पूरी तरह आतंक की गिरफ्त में आ चुकी कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियों के चलते हालात कतई ऐसे नहीं हैं कि कोई सामान्य पर्यटक भी वहां जाए. लेकिन 29 जून से 7 अगस्त तक होने वाली अमरनाथ यात्रा में देशभर से लगभग 7 लाख श्रद्धालुओं के अमरनाथ पहुंचने के अनुमान ने जता दिया है कि धर्मांधता इन दिनों सिर चढ़ कर बोल रही है.

क्यों लाखों लोग धर्म के नाम पर मौत के मुंह में जानबूझ कर जा रहे हैं, इस सवाल का जवाब अब बेहद साफ है कि अमरनाथ यात्रा का उद्देश्य अब कुछकुछ बदल रहा है. कहने को तो यह कहा जाता है यहां शिव ने अपनी पत्नी पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था लेकिन

अब यहां मरण की आशंका ज्यादा है. अधिकांश श्रद्धालु अब चमत्कारिक किस्सेकहानियों के फेर में पड़ कर ही नहीं, बल्कि मुसलिम आतंकवादियों को यह बतानेजताने भी जा रहे हैं कि हिंदू किसी गोलाबारूद या मौत से नहीं डरता. कश्यप ऋषि की तपोस्थली कश्मीर घाटी हमारी है, बर्फानी बाबा का पुण्य कोई हम से छीन नहीं सकता.

आस्था और कट्टरवाद में फर्क कर पाना हमेशा से ही मुश्किल काम रहा है. अमरनाथ यात्रा के मामले में तो हालत बेहद चिंताजनक और हास्यास्पद हो गई है कि देशभर में एक करंट सा फैल रहा है कि जितनी ज्यादा से ज्यादा संख्या में श्रद्धालु अमरनाथ पहुंचेंगे, उतनी ही तादाद में पुण्य मिलेगा और हिंदुओं की ताकत दिखेगी.

आस्था का करंट फैला कर पैसा बनाने वाले लोग खुश हैं कि इस साल कारोबार अच्छा चलेगा. पिछले साल कश्मीर के कुख्यात आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में बारबार कर्फ्यू लगा था,

जिस से अमरनाथ यात्रा बाधित हुई थी. उस से धर्म के धंधेबाजों को वहां पहली दफा घाटा उठाना पड़ा था. उन लोगों को अंदाजा था कि साल 2017 में भी ऐसा दोहराव हो सकता है, इसलिए भीड़ बढ़ाने की तैयारियां तभी से शुरू कर दी गई थीं.

ऐसे उमड़ती है भीड़

देशदुनिया के राजनीतिक व सामाजिक सरोकारों से दूर अधिकांश श्रद्धालुओं की मंशा बेहद साफ रहती है कि जैसे भी हो, पापों व कष्टों से मुक्ति मिले. इस के लिए खूनपसीने की कमाई चढ़ाना सोचने की बात नहीं और अगर कर्ज भी लेना पड़े तो कोई हर्ज नहीं. एक बार वहां हो आएं, फिर तो तमाम कर्जे सूद के साथ उतारना ऊपर वाले की जिम्मेदारी हो जाएगी.

देश में तीर्थयात्राओं का इतना जबरदस्त क्रेज बेवजह नहीं है कि लोग परेशानियों, अभावों, मौसम की मार, पैसों और जान तक की चिंता नहीं करते. दरअसल तीर्थयात्राओं के कारोबारियों ने कोनेकोने में ऐसा जाल फैला रखा है कि इस से किसी का बच कर निकलना बहुत मुश्किल है. चारों दिशाओं में तीर्थस्थल हैं जिन के अलगअलग चमत्कारी किस्सेकहानियां प्रचलित हैं. इन्हें सुन धर्मांधों की बुद्धि बौरा जाती है कि अगर जिंदगी में एक बार तीर्थ नहीं किया तो सब व्यर्थ और नश्वर है.

धर्म के धंधे की सहायक शाखा तीर्थयात्रा का व्यापार धर्म जितना ही प्राचीन है, जिस का मकसद भी आम लोगों से पैसा कमाना रहा है. हर एक धर्मग्रंथ तीर्थ माहात्म्य से भरा पड़ा है जिस का प्रचार पंडेपुजारी हर धार्मिक आयोजन में करते रहते हैं. सार यही है कि तीर्थयात्रा जरूर करो, बगैर इस के जीवन निरर्थक, पशुवत है.

कृषि प्रधान इस देश के संस्कार और मानसिकता अभी भी देहाती हैं. लोग भले ही बड़े शहरों में जा कर बसने लगे हों, सुविधाजनक जिंदगी जीने लगे हों पर तीर्थयात्रा का भूत उन के घरों और दिमाग में सालों पहले जैसा लटका हुआ है.

70 के दशक में सड़कें नहीं थीं, गांवों में आवागमन के साधन नहीं थे जबकि लोगों की आमदनी ज्यादा थी. दूसरे शब्दों में कहें तो खर्च सीमित थे. तब बड़े पैमाने पर पंडेपुजारियों और बनियों ने लोगों को तीर्थयात्रा के बाबत उकसाना शुरू किया.

ब्राह्मणबनिया गठजोड़ ने श्रद्धालुओं को बताया कि तीर्थयात्रा दुर्लभ है और भाग्य वाले ही इसे कर सकते हैं. इस सोए भाग्य को जगाने के लिए तीर्थस्थलों से संबंध रखते चमत्कारिक किस्से हैंडबिलों के जरिए बताए जाने लगे. लोग आसानी से जेबें ढीली करें, इस बाबत इन पर्चों में बताया जाता था कि फलां ने चारधाम की यात्रा की तो उसे खेत में सोने का घड़ा मिला. फलां ने जा कर वैष्णो देवी के दर्शन किए तो उस के बेटे की नौकरी लग गई और बेटी की शादी धनाढ्य परिवार में हो गई.

देखते ही देखते तीर्थयात्रा से बेऔलादों को औलादें मिलने लगीं, असाध्य बीमारियों से ग्रस्त मरीज भलेचंगे हो कर घूमने लगे, पति ने पत्नी को मारनापीटना छोड़ दिया, क्योंकि उस की पत्नी ने तिरुपति और रामेश्वरम जा कर पूजापाठ किया था. रामलाल का व्यापार दिन दोगुना रात चौगुना चल निकला क्योंकि उस ने शिर्डी जा कर सांईंबाबा के दरबार में गुहार लगाई थी.

यह वह वक्त था जब लोगों के पास अचल संपत्तियां ज्यादा होती थीं, नकदी कम. लिहाजा हर गांवशहर में रातोंरात फाइनैंसर पैदा हो गए जो जमीन, गहने, खेत और मकान गिरवी रख कर ब्याज पर तीर्थयात्रा के लिए नकदी देने लगे. लोगों की लालची मानसिकता को भुनाने को हर स्तर पर कोशिशें हुईं.

तीर्थयात्रा के दलाल गांवगांव घूम कर बताने लगे कि चलो हमारे साथ, हम ने आप की सहूलियत के लिए सारे इंतजाम किए हुए हैं. दुर्गम तीर्थस्थल तक ले जाना हमारी जिम्मेदारी है, आप को तो बस पैसे देने हैं.

तीर्थयात्रा के कारोबार की गहरी जड़ें गमलों के जरिए शहरों तक आ गईं और आज सोशल मीडिया के दौर में हालत यह है कि चमत्कारों का प्रचार फेसबुक, इंटरनैट और व्हाट्सऐप के जरिए हो रहा है. लोग शिक्षित तो हुए पर जागरूक नहीं हो पाए. तीर्थयात्रा के फलों और फायदों का लालच बरकरार है और दलालों, पंडों का गिरोह उम्मीद से ज्यादा बड़ा हो चुका है.

अमरनाथ यात्रा का सच

अमरनाथ गुफा में बर्फ का शिवलिंग बनता है, श्रद्धालु जिसे बर्फानी बाबा कहते हैं. इस के चमत्कारिक किस्से दूसरे तीर्थस्थलों की तरह किसी सुबूत के मुहताज नहीं. सालभर कंजूसी और किफायत से पैसे खर्च करने वाले लोग अमरनाथ यात्रा के नाम पर बड़ी दरियादिली से पैसे फूंकते हैं जिस का नजारा हर गांव और शहर में देखा जा सकता है.

पिछले साल के घाटे से उबरने के लिए अमरनाथ यात्रा के व्यापारियों ने साल की शुरुआत में ही जाल बिछाना शुरू कर दिया था. 21 मई को दिल्ली के जंतरमंतर पर अमरनाथ यात्रा बचाओ मुहिम में हिस्सा लेने देशभर से पंडेपुजारी, लंगर संचालक और ट्रैवल एजेंट वगैरा पहुंचे थे. इन लोगों की मांग थी कि अमरनाथ यात्रा निर्विघ्न संपन्न कराने को सरकार लोगों को आश्वस्त करे.

इस राष्ट्रीय अभियान से एक बात यह स्पष्ट हुई थी कि बर्फानी बाबा भक्तों की सलामती की गारंटी नहीं लेता. वह न तो आतंकियों को तीसरी आंख खोल कर भस्म कर सकता है और न ही भक्तों की सहूलियत के लिए रास्तों में जमी बर्फ हटा सकता, क्योंकि उस का काम परीक्षा लेना है, परिणाम देना नहीं.

शिवलिंग को तो दूसरों की हिफाजत करनी चाहिए पर यहां तो उलटे उस की ही हिफाजत के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर सेना तैनात करनी पड़ती है.

प्रचार यह किया जा रहा है कि बाबा कड़ा इम्तिहान ले रहा है, इसलिए तमाम बाधाओं को नजरअंदाज करते जो अमरनाथ पहुंच कर बर्फानी बाबा के दर्शन 7 अगस्त तक कर लेगा वह तर जाएगा.

ज्यादा से ज्यादा श्रद्धालु अमरनाथ आएं, इस बाबत इस से संबंध रखती तमाम धार्मिक समितियों व संगठनों ने साल की शुरुआत में ही प्रचार शुरू

कर दिया था. भोपाल के पौश इलाके शिवाजीनगर के 6 नंबर मार्केट में पान की गुमटी चलाने वाले एक सज्जन, जिन्हें लोग सिर्फ पंडितजी के नाम से जानते हैं, के पास जम्मू की एक संस्था की रसीदों की एक बुक और दूसरा प्रचार साहित्य पहुंच गया था.

इस संस्था का नारा है, भोले की फौज करेगी मौज. प्रचार सामग्री पा कर पंडितजी धन्य हो गए. वे पिछले साल एक जत्थे के साथ अमरनाथ गए थे. उन के हिसाब से यात्रा रोमांचक थी पर रास्तेभर जान का डर सताता रहा था. जम्मू में जिस संस्था में उन्होंने नामपता लिखाया था, उस ने उन्हें रसीदें और साहित्य भेजा था जिन्हें वे अपने ग्राहकों को बांटते रहे.

एक रसीद बुक से लगभग ढाई हजार रुपए का चंदा इकट्ठा हुआ जो उन्होंने डिमांड ड्राफ्ट के जरिए संस्था को भेज दिया. जवाब में जय भोलेनाथ और धन्यवाद सहित दूसरी रसीद बुक आ गई जिसे उन्होंने फिर काउंटर पर रख दिया. पंडितजी किसी से चंदा नहीं मांगते. दुकान पर आए ग्राहक श्रद्धानुसार जो दे जाते हैं, वह राशि वे एक अलग डब्बे में रखते जा रहे हैं. ऐसे देशभर में लाखों लोग इन समितियों और संस्थाओं के लिए चंदा इकट्ठा कर भेज रहे हैं.

रोजाना मुश्किल से 3-4 सौ रुपए कमाने वाले इस पान विक्रेता का कहना है कि पिछले साल उन्हें अमरनाथ यात्रा के दौरान 12 हजार रुपए उधार लेने पड़े थे जिन्हें धीरेधीरे वे चुका चुके हैं. अब बैठेबिठाए उन्हें धर्मकार्य सौंप दिया गया है. अगर कहीं से पैसा बरस पड़ा तो वे फिर इस साल, नहीं तो अगले साल तो जाएंगे ही.

शहरशहर में अमरनाथ यात्रा कराने वाली समितियां हैं जो अमरनाथ यात्रियों के रजिस्ट्रेशन से ले कर उन की हर मुमकिन मदद करती हैं. अधिकांश समितियों के कर्ताधर्ता हिंदूवादी संगठनों से जुड़े हैं और अकसर जम्मूकश्मीर जाते रहते हैं. इन रजिस्टर्ड और गैररजिस्टर्ड समितियों के पदाधिकारियों की सक्रियता यात्रा के दिनों में देखते ही बनती है.

जिस दिन जत्था रवाना होता है उस दिन ट्रेन पर ये लोग ढोलबाजों और फूलमाला ले कर पहुंच जाते हैं. समिति के नाम के बैनर स्टेशन पर फहराते

रहते हैं, ट्रेन के डब्बों में भी बैनरों को लटकाया जाता है. अमरनाथ यात्रियों से पहले स्टेशन के पास मंदिर में पूजापाठ कराया जाता है, फिर उन के गले में माला पहना कर उन का समारोहपूर्वक सम्मान किया जाता है.

दरअसल, ये श्रद्धालु उन के ग्राहक होते हैं जो अमरनाथ यात्रा का भुगतान तो करते ही हैं, साथ ही चंदा भी खूब देते हैं. बदले में इन्हें यह गारंटी मिलती है कि आप को कहीं कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी. कहा जाता है कि जम्मू के भगवतीनगर में या पहलगाम में और बालटाल में भी समिति के डाक्टर और लंगर हैं जहां सबकुछ फ्री है. शिवसेवक आप की सेवा में मौजूद रहेंगे.

कहने और बताने को सेवा व पुण्य के इस काम में बैठेबिठाए पैसा बरसता है. इस कारोबार में लागत न के बराबर है जिस में भक्त किराया व दूसरे शुल्क एडवांस में दे चुका होता है और जाते व लौटते वक्त समिति को सहायता राशि यानी चंदा भी देता है. एवज में उसे मिलती है एक समूह यानी जत्थे में रहने की सुरक्षा क्योंकि जम्मू से अमरनाथ तक की पैदल यात्रा वाकई दुरूह और जोखिम भरी है. बालटाल और पहलगाम दोनों रास्तों पर लंगरों की भरमार रहती है.

महंगे भोजनालय – लंगर

जम्मू के भगवतीनगर इलाके में लंगरों की रौनक देखते ही बनती है. श्रद्धालुओं की आमधारणा यह है कि इन लंगरों में खाना मुफ्त में मिलता है जबकि हकीकत यह है कि ये लंगर दुनिया के सब से महंगे भोजनालय साबित होते हैं.

कैसे होते हैं, इसे भोपाल के पान विक्रेता पंडितजी के शब्दों में समझें. उन्होंने जम्मू के एक लंगर में एक दिन दोनों वक्त का खाना खाया था. खाने का मीनू हरेक लंगर में लगभग फिक्स है राजमा, चावल, पूरी, सब्जी और एक मीठा जो आमतौर पर हलवा होता है.

पंडितजी ने एक दिन खाना खा कर लंगर के नीचे बने अस्थायी मंदिर, जहां बर्फानी बाबा की तसवीर लगी थी, के पास रखी दानपेटी में श्रद्धापूर्वक 500 रुपए डाले यानी दान दिए.

निसंदेह यही खाना वे जम्मू के किसी होटल में खाते तो वह 60 रुपए में मिल जाता पर चूंकि जत्थे के साथ गए थे और सारा टूर प्रोग्राम पहले से तय था, इसलिए लंगर में खाना बाध्यता हो गई थी. लाखों श्रद्धालु इसी तरह ठगे जाते हैं जो मानते हैं कि अमरनाथ गए हैं तो दानपुण्य तो करें, खासतौर से उन लोगों को दें जो देश के विभिन्न सूबों से आ कर जम्मू, पहलगाम और बालटाल में लंगर लगा कर सेवा का काम कर रहे हैं.

धर्म और आस्था के अंधे ही तीर्थ के इस कारोबार को सेवा और धर्म का काम कह सकते हैं, वरना यह करोड़ों के मुनाफे वाला धंधा है जिसे 8-10 लोग अमरनाथ यात्रा की समाप्ति के बाद बांट लेते हैं.

इन तीनों जगहों में विभिन्न प्रांतों के लंगर देखे जा सकते हैं. हिंदीभाषी राज्यों के लंगर तो हैं ही, अब दक्षिणी राज्यों के लंगर भी लगने लगे हैं जिन के होर्डिंग्स और हैंडबिल वगैरा जम्मू स्टेशन पर उतरते ही भक्तों को मिल जाते हैं.

उत्तर प्रदेश के बदायूं के रहने वाले युवा संजय जोशी बीते 4 सालों से भगवतीनगर इलाके में लंगर लगा रहे हैं. जब उन से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि हर साल वे यात्रा के 15-20 दिनों पहले ट्रकों में सामान भर कर भगवतीनगर में डेरा डाल लेते हैं. यही दूसरे राज्यों से आ कर लंगर लगाने वाले करते हैं. उन की भी कोई न कोई समिति या संस्था होती है.

बकौल संजय, डेढ़दो महीने का राशन वे बदायूं से ले कर आते हैं जो वहां के किसानों व व्यापारियों से चंदे की शक्ल में लिया जाता है. पहले लंगर लगाने का कोई शुल्क नहीं था पर पिछले साल से 20 हजार रुपए स्थान आवंटन के लिए जम्मूकश्मीर सरकार लेने लगी है, जिस से लंगर संचालकों में खासा गुस्सा है.

संजय तंबू खींच कर बैठ जाते हैं और समिति के साथ आए दूसरे सदस्य खाना बनाने व परोसने लगते हैं. लंगर बिलकुल फ्री है, संजय बताते हैं, पर सभी यात्री कुछ न कुछ पैसा चढ़ाते हैं जिस से लंगर का खर्च चलता है.

कुल कितना चंदा होता है और कितना चढ़ावा आता है, और एक लंगर लगाने में खर्च कितना आता है, इस सवाल पर चौकन्ने हो कर वे यह कहते बात को टाल जाते हैं कि भगवान के काम में कोई हिसाबकिताब नहीं होता.

दूसरे तमाम लंगर वाले भी यही कहते हैं जिन के स्टालों से दक्षिणा के मुताबिक खाने की महक बढ़ती रहती है. लंगर का धंधा चोखा इस लिहाज से भी है कि अनाज, आटा, तेल, घी, किराना सामान वगैरा सब दान का होता है. नकदी भी लाखों में आती है जिस का बमुश्किल 20-25 फीसदी ही खर्च होता है यानी यह 75 फीसदी मुनाफे का धंधा है. कुख्यात संत आशाराम बापू भले ही बलात्कार के आरोप में जेल में बंद हो पर उस की संस्था अमरनाथ यात्रियों से लाखों रुपए बना रही है.

इस पर भी हास्यास्पद या तरस खाने वाली बात भक्तों और श्रद्धालुओं का यह प्रचार है कि अमरनाथ यात्रा में लंगर मुफ्त मिलते हैं जहां एक से बढ़ कर एक पकवान खाने को मिलता है. इन भोलेभाले, भोले भक्तों को शायद ही कभी यह बात समझ आएगी कि वे 20-25 रुपए के खाने के सौ से ले कर 1 हजार रुपए तक अदा करते हैं.

भोपाल के नजदीक सीहोर के  एक अग्रणी युवा किसान हर साल 2 क्ंिवटल गेहूं और 1 क्ंिवटल अरहर की दाल अमरनाथ के लंगर के लिए एक स्थानीय समिति को दान में देते हैं. इस किसान का कहना है कि सब भगवान ही तो देता है, अब उस में से ही कुछ हिस्सा धर्म के काम में लगा दिया तो क्या हुआ.

अक्ल के मारे ऐसे किसानों पर तरस ही आता है जो बातबात पर सरकार की हायहाय करने का कोई मौका नहीं चूकते पर तीर्थयात्रा के लंगर के लिए 10 हजार रुपए की उपज दरियादिली से दे देते हैं. इन दानी किसानों को क्या किसान आत्महत्या पर किसी को कोसने का हक है, जिन्होंने कभी अपने ही गांव या शहर के किसी गरीब की मदद नहीं की होगी.

यही काम व्यापारी करते हैं शक्कर, दाल, चावल और किराने के दूसरे सामान ये लोग ऐसे दान करते हैं मानो इन के और इन के पूर्वजों के जहाज चलते रहे हों. इन्हीं व्यापारियों, किसानों और नौकरीपेशा लोगों की दान की मानसिकता के चलते केवल अमरनाथ ही नहीं, बल्कि देशभर में लंगरों का कारोबार खूब फलफूल रहा है.

अब तो बातबात पर लंगर हर कहीं लगने लगे हैं रामनवमी, हनुमान जयंती, जन्माष्टमी, नवदुर्गा तो दूर की बात है, बुद्ध और अंबेडकर जयंती पर भी लंगर, दूसरे तरीकों से ही सही, लगना शुरू हो गए हैं. यहां भी लोग दान करते हैं जो मुफ्तखोरों की जेबों में जाता है.

ज्यों की त्यों क्यों बदहाली

जम्मू के भगवतीनगर इलाके में लगने वाले लंगरों के ठीक नीचे एक झुग्गी बस्ती है जिस की आबादी लगभग 20 हजार है. इस बस्ती में झांक कर देखें तो यहां गंदगी और गरीबी के साक्षात दर्शन हो जाते हैं. ये झुग्गी वाले छोटेमोटे काम करते हैं और बच्चे दिनभर श्रद्धालुओं की फेंकी पानी की बोतलें और पौलिथीन बीनते रहते हैं.

इन दरिद्रनारायणों को लंगर में जा कर खाना खाने की इजाजत नहीं है. अगर कोई बच्चा या बड़ा कोशिश भी करे तो उसे लंगर के कार्यकर्ता दुत्कार कर भगा देते हैं. ये वही धार्मिक लोग हैं जो यह प्रचार करते हैं कि भगवान की नजर में सब बराबर हैं.

यह बराबरी हर तीर्थस्थल में देखी जा सकती है. पुरी के जगन्नाथ मंदिर के बाहर लूलेलंगडे़ भिखारियों की फौज खड़ी रहती है. मंदिर परिसर में प्रसाद यानी भोग की इफरात से दुकानें लगी रहती हैं. इसे दुनिया की सब से बड़ी फूड मार्केट कहा जाता है. जहां थोड़े से चावल खाने के एवज में भक्त हजारों रुपए दान में दे आते हैं.

भिखारी क्यों हैं, यह सवाल एक अलग बहस का विषय है. पर भिखारियों के हुजूम तीर्थ और धार्मिक स्थलों पर ही क्यों ज्यादा नजर आते हैं, इस पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं. दरअसल, यहां भिखारियों को जानबूझ कर जगह दी जाती है जिस से लोग उन्हें देख सबक ले लें कि वे अगर धर्म और दान नहीं करेंगे तो अगली बार या इसी जन्म में वे भी इसी जगह, इसी भीड़ में कहीं खड़े नजर आएंगे.

अगर धर्म खुशहाली लाता होता तो किसी को भीख मांगने की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी, इस सवाल का जवाब धर्म के कारोबारियों के पास सालों और सदियों पुराना है कि ये भिखारी अपने पिछले जन्मों के पापों की सजा भुगत रहे हैं, ये नास्तिक और अनीश्वरवादी थे. इसलिए इस हालत से बचने के लिए धर्म और दान करते रहो.

कभी कोई यह नहीं सोचता कि अगर दान देना बंद हो जाए तो भगवान के मंदिरों में दुकानें चला रही पंडों की फौज जरूर इसी भीड़ का हिस्सा बन कर रह जाएगी जो दानदक्षिणा के दम पर पूरी, हलवा, खीर पीढि़यों से सूत रही है.

अमरनाथ की गुफा तक सहूलियत से हैलीकौप्टर के जरिए जाने वाले यात्री

8 हजार रुपए हवा में उड़ा देते हैं और इस से 5 गुना ज्यादा लंगरों, जम्मू के वैष्णो देवी और रघुनाथ मंदिर में दान में दे आते हैं.

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

एक वक्त में अमरनाथ जैसे दुर्गम तीर्थस्थलों पर केवल पुरुष ही जाते थे, लेकिन अब अमरनाथ जाने वाले जत्थों में महिलाओं की तादाद लगातार बढ़ रही है.

महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा धर्मभीरू होती हैं, महज इसलिए ही उन की भागीदारी तीर्थयात्रा में नहीं बढ़ रही, बल्कि सच यह है कि उन की पारिवारिक, आर्थिक और सामाजिक परेशानियां पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं, इसलिए वे भी बढ़चढ़ कर तीर्थयात्राएं करने लगी हैं. शिर्डी और तिरुपति में तो महिलाएं पुरुषों से ज्यादा दिखती हैं.

अमरनाथ का माहात्म्य सुन अब महिलाओं को अपनी परेशानियां का हल बर्फानी बाबा में भी दिखने लगा है, तो बात कतई हैरत की नहीं. भोपाल की एक प्रोफैसर 2 साल पहले अमरनाथ एक जत्थे के साथ गई थीं. उन का मकसद था राह भटक चुकी बेटी रास्ते पर आ जाए, यह प्रार्थना करना या मन्नत मांगना.

आज 2 वर्षों बाद भी बेटी हरकतों से बाज नहीं आ रही, तो उन का भरोसा भगवानों से ही उठने लगा है. वे बताती हैं कि बेटी की आजादखयाली के चलते कोई ढंग का लड़का उस से शादी करने को तैयार नहीं. अब तो नौबत यहां तक आ गई है कि बेटी बेशर्मी से कहने लगी है कि जब सारी जरूरतें बगैर शादी के ही पूरी हो जाती हैं तो शादी क्यों करूं.

ये प्रोफैसर केवल अमरनाथ ही नहीं, बल्कि कई तीर्थस्थलों की यात्रा कर चुकी हैं पर समस्या हल नहीं हो रही. बेटी को रास्ते पर लाने के टोनेटोटके और तंत्रमंत्र तक, अनिच्छापूर्वक ही सही, वे कर चुकी हैं.

कोई भारतीय महिला विधवा नहीं होना चाहती. वे केवल सधवा रहने के लिए भी तीर्थयात्राएं करने लगी हैं. जाहिर है विधवा जीवन की दुश्वारियों का एहसास उन्हें है और सामाजिक असुरक्षा सिर चढ़ कर बोलती है. इसलिए वे पति की दीर्घायु के लिए मन्नतें मांगने चारों दिशाओं में घूमने लगी हैं बावजूद यह जाननेसमझने के कि, कोई भगवान या देवीदेवता इस की गारंटी नहीं देता.

तीर्थयात्रा के कारोबारी भी महिलाओं को प्राथमिकता में लेने लगे हैं और लेडीज के लिए अलग से व्यवस्था का प्रचार करते नजर आते हैं. तो इस की अहम वजह महिलाओं की दानप्रवृत्ति या उदार होना है. जो महिलाएं अपने दरवाजे पर आए साधु को खाली हाथ जाने देना भी अधर्म समझती हों, वे तीर्थस्थलों पर जा कर कितनी दरियादिली से पैसा लुटाती होंगी, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.

हैरत की बात अब खुद महिलाओं का तीर्थयात्रा के कारोबार में शामिल हो जाना है. मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर की एक भाजपा नेत्री का तो यह फुलटाइम कारोबार बन गया है. उन के संपर्क ईश्वर की तरह व्यापक हैं, इसलिए साल में 4 बार वे बस में लोगों को भर कर तीर्थयात्रा कराती हैं.

हालत यह है कि एक तीर्थ करवा कर आती हैं और हिसाबकिताब कर दूसरे की तैयारी शुरू कर देती हैं. जबलपुर के ग्वारी घाट में रोज नर्मदा आरती में शामिल होने वाली इस नेत्री ने पुण्य के इस कारोबार से खासी जायदाद बना ली है और लोकप्रियता भी हासिल कर ली है. अब वे वार्ड मैंबरी के चुनाव की तैयारी कर रही हैं. चूंकि महिला हैं, इसलिए महिलाओं के अलावा पुरुषों का भी सहज विश्वास उन्हें मिला हुआ है कि वे कोई बेईमानी या हेराफेरी दूसरे तीर्थ कारोबारियों की तरह नहीं करेंगी.

महिलाएं व तीर्थयात्रा

इस साल ये नेत्री अमरनाथ जत्था ले कर जा रही हैं. पूछने पर वे बातती हैं कि औरतों में आस्था (धर्मभीरुता नहीं) ज्यादा होती है. ईश्वर उन की गुहार सुनता भी जल्दी है, इसलिए वे अब बढ़चढ़ कर सिद्ध और तीर्थस्थलों की यात्रा करने लगी हैं.

तीर्थयात्रा के मामले में महिलाओं से कोई धार्मिक भेदभाव नहीं होता है तो जाहिर है कारोबारियों को ग्राहक और पैसा चाहिए और उस के लिए कोई शर्त वे नहीं थोपते. धर्म में सुकून ढूंढ़ती महिलाओं की संख्या 90 फीसदी के लगभग आंकी जाती हैं जो तीर्थस्थलों पर शौपिंग भी खूब करती हैं.

जम्मू के रघुनाथ मंदिर परिसर के अंदर लगी कपड़ों की सरकारी दुकान की एक सेल्सगर्ल की मानें तो, ‘‘औरतें खूब बढ़चढ़ कर साडि़यां और सूट खरीदती हैं हालांकि हम से मोलभाव करती हैं पर पंडों से नहीं कर पातीं जो तरहतरह की मनोकामनाओं के लिए मंत्र फूंकते दक्षिणा वसूलते हैं.’’

असमंजस भी कम नहीं

ऐसा भी नहीं है कि लोग अब तीर्थयात्रा का फल नहीं मिलने पर संतुष्ट हो जाते हों या तीर्थयात्रा के दौरान खर्च किए पैसे के मुताबिक सुविधाएं न मिलने पर किलपते न हों.

भोपाल के एक इंजीनियर भी पिछले साल अमरनाथ गए थे पर उन की हिम्मत जम्मू से आगे जाने की नहीं हुई, इसलिए जिस जत्थे के साथ गए थे उसे उन्होंने जाने दिया और खुद जम्मू के एक होटल में पड़े रहे. इस इंजीनियर का कहना है कि घाटी के हालात देख मैं अपनी जान और सुरक्षा के प्रति आश्वस्त नहीं था. रास्ते में कभी भी बर्फ जम जाती है या हिंसा होने लगती है, इसलिए मुझे बेहतर लगा कि मैं वहां न जाऊं जहां सुरक्षा भगवान भी नहीं कर पाते.

कुछ तीर्थयात्रियों के असमंजस सहज हैं और बरकरार हैं जो खर्च किए गए पैसे को निवेश मानते हैं पर गारंटेड रिटर्न नहीं मिलता तो तर्क करने लगे हैं. लेकिन सुधर नहीं रहे तो यह उस जाल की देन है जो सदियों से लोगों के दिलोदिमाग पर बुना जा रहा है.

क्या तीर्थयात्रा से मन्नतें पूरी हो जाती हैं, इस सवाल के जवाब में एक युवती निधि दुबे दोटूक कहती है कि नहीं होतीं. निधि मैडिकल कालेज में दाखिला चाहती थी और इस बाबत वह शिर्डी, तिरुपति और वैष्णोदेवी तक जा चुकी थी पर लगातार 3 साल तक प्रीमैडिकल टैस्ट देने के बाद भी चयन नहीं हुआ तो उसे तीर्थयात्रा की दुकानदारी समझ आने लगी है.

बात सिर्फ असमंजस या अधकचरी दलीलों की भी नहीं है, बल्कि उन अव्यवस्थाओं और परेशानियों को भोगने की भी है जिन का सामना तीर्थयात्रा के दौरान लोगों को होता है. बनारस, पुरी, इलाहाबाद, मथुरा या गया के पंडों की लूटपाट कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही. इन और दूसरे तीर्थस्थलों की गंदगी देख भी भक्तों का मन वितृष्णा से भरने लगता है.

अमरनाथ जाने वाले श्रद्धालु पूरे रास्ते सहमे रहते हैं कि जाने कब, क्या अनहोनी हो जाए यानी आस्था की जगह आशंका लेने लगी है जो जयभोले, और हरहर महादेव का मंत्र रटते रहने और जयकारा करते रहने से दूर नहीं हो जाती. हां, अस्थायी रूप से दब जरूर जाती है.

पिछले साल उज्जैन में हुए सिंहस्थ कुंभ के मेले में पसरी गंदगी देख भक्ति का भाव छू होने लगा था तो इस में गलती श्रद्धालुओं की ही थी जो दलालों के जरिए भगवान के बुलावे पर दौड़ तो जाते हैं लेकिन परेशानियों से समझौता नहीं कर पाते. हर तरफ भीड़ है, धक्कामुक्की है, भेदभाव है, लूटपाट है. नहीं है तो मन्नत पूरी होने की गारंटी जिस के लिए लोग पैसे लुटाते हैं.           

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