होती है तो भी कोई कुछ नहीं कहता. मगर यही काम एक औरत करे तो हल्ला मच जाता है. समाज के तथाकथित संचालक और धर्म व संस्कारों के रक्षक हंगामे खड़े कर देते हैं. उस महिला का समाज में निकलना दूभर कर दिया जाता है. घरवाले उस पर तोहमतें लगाने लगते हैं. आज अगर औरतें कह रही हैं कि हमें अपने पति के अलावा भी बाहर कहीं रिश्ता बनाने का हक़ है तो यह बात लोगों को हजम नहीं होती. लेकिन आदमी को सारी छूटें मिली हुई हैं. इस तरह के भेदभाव पूर्ण रवैये ने हमेशा ही औरतों को शिकंजे में रखा है. शादी होती है तो यह वचन लिया जाता है कि दोनों अपने साथी के लिए ही समर्पित रहेंगे. लेकिन इस वचन का पालन सिर्फ औरतों से ही कराया जाता है.

एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से कुछ लोगों को मिलती है खुशी

अमेरिका की एक रिसर्च बताती है कि विवाहेतर संबंध रखने वाले कुछ लोग ज्‍यादा खुश रहते हैं. अमेरिका की मिसौरी स्‍टेट यूनिवर्सिटी की डॉ. एलीसिया वॉकर ने एश्‍ले मेडिसीन नामक एक डेटिंग साइट के एक हजार से ज्यादा यूजर्स के बीच एक सर्वे किया. यह डेटिंग साइट भी अनोखी है जो केवल विवाहित जोड़ों या रिलेशनशिप में रह रहे कपल्स के लिए डेटिंग सुविधा उपलब्ध कराती है. सर्वे में शामिल लोगों से पूछा गया कि अपनी गृहस्‍थी से बाहर किसी से संबंध बनाने के बाद उन के जीवन की संतुष्टि’ पर क्या असर पड़ा.

10 में से 7 लोगों ने कहा कि विवाहेतर संबंध करने के बाद वे अपनी शादीशुदा जिंदगी से ज्‍यादा संतुष्ट हैं. आंकड़ों के मुताबिक पुरुषों से ज्‍यादा महिलाएं अपने विवाहेतर संबंधों की वजह से ‍ज्यादा खुश थीं. इस संतुष्टि को प्रभावित करने वाले बहुत से कारकों में सर्वप्रमुख था, अपनी गृहस्थी में पार्टनर से यौन संतुष्टि न मिल पाना लेकिन बाहर वाले पार्टनर से इस खुशी का मिलना.

अफेयर खत्म होने के बाद और खुशी

जब यह विवाहेतर संबंध खत्म हो जाते हैं तब क्‍या अपने पार्टनर को धोखा देने वाले को पछतावा होता है? इस सवाल का जवाब भी हैरान करने वाला था. शोध में शामिल लोगों ने कहा कि विवाहेतर संबंध खत‍म होने पर तो जीवन में पहले से भी ज्यादा संतुष्टि का अनुभव होता है.

PubMed नामक एक जर्नल में भी इसी तरह की एक रिसर्च छपी थी जिस में कहा गया था कि जो लोग अपनी शादी के बाहर किसी से अफेयर करते हैं, लेकिन इस की जानकारी अपने पार्टनर को नहीं देते, वे ज्यादा खुश रहते हैं.

थोड़ी सी बेवफ़ाई

इस का मतलब यह नहीं कि शादीशुदा जिंदगी की समस्‍याओं से निपटने का यह सही समाधान है. अपने पार्टनर को धोखा दे कर मिलने वाली खुशी अस्‍थायी होती है. पहले बातचीत कर के आप को अपनी शादीशुदा जिंदगी को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए. मगर परिणाम बेहतर न निकलें तो खुद परेशान होते रहने से बेहतर है कि जीवन में कुछ रोमांच लाएं भले ही इस के लिए थोड़ी सी बेवफ़ाई ही क्यों न करनी पड़े.

पुरुषों से ज्‍यादा महिलाओं के एक्‍स्‍ट्रा मैरिटल रिलेशनशिप

आप को एक सच और बता दें और वो यह कि इस मामले में स्त्रियां आगे हैं. एक्स्ट्रा मैरिटल डेटिंग ऐप ग्लीडन ने एक रिसर्च किया जिस में 53 फीसदी भारतीय महिलाओं ने माना है कि वे अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के साथ इंटिमेट रिलेशनशिप में हैं. जबकि शादी के बाहर एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखने वाले पुरुषों की संख्या 43 फीसदी थी.

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ग्लीडन का यह रिसर्च ऑनलाइन कराया गया था जिस में दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, बैंगलोर, पुणे, अहमदाबाद और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों के 1500 लोगों ने भाग लिया. रिसर्च में खुलासा हुआ कि पुरुषों के मुकाबले उन महिलाओं की संख्या ज्यादा थी जो नियमित रूप से अपने पति के अलावा अन्य पुरुषों से रिश्ता रखती हैं.

सर्वे के मुताबिक़ 77 प्रतिशत भारतीय महिलाओं का कहना था कि उन के द्वारा पति को धोखा देने की वजह उन की शादी का नीरस हो जाना था. जब कि कुछ ने इसलिए धोखा दिया क्योंकि पति घरेलू कामों में हिस्सा नहीं लेते हैं. वहीं कुछ को शादी से बाहर एक साथी को खोजने से जीवन में उत्साह का अहसास हुआ. 10 में से 4 महिलाओं का मानना है कि अजनबियों के साथ मौजमस्ती के बाद जीवनसाथी के साथ उन का रिश्ता और अधिक मजबूत हुआ है.

प्रश्न यह उठता है कि क्या शादी जैसी संस्था महिलाओं के लिए बोझ बन रही है और क्या इस के लिए पुरुष ज्यादा जिम्मेदार हैं या फिर यह समाज की दकियानूसी सोच के खिलाफ महिलाओं की बगावत है.

बराबरी के नहीं पतिपत्नी के रिश्ते

भारत में पतिपत्नी के रिश्तों में बहुत भेदभाव है. ये रिश्ते बराबरी के नहीं हैं. ज्यादातर घरों में पति को मुखिया और पत्नी को दासी बना दिया जाता है. पति दूसरी औरत के साथ हंसीमजाक करे तो यह स्वाभाविक है और औरत करे तो वह वैश्या हो जाती है. पति रूपए कमाए तो वह सर्वेसर्वा बन जाता है मगर पत्नी कमाई करे फिर भी नौकरानी की तरह घर को भी संभाले. पति के लिए ऑफिस चले जाना ही उन की ड्यूटी है जो वह कर रहा है. वहीं पत्नी अगर वर्किंग है तो भी पूरे घर के काम कर के ही ऑफिस जा सकती है. वह बीमार है तो भी कोई मदद करने नहीं आता. यही वजह है कि अब महिलाऐं अपने बारे में भी सोचना चाहती हैं ताकि उन के जीवन में कुछ एक्साइटमेंट आए.

प्यार और तारीफ की जरूरत सब को होती है

शादीशुदा जिंदगी एक वक्त के बाद नीरस हो जाती है. देखा जाए तो महिला की जिंदगी काफी कठिन है. पुरुष ऑफिस जा कर फ्री हो जाते हैं. लेकिन महिलाओं को घर की हर छोटीछोटी ज़रूरतों का ख्याल रखना पड़ता है और बदले में तारीफ के दो शब्द भी नहीं मिलते. ऐसे में महिलाएं ऐसा शख्स ढूंढने लगती हैं उन्हें कहे कि वे सब से ज्यादा सुंदर हैं. शादी के कुछ दिन बाद या फिर बच्चे होने के बाद से ही पति उन्हें भाव नहीं देते. दो शब्द तारीफ़ के भी नहीं कहते. पहले की तरह रोमांस में समय भी नहीं बिताते. ऐसे में अपने अंदर पहले सी ताजगी और उत्साह लाने के लिए दूसरे पुरुष की तरफ उन का झुकाव हो सकता है.

महिलाएं क्‍यों करती हैं एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स

पति/पत्नी यानी जीवनसाथी से इंसान अपने मन की हर बात शेयर करता है. हर राज खोल देता है. खासकर महिलाएं जब तक किसी से अपना सुखदुख शेयर न कर लें उन्हें चैन नहीं पड़ता. मगर कई बार जब पत्नी को अपने पति का पूरा साथ नहीं मिल पाता और पति उसे इग्नोर करता है तो पत्नियां अपने दिल की बातें शेयर करने के लिए किसी और को तलाशती हैं और इस में ऐसा कुछ बुरा भी नहीं है. इस से उन की जिंदगी में वह उत्साह, उमंग और तरंग फिर से जागने लगती हैं जो अन्यथा उन की रोजाना की वैवाहिक जिंदगी से गायब हो चुकी थी.

जब विवाहित जिंदगी में सेक्स रोजाना का एक बोझिल रूटीन बन जाता है तो समझिये वह समय आ गया है जब महिलाएं अपने जीवन में खुशियां और उत्साह वापस लाने के लिए किसी अफेयर से जुड़ने की ख्वाहिश रखने लगती हैं. यह लव अफेयर उन्हें किसी सौगात से कम नहीं लगता.

अक्सर अपने बिजी शेड्यूल के कारण पति और पत्नी समानांतर जिंदगी जीने लगते हैं. उन्हें आपस में बातचीत करने का भी समय नहीं मिल पाता. यहां तक कि वीकेंड और छुट्टी के दिन भी वे एकदूसरे से कटेकटे ही रहते हैं. बच्चों के जन्म के बाद भी कई पति अपनी पत्नी से पहले सा प्यार नहीं कर पाते. वे उन्हें एक बच्चे की मां के रूप में देखने लगते हैं. अपनी पत्नी या प्रेमिका के रूप में नहीं देख पाते. ऐसे में महिलाओं के मन में अवसाद और निराशा पनपने लगती है. इस से निकलने के लिए ही वे ऐसे रिश्ते की तलाश करती हैं.

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वस्तुतः महिलाएं अपने पति से प्यार और आत्मीयता चाहती है और जब यह आत्मीयता महिलाओं को अपनी जिंदगी में नहीं मिलती तो उन के पास शादी से बाहर प्यार की तलाश करने के अलावा और कोई विकल्प बाकी नहीं रहता.

सच तो यह है कि महिलाओं के लिए असफल शादी की स्थिति को झेलने से ज्यादा बुरा कुछ नहीं होता. जिस शादी में अपनापन, इज़्ज़त और पति के प्यार की कमी होती है वहां महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है. वे अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं. ऐसे में शादी से बाहर प्रेम संबंध बना कर वे अपनी उबाऊ और असफल शादी के दर्द को भुलाने का प्रयास करती हैं. महिलाएं किसी अपने जैसे पार्टनर की तलाश करने का प्रयास करती हैं जिन की रुचियां और आदतें उन से मिलतीजुलती हों. इस में गलत क्या है?

मैं ससुराल के माहौल से नाखुश हूं, मैं क्या करुं?

सवाल-

  मैं 23 वर्षीय नवविवाहिता हूं. शादी के बाद ढेरों सपने संजोए मायके से ससुराल आई, मगर ससुराल का माहौल मुझे जरा भी पसंद नहीं आ रहा. मेरी सास बातबेबात टोकाटाकी करती रहती हैं और कब खुश और कब नाराज हो जाएं, मैं समझ ही नहीं पाती. वे अकसर मुझ से कहती रहती हैं कि अब तुम शादीशुदा हो और तुम्हें उसी के अनुरूप रहना चाहिए. मन बहुत दुखी है. मैं क्या करूं, कृपया सलाह दें?

जवाब-

अगर आप की सास का मूड पलपल में बनताबिगड़ता रहता है, तो सब से पहले आप को उन्हें समझने की कोशिश करनी होगी. खुद को कोसते रहना और सास को गलत समझने की भूल आप को नहीं करनी चाहिए. घरगृहस्थी के दबाव में हो सकता है कि वे कभीकभी आप पर अपना गुस्सा उतार देती हों, मगर इस का मतलब यह कतई नहीं हो सकता कि उन का प्यार और स्नेह आप के लिए कम है.

दूसरा, अपनी हर समस्या के समाधान और अपनी हर मांग पूरी कराने के लिए आप ने शादी की है, यह सोचना व्यर्थ होगा. किसी बात के लिए मना कर देने से यह जरूरी तो नहीं कि वे आप की बेइज्जती करती हैं.

आज की सास आधुनिक खयालात वाली और घरगृहस्थी को स्मार्ट तरीके से चलाने की कूवत रखती हैं. एक बहू को बेटी बना कर तराशने का काम सास ही करती हैं. जाहिर है, घरपरिवार को कुशलता से चलाने और उन्हें समझने के लिए आप की सास आप को अभी से तैयार कर रही हों.

बेहतर यही होगा कि आप एक बहू नहीं बेटी बन कर रहें. सास के साथ अधिक से अधिक समय रहें, साथ घूमने जाएं, शौपिंग करने जाएं. जब आप की सास को यकीन हो जाएगा कि अब आप घरगृहस्थी संभाल सकती हैं तो वे घर की चाबी आप को सौंप निश्चिंत हो जाएंगी.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

वर्कप्लेस को ऐसे बनाएं खास

पहला भाग पढ़ें- जौब से करेंगे प्यार तो सक्सेस मिलेगी बेशुमार

औफिस में काम करने के लिए जरूरी है कि हम अपने बर्ताव पर ध्यान देना चाहिए ताकि हमारी लाइफ स्मूदली चलती है. इसीलिए आज हम आपको कुछ टिप्स बताएंगे, जिसे आप औफिस में अपने मूड स्विंग्स को कंट्रोल करते हुए एक अच्छा वर्कप्लेस बनाएंगे. तो आइए जानते हैं वर्क स्पेस से जुड़ी बातें…

1. सबसे पहले पसंदीदा काम करें

सुबह की शुरुआत 15 मिनट पहले करें. इस समय का इस्तेमाल उन कामों के लिए करें जो आप को ऊर्जावान बनाते हों. सुबह की शुरुआत सही होगी, तो पूरा दिन अच्छा गुजरेगा.

2. नापसंद काम लंच से पहले करें

कई काम पसंद तो नहीं होते, लेकिन उन्हें करना आप की जिम्मेदारी होती है. जैसे, किसी चिड़चिड़े ग्राहक से बात करना, किसी घिसीपिटी, असफल फाइल पर पत्राचार करना या उलझा हुआ हिसाबकिताब फिर से जांचना आदि. इन कामों को लंच से पहले कर डालें, ताकि लंच करने के बाद आप फ्रैश मूड में काम कर सकें.

 3. किसी के लिए अच्छा करें

दिन का ऐसा समय चुनें जब आप सब से ज्यादा थके हुए या नाखुश हों. इस समय औफिस में किसी कलीग की बिना अपेक्षा के मदद करें. इस का पौजिटिव असर होगा. मदद करने से जीवन में खुशियां आती हैं, साथ ही उन में आप के प्रति अच्छी भावना भी आएगी.

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4. कृतज्ञता जताना सीखें

आप को जो काम करने का मौका मिला है, उस के लिए धन्यवाद कहें. किसी भी काम को इस तरह से पूरा करें कि वह आप को अपने मकसद के थोड़ा और करीब ले जाए. खुद को मिली आजादी और मौके के लिए कृतज्ञ रहें. आप गौर करें कि आभार जताते समय दुखी नहीं रहा जा सकता. जीवन को महसूस करने की कोशिश करें.

वर्कप्लेस पर खुशियां ढूंढ़ें ताकि आप खुश रहें. बौस के गलत व्यवहार और विफलताओं को भुला कर आगे बढ़ें. नैगेटिव खयाल आप को कुछ नहीं देते. आप को जिन कार्यों की जिम्मेदारी दी गई है उन्हें खुशीखुशी पूरा करें.

रिश्ते पर भारी न पड़ जाएं राजनीतिक मतभेद

हम अक्सर राजनीतिक मुद्दे पर लोगों को वादविवाद करते देखते हैं. लेकिन कई बार ये विवाद झगड़े का रूप भी ले लेते हैं. रिश्ते कितने भी अच्छे क्यों न हों जब सोच अलग होती है तो उन में दरार आ ही जाती है.

ऐसा ही कुछ हुआ सपना और नीलम के बीच. नीलम पढ़ने में तेज है, सामाजिक भी है, पारिवारिक भी है, लेकिन अकसर जब वह अपने दोस्तों के साथ होती है और वादविवाद के दौरान राजनीतिक मुद्दे आ जाते हैं तो वह बहुत अग्रैसिव हो जाती है. चेहरा लाल हो जाता है. कभीकभी तो गुस्से में कांपने भी लगती है.

कुछ दिनों पहले की बात है. नीलम और सपना अपने बाकी दोस्तों के साथ कालेज की कैंटीन में बैठे थे. चाय पीतेपीते सब की नजर कैंटीन में लगे टीवी पर थी. तभी किसी एक राजनीतिक दल का प्रचार आने लगा. नीलम ने प्रचार देखते ही कहा, ‘‘देखना, इस बार इसी की सरकार बनेगी. सही माने में ऐसा नेता ही देश का सिपाही है.’’

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नीलम की इस बात से सपना सहमत नहीं थी. वह अपनी राय देते हुए बोली, ‘‘किसी खास नेता का पक्ष करना एक व्यक्तिगत मामला है. तुम्हें यह पसंद होगा मुझे नहीं.’’

इस पर नीलम का मुंह बन गया. उस ने चाय के कप को सपना की तरफ गुस्से में पटकते हुए कहा, ‘‘क्यों इस में क्या खराबी है?’’

तभी वहां बाकी दोस्तों ने भी इस राजनीतिक दल और इस के विचारों का विरोध किया. नीलम अकेले उस के पक्ष में थी. सपना और बाकी दोस्त उस दल की खामियां निकालने में लगे हुए थे. ऐसे में नीलम खुद को बहुत अकेला महसूस करने लगी. फिर वह गुस्से में पैर पटकती हुई वहां से चली गई.

नीलम और सपना आसपास ही रहती थीं. इसलिए दोनों कालेज भी एकसाथ आयाजाया करती थीं. लेकिन उस दिन नीलम बिना बताए ही कालेज से निकल गई. सपना ने जब उसे फोन कर के पूछा कि कहां है तो नीलम ने अनमने ढंग से कहा, ‘‘मेरी तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए मैं जल्दी घर आ गई.’’

सपना यह सुन कर उस का हाल जानने के लिए कालेज से सीधे नीलम के घर चली गई. वहां उस ने नीलम को अपने भाई के साथ छत पर बैडमिंटन खेलते पाया. उसे देख कर ऐसा लगा ही नहीं कि उस की तबीयत खराब है. सपना ने नीलम से बात करने की कोशिश की तो नीलम उसे नजरअंदाज करते हुए चली गई.

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कुछ दिनों तक सपना ने भी नीलम से बात नहीं की. एक दिन कालेज में डिबेट प्रतियोगिता आयोजित की गई. इस में छात्रों को किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में बोलना था. इस प्रतियोगिता में सपना और नीलम ने भी भाग लिया. नीलम को ऐसे दल का नाम दिया गया जिस के पक्ष में सपना थी.

पहले बारी सपना ने किसी राजनीतिक दल की तारीफों के पुल बांध दिए. लेकिन जब नीलम की बारी आई तो उस ने शुरुआत ही ऐसे की जैसे मानो किसी ने उस के घर वालों को कुछ उलटा बोल दिया हो. दरअसल, नीलम कैंटीन की बात को भूली नहीं थी, इसलिए इस डिबेट के सहारे वह अपने दोस्तों को जवाब दे रही थी. प्रतियोगिता तो वह जीत गई, लेकिन इस राजनीतिक मतभेद के बाद अपने दोस्तों से दूर हो गई.

आमतौर पर बसों में, ट्रेनों में अथवा किसी सार्वजनिक जगह पर हम अकसर लोगों को राजनीतिक मुद्दे पर बात करते हुए देखते हैं. सार्वजनिक जगहों पर जब ऐसे मुद्दे उठाए जाते हैं तो यह लड़ाई की खास वजह बनती है. कोई जरूरी नहीं है कि वहां एकमत राय रखने वाले लोग हों.

चुनावी शोर

चुनावी समय शुरू होने से पहले ही लोग अलगअलग समूहों में दिखने लग जाते हैं. कल तक जो एकसाथ बैठ कर चाय पीते थे वे अलगअलग राजनीति दलों के सहायक बन कर एकदूसरे से लड़ने पर उतारू हो जाते हैं जैसे कोई इन की संपत्ति हड़पने की कोशिश कर रहा हो.

राजनीतिक मुद्दे पर अपनी बात रखना, अपनी राय देना हर किसी का अधिकार है, लेकिन इन मुद्दों की आड़ में लोग एकदूसरे से झगड़ने लग जाते हैं. एक  तरफ यह देख कर अच्छा लगता है कि देश की जनता इन मुद्दों पर आपस में वादविवाद करती है, लेकिन सोचिए अगर यही मुद्दे दुश्मनी की वजह बन जाएं तो?

दिल्ली मैट्रो में या तो लोग मौन व्रत रखे नजर आते हैं या फिर मोबाइल में खोए नजर आते हैं. लेकिन बात जब राजनीतिक मुद्दों पर बहस करने की आती है तो 2 अनजान व्यक्ति कब दोस्त बन जाते हैं और 2 दोस्त कब अनजान बन जाते हैं, इस का पता ही नहीं चलता.

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सौरभ और उस का दोस्त अमित मंडीहाउस से नोएडा जाने के लिए मैट्रो में चढ़े. दोनों की पहले से ही किसी विषय पर बात हो रही थी, लेकिन धीरेधीरे दोनों की आवाज पूरी मैट्रो में गूंजने लगी. दरअसल, दोनों राजनीतिक मुद्दे पर बात कर रहे थे. दोनों एकदूसरे से तेज आवाज में बात कर रहे थे. साइड में बैठा एक युवक सौरभ का साथ देते हुए दूसरे राजनीतिक दल की बुराई करने लगा. धीरेधीरे 2-4 लोग और बोल उठे. ऐसे में दोनों दोस्तों के बीच तूतू, मैंमैं शुरू हो गई. यह देखते ही बाकी लोग शांत हो गए. कुछ लोगों ने दोनों को शांत करवाया. दोनों शांत तो हो गए, लेकिन जैसे ही मैट्रो से बाहर निकले दोनों का गुस्सा साफ नजर आ रहा था.

राजनीतिक मुद्दों पर वादविवाद हर कोई करता है. इन मुद्दों के कारण रिश्तों में खटास आ जाए तो यह सरासर मूर्खता है.

इस में कोई संदेह नहीं है कि वादविवाद से हमारी समझ बढ़ती है, बहुत कुछ नया मालूम होता है, सामान्य ज्ञान में सुधार होता है, आत्मविश्वास भी बढ़ता है, मगर जब आप ऐसे मुद्दों को उठाते हैं, उन पर विचारविमर्श करते हैं तो नकारात्मक रूप से नहीं, बल्कि एक समूह में रह कर भी इन मुद्दों पर बात की जा सकती है. लेकिन कुछ लोग ऐसा नहीं करते. कई बार ऐसे मामले हिंसक भी हो जाते हैं, जो बड़े हादसे का रूप ले लेते हैं.

बुरे वक्त में मदद के लिए आप के पास कोई नेता नहीं आएगा. आप का दोस्त ही आएगा. इसलिए रिश्ते सब से पहले हैं, राजनीतिक मुद्दों के कारण संबंध खराब न करें.

 रूठे सास-ससुर को मनाएं ऐसे

अमिता के सासससुर साथ रहते हुए भी उस से अजनबियों सा व्यवहार करते और अमिता की लाख कोशिशों के बाद भी नहीं मानते. दरअसल, होता यही है कि जब बात सासससुर के साथ बहू के रिश्ते की आती है, तो इस रिश्ते में थोड़ी मिठास तो थोड़ी खटास हो ही जाती है और परिवार की सब से मजबूत कड़ी सासससुर छोटीछोटी बात पर ही बहू से मुंह मोड़ लेते हैं.

ऐसे में अगर आप को यह समझ नहीं आता है कि किस तरह अपने रिश्तों के बीच जमी बर्फ को पिघलाया जाए ताकि घर का माहौल खुशनुमा बन जाए, तो यकीन मानिए सासससुर को मनाने के लिए त्योहारों का समय सब से बेहतरीन होता है. आप को कुछ ऐसे ही ट्रिक्स बता रहे हैं जो रूठे सासससुर के गुस्से को कम करने और उन्हें मनाने के काम आएंगे और उन के साथ आप की ट्यूनिंग एकदम परफैक्ट हो जाएगी:

1. पूरा वक्त दें

इस बात का एहसास करें कि रिश्तों को बनने में समय लगता है और सासससुर के साथ समय बिताएंगी, तो रिश्तों के बीच की दूरी कुछ समय में पट जाएगी. उन के साथ समय बिताने के लिए आप उन्हें टैक्नोलौजी से रूबरू करा सकती हैं. आप उन्हें कार चलाना सिखा सकती हैं, लेटैस्ट मोबाइल चलाना सिखा सकती हैं, ताकि वे भी समय के साथ स्मार्ट बन जाएं और उन का जब मन करे वे आप से बात कर पाएं.

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अगर आप उन के साथ समय बिताएंगी, तो अपने बौंड को और स्ट्रौंग कर पाएंगी. आप उन के साथ समय बिताने के लिए साथ में टीवी देख सकती हैं, औनलाइन गेम्स खेल सकती हैं, बागवानी कर सकती हैं, उन की क्रिएटिविटी को उजागर कर सकती हैं, पार्क जा सकती हैं या अगर आप जिम जाती हैं, तो उन्हें भी जिम जौइन करा सकती हैं ताकि आप के साथ वे भी फिट रहें.

2. क्या है पसंदनापसंद

शादी के बाद हर लड़की को पति के साथसाथ सासससुर की पसंद भी जाननी चाहिए. अगर उन्हें घूमना पसंद है, तो उन्हें फैमिली ट्रिप पर ले कर जाएं. वैसे भी फैमिली डे आउट रिश्तों को करीब लाते हैं और हम अपने प्रियजनों के शौक जान पाते हैं. साथ ही मन में पड़ चुकी गांठें, नाराजगी दूर कर एकदूसरे को सुनने का बेहतर मौका देती है आउटिंग. उन की मनपंसद डिश बना सकती हैं. कुछ बना नहीं सकतीं तो बाहर लंच या डिनर पर ले जा सकती हैं. या फिर औफिस से आते हुए ही उन के लिए उन का कुछ मनपसंद खाना ला सकती हैं. आप की इन कोशिशों को देख कर वे खुश हो जाएंगे.

3. खास दिन बनाएं यादगार

जन्मदिन, शादी की सालगिरह, मदर्सडे व फादर्सडे जैसे खास मौकों पर सरप्राइज गिफ्ट या पार्टी दे कर उन्हें स्पैशल फील करवा सकती हैं. सासससुर को शौपिंग पर ले जा सकती हैं और ससुर को शर्ट की जगह टीशर्ट दिलाएं, तो वहीं सास को सूट नहीं बल्कि जींस दिलाएं, उन्हें मौर्डन बनाएं, उन के मन की अनकही ख्वाहिशों को पूरा करें. आप चाहे तो सासससुर को यूनीसैक्स सैलून भी ले कर जा सकती हैं. वहां आप उन का अच्छा सा हेयरकट या हेयर स्पा या फिर मसाज करा सकती हैं.

इस के अलावा आप उन्हें मूवी दिखाएं या फिर गेम्स सैक्शन में ले जाएं, जहां जा कर वे खूब मजे करें. आप ये सब करेंगी तो आप के सासससुर को महसूस होगा कि आप उन्हें मांबाप का दर्जा देती हैं और उतना ही प्यार भी करती हैं.

4. सलाह लें

सब से पहले उन्हें अपना दोस्त बनाएं. उन से दोस्ती करें और घर में कोई भी फैसला लेने से पहले एक दोस्त की तरह उन से राय मांगें और उन की अनुमति अवश्य लें. ऐसा करने से उन्हें अच्छा फील होगा.

5. शेयरिंग में छिपी केयरिंग

शाम की चाय सासससुर के साथ पीएं और उन्हें दिखाएं कि आप उन की कितनी परवाह करती हैं. साथ ही उन से अपने दोस्तों या औफिस के कुछ फनी किस्से शेयर करें ताकि उन्हें एहसास हो कि आप उन की गैरमौजूदगी वाले पल भी उन से साझा करती हैं.

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6. शादी से पहले

शादी से पहले हर लड़की के मन में यह डर होता है कि उस की होने वाली सास कैसी होंगी? कहीं ससुरजी गुस्से वाले तो नहीं होंगे? भारतीय समाज में तो इन दोनों का दिल जीतना एक बहू के लिए किसी टास्क से कम नहीं है. ऐसे में कहा जाता है कि अगर शुरुआत अच्छी हो गई तो आधी जीत हो गई.

इसलिए जब भी शादी से पहले होने वाले सासससुर से मिलें तो उन्हें सम्मान दें और प्यार जताएं, उन की हौबी पूछें. इस तरह की बातें आप के सासससुर के सामने आप की अच्छी छवि बनाती हैं और यह दर्शाती हैं कि आप उन्हें बेहद पसंद करती हैं. अगर आप की सगाई हो गई है, तो आप उन से लंच पर मिलें. इतना ही नहीं अपने मंगेतर या बौयफ्रैंड से पूछें कि ऐसी कौन सी बातें हैं, जो उन के मातापिता को पसंद है या किन बातों से उन्हें खुशी मिलती है.

अगर आप शादी से पहले इन सब बातों पर ध्यान देंगी तो आप के सासससुर आप से कभी नहीं रूठेंगे, बल्कि वे आप के दोस्त बन जाएंगे.

रिलेशनशिप ऐक्सपर्ट डा. शिवानी से बातचीत पर आधारित

शादी में कितनी हो दखलंदाजी

शादी के लिए लड़का या लड़की पसंद करते समय उस के भाई और बहन की सलाह लेना भी जरूरी होने लगा है. शादी के बाद आपस में तालमेल बैठाना आसान हो जाए. हमउम्र होने के कारण इन के बीच दोस्ती जल्दी हो जाती है, यह सुखद जीवन के लिए बेहद जरूरी होने लगा है.

हरदोई जिले के रहने वाले प्रतीक ने एमबीए की पढ़ाई पूरी की. इस के बाद वह गुरुग्राम में नौकरी करने लगा. यहां उस के कई दोस्त बने, जिन में लड़के और लड़कियां दोनों ही थे. कई दोस्तों की लड़कियों के साथ दोस्ती प्यार और शादी में बदल गई. प्रतीक की अपने फ्रैंड सर्किल में ही  झारखंड की रहने वाले स्वाति से मुलाकात हुई. स्वाति ने खुद को मेकअप आर्टिस्ट के रूप में बताया था. देखने में वह साधारण रूपरंग की थी पर उस का स्टाइल और अंदाज ऐसा था कि उस की तारीफ करने लगता.

प्रतीक और स्वाति का परिचय दोस्तों की पार्टी में हुआ. इस के बाद मिलनेजुलने लगे. दोस्ती गहरी हो गई. कुछ माह की दोस्ती के बाद दोनों ने तय किया कि अब शादी कर लेनी चाहिए.

स्वाति और प्रतीक दोनों को ही एकदूसरे के परिवार के  लोगों का कुछ पता नहीं था. प्रतीक ने अपने परिवार के बारे में स्वाति को सारी जानकारी दी. स्वाति ने कुछकुछ बताया पर कभी किसी से परिचय कराने जैसा कोई काम नहीं किया. प्रतीक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करता है, यह बात स्वाति को पता थी. प्रतीक के दोस्तों से स्वाति ने उस की जौब की जानकारी भी कर रखी थी. प्रतीक केवल यह जानता था कि स्वाति किसी बड़े मेकअप ब्रैंड के साथ जुड़ कर अपना बिजनैस कर रही है.

दोनों ने जब शादी करने का फैसला किया तो दोनों के परिवार के कुछ करीबी लोग शादी में मिले. तब पता चला कि स्वाति साधारण से ब्यूटीपार्लर में काम करती है. उन का परिवार  झारखंड से मजदूरी करने दिल्ली आया था. स्वाति के 2 भाई और 1 बहन और भी हैं. परिवार का स्वाति के जीवन में कोई बड़ा दखल नहीं रहता है.

बदल गया है व्यवहार

दूसरी तरफ प्रतीक  गांव का रहने वाला जरूर था पर उस ने जो भी स्वाति को बताया था वह सब सही था. गांव में उस का परिवार खेती करता था. इस के बाद भी गांव में उस के परिवार का अपना अलग सामाजिक स्तर था. बेटे की बात को मानते हुए प्रतीक के घर वाले बेटे और बहू को ले कर अपने गांव गए ताकि वह गांव के लोगों को दिखा सकें कि उन के बेटे ने शादी कर ली है. गांव में स्वाति और प्रतीक को ज्यादा दिन नहीं रुकना था. प्रतीक यह तो सम झ गया था कि उस के परिवार की सोच और स्वाति की सोच में बहुत अंतर है. बावजूद इस के वह सोच रहा था कि 1 सप्ताह किसी तरह से अच्छी तरह गुजर जाए और वे वापस दिल्ली आ जाएं.

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शादी के बाद की दावत और दूसरे आयोजनों में ही स्वाति ने अपने व्यवहार से घरपरिवार और प्रतीक को काफी परेशान कर लिया. प्रतीक की बहनों के साथ भी उस का व्यवहार ठीक नहीं था. स्वाति यह सम झने को तैयार ही नहीं थी कि उस की शादी हो चुकी है. उसे पति और पति के परिवार के साथ अच्छी तरह व्यवहार कर के तालमेल बैठाना है.

पति ‘परिवार कल्याण’ नाम से संस्था चला रहीं इंदू सुभाष कहती है, ‘‘अब लड़कियों का व्यवहार पहले से अधिकबदल गया है. शादी की जिम्मेदारी को वे सम झने को तैयार ही नहीं होतीं. ऐसे में लड़की का पति के साथसाथ उस के परिवार खासकर पति की बहन और उन की मां या दूसरे करीबी संबंधियों से अच्छा व्यवहार नहीं रहता है.’’

दामाद से मुश्किल काम है बहू तलाश करना

बात केवल स्वाति और प्रतीक की ही नहीं है. ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो यह बताते हैं कि लड़कियों के व्यवहार में सहनशीलता पहले से कम होती जा रही है. अब वे पति के परिवार के साथ तालमेल बैठाने से बचती हैं. ऐसे में लड़कों के लिए लड़की की तलाश करना मुश्किल काम होने लगा है.

इंदू सुभाष बताती हैं, ‘‘आजकल प्रेम विवाह भी ऐसे होते हैं, जिन में मातापिता की सहमति होने लगी है. अब मातापिता भी प्रेम विवाह में अनावश्यक अड़ंगा नहीं लगाते हैं. इस बदलती सोच के बाद भी बहू घर के लोगों से तालमेल नहीं बैठाना चाहती. उसे पता होता है कि उस को पति के परिवार के साथ रहना है, तीजत्योहार मनाने हैं, बावजूद इस के तालमेल में कमी दिखती है. ऐसे मसलों से सब से खराब हालत लड़के की होती है. वह परिवार को भी नहीं  छोड़ पाता है और पत्नी को भी कुछ नहीं  कह पाता.’’

क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट आकांक्षा जैन कहती है, ‘‘मेरे पास ऐसे कई लड़के अपनी होने वाली पत्नी को ले कर भी आते हैं कि हम शादी के बाद परिवार के साथ तालमेल कैसे बैठाएंगे? हम कई बार ऐसे लोगों को सलाह देते हैं कि शादी के पहले अपनी होने वाली पत्नी को अपने घरपरिवार खासकर अपने भाईबहन से जरूर मिलवा देना चाहिए ताकि उन के बीच एक स्वाभाविक तालमेल बन सके.

भाईबहन आपस में हमउम्र होते हैं. ऐसे में उन के बीच तालमेल बनना आसान होता है. इस से फिर लड़की को भी अनजान घर में अकेलापन नहीं लगता. वह बेहतर तरीके से तालमेल बैठाने में सफल हो जाती है. शादी से पहले केवल पति को ही नहीं उस के भाईबहनों को भी आपस में व्यवहार बना लेना चाहिए. यह सही कदम होता है.’’

प्यारदुलार में पली लड़कियां

पिछले कुछ सालों में लड़कियों को ले कर घर, परिवार और समाज दोनों काफी उदार हो गए हैं. लड़कियों के साथ घरों में प्यारदुलार बढ़ गया है. लड़कियों को मिली आजादी ने उन के स्वभाव में काफी बदलाव भी किया है, जिस की वजह से वे बेटियां बन कर तो आसानी से रह लेती हैं पर जब उन्हें बहू बन कर ससुराल जाना पड़ता है और वहां कायदेकानून और दबाव में रहना पड़ता है तो उन के सामने परेशानियां पैदा होने लगती है. ऐसे में स्वाभाविक तरह से आपस में पहले दूरियां बढ़ती हैं बाद में  झगड़े बढ़ जाते हैं.

ससुराल में होने वाले पतिपत्नी के  झगड़ों का प्रभाव पतिपत्नी के साथसाथ पति के भाईबहनों और पेरैंट्स पर भी पड़ता है.

बाराबंकी जिले के रहने वाले विकास की शादी नेहा के साथ हुई थी. शादी के कुछ दिनों के बाद विकास कानपुर में नौकरी करने चला गया. नेहा उस के साथ जाना चाहती थी पर वह जा नहीं पाई. नेहा का ससुराल में  झगड़ा होने लगा. पहले कुछ दिनों तक मामला घर के अंदर ही रहा. फिर  झगड़े की जानकारी बाहरी लोगों को भी होने लगी. एक दिन नाराज हो कर नेहा अपनी मां के घर चली गई. वहां जा कर उस ने अपने ससुराल के लोगों को जेल भिजवाने की कोशिश शुरू की. नेहा सब से अधिक नाराज अपने देवर रमेश से थी. उस ने रमेश पर बलात्कार की कोशिश करने का मुकदमा कर दिया.

‘पति परिवार कल्याण’ नाम से संस्था चला रहीं इंदू सुभाष कहती है, ‘‘शादी से पहले लड़कियों की काउंसलिंग बहुत जरूरी होती है. पहले संयुक्त परिवार होते थे तो बहुत कुछ जानकारी और शिक्षा घर के बड़ेबूढ़े लोग दे देते. अब केवल मां होती है. नातेरिश्तेदार अब शादी के ही दिन आते हैं. ऐसे में वे बहुत कुछ सम झाने की हालत में नहीं होते हैं. कई जागरूक परिवार प्रीमैरिज काउंसलिंग कराते भी हैं, जिस का कई बार असर पड़ता है.’’

मैरिज काउंसलर सिद्धार्थ दुबे कहते हैं, ‘‘हर शादी को टूटने से भले ही न बचाया जा सकता हो पर 60 से 70% टूटने वाली शादियों में दोनों को अगर सही समय पर सम झाया जाए तो इन शादियों को कोर्ट और थाने जाने से पहले ही बचाया जा सकता है.’’

शादी करने से पहले यदि लड़का और लड़की दोनों के ही पेरैंट्स और भाईबहन एकदूसरे को सही जानसम झ लें तो शादी के बाद होने वाले  झगड़ों को रोका जा सकता है.

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महत्त्वपूर्ण होता है भाईबहनों का रोल

कई ऐसे उदाहरण हैं जहां भाईबहनों ने अपनी होने वाली भाभी या जीजा के साथ दोस्ताना संबंध पहले से ही बना लिए तो किसी को भी एकदूसरे से अजनबीपन महसूस नहीं होता है.

ज्योति की शादी राजकुमार के साथ तय हुई. उस ने अपने सभी सगेसंबंधियों से अच्छा व्यवहार बना लिया. शादी होने के बाद घर में ऐसा दोस्ताना माहौल बन गया कि उसे कभी इस बात का अनुभव ही नहीं हुआ कि वह अपना घर छोड़ कर पति के घर आई है. ज्योति की अपने देवर और ननद से दोस्तों की हंसीमजाक होता है. ज्योति बताती है कि हम ने कभी अपने भाईबहनों की कमी महसूस नहीं की.

ज्योति की ही तरह का अनुभव रीता का है. रीता सरकारी नौकरी करती है. ऐसे में उस की परेशानी यह होती थी कि उस के लिए घर के काम और वहां तालमेल बैठाना मुश्किल होता था. रीता ने अपने देवर और ननद से अच्छी दोस्ती कर ली. रीता दोनों की ही पढ़ाई, कैरियर और शौपिंग में सहयोग करने लगी. ऐसे में उन की आपस में अच्छी दोस्ती हो गई.

रीता कहती है कि पति के भाईबहन जब हमउम्र होते हैं तो उन के साथ आपस में तालमेल बैठाना आसान होता है. हमउम्र लोगों की मानसिक सोच एकजैसी होती है. एकदूसरे को सम झना अच्छा रहता है. मेरा मानना है कि भाई या बहन के जीवनसाथी का चुनाव करते समय घरपरिवार के लोगों के साथ दूल्हा और दुलहन के भाई और बहन का दखल होना भी जरूरी होता है. जब लड़का या लड़की की पसंद या नापसंद में इन का दखल होता है तो आपस में तालमेल बैठाना आसान हो जाता है.

पर्सनैलिटी ग्रूमिंग सफलता के लिए जरूरी 

नेहा देखने में बहुत ही सुंदर थी. लंबा कद, छरहरा सांचे में ढला बदन, बोलती आंखें और लंबेघनेकाले बाल देख कर कोई भी उस की तारीफ  करने से खुद को रोक नहीं पाता था. एमबीए करने के बाद जब वह अपनी पहली नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जा रही थी तो किसी को इस बात की उम्मीद नहीं थी कि उसे इंटरव्यू में फेल भी किया जा सकता है.

नेहा भी यह मान रही थी कि वह आज सफल हो कर ही लौटेगी. इंटरव्यू के दौरान जब नेहा से सवाल किए गए तो वह उन का सही तरह से जवाब भी दे रही थी, इंटरव्यू के दौरान ही नेहा की मुलाकात दीपा से हुई. वह भी देखने में नेहा जैसी ही थी पर पता नहीं क्यों नेहा को बारबार यह लग रहा था जैसे कि नेहा की जगह दीपा को ही इंटरव्यू में चुना जाएगा. नेहा का अंदाजा सही निकला, इंटरव्यू के बाद दीपा को ही कंपनी सैक्रेटरी के लिए चुना गया था.

नेहा के करीबी लोगों को जब इस बात का पता चला तो उन का कहना था कि इंटरव्यू के दौरान दीपा का पक्ष ले लिया गया होगा. इस के जवाब में नेहा ने कहा, ‘‘नहीं ऐसी बात नहीं है. दीपा में आत्मविश्वास साफतौर पर  झलक रहा था जबकि मैं उस का मुकाबला नहीं कर पा रही थी. मु झे उसी समय लग गया था कि दीपा मु झ से बाजी मार ले जाएगी.’’

नेहा ने इस के बाद कैरियर कांउसलर दिशा संधू से मुलाकात की और अपनी पूरी बात बताई. दिशा संधू ने नेहा को बताया कि उस की पर्सनैलिटी तो बहुत अच्छी है. बस, इस को थोड़ी सी ग्रूमिंग की जरूरत है. इस के लिए उन्होंने कुछ टिप्स नेहा को बताए. इस के बाद नेहा की पर्सनैलिटी में बहुत सुधार हुआ और नेहा का अगले इंटरव्यू में चयन हो गया. पर्सनैलिटी ग्रूमिंग के टिप्स कम आकर्षक लोगों के लिए भी बहुत काम के साबित होते हैं.

व्यक्तित्व निखारने का जरिया

हर व्यक्ति में कुछ न कुछ खासीयत जरूर होती है. जरूरत इस बात की होती है कि पर्सनैलिटी की इस खासीयत को उभार दिया जाए जिस से व्यक्ति की दूसरी कमियां छिप जाएं. बहुत सारे लोगों को यही लगता है कि अच्छा मेकअप, अच्छे कपड़े और गोराचिट्टा रंग ही अच्छी पर्सनैलिटी के लिए जरूरी होता है. बहुत सारे ऐसे लोग भी होते हैं जो बहुत ही साधरण दिखते हैं पर दूसरे मन में कहीं दूर तक अपनी पर्सनैलिटी की छाप छोड़ जाते हैं.

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उदाहरण के लिए अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री कोडोंलिसा राइस को देखें तो उन की पर्सनैलिटी हर किसी पर अपना रंग जमा जाती है. बहुत सारे खूबसूरत लोगों को उन की पर्सनैलिटी के सामने  झुकना पड़ जाता है. अपने देश में भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं. कई बड़ी कंपनी के सीईओ के रूप में काम कर रहे लोगों को देख कर लगता है कि उन की पर्सनैलिटी कितनी मोहक है.

पर्सनैलिटी का मोहक रूप काम के हिसाब से होता है. पर्सनैलिटी गू्रमिंग की कक्षाएं चलाने वाली दिशा संधू कहती हैं, ‘‘आप जिस प्रोफैशन में हों उस के हिसाब से ही कपडे़ पहनें और मेकअप करें. आप की बातचीत का तरीका भी इतना आकार्षक हो कि एक बार बात करने वाला आप से बारबार बात करने के लिए प्रयासरत रहे. पर्सनैलिटी का असर सब से ज्यादा पड़ता है. इसलिए सब से पहले पर्सनैलिटी को निखारने की जरूरत होती है. पर्सनैलिटी ग्रूमिंग के बढ़ते हुए महत्त्व को देखते हुए यह एक बडे़ कारोबार की तरह हो गया है. प्राइवेट और ग्लैमर से भरपूर नौकरियों के जमाने में पर्सनैलिटी ग्रूमिंग बहुत ही जरूरी हो गई है. अच्छी पर्सनैलिटी के न होने से नौकरी में तरक्की के रास्ते भी कम हो जाते हैं. ज्यादातर नौकरियों में दूसरे को अपनी बातचीत के अदांज से प्रभावित करना होता है. इसलिए यह एक जरूरत बन गई है.’’

जरूरी है ड्रैस सैंस

फैशन डिजाइनर नेहा दीप्ति का कहना है, ‘‘पर्सनैलिटी ग्रूमिंग का सब से खास हिस्सा ड्रैस सैंस का होता है. आप की ड्रैस सैंस जितनी अच्छी होगी, सामने वाले पर उस का प्रभाव ज्यादा पडे़गा. अच्छी ड्रैस के लिए यह जानना जरूरी होता है कि किस मौके पर कैसी ड्रैस पहनी जाए. पार्टी में जाने और औफिस की मीटिंग में जाने की ड्रैस कभी एकजैसी नहीं हो सकती.

‘‘यह बात केवल महिलाओं के लिए ही लागू नहीं होती. पुरुषों पर भी यह लागू होती है. पार्टी में जा रहे हैं तो यह भी देखना पड़ता है कि पार्टी किस तरह की है. अगर आयोजन आप के घर का है तो आप की ड्रैस अलग होगी और जब आयोजन किसी दूसरे के घर पर हो तो ड्रैस अलग होनी चाहिए. हर उम्र में अलगअलग ड्रैस पर्सनैलिटी पर निखार लाती है. जिन लोगों को इस बात का खयाल नहीं होता, कभीकभी ‘बूढ़ी घोड़ी, लाल लगाम’ जैसे खिताब भी मिल जाते हैं. इसलिए अच्छी पर्सनैलिटी के लिए अच्छी ड्रैस सैंस बहुत जरूरी होती है.’’

मेकअप हो सौम्य और सुंदर

ब्यूटी एक्सपर्ट पायल श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘पर्सनैलिटी गू्रमिंग में मेकअप का भी बड़ा महत्त्व होता है. इसलिए मेकअप करने से पहले यह जान लें कि आप किस जगह पर जा रहे हैं. अगर पार्टी में जाना है तो आप का मेकअप कलरफुल होना चाहिए. औफिस में मेकअप अलग किस्म का होता है. बहुत ज्यादा भड़काऊ मेकअप औफिस में आप को सुंदर नहीं बनाता है. औफिस में भड़काऊ मेकअप करने वालों का अच्छा असर नहीं पड़ता है. कपड़ों की ही तरह मेकअप भी उम्र के हिसाब से किया जाता है. सौम्य मेकअप आप को ज्यादा आकर्षक बनाता है. आप जिस पद पर काम कर रहे हैं, मेकअप उस के हिसाब से भी होना चाहिए.’’

बौडी लैंग्वेज निखारे पर्सनैलिटी ग्रूमिंग

पर्सनैलिटी ग्रूमिंग की जानकारी देने वाली दिशा संधू का मानना है, ‘‘हर शरीर की अपनी एक लैंग्वेज होती है जिस को बौडी लैंग्वेज कहा जाता है.’’ सुनीता को बात करतेकरते हाथ  झटकने की आदत थी. उस को अपनी इस आदत के चलते कई बार पार्टी में हास्यास्पद हालत का सामना करना पड़ जाता था. उन के पति दीपक को यह बात सम झ आई तो उन्होंने सुनीता की इस आदत को छुड़वाने में मदद की.

स्नेहा एक बडे़ बैंक में अफसर के रूप में काम करती थी. उस में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी. पर कभीकभी तनाव में आने पर वह अपने हाथ के नाखून मुंह में डाल कर कुतरना शुरू कर देती थी. बहुत मुश्किल के बाद उस की यह आदत छूट सकी.

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इस तरह की गलत बातें आप की बौडी लैंग्वेज को खराब कर देती हैं. चलनेफिरने, उठनेबैठने, खड़े होने, टैलीफोन पर बात करने का भी अपना एक तरीका होता है, जो बौडी लैंग्वेज का अहम हिस्सा होता है. इस को निखारे बिना पर्सनैलिटी ग्रूमिंग मुश्किल हो जाती है. बातचीत में शिष्टाचार भी पर्सनैलिटी ग्रूमिंग को बढ़ाता है. अच्छी तरह से बात करने वाले लोग दूसरों को ज्यादा प्रभावित कर लेते हैं.

नकारात्मक विचारों को कहें बाय

अमेरिकी लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर जिम रौन ने कहा है कि आप वास्तव में जो चाहते हैं, आप का मस्तिष्क खुद ही आप को उस ओर खींच लेता है. इसलिए नकारात्मकता के अंधेरे से आप सकारात्मकता के उजाले में आसानी से आ सकते हैं. बस, आप को अपने मस्तिष्क में बने दृष्टिकोण और उस की शब्दावली में थोड़ा हेरफेर करना होगा. आइए जानें कैसे करें :

नैगेटिव थिंकिंग वाले लोगों से रहें दूर

कुछ लोग इतने नैगेटिव होते हैं कि उन के साथ रह कर पौजिटिव सोच वाला व्यक्ति भी बदलने लगता है. ऐसे लोग हर समय नकारात्मक माहौल बनाए रखते हैं, ऐसे लोगों से बचें, क्योंकि उन के साथ रह कर जीवन में कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि अन्य लोग भी आप से दूरी बनाने लगेंगे.

बहाने बनाने से बचें

जो भी काम आप ने अपने हाथ में लिया है, उसे समय पर पूरा करें. आलस में आ कर उसे न करने के बहाने मारने से नुकसान आप का ही होगा, अगर एक बार आप ने बहाना छोड़ कर यह काम कर लिया तो आप को कभी जिंदगी में इस तरह के नकारात्मक विचार तंग नहीं करेंगे.

तुलना न करें

अगर आप के किसी दोस्त को किसी कंपीटिशन ऐग्जाम में सफलता मिली है तो उस की तुलना खुद से कर रोना न रोएं कि आप को इतने प्रयासों के बाद भी सफलता नहीं मिली. ऐसा करना बेवकूफी है बल्कि ऐसे में आप को चाहिए कि दोस्त की खुशी में शामिल हों और उस से सलाह लें कि सफलता के लिए उस ने क्या किया और अपनी कमियों को ढूंढ़ कर दूर करने का प्रयास करें.

सफलताअसफलता एक सिक्के के 2 पहलू हैं

इस बात को हमेशा ध्यान रखें कि यदि आप सफल नहीं होते और डिप्रैशन में जा कर सब से बोलचाल बंद कर खुद को अलगथलग कर लेते हैं, तो यह कोई हल नहीं है. अगर असफलता मिली है तो उस से सीख कर आगे बढ़ते हुए ही कामयाबी के शिखर पर पहुंचेंगे.

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म्यूजिक सुनें

जब भी आप तनाव या नकारात्मकता से घिरे हुए हों तो इस सिचुएशन से खुद को बाहर निकालने के लिए संगीत का सहारा लें. इस से आप का तनमन दोनों प्रसन्न होंगे और आप परेशानी को भूल कर आगे बढ़ पाएंगे.

खुद को प्रोत्साहित करें

जब भी आप को लगे कि आप विफल होने लगे हैं तो खुद को समझाने का प्रयास करें और कहें कि हमें नहीं हारना. जब आप खुद से इस तरह की बातें करेंगे तो निराशा कम होगी और हिम्मत मिलेगी जो आगे बढ़ने की प्रेरणा देगी.

आज में जीएं

वर्तमान में रहने की कोशिश करें. जो बीत गया है उस के बारे में विचार कर दुखी न हों और जो होने वाला है उस की सोच में डूबने के बजाय जो आज है उसे ऐंजौय करें.

खुश रहें

आज क्या अच्छा हुआ है उस पर विचार करें. यह कुछ भी हो सकता है सुबह नाश्ते का स्वादिष्ठ परांठा, किसी दोस्त की फोन कौल या फिर रास्ते में देखा कोई सुंदर बच्चा. इस से तनाव कम होगा और आप अच्छे काम के लिए प्रेरित होंगे. आप दूसरों को खुशी तभी दे पाएंगे जब आप खुद खुश रहें. इसलिए अपने मन को प्रसन्नचित्त रखें. जिन कामों को करने में आप को खुशी महसूस होती है. उन के लिए वक्त निकालें.

शराब न पीएं

शराब नकारात्मक विचारों को जन्म देती है और इस के इस्तेमाल से मनुष्य जानवरों की तरह बरताव करने लगता है. उस का अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं रहता. इसलिए शराब का सेवन न करें.

हंसने की आदत डालें

यह एक तरह की थेरैपी है. बिना किसी कारण के रोजाना 5-10 मिनट जोर से ठहाके लगा कर हंसें. इस से ब्लडप्रैशर कंट्रोल रहता है और विचारों में सकारात्मकता आती है. हंसने के लिए मौके न तलाशें. हर रोज ऐक्सरसाइज की तरह कुछ देर हंसने की आदत डालें.

बच्चों के साथ समय बिताएं

बच्चों के साथ खेलें, उन के साथ बातें करें, चीजों को उन के नजरिए से देखें, सुनें. तब आप को एहसास होगा कि दुनिया में कितना भोलापन है और आप का चीजों को देखने का नजरिया ही बदल जाएगा. बच्चों के साथ आप का जिस तरह से मन चाहे उस तरह से खेलें. लोग क्या कहेंगे इस बात की परवा न करें.

सहज रहना सीखें

दुखद परिस्थिति में भी सहज रहना सीखें. जटिल समय में उन लोगों के बारे में सोचें, जिन्होंने खुद को मुश्किल स्थितियों से बाहर निकाला. वर्तमान में आप क्या अच्छा कर सकते हैं. इस बारे में सोचें.

खुद के साथ समय बिताएं

सुबह पार्क में टहलें, छुट्टियों में घूमने जाएं, प्रकृति के बीच समय बिताएं, अपने फोटो खींचें, अपने लिए शौपिंग करें, अपना मनपसंद खाना खाने रैस्टोरैंट जाएं, फिल्म देखें. इस तरह खुद से प्यार करना भी जीवन में अच्छाई की ओर ले जाता है.

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नैगेटिविटी क्या है

–       दूसरों के कार्यों में हमेशा कमी निकालना.

–       अपने काम से संतुष्ट न होना. हमेशा काम में मन न लगने का रोना रोते रहना, लेकिन उसे अच्छा बनाने के लिए कोई खास प्रयास न करना.

–       छोटी सी बात पर हायतोबा मचाना और अपने साथ दूसरों को भी परेशान करना.

–       दूसरों को आगे बढ़ता और खुश देख कर जलन महसूस करना.

–      अपने से अमीर या संपन्न लोगों को देख कर खुद को हीन समझना.

–       खुद पर विश्वास न होना.

–       किसी भी काम को ट्राई करने से पहले ही उस का नतीजा सुना देना, ‘वह काम मुझ से नहीं होगा, मुझे नहीं आता,’ वगैरावगैरा.

नैगेटिव थिंकिंग को पौजिटिव थिंकिंग में कैसे बदलें

–       यदि किसी खास परिस्थिति को ले कर आप के मन में नकारात्मक विचार हैं और आप गुस्से में हैं तो कुछ देर शांत रहें और उस परिस्थिति को किसी दूसरे नजरिए से देखें. खुद ब खुद आप के मन में सकारात्मक विचार आ जाएंगे.

–       आज नियमित काम से कुछ अलग हट कर करें. वह आप की कोई हौबी या फिर ऐसा गुण भी हो सकता है जिसे आप भूल गए थे. ऐसा करने पर आप को खुद से प्यार होगा और लगेगा कि आप भी लीक से हट कर कुछ नया और अच्छा करने की काबिलीयत रखते हैं, इस से अपने प्रति आप का नजरिया पौजिटिव हो जाएगा.

–       यदि शारीरिक रूप से सौंदर्य के मामले में आप में कोई कमी है तो उसे सहज स्वीकार करें. अगर उस कमी के बारे आप हीनभावना के शिकार होते हैं तो ऐसे में उन्हें न देखें, जिन में कोई कमी नहीं है बल्कि ऐसे लोगों को देखें जिन में आप से भी ज्यादा कमी है और वे खुशहाल जीवन जी रहे हैं. ऐसे लोगों से प्रेरणा लें.

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–       किसी फैमिली फंक्शन में जाएं तो वहां कमियां न निकालें. ऐसा करने से खुद को रोकें और अच्छा देखने का प्रयास करें. वहां आप कमियां निकालने नहीं बल्कि ऐंजौय करने आए हैं.

–       नकारात्मकता से व्यक्ति गुस्सैल हो जाता है इसलिए किसी भी बात पर तुरंत रिऐक्ट करने से पहले एक बार अवश्य सोचें कि जो आप कहने जा रहे हैं वह सही है या आप के बेवजह के गुस्से का परिणाम है. जवाब आप को मिल जाएगा और उस के साथ आप का गुस्सा भी शांत हो जाएगा व पौजिटिव सोच भी आ जाएगी.

शादी किसी से भी करें, आपका हक है

दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में रहने वाले प्रतीक (29) ने जब अपने घर में सिया (25,बदला नाम) के बारे में बताया तो मानो घर में पहाड़ टूट पड़ा हो. सिया के बारे में सुनते ही प्रतीक के घरवाले खुद को दोतरफा चोट खाया हुआ महसूस करने लगे. एक, सिया उन के अपने राज्य उत्तराखंड से नहीं थी, वह यूपी से ताल्लुक रखती थी. दूसरी व बड़ी बात यह कि वह जाति से भी अलग थी. दरअसल प्रतीक और सिया काफी समय से एकदुसरे से प्रेम कर रहे थे. साथ में समय बिताते हुए दोनों के बीच आपसी अंडरस्टेंडिंग काफी अच्छी हो गई थी. दोनों ने शादी करने का फैसला किया. लेकिन उन दोनों के प्रेम सम्बन्ध और शादी के बंधन के बीच उन की जाति आड़े आ रही थी. जहां प्रतीक ऊंची जाति से था वहीँ सिया कथित नीची जाती से थी.

प्रतीक के घर में काफी हंगामा बरपा. शहरी रहनसहन होने के बावजूद जाति की खनक परिवार के कान में शोर मचा रही थी, यह वही खनक थी जिस में खुद की जातीय श्रेष्टता का झूठा गौरव ऊंचनीच के भेदभाव की नीव को सदियों से मजबूत कर रहीहै. प्रतीक के घर में शादी के लिए नानुकुर हुई. ऐसे में सगेसम्बन्धी कहां पीछे रहने वाले थे, उन्हें तो खासकर तुड़का मारना ही था. बात परिवार की इज्जत पर आ गई, ले देकर परिवार की सहमती बनी कि यह शादी हरगिज नहीं होनी चाहिए. कई बार प्रतीक के समझाने के बाद भी घर वाले नहीं मान रहे थे तो अंत में दोनों ने सहमती बनाई और कोर्ट मैरिज कर ली.फिलहाल वे परिवार से अलग अच्छी जिंदगी काट रहे हैं लेकिन उम्मीद इसी बात की करते हैं कि एक दिन प्रतीक के मातापिता सिया को बहु के तौर पर स्वीकार कर लेंगे.

जाति ने न जाने कितने रिश्तोंकी भेंट चढ़ा दी

यह तो शहरी मामला रहा जहां प्रतीक और सिया ने कानून का सहारा ले कर शादी रचाई और खुद की इच्छा का जीवनसाथी चुना. लेकिन क्या भारत में ऐसा हर जगह हो पाना आज भी संभव है? अगर बात गांव देहात की हो तो वहां ऐसा करना तो दूर, सोचना भी पाप माना जाता है. यदि ऐसा कोई मामला सामने आ जाए तो अगले दिन ‘औनर किलिंग’ की खबर देश की शोभा बढ़ाने में चार चांद लगाने को तैयार रहती है. भारत में जाति व्यवस्था सदियों से अस्तित्व में रही है जो न सिर्फ समाज में घृणा फैलाती रही है बल्कि कई लोगों के मौत का भी कारण बनी है. ऐसे में जातीय शुद्धता के चलते अंतरजातीय प्रेमी युगलों/विवाहितों को समाज द्वारा खास टारगेट किया जाता रहा है.

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हाल ही, अक्टूबर 2020 में कर्नाटका के रामनगरा जिला (मगदी तुलक) में औनर किल्लिंग की घटना घटी. बकौल पुलिस, एक पिता ने अपनी बेटी को इसी के चलते मार दिया कि उस की बेटी का किसी गैरजातीय लड़के के साथ प्रेम सम्बन्ध चल रहा था और दोनों शादी करने वाले थे. हैरानी की बात यह कि गांव वाले घटना की हकीकत जानने के बावजूद पुलिस के आगे मूक बने रहे. जाहिर है इस में उन की भी सामाजिक स्वीकृति रही. यही कारण है कि बहुत सी ऐसी घटनाएं सामने आ भी नहीं आ पाती. बहुत बार यदि प्रेमी युगल के परिवार बच्चों की ख़ुशी के लिए वाले शादी करने को तैयार भी हो जाएं तो गांव का खाप उन्हें ऐसा करने से रोक देता है, और दंडित करता है. एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014-17 के बीच भारत में कुल 300 औनर किलिंग की घटनाएं सामने आईं.देश में अधिकाधिक औनर किलिंग की शर्मशार कर देने वाली घटनाएं उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र से अधिक देखने को मिलती हैं.

गौत्र एक होना भी समस्या

भारत में दो प्रेमी जोड़ों की स्वैच्छा से शादी में रुकावट डालने का समाज के पास सिर्फ यही तंत्र नहीं है. ऐसा ही एक मामलाअमित और प्रिया के साथ हुआ. यहां समस्या उन की जाति नहीं, बल्कि,उन का एक गौत्र का होनाथा. हिन्दू धर्म में तीन गौत्र (खुद का, मां का और दादी व नानी का) में शादी करने को गलत माना जाता है. आमतौर पर माना जाता है कि एक गौत्र होने पर गुणसूत्र एक से हो जाते हैं, फिर आगे समस्याएं पैदा हो जाती हैं. लेकिन अमित के लिए प्रिया से प्यार ना करने की यह दलील नाकाफी थी. प्रिया, अमित के ननिहाल गांव से थी, जहां अमित का अकसर आनाजाना रहता था. जाहिर है जहां,उठनाबैठना व बातचीत का सिलसिला चलता है वहां आपसी समझदारी भी बनने लगती है.

यही कारण है किअमित और प्रिया को आपस में प्रेम हुआ. वे एकदुसरे के करीब आए और शादी का फैसला भी किया. बात घर में पता चली तो इस रिश्ते का पुरजोर विरोध हुआ. उन के घर वालों ने एक गौत्र होने की अड़चन खड़ी कर दी और एकदुसरे से न मिलने का फरमान जारी कर दिया. यहां बात गांव की थी,स्थानीय समाज भी उन दोनों के खिलाफ खड़ा हो गया. जिस का अंत यह हुआ कि जौरजबरन आननफानन में प्रिया की शादी ऐसे व्यक्ति से कर दी गई जो उस के लिए बिलकुल अजनबी था, जिस के प्रति उस की चाहत शून्य थी.

भाषा और संस्कृति का झमेला

भारत में ऐसे कई मामले सामने आते हैं जहां प्रेमी युगलों को समाजिक दबाव के चलते अपनी इच्छाओं की आहुति देनी पड़ती है. यह न सिर्फ जाति या गौत्र के चलते होता है बल्कि ऐसे हीकुछ मामले तब भी देखने को मिलते हैं जब दो परिवारों के रहनसहन, भाषा और संस्कृति में अंतर होता है. यह दुर्भाग्य है कि भारत में शादी दो व्यक्तियों का आपसी मसला नहीं बल्कि दो परिवारों और उन के सगेसंबंधियों का आपसी मसला बन जाता है.

यहां राज्यों के भीतर ही भाषा और संस्कृति में कई तरह की विविधताएं देखने को मिल जातीहैं तो फिरदूसरे राज्य की विविधता की तो बात ही अलग है. यही कारण है कि जब हिमाचल प्रदेश के विक्रम ने अपनी प्रेमिका आभा के बारे में घर वालों को बताया तो परिवार में सरसरी सी दोड़ पड़ी है. कारण यह कि आभा बंगाल से है, जबकि विक्रम का परिवार उस की शादी हिमाचल से कराना चाहते हैं. दरअसल 8 साल पहले आभा और विक्रम की मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपसराम लाल कालेज में साथ पढ़ते हुए हुई थी. दोनों को आपस में खास लगाव हो गया, तो उसी समय दोनों ने अंत तक साथ रहने का विचार भी मजबूत कर लिया. इस बीच दोनों ने खुद के करियर को मजबूत किया. जिस के चलते उन्होंने परिवार से बात करने की हिम्मत जुटाई थी.

विक्रम के घरवालों का फिलहाल यही मानना है कि दोनों परिवारों की भाषा, संस्कृति और रहनसहन में काफी अंतर है वे आपस में मेल नहीं खा पाएंगे. ऊपर से डर है कि बंगाल के लोग चंटचालाक होते हैं. वह (आभा) विक्रम को अपने वश में कर लेगी.

जाहिर सी बात है जब दो व्यस्क लोग आपस में शादी के लिए पूरी तरह तैयार हैं तो उस स्थिति मेंबाकी लोगों को शादी कराने की पोसिब्लिटी की तरफ बढ़ना चाहिए ना कि रोकने की.ऐसे में उचित यही होता कि विक्रम के मातापिता देखें कि विक्रम को आभा के साथ जीवन बिताना है ऐसे में उस की पसंद प्राथमिक होनी चाहिए. दूसरा, अगर संस्कृति आपस में मेल नहीं खा रही तो यह समस्या आभा के लिए ज्यादा होनी चाहिए जिसे अपना घर छोड़ कर ससुराल आना है, ऐसे में अगर वह तैयार है तो उन्हें भी एक कदम आगे की तरफ बढ़ाना चाहिए. बाकी किसी के गलत और सही को ऐसे जज तो बिलकुल भी नहीं किया जा सकता.

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अंतरधार्मिक विवाह बड़ा बवाल

मौजूदा समय में जिस तरह सेसामाजिक और राजनीतिक हवा बह रही है वह प्रेम विवाहों पर तरहतरह से रोड़े अटकाए जाने को ले कर है, किन्तु इस हवा के सीधे रडार पर वे जौड़े आ रहे हैंजो धर्म के इतर जाकर अपनी प्यार की बुनियाद मजबूत कर रहे थे. भारत में अंतरधार्मिक विवाहों को समाज द्वारा सब से ज्यादा हिराकत भरी नजरों से देखा जाता रहा है. परिवार, रिश्तेदार औरसमाज द्वारा अंतरधार्मिक विवाहों का खुल कर विरोध किया जाता रहा है, बल्कि यहां तक कि इस पर तमाम भ्रमबना कर खौफ बनाया जाता है.ऐसे में इन प्रेम विवाहों को जहां सरकार को प्रोत्साहन देने की जरुरत थी व हर संभव मदद करने की जरूरत थी,वहां खुद भाजपा शासित सरकारें तथाकथित धर्मान्तरण विरोधी कानून के नाम पर इनप्रेम विवाहों पर अडचनें डालने में जुट गई हैं.जिस के बाद कई शादीशुदा जोड़ों को इस कानून के नाम पर उत्पीड़ित किया जा रहा है.

स्थिति यह है कि ऐसे प्रेमी व विवाहित जौड़ों को असामाजिक तत्वों द्वारा ढूंढ कर पीटा जा रहा है.इस में संविधान की कसम खाने वाले पुलिस भी पीछे नहीं है, वह लाठी के बल परइन जौड़ों को अलग व गिरफ्तार किया जा रहा है. उन के ऊपरझूटे मुकदमें दर्ज किए जा रहे हैं, वहीँ जबरन विवाहित महिला को उस के पिता की कस्टडी में भेजा जा रहा है. ऐसे में व्यस्क प्रेमी युगलों के पास न सिर्फ घरपरिवार, सगेसम्बन्धी और समाज को मनाने का चैलेंज है बल्कि इस के बाद सरकार के सामने यह साबित करना भी चैलेंज हो गया है कि प्यार और शादी उन की खुद की मर्जी से हुई है.

विवादित धर्मांतरण निषेध कानून के यूपी में पास होने के बाद से ही अलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष कई अंतरधार्मिक विवाह के मामले आने लगे हैं, जिस में ऐसा हीहालिया मामला अलाहाबाद हाई कोर्ट में सामने आया. झूठे आरोपों में फंसाए बालिगसिखा (21) और सलमान को पहले परिवार, नाते और समाज से लड़ना पड़ा. जब वे शादी करने में कामयाब हुए तो अब उन्हें सरकार से भी संघर्ष करना पड़ रहा है. 18 दिसंबर को जस्टिस पंकज नकवी और विवेक अग्रवाल की बेंच ने कहा कि, “शिखा अपने पति के साथ रहना चाहती है और वह आजाद है कि अपनी इच्छा अनुसार अपना जीवन जिए.” वहीँ इस सेपहले 7 दिसंबर को कोर्ट ने सिखा की जबरन पिता की कस्टडी में भेजे जाने की सिफारिश पर सीडब्ल्यूसी को कहा था कि बिना उस की इच्छा के सीडब्ल्यूसी द्वारा इसा किया गया.”

यह चीजें दिखाती हैं कि किस प्रकार से विवादित कानून की आड़ में अंतरधार्मिक वैवाहिक जौड़ों को परेशान किया जा रहा है.इस से पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी दोहराया कि, “अगर कोई वयस्क अपनी पसंद के अनुसार शादी करता है और धर्मपरिवर्तन कर अपने पिता के घर नहीं जाना चाहता है,तो मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता है.” अब स्थिति यह है कि इन सब फसादों के चलते कई प्रेमी जौड़े डर रहे हैं कि कि वे शादी के लिए आगे बढ़े या नहीं.

कानून क्या कहता है?

भारत में वयस्कों की शादी करने की न्यूनतम उम्र निर्धारित की गई है. जिस में पुरुष की 21 और महिला के लिए 18 साल है. ऐसे में दोनों स्वतंत्र हैं कि अपनी मर्जी से जिस से चाहे शादी कर सकते हैं. भारत में अधिकतर शादियां अलगअलग धार्मिक कानूनों और ‘पर्सनल लॉ’ बोर्ड के तहत होती हैं. इस के लिए शर्त यह कि दोनों का उसी धर्म का होना जरुरी है.नेशनल कौंसिल ओफ एप्लाइड इकनोमिक रिसर्च (एनसीएईआर) द्वारा 2014 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 5 प्रतिशत ही अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाह होते हैं, और 95 फीसदी अपनी जाति/समुदाय के भीतर होते हैं.

हिन्दू विवाह अधिनियम-1955, यह प्रावधान है कि हिन्दू, सिख, जैन, बोद्ध आपस मेंशादी कर सकते हैं. कुछ इसी प्रकार मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड-1937, भारतीय इसाई विवाह अधिनियम-1872, पारसी विवाह और निषेध अधिनियम-1936 है. जहां एक ही धर्म के लोग आपस में शादी कर सकते हैं,ऐसे में अगर किसी गैरधार्मिक व्यक्ति को इन नियम कानूनों के तहत शादी करनी हो तो उसे अपना धर्म बदलना ही पड़ता है.

ऐसे में भारत सरकार साल 1954 में विशेष विवाह अधिनियम-1954 ले कर आई. ताकि किसी भी पार्टी को धर्म बदलने की जरुरत ना पड़े.इस अधिनियम के तहत दोनों में से कोई भी पार्टी बिना धर्म परिवर्तन के एक वैध शादी कर सकती है. साफ़ है कि यह अधिनियम अनुच्छेद 21 के जीवन जीने का अधिकार के तहत अपना जीवनसाथी स्वयं चुनने की स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है.

किन्तु उस के बावजूद इस क़ानून की कुछ खामियां रहीं हैं, जिस के चलते इस प्रक्रिया से प्रेमी जौड़े को शादी करना पेचीदा महसूस होने लगता है. जाहिर है, इस में घरपरिवार की सहमती हो तब तो ठीक है (अलबत्ता बजरंग दल या युवा वाहिनी होहल्ला ना करे तो), लेकिन अगर वे असहमत हैं और नोटिस लगने के 30 दिन के भीतरऔब्जेक्ट करते हैं तो शादी में रुकावट पैदा किया जा सकता है.

यही कारण है कि इन पैचीदियों से बचने के लिए प्रेमी जोड़ा धार्मिक कानूनों में सरल प्रक्रिया के चलते धर्म परिवर्तन के लिए भी तैयार हो जाता है. ऐसे में धर्म प्रेमी युगलों के लिए बहुत बड़ा मसला है भी नहीं, जितना होवा कट्टरपंथी लगातार खड़ा कर रहे हैं. अब मुख्य मामला यह कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 संविधान के मौलिक अधिकार का एक हिस्सा है,जिस में यह स्पष्ट कहा गया है कि,“भारत में कानून द्वारा स्थापित किसी भी प्रक्रिया के आलावा कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को उसके जीवित रहने के अधिकार और निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकता है.”इस का अर्थ वह चाहे जिस से प्रेम करे, चाहे जिसे माने यह उस की निजी स्वतंत्रता और हक है. ऐसे में इन दिनों इन्ही वाक्यों को बारबार अलाहाबाद हाई कोर्ट सामने आ रहे फर्जी मुकदमों के खिलाफ कहते भी आ रहा है. फिर सवाल यह कि जब संविधान हामी भरता है तो ऐसी शादियों से समस्या किसे और क्यों है?

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मिक्स्ड कल्चर का खौफ

दुनिया के किसी भी कौने में समाज को अगर किसी चीज का डर सताता है तो वह कल्चर के मिक्सहोने का है.हजारों सालों से लोगों नेखुद को मानसिक दासता की बेड़ियों में बांध करडब्बों (बौक्सेक्स) में देखने की आदत डाल ली है. यह कब्बे धर्म के हैं, जाति के हैं, अमीरीगरीबी के हैं, नस्ल के हैं. यही कारण है कि थोड़े से सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाओं से भी यह समाज विचलित हो उठता है.ऐसे ही इस मानसिक दासता को चोट पहुंचाने का तीखा काम इसी प्रकार के प्रेम विवाह करते हैं, जहां लोगों के हजारों सालों से जमे अंधविश्वासों पर गहरी चोट पड़ती है. जाति और धर्म के बाहर जा कर शादी करना रूढ़ीवाद पर तीखा प्रहार करने के समान है. सिर्फ एक मामला और सब कुछ कोहरे की तरह साफ़ होने जैसा है.अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों के बाद होने वाले बच्चे मुसलमान, हिन्दू, ब्राह्मण, चमार नहीं बनते बल्कि वे इन्सान बनते हैं.

यही चीज समाज के अव्वल दुश्मन, रुढ़िवादी और धार्मिक कट्टरपंथी नहीं होने देना चाहते.उन्हें डर होता है अपनी विरासत चले जाने का. यह डर होता है की कहींउन के खिलाफ बगावत न उठ खड़ी हो जाए. वे ताकत को अपने हाथों में ही केन्द्रित रखना चाहते हैं. लोगों को बंटा हुआ देखना ही उन के राजपाट को मजबूत करता है. उन की तमाम राजनीति शुरुआत और अंत ही एकदुसरे के विभिन्नता को कुरेदने से होती है. यह लोग जानते हैं किइस प्रकार की शादियों से लोग धार्मिक अंधविश्वासों के बनाए भ्रम को मानने से इनकार करेंगे.मिक्स्ड कल्चर से पैदा हुए बच्चे कभी इन के धार्मिक और जातीय उकसावे में नहीं आएंगे. यही कारण है कि सत्ता में बैठे लोगों की अंत कोशिश यही रहती है कि जितना हो सके इन की भिन्नता को और भी गाढ़ा किया जाए.

आमतौर पर मिक्स्ड कल्चर के लोग समानता और मानव अधिकारों के पक्ष में अधिक उदार होते हैं. ऐसे में वे धर्म के पाखंडों के फरेब में आसानी से नहीं फंसते हैं. उन का ध्येय धर्म की सरखपाई से अधिक कर्म की कमाई पर होती है. जिस कारण इन कट्टरपंथियों को इस प्रकार के लोग खासा रास नहीं आते हैं, इसलिए इन की मूल कोशिश ही यही रहती है कि ऐसी स्थिति बनने से पहले इन पर रोक लगा दी जाए. किन्तु प्रेम को कोई रोक पाया है भला.इस तरह के लोग अपने घरपरिवारों में इस ही इसे रोक न सके तो समाज को क्या रोकेंगे.

तलाक के दर्द से उबरें कुछ इस तरह

तलाक का दर्द किसी को भी तोड़ सकता है भले ही वह साधारण मध्यमवर्गीय इंसान हो या सुपरस्टार. हाल ही में सैफ अली खान ने भी अपने तलाक का दर्द बयां किया था. 2004 में तलाक के बाद वे डिप्रेशन का शिकार हो गए थे. पत्नी अमृता ने सालों तक उन्हें बच्चों से दूर रखा था. बकौल सैफ तलाक दुनिया की सब से बुरी चीज़ है. तलाक हर लिहाज से बुरा होता है. खास कर तब जब आप की फैमिली में बच्चे हों. सैफ के मुताबिक कुछ चीजें कभी ठीक नहीं हो सकतीं हैं. तलाक और उस के बाद का समय उन के जीवन का काफी बुरा दौर था. उस दौरान वे मानसिक रूप से बहुत परेशान रहे थे .

इसी तरह कुछ समय पहले बिग बॉस 13 की कंटेस्‍टेंट रही रश्मि देसाई जो टीवी इंडस्‍ट्री का बड़ा नाम हैं ने भी तलाक के दर्द को बयां किया था. उन्होंने स्वीकारा कि पति नंदीश संधू के साथ तलाक के दौरान वह डिप्रेशन का शिकार हो गईं थीं. बकौल रश्मि वह समय उन के लिए बहुत तनावपूर्ण था. वह तलाक के लिए तैयार नहीं थी और अपने रिश्ते को बचाने की लाख कोशिशें भी की लेकिन नाकामयाब रहीं. परिस्थितियां और खराब होने लगीं और आखिरकार दोनों को रिश्ता खत्म करना पड़ा. ऐसी भी खबरें थीं कि नंदीश ने रश्मि देसाई संग मारपीट की थी. रश्मि और नंदीश को अलग हुए चार साल से ज्यादा समय हो चुका है.

भदौड़ (बरनाला) में रहने वाली नवदीप कौर की ससुराल में किसी बात को ले कर पति से लड़ाई हो गई थी. इस के बाद वह मायके आ गई और पुलिस को शिकायत की. बाद में पंचायत में समझौता हो गया. समझौते के अनुसार दो दिन बाद नवदीप को लेने उस के पति को आना था. लेकिन दो महीने बीत जाने के बाद भी वह नहीं आया बल्कि उस ने तलाक का नोटिस भेज दिया. इस से नवदीप गहरे डिप्रेशन में आ गई और कई दिनों तक बेहोश रही. उस का इलाज चलता रहा और इलाज के दौरान ही उस ने दम तोड़ दिया. पुलिस ने ससुराल पक्ष के 5 लोगों पर आत्महत्या के लिए मजबूर करने का केस दर्ज किया.

हरियाणा के अंबाला जिले में कर्ज में डूबने और पत्नी से तलाक होने पर 35 वर्षीय मनीष डिप्रेशन में आ गया. वह काफी परेशान रहने लगा और अंत में एक दिन घर की छत पर बने कमरे में पंखे से लटक कर उस ने अपनी जान दे दी.

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दरअसल तलाक इंसान को अंदर से तोड़ देता है. वह परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता खो बैठता है. खुद को बहुत अकेला और असहाय महसूस करने लगता है. ऐसे में कुछ लोग डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं तो कुछ खुद को दूसरों से काटने लगते हैं. वे घंटो अकेले बैठ कर यह सोचते रहते हैं कि उन के साथ ऐसा क्यों हो रहा है. जब जवाब नहीं मिलता तो वे इन सब का जिम्मेदार खुद को मानने लगते हैं. ऐसे में जिन लोगों को परिवार और दोस्तों का सपोर्ट मिलता है वे इस तकलीफ़ से उबर जाते हैं पर कुछ लोग अकेले पड़ जाते हैं और इस दर्द को सह नहीं पाते.

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है तलाक

तलाक से गुजरना बेहद चुनौतीपूर्ण है और अब एक नए अध्ययन से भी पता चलता है कि यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है. फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों का हाल ही में तलाक हुआ है वे अन्य लोगों की तुलना में कहीं अधिक मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रहे हैं.

अध्ययन के लिए तलाक लेने वाले 1,856 लोगों से उन की पृष्ठभूमि, स्वास्थ्य और तलाक से संबंधित तरहतरह के सवाल पूछे गए. इस अध्ययन से पता चला कि हाल में हुआ तलाक व्यक्ति के भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालता है और यह प्रभाव नकारात्मक होता है.

दरअसल तलाक एक लंबी प्रक्रिया है. कई देशों में यह प्रावधान भी है कि तलाक के लिए आवेदन करने से पहले पतिपत्नी को कुछ समय दिया जाता है ताकि हमेशा के लिए अलग होने से पहले वे अपने फैसले पर पुनर्विचार कर लें. इस की अवधि विभिन्न देशों में अलगअलग है. तलाक न केवल दो रिश्तों को तोड़ता है बल्कि तलाक लेने की प्रक्रिया के दौरान एकदूसरे पर जिस तरह आरोपों का दौर चलता है वह दो दिलों को भी तोड़ देता है. आप जिस जीवनसाथी को कभी दिल से चाहते थे वही जब रिश्ता खराब होने पर तलाक के समय आप पर कीचड़ उछाले या प्यार को शर्मिंदा करे तो इंसान अंदर से बुरी तरह टूट जाता है. तलाक के बाद इंसान के दिल और दिमाग की हालत कुछ ऐसी हो जाती है—-

अविश्वास – किसी के साथ रिश्ता टूटने का असर दिल के साथ दिमाग पर भी पड़ता है. व्यक्ति का जब अपने जीवनसाथी पर से विश्वास टूटता है तो फिर दोबारा किसी पर आसानी से विश्वास जम नहीं पाता. इंसान सब को संदेह की नजरों से देखने लगता है. उस का सामाजिक दायरा भी घटने लगता है. वह अपने चारों तरफ एक अनजान लकीर खींच लेता है.

आत्मसम्मान पर चोट – जब आप को प्यार और समर्पण के बदले अपमान और परायापन मिले, जिन की ख़ुशी के लिए अपनी परवाह नहीं की उन्ही के द्वारा जब आप के ऊपर तरहतरह के इल्जाम लगाए जाएं, कोर्ट कचहरी में आप के रिश्ते और प्यार का मजाक बनाया जाए, लांछन लगाए जाएं तो आप के आत्मसम्मान के परखच्चे उड़ जाते हैं. आप दिमागी तौर पर काफी टूट जाते हैं. वापस नार्मल होने में काफी समय लगता है. आप के अंदर नकारात्मकता आ जाती है.

धोखा खाने का अहसास – कई बार तलाक की वजह जीवनसाथी का एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर भी होता है. जीवनसाथी द्वारा धोखा दिया जाना इंसान के दिल में गहरा दर्द पैदा करता है. किसी और से शादी की इच्छा में इंसान अपने वर्तमान जीवनसाथी के फीलिंग्स की कद्र भी नहीं करता. ऐसे में तलाक के बाद भी धोखा दिए जाने का दर्द दिल से नहीं जाता और यह दर्द डिप्रेशन की वजह भी बन जाता है.

अपने प्यार का अपमान – जब आप अपने रिश्ते को 100 प्रतिशत देते हैं मगर बदले में आप को धोखा और अपमान मिलता है तो इंसान अंदर से टूट जाता है और यह टूटन हजारों बीमारियों की वजह बनता है. स्वस्थ रहने के लिए मन में एक उत्साह और प्यार का होना जरुरी है. मगर जब प्यार ही न बचे तो शरीर पर सीधा असर पड़ता ही है.

मानसिक संताप – दिल का गम इंसान को गहरा मानसिक संताप देता है. शादी सफल रहे तो इंसान हर तकलीफ हंसतेहंसते झेल लेता है मगर जब घर ही टूट जाए तो कोई खुद को खुश कैसे रख सकता है. इंसान को रहरह कर पुराने दिन याद आते हैं. वह तलाक की वजह समझने के लिए बारबार जिंदगी के तकलीफ भरे पन्नो को पलटता है जिस से मन का संताप गहरा होता जाता है. तलाक वैसे भी एक लंबी प्रक्रिया है और इस से संताप भी लंबे समय तक इंसान को घेरे रहता है और व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार होने लगता है.

अकेलापन – जीवनसाथी यानी जीवन भर का साथी. मगर जब यही साथ बीच में छूट जाए तो दिल में अकेलेपन का घाव पैदा होता है. जीवन में लोग तो बहुत होते हैं मगर सब की अपनी दुनिया होती है, अपनी प्राथमिकताएं होती हैं. शादी के बाद असली साथ जीवनसाथी का ही होता है और यह साथ छूट जाए तो अकेलेपन का दर्द इंसान की सेहत पर सीधा असर डालता है.

नकारात्मक सोच – तलाक के दौरान और उस के बाद न चाहते हुए भी इंसान के मन में नकारात्मकता भर जाती है. वह खुद को अजीब स्थिति में पाता है और इस की वजह उस का जीवनसाथी होता है. वह जीवनसाथी और तलाक की वजह बने लोगों के प्रति घृणा की भावना से भर उठता है. एक क्रोध और एक नफरत की आग इंसान को अंदर से जलाने लगती है और दिनोंदिन उस का स्वास्थ्य गिरने लगता है.

बच्चों पर असर

माता पिता के बीच हुए अलगाव का असर सब से ज्यादा उन के बच्चों पर ही होता है और कई बार यह प्रभाव बड़ा विध्वंसक होता है. छोटे बच्चों में मातापिता के प्रति खीज, गुस्सा और शक आने लगता है. छोटे बच्चों में भी एक डर समा जाता है. वे अपनी मां से चिपके रहना चाहते हैं. पीछेपीछे लगे रहना, चिपक कर सोना जैसी हरकतें करने लगते हैं जो पहले नहीं करते थे.

एक शोध में पाया गया है कि अपेक्षाकृत छोटे बच्चों की शिक्षा और उन की मानसिक स्थिति पर इस का अधिक असर पड़ता है. कनाडा के अल्बर्टा और मानितोबा विश्वविद्यालय की ओर से किए गए शोध में चेतावनी दी गई है कि दंपतियों को तलाक का निर्णय लेते समय अपने बच्चों की शिक्षा और उन के जीवन पर प्रभाव के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए.

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स्वास्थ्य पर भी बुरा असर

तलाक का असर आप के बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है. द प्रोसीडिंग ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस नाम की एक स्टडी के अनुसार शारीरिक स्वास्थ्य का बुरा असर बच्चों की युवावस्था पर भी पड़ सकता है. रिपोर्ट के अनुसार परिवार में अगर शुरुआत में झगड़े हो तो बच्चों के इम्यून सिस्टम पर भी इस का बुरा असर पड़ता है.

कई बार रिश्ते में कड़वाहट और तलाक की नौबत आने के बावजूद महिलाएं तलाक लेने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं और तलाक के बाद सहज नहीं रह पातीं क्योंकि हमारे देश में लड़की अगर तलाक ले ले तो इसे जीवन की बड़ी असफलता समझा जाता है. समाज तलाकशुदा होने के बाद महिला को शादीशुदा होने जितना सम्मान नहीं दे पाता. तलाक के बाद महिला मातापिता पर बोझ समझी जाती है. डिवोर्सी का टैग उस के नाम से जुड़ जाता है और तलाक के बाद दुख-परेशानियां खत्म हो जाएं ऐसा भी नहीं है. यही वजह है कि समाज के तानों से बचने के लिए महिलाएं अक्सर शादी में खुश न हो तो भी उसे निभाती जाती हैं और यदि मजबूरी में तलाक लेना ही पड़ा तो यह सोच कर मानसिक रूप से परेशान रहती हैं कि अब ज़माना क्या कहेगा.

रिश्तों में घुटन हो तो बेहतर है अलग हो जाना

समाज की सोच कर खुद को तकलीफ में रखना उचित नहीं. यदि किसी महिला को शादीशुदा जिंदगी में रोज अपमानित किया जा रहा हो, दहेज़ के लिए प्रताड़ित किया जा रहा हो, घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ रहा हो या पति बेवफाई कर रहा हो तो सब सहने के बजाय अच्छा है अलग हो जाना.
जरूरी है कि ऐसे में महिलाएं घुटघुट कर जीने के बजाए अपने जीवन के लिए कठोर फैसला लें. तलाक के बाद भी इस का जिम्मेदार खुद को नहीं समझें. तलाक का फैसला एक बहुत बड़ा फैसला होता है लेकिन उसे यह सोच कर स्वीकार करना चाहिए कि खराब रिश्ते में घुटने से अच्छा रिश्ता तोड़ कर खुली हवा में सांस लेना है.

तलाक लेने के बाद कुछ लोग डिप्रेशन में आ जाते हैं तो कुछ खुद को संभाल नहीं पाते. ऐसे में कोई और आप की मदद नहीं कर सकता. आप को खुद को मजबूत बनाना होगा और जीवन में आगे बढ़ने के नए रास्ते तलाशने होंगे कुछ इस तरह,

तलाक से लें ये सबक

1. अपने तलाक से आप सब से बड़ी सीख यह ले सकते हैं कि किसी एक इंसान के आप के जीवन में नहीं होने से दुनिया खत्म नहीं हो जाती.

2. जिंदगी में हमेशा अपना एक सर्कल बना कर रखना चाहिए जिस में सिर्फ ऐसे लोग हों जिन से बात कर के और जिन के साथ रह कर खुशी मिले. जिन का साथ सुख में भी हो और दुख में भी.

3. तलाक के बाद यह सबक लीजिए कि जिस रिश्ते से तकलीफ मिले उस से जुड़ी सारी यादों को मिटा देना चाहिए. अपने पार्टनर से जुड़ी हर याद जैसे शादी की फोटोग्राफ्स, वीडियो मेमोरी, डिजीटल मेमोरी, गिफ्ट्स आदि सबकुछ नष्ट कर दें.

4 . खुद को कोसना छोड़ दें. अपनी गलती मान लेना अच्छी बात है लेकिन दूसरे की गलती को नजरअंदाज कर के खुद को दोषी मानना गलत है. जो हुआ उसे स्वीकार करें और आगे बढ़ जाएं.

5 . खुद को हमेशा प्राथमिकता दें. अपने लिए हमेशा समय होना चाहिए. शादी के बाद लड़कियां खुद को बिल्कुल ही भूल जाते हैं पर यह गलत है. क्योंकि इस से आप का ही नुकसान होता है.

6 . तलाक के बाद भी खुश रहना नहीं छोड़ें. खुश रहना आप का हक है जिसे आप से कोई नहीं छीन सकता.

7 . चीजों और परिस्थितियों से भागना छोड़ दें. परिस्थितियों से भाग कर हम सिर्फ और सिर्फ अपना ही नुकसान करते हैं.

8 . सब से खास बात यह है कि तलाक को प्रतिष्ठा से जोड़ कर न देखें. खुद को छोड़ा हुआ मान कर हीनभावना कतई न पालें.

लाइफ को फिर से पटरी पर लाएं

करियर पर फोकस करें

अगर आप तलाक से पहले पूरी तरह अपने पार्टनर पर निर्भर थे तो अब समझ लें की आप के आत्मनिर्भर बनने का समय आ गया है. सब से पहले अपने करियर पर फोकस करें ताकि अपने खर्चे और अपनी जिम्मेदारियां खुद उठा सकें. आप के पास यह बेहतरीन मौका है खुद से कुछ करने का जो आप को पसंद हो.

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अपनों को पहचानें

जब बुरा वक्त आता ही तभी असली दोस्तों और अपनों की पहचान होती है. ऐसे समय में जब आप अकेले हैं और आप को इमोशनल सपॉर्ट की जरूरत है तो उन लोगों के साथ समय बिताएं जो सच में आप का भला चाहते हैं. इन के साथ बात कर आप को नए रास्ते दिखेंगे, आप का मनोबल बढ़ेगा और कठिन समय को पार कर आगे निकल जाने का हौसला मिलेगा.

बच्चों का रखें ध्यान

अगर आप के बच्चे हैं और तलाक के बाद वे आपके साथ रह रहे हैं तो जाहिर सी बात है अब आप को अकेले ही उन का ध्यान रखना है. इस का मतलब है कि आप की जिम्मेदारी अब और बढ़ जाएगी लेकिन इस वजह से परेशान और स्ट्रेस्ड होने की जरूरत नहीं. इस चैलेंज को स्वीकार करें और अच्छी तरह से निभाएं तभी आप के बच्चे आप को रोल मॉडल के तौर पर देखेंगे.

गुजरे कल को भूल जाएं और आज के लिए प्लान बनाएं.

अक्सर तलाक के बाद लोग मुड़ मुड़ कर अपना अतीत देखते हैं. पुरानी बातें याद करते हैं और दुखी होते हैं. उन लम्हों की यादों में गुम रहते हैं जब पार्टनर आप के बहुत करीब था या फिर वे लम्हे जब उस ने आप का दिल तोड़ा , बेइज्जती की. इन सब बातों से कुछ हासिल नहीं होता सिवा इस के कि आप कमजोर पड़ते हैं. कुछ लोग तो अपने एक्स पार्टनर का सोशल मीडिया पर या कहीं बाहर पीछा भी करते हैं. ऐसा कदापि न करें. बीते कल को भूल कर आज और आने वाले कल की प्लानिंग करें और खुद को मशगूल रखें. खाली न बैठें.

जीवन को फिर से मौका दें

कभीकभी जिंदगी आप को दूसरा मौका देती है. उस मौके को चूकें नहीं बल्कि हाथ बढ़ा कर अपना बना लें. तलाकशुदा होने का मतलब यह नहीं कि आप को अब हमेशा अकेला ही रहना होगा. यदि कोई शख्स आप की जिंदगी में आता है जिस के साथ आप फिर से हंसनेखिलखिलाने लगती हैं तो उसे हमेशा के लिए अपना बनाने की बात पर विचार जरूर करें.

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