लेखक- पूजा पाठक

क्षिप्रा के घर किट्टी पार्टी चल रही थी. अचानक घड़ी पर नजर पड़ते ही रागिनी उठ कर चल दी.

‘‘अरे अभी तो 5 ही बजे हैं, 6 बजे तक चली जाना,’’ क्षिप्रा ने उस का हाथ पकड़ कर चिरौरी की.

‘‘माफ करना. मुझे तो कल सुबह औफिस जाना है. अब तेरी तरह हाउसवाइफ तो हूं नहीं कि आराम की जिंदगी जी सकूं. मुझे तो घरबाहर दोनों देखना होता है,’’ रागिनी ने महीन ताना करते हुए कहा. अपनेपन से पकड़े गए हाथ की पकड़ ढीली हो गई. क्षिप्रा ने सामने कुछ नहीं कहा लेकिन इस एक व्यंग्य से दोनों सखियों की दोस्ती में एक अनकही दरार तो आ ही गई.

कई लोग व्यंग्य, फब्तियां कसने, ताना देने और किसी के मजे लेने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. पर वास्तव में इस के पीछे उन की जलन की भावना काम करती है. उक्त परिदृश्य में भी किट्टी पार्टी के दौरान क्षिप्रा के घर की साजसंभाल को ले कर हो रही तारीफ रागिनी आसानी से हजम नहीं कर पाई और न चाहते हुए भी उस के मुंह से क्षिप्रा को नीचा दिखाने वाली बात निकल गई, जिस ने पार्टी का माहौल तो बोझिल किया ही साथ ही 2 सखियों के बीच मनमुटाव को भी जन्म दे दिया.

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क्या है इस मानसिकता की वजह

आखिर ताना करने के पीछे किसी का क्या मंतव्य हो सकता है. दरअसल, जब आप किसी को सुपीरियर देखते हैं तो मन में एक स्वाभाविक जिज्ञासा उठती है कि आखिर वह हम से बेहतर कैसे? बस यहीं एक सकारात्मक विचार वाला व्यक्ति इस बात को प्रशंसात्मक रूप में ले कर सामने वाले की प्रशंसा करता है. उस के हुनर या प्रतिभा से सीखने की कोशिश करता है जबकि हीनभावना से ग्रसित इंसान उक्त व्यक्ति से ईर्ष्या, द्वेष व जलन की भावना रखने लगता है और अंतत: आसानी से दुराग्रह की चपेट में आ कर उसे नीचा दिखा कर दुखी करने की फिराक में लग जाता है.

इस किस्म के लोग वास्तव में बीमार मानसिकता के गुलाम होते हैं. उन्हें दूसरों की खूबसूरती, प्रतिभा, खुशी या सफलता रास नहीं आती. जब वे अपनी इस भावना पर अंकुश नहीं लगा पाते तब उन के मुंह से ताना निकल जाते हैं जो सामने वाले को अप्रत्यक्ष रूप से अपमानित करने के लिए होते हैं.

कभीकभी ये ताना किसी बदले की भावना के तहत किए जाते हैं या शायद अपनी खुन्नस निकालने के लिए भी. बहरहाल, ये वाक्य शब्दों को घुमाफिरा कर इस तरह से कहे जाते हैं ताकि साफसाफ उन पर कोई आरोप न आए और वक्त पड़ने पर वे यह कह कर अपना बचाव भी कर सकें कि मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. मेरा वह मतलब नहीं था.

बचने का रास्ता

आखिर ऐसा क्या करें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यानी उसे आईना भी दिखा दें और स्वयं भी दुखी न हों, आइए जानते हैं:

– इस बात को ज्यादा तरजीह न देते हुए उस वक्त यह सोच कर चुप्पी साध जाएं कि आप पर फब्तियां कसना उस की कमजोरी है. हां, बाद में सही वक्त देख कर उस के मन में अपने लिए बैठे मैल को दूर करने का प्रयास करें.

– उस की जो भी खूबी आप को भाती हो उस की दिल खोल कर तारीफ करें, ताकि वह स्वयं ही अपनी करनी पर शर्मिंदा हो कर आप के प्रति दोगुने सम्मान से भर उठे.

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– उसे साफ शब्दों में ऐसी कोई बात न कहने के लिए जरूर कहें. इस से वह सचेत हो जाएगा और किसी और से भी ऐसा व्यवहार करने से पहले कई बार सोचेगा.

तो यह फैसला व्यक्ति या परिस्थितियां देख कर आप को स्वयं लेना होगा कि किसी के द्वारा ताना किए जाने पर आप की क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए. सिर्फ इतना निश्चित करना पड़ेगा कि किसी के ताना पर आप अपना दिल न दुखाएं और न ही स्वयं बेवजह किसी पर कोई व्यक्तिगत आक्षेप या टिप्पणी करें.

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