बीते पिछले कुछ सालों में ऑनलाइन मनोरंजन इंडस्ट्री में बहुत ज्यादा वृद्धि देखी गयी है. नेटफ्लिक्स, अमेज़ॅन प्राइम, डिज़नी होस्टस्टार, आदि जैसी ऑनलाइन स्ट्रीमिंग सेवाओं के मिलने और तेज़, सस्ती इंटरनेट सेवाओं की शुरूआत होने से भारत में ओटीटी कंटेंट की बहुत बड़ी मात्रा खपत हो रही है. डॉ. प्रकृति पोद्दार, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, निदेशक पोद्दार वेलनेस के मुताबिक यहाँ पर बहुत सारे लोग ओटीटी कंटेंट के उपयोगकर्ता  बन गए है. पीडब्ल्यूसी के मीडिया एंड एंटरटेनमेंट आउटलुक 2020 के अनुसार भारत का ओटीटी बाजार 2024 तक दुनिया का छठा सबसे बड़ा बाजार बनने की ओर अग्रसर है.

 ओटीटी प्लेटफॉर्म पर डार्क और वायलेंट शो लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को किस प्रकार प्रभावित कर रहे हैं?

जबकि ओटीटी प्लेटफार्मों की बाजार हिस्सेदारी में भी बढ़ोत्तरी जारी है. इन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्मों की मुख्य समस्या इनका डार्क और वायलेंट कंटेंट रहा है. यह दर्शकों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है. स्क्वीड गेम, हाउस ऑफ सीक्रेट्स, यू और अन्य जैसे वेब सीरीज शो लोगों के बीच कौतुहल का विषय बने हुए हैं, लेकिन वे हिंसा, ड्रग्स, सेक्स और अपराध की संवेदनशीलता को बढ़ा रहे हैं जिससे लोगों का मानसिक स्वास्थ्य नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रहा है और सोशल स्किल में गिरावट हो रही हैं.

वायलेंट (हिंसक) और डार्क शो से नस्लीय हिंसक व्यवहार

ओटीटी प्लेटफॉर्म की लोकप्रियता के पीछे सबसे बड़ा कारण मनोरंजन है. स्मार्टफोन, लैपटॉप आदि जैसे गैजेट्स की उपलब्धता और इंटरनेट सेवाओं की पहुंच आसान होने से ओटीटी कंटेंट को कभी भी, कहीं भी देखने की सुविधा मिल जाती है. युवा, विशेष रूप से फ्रेश कंटेंट, दिलचस्प प्लॉट्स और किरदारों और परिस्थितियों की यथार्थवादी प्रस्तुतियों (रियल रिप्रजेंटेशन) के प्रतिनिधित्व से ओटीटी कंटेंट को ज्यादा देख रहे हैं, इन कंटेंट के साथ वे खुद को जोड़ कर देखते हैं. जबकि कुछ कंटेंट शिक्षित और सूचनात्मक है, कुछ हिंसक, अश्लील सामग्री को इस तरह से दिखाया जा रहा है जो दर्शकों के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित कर रहे है.

जब लोग सामूहिक गोलीबारी और अन्य हिंसा के हिंसक वीडियो देखते हैं, तो उनमे प्रत्यक्ष रूप से ट्रामा के होने की संभावना बढ़ जाती हैं. इससे एंग्जाइटी, डिप्रेशन, क्रोनिक स्ट्रेस और अनिद्रा की संभावना बढ़ जाती है. जिन लोगों को PTSD है, उनके लिए इन वीडियो को देखने से फ्लैशबैक जैसे लक्षणों में वृद्धि हो सकती है.

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क्रूर, हिंसक शो या फिल्मों को बार-बार देखने से दर्शकों में भय और चिंता बढ़ सकती है, और यहां तक कि इससे लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं. अध्ययनों के अनुसार आपदाओं, विशेष रूप से आतंकवाद को देखने से PTSD, डिप्रेशन, स्ट्रेस, एन्ग्जाईटी और यहां तक कि नशीलें पदार्थों के सेवन के मामलों में वृद्धि हो सकती है.

युवाओं और बच्चों में किसी के व्यवहार को खुद में नकल करने की ज्यादा संभावना होती है क्योंकि वे आसानी से ऑनलाइन वेब शो और अन्य वीडियो सामग्री पर दिखाई जाने वाली चीज़ों से जुड़े हो सकते हैं. इसका असर यह हो रहा है कि आज के युवाओं में बहुत सारे व्यवहार परिवर्तन लक्षण पैदा हो रहे है. यह न केवल उन्हें उनके व्यवहार और उनके विचारों दोनों में आक्रामक बनाता है, बल्कि उनमे धूम्रपान, शराब पीने, ड्रग्स, न्यूडिटी और अश्लीलता जैसी नियमित रूप से देखी गई चीज़ों से भी प्रभावित होने की संभावना को बढ़ा देता है. ये सब चीजें कई ऑनलाइन वेब शो में अक्सर दिखाए जाते हैं. ये कंटेंट आगे चलकर कम उम्र के लोगों में अस्वस्थ आदतों को विकसित कर सकते हैं.

कई स्टडी में पाया गया है कि हिंसक शो देखने और बच्चों द्वारा हिंसक व्यवहार में वृद्धि के बीच संबंध है. इस बात की पुष्टि 1000 से ज्यादा अध्ययनो में हो चुकी है. बहुत ज्यादा हिंसक चीजें देखने से व्यवहार आक्रामक हो जाता है, यह चीजें खासकर लड़कों में ज्यादा देखने को मिलती है.

बिंज-वाचिंग (किसी कंटेंट को लगातार देखना) से चिंता बढ़ जाती है

बिंज-वाचिंग अपेक्षाकृत एक नई घटना है, लेकिन निश्चित रूप से पिछले कुछ सालों में ओटीटी दर्शकों के बीच यह एक लोकप्रिय ट्रेंड बन गया है. कई स्टडी से पता चला है कि जो लोग बिंज-वाचिंग करते हैं, उनमें ख़राब वाली नींद और अनिद्रा से पीड़ित होने की संभावना ज्यादा होती है. बिंज-वाचिंग करना सर्कैडियन लय को बाधित कर सकता है, जिससे सोना मुश्किल हो जाता है.

मनोवैज्ञानिक रूप से एक वेब सीरीज एक व्यक्ति को घंटों तक बांधे रह सकती है, इस दौरान वह व्यक्ति सोना भी भूल  सकता है. ओटीटी शोज के ड्रामा, टेंशन, सस्पेंस और एक्शन को लोग खूब एन्जॉय करते हैं, लेकिन ये हार्ट रेट रुकने, ब्लडप्रेशर और एड्रेनालाईन को भी बढ़ाते हैं. जब कोई व्यक्ति इन्हे देखने के बाद सोने की कोशिश करता है तो यह अनुभव  एक तनावपूर्ण या हल्का दर्दनाक जैसा महसूस हो सकता है, जो सोने में परेशानी पैदा कर सकता है. नींद में यह व्यवधान व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है.

कई अध्ययनों में पाया गया है कि नींद की कमी की समस्या ध्यान, काम करने की याददाश्त और भावनात्मक व्यवहार जैसे मानसिक कामों को आसानी से नुक़सान पहुंचा सकते है. लंबे समय तक अनिद्रा से पीड़ित रहने पर  डिप्रेशन और एंग्जाइटी डिसऑर्डर का ज्यादा खतरा पैदा हो सकता है. बहुत ज्यादा बैठे रहना और स्नैकिंग भी मोटापे और इससे संबंधित समस्याओं जैसे डायबिटीज और हृदय की बीमारियों के खतरे को बढ़ाता है.

 सावधानी और निष्कर्ष

कोई भी जॉनर (शैली) का कंटेंट सबसे उपयुक्त की श्रेणी में नहीं आता है, लोगों को ऐसे किसी भी कंटेंट को देखने से बचना चाहिए जो उन्हें ट्रिगर करने वाला लगे और उन्हें समाज से अलग रखने को प्रेरित करें. एक व्यक्ति को यह समझने की जरूरत है कि कंटेंट को देखने के लिए कोई प्रिसक्रिप्शन (नुस्खा) नहीं है. एक संतुलित जीवन जीने के लिए सही नुस्खा डिजिटल चीजों को ज्यादा देखना नहीं है. जो लोग डिजिटल कंटेंट को ज्यादा देखते हैं, उनके लिए जीवन और काम के बीच संतुलन नहीं रह पाता है इससे उनका स्वास्थ्य नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है. दरअसल बार-बार डिजिटल डिटॉक्स करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना एक्सरसाइज, कला या सामाजिककरण होता है.

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