आमतौर पर नर्सों पर लोग बहुत ज्यादा विश्वास करते हैं क्योंकि गरीब चाहे बच्चा हो या बड़ा, आदमी हो या औरत, नर्सों के हाथों में अपने को सुरक्षित समझते हैं. जिद्दी मरीजों को भी जो टैक्नीक नर्सों के कोमल हाथों में होती है वह अद्भुत होती है. यह एक ऐसा काम है जिसे आमतौर पर बहुत अी आदर से देखा जाता है और दुनिया भर में नर्सों को सिस्टर कहां जाता है.

लेकिन अपनाद हर जगह होते हैं. जब से बिमारियां बढ़ी हैं. नॄसग ज्यादा टैक्नीकल हो गई है, मरीजों की गिनती बढऩे लगी है, मरीज और नर्स का व्यक्तिगत संबंध नर्सों और मरीजों की भीड़ में खो गया है, नर्सों में थकान, बोरियत, तनाव, प्रेंशर की वजह से सेवा में कमी होने लगी है. दिल्ली के एक अस्पताल में एक 2 महीने के बच्चे के साथ मारपीट के आरोप पर एक नर्स को गिरफ्तार किया गया. बच्चे को चोटें भी लगीं और उस की हड्डियों में क्रेक भी आई हैं.

कोविड के दिनों में नर्सों ने अपनी जान पर खेल कर लोगों को बचाया है या उन के अंतिम क्षण तक उन का ध्यान रखा. फिर भी शिकायतों का अंबार भी लगा है कि डर के मारे और काम के बोझ के मारे नर्सों ने घंटों मरीजों को तड़पना छोड़ा है. दूसरी तरफ कुछ इलाकों में नर्सों को घरों में घुसने नहीं दिया कि कहीं वे कोरोना वायरस ले कर न आई हों. कहीं उन पर फूल भी बरसाए गए हैं पर यह काम जोखिमभरा रहा है.

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नर्सों की कमी अब पूरी दुनिया में बहुत हद तक बढ़ रही है क्योंकि अमीर देशों में लोग देर तक जी रहे हैं और उन के अपने कम होते जा रहे हैं, लोग होश रहतेरहते इंश्योरैंस   खरीद रहे हैं ताकि अस्पतालों में नर्स उन के पास रहें या ओल्डएज होमों में बुङ्क्षकग करा रहे हैं जहां नर्सों के भरोसे आखिरी दिन बिता सकें.

पैसे की खातिर गरीब देशों की लड़कियां दूर देशों में जा रही हैं जहां उन्हें अच्छा पैसा तो मिल रहा है पर अपना कोई समा नहीं मिल पाता. इस काम में 8-10 घंटे पैरों पर खड़ा रहता होता है जो पराए शहर और पराए देश में खलता है और ऊपर से यदि मरीज शिकायत करने लगें जो चाहे वाजिब और सही हो तो बहुत खलता है. हमारे देश में तो इसे प्रोफेशन में आने वाली लड़कियां सभी निचले जातियों की होती हैं और बढ़ती जातिवादी धाॢमक कट्टरता भी नर्सों को पूरा व सही आदर सम्मान देने के आड़े आती है.

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