लाखों अनुयायियों के गुरु माने जाने वाले गुरमीत राम रहीम को बलात्कार के मामले में अदालत द्वारा दोषी करार दिया गया तो उपद्रव, हिंसा से कई शहर जल उठे. इस घटना से स्तब्ध देश में बाबाओं की बढ़ती भीड़ को ले कर प्रश्न उठ रहे हैं. क्यों बाबाओं की जमातें बढ़ रही हैं. उन के पीछे लाखों अंधभक्त क्यों पागल हो रहे हैं?

असल में बाबाओं की यह खरपतवार हमारे देश की भेदभावपूर्ण सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था की देन है. बाबाओं ने हमारे सामाजिक विभाजन का पूरा फायदा उठाया. सदियों से दलित, पिछड़े, वंचित लोग हाशिए पर थे, ये लोग उन के लिए अवतार, भगवान बन गए. लाखों, करोड़ों लोग उन के चरणों में झुकने लगे. बाद में राजनीतिबाजों ने उन्हें लपक लिया.

पंथ के नामों पर बने हुए डेरे, आश्रम, मठ, मंदिर अलगअलग धर्म, जाति, विभाजित समाज को मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं. इन के बीच आपसी प्रेम, सौहार्द नहीं है. आएदिन झगड़े, खूनखराबा, पुलिस, अदालती मामले सामने आते रहते हैं. कभीकभी लगता है कि देश में गृहयुद्ध सा चल रहा है.

देश के हर हिस्से में बाबा विराजते हैं. बाबागीरी का लबादा ओढ़े ज्यादातर बाबा जमीन हथियाने, राजनीतिक दलाली करने में जुटे हैं. इन के कालेधंधे भी चलते हैं. इन की करतूतों का अकसर परदाफाश होता भी रहा है.

ऐशोआराम का धंधा

हैरानी की बात है कि हर डेरा, आश्रम, मठ पांचसितारा से कम नहीं दिखता. बाबा लोग सोनेचांदी के सिंहासनों पर विराजते हैं. ये एअरकंडीशंड आश्रमों में रहते हैं और  महंगी लक्जरी गाडि़यों में घूमते हैं. इन के यहां ऐशोआराम के सभी साधन उपलब्ध हैं. आश्रमों में अप्सराएं भी थोक में उपलब्ध रहती हैं.

राम रहीम के लाखों अनुयायी देशविदेश में फैले हुए हैं. इन में अधिकतर निचले, दलित, पिछड़े वर्ग के स्त्रीपुरुष हैं. आसाराम, रामपाल जेल में हैं. इन गुरुओं के भक्त भी बड़ी तादाद में निचले तबके के हैं.

राम रहीम के उदय की कहानी 1990 से शुरू होती है. उस समय वह 23 साल का ऐयाश आदमी था. 1948 में डेरा सच्चा सौदा, सूफी गुरु माने जाने वाले बाबा मस्ताना महाराज ने स्थापित किया था. बाद में शाह सतनाम सिंह ने गद्दी संभाली. सतनाम सिंह ने 1990 में राम रहीम को डेरा का मुखिया बनाया. डेरा की कुरसी मिलने के बाद राम रहीम ने खूब दौलत और शोहरत बटोरी. उस ने तेजी से अपने समर्थक बनाए, बढ़ाए और राजनीतिक संबंध बढ़ाए. देशभर में करोड़ों अनुयायी बना लिए. हरियाणा के 9 जिलों में 30 से अधिक विधानसभाई सीटों में उस का दखल है. पंजाब की दर्जन से अधिक विधानसभा सीटों पर डेरा निर्णायक की हैसियत रखता है.

राम रहीम ने कुछ समय पहले अपना पहला म्यूजिक अलबम ‘लव चार्जर’ जारी किया था. उस के अधिकतर खरीदार उस के भक्त ही थे. फिर ‘एमएसजी’ (मैसेंजर औफ गौड) फिल्म बनाई. बाबाओं, गुरुओं की परंपरागत पोशाक के बजाय राम रहीम चमकीले, भड़कीले कपड़ों में अधिक रहता है. वह नई महंगी गाडि़यों और मोटरबाइकों का शौकीन है.

चमकीला बाबा

गुरमीत राम रहीम की यह चमकदमक समर्थकों को खूब पसंद आई. सदियों से भेदभावपूर्ण सामाजिक, धार्मिक, जातीय व्यवस्था से पीडि़त लोग तथाकथित गुरुओं के पास इसलिए पहुंच जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऊंची जाति वालों और उन के वर्चस्व वाली राजनीति ने उन के लिए कुछ नहीं किया, उन के साथ हमेशा भेदभाव बरता गया.

अमीरों और गरीबों के बीच बड़े फासलों वाली जातीय, धार्मिक व्यवस्था में सवर्ण धर्मगुरुओं ने उन्हें जानबूझ कर न्यूनतम स्तर पर रखा. उन्हें जलालत की जिंदगी जीने को मजबूर किया गया. मानसम्मान देने की जगह उन्हें अपमानित किया गया.

यह गैरबराबरीपूर्ण व्यवहार निचली जातियों को आसाराम, रामपाल, राम रहीम, रामवृक्ष यादव जैसे बाबाओं के पास ले जाता है. स्पष्ट है कि बाबाओं और पंथों का उदय यह बताता है कि हमारा देश अंदरूनी तौर पर कितना बंटा हुआ है और किस कदर गैरबराबरी व्याप्त है.

समाजशास्त्रियों के मुताबिक, राम रहीम जैसे बाबाओं का उत्थान हमें यह बताता है कि किस तरह से सरकारें, राजनीति और धर्म लोगों की एक बड़ी संख्या को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे लोग सम्मान और बेहतर जिंदगी की आस में सतलोक आश्रम, डेरा सच्चा सौदा जैसे, हिंदू धर्म की सनातन परंपरा से अलग बने, पंथों की ओर चल पड़ते हैं. ये पंथ जाति, वर्ग, धर्म की बात नहीं करते, न कोई भेदभाव बरतते हैं. ये लाखों भक्तों को एक जगह इकट्ठा कर के उन्हें समानता का एहसास दिलाते हैं. विदेशों में गए दलित, पिछड़े इन डेरों को खूब पैसा भेजते हैं. इस के अलावा, भक्त दानदक्षिणा देते रहते हैं.

अंधभक्तों का दुस्साहस

राम रहीम की करतूतों का परदाफाश होने के बाद बाबाओं पर बहुत सवाल उठ रहे हैं और राम रहीम के अंधभक्तों के दुस्साहस की आलोचना हो रही है. सच यह है कि अंधभक्ति प्रवचनों, सत्संगों, भाषणों, पुस्तकों, टीवी कार्यक्रमों से रातदिन लोगों के दिमागों में भरी जा रही है. हां, फर्क इतना है कि जब ऊंची जातियों के शंकराचार्यों, रविशंकरों, रामदेवों के प्रति भक्ति का पाठ पढ़ाया जाता है तो हिंदू धर्मग्रंथों का हवाला दे कर इसे महान संस्कृति माना जाता है.

हमारे देश में सदियों से गुरु की परंपरा रही है. गुरु को ईश्वर का अवतार, उस तक पहुंचने का मार्ग बताने वाला माध्यम माना गया है. धर्म में गुरु को बहुत सम्मानजनक और सर्वाेपरि स्थान दिया गया है. गं्रथों में गुरु की महिमा का खूब गुणगान किया गया है. गुरुभक्ति, गुरुसेवा को बहुत महत्त्व दिया गया है. इस का दिनरात प्रचारप्रसार भी हो रहा है.

गुरु का महिमामंडन

पुराण, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता जैसे ग्रंथों में गुरु की महत्ता का खूब वर्णन है. गुरु वशिष्ठ (राम के गुरु), विश्वामित्र, सांदीपनि (कृष्ण के गुरु), महर्षि वेदव्यास, द्रोणाचार्य (पांडवों के गुरु), कृपाचार्य (कुरुवंश के गुरु), गौतम, भारद्वाज, च्यवन, कृपाचार्य की महिमा गाई गई हैं. बाद में, गुरु गोरखनाथ, गुरुनानक, नामदेव, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविंद, धीरेंद्र ब्रह्मचारी, चंद्रास्वामी जैसे गुरुओं की लंबी शृंखला है.

धर्मगं्रथों के अनुसार पैल, जैमिनी, वैशंपायन, समंतुमुनि, रोमहर्षण महर्षि वेदव्यास के शिष्य थे. गुरुपूजा के लिए दिन भी तय किया गया है. भविष्योत्तर पुराण में गुरुपूर्णिमा के बारे में लिखा है-

मम जन्मदिने सम्यक् पूजनीय. प्रयत्नत:,

आषाढ़ शुक्ल पक्षेतु पूर्णिमायां गुरौ तथा.

पूजनीयो विशेषण वस्त्राभरणधेनुभि:,

फलपुष्पादिना सम्यगरत्नकांचन भोजनै.

दक्षिणाभि: सुपुष्ठाभिर्मत्स्वरूपरूप

प्रपूजयेत.

अर्थात, आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को मेरा जन्मदिन है. इसे गुरुपूर्णिमा कहते हैं. इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ गुरु को सुंदर वस्त्र, आभूषण, गाय, फल, पुष्प, रत्न, स्वर्ण मुद्रा आदि समर्पित कर उन का पूजन करना चाहिए. ऐसा करने से गुरुदेव में मेरे ही स्वरूप के दर्शन होते हैं.

ग्रंथों में बारबार कहा गया है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं, गुरु के बिना मोक्ष नहीं. गुरु ही मनुष्य के समस्त पापों का हरण करने वाला होता है. गुरु का पद ईश्वर से ऊपर बताया गया है.       

गुरु गोविंद दोऊ खड़े,

काके लागूं पांव

बलिहारी गुरु आप ने

गोविंद दियो बताए.

गुरु बिन ज्ञान न उपजे,

गुरु बिन मिलै न मोक्ष,

गुरु बिन लखै न सत्य को,

गुरु बिन मिटै न दोष.

अर्थात, गुरु के बिना ज्ञान मिलना कठिन है. गुरु के बिना मोक्ष नहीं है. गुरु के बिना सत्य को पहचानना असंभव है और गुरु बिना दोष का, मन के विकारों का मिटना मुश्किल है.

गुरु समान दाता नहीं,

याचक सीष समान,

तीन लोक की संपदा,

सो गुरु दिन्ही दान.

यानी, गुरु के समान कोई दाता नहीं है. शिष्य के समान कोई याचक यानी मांगने वाला नहीं है. ज्ञानरूपी अनमोल संपत्ति, जो तीनों लोकों की संपत्ति से बढ़ कर है, शिष्य के मांगने पर गुरु उसे यह ज्ञानरूपी संपदा दान में दे देते हैं.

गुरु शरणगति छाडि़ के,

करै भरोसा और,

सुखसंपत्ति को कह चली,

नहीं नरक में ठौर.

अर्थात, जो व्यक्ति सतगुरु की शरण छोड़ कर, उन के बताए रास्ते पर न चल कर अन्य बातों में विश्वास करता है उसे जीवन में दुखों का सामना करना पड़ता है और उसे नरक में भी जगह नहीं मिलती.

और देखिए-

सतगुरु महिमा अनंत है,

अनंत किया उपकार,

लोचन अनंत उघारिया,

अनंत दिखावा हार.

अर्थात, सतगुरु की महिमा अनंत है. उन्होंने मुझ पर अनंत उपकार किए हैं. उन्होंने मेरे ज्ञानचक्षु खोल दिए और मुझे अनंत यानी ईश्वर के दर्शन करा दिए.

सब धरती कागद करूं,

लिखनी सब बनराय,

सात समुद्र का मसि करूं,

गुरु गुण लिखा न जाए.

यानी, सारी धरती को कागज बना लिया जाए, सारे वनों की लकडि़यों को कलम बना लिया जाए, सात समुद्र को स्याही बना लिया जाए तो भी गुरु के गुण नहीं लिखे जा सकते, गुरु की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि गुरु की महिमा अपरंपार है.

गुरु की महिमा में इस तरह के सैकड़ों श्लोक रचे गए हैं.

आधुनिक गुरु सतपाल महाराज अपने प्रवचनों की पुस्तक ‘अपने आप को जानो’ में लिखते हैं, ‘‘शिष्य के जीवन में आज्ञा का ही सब से बड़ा महत्त्व है. जो शिष्य अपने गुरु की आज्ञा नहीं मानता, दरबार की पवित्रता की तरफ ध्यान नहीं देता, वह इस मार्ग में सफल नहीं हो सकता.’’

एक जगह लिखा है-

‘‘माया ही मनुष्य को संसार के जंजाल में उलझाए रखती है. संसार के मोहजाल में फंस कर मनुष्य मन में अहंकार, इच्छा, राग और द्वेष के विकारों को उत्पन्न करता रहता है. विकारों से भरा मन माया के प्रभाव से ऊपर नहीं उठ सकता. वह जन्ममृत्यु के चक्र में फंसा रहता है. सतगुरु की कृपा से मनुष्य मोहमाया के जाल से छूट सकता है. जो मनुष्य गुरु की आज्ञा नहीं मानता और गलत मार्ग पर चलता है वह दुनिया और धर्म दोनों से ही पतित हो जाता है, साथ ही दुख व कष्टों से घिरा रहता है.’’

भेदभावभरी बाबाओं की दुनिया

अब मामला राम रहीम का है जिस के समर्थकों में ऊंची जातियों के कम ही लोग हैं. और इसीलिए बाबा के खिलाफ सही व उचित माहौल पैदा हो गया. काश, यह पहले ही हो गया होता और धर्म के इन दुकानदारों को चप्पेचप्पे पर आश्रम खोलने की इजाजत न होती.

हमारे गुरुओं की दुनिया भेदभाव से भरी हुई है. ऊंची जातियों के धार्मिक संगठन व गुरु निचलों को अपने यहां घुसने नहीं देते. राधास्वामी सत्संग, श्रीश्री रविशंकर का आर्ट औफ लिविंग, शंकराचार्यों के मठ, रामदेव के योग आश्रम अमीर सवर्णों की जागीर माने जाते हैं.

ऐसे में दलितों, पिछड़ों को जातीय, धार्मिक भेदभाव रहित राम रहीम, आसाराम, आशुतोष महाराज, रामपाल, रामवृक्ष, निरंकारी, साईं बाबा जैसों की शरण में जा कर अपने दुखों का निवारण खोजना पड़ता है.

डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम पर जैसे ही आरोप तय हुए, हरियाणा, पंजाब सहित दिल्ली, राजस्थान में अनुयायियों का गुस्सा भड़क उठा. चारों ओर उपद्रव, आग, अराजकता और चीखपुकार मच गई. पंचकूला और सिरसा जल उठे. हिंसा में 38 लोग मारे गए. सैकड़ों वाहन आग के हवाले कर दिए गए. शासनप्रशासन राम रहीम के अनुयायियों के सामने बेबस दिखा. इस हिंसा से समूचा देश स्तब्ध रह गया पर सरकार और समर्थक इसे कलंक मानने को तैयार नहीं. वे तो इसे लीला समझ रहे थे.

राम रहीम के काफिले में 400 विदेशी एयूवी कारें, 120-140 तक की स्पीड से सड़क पर दौड़ रही थीं, हजारों लोग हाथ जोड़े सड़क पर बैठे थे. पुलिसअर्धसैनिक बल मानो स्वागत में खड़े थे. पूरा देश धड़कते दिल से बाबा के अंधभक्तों का शक्तिप्रदर्शन देख रहा था. सत्ता लाभहानि के अनुमान में लगी नतमस्तक थी. उस वक्त एक जज, सीधेसादे कपड़े पहन कर, कोर्ट पहुंचा, कुछ वीरोचित नहीं, शक्तिप्रदर्शन नहीं, उसी जज ने साहसिक फैसला सुनाया.

अदालत द्वारा राम रहीम को दोषी करार दिए जाने के बाद आक्रोशित भक्तों द्वारा हिंसा किए जाने का ऐसा वीभत्स दृश्य दिखाईर् दे रहा था मानो कुरुक्षेत्र में गदर छिड़ गया हो. 800 से अधिक गाडि़यों के काफिले और अन्य साधनों से पहुंचे लाखों अनुयायियों से पूरा पंचकूला शहर पट गया था. शहरवासी दहशत में आ कर घरों में कैद हो गए. सुरक्षा बलों और सेना के हजारों जवान शहर के चप्पेचप्पे पर तैनात थे.

हिंसा की आंच राजधानी दिल्ली समेत 6 राज्यों तक पहुंच गई. दिल्ली के आनंद विहार रेलवेस्टेशन पर खड़ी रीवा ऐक्सप्रैस की 2 बोगियां फूंक दी गईं. दर्जनभर बसों में आग लगा दी गई. हिंसा को देखते हुए स्कूलों की छुट्टी कर दी गई. राजधानी की सीमाएं सील करने के साथसाथ धारा 144 लागू कर दी गई.

सरकार को एहतियात के तौर पर बिजली, इंटरनैट बंद करने पड़े. पंजाब, हरियाणा, जम्मूकश्मीर, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जाने वाली कई रेलगाडि़यां रद्द करनी पड़ीं.

आस्था के नाम पर ढोंग और ऐयाशी का बाजार देशभर में खूब फूलाफला है. इस बाजार में लाखों ढोंगी गुरु, बाबा, संत, साधु उतरे और वे अनुयायियों की बड़ी भीड़ को अपनी ओर खींचने में कामयाब रहे हैं. दरअसल, गैरबराबरी की व्यवस्था वाले समाज को गुरुओं और गुरुओं को समाज की जरूरत रही है. वहीं, गुरुओं के बीच आपसी मतभेद, कलह, हिंसा समयसमय पर सामने आती रही हैं.

निरंकारी और अकाल तख्त के बीच विवाद रहा है. अकाल तख्त को निचले वर्गों के लिए आध्यात्मिक रास्ता दिखाने वाला निरंकारी पंथ कभी रास नहीं आया. लंबे समय तक उस के प्रमुख रहे बाबा गुरबचन सिंह की जरनैल सिंह भिंडरावाले के लोगों ने यह कह कर हत्या कर दी थी कि वह खुद को गुरु बताता है.

सिख पंथ और डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों के बीच कई बार हिंसक झड़पें हुई हैं, एकदूसरे के समागमों पर हमले किए गए हैं.भिंडरावाला के चेलों ने 1978 में बैसाखी के दिन निरंकारियों के धार्मिक जलसे के सामने प्रदर्शन किया. उस में  16 लोग मारे गए थे. उस के बाद स्वर्ण मंदिर स्थित अकाल तख्त से हुक्मनामा जारी हुआ कि निरंकारियों के साथ कोई संबंध न रखा जाए. सिख परिवार न उन्हें अपनी बेटी दें, न उन के घर का खानापानी करें.

अपराध के अड्डे

पंजाब के नूरमहल में आशुतोष महाराज के अनुयायियों और सिख गुरुओं के समर्थकों के बीच हिंसक टकराव रहा है. आशुतोष के अनुयायियों की तादाद भी लाखों में है और वे अधिकतर निचले वर्गों के हैं. जनवरी 2014 में आशुतोष की मौत हो गई थी. डाक्टरों की टीम ने उसे क्लिनिकली डैड करार दे दिया था पर अनुयायी मानते हैं कि आशुतोष महाराज समाधि में हैं और लौट आएंगे.

रामदेव अमीर ब्राह्मण और बनियों से  मोटी फीस ले कर योग शिविरों में प्रवेश देते हैं. लोग बारबार आवाज उठाते हैं कि रामदेव गरीबों को मुफ्त में योग क्यों नहीं सिखाते.                

राधास्वामी सत्संग के प्रमुख रेलिगरे, फोर्टिस और रैनबैक्सी जैसी विख्यात कंपनियों के मालिक हों, तब क्या कोई दलित, शूद्र उन के सत्संग, आश्रमों में जाने का साहस कर सकता है?

रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, शंकराचार्य जैसे ब्राह्मणवादी साधुसंतों के खिलाफ भी गैरकानूनी कई मामले सामने आए हैं. यमुना किनारे श्रीश्री रविशंकर के कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के कारण एनजीटी, जिस की सुप्रीम कोर्ट के समकक्ष हैसियत है, के आदेश को दरकिनार कर श्रीश्री रविशंकर की संस्था आर्ट औफ लिविंग ने जुर्माने के 50 लाख रुपए देने से इनकार कर दिया. आज तक कोई भी अदालत, सरकार या संगठन श्रीश्री रविशंकर के खिलाफ कुछ नहीं कर पाए. रामदेव के कैंसर, अस्थमा, टीबी जैसी लाइलाज बीमारियों को योग से मुक्त कर देने के भ्रमित दावे, उन की दिव्य पुत्र जीवक बीज पर विवाद के बावजूद उन का बाल बांका नहीं हो सका.

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा साईं बाबा की हिंदू मंदिरों में मूर्तिस्थापना के खिलाफ मुहिम चलाने और उन्हें अवतार न मानने के बावजूद उन पर धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने का कोई मामला दर्ज नहीं कराया गया.

हैरत है कि सिखों के जुलूसों में पंचप्यारों की पोशाक पहनने पर किसी की धार्मिक भावना को ठेस नहीं पहुंचती जबकि राम रहीम पर गुरु गोविंद सिंह की पोशाक पहनने पर मामला दर्ज करा दिया जाता है.

इसीलिए, राम रहीम, आसाराम, आशुतोष, रामपाल, जयगुरु देव निचले तबकों में अधिक लोकप्रिय हैं. लेकिन ऊंचे समझे जाने वाले पंथों अकाल तख्त, शंकराचार्य, श्रीश्री रविशंकर जैसे बाबा इन बाबाओं की निंदा करते हैं. वे इन्हें धर्मी मानने से इनकार करते हैं और अधर्मी करार देते हैं. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने साईंबाबा को अवतार मानने से मना कर दिया. शंकराचार्य सवर्णों में मान्य हैं जबकि साईं बाबा के यहां जाति, धार्मिक, अमीरगरीब का कोई भेद नहीं माना जाता. उन के अधिकतर अनुयायी निचले, पिछड़े तबकों के हैं.

गुरुवाद का यह संघर्ष सवर्ण साधुओं, गुरुओं, शंकराचार्यों बनाम निचलों, दलितों, पिछड़ों के गुरुओं के प्रति भेदभाव की उपज है. यह भेदभाव है. सवर्ण बाबाओं में अपराध के बावजूद बच निकलने की कूवत है. निचलों के बाबा शुरुआती जांच से ही अदालतों में मात खा रहे हैं.    

सरकारें चाहे किसी भी दल की हों, वे ऐसे बाबाओं का इस्तेमाल अपने वोटबैंक के तौर पर तो करती आई हैं पर उन्हें संरक्षण नहीं देतीं, वह चाहे कांग्रेस की हो, अकाली दल की, शिवसेना या भाजपा की हो. डेरा सच्चा सौदा के वोटबैंक का उपयोग इन तीनों पार्टियों ने किया है. पंचकूला में हुई हिंसा एक बार फिर जाहिर करती है कि राम रहीम जैसे बाबा किस तरह से अपनी समानांतर सत्ता चला  सकते हैं और सरकारें इन के आगे नतमस्तक दिखाई देती हैं.

गैरबराबरी के शिकार

पिछले चुनाव में राम रहीम ने भाजपा की मदद इसलिए की थी ताकि वह हत्या, बलात्कार मामले में सीबीआई से बच सके लेकिन सरकार ने नहीं बचाया. ये बाबा बेशक ढोंगी हैं, अपराधी हैं, भारतीय कानून के अनुसार सजा के लायक हैं. वहीं, सच यह भी है कि ये सामाजिक भेदभाव का दंश झेल रहे लोगों के तारणहार बने दिखते हैं. हालांकि ये खुद भी गैरबराबरी के शिकार हो रहे हैं.

यही वजह है कि राम रहीम की सजा का किसी भी राजनीतिक दल ने स्वागत नहीं किया है. हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार तो सन्नाटे में चली गई. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाली भाजपा की केंद्र सरकार की भी बोलती बंद है. न तो कानून मंत्री और न ही महिला एवं बाल कल्याण मंत्री की ओर से, हरियाणा की 2 युवतियों का यौन शोषण किए जाने के मामले में, राम रहीम को मिली सजा पर किसी तरह का बयान जारी किया गया.

देश के हर क्षेत्र में ऐसे बाबाओं की उपज और फूलनेफलने के पीछे वजह यही है. यह भूमि बाबाओं के लिए अत्यधिक उपजाऊ है.

सवाल यह भी है कि बड़ी तादाद में महिलाएं गुरुओं की शरण में क्यों जाती हैं? गुरु से आशीर्वाद पाने के लिए गुरुभक्ति, सेवा के नाम पर महिलाएं कुछ भी करने को तैयार रहती हैं. गुरु भी आखिर इंसान होते हैं. ऐसा नहीं है कि उन के भीतर कामवासना जागृत नहीं होती. मौका देख कर गुरु अपनी चेलियों को धीरेधीरे बिस्तर तक ले आते हैं. सबकुछ आपसी रजामंदी से चलता रहता है. मामला तब बिगड़ता है जब दूसरी औरतों को गुरुशिष्या के बीच के संबंधों का पता चल जाता है. फिर अपनेआप को बचाने के लिए चीखनाचिल्लाना शुरू होता है.

समाज विज्ञानियों का मानना है कि हर धर्म भेदभाव की नींव पर खड़ा है. धर्म व्यक्तियों के बीच ऊंचनीच, छुआछूत, भेदभाव, शोषण, लैंगिक दुराचार पर आधारित हैं.

निचले तबकों की धार्मिक भूख, बराबरी का सम्मान पाने की लालसा इन बाबाओं के आश्रमों, डेरों में पूरी हो रही है. बाबाओं ने उन्हें बराबरी का स्पेस उपलब्ध कराया.

कौन हैं पीडि़त?

लोगों को दुख, गरीबी, बीमारी और विपरीत हालात के समय ऐसे किसी ईश्वरीय अवतार की जरूरत महसूस होती है. इन बाबाओं ने इस मनोविज्ञान को समझा और अपनीअपनी दुकानें खोल लीं. इन दुकानों पर दलितों, पिछड़ों की इच्छानुसार बातें होने लगीं. उन्हें दिमागी संबल मिला, अपना गुरु बनाने की इच्छा पूरी होने लगी. मुफ्त में खाना, पढ़ाई मिलने लगी. और सब से बड़ी बात, हजारों लोगों के बीच उन्हें इकट्ठा हो कर बराबरी का एहसास मिला. इस से वे खुद को सम्मानित समझने लगे. सवर्णों के गुरुओं के पास फटकने की उन में हिम्मत नहीं.

इन बाबाओं की चमकदमक ने उन्हें प्रभावित किया, उन के कई तथाकथित चमत्कारों ने असर किया हालांकि वे फरेब थे. पर, ये भोलेभाले लोग समझ नहीं पाते और चमत्कार मान बैठते हैं.

इस के अलावा निचला वर्ग सब से अधिक त्रस्त रहा है. वह नशा, मांसाहार, गालीगलौज की भाषा, औरतों के साथ मारपीट जैसी बुराइयों से पीडि़त रहा है. ये बाबा उन्हें इस तरह की बुराइयां छोड़ने की सीख देते हैं. लोगों पर खासतौर से महिलाओं पर बाबाओं की सीख वाले इस तरह के प्रवचन असर डालते हैं क्योंकि इन बुराइयों से गरीब, दलित तबके की महिलाएं ही अधिक पीडि़त होती हैं.

सवाल यह भी है कि आसाराम, राम रहीम, रामपाल जैसे निचलों के गुरु ही एक के बाद एक जेलों में जा रहे हैं. श्रीश्री रविशंकर, रामदेव, शंकराचायर्ोें के खिलाफ गैरकानूनी मामले सामने आने के बाद भी उन का साम्राज्य ज्यों का त्यों चमक रहा है. बाबाओं की यह दुनिया गैरबराबरी की है. गुरुओं, बाबाओं के प्रति लोगों की अंधभक्ति से ऐसी घटनाएं होती रहेंगी. सुधार केवल कानून से नहीं होगा, न सरकार कुछ कर पाएगी. समाज को स्वयं अपने भीतर झांकने की क्षमता विकसित करनी होगी. उसे किसी भगवान, अवतार या गुरु का अवलंबन छोड़ना होगा. उसे समझना होगा कि समस्याएं, कष्ट दूर करने के उपाय उसे खुद करने होंगे. उसे खुद में विवेक, व्यावहारिकता, तर्क और नैतिकता की स्थापना करने की जरूरत है.      

बाबा रे बाबा

सालडेढ़ साल पहले की बात है. मौर्निंग वाक के लिए निकली तो एक अनोखा सा नजारा देखने को मिला. सैकड़ों लोग मुंह पर कपड़ा बांधे, हाथों में बड़ीबड़ी झाड़ू लिए सड़कों की साफसफाई में जुटे थे. मेरे महल्ले में ही नहीं, बल्कि पूरे शहर में ये लोग फैले थे. उत्सुकतावश मैं ने एक व्यक्ति से पूछा, ‘‘यह क्या हो रहा है, आप लोग किस संस्था से जुड़े हैं?’’

वह बोला, ‘‘हम डेरा सच्चा सौदा वाले गुरु गुरमीत राम रहीम इंसा के अनुयायी हैं और यह हमारा मिशन है. इस के तहत हम किसी एक शहर को चुनते हैं और सब मिल कर कुछ ही घंटों में पूरे शहर की सड़कोंगलियों आदि की सफाई कर देते हैं.’’ यह सुन कर दिल को लगा कि कुछ अच्छा हो रहा है, साथ ही मुझे उस बाबा के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी.

संयोग से कुछ ही दिनों बाद एक औफिशियल टूर पर कोलायत जाना हुआ. रास्ते में दियातरा के पास ड्राइवर ने एक बड़ा सा आश्रम दिखाते हुए कहा, ‘‘यह बाबा गुरमीत राम रहीम का आश्रम यानी डेरा सच्चा सौदा है.’’ बस, फिर क्या था, मैं ने ड्राइवर से गाड़ी रोकने और आश्रम देखने की बात कही.

आश्रम के बाहर एक छोटा सा होटल बना हुआ था और सड़क के दूसरी तरफ डेरे की कई एकड़ जमीन थी जिस पर बेरों से लदी झाडि़यां थीं. वहां काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने सरकारी गाड़ी देख कर हमें चायनाश्ता औफर किया. हम ने आश्रम देखने की इच्छा जाहिर की. यों तो आश्रम में किसी अनजान को जाने की इजाजत नहीं थी मगर शायद यह सरकारी गाड़ी की ताकत थी कि इच्छा न होते हुए भी वह हमें अंदर ले गया.

अंदर का दृश्य सचमुच देखने लायक था. एक बड़ा सा टीनशेड लगा था. वहां बेर के ढेर लगे थे और बहुत से सेवादार उन्हें छांटछांट कर बोरियों में भर रहे थे. खुली जमीन पर अन्य सब्जियां और खासतौर से एलोवेरा के पौधे लगे थे. मेरे पूछने पर बताया गया कि ये सब बेर और सब्जियां भक्तों को पहुंचाए जाएंगे. मुझे जान कर आश्चर्य हुआ कि भक्त यहां मुफ्त में काम कर रहे हैं और यहां पैदा होने वाली फलसब्जियां मूल्य दे कर खरीदते हैं.

उन्हीं दिनों मेरी एक रिश्तेदार ने मुझे अपने यहां बाबा गुरमीत राम रहीम के सत्संग में आमंत्रित किया. मैं इस तरह के ढकोसले जरा कम ही पसंद करती हूं, इसलिए मैं ने टाल दिया. मगर शाम को जब उन्होंने प्रसाद भिजवाया तो मुझे और भी आश्चर्य हुआ कि प्रसाद के नाम पर बाबा की फैक्टरी के बने बिस्कुट थे. जिन्हें भक्त ‘पिताजी’ कह कर संबोधित करते हैं, के प्रति भक्तों की अंधश्रद्धा देखते ही बनती थी. मैं ने अपनी रिश्तेदार को बहुत समझाया मगर वे ‘पिताजी’ के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं होतीं. यहां तक कि अपने छोटे बच्चों को भी जन्मदिन पर आशीर्वाद दिलाने के लिए डेरे पर ले कर जाती हैं. यही नहीं, अपनी नई खरीदी गाड़ी भी सब से पहले सिरसा ले कर गईं ताकि ‘पिताजी’ का आशीर्वाद उसे मिल सके.

25 अगस्त को जब अदालत ने बाबा को दोषी करार दिया तो मैं ने अपनी उसी रिश्तेदार को फोन किया. मगर घोर आश्चर्य  कि इतना सबकुछ साबित होने के बाद भी वह राम रहीम के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार न थी. उसे अब भी भरोसा था कि वे निर्दोष हैं और बहुत जल्दी वे कोई चमत्कार करेंगे और उन्हें दोषी साबित करने वाले वकील और जज को सजा मिलेगी.

वाह रे अंधभक्ति, इन्हें कहां ले कर जाएगी, पता नहीं. कैसे इन की आंखों पर बंधी अंधभक्ति की पट्टी खुलेगी और इन्हें सचाई नजर आएगी.                                                  

– आशा शर्मा

इ़न्होंने जो कहा

हम कब जागेंगे

पाखंड की दुकानें जब अपनी शैशव अवस्था में रहती हैं तभी उन के फन कुचलने चाहिए न कि उन के तक्षक बनने की राह देखनी चाहिए. हम सभी को अपने कानआंख खोल कर रखने होंगे ताकि समाज की कोई फुंसी, फोड़ा न बन जाए. अन्याय को सहना भी तो अन्याय करने की तरह होता है.

दुखद है कि खबरिया चैनल भी एयरकंडीशंड कार्यालय में बैठ खबरों की रचनाएं करना चाहते हैं. जब सबकुछ इतना उजागर था तो उंगली पहले ही उठानी थी.

ठगी के धंधे के अलावा जनता को धर्म और आस्था के नाम पर गुमराह और मतिभ्रष्ट किया जा रहा है. बेहतर है कि जल्दी से जल्दी आवाज उठाई जाए ताकि कट्टरपंथी पाखंड और ठगी का कोई और बाबा लोगों को मानसिक गुलामी की जंजीरों में न जकड़ ले. इस के लिए आम जनता और हम जैसे लोगों को आवाज उठानी चाहिए.                     

– रीता गुप्ता

 

धर्म का डर

धर्म से डरना हम ने बचपन से सीखा है, इसलिए बाबा के प्रति भी लोग अपना मुंह बंद कर लेते हैं.      

– पद्मा

 

डर की जड़ें

हम सचाई को कुबूल करना नहीं चाहते. कुछ दिन गुजरेंगे और सब भूल जाएंगे. फिर एक नया बाबा और उस के अनुयायी पैदा हो जाएंगे. यही हमारी कमजोरी है जिस का फायदा ये लोग खूब उठाते हैं. धर्म हमारी जड़ों में डर के साथ इतनी गहरी जड़ें जमा चुका है कि ‘ऐसा नहीं किया तो, यह अनिष्ट, वह नुकसान हो जाएगा…’ वाली सोच से उबर पाना बेहद मुश्किल है.       

– मीनू परियानी

 

विरासत की भक्ति

इतना अंधाविश्वास है कि मातापिता अपने बेटेबेटियों को भी बाबाओं की सेवा में, कृपा, आशीर्वाद लेने भेज देते हैं कि सबकुछ आसानी से मिल जाए, जीवन सफल हो जाए मिनटों में. धर्म में और गुरुओं में आस्था, श्रद्घा, भक्ति विरासत में मिली, जो चली ही आ रही है.

– नीरजा श्रीवास्तव

 

दस जन्मों की सजा होती

काश, कोई ऐसी तरकीब होती

काश, कोई ऐसा कानून होता

खुद को देवता बताने वाले को

काली करतूत करने वाले को

दस साल की नहीं,

दस जन्मों की सजा होती

हर जन्म में पीछा करती उस का

उस के करतूतों की काली छाया

शायद तब समझ में आता

कैसा लगता है उस लड़की को

जो उठाती है हर पल, हर घड़ी

साधुमहात्माओं की

मौजमस्ती का बोझ

और जब उस के साथसाथ

उम्रभर चलता है

बलात्कार का काला धब्बा…            

– कविता

 

मानसिकता बदलें

महिलाओं को अपनी सोच बदलनी होगी क्योंकि महिलाएं इन से बहुत अधिक प्रभावित होती हैं. उन का एक ही कथन होता है कि इतने बड़े बाबा हैं, कुछ तो बात होगी.

महिलाएं एक व्रत करती हैं-ऋषि पंचमी, इसे इसलिए रखा जाता है कि रजस्वला स्त्री घर के बरतन आदि छूती है तो इस व्रत के करने से वह पापमुक्त हो जाती है. उत्सुकतावश, इस से संबंधित एक पुस्तक पढ़ी. उस में लिखा है, ‘जो महिला इसे नहीं करती है वह कुतिया की योनि को प्राप्त होती है और उस के शरीर में कीड़े पड़ते हैं.’

इस व्रत को करने वाली अशिक्षित ही नहीं, बल्कि एमबीए पास महिलाएं भी हैं. मैं ने उन से पूछा तो उन का उत्तर था, ‘‘अब इतने बड़े ऋषियों ने पुस्तक में लिखा है तो सचाई होगी ही.’’

ऐसी महिलाएं क्या सिखाएंगी अपने बच्चों को?         

– प्रतिभा अग्निहोत्री

 

राजनीतिक संरक्षण

बाबाओं की दिनदूनी रातचौगुनी तरक्की का मुख्य कारण उन्हें प्राप्त राजनीतिक संरक्षण है. उन की संपत्ति पर टैक्स नहीं लगता. आम नागरिकों से खून चूस कर टैक्स वसूलने वाली सरकारें बाबाओं और मंदिरों या धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति को टैक्स के दायरे में क्यों नहीं लातीं? दूसरे, बाबाओं के अनुयायी पार्टियों के वोटबैंक भी होते हैं.

वोटों की राजनीति ने बाबाओं को राजनीतिक दलों के लिए बड़ा वोटबैंक उपलब्ध कराने वाला साधन भी बना दिया है. इसीलिए बाबाओं के दामन पर कोई राजनीतिक दल हाथ नहीं डालता है.

ऐसे माहौल में देश के भविष्य के प्रति कोई आशा या उम्मीद नहीं महसूस होती.

– गीता यादवेंदु

 

ठगी का कारोबार

हमें डर और अंधभक्ति विरासत में मिली है. इस का फायदा राम रहीम जैसे पाखंडी उठाते हैं. मेरी बड़ी ननद मध्य प्रदेश में रहती हैं. पिछले साल वे हमारे यहां आईं. उन्हें देख कर एक पंडित आ गया.

पंडित ने कहा कि आप अपने बेटे की शादी कर के परेशान हैं. मैं कुछ उपाय आप को लिख कर देता हूं. इस से आप के घर में शांति आएगी. जबकि, ऐसा कुछ नहीं था. उस ने एक कागज पर लिख कर दिया और बीचबीच में यह लिख दिया कि आप गुलाब का फूल लिखेंगी, आप गंगा का नाम लिखेंगी आदिआदि. यह पाखंडी पंडित की चाल है. कागज देने के बाद वह सब से पूछता है कि आप को कौन सा फूल अच्छा लगता है, कौन सी नदी को आप मानते हैं?

ज्यादातर लोग गुलाब और गंगा ही बताते हैं और उस की धाक जम जाती है. उस ने मेरी ननद से भी पूछा. उन्होंने बताया कमल का फूल और साबरमती नदी. वह कुछ नहीं बोला लेकिन दक्षिणा में हजार रुपए ऐंठ ले गया. मैं ने उन से कहा भी कि आप ने अलग नाम बताया. वह ठग है. लेकिन मेरी ननद ने जवाब दिया, ‘‘साबरमती को गंगा भी बुलाते हैं. मुझे गुलाब ही पसंद है. हम ने ही उन्हें गलत बताया था.’’    

– कविता कुमारी

 

अंधविश्वास से अंधभक्ति

अज्ञानता से भय पैदा होता है, भय से अंधविश्वास पैदा होता है और अंधविश्वास से अंधभक्ति पैदा होती है. अंधभक्ति से मनुष्य का विवेक शून्य

हो जाता है. जिस का विवेक शून्य हो जाता है वह इंसान तर्क नहीं कर सकता, तर्क सुन भी नहीं सकता और फिर यहीं से शुरू होती है मानसिक गुलामी और शुरू होता है बाबाओं का खेल. भारत में करोड़ों लोग इस समस्या से पीडि़त हैं.               

– मोनिका

 

सार्थक संदेश की जरूरत

दिल्ली प्रैस की पत्रिकाएं जिस प्रकार ढोंगी बाबाओं की पोल खोलती आ रही हैं, वह संदेश अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे तो निश्चय ही लोगों के सोचनेसमझने का दृष्टिकोण बदलेगा.

जब मैं बहुत छोटी थी, पढ़लिख भी नहीं सकती थी. उस समय मेरी मम्मी ने मुझे सरिता में प्रकाशित एक कहानी ‘उड़ने वाले बाबा’ सुनाई थी. उस में एक ढोंगी बाबा गुब्बारे को मानवाकृति का रूप दे कर रात में धागे से बांध कर उड़ाते थे. मम्मी ने समझाया था कि ऐसे लोगों और उन के तथाकथित चमत्कारों पर कभी विश्वास मत करना. संभव है कि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में यदि बाबाओं का विरोध न हुआ होता तो अंधविश्वासी लोगों की संख्या कहीं अधिक होती.  

– मधु शर्मा

 

सच स्वीकार नहीं

मेरे घर में झाड़ूपोंछा करने के लिए जो महिला आती है वह राम रहीम की भक्त है. वर्षों से वह राम रहीम के आश्रम जाती रही है. राम रहीम की करतूतों का परदाफाश हुआ तो वह अब रो रही है, कहती है, ‘‘बाबा ऐसे नहीं हैं, उन पर इल्जाम लगाया गया है.’’ मेरी सास ने उसे समझाने की कोशिश की तो उसे उन पर भी गुस्सा आ गया. लोगों में इतनी अंधभक्ति भरी हुई है कि वे सच को सामने देख कर भी स्वीकार नहीं कर रहे.        

– पारुल

 

आखिर धर्म है क्या?

कई धर्मों व कई धार्मिकस्थलों के होने के बावजूद हम इंसानों को एक बाबा की जरूरत पड़ ही जाती है. आम इंसान ही नहीं, खास इंसान भी इन के चक्करों में पड़ते हैं.

इंदिरा गांधी न तो अनपढ़ थीं, न ही गरीब, फिर भी धीरेंद्र ब्रह्मचारी को गुरु मानती थीं. आज भी कई राजनेता, अभिनेता, उद्योगपति, खिलाड़ी ऐसे हैं जो किसी बाबा या माता के चरणों में सिर झुकाते हैं. गरीब जनता की तो बात ही छोड़ दीजिए.

इस सब के व्यावहारिक कारण कई हैं. भक्तों के मन में सुख पाने की लालसा रहती है, बाबा के मन में भी यही सब रहता है. सभी सांसारिक सुखों को भोगना चाहते हैं. इस के लिए माध्यम बनता है धर्म, जिसे कोई नहीं जानता कि आखिर है क्या? ऐसे में होता है जन्म नए बाबा का और यह सिलसिला रुकता ही नहीं.

भक्तों को सोचना होगा कि वे किस के पीछे, क्यों भाग रहे हैं. काम करो और आगे बढ़ो. वरना समझ लो, बाबा गुरमीत तो एक मास्क है, कितने ही बाबा और हैं जो आप को बेवकूफ बनाने को आमंत्रण देने को तत्पर हैं.               

– श्वेत

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