दिल्ली के राजपथ को फिर नए सिरे से सजाया गया है और हजारों करोड़ खर्च कर दिए गए हैं. हालांकि सरकारी आंकड़ा 477 करोड़ का है पर लगता नहीं कि यह काम इतने में हुआ होगा. 1947 के बाद कांग्रेस सरकारों ने इस के सुंदर कामों को मैंटेन तो किया पर बहुत ज्यादा रद्दोबदल नहीं किया था. इस पार्क पर न मूर्तियां थीं, न स्मारक. इंदिरा गांधी ने 1971 के बाद अमर जवान ज्योति जरूर जोड़ी थी पर इस के अलावा यह वैसे का वैसा ही था.

अब हजारों करोड़ क्यों खर्च किए गए. जनता की कौन सी कहां मांग थी, ट्रैफिक कंट्रोल की कौन सी आफत आन पड़ी थी, कहीं स्पष्ट नहीं है. यह मनमानी केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की थी और उन के मंत्रियों ने पूरा किया. जीएसटी, आय कर और कंपनियां बेच कर आने वाले पैसे को लगा कर अपने नाम से जुड़ जाने वाला स्मारक बना दिया जाए इंडिया गेट के सादे पर आकर्षक लानों को.

लाल पत्थर से भरे नए राजपथ पर चारों और कर्तव्य नहीं पैसा बिखरा दिख रहा है. लग यही रहा है कि राजपथ जो सरकार का प्रतीक था, अब जनता के इस पर खर्च करने और देखभाल करने के कर्तव्य का पथ बन गया है.

दिल्ली के घुटन भरे इलाकों से आने वालों के राजपथ के लान दशकों से एक राहत थे जहां पेड़ों की छांवों में रात देर तक दरियां बिछा कर खाना खाया जा सकता था. अब इस पर जनता के कर्तव्य थोप दिए गए हैं कि आइसक्रीम नहीं खा सकते, लान पर चल नहीं सकते, पानी में पैर नहीं डाल सकते, पुलिस और प्राइवेट गार्ड व कैमरे पलपल की खबर रखेंगे.

अब इस का नक्शा ऐसा बन गया है कि बारबार प्रधानमंत्री के अपने घर से निकलते ही सुरक्षा के नाम पर रास्ते बंद हो जाएंगे. दिल्ली की ज्योग्राफी वैसे भी ऐसी है कि यह 2 तरफ की दिल्लयों को जोड़ती है और इतना करने पर भी रास्ते चौड़े नहीं हुए, बस स्टाप नहीं बने.

क्या उस देश की प्राथमिकता है यह जो गरीबी, बेरोजगारी से जूझ रहा है? कहने को हम विश्व की सब से बड़ी 5वीं अर्थव्यवस्था हैं पर वह इसलिए कि हम विश्व दूसरे नंबर के जनसंख्या वाले सिंगापुर, इंग्लैंड, अमेरिका, जापान की प्रति व्यक्ति आय 65,000 डौलर प्रति वर्ष के आसपास है हम 2000 डौलर को ले कर खुश हो रहे हैं. 1960 में हमारे बराबर के चीन व ङ्क्षसगापुर, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जैसे देश आज हम से कहीं आगे है प्रतिव्यक्ति आय में पर हमें दिखावटी चीजों की लगी है.

नरेंद्र मोदी से पहले यही काम अंग्रेजों ने किया था वायसरौय हाउस और राजपथ जो पहले ङ्क्षकग्स वे कहलाता था वे चारों और रजवाड़ों के मेगा महल बने थे जो सब हमारी गरीबी का माखौल उड़ाते थे. आज वही दोहराया जा रहा है. मूर्तियों पर खर्च हो रहा हैं. मंदिरों पर बेहताथा अरबों लगाए जा रहे हैं. देश को टुकड़े करने वाले नाटक आनंद मठ के गीत को गवाया जा रहा है. यह लोगों को सरकार के प्रति कर देने के कर्तव्य का याद दिलाने का काम है. 26 जनवरी को सेना सैल्यूट करेगी, 364 दिन जनता को नए बन रहे संसद भवन, प्रधानमंत्री भवन को सैल्यूट करने को कहा जाएगा, पुलिस व चौकीदारों की निगाहों में.

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