भारतीय कानून व्यवस्था में महिलाओं के हितों को ध्यान में रख कर कई कानून अस्तित्व में आए हैं. इसी प्रकार की एक कानूनी व्यवस्था गुजारा भत्ता व भरणपोषण को ले कर भी है. लेकिन, अदालतें अब आत्मनिर्भर महिलाओं को गुजारा भत्ता देने से साफ इनकार करने लगी हैं. अदालतें  उन महिलाओं की गुजारे भत्ते की मांग को खारिज कर रही हैं जो पति से वसूली की मंशा रखते हुए तलाक से पहले अपनी नौकरी छोड़ देती हैं या सक्षम होते हुए भी कुछ काम नहीं करतीं.

बदलते माहौल में अदालतें अब पत्नी की योग्यता और कार्यक्षमता का आकलन करने के बाद ही उन्हें गुजारे भत्ते का हकदार ठहरा रही हैं. पत्नी को हर प्रकरण में गुजारा भत्ता मिल ही जाएगा, यह जरूरी नहीं. पेश हैं कुछ उदाहरण जिन्होंने इस मामले को नए मोड़ दिए हैं :

पति की कमाई पर मुफ्तखोरी : हाल ही में दिल्ली की एक अदालत ने घरेलू हिंसा के एक मामले में महिला को मिलने वाले 5,500 रुपए के मासिक अंतरिम भत्ते में इजाफा कर उसे 25,000 रुपए करने की मांग की याचिका को खारिज कर दिया और अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि महिला पढ़ीलिखी है. महिला के पास एमए, बीएड और एलएलबी जैसी डिगरियां हैं और वह खुद कमा सकती है, इसलिए उस से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह घर पर आलसी की तरह बैठे और पति की कमाई पर मुफ्तखोरी करे.

अदालत ने कहा कि महिला ने गुजारा भत्ते में वृद्धि की मांग का न तो कारण बताया और न ही यह साबित किया कि उस के खर्च में वृद्धि कैसे हो गई.  अदालत का यह फैसला गुजाराभत्ता कानून के हो रहे दुरुपयोग के मद्देनजर  काफी अहम है.

पति भी गुजारे भत्ते का हकदार : भारत जैसे देश में जहां यह माना जाता है कि गुजारे भत्ते की हकदार पत्नी ही होती है, ऐसे में अगर पति से गुजारा भत्ते की मांग कर रही पत्नी को उलटा पति को  गुजारा भत्ता देने का अदालत से फरमान मिल जाए तो आप को हैरानी होगी. लेकिन, ऐसा हुआ है. महिलाओं के गुजारा भत्ता मांगने की इसी खराब आदत पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला को आदेश दिया है कि वह अपने पति को गुजारे भत्ते के रूप में हर महीने 20 हजार रुपए का भुगतान करे. अदालत ने महिला को यह भी निर्देश दिया कि वह पति को कार भी दे.

दरअसल, मामला कुछ ऐसा था कि पतिपत्नी के एक विवादित मुकदमे में पति ने वर्ष 2002 में अपनी पत्नी को अपनी संपत्ति की मालकिन बनाया था लेकिन पतिपत्नी के बीच बाद में झगड़े होने लगे जिस के चलते पत्नी ने अपने बच्चों के साथ मिल कर अपने पति को साल 2007 में उस के ही घर से बाहर निकाल दिया. जिस के बाद साल 2008 में पति ने कड़कड़डूमा कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की और साथ ही, हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा-24 के तहत गुजारा भत्ता दिए जाने की गुहार लगाई.

याचिका में पति ने कहा कि उसे घर से निकाला गया और उसे गुजारे के लिए खर्चा तक नहीं दिया जा रहा. याचिका में कहा गया था कि पीडि़त की पत्नी की सालाना आमदनी एक करोड़ रुपए है और उस के पास 4 गाडि़यां भी हैं, दूसरी तरफ पति की कोई आमदनी नहीं है और वह सड़क पर आ चुका है.

जिस के बाद साल 2009 में निचली अदालत ने फैसला सुनाया कि हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत पतिपत्नी में से जो भी आर्थिक रूप से संपन्न है वह दूसरे को गुजारा भत्ता दे सकता है और चूंकि पत्नी आर्थिक रूप से संपन्न है, इसलिए वह हर महीने अपने पति को 20 हजार रुपए गुजारा भत्ता दे.

इस फैसले के बाद पत्नी हाईकोर्ट पहुंची थी लेकिन हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और पत्नी को निर्देश दिया कि वह अपने पति को हर महीने 20 हजार रुपए गुजारा भत्ता और साथ ही कार भी दे.

बराबर कमाई तो गुजारा भत्ता नहीं: पति के बराबर ही कमाने वाली महिला को पति से गुजारा भत्ता पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. इस का उदाहरण पिछले दिनों एक मामले में देखने को मिला जिस में गुजारा भत्ता मांगने अदालत पहुंची पत्नी की अर्जी को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनुराधा शुक्ला भारद्वाज ने खारिज कर दिया. कारण था पत्नी की पति के बराबर ही कमाई होना

अदालत ने कहा कि लैंगिक समानता के इस दौर में पति को महज मर्द होने के कारण कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता है. दरअसल, इस मामले में पत्नी ने पति से आवास सुविधा मुहैया कराने की मांग की थी. अदालत ने कहा कि पत्नी को इस के लिए यह साबित करना होगा कि वह अपनी आर्थिक अक्षमता के कारण अपने लिए आवास का इंतजाम करने में लाचार है.

महिलाओं से आर्थिक सहयोग की उम्मीद : एक अन्य मामले में  महिला द्वारा अपने पति से गुजारा भत्ता मांगने पर कोर्ट ने महिला की मांग को खारिज कर दिया और कहा कि आज के समय में घर चलाने में महिलाओं से आर्थिक मदद की उम्मीद की जाती है, न कि बेकार बैठने की. महिला द्वारा की गई गुजारे भत्ते की मांग को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि महिला ने खुद यह स्वीकार किया है कि उस ने ब्यूटीशियन का कोर्स किया है जिस का मतलब है कि उस के पास काम करने और कमाने का हुनर है, लेकिन इस के बावजूद वह काम करना नहीं चाहती.

इस मामले में मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट मोना टारडी ने फैसला सुनाते हुए कहा कि आज के जमाने में महिलाओं से भी उम्मीद है कि वे काम कर घर में आर्थिक रूप से सहयोग करेंगी.

पत्नी होना मुआवजे की वजह न बने: दिल्ली की  ही एक सत्र अदालत ने यह फैसला सुनाया कि अगर पत्नी अपने पति से ज्यादा पढ़ीलिखी है, तो तलाक की सूरत में केवल इस बिना पर उसे मुआवजा नहीं मिल सकता कि वह एक पत्नी है. इस मामले में एक महिला ने अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ते की मांग को ले कर अदालत में मामला दाखिल किया था, लेकिन उस की दलील खारिज हो गई.

जिला व सत्र न्यायाधीश सुजाता कोहली की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि महिला अपने पति से ज्यादा पढ़ीलिखी है, इसलिए  वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है.

कोर्ट ने केस खारिज करते हुए कहा कि महिला कोर्ट को यह बताने में नाकाम रही कि वह ज्यादा पढ़ीलिखी है, लेकिन इस के बावजूद उस ने कभी नौकरी करने के बारे में क्यों नहीं सोचा. याचिकाकर्ता महिला दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट थी  और उस के पास लाइब्रेरी साइंस में डिप्लोमा भी था जबकि पति केवल 12वीं पास था.

पति की हैसियत का होगा आकलन: एडवोकेट अनुपमा गुप्ता बताती हैं, ‘‘वैवाहिक विवादों से संबंधित मामलों में कई कानूनी प्रावधान हैं, जिन के जरिए पत्नी गुजारा भत्ता मांग सकती है. सीआरपीसी, हिंदू मैरिज ऐक्ट, हिंदू अडौप्शन ऐंड मेंटिनैंस ऐक्ट और घरेलू हिंसा कानून के तहत गुजारा भत्ते की मांग की जा सकती है. अगर पतिपत्नी के बीच किसी बात को ले कर अनबन हो जाए और पत्नी अपने पति से अपने और अपने बच्चों के लिए गुजारा भत्ता चाहे तो वह सीआरपीसी की धारा-125 के तहत गुजारे भत्ते की अर्जी दाखिल कर सकती है. लेकिन कई महिलाएं कानून का दुरुपयोग करते हुए अपने पति से भारी रकम वसूलती हैं.

‘‘कई बार प्रेमी के संपर्क में रहने के लिए विवाहित महिलाएं अपने मातापिता के घर जा कर बैठ जाती हैं और महिलाओं के लिए बने कानूनों, जैसे दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और गुजारा भत्ता के कानूनों का पति पर दुरुपयोग करती है. कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए हाल ही में अदालत ने कई ऐसे फैसले दिए हैं जिन के अनुसार वे इस कानून का दुरुपयोग नहीं कर सकेंगी. हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा-24 के तहत गुजारा भत्ता तय होता है, जिसे तय करते वक्त पति व पत्नी की हैसियत देखी जाती है. अगर पत्नी की कमाई अच्छी हो और पति बेरोजगार हो तो गुजारा भत्ता पत्नी को भी देना पड़ सकता है. यानी पति या पत्नी जिस की भी माली हालत अच्छी नहीं है, उसे गुजारा भत्ता दिया जाता है. इस मामले में कानून में दोनों के प्रति एक ही नजरिया अपनाया गया है.’’

बिना कारण घर छोड़ेगी तो गुजारा भत्ता नहीं मिलेगा : एक दूसरे प्रकरण में पत्नी ने शादी के डेढ़ साल बाद ही पति का घर छोड़ दिया था. पति ने उसे इस के लिए कभी नहीं उकसाया था. पति ने उसे घर वापस बुलाने के लिए नोटिस भी भेजा लेकिन जब पत्नी की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला तो पति ने फैमिली कोर्ट में वैवाहिक अधिकारों को ले कर याचिका दायर की.

इस बीच पत्नी ने गुजारा भत्ता पाने के लिए याचिका दायर कर दी. फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका स्वीकार कर पत्नी की याचिका खारिज कर दी. न्यायाधीश ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि यदि पत्नी ने बिना किसी ठोस कारण के पति का घर छोड़ा है तो उसे गुजारा भत्ता पाने का हक नहीं है.

महिला पेशेवर है तो गुजारा भत्ता नहीं : एक अन्य फैसले में भी दिल्ली हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा के मामले में एक कामकाजी महिला को गुजारा भत्ता इस आधार पर देने से इनकार कर दिया कि महिला खुद एक पेशेवर है. वह बीते 13 साल से चार्टर्ड अकाउंटैंट के पेशे में है.

न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग और प्रतिभा रानी की खंडपीठ के समक्ष महिला ने अपने व अपने 2 बच्चों के अच्छे जीवन के लिए पति से 3 लाख रुपए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दिए जाने की मांग की थी. निचली अदालत से निराशा हासिल होने पर महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. सभी परिस्थितियों पर गौर करने के बाद खंडपीठ ने कहा कि उसे नहीं लगता कि महिला की याचिका में दम है.

अदालत ने महिला की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिस में उस ने महज 7 हजार रुपए प्रतिमाह कमाने की बात कही थी. खंडपीठ ने कहा कि 7 हजार रुपए की राशि तो न्यूनतम आय के कानून से भी कम है. 13 साल तक चार्टर्ड अकाउंटैंट जैसे पेशे में रहने के बाद महज 7 हजार रुपए प्रतिमाह कमाने की दलील विश्वास योग्य नहीं है.

इस से पूर्व निचली अदालत ने महिला के पति को यह आदेश दिया था कि वह अपने 2 बच्चों के अच्छे जीवनयापन के लिए 22,900 रुपए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे. महिला के पेशेवर होने के कारण उसे गुजारा भत्ता दिए जाने से अदालत ने इनकार कर दिया था.

दरअसल, भारतीय समाज का ढांचा ही कुछ ऐसा बना हुआ है कि महिलाओं को जीवन के हर पड़ाव पर पुरुषों पर आश्रित रहने की आदत डाल दी जाती है और इसी आदत की वजह से महिलाएं आर्थिक रूप से सक्षम होते हुए भी पुरुषों पर निर्भर रहती हैं और उन से गुजारे के लिए मुआवजे की मांग करती हैं.

वैसे महिलाएं समानता की, बराबरी की मांग करती हैं, वे कहती हैं कि वे पुरुषों से किसी तरह से कम नहीं. मातापिता भी उन्हें बेटों के बराबर शिक्षा और सुविधाएं देते हैं तो फिर वे आत्मनिर्भर और पढ़ीलिखी होने के बावजूद पति से गुजारे भत्ते की मांग क्यों करती हैं? क्या सक्षम होते हुए भी सुविधा की मांग करना उन की बराबरी के अधिकार के आड़े नहीं आता?    

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